नेपोटिज्म पर रैपर हनी सिंह ने कही ये बात, ज्यादातर युवाओं के साथ ही काम करने की बताई वजह

‘बिजनेस वर्ल्ड’ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा के साथ एक बातचीत के दौरान मशहूर रैपर यो यो हनी सिंह ने साझा किए जीवन के अनुभव

Last Modified:
Saturday, 04 July, 2020
Honey Singh

म्यूजिक सिर्फ युवा दिलों की नहीं, बल्कि हर किसी के दिल की धड़कन होता है। म्यूजिक से ही तो जीवन रसमय है। बच्चे-बूढ़े हर कोई म्यूजिक से प्यार करते हैं। शायद ही कोई ऐसा हो, जिसे म्यूजिक से लगाव न हो। यही कारण है कि जीवन में म्यूजिक के महत्व को दर्शाने के लिए हर साल 21 जून को ‘विश्व संगीत दिवस’ (World Music Day) के रूप में मनाया जाता है। म्यूजिक के दीवानों के लिए हमारे समूह की बेवसाइट ‘Loudest.in’ ने 20 और 21 जून को ‘Music Inc 3.0’ नाम से वर्चुअल समिट का आयोजन किया।

वर्चुअल (ऑनलाइन) रूप से हुई इस दो दिवसीय समिट में 75 से ज्यादा स्पीकर एक साथ इस मंच पर आए। इस साल इस वर्चुअल समिट के स्पीकर्स में जाने-माने भारतीय कंपोजर, रैपर, पॉप सिंगर और फिल्म एक्टर यो यो हनी सिंह भी शामिल रहे। इस दौरान ‘बिजनेस वर्ल्ड’ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा के साथ एक बातचीत के दौरान इस लोकप्रिय म्यूजिक स्टार ने बॉलिवुड इंडस्ट्री में नेपोटिज्म से लेकर इंडस्ट्री में अपने अब तक के सफर और अपने जीवन से जुड़ी प्रमुख बातों समेत कई मुद्दों पर खुलकर अपने विचार रखे।

प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

लोग आपको यो यो हनी सिंह के रूप में जानते-पहचानते हैं। आपका यह नाम कैसे पड़ा?

यह एक लंबी कहानी है। शायद इस बात को 11-12 साल हुए हैं। पहले मेरा बेस चंडीगढ़ में था। उस समय मैं सिर्फ म्यूजिक डायरेक्टर था। मैं म्यूजिक डायरेक्शन की दिशा में ही काम करना चाहता था और अपना म्यूजिक तैयार करना चाहता था। मैं कभी भी गानों को लिखना या गाना नहीं चाहता था। म्यूजिक डायरेक्शन में सात-आठ साल गुजारने के बाद मैंने सोलो आर्टिस्ट के रूप में एक गाना लिखने की सोची और वह गाना था ‘Brown Rang’। यह गाना तुरंत ही हिट हो गया और मुझे और ज्यादा म्यूजिक तैयार करने के लिए प्रोत्साहित किया जाने लगा। ‘यो यो’ का मतलब होता है ‘आपका नाम’ और इस तरह उसके बाद मेरा नाम यो यो हनी सिंह पड़ गया।   

यो यो हनी सिंह के लिए पैसे के क्या मायने हैं? किसी कलाकार के लिए पैसा कितना महत्व रखता है?  

पैसा काफी महत्वपूर्ण है। चाहे कोई छोटा कलाकार हो अथवा बड़ा कलाकार, उनकी लाइफस्टाइल उनके जीने का अपना तरीका है और वे सुबह नौ से शाम पांच बजे वाली जॉब में यकीन नहीं रखते हैं। इसलिए, सही मायने में किसी कलाकार की जिंदगी जीने के लिए पैसा काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब आपके पास पर्याप्त पैसा होता है तो आपका दिल काम करता है, दिमाग काम करता है और म्यूजिक बनता है।

कोरोनावायरस (कोविड-19) जैसी महामारी के दौरान तमाम लोग काफी तनाव में हैं। आप भी जीवन में तमाम चुनौतियों से जूझकर बाहर निकले हैं। ऐसे लोगों के लिए आप क्या कहना चाहते हैं?

करीब तीन-चार साल पहले इस तरह की खबरें चली थीं कि मैं इलाज के लिए पुनर्वास केंद्र गया हूं, जबकि सच्चाई यह थी कि मैं करीब दो-ढाई साल तक अपने घर पर ही था। इस महामारी को लेकर जो लोग चिंतित अथवा तनावग्रस्त हैं, उन्हें मैं कहना चाहता हूं कि मैंने दो-ढाई साल किस तरह काटे यह मैं ही जानता हूं, लेकिन मैंने कभी भी निराशा और कमजोरी को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। मैं कहना चाहता हूं कि यह सिर्फ कुछ महीनों की बात है और हम सब इस महामारी के खिलाफ लड़ाई में जीतेंगे।

संकट के इस दौर में टेक्नोलॉजी किस तरह से कलाकारों की मदद कर रही है?

टेक्नोलॉजी की बात करें तो यह कलाकरों को एक बेहतर प्लेटफॉर्म दे रही है और उन्हें अपने गाने तैयार करने व प्रमोट करने में मदद कर रही है। टेक्नोलॉजी से जल्दी ही यह फीडबैक भी मिल जाता है कि ऑडियंस गानों को पसंद कर रही है या नहीं। इसलिए मेरा मानना है कि टेक्नोलॉजी कलाकारों को काफी सपोर्ट कर रही है।  

इस इंडस्ट्री में आपका कोई गॉडफादर नहीं था और फिर भी आप सफलता के शिखर पर पहुंचे। इन दिनों इंडस्ट्री में भाई-भतीजावाद (nepotism) को लेकर तमाम तरह की बातें सुनने को मिल रही हैं, इस बारे में आपका क्या कहना है?

मैंने अपने करियर में कभी भी नेपोटिज्म का सामना नहीं किया। मैं यहां दिल्ली से आया था और एक लोअर मिडिल क्लास फैमिली से था। मुझे यहां शाहरुख खान, अक्षय कुमार जैसे एक्टर्स का काफी सपोर्ट मिला, जिन्होंने मुझे इस इंडस्ट्री बारे में काफी गहराई से जानकारी दी। अमिताभ बच्चन सर ने भी मुझे काम का मौका दिया और मैंने उनके साथ फिल्म ‘भूतनाथ’ में एक गाना किया। मैं बहुत सौभाग्यशाली हूं कि बॉलिवुड ने मुझे इतना प्यार दिया और काम के मौके दिए।   

कहा जाता है कि युवाओं की नब्ज पर आपकी काफी बेहतर पकड़ है और यही कारण है कि आपके गाने तुरंत हिट हो जाते हैं, इस बारे में आप क्या कहेंगे?  

गाना लिखने या उसे निर्देशित करने से पहले मैं युवाओं के साथ समय बिताता हूं और उन्हें समझने की कोशिश करता हूं, ताकि यह पता चल सके कि उनकी क्या सोच है और वे क्या पसंद-नापसंद करते हैं। जिन कलाकारों के साथ मैं काम करता हूं, उनमें से ज्यादातर 22 से 23 साल की उम्र के हैं। उनके साथ काम करने के कारण मुझे युवाओं की सोच आदि जानने में मदद मिलती है और मैं अपने गानों में उसे शामिल करने की कोशिश करता हूं।  

आपको जीवन से तीन बड़ी सीख क्या सीखने को मिलीं?

यदि मैं अपनी बात करूं तो मैंने जो अपने जीवन में सीखा है, वह यह है कि हमेशा अपने दिल की सुननी चाहिए क्योंकि वही जानता है कि आप क्या चाहते हैं और आप इसे हासिल कर सकते हैं अथवा नहीं। दूसरी बात यह है कि हमेशा अपने पैरेंट्स से नजदीक रहें। उनकी देखभाल करें और उन्हें सपोर्ट करें और तीसरी व आखिरी बात जो मैंने अपने जीवन में सीखी है, वह यह है कि अपने आप से कभी झूठ न बोलें।

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डेलीहंट के फाउंडर्स बोले, भारत में एंटरप्रिन्योर बनना कमजोर दिल वालों का काम नहीं

डेलीहंट के फाउंडर वीरेंद्र गुप्ता व को-फाउंडर उमंग बेदी ने अपने शॉर्ट वीडियो ऐप जोश समेत तमाम मुद्दों पर रखी राय

Last Modified:
Monday, 05 October, 2020
Josh

लोकल मार्केट में अपना दबदबा बढ़ाने के बाद ‘डेलीहंट’ (Dailyhunt) ने पिछले दिनों शॉर्ट वीडियो ऐप ‘जोश’ (Josh) लॉन्च किया था, जिसे पहले हफ्ते से ही लोगों द्वारा काफी पसंद किया जा रहा है। ‘डेलीहंट’ के फाउंडर वीरेंद्र गुप्ता और को-फाउंडर उमंग बेदी ने ‘बिजनेस वर्ल्ड’ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ ग्रुप के डायरेक्टर नवल आहूजा से अपनी नई पेशकश, भारतीय ऐप मार्केट पर बढ़ते फोकस और डिजिटल कंटेंट पब्लिशर्स के आगे बढ़ने समेत तमाम मुद्दों पर बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

इस समय नए शॉर्ट वीडियो ऐप जोश को लॉन्च करने के पीछे आपकी क्या सोच रही, इस बारे में कुछ बताएं?

उमंग बेदी: हम देश के डिजिटल सिस्टम में एक बिलियन लोगों को शामिल करना चाहते हैं, जो स्थानीय भाषाओं द्वारा संचालित है। हमारा मानना है कि डेलीहंट के साथ स्थानीय भाषाओं को लेकर एक सामाजिक क्रांति शुरू हो रही है। हम सबसे बड़ा डिजिटल मीडिया बनना चाहते हैं जो एक अरब भारतीयों को इंफॉर्म करने, उनका ज्ञान बढ़ाने और मनोरंजन करने वाले कंटेंट को डिस्ट्रीब्यूट करने और कंज्यूम करने के लिए सशक्त बना रहा है। हमारी स्ट्रैटेजी अपने यूजर्स, कंज्यूमर्स, पब्लिशर्स, पार्टनर्स और ऐडवर्टाइजर्स के लिए उनकी पसंद का ऐसा प्लेटफॉर्म तैयार करना है, जो स्थानीय भाषाओं पर केंद्रित हो। हम इस बात को लेकर पूरी तरह स्पष्ट हैं कि हम स्थानीय भाषा के यूजर्स (लोकल लैंग्वेज यूजर्स) के लिए अपना माइंडशेयर (mindshare), टाइमशेयर (timeshare) और रेवेन्यू शेयर (revenue share) चाहते हैं। पिछले दो वर्षों में हमने काफी ज्यादा ग्रोथ देखी है। यहां तक कि मार्च से जब पूरे देश में लॉकडाउन लगा हुआ था, डेलीहंट ने काफी ज्यादा कंटेंट को प्राथमिकता देना और उसे बनाना शुरू कर दिया था। जब प्रधानमंत्री ने देश को आत्मनिर्भर बनाने के बारे में बात की तो इस बात ने डेलीहंट को प्रोत्साहन के साथ एक अतिरिक्त जिम्मेदारी भी प्रदान की। जैसा कि हमने कहा है कि हम शार्ट वीडियो के फॉर्मेट द्वारा स्थानीय भाषा के यूजर्स (लोकल लैंग्वेज यूजर्स) के लिए अपना माइंडशेयर (mindshare), टाइमशेयर (timeshare) और रेवेन्यू शेयर (revenue share) चाहते हैं, हमने दो हफ्ते के समय में जोश को लॉन्च किया। हमारा यह शॉर्ट वीडियो ऐप पूरी तरह स्वदेशी है और यह देश का तेजी से बढ़ता ऐप है, जिसे लोगों द्वारा काफी पसंद किया जा रहा है।

जोश को लॉन्च किए हुए कुछ हफ्ते हो गए हैं, इसका अब तक का रिस्पॉन्स कैसा रहा है?

उमंग बेदी: जोश देश के टॉप 200 क्रिएटर्स का अनूठा संगम है, जिनका विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर सामूहिक यूजर बेस 300-400 मिलियन है। शुरुआती हफ्तों की बात करें तो जोश को बेहतरीन प्रतिक्रिया मिली है। 45 दिनों में ही हम टॉप रेटेड ऐप बन गए हैं, जिसके 50 मिलियन डाउनलोड्स हो गए हैं। रोजाना इस ऐप पर 23 मिलियन लोग आते हैं और औसतन 21 मिनट व्यतीत करते हैं। इसमें रोजाना एक बिलियन वीडियो प्ले होते हैं और पांच मिलियन लोग कंटेंट बना रहे हैं। जिस हिसाब से हमारी ग्रोथ हो रही है, हमें उम्मीद है कि इस तरह अगले 60 से 90 दिनों में हम इन आंकड़ों के दोगुने तक पहुंच जाएंगे। हमने इसे पूरी तरह भारत में, भारत के लिए 14 भारतीय भाषाओं में तैयार किया है और हमारा मानना है कि यूजर बेस के मामले में इसने टिकटॉक को रिप्लेस कर दिया है।

वीरेंद्र गुप्ता: विदेशी कंपनियां जब भारत को सिर्फ अंग्रेजी भाषी मार्केट के तौर पर देखती हैं, डेलीहंट स्थानीय भाषाओं में काम कर रहा है। हम काफी समय से इस मार्केट में हैं। हमने इस मार्केट के लिए टूल्स, टेक्नोलॉजी और कंटेंट तैयार किया है। अभी तक इस मार्केट पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया था और हमने अपनी पेशकश के द्वारा इस दिशा में काफी काम किया है। जोश हमारी नवीनतम पेशकश है।

भारतीय ऐप के ईकोसिस्टम की बात करें तो इसमें रोजाना प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है, ऐसे में आप किस तरह आगे बने हुए हैं?

वीरेंद्र गुप्ता: यह बहुत अच्छी बात है कि बहुत सारी भारतीय कंपनियां नए ऐप बना रही हैं। हमें एक नए भारत की कल्पना करने की जरूरत है। हम जानते हैं कि इस खेल को कैसे जीता जाता है। मेरा मानना है कि यदि मार्केट में ज्यादा प्लेयर्स आते हैं तो इससे आगे बढ़ने में मदद मिलेगी और हमें एक-दूसरे से काफी कुछ सीखने को मिलेगा। इससे शॉर्ट वीडियो ऐप्स और अन्य ऐप्स पर काफी प्रभाव पड़ेगा, क्योंकि युवा एंटरप्रिन्योर्स नए-नए आइडियाज के साथ आ रहे हैं, इससे भारतीय ऐप का ईकोसिस्टम आगे बढ़ेगा।

उमंग बेदी: भारतीय स्टार्ट-अप इकोसिस्टम को लेकर मैं बहुत प्रोत्साहित और उत्साहित हूं। मैं हमेशा से कहता हूं कि भारत में एंटरप्रिन्योर बनना कमजोर दिल वालों का काम नहीं है। इस मार्केट में काफी भीड़भाड़ है, लेकिन प्रत्येक वर्टिकल की तरह चाहे वह ऑटोमोबाइल्स हो, हैंडसेट्स हो, टेलिकॉम या ई-कॉमर्स हो, मार्केट में दो प्लेयर्स बड़े शेयर्स के साथ उभरकर सामने आते हैं।

मेरा मानना है कि अगले छह महीनों में यह मार्केट नया रूप लेने जा रहा है। यदि आप कुछ बड़ी टेक कंपनियों की तरफ देखें, जिन्होंने अपने मार्केट में स्थानीय भाषाओं पर काम किया है, ऐसे में उन्हें किस वजह के आगे निकलने का अधिकार है?

पहली बात तो यह है कि उन्हें विभिन्न भाषाओं में विभिन्न फॉर्मेट्स में कंटेंट की गहरी समझ है। कंटेंट को समझने के लिए उनके पास आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (AI) है। दूसरी बात यह है कि वह गहरी समझ का इस्तेमाल कर रहे हैं। तीसरी बात यह है कि उनमें बड़े पैमाने पर मुद्रीकरण (monetisation) को तैयार करने की क्षमता है। हम इस बात की काफी कद्र करते हैं कि ग्लोबल कंपनियों ने किस तरह से अपना बिजनेस तैयार किया है, लेकिन हम पूरी तरह स्पष्ट हैं कि वे सिर्फ देश के खास तबके तक सीमित हैं। हम इस मायने में उनसे अलग हैं कि हम भारत को अच्छे से समझते हैं, हम स्थानीय भाषाओं को समझते हैं। देश में 21000 पिन कोड में से हमें 19000 से ट्रैफिक मिलता है। हमें लगता है कि दो बड़े प्लेयर्स के लिए एक-दूसरे से आगे बढ़ने के लिए मार्केट काफी बड़ा है और अपने आप को लेकर हम काफी आश्वस्त हैं।

यदि टिकटॉक की भारतीय मार्केट में दोबारा से एंट्री होती है या जियो कोई इसी तरह का प्रॉडक्ट लॉन्च कर देता है तो उस दौरान आपकी स्ट्रैटेजी क्या रहेगी?

कंप्टीशन को लेकर हम चिंतित नहीं हैं। हम प्रतिस्पर्धा का स्वागत करते हैं। हम ऐसे मार्केट में प्रतिस्पर्धा करते हैं, जहां पर डिजिटल एडवर्टाइजिंग की बात आती है तो एकाधिकार हावी हो जाता है। हमने चीन के बड़े ऐप्स के साथ प्रतिस्पर्धा की है और हमने वह लड़ाई जीती भी है। यदि टिकटॉक या इसी तरह का कोई ऐप वापस भी आ जाता है, तो भी हमें कोई दिक्कत नहीं है। हमारा मानना है कि यह मार्केट दो या तीन प्लेयर्स के लिए पर्याप्त बड़ा है और हमें पूरा विश्वास है कि हम उन दो प्लेयर्स में शामिल होंगे।

आपकी नजर में, क्या मार्च 2020 के बाद विज्ञापन खर्च में कुछ परिवर्तन आया है, मार्केट को लेकर आपका क्या कहना है?

उमंग बेदी: आप जिस क्षण डिजिटल में आते हैं, प्रत्येक मार्केटर आपकी परफॉर्मेंस मांगता है। चाहे पहुंच अथवा फ्रीक्वेंसी की बात हो, चाहे क्लिक की बात हो या फिर एडवर्टाइजिंग का प्रदर्शन हो।

गूगल, फेसबुक और डेलीहंट के अलावा कितने प्लेटफॉर्म्स हैं, जहां पर आप परफॉर्मेंस के आधार पर विज्ञापन हासिल कर सकते हैं?

जो मैंने देखा है, उसके अनुसार, कोविड-19 की तिमाही के दौरान हमारे रेवेन्यू में साल दर साल 100 प्रतिशत तक का इजाफा हुआ है। अब हम ब्रैंड एडवर्टाइजिंग में काफी उछाल देख रहे हैं। मुझे लगता है कि परफॉर्मेंस एक यात्रा है और हमने 100000 पब्लिशर्स व लोगों के साथ मिलकर डाटा इंटीग्रेशन तैयार किया है, जो हमें कंटेंट दे रहे हैं। परफॉर्मेंस की बात करें तो हमारे पास 250 एडवर्टाइजर्स हैं, जिनके साथ हमने डाटा इंटीग्रेशन (डाटा एकीकरण) किया है, जिसके द्वारा हम यूजर को ट्रैक कर सकते हैं और उसी हिसाब से टार्गेट कर सकते हैं। यही कारण है कि देश में गूगल और फेसबुक के बाद हम एकल गंतव्य (single destination) के मामले में रेवेन्यू के हिसाब से तीसरे स्थान पर हैं। हम अभी इनसे काफी दूर हैं, क्योंकि देश में ये कंपनियां रेवेन्यू और पहुंच के मामले में काफी बड़ी हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि आने वाले तीन वर्षों में भारत में डिजिटल टीवी के बराबर आ जाएगा या इससे आगे निकल जाएगा।  

वीरेंद्र गुप्ता: हमारे पास डेलीहंट के ऐप्स पर रोजाना दो घंटे से ज्यादा समय बिताने वाले 500 मिलियन लोकल लैंग्वेज यूजर्स होंगे। और जब आप ऐसा करते हैं, तो मेरा मानना ​​है कि विज्ञापन और बढ़ेंगे, क्योंकि यह भारत है और यह एक अंडरस्कोर मार्केट है। जैसा कि हम जानते हैं, विज्ञापन का पैसा बड़े पैमाने पर चलता है और यही वह जगह है, जहां हम आगे बढ़ रहे हैं।

यदि हम कंटेंट के विमुद्रीकरण (monetising) की बात करें देश में डिजिटल न्यूज पब्लिशिंग ईकोसिस्टम के लिए आगे बढ़ने का क्या तरीका है?

उमंग बेदी: यदि आप भारत और यहां के इंटरनेट ईकोसिस्टम के बारे में सोचते हैं तो आज की तारीख तक हम ओपन और न्यूट्रल इंटरनेट में विश्वास रखते हैं। हम मल्टीस्टेकहोल्डर तंत्र में विश्वास रखते हैं। रही बात सही और गलत स्ट्रैटेजी की तो मेरा मानना है कि इस पर गंभीर बहस किए जाने की जरूरत है। इसके अलावा टीवी ने भी काफी यूनिक और अलग कंटेंट तैयार किया है। जब मैं पांच अलग-अलग चैनल्स पर न्यूज देखता हूं तो यह वैचारिकता से प्रभावित लगती है, जो तथ्य नहीं हैं। यह न्यूज का विश्लेषण और उस न्यूज के बारे में राय है। मुझे लगता है कि एक पब्लिशिंग ईकोसिस्टम के रूप में हमें इससे प्रेरणा लेने की आवश्यकता है।

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IIMC के DG प्रो.संजय द्विवेदी बोले- दो आधारों पर खड़ी है आज की पत्रकारिता

मेरे जीवन में किस्से बहुत नहीं हैं, संघर्ष तो बिल्कुल नहीं। मेरे पास यात्राएं हैं, कर्म हैं और उससे उपजी सफलताएं हैं। बहुत संघर्ष की कहानियां नहीं हैं, जिन्हें सुना सकूं।

विकास सक्सेना by
Published - Monday, 17 August, 2020
Last Modified:
Monday, 17 August, 2020
Sanjay Dwivedi

प्रो.संजय द्विवेदी देश के जाने-माने पत्रकार, संपादक, लेखक, संस्कृतिकर्मी और मीडिया प्राध्यापक हैं। अनेक मीडिया संगठनों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालने के बाद वे माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल में 10 वर्ष मास कम्युनिकेशन विभाग के अध्यक्ष, विश्वविद्यालय के कुलपति और कुलसचिव भी रहे। राजनीतिक, सामाजिक और मीडिया के मुद्दों पर निरंतर लेखन से उन्होंने खास पहचान बनाई है। अब तक 25 पुस्तकों का लेखन और संपादन करने वाले प्रो.  द्विवेदी को अनेक संगठनों ने मीडिया क्षेत्र में योगदान के लिए सम्मानित किया है। हाल ही में उन्हें देश के प्रतिष्ठित मीडिया प्रशिक्षण संस्थान- भारतीय जनसंचार संस्थान का महानिदेशक नियुक्त किया गया है। भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) के 56वें स्थापना दिवस पर समाचार4मीडिया ने उनसे खास बातचीत की - 

आपने अब तक तमाम मीडिया संस्थानों और शैक्षणिक संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं, अपने अब तक के सफर के बारे में कुछ बताएं?

मैं खुद को आज भी मीडिया का विद्यार्थी ही मानता हूं।  पत्रकारिता में मेरा सफर 1994 में दैनिक भास्कर, भोपाल से प्रारंभ हुआ। उसके बाद स्वदेश-रायपुर, नवभारत- मुंबई, दैनिक भास्कर-बिलासपुर, दैनिक हरिभूमि-रायपुर, इंफो इंडिया डॉटकॉम-मुंबई, जी 24 घंटे छत्तीसगढ़ जो छत्तीसगढ़ का पहला सैटेलाइट चैनल था के साथ रहा। पत्रकारिता में संपादक, स्थानीय संपादक, समाचार संपादक, इनपुट एडिटर, एंकर जैसी जिम्मेदारियां मिलीं, उनका निर्वाह किया। मीडिया शिक्षा में आया तो कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय, रायपुर में पत्रकारिता विभाग का संस्थापक विभागाध्यक्ष रहा। बाद में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में कुलपति, कुलसचिव जैसे पदों के साथ जनसंचार विभाग के अध्यक्ष के रूप में भी दस साल दायित्व रहा। बचपन के दिनों के में दोस्तों के मिलकर‘बालसुमन’ नाम की पत्रिका निकाली। यह लिखने-पढ़ने का शौक ही बाद में जीविका बन गया  तो सौभाग्य ही था।

 इस दौरान का कोई ऐसा खास वाक्या जो आपको अभी तक याद हो?

मेरे जीवन में किस्से बहुत नहीं हैं, संघर्ष तो बिल्कुल नहीं। मेरे पास यात्राएं हैं, कर्म हैं और उससे उपजी सफलताएं हैं। बहुत संघर्ष की कहानियां नहीं हैं, जिन्हें सुना सकूं। अपने काम को पूरी प्रामणिकता, ईमानदारी से करते रहे। अपने अधिकारी के प्रति ईमानदार रहे, यात्रा चलती रही। मौके मिलते गए। मुंबई, भोपाल, रायपुर, बिलासपुर और अब दिल्ली में काम करते हुए कभी चीजों के पीछे नहीं भागा। नकारात्मकता और नकारात्मक लोगों से दूरी से बनाकर रखी। साधारण तरीके से चलते चले गए। यह सहज जीवन ही मुझे पसंद है। सफलता से बड़ा मैंने हमेशा सहजता को माना। कुछ दौड़कर, छीनकर नहीं चाहिए। स्पर्धा और संघर्ष मेरे स्वभाव में नहीं है। मैं अपना आकलन इस तरह करता हूं कि मैं कोई विशेष प्रतिभा नहीं हूं। सकारात्मक हूं और सबको साथ लेकर चलना मेरा सबसे खास गुण है। मैं जो कुछ भी हूं अपने माता-पिता, मार्गदर्शकों, शिक्षकों और दोस्तों की बदौलत हूं।   

 'कोविड-19 के दौरान पढ़ाई-लिखाई की पुरानी व्यवस्था पर काफी फर्क पड़ा है। नए दौर में ऑनलाइन पढ़ाई पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है। आईआईएमसी में इसके लिए किस तरह की तैयारी पर जोर है?

ऑनलाइन कक्षाएं हमारी मजबूरी हैं। कोरोना  जैसे संकट से डील करने का न हमारे तंत्र का अभ्यास, न हमारा है। लोंगों की जिंदगी अहम है। खासकर हमारे विद्यार्थी किसी संकट का शिकार न हों यही चिंता है। पहला सेमेस्टर ऑनलाइन ही चलेगा। तैयारी पूरी है। हमारा प्रशासनिक तंत्र और अध्यापकगण इसके लिए तैयार हैं। विद्यार्थी तो वैसे भी नए माध्यमों और  प्रयोगों का स्वागत ही करते हैं। ई-माध्यमों के साथ हमारी पीढ़ी भले सहज न हो, किंतु हमारे विद्यार्थी बहुत सहज हैं। 

पिछले दिनों आईआईएमसी में फीस बढ़ोतरी का मुद्दा काफी गरमाया रहा है, हालांकि फिलहाल यह मामला शांत है, इस बारे में आपका क्या कहना है और इस तरह के मुद्दों से किस तरह निपटेंगे?

किसी भी मामले में अपना अभ्यास निपटने-निपटाने का नहीं है। सहज संवाद का है, बातचीत का है। बातचीत से चीजें हल नहीं होतीं, तो लोग अन्य मार्ग भी अपनाते हैं। एक शासकीय संगठन होने के नाते हमारी सीमाएं हैं, हम हर चीज को मान नहीं सकते। किंतु छात्र हित सर्वोपरि है।  संवाद से रास्ते निकालेंगे। अन्यथा अन्य फोरम भी जहां लोग जाते रहे हैं, जाएंगे, जाना भी चाहिए।

पत्रकारिता में व्यावहारिक रूप में काफी बदलाव आए हैं। कोरोना काल में पत्रकारों ने अपनी जान जोखिम में डालकर ड्यूटी को अंजाम दिया है, यह बिल्कुल नई तरह की आपदा है। पत्रकारों की नई पौध को इस तरह की किसी भी स्थिति के लिए किस तरह व्यावहारिक रूप से तैयार करेंगे?

मैंने आपसे पहले भी कहा इस तरह के संकटों से निपटने का अभ्यास हमारे पास नहीं है। हम सब सीख रहे हैं। बचाव के उपाय भी अब धीरे-धीरे आदत में आ चुके हैं। पत्रकारिता हमेशा जोखिम भरा काम था। खासकर जिनके पास मैदानी या रिपोर्टिंग  दायित्व हैं। जान जोखिम में डालकर पत्रकार अपने कामों को अंजाम देते रहे हैं। कोरोना संकट में भी पत्रकारों के सामने सिर्फ संक्रमण के खतरे ही नहीं थे, कम होते वेतन, जाती नौकरियों के भी संकट थे। सबसे जूझकर उन्हें निकलना  होता है। फिर भी वे काम कर रहे हैं, समाज को संबल देने का काम कर रहे हैं। हमें भी ऐसी पीढ़ी का निर्माण करना है, जो जरा से संकटों से घबराए नहीं, संबल और साहस बनाए रखे। एक संचारक के नाते हम सबकी कोशिश होनी चाहिए कि समाज में गलत खबरें न फैलें, नकारात्मकता न फैले, लोग निराशा और अवसाद के शिकार न हों। उन्हें उम्मीदें जगाने वाली खबरें और सूचनाएं देनी चाहिए। हमारे विद्यार्थी बहुत प्रतिभावान हैं। वे अपने सामने उपस्थित सवालों और उनके ठोस तथा वाजिब हल निकालने की क्षमताओं से भरे हैं। मैं उन्हें बहुत आशा और उम्मीदों से देखता हूं। 

इस प्रतिष्ठित मीडिया शिक्षण संस्थान से पढ़कर निकले तमाम विद्यार्थी विभिन्न संस्थानों में ऊंचे पदों पर काम कर रहे हैं। IIMC को और अधिक ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए क्या आपने किसी तरह की खास स्ट्रैटेजी बनाई है?

हमारे संस्थान की स्थापना की आज हम 56वीं वर्षगांठ मना रहे हैं। 17 अगस्त,1965 को तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने इसका शुभारंभ किया था। मेरा सौभाग्य है कि एक खास  समय में मुझे इस महान संस्थान की सेवा करने का अवसर मिला है। मेरी कोशिश होगी इस महान संस्था की गौरवशाली परंपराओं में कुछ और सार्थक जोड़ सकूं। इसे भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता का केंद्र बनाने, उन पर शोध अनुसंधान का काम हो, इसकी कोशिश होगी। अपने बहुत प्रतिभावान पूर्व विद्यार्थियों, पूर्व प्राध्यापकों, पूर्व महानिदेशकों से संवाद करते हुए, उनकी सलाह लेते हुए इसे जीवंत व ऊर्जावान परिसर बनाने की कोशिश होगी। जहां बिना छूआछूत के सभी विचारों और प्रतिभाओं का स्वागत होगा। एक समर्थ भारत बनाने में कम्युनिकेशन और कम्युनिकेटर्स बहुत खास भूमिका है, हम इस ओर जोर देंगे। 

नई शिक्षा नीति कितनी सही, कितनी गलत, इस बारे में क्या है आपका मानना?

नई शिक्षा बहुत सुविचारित और सुचिंतित तरीके से प्रकाश में आई है। इसको बनाने के पहले जो मंथन हुआ है, जिस तरह पूरे देश  के लोगों की राय ली गयी है, वह प्रक्रिया बहुत खास  है। इसमें भारतीयता, भारत बोध, नैतिक शिक्षा, पर्यावरण और भारतीय भाषाओं को सम्मान देने के विषय जिस तरह से संबोधित किए गए हैं, उसके कारण यह विशिष्ट बन गयी  है। उच्च शिक्षा को स्ट्रीम से मुक्त करना एक तरह का क्रांतिकारी फैसला है। 0 से  8 साल के बच्चों का विचार। जन्म से लेकर पीएचडी तक बच्चे की परवाह यह शिक्षा नीति करती है। मुझे लगता है कि नीति के तौर इसमें कोई समस्या  नहीं है। इसे जमीन पर उतारना एक कठिन काम है। इसलिए शिक्षाविदों, शिक्षा से जुड़े अधिकारियों और संचारकों की जिम्मेदारी बहुत बढ़ गयी है। इस शिक्षा नीति को हम उसके वास्तविक संकल्पों के साथ जमीन पर उतार पाए तो एक ऐसा भारत बनेगा जिसकी कल्पना हमारे राष्ट्रीय आंदोलन के नायकों ने की थी। मुझे लगता है कि हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार की मंशाएं बहुत स्पष्ट हैं, अब समय हमारे द्वारा किए जाने वाले क्रियान्वयन और डिलेवरी का है। निश्चय ही इस कठिन दायित्वबोध ने हम सबमें ऊर्जा का संचार भी किया है। 

एक आखिरी सवाल, पत्रकारिता के क्षेत्र में आने वाले नए विद्यार्थियों के लिए क्या संदेश देना चाहेंगे?

आज की पत्रकारिता दो आधारों पर खड़ी है, एक भाषा, दूसरा तकनीकी ज्ञान। तकनीक दिन-प्रतिदिन और माध्यमों के अनुसार बदलती रहती है। तकनीक ज्यादातर अभ्यास का मामला भी है। हम करते और सीखते जाते हैं। भाषा एक कठिन स्वाध्याय से अर्जित की जाती है। किंतु हमें हर तरह से भाषा में ही व्यक्त होना है। इसलिए हमारे युवा पत्रकारों को भाषा के साथ रोजाना का रिश्ता बनाना होगा। एक अच्छी भाषा में सही तरीके कही गयी बात का कोई विकल्प नहीं है। दूसरा हमें सिर्फ सवाल खड़े करने वाला नहीं बनना है, इस देश के संकटों के ठोस  और वाजिब हल तलाशने वाला पत्रकार बनना है। मीडिया का उद्देश्य अंततः लोकमंगल ही है। यही साहित्य का भी उद्देश्य है, हमारी सारी प्रदर्शन कलाओं का भी यही ध्येय है। इसके साथ ही देश की समझ। देश के इतिहास, भूगोल, संस्कृति, परंपरा, आर्थिक-सामाजिक चिंताओं,  संविधान की मूलभूत चिंताओं की गहरी समझ हमारी पत्रकारिता को प्रामणिक बनाती है। तभी हम समाज के दुखः-दर्द, उसकी चिंताओं को समझकर तथ्य और सत्य पर आधारित पत्रकारिता करने में समर्थ होते हैं। सामाजिक-आर्थिक न्याय से  युक्त, न्यायपूर्ण-समरस समाज हम सबका साझा स्वप्न है। पत्रकारिता अपने इस कठिन दायित्वबोध से अलग नहीं हो सकती।

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BCCI और IPL को लेकर वरिष्ठ खेल पत्रकार बोरिया मजूमदार ने कही ये बात

बीसीसीआई 18 अगस्त को आईपीएल के टाटइल स्पॉन्सर की घोषणा कर सकता है।

Last Modified:
Sunday, 16 August, 2020
boria-majumdar

‘इंडियन प्रीमियर लीग’ (आईपीएल) 2020 की टाइटल स्पॉन्सर चीनी कंपनी ‘वीवो’ (VIVO) ने इस साल लीग से हाथ खींच लिए हैं। वीवो ने पिछले दिनों घोषणा की है कि वह साल इस आयोजन की फ्रेंचाइजी का हिस्सा नहीं रहेगा। अब सबकी निगाहें बीसीसीआई पर लगी हुई हैं। इसके साथ ही बीसीसीआई ने नए टाइटल स्पॉन्सर की तलाश शुरू कर दी। अब खबर है कि बीसीसीआई 18 अगस्त को टाइटल स्पॉन्सर की घोषणा कर सकती है।

इस बारे में क्रिकेट की गहराई से समझ रखने वाले जाने-माने खेल पत्रकार, लेखक और शिक्षाविद बोरिया मजूमदार से हमारी सहयोगी वेबसाइट एक्सचेंज4मीडिया (exchange4media) ने बातचीत की। इस दौरान मजूमदार ने बताया कि इस साल टाइटल स्पॉन्सरशिप के लिए किस तरह भारतीय कंपनियां आगे आ रही हैं और बीसीसीआई कैसे इसे अपनी प्रतिष्ठा के रूप में देखता है।  

पेश हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

क्या बीसीसीआई दोबारा से अपनी पूर्ववत स्थिति में आ सकता है?

इस स्वतंत्रता दिवस पर भारतीय खेल गलियारों में सबसे ज्यादा यही सवाल उठा। आईपीएल की टाइटल स्पॉन्सरशिप के लिए कई बड़ी भारतीय कंपनियां आगे आई हैं। इसमें कोई शक नहीं है कि यह आयोजन एक बार फिर मार्केट के सारे अनुमानों को मात दे देगा और आश्चर्यचकित कर देगा। इस साल वीवो के अलग हटने से 440 करोड़ रुपये के नुकसान के बाद तमाम लोगों को लगता है कि वर्तमान आर्थिक परिस्थितियों में बीसीसीआई 200 करोड़ रुपये कमा लेगा।   

संभावना है कि यह कम से कम 100 करोड़ रुपए ज्यादा यानी कुल 300 करोड़, जिनमें से 200 करोड़ से ज्यादा टाइटल स्पॉन्सरशिप से और 100 करोड़ दो अन्य ऑफिशियल पार्टनर से कमा लेगा। खास बात यह है कि अनिश्चितता के इस दौर में भी भारतीय कंपनियां (India Inc) इस आयोजन का सपोर्ट करने के लिए पूरी तरह दृढ़ हैं। दूसरा आप इन कंपनियों को देखें और तीसरा लोकल फ्लेवर भी इसमें अपनी भूमिका निभाएगा।  

यदि हम इंडिया इंक की बात करें तो आपको क्या लगता है, कौन सा ब्रैंड्स इस साल प्रमुख भूमिका निभाएगा?

टाटा, जो 2017 के बाद से क्रिकेट में अपने पहले प्रमुख स्थान पर नजर जमाए हुई है, इस भारतीय दिग्गज की वैश्विक मार्केट में भी अच्छी पकड़ है। इसने वर्ष 1920 के ओलंपिक्स में न सिर्फ इंडियन टीम को फंड दिया था, बल्कि भारतीय स्पोर्ट्स की दुनिया में लगातार बने हुए हैं। ऐसे समय में उनका आगे आना और इस तरह का कदम उठाना कोई आश्चर्य की बात नहीं है, जब प्रधानमंत्री लगातार आत्मनिर्भरता की बात कर रहे हैं।

टाइटल स्पॉन्सरशिप की इस दौड़ में ‘ड्रीम11’ (Dream11) और ‘बायजूस’ (Byju’s) जैसे दो बड़े ब्रैंड्स भी शामिल हैं। वहीं, हमें ‘अनएकैडमी’ (Unacademy) को भी नहीं भूलना चाहिए, जो डिजिटल एजुकेशन के क्षेत्र में तेजी से उभरता हुआ ब्रैंड है। दो युवा भारतीय एंटरप्रिन्योर्स द्वारा शुरू की गई ‘ड्रीम11’ का अब आठ करोड़ से ज्यादा सबस्क्राइबर बेस है और इसे सिर्फ इंडिया में खेला जाता है। वहीं, ‘बायजूस’ भी पूरी तरह इंडियन ब्रैंड है, जिसने डिजिटल एजुकेशन को पूरी तरह बदल दिया है।

खास बात यह है कि दोनों ब्रैंड्स भारतीय क्रिकेट से काफी नजदीकी से जुड़े हुए हैं और एक बार फिर जरूरत के समय ‘आईपीएल’ के लिए आगे आए हैं। ‘अनएकैडमी’ (Unacademy) जो डिजिटल एजुकेशन के क्षेत्र में कड़ी टक्कटर दे रही है, उसके लिए ‘आईपीएल’ के साथ तेजी से आगे बढ़ने का अच्छा मौका है।

क्या टाइटल स्पॉन्सरशिप का मुद्दा अब बीसीसीआई के लिए प्रतिष्ठा का मुद्दा बन गया है?

जी, यह बीसीसीआई के लिए प्रतिष्ठा का सवाल है। इन भारतीय कंपनियों के लिए खेल में गहरी दिलचस्पी के साथ-साथ ब्रैंड की मजबूती के लिए आईपीएल की रक्षा करना एक गंभीर प्रतिबद्धता है। तमाम लोगों ने सौरव गांगुली के बयान को लेकर बीसीसीआई की क्षमता पर संदेह जताया है, लेकिन तमाम लोगों ने इस इंडियन क्रिकेट ब्रैंड की ताकत को नहीं समझा है। त्योहारी सीजन पर आईपीएल शुरू होने से यह संभावना है कि टेलीविजन पर इस टूर्नामेंट को अब तक सबसे अधिक दर्शक देखेंगे। ऐसा इसलिए क्योंकि मेजबान ब्रॉडकास्टर ‘स्टार स्पोर्ट्स’ टूर्नामेंट को 7 से अधिक भाषाओं में कवर करेगा, जिसकी जड़ें देश के हर कोने-कोने तक जुड़ी हुई हैं।

हालांकि टाटा कंपनी सर्वव्यापी है, लेकिन ‘बायजूस’ की डिजिटल तकनीक का उपयोग अब उपनगरीय भारत में भी है। इनके लिए आईपीएल एक ऐसा खेल है, जिसे हर कोई देखना पसंद करता है। लिहाजा इनके लिए अगली बड़ी छलांग के लिए यह एकदम सही लॉन्चिंग पैड है। फिर चाहे उनका प्रतिद्वंद्वी ‘अनएकैडमी’ ही क्यों न हो, IPL के जरिए हर  भारतीय के ड्राइंग रूम में प्रवेश करने का अवसर है। ‘ड्रीम11’  से जुड़े लोग भी लगभग हर जगह हैं। 8 करोड़ भारतीय फैंटेसी गेम खेलते हैं,  जिनमें एक दिहाड़ी मजदूर से लेकर कॉरपोरेट सीईओ तक शामिल हैं। लगभग हर भारतीय की एक फैंटेसी स्पोर्ट्स टीम है, जिसमें मैं भी शामिल हूं।

18 अगस्त को टाइटल स्पॉन्सरशिप की घोषणा होने की संभावना है, आपको क्या लगता है कि परिणाम क्या होगा?

इन परिस्थितियों से आश्चर्यचकित न हों, मंगलवार को ही बीसीसीआई आने वाले आईपीएल टाइटल स्पॉन्सरशिप की घोषणा करेगा। भविष्यवाणी करें, तो यह  अपेक्षित राजस्व से अधिक उत्पन्न करेगा और फिर एक स्ट्रॉन्ग स्टेटमेंट देगा, जो इंडियन स्पोर्ट्स इंडस्ट्री के लिए प्रोत्साहन का काम करेगा।

वहीं, कुछ लोगों ने आईपीएल के संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में होने पर सवाल उठाए हैं और इस तरह की दलीलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। आईपीएल सिर्फ विराट कोहली या महेंद्र सिंह धोनी के बारे में नहीं है। जब हम उन्हें खेल में सबसे आगे देखते हैं, तो यह पूरी स्पोर्ट्स इंडस्ट्री को प्रभावित करता है, जिसमें ब्रॉडकास्टर, मीडिया, स्टेट एसोसिएशन, स्पोर्ट्स गुड्स कंपनीज, फर्स्ट क्लास क्रिकेटर्स और कई अन्य शामिल हैं।

मनी जनरेट होती है, तो इससे हर कोई जुड़ा होता है, हर किसी को लाभ होता है और यदि टूर्नामेंट आयोजित नहीं किया जाता, तो इससे कई लोगों की जिंदगी  और उनकी आजीविका पर असर पड़ता। हालांकि फ्रंट रैंक्ड के स्टार्स को तो इतना नहीं, लेकिन बैकग्राउंड से लोगों पर बहुत ज्यादा प्रभाव पड़ेगा, जो इस प्रतियोगिता में समान हितधारक हैं। वैसे मैं यह देखने के लिए उत्सुक हूं कि मंगलवार को क्या होगा। लेकिन एक बार फिर कहना चाहूंगा कि पुरानी बातों पर न जाएं, बीसीसीआई इंडिया इंक (India Inc) के सपोर्ट से मार्केट को सरप्राइज करेगा।

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पिता से सीखीं इन तीन खास बातों का हमेशा ध्यान रखती हैं इंडिया टुडे समूह की कली पुरी

‘बिजनेस वर्ल्ड’ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा के साथ इंडिया टुडे ग्रुप की वाइस चेयरपर्सन कली पुरी ने तमाम पहलुओं पर बातचीत की

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 06 August, 2020
Last Modified:
Thursday, 06 August, 2020
Kalli Purie

एक्सचेंज4मीडिया (exchange4media) समूह की जानी-मानी वीकली मैगजीन ‘इम्पैक्ट’ (IMPACT) द्वारा मीडिया, एडवर्टाइजमेंट और मार्केटिंग में इस साल अपनी खास पहचान बनाने वाली 50 महिलाओं की लिस्‍ट (IMPACT’s 50 Most Influential Women, 2020) से पांच अगस्त को पर्दा उठ गया। शाम पांच बजे से वर्चुअल रूप से आयोजित एक कार्यक्रम में इस लिस्ट से पर्दा उठाया गया। इस साल इस लिस्ट में ‘इंडिया टुडे’ (India Today) समूह की वाइस चेयरपर्सन कली पुरी ने पहला स्थान हासिल किया है।

इस मौके पर ‘बिजनेस वर्ल्ड’ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा के साथ एक बातचीत में कली पुरी ने अपने पिता अरुण पुरी के साथ काम करने के अपने अनुभव और आज के डिजिटल युग में न्यूज टेलिविजन की स्थिति समेत तमाम पहलुओं पर अपने विचार रखे। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

इंडिया टुडे ग्रुप के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ अपने पिता अरुण पुरी के साथ काम करने के अनुभव के बारे में बताएं?

इस ग्रुप में मुझे 21 साल और कुल मिलाकर 25 साल काम करते हुए हो गए हैं। इस दौरान मुझे उनके (पिता के) साथ काम करने का काफी समय मिला है। उनके साथ काम करना काफी अच्छा लगता है, क्योंकि हम काफी प्रोफेशनल तरीके से काम करते हैं। काम के दौरान वह सिर्फ एपी होते हैं, जबकि घर पर ऐसा नहीं होता है। इसी तरह, घर पर क्या होता है, यह हम ऑफिस से पूरी तरह अलग रखते हैं। काफी शुरुआत में जब हमने साथ काम करना शुरू किया था, तभी इस बारे में यह फैसला ले लिया था कि हमें प्रोफेशनल व पारिवारिक रिश्तों को अलग-अलग रखना है। इसने हमें साथ-साथ मिलकर काम करने में काफी मदद की है। एक बॉस के रूप में उन्हें हर काम में परफेक्शन चाहिए होता है, लेकिन वह दूसरों को अपने आइडिया व दृष्टिकोण रखने का भी मौका देते हैं। इतने वर्षों में संस्थान को आगे ले जाने में उन्होंने जो दृष्टिकोण अपनाया है और पत्रकारिता के लिए उनका जो प्यार है, वह आपको अपने पथ से भटकने नहीं देता। इसलिए एक लाइट हाउस के रूप में हमारा मार्ग हमेशा काफी बेहतर रहा है। इस बात को लेकर हम पूरी तरह स्पष्ट हैं कि हम किस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

ऐसी कौन से तीन प्रमुख बातें हैं, जो आपने अपने पिता से सीखी हैं?

अपने पिता से जो तीन खास चीजें मैंने सीखी हैं, वे हैं चीजों पर विस्तार से ध्यान देना, दूसरा अपने बिजनेस अथवा काम पर पूरा ध्यान लगाना और तीसरी बात यह है कि हमेशा सही चीजें करना। सही चीजें करें और लंबे समय में हमेशा आपको इसका फायदा मिलता है।

न्यूज टेलिविजन को लेकर आपका क्या कहना है, खासकर कोविड-19 के बाद डिजिटल युग की बात करें तो? इंडिया टुडे ग्रुप किस तरह से इसकी तैयारी कर रहा है?

जब इंडिया टुडे पाक्षिक (fortnightly) से साप्ताहिक (weekly) में तब्दील हुई थी, तब मैं वहीं थी। तब ग्रुप में मेरी एंट्री हुई ही थी और मैं एक इंटर्न के तौर पर उनके लिए क्रिएटिव एडवर्टाइजिंग कर रही थी। टीवी का जो सफर है, वह रोलर कोस्टर (roller-coaster) की तरह रहा है। मैं प्रिंट बैकग्राउंड से आई थी और मैंने डिजिटल में 20 साल से ज्यादा समय गुजारा है। अब के टीवी में पहले की टीवी जैसा कुछ नहीं है। शुरुआती दिनों में चेयरमैन खुद बैठते थे और प्रत्येक एंकर द्वारा बोले गए हर शब्द पर नजर रखते थे, क्योंकि ‘आजतक’ की शुरुआत सिर्फ 30 मिनट के बुलेटिन के तौर पर हुई थी और इसके बाद यह 24x7  चैनल बन गया। मैं अब उस तरह इसे कंट्रोल नहीं कर सकती, क्योंकि हमारे पास अब पूरा डिजिटल सिस्टम और सोशल मीडिया है।

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पत्रकारिता में होनी चाहिए सच की 'वैक्सीन': सुधीर चौधरी

टीवी न्यूज की दुनिया में पिछले 20 वर्षों में काफी परिवर्तन आए हैं। इस दौरान इसकी व्युअरशिप में काफी वृद्धि हुई है।

Last Modified:
Monday, 27 July, 2020
Sudhir Chaudhary Dr Annurag Batra

टीवी न्यूज की दुनिया में पिछले 20 वर्षों में काफी परिवर्तन आए हैं। इस दौरान इसकी व्युअरशिप में काफी वृद्धि हुई है। हालांकि डिजिटल के आने से इस पर थोड़ा प्रभाव जरूर पड़ा है, इसके बावजूद इसका आगे बढ़ना जारी है। कोविड-19 के दौरान टीवी न्यूज की व्युअरशिप में काफी इजाफा देखने को मिला है। इस तरह की तमाम बातों को लेकर ‘बिजनेस वर्ल्ड’ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा ने शनिवार को ‘जी न्यूज’ (Zee News) के एडिटर-इन-चीफ सुधीर चौधरी के साथ ‘वन टू वन’ (One To One) बातचीत की। वेबिनार सीरीज के तहत दोपहर तीन दस बजे से हुए इस कार्यक्रम का टॉपिक ' 20 Years of News TV and its Growing Relevance' रखा गया था, जिसमें सुधीर चौधरी ने खुलकर अपनी बात रखी।

प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

पिछले 120 दिन आपके लिए किस तरह के रहे हैं?

पिछले दो-तीन महीने खासकर मार्च के बाद से लेकर दिन काफी मुश्किल भरे रहे हैं। हालांकि, लोगों को हम स्क्रीन पर काफी रिलैक्स दिखाई देते हैं, क्योंकि हम लगातार अपना काम कर रहे हैं, लेकिन मुझे लगता है कि पहली बार देश ने इस समय पहचाना कि मीडिया एक आवश्यक सेवा (Essential Service) है। मीडिया को इस तरह की पहचान मिलना एक बड़ी बात है। इससे यह पता चलता है कि इस तरह की महामारी में मीडिया की कितनी अहम भूमिका होती है। 

दूसरी बात ये कि यह हमारे लिए कितना चैलेंजिग है। देखिए, लगातार 24 घंटे काम करना है। संक्रमित नहीं होना है और न्यूज रूम के ऑपरेशंस भी नहीं रुकने चाहिए। आपको खुद स्वस्थ रहना है और अपने परिवार की देखभाल भी करनी है। यह भी देखना है कि इस महामारी से कैसे निपटना है, क्योंकि इसका फुटप्रिंट दुनिया में कहीं नहीं है, इस तरह की स्थिति पहली बार आई है। इस समय जब 24 घंटे के न्यूज ऑपरेशंस लगातार चल रहे हैं, मुझे लगता है कि इसका एक पहलू तो ये है कि हमने अपने ऑफिस में क्या सुरक्षात्मक कदम उठाए, लेकिन उससे बड़ा पहलू ये है कि इस समय भावनात्मक मजबूती चाहिए थी। आपको पता ही है कि ‘जी न्यूज’ में शुरुआत में ही कई सारे लोग इस महामारी से संक्रमित हो गए थे। हमारे ऑफिस में बड़ी संख्या में हमारे रिपोर्टर्स कोविड पॉजिटिव हो गए थे। उसके बाद अजीब सा माहौल था, हमें ये देखना था कि हमारे न्यूजरूम के ऑपरेशंस चलते रहें और हमारे और लोग बीमार न पड़ें। एक समय ऐसा था कि जी न्यूज का पूरा परिचालन सिर्फ दस प्रतिशत कार्यबल पर चल रहा था। हमने ज्यादातर लोगों को घर से काम (वर्क फ्रॉम होम) का ऑप्शन दे दिया था।

एक टीम लीडर के रूप में मेरे सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि मैं क्या करूं? उस समय सारे लोग कहते थे कि वर्क फ्रॉम होम करो। लेकिन मैंने उस समय ये निर्णय लिया कि मैं तमाम एहतियात बरतते हुए रोजाना ऑफिस जाऊंगा। कोविड-19 के दौर में एक दिन भी ऐसा नहीं हुआ, जब मैं ऑफिस नहीं गया और वहां जाकर मैंने लोगों को प्रोत्साहित किया। देखिए, भावनात्मक मजबूती को बढ़ाना और उस डर को दूर करना बहुत जरूरी था। लोगों को ये बात पता नहीं चल पाती कि जब एक रिपोर्टर कंटेंटमेंट जोन में रिपोर्टिंग के लिए जाता है या किसी अस्पताल में रिपोर्टिंग के लिए जाता है तो उस रिपोर्टर के मन में क्या चल रहा होता है, उसकी फैमिली के मन में क्या चल रहा होता है और जब आपको पता होता है कि जी न्यूज में 50 कोविड19 पॉजिटिव लोग हैं तो बाकी के लोग काम करना चाहते हैं या उन पर क्या गुजरती है, समझ सकते हैं। मुझे लगता है कि टीम भावना की इससे बड़ी मिसाल कोई हो नहीं सकती, जब लोगों ने इस सबके बावजूद कहा कि हम काम करेंगे।

हम लोग एक दिन के लिए भी, एक मिनट के लिए भी इस ऑपरेशन को रोकेंगे नहीं। तमाम जरूरी एहतियात बरतते हुए सभी ने यहां अपना काम किया। चैनल्स में कार्यरत एम्पलॉयीज की फैमिली की बात करें तो उन्होंने भी काफी सपोर्ट किया और उनको एक दिन भी काम पर जाने के लिए नहीं रोका। इसलिए मेरा मानना है कि यह काफी मुश्किल और चुनौतीपूर्ण समय रहा, जिसने यह दिखा दिया कि कौन इस तरह की परिस्थितियों का मजबूती से सामना कर सकता है और कौन नहीं। यह हमारे लिए बहुत बड़ी सीख थी। आपने यह भी देखा होगा कि इस दौरान बहुत सारे लोगों की नौकरियां चली गईं और तमाम लोगों की सैलरी में कटौती हुई, लेकिन मुझे यह बताते हुए काफी खुशी है कि न तो हमारे यहां से किसी की नौकरी गई और न ही किसी की सैलरी में कटौती की गई।

‘जी’ में काम करते हुए आपको आठ साल हो गए हैं। ‘जी’ के साथ आपका अब तक का यह सफर कैसा रहा है?

‘जी’ में मेरा अब तक का सफर बहुत ही शानदार रहा है। पहली बात तो यह है कि मुझे इस ब्रैंड पर काफी गर्व है। ‘जी’ एक ऐसा ब्रैंड है, जिसे देश में लगभग हर परिवार में बच्चों से लेकर घर के बुजुर्ग तक सभी जानते हैं। ‘जी’ इस देश का पहला सैटेलाइट चैनल है। पहला एंटरनेटनमेंट चैनल है। ‘जी न्यूज’ पहला न्यूज चैनल है। जब मैं 2012 में यहां आया था, तब कॉम्प्टीशन बहुत बढ़ रहा था, लोग लगातार आगे निकल रहे थे। ‘जी’ को उस समय 2.0 वर्जन में जाने की बहुत ज्यादा जरूरत थी। मैं जब आया तो मैंने देखा कि अब हमें अगले लेवल पर जाना होगा और जी 2.0 लॉन्च करना होगा। इसके लिए हमने अपनी प्रोग्रामिंग में थोड़ा बदलाव किया। आपको याद होगा कि वर्ष 2013 के आसपास नेशनलिज्म यानी राष्ट्रवाद का कॉन्सैप्ट जिसे कुछ लोग आजकल एक निगेटिव शब्द मानते हैं, इस राष्ट्रवाद को सबसे पहले इंट्रोड्यूस करने वाला सबसे पहला चैनल ‘जी’ था। इसी चैनल ने सबसे पहले यह बताया था कि लोगों का मन बदल रहा है। लोग न सिर्फ सत्ता में परिवर्तन चाहते हैं, लोग विचारधारा में परिवर्तन चाहते हैं और लोगों की विचारधारा को लंबे समय से दबाया जा रहा है। मीडिया में यह बात खुलकर किसी में कहने की हिम्मत नहीं थी, क्योंकि इसमें रिस्क था। रिस्क ये था कि ये आरोप लग सकता था कि आप एक खास विचारधारा को सपोर्ट कर रहे हैं, किसी खास पार्टी को आप सपोर्ट कर रहे हैं और सांप्रदयिक कहलाने का रिस्क था। लेकिन मेरा मानना है कि राष्ट्रवाद एक पॉजिटिव शब्द है। सभी को अपने देश को और देश के लोगों को प्यार करना चाहिए। आपने देखा होगा कि राष्ट्रवाद अब एक फैशन बन गया है और बाकी के तमाम चैनल भी उस लाइन को फॉलो करते हैं।

आप उन संपादक/एंकर्स और मीडिया प्रोफेशनल्स में से हैं, जिन्होंने टीवी से अपना करियर शुरू किया और पिछले 20 वर्षों में आपने न्यूज चैनल्स में हर तरह की पोजीशन निभाई है। आपने इनपुट में काम किया है, आउटपुट में काम किया है, स्क्रिप्ट राइटिंग में काम किया है, रिपोर्टिंग की, संपादक बने और बड़े एंकर बने और अब सीईओ हैं, ये बताएं कि सुधीर चौधरी किस तरह से हरफनमौला बन गए?

देखिए, इसका एक बड़ा कारण तो यह था कि जब मैं ‘इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन’ (IIMC) से पढ़कर बाहर निकला तो उस समय मैं इस बात को लेकर पूरी तरह स्पष्ट था कि मुझे क्या करना है। आज जो छात्र पढ़ाई कर रहे हैं, यह उनके लिए भी काफी महत्वपूर्ण है कि क्या वो इस बात को लेकर बिल्कुल स्पष्ट हैं कि वो क्या करना चाहते हैं और क्या नहीं करना चाहते हैं। अपनी बात करूं तो आईआईएमसी में पढ़ाई के दौरान 1994 में मैंने ये तय किया था कि मैं टीवी करना चाहता हूं और इसी में अपना करियर बनाना है। मैं सोच रखा था कि मुझे प्रिंट मीडिया में नहीं जाना है। मुझे लगता था कि मैं टीवी के लिए बना हूं। उस समय देश में एक भी न्यूज चैनल नहीं था, सिर्फ दूरदर्शन था। उस समय मेरे प्रोफेसर्स समेत सभी लोगों ने कहा था कि आप गलत रास्ते का चुनाव कर रहे हो, क्योंकि उस समय टीवी न्यूज इंडस्ट्री नहीं थी। उस समय संसाधन भी काफी सीमित थे। लेकिन मैंने कोशिश की और शुरू से ही टीवी में नौकरी की। इसलिए मैं कह सकता हूं कि टीवी में छोटे पद से लेकर सीईओ तक का सफर मैंने किस तरह तय किया है। टीवी का कोई ऐसा विभाग नहीं है, जहां मैंने काम न किया हो। मेरी नजर में दो तरह के संपादक होते हैं। एक वो जो नीचे से ऊपर जाते हैं, और दूसरे वो जो ‘पैरा जंपिंग’ करके यानी सीधे ऊपर से आते हैं। मैं नीचे से ऊपर जाने वाले संपादकों में से हूं। मैं एक-एक सीढ़ी चढ़कर यहां तक पहुंचा हूं। इससे एक फायदा ये हुआ कि एक तो प्रैक्टिस अच्छी हो गई, दूसरा मैं इस मीडियम को समझने लगा। इसमें सबसे आसानी होती है कि आप अपनी टीम के प्रत्येक मेंबर को बहुत अच्छे से समझते हो, क्योंकि आप जानते हो कि जहां आज वह काम कर रहा है, वहां आप एक समय रह चुके हो।  

अब आप एडिटर और एंकर के साथ सीईओ भी हैं। आपने बिजनेस पक्ष को कैसे समझा और आप जी न्यूज में क्या बदलाव ला रहे हैं? आप एडिटोरियल और बिजनेस में किस तरह सामंजस्य बिठाकर चलते हैं?

आप सही कह रहे हैं। किसी समय में सेल्स और न्यूजरूम के बीच एक ‘चाइनीज वॉल’ हुआ करती थी। हालांकि, धीरे-धीरे वह खत्म होती चली गई। जिस दिन से न्यूज चैनल्स को लेकर टैम की रेटिंग आनी शुरू हुई, उसके कुछ दिनों के बाद ही इस ‘चाइनीज वॉल’ में दरार आने लगी थी, क्योंकि सेल्स टीम आपको बताने लगी थी कि हमारी सेल इस स्टेट में कम है, इस स्टेट में ज्यादा है या इस मार्केट में कम है और इस मार्केट में ज्यादा है। मेरा आज भी मानना है कि चाहे टैम की रेटिंग्स हों या बार्क की, ये एडवर्टाइजर्स के लिए होती हैं। ये रेटिंग्स हमारे बिजनेस क्लाइंट्स के लिए होती हैं। जब सेल्स और न्यूजरूम के बीच ये दीवार खत्म हुई तो लगभग सभी चैनल्स अपना कंटेंट बार्क रेटिंग के लिए बनाने लगे। आज भी जब प्रत्येक गुरुवार को बार्क की रेटिंग आती है तो हर चैनल लेकर बैठता है कि मेरा कौन सा शो अच्छा कर रहा है और कौन सा शो खराब कर रहा है। वह बार्क की रेटिंग के हिसाब से देखता है कि लोगों की पसंद क्या है, नापसंद क्या है। मेरा ये कहना है कि इसमें हमारी थोड़ी सी कैलकुलेशन गलत है। जिस दिन हम यो सोचने लगेंगे कि मैं अपना कंटेंट लोगों (आम दर्शकों) के लिए बनाऊंगा और लोग उसे देखेंगे तो रेटिंग तो आपकी अपने आप आएगी ही। और यदि आपकी रेटिंग आ रही है तो आपको रेवेन्यू तो आएगा ही। मैं इसमें एंटरटेनमेंट चैनल्स की बात नहीं कर रहा हूं। उनका अलग हिसाब-किताब है, लेकिन न्यूज में आपकी एक सामाजिक जिम्मेदारी होती है। आप न्यूज में रेटिंग्स के लिए एक ‘लक्ष्मण रेखा’  को पार नहीं कर सकते हैं।

बतौर एडिटर हमेशा मैंने इस बात का ध्यान रखा कि उस चाइनीज वॉल में भी एक लक्ष्मण रेखा रहे। वो टूट तो गई है, लेकिन एक लक्ष्मण रेखा रहे। एक एडिटर की बात करें तो उसे अपने सभी प्रोग्राम अच्छे लगते हैं और सीईओ उस प्रॉडक्ट को अपने दिमाग से सोचता है, बस ये दिल और दिमाग का तालमेल रहता है। कई बार यदि दो अलग-अलग लोगों के लिए इस तरह की स्थिति आती है कि एक दिल से चल रहा है और दूसरा दिमाग से तो कई बार अप्रिय स्थिति आ जाती है और कई बार ऐसा लगता है कि दोनों एक-दूसरे के साथ नाइंसाफी कर रहे हैं। इसलिए मुझे ऐसा लगा कि स्टार्टअप कल्चर अपनाना चाहिए। यदि मैं संपादक और सीईओ दोनों की भूमिका में हूं तो मैं इस बात को ज्यादा बेहतर समझ सकता हूं कि मैं अपने बनाए हुए प्रॉडक्ट को मार्केट में क्लाइंट्स के बीच लेकर जाता हूं और उन्हें चैनल पर आने के लिए कहता हूं तो उसमें काफी आसानी होती है, क्योंकि मैं अपने प्रॉडक्ट को बहुत अच्छे से समझता हूं और मैंने काफी मेहनत व दिल से उसे तैयार किया है।

आप ट्विटर पर काफी सक्रिय रहते हैं। इतनी व्यस्तता के बावजूद आखिर ट्विटर के लिए इतना समय कैसे निकाल लेते हैं?

तमाम लोग इस बात को नहीं समझते हैं कि अब व्युअर्स की रिदम बदल चुकी है और अब ट्विटर इस गेम का अहम हिस्सा है और ट्विटर मेरे संस्थान का हिस्सा है। पहले हम कहते थे कि टीवी स्क्रीन हमारी फर्स्ट स्क्रीन है और स्मार्ट फोन स्क्रीन हमारी सेकेंड स्क्रीन है। हम दोनों को ध्यान में रखकर चलते थे, लेकिन फर्स्ट स्क्रीन को ज्यादा महत्व देते थे, लेकिन अब हमने अपनी अप्रोच बदली है और सेकेंड स्क्रीन को फर्स्ट स्क्रीन कहना शुरू किया है और सेकेंड स्क्रीन को फर्स्ट स्क्रीन कहना शुरू किया है। ट्विटर या यूं कहें कि सोशल मीडिया पर एक बहुत बड़ा वर्ग है, जो हर समय टीवी के सामने नहीं है। मैंने सोशल मीडिया को एक टूल की तरह इस्तेमाल किया है।

जैसे-जैसे सोशल मीडिया का विस्तार होता जा रहा है, क्या न्यूज चैनल इस ग्रोथ के साथ तालमेल बिठा पा रहे हैं। क्या आपको लगता है कि किसी स्टेज पर आकर पूरी तरह डिजिटली प्रॉडक्ट पारंपरिक प्रॉडक्ट्स के मुकाबले ज्यादा प्रभावकारी होंगे या हाइब्रिड मिक्स प्रॉडक्ट होंगे?   

मुझे लगता है कि भारत जैसे देश में शुरुआती स्टेज पर कुछ समय के लिए हाइब्रिड मॉडल काम करेगा। क्योंकि अभी ‘भारत’ और ’इंडिया’ में बहुत फर्क है। भारत को ध्यान में रखते हुए कुछ वर्षों तक आपको समानांतर फीड चलानी पड़ेगी, लेकिन यह गैप बहुत तेजी से कम होता जा रहा है और आपने देखा होगा कि कोविड-19 के दौरान यह गैप और ज्यादा तेजी से भर गया है। आने वाले दिनों में मुझे लगता है कि ऐप्स नए टेलिविजन बनने जा रहे हैं। कोई भी प्रॉडक्ट चाहे वो न्यूज का हो अथवा एंटरटेनमेंट का, वह आप तक अपने ऐप के जरिये पहुंचेगा, टीवी के जरिये नहीं।

आपका शो ‘डीएनए’ लंबे समय से नंबर वन बना हुआ है। इस बारे में कुछ बताएं?  

जब हमने डीएनए शो शुरू किया था तो हमारे सभी रिसर्चर्स ने ये बताया था कि न्यूज सिर्फ पुरुष देखते हैं। महिलाएं, युवा और बच्चे न्यूज नहीं देखते हैं। इसलिए सिर्फ पुरुष ओरिएंटेड कंटेंट बनाइए और उसमें अपनी व्युअरशिप डालिए। लगभग सारा मीडिया यही कर रहा था। उस समय जब मुझे ये बताया गया तो उस समय मेरे दिमाग में ये चल रहा था कि महिलाएं न्यूज क्यों नहीं देखतीं। इस देश में बच्चे और युवा न्यूज क्यों नहीं देखते? इसका कारण पता लगाना चाहिए और जब हम इसमें गहराई में गए तो हमें लोगों की पसंद का पता चला। इसके लिए हम देश के कोने-कोने में गए और लोगों से बात की कि आखिर वे किस तरह का कंटेंट देखना चाहते हैं। इसके बाद हमने यह बदलाव किए और ये बदलाव मैंने सबसे पहले अपने शो में किए। इसलिए आपने देखा होगा कि डीएनए की व्युअरशिप अलग है, क्योंकि हमारे सब्जेक्ट्स अलग होते हैं, हमारी भाषा अलग होती है। आपको ऐसा नहीं लगेगा कि आप एक विशुद्ध हिंदी चैनल देख रहे हैं, जिसमें क्लिष्ट भाषा होती है। मीडिया की जो भाषा आप पढ़ते हैं और सुनते हैं, वह कभी आप बोलचाल में इस्तेमाल नहीं करते। यही कारण है कि हमारे देश के लोग टीवी चैनल्स से कनेक्ट नहीं कर पाते, क्योंकि वे इसकी भाषा को समझ नहीं पाते।

कई बार आपकी आलोचना होती है कि आप एक पार्टी या विचारधारा को ज्यादा महत्व देते हैं, इस पर आपका क्या कहना है?
अपने बारे में ये आरोप मैं बहुत सुनता हूं। हमारे देश में जो ट्रेडिशनल पत्रकारिता है अथवा जो ट्रेडिशनल पत्रकार काम कर रहे हैं, वो जर्नलिज्म में ये समझते हैं कि जितना सरकार के खिलाफ स्टोरी करेंगे, उतना ज्यादा उनका नाम होगा। उतना ज्यादा उनका न्यूज सेंस वैल्यू होगा, चाहे उसमें दम हो या न हो। वे सोचते हैं कि यही पत्रकारिता है। दूसरा ये कि हमारे यहां तमाम पत्रकारों को सेक्युलर बनने का बहुत शौक है, लेकिन उन्हें सब धर्मों को बराबर का दर्जा तो देना चाहिए। गलवान में इतने भारतीय सैनिक शहीद हुए। ऐसे लोग अपनी सेना से तो ये सवाल पूछते हैं कि आप वहां हथियार लेकर क्यों नहीं गए, आपने ये क्यों नहीं किया या वो क्यों नहीं किया, लेकिन ये लोग चीन के बारे में एक शब्द भी नहीं बोलना चाहते और जो बोलना भी चाहता है, उसे ट्रोल करते हैं।

एक चीज और मैं बोलना चाहता हूं, जो बहुत खतरनाक ट्रेंड है कि यदि ऐसा कोई बोलता है, तो उसके खिलाफ एफआईआर होगा, उसे कानूनी केसों में फंसाया जाएगा। जान से मारने की धमकियां दी जाएंगी। ट्विटर पर आपकी ट्रोलिंग होगी, दुष्प्रचार होगा। मेरे विकिपीडीया पेज पर जाकर लोग मेरे बारे में गलत जानकारी लिखते हैं। आज यदि आप मेरे विकिपीडिया पेज पर जाएंगे तो मेरे बारे में सारी जानकारी गलत मिलेगी। 
मैं बहुत खुश हूं कि अब सिस्टम बदल रहा है और जनता इस एजेंडे को बहुत अच्छे से समझ गई है। इसलिए आपने देखा होगा कि जो इस तरह का एजेंडा चलाते थे, उन चैनल्स/रिपोर्टर्स की व्युअरशिप काफी नीचे गिरी है। आज जब लोग पूरी दुनिया में कोविड-19 की वैक्सीन ढूंढ रहे हैं, मैं बस ये चाहता हूं कि इस देश में, जर्नलिज्म में एक सच की वैक्सीन होनी चाहिए। आपका सच कुछ और है, मेरा सच कुछ और है। आपकी न्यूट्रेलिटी की परिभाषा कुछ और है, मेरी न्यूट्रैलिटी की परिभाषा कुछ और है। हमेशा लोग तटस्थ और निष्पक्ष में कंफ्यूज करते हैं। आप तटस्थ नहीं रह सकते, आपको निष्पक्ष रहना चाहिए। मीडिया को क्रिकेट के अंपायर की तरह होना चाहिए, जिसमें वह लोगों को यह बताए कि यह सही है और यह गलत है।

मैं खुश हूं कि अब मीडिया में तमाम विकल्प मौजूद हैं। जब मैंने बीस साल पहले ये सफर शुरू किया था, तब कोई नरैटिव (Narative) होता ही नहीं था, एक ही नरैटिव था। चैनल ही नहीं होते थे। आज देखिए, कितने सारे चैनल्स, कितनी सारी वेबसाइट्स, कितने सारे जर्नलिस्ट्स एक ही खबर को तमाम अलग-अलग तरीकों से समझाएंगे, बताएंगे। यह लोग तय करेंगे कि उन्हें इनमें से किसके ऊपर विश्वास करना है।

आपने कई बेहतरीन इंटरव्यूज किए हैं। तमाम स्टोरी ब्रेक की हैं। कई ऐसे शो किए हैं, जिनकी काफी चर्चा हुई है। आप इनमें से पांच ऐसे इंटरव्यू, स्टोरीज और शो बताएं, जिनके साथ आप जुड़े रहे हैं और आपके लिए वो स्पेशल क्यों हैं?

इसमें मेरी प्लेलिस्ट बिल्कुल अलग है। सबसे पहले मुझे कारगिल वॉर को कवर करने का मौका मिला था। यह मेरे जीवन में काफी यादगार है। कारगिल वॉर के दौरान मैंने कारगिल में कैप्टन विक्रम बत्रा का एक इंटरव्यू किया था। उस समय तकनीकी इतनी ज्यादा विकसित नहीं थी। तब लाइव कुछ नहीं होता था। किसी टेप को वहां से दिल्ली पहुंचने में तीन दिन लगते थे। दुर्भाग्य से जब तक वह टेप दिल्ली जी न्यूज के ऑफिस पहुंचा, तब तक कैप्टन विक्रम बत्रा शहीद हो चुके थे। मुझे आज भी इस बात का दुख है कि मेरा इंटरव्यू जब तक दिल्ली पहुंचा, तब तक वह नहीं रहे। ये मेरे जीवन में बहुत बड़ी घटना थी। पार्लियामेंट पर जब अटैक हुआ, मैं ठीक वहीं सामने पार्लियामेंट में था। उन सब आतंकवादियों को मैंने नजदीक से देखा था और पूरी नॉनस्टॉप कवरेज की थी। यह मेरे जीवन में बहुत बड़ा अनुभव था। ये मुझे हमेशा याद रहेगा। निर्भया रेप केस जब हुआ था और निर्भया का जो दोस्त था, उसका पहला इंटरव्यू मैंने किया था।

आपको जानकर हैरानी होगी कि उस इंटरव्यू को करने पर दिल्ली पुलिस ने मेरे खिलाफ एफआईआर कर दी थी। 2016 में मैं उस समय सीरिया गया था, जब सीरिया कोई जाना नहीं चाहता था। उस समय मैंने पहली बार देश के लोगों को ये दिखाया था कि सीरिया की जो लड़ाई है, वह कैसी है। इसके अलावा मैंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ चार बार इंटरव्यू किया है। उनके साथ जब मैं इंटरव्यू करता हूं, तो जिस ईमानदारी से वो जवाब देते हैं, वह मैंने बहुत एंज्वॉय किया। जब आप किसी ऐसे व्यक्ति के साथ इंटरव्यू करते हैं, जिसके बारे में लगता है कि यह व्यक्ति काफी ईमानदारी के साथ जवाब देगा, तो इंटरव्यू करने का आनंद और बढ़ जाता है। ये मेरी प्लेलिस्ट है, जिसके बारे में मैं कहूंगा कि ये मेरे जीवन के बड़े क्षण हैं, जो मुझे याद रहेंगे। 

जब अमेरिका के राष्ट्रपति भारत आए और उस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आपका उनसे परिचय करवाया, तब आपको कैसा लगा?

यह क्षण मेरे लिए बहुत ही खास है। इसे मैंने अपनी प्लेलिस्ट में वैसे रखा नहीं है, क्योंकि ये एक अलग तरह का वाकया है। पहली बात तो यह कि जब प्रधानमंत्री ने मुझे कार्यक्रम के लिए आमंत्रित किया तो मैं खुद काफी आश्चर्यचकित और खुश था। जब मैं वहां गया तो अन्य लोगों की तरह डोनाल्ड ट्रंप के साथ मेरा भी परिचय कराया गया। वहां काफी सीमित संख्या में लोग थे, मुझे लगता है कि 25-30 लोग रहे होंगे। उस समय मैंने डोनाल्ड ट्रंप से गुजारिश की कि क्या मैं आपके साथ सेल्फी ले सकता हूं। मैंने उन्हें यह भी कहा कि आप हमेशा लाल टाई पहनते हैं और मैं आज आपसे मिलने वाला था, इसलिए मैं भी आपके सम्मान में लाल टाई पहनकर आया हूं। यह सुनकर वह काफी हंसे और मैंने उनके साथ सेल्फी ली। इसके बाद मैं प्रधानमंत्री से मिला। उस समय मैंने उनसे कहा कि यदि मैं आपके और डोनाल्ड ट्रंप के साथ एक सेल्फी लूं तो यह अब तक की बेहतरीन सेल्फी होगी। उन्होंने कहा कि मैं डिनर के बाद ट्राई करूंगा। डिनर के बाद प्रधानमंत्री ने मुझे बुलाया और डोनाल्ड ट्रंप के साथ अलग से मेरा परिचय कराया और मेरे व मेरे शो के बारे में उन्हें काफी बताया। इसके बाद मैंने उन दोनों के साथ ऐतिहासिक सेल्फी ली। मेरे फोन में वह सबसे स्पेशल सेल्फी है, जिसे मैं सबसे ऊपर लगाकर रखता हूं।     

आपने रामनाथ गोयनका अवॉर्ड जीता, आपको एक्सचेंज4मीडिया न्यूज ब्रॉडकास्टिंग अवॉर्ड (enba) भी मिल चुका है। इसके अलावा भी आपने तमाम अवॉर्ड्स जीते हैं, क्या सुधीर चौधरी को अगले साल पद्मश्री मिलेगा, क्या आप इसकी आशा करते हैं, क्या ये आपके लिए अहमियत रखता है?

मैं आपको बता दूं कि अभी तक एक्सचेंज4मीडिया की तरफ से ही मुझे तमाम अवॉर्ड्स दिए जा चुके हैं, लेकिन आपने नोट किया होगा कि मैं कभी भी अवॉर्ड्स लेने नहीं आता। जब अवॉर्ड्स के लिए आपकी जूरी बैठती है तो मैं कभी जूरी के सामने नहीं आता हूं कि मुझे अवॉर्ड दीजिए। मैं इस अवॉर्ड के कॉन्सैप्ट को अपने लिए अनकंफर्टेबल मानता हूं। मेरा मानना है कि असली पद्मश्री ये नहीं बल्कि /ये है कि इस देश के लोग आपके ऊपर विश्वास करते हैं। आप जो कहते हैं, उसे मानते हैं, आपको देखते हैं और सबसे बड़ी बात कि अगर आपको प्यार करते हैं तो मुझे लगता है कि उससे बड़ा पुरस्कार कोई हो नहीं सकता। मुझे नहीं पता कि पद्मश्री मिलेगा या नहीं मिलेगा, लेकिन मुझे लगता है कि नहीं मिलेगा और मुझे इसका कोई दुख भी नहीं होगा, क्योंकि मैंने कभी इसके बारे में ये सोचा भी नहीं है कि ये मुझे मिलना चाहिए। मुझे देश के लोगों से इतना प्यार मिल रहा है, यह अपने आप में बहुत बड़ा पुरस्कार है।

आपको टीवी न्यूज इंडस्ट्री में काम करते हुए काफी लंबा समय हो गया है। आपको क्या लगता है कि आने वाले तीन सालों में न्यूज टेलिविजन में किस तरह का बदलाव आने वाला है?
पहला बदलाव मैं ये देखता हूं कि टीवी न्यूज में व्युअरशिप और रेवेन्यू के मामले में काफी उछाल आएगा। आज यदि आप न्यूज चैनल्स की तुलना जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स (GEC) से करें तो इनमें काफी बड़ा गैप है। मुझे लगता है कि अगले तीन सालों में भारत में न्यूज का मार्केट काफी तेजी से आगे बढ़ेगा। रीजनल चैनल्स और रीजनल मीडिया हाउसेज में जबर्दस्त विस्तार देखने को मिलेगा और न्यूज टीवी की बजाय ऐप में आ जाएगी। दूसरी बात मुझे ये लगती है कि न्यूजरूम के वर्कफ्लो में भी आपको बदलाव लाना होगा। इसके लिए पत्रकारों को अपना स्किल बढ़ाना होगा और मल्टीमीडिया के लिए तैयार करना पड़ेगा। अभी तक जो रिपोर्टर टीवी के लिए रिपोर्ट फाइल करता है, आने वाले समय में शायद उसे पहले डिजिटल के लिए पहले अपनी रिपोर्ट फाइल करनी पड़ेगी। कई बार मैं ये भी सोचता हूं कि इस दौरान जो बेसिक थे जर्नलिज्म के, उनको हमने थोड़ा सा पीछे छोड़ दिया था और हम न्याय नहीं कर पा रहे थे। मुझे लगता है कि एक न एक दिन ये पूरी इंडस्ट्री जर्नलिज्म के बेसिक की ओर वापस लौटेगी। 

आपका शो ‘डीएनए’ काफी लोकप्रिय है। उसकी रेटिंग्स भी आती है। उस पर प्रतिक्रियाएं भी आती हैं, आप अपने शो का मुद्द् कैसे तय करते हैं और कैसे इसकी तैयारी करते हैं?
मेरा शो दूसरों से अलग है। पहली बात तो यही है कि मेरे इस डेढ़ घंटे के शो में कोई डिबेट नहीं है। इसमें कोई इंटरव्यू भी नहीं है। ऐसे में डेढ़ घंटे का शो बनाने के लिए सब्जेक्ट को ऑर्गेनिक होना चाहिए। मतलब, यह देश के ज्यादा से ज्यादा लोगों से जुड़ा हुआ सब्जेक्ट होना चाहिए। दूसरी बात ये कि यह एक टीम वर्क है। चौबीसों घंटे और सातों दिन हमारा काम चालू रहता है। डीएनए में काम करने वाला व्यक्ति लगातार इस शो के बारे में और इसे बेहतर बनाने के बारे में सोचता रहता है। रिसर्च के ऊपर हमारा बहुत जोर रहता है। इसके अलावा हम सिर्फ समस्या को ही नहीं उठाते, बल्कि उसका समाधान क्या हो, यह बताने का भी प्रयास करते हैं।  

अब तक के सफर में आपने तमाम दिग्गजों के साथ काम किया है। मुझे ऐसे लोगों के नाम बताएं, जिनका आप पर प्रभाव हो और जिनसे आपने कुछ सीखा हो?

आपने सही कहा कि मैंने तमाम दिग्गजों के साथ काम किया है और इनके साथ काम करके मैंने अपने स्किल्स को काफी डेवलप किया है। अपने करियर के शुरुआती दिनों में मैंने रजतजी के साथ काम किया था। वे काफी हार्ड वर्किंग और अनुशासन प्रिय हैं और उनसे मैंने बहुत कुछ सीखा है। इसके बाद मैंने मार्कंड अधिकारीजी के साथ काम किया। उन्होंने ही मुझे सबसे पहली बार सीईओ बनाया था। उससे पहले मैं एडिटर था। उनकी मार्केट पर काफी अच्छी पकड़ है और एक प्रॉडक्ट को कैसे शून्य से ऊचाइयों पर ले जाना है यह उन्हें बखूबी आता है, मैंने उनसे काफी सीखा है। फिर मैं जी में आया और सुभाष चंद्रा जी को रिपोर्ट करने लगा। उनकी एडिटोरियल, बिजनेस पर काफी अच्छी पकड़ है और वे काफी आगे के बारे में सोचते हैं। जब मैं उनसे 2012 में मिला था, उस समय वे 2020 के बारे में सोचते थे। उनके काम करने का स्टैंडर्ड बहुत हाई है, उनसे भी मैंने बहुत कुछ सीखा है।      

ऐसे कौन से लोग हैं, जिनके साथ आपने काम नहीं किया, लेकिन काम करना चाहेंगे, चाहे आप उनकी विचारधारा से सहमत हों अथवा नहीं?
चूंकि मैंने ऐसे लोगों के साथ कभी काम नहीं किया है और बहुत ज्यादा करीब से इन लोगों को देखा भी नहीं है, इसलिए मैं इन्हें एक कॉम्पटीटर की तरह देखता हूं, कभी वे मुझसे आगे निकल जाते हैं तो मैं ये समझने की कोशिश करता हूं कि उन्होंने ऐसा क्या किया जो मैं नहीं कर पाया। मैं उनके बिजनेस मॉडल को समझने की कोशिश करता हूं। पर ऐसा ख्याल मेरे दिमाग में कभी नहीं आया कि मैं इसके साथ जाकर काम करूं या इस चैनल के साथ जाकर काम करूं। लेकिन मैं ये सोचता हूं कि क्या-क्या दूसरों से सीख सकता हूं। ऐसे में मेरे लिए ये बताना मुश्किल होगा कि मैं किसके साथ काम करना चाहता हूं। 

आपने जीवन में पद-प्रतिष्ठा सब कुछ हासिल कर लिया है। आपकी नजर में क्या अभी कुछ बचा है, आपकी बकेट लिस्ट की बात करें तो इस बारे में आपका क्या कहना है?

यह देश बहुत बड़ा है। यहां करीब 135 करोड़ आबादी है। मैं पत्रकारिता के जरिये देश के अंदर और बदलाव लाना चाहता हूं। हमारे देश में आज भी मानसिक गुलामी बरकरार है। मैं उस मानसिक गुलामी से लड़ना चाहता हूं। मैं चाहता हूं कि लोग कुछ खास मुद्दों पर अपनी सोच रखें। इसके अलावा मैं ये सोचता हूं कि देश के युवाओं की मैं किस तरह से मदद कर सकता हूं। 

WION चैनल के बारे में कुछ बताएं?
 
WION डॉ. सुभाष चंद्रा का ड्रीम प्रोजेक्ट था। जब मैं उनके साथ जुड़ा था तो वो उस जमाने से यह कहते थे कि मुझे इस बात का बड़ा दुख होता है कि भारत इतना बड़ा देश है, लेकिन आज भी हम कोई वर्ल्ड क्लास ग्लोबल चैनल हम लॉन्च नहीं कर पाए। जो ग्लोबल चैनल आज हैं, उनमें भारत के लिए और यहां की बात रखने के लिए कोई जगह नहीं है। इसलिए वह ऐसा चैनल लॉन्च करना चाहते थे, जहां भारत अपनी बात रख सके। WION के जरिये ये हमने लॉन्च किया और मुझे काफी खुशी है कि दो-तीन साल के अंदर इस चैनल ने अपनी एक जगह बना ली है और करीब 80 देशों में यह देखा जाता है।

चैनल्स की रेटिंग्स की बात करें तो जिसकी रेटिंग ऊपर जाती है, वह तो इसे सही बताता है, लेकिन जिसकी रेटिंग नीचे जाती है, वह इस मीजरमेंट प्रणाली को खराब बताता है, इस बारे में आपका क्या सोचना है?

देखिए, मेरा ये मानना है कि आप अपना कंटेंट रेटिंग के लिए बनाते हैं या लोगों के लिए। अगर कोई चैनल ये तय कर ले कि मैं बार्क रेटिंग में आगे बढ़ने के लिए उसी हिसाब से काम करूंगा तो वह काफी आसानी से कर सकता है। लेकिन मेरा ये मानना है कि जितने चैनल्स आप देखते हैं, जो बार्क रेटिंग में ऊपर हैं, उनके बारे में बाहर कितने लोग चर्चा करते हैं कि उन्होंने फलां खबर फलां चैनल पर देखी। मैं चैनल्स के लैंडिंग पेज में विश्वास नहीं करता। मैं दर्शकों के ऊपर अपना कंटेंट थोपने पर विश्वास नहीं करता। हमारी व्युअरशिप काफी लॉयल है और जितनी भी है, हम उससे बहुत खुश हैं। 

आप तमाम आलोचनाओं और दवाबों का सामना किस तरह करते हैं?

शुरू में जब मैं सोशल मीडिया पर अपने बारे में तमाम तरह के निगेटिव कमेंट्स और ट्रोलिंग देखता था तो काफी परेशान होता था। कुछ दिन तक इसने मुझे काफी आहत किया, लेकिन फिर मैंने देखा कि मैं इस बारे में जितना ज्यादा सोचता हूं, उससे मेरा कंटेंट प्रभावित होता है। इसके बाद से मैंने सोचा कि मैं इन ट्रोलर्स की वजह से खुद को नहीं बदलूंगा और मैंने अपने आसपास एक तरह की शील्ड विकसित कर ली और अब मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि लोग मेरे बारे में सोशल मीडिया पर क्या कहते हैं। अब मैंने ये नया तरीका अपनाया है कि मुझे सोशल मीडिया पर जो कहना होता है, लिखना होता है, वह लिखता हूं और उसके बाद आगे बढ़ जाता हूं। मैं वापस मुड़कर नहीं देखता कि मुझे कौन ट्रोल कर रहा है। हां, जो लोग मुझे प्यार करते हैं और मुझे सही फीडबैक देना चाहते हैं, उसके लिए मैं जरूर सोशल मीडिया का इस्तेमाल करता हूं। आज ट्रोलिंग एक तरह की इंडस्ट्री हो गई है, जहां पर आप पैसा देकर किसी की भी ट्रोलिंग करा सकते हैं।

जहां तक बात असहिष्णुता की है, तो जोग लोग कहते हैं कि भारत में लोग असहिष्णु हो गए हैं, सबसे ज्यादा असहिष्णु वही लोग हैं और ऐसे ही लोग सोशल मीडिया पर वापस आकर आपको ट्रोल करते हैं। ट्रोलिंग और धमकियां आपको काफी प्रभावित करती है। यही कारण है कि मैं अपने परिवार के बारे में खुलकर कभी बात नहीं कर पाता हूं, मैं अपने परिवार के लिए काफी चिंतित रहता हूं। इस ट्रोलिंग और धमकियों की वजह से मैं उनके साथ कहीं बाहर नहीं जा पाता। मैं कभी सोशल मीडिया पर उनकी तस्वीर नहीं डाल पाता, सिर्फ इसलिए कि बेवजह उन्हें ट्रोल किया जाएगा। इसलिए आपको सोशल मीडिया पर मेरे परिवार की कोई फोटो नहीं मिलेगी।   

इस पूरी बातचीत को आप यहां इस वीडियो में देख सकते हैं-

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‘फ्री एंड फेयर’ मीडिया देखना है तो इस दिशा में उठाना होगा कदम: शशि शेखर

हिन्दुस्तान के एडिटर-इन-चीफ ने कहा, ‘कंटेंट के लिए कुछ भुगतान करना चाहिए ताकि मीडिया कंटेंट पर जिंदा रह सके।

Last Modified:
Sunday, 26 July, 2020
Shekhar

इन दिनों मीडिया का परिदृश्य काफी तेजी से बदल रहा है। पिछले वर्षों की तुलना करें तो समय के साथ मीडिया में टेक्नोलॉजी काफी बढ़ी है, तमाम नए प्लेटफॉर्म्स का उदय भी हुआ है, इसके साथ ही तमाम चुनौतियां भी बढ़ी हैं। ऐसे में आज से करीब चालीस साल पूर्व की पत्रकारिता, इतने वर्षों में मीडिया के क्षेत्र में आए बदलाव और वर्तमान में पत्रकारिता की दशा व दिशा को लेकर ‘बिजनेस वर्ल्ड’ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा ने शनिवार को ‘हिन्दुस्तान’ के एडिटर-इन-चीफ शशि शेखर के साथ ‘वन टू वन’ (One To One) बातचीत की। वेबिनार सीरीज के तरह सुबह साढ़े दस बजे से साढ़े 11 बजे तक हुए इस कार्यक्रम का टॉपिक 'The Rise of Language Press, has Bharat Overtaken India in Setting the National Agenda...' रखा गया था, जिसमें शशि शेखर ने खुलकर अपने विचार व्यक्त किए।

प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

आप चार दशक से पत्रकारिता में हैं। ये बताएं कि पिछले 40 साल में पत्रकारिता में कितना फर्क आया है और इस दौरान आपने कैसे-कैसे दौर देखे हैं?

असल में हमारे देश में एक परंपरागत बुराई है। हम पुरानी चीजों को बहुत कहते हैं कि हमारी पुरानी संस्कृति बहुत अच्छी थी। पुराने लोग बड़े बहादुर थे। उस समय हम यह भूल जाते हैं कि बहुत सी लड़ाइयां हम हारे भी हैं। तो जब हम पुरानों की बात करते हैं तो हम उस समय के बारे में ज्यादा सोचने लगते हैं और कभी-कभी सच को दरकिनार कर देते हैं। मैं 1980 में अचानक ‘आज’ अखबार के दफ्तर में चला गया था। उस समय मुझे मालूम नहीं था कि मेरी पूरी जिंदगी अब इसी दिशा में आगे बढ़ेगी। मैं तो आर्कियोलॉजिस्ट यानी पुरातत्वविद् बनना चाहता था। लेकिन मैं जब पीछे पलटकर देखता हूं तो पत्रकारिता के उसूल वही थे, आज भी वही हैं। पत्रकारिता की चुनौतियां तब भी वही थीं और आज भी वही हैं। यदि 1980 की बात करें तो उस समय आपातकाल को लगे हुए कुल पांच साल हुए थे, तो लोग ये कहते थे कि अभी तो हमारी आजादी ही पूरी नहीं हुई है, कोई भी तानाशाह आ सकता है। आज देश के लोग कुछ और तानाशाही का राग अलापते रहते हैं। मुझे ऐसा लगता है कि पत्रकारिता के बदलाव को हम टेक्नोलॉजी के बदलाव से मिक्स कर देते हैं। पत्रकारिता में तकनीकी रूप से काफी परिवर्तन आए हैं। इस वजह से पत्रकारिता में तब्दीली आ गई। उसके मीडियम्स बदल गए, लेकिन उसके उसूल नहीं बदले। आखिर खबर क्या है, खबर का मतलब है सिर्फ सच्चाई। सच को अगर आप किसी भी चीज से मिला देते हैं तो वह खबर नहीं रह जाती, स्टोरी रह जाती है। ऐसे में एक तो खबर और कहानी का तालमेल हो गया और दूसरी बात कि टेक्नोलॉजी की वजह से हमने बहुत एक्सक्यूज तलाश लिए।

आपने करीब 20 साल तक ‘आज’ अखबार में काम किया। फिर आपने लगभग दो साल ‘आजतक’ टीवी चैनल में काम किया, पिछले 20 सालों में आपकी नजर में टीवी न्यूज में किस तरह का परिवर्तन आया है?

असल में जब बहुत विस्तार होता है, तो चीजों को समेटना बहुत मुश्किल हो जाता है। मैं ‘आजतक’ की बहुत इज्जत करता हूं, क्योंकि इस चैनल ने मुझे बहुत सिखाया है। जहां तक 20 साल में टीवी न्यूज में आए परिवर्तन की बात है तो मुझे लगता है कि उस समय के टेलिविजन की आज से तुलना करना थोड़ा सा अन्याय होगा। आप उन दो सालों को देखें तो गुजरात का भूकंप रहा हो, नेपाल के राजघराने की हत्या रही हो, 9/11 की घटना रही हो, हमारे यहां संसद पर हमला रहा हो, ऑपरेशन पराक्रम रहा हो, वो खबर भरे दिन थे। ऐसा लगता था कि जैसे खबर ही खबर पैदा हो रही हैं और उस जमाने में खबर ऐसी नहीं थी, वह दुनिया को बदलने वाली थी। 9/11 से पहले और बाद की स्थिति में जमीन-आसमान का अंतर है। वो ऐसा समय था, जब हमें खबर से फुर्सत नहीं रहती थी। तब के राजनेता भी अलग थे। उस समय जॉर्ज फर्नाडिस रक्षा मंत्री थे, हमने उन्हें स्टूडियो में बुलाया और वे आगे गए। मुझे नहीं लगता कि अब तो कोई भी रक्षामंत्री किसी भी चैनल के स्टूडियो में जाने वाला है। उस समय आशुतोष ने करीब पौने दो घंटे का लाइव इंटरव्यू किया, जो अभूतपूर्व था। मैं और उदय शंकर पीसीआर में खड़े हुए थे और लगातार आशुतोष से बात कर रहे थे और जॉर्ज थे कि जवाब पर जवाब दिए जा रहे थे। उस समय ऐसे नेता थे जो सवालों को लेने से नहीं डरते थे। पत्रकारों को वैसे इस्तेमाल नहीं करते थे। मैं क्षमा के साथ कहना चाहूंगा कि आज के लीडर और फिल्म स्टार एक ही तरह के हैं, सिनेमा का स्टार स्क्रीन पर तभी दिखाई देता है, जब उसकी कोई नई मूवी आती है, आज का पॉलिटिशियन भी तभी इंटरव्यू देता है, जब उसे चुनाव लड़ना हो अथवा अपना कोई संदेश जनता तक पहुंचाना हो। ये एक बहुत बड़ा परिवर्तन आया है। ऐसे में मीडिया का दायित्व और चुनौतियां बहुत बढ़ जाती हैं। मैं मानता हूं कि अभी भी देश के कुछ न्यूज चैनल्स बहुत ही ईमानदारी से काम कर रहे हैं। दूसरी बात ये रही कि विस्तार बहुत तेजी से हुआ, जिससे तमाम चैनल जल्दी में आ गए कि टीआरपी बहुत जल्दी ले लेनी है या कोई अन्य काम बहुत जल्दी कर लेना है, लेकिन इन सबके बीच दर्शक/पाठक अथवा श्रोताओं की चिंता करनी छोड़ दी है, जबकि इनकी और इनकी भावनाओं की रक्षा करना भी हमारा दायित्व है। शायद थोड़ा से इसमें घालमेल हो गया है।

आजकल टीवी देखने पर ऐसा लगता है कि जैसे दो सच्चाई हैं। आज तमाम संपादक/न्यूज एंकर/पत्रकार देखकर लगता है कि खबर दिखाने की बजाय खबर बना रहे हैं। कभी-कभी तो ये प्रवक्ता जैसे लगने लगते हैं, इस पर आपका क्या कहना है?

मुझे लगता है कि हम पत्रकारों पर सारा दोष मढ़ देते हैं, जो गलत बात है। हमें अपने इस प्रोफेशन की कुछ जरूरी बातों को समझना पड़ेगा। इतिहास सिर्फ तीन लोगों को याद करता है। हीरोज को, विलेन्स को और जोकर्स को। इतिहास आम आदमी को दर्ज नहीं करता जबकि बताया ये जाता है कि इतिहास आम आदमी की गाथा बयां करता है।

इन 70 सालों में जो वैचारिक द्वंद्व पैदा हुआ है, उसके शिकार हम सभी हुए हैं। इसके शिकार हम तीन तरह से हुए हैं। पहले तो हमने ‘चश्मे’ पहन लिए हैं। कहने का मतलब है कि हम चीजों को अपने हिसाब से देखने लगे हैं। दूसरी बात ये कि हमें कंटेंट के बिजनेस पर भी नजर डालनी होगी। हमें मीडिया को इंडस्ट्री का दर्जा देना होगा। मुझे ऐसा लगता है कि कंटेंट फ्री नहीं होना चाहिए। जब कंटेंट फ्री होता है तो इंडस्ट्री को चलने के लिए एडवर्टाइजर्स पर निर्भर होना पड़ता है। इस देश में एडवर्टाइजर्स सिर्फ दो हैं। या तो सरकार अथवा कॉरपोरेट हाउस। ऐसे में यदि लोगों को वास्तव में ‘फ्री एंड फेयर’ मीडिया देखना है तो कंटेंट के लिए कुछ भुगतान करना चाहिए ताकि मीडिया कंटेंट पर जिंदा रह सके। यह एक सोसायटी के लिए जरूरी है। जिस सोसायटी को प्रोफेशनल वकील की जरूरत है, प्रोफेशनल डॉक्टर की जरूरत है, जिस सोसायटी को अपराधियों को फांसी पर चढ़ाने के लिए प्रोफेशनल जल्लाद की जरूरत है, उस सोसायटी को क्या प्रोफेशनल ट्रुथ टैलर्स (Truth Tellers) की जरूरत नहीं है? कहने का मतलब है कि कंटेंट के पैसे मिलने चाहिए, ताकि यह दबाव मुक्त रह सके।

आपने कंटेंट के लिए भुगतान करने की बात कही है। पिछले चार महीनों में कोरोनावायरस (कोविड-19) ने काफी चीजों को बदल दिया है। तमाम लोग अब भी न्यूज वेबसाइट की जगह अखबार पढ़ना पसंद करते हैं। कोविड के बाद क्या कंटेंट को पेड होना चाहिए? न्यूज पसंद करने वालों तमाम लोगों ने इसके लिए भुगतान करना भी शुरू कर दिया है, इस बारे में आपका क्या कहना है?

मेरा मानना है कि कंटेंट को पेड होना चाहिए। कोविड की वजह से तमाम अखबारों ने अपने ईपेपर को पेड कर दिया है, जो पहले फ्री देते थे। यहां मैं बताना चाहूंगा कि पिछले एक महीने में मीडिया संस्थानों को जो सबस्क्रिप्शन मिले, वह उम्मीद से बहुत बेहतर थे। कोविड ने बहुत सी चीजों के प्रोसेस को तय कर दिया है। मीडिया में भी काफी परिवर्तन आ रहा है। मुझे लगता है कि भाषाई अखबारों के लिए रनवे बचा हुआ है और 90 प्रतिशत सर्कुलेशन पटरी पर लौटना इसकी गवाही देता है।  

अगर हम हिंदुस्तानी न्यूज टेलिविजन की बात करें और आपको उसमें दो-तीन चीजों को बेहतर करना हो, तो वो कौन सी होंगी?

मैंने शुरू में 20 साल अखबार में काम किया, फिर मैं टेलिविजन में गया। अखबार में तो बात करके भी चीजें लिख सकता था, लेकिन टीवी के लिए मुझे बाइट लेने के लिए कैमरा और टीम भेजनी पड़ती थी। टीवी में काम करते समय मुझे लगने लगा कि मैं एडिटर नहीं, बल्कि लॉजिस्टिक मैनेजर हूं। टीवी की यह समस्या तब भी थी और आज भी है कि उसे दिखाना होता है। उसकी ये ताकत भी है और उसकी ये कमजोरी भी है। हम शायद दिखाने के चक्कर में ज्यादा पड़ गए। न्यूज को सिर्फ दिखाकर ही काम नहीं चलता, न्यूज बहुत से तरीकों से अभिव्यक्त की जा सकती है। ऐसे में पहला सवाल ये उठता है कि कहीं हम दिखाने के चक्कर में लोगों की संवेदनाओं से तो खिलवाड़ नहीं करने लगे हैं? दूसरा सवाल ये उठता है कि लोगों की सत्य के प्रति जो आस्था है, उससे तो हम खिलवाड़ नहीं करने लगे हैं? तीसरा सवाल ये उठता है कि महावीर ने कहा था कि सत्य के सात स्वरूप होते हैं, आपको एक स्वरूप दिखाई पड़ता है। इसलिए अंग्रेजी में कहते हैं, ‘Truth is nothing but is version’ यानी हर आदमी का अपना वर्जन होता है सत्य का। तो हम शायद दिखाने के चक्कर में और वर्जन के चक्कर में सच की जो सार्वभौमिकता है, उसको शायद थोड़ा सा भुला बैठे हैं।  

अपने करियर में आपने अब तक तमाम दिग्गजों के इंटरव्यूज किए हैं। इनमें से आपके दो सबसे ज्यादा यादगार इंटरव्यू कौन से हैं और क्यों? इसके अलावा इतने लंबे समय में आपकी नजर में संपादक और सब्जेक्ट के बीच आपसी संबंध में कितना बदलाव आया है?

पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी का इंटरव्यू मेरे लिए काफी यादगार है। चंद्रशेखर जी उस समय प्रधानमंत्री थे और उनकी कुर्सी जाने वाली थी कुछ दिनों में, यह बात वे जानते थे। मैं उनका इंटरव्यू करने गया। उस समय सत्यप्रकाश मालवीय जी भी वहां बैठे हुए थे। चंद्रशेखर जी का बात करने का अलग ही अंदाज था। उनका ट्रुथ का एक वर्जन होता था और बड़ा तीखा होता था। मैंने उनसे कहा कि आप तो ये कह रहे हैं और राजीव गांधी जी ने यह बात कही है तो उन्होंने मेरी ओर देखते हुए कहा कि अगर कोई अपनी झोपड़ी को राजमहल समझता है तो मुझे उस पर तरस आता है। उन्होंने यह राजीव गांधी के लिए कहा था उनका कहना था कि राजा तो वही होता है, जो राजमहल में बैठा होता है और फैसला भी वही लेगा जो राजमहल में बैठा हुआ है। ये शक्ति और अपने गठबंधन से न दबने की कुव्वत और पत्रकारों से सीधे-सीधे बोलने की ताकत चंद्रशेखर जी में थी, ये बात अलग है कि मेरे उनके अनुभव थोड़े अलग तरीके के थे। तो एक इंटरव्यू वो जिसमें एक आदमी इतनी ताकत के साथ उस व्यक्ति के लिए बोल सकता है, जिसके बूते पर सरकार हो, काफी बड़ी बात थी।

इस इंटरव्यू से काफी पहले मैंने रविशंकर जी का इंटरव्यू किया था, यह भी मेरे लिए काफी यादगार है। रविशंकर जी ने इलाहाबाद में सितार बजाया। मैं उन चंद भाग्यशाली लोगों में से हूं, जिन्होंने रविशंकर जी को मन से बजाते हुए देखा है। उस सितार को सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए। उस समय इंटरव्यू में एक प्रचलित सवाल था कि ये बताएं, आप आम आदमी के लिए क्या करेंगे? मैंने भी रविशंकर जी ये यह सवाल पूछ लिया। उन्होंने कहा कि मैं कुछ नहीं करूंगा, मैं क्यों करूं? मैं कोई आम आदमी का गायक या बजाने वाला थोड़े ही हूं। मैं तो शास्त्रीय संगीत (Classical Music) का साधक हूं और इसी के लिए बजाता हूं। मुझे उनकी सच्चाई और जो क्लासिफिकेशन था, उसने बहुत सिखाया। ये दो इंटरव्यूज मेरे जीवन में बहुत अच्छे थे।

पहले यदि संपादक किसी राजनेता का इंटरव्यू करता था तो ये राजनेता की खुशकिस्मती होती थी, आजकल कई इंटरव्यूज देखकर लगता है कि राजनेता से ज्यादा पत्रकार या संपादक की खुशकिस्मती है, इस पर आपका क्या कहना है?

यह थोड़ी गलतफहमी है। मेरा मानना है अच्छाई और बुराई हमेशा से थी। 1980 में मीडिया इंडस्ट्री इससे बहुत खराब हालत में थी। आज तो तमाम तरह का मीडिया है, तमाम तरह के लोग हैं, तमाम तरह के लोग अपनी बात कहने वाले हैं। ऐसा नहीं है कि उस समय संपादक इतने महान और धाकड़ हुआ करते थे कि लोग उनसे कांपते थे। आज भी जो लोग सच बोलते हैं और जो उनसे कुछ मांगने नहीं जाते, जिन्हें पद्मश्री नहीं चाहिए, जिन्हें लोकसभा या राज्यसभा नहीं चाहिए, जिन्हें किसी तरह का कोई कोटा नहीं चाहिए, तो आज भी उनकी इज्जत होती है। मुझे नहीं लगता कि तब से अब में कोई बहुत बड़ा अंतर आया है। बस एक अंतर आया है, क्योंकि तब बहुत ही कम अखबार होते थे। चूंकि उस समय संपादक कम होते थे, इसलिए लोगों की नजर में कम आते थे और दिखाई नहीं पड़ते थे। आज मीडियम बदल गया है, दिखाई पड़ते हैं। हम बार-बार पत्रकारों को दोष देते हैं। पत्रकारों को दोष देना या कुछ भी बोल देना आसान है, ऐसा नहीं हैं। आज भी तमाम लोग सच्चाई को लेकर अड़े हुए हैं। इन दिनों जयपुर और गुड़गांव के मामलों में कुछ हिंदी चैनल्स की रिपोर्टिंग वाकई में बहुत अच्छी है। मैं अंग्रेजी चैनल्स की बात नहीं कर रहा। मैं हिंदी के चैनल्स की बात कर रहा हूं, जिनके अधिकांश संपादकों को रीढ़ विहीन कहा जाता है। वे काफी अच्छे पत्रकार हैं।

टीवी न्यूज की दुनिया में आपकी नजर में पिछले 20 सालों में कौन सी ऐसी घटनाएं या रिपोर्टिंग हैं, जो आपको आज भी याद हैं और आप समझते हैं कि उनकी टीवी न्यूज रिपोर्टिंग सबसे अच्छी रही है या कह सकते हैं कि उनकी कवरेज टर्निंग प्वाइंट है?

इसमें मैं कारगिल की लड़ाई का जिक्र करना चाहूंगा। उस समय जो रिपोर्टिंग हुई, उससे पहले कभी युद्ध क्षेत्र से रिपोर्टिंग नहीं हुई थी, जो इस तरह दिखाई गई। हालांकि जो दिखाया गया, वह लड़ाई नहीं थी, लेकिन फिर भी रिपोर्टर काफी दूर तक गए। इतना आगे भी पहले कभी नहीं जाते थे। अफगानिस्तान में जब लड़ाई हुई तो उस समय मैं जिस चैनल में था, वहां से दो पत्रकारों को वहां भेजा गया और उन लोगों ने अद्भुत रिपोर्टिंग की। कहने का मतलब है कि उस समय इन घटनाओं ने भारतीय न्यूज टेलिविजन को एक नई दिशा दी, जो उससे पहले हम विदेशी चैनल्स पर देखा करते थे। कोविड-19 की बात करें तो अब सिर्फ टीवी में ही नहीं, मोबाइल जर्नलिज्म (मोजो) में भी और तरह-तरह से हमें जर्नलिज्म के बहुत से स्वरूप दिखाई पड़ रहे हैं। इस दौरान लोग भूखे-प्यासे सड़कों पर पैदल अपने घर जा रहे थे। उनके पैरों में छाले थे और उन छालों को पोंछने का काम भी कई पत्रकारों ने किया है। हमने भी अपने नेटवर्क की टीम को विभिन्न संस्थाओं के सहयोग से लोगों का दुख-दर्द दूर करने के लिए कहा।

यंग रिपोर्टर्स को आप क्या संदेश देना चाहते हैं। आज के दौर में कैसे वे अच्छी पत्रकारिता करें, इस बारे उन्हें क्या कहना चाहते हैं?

भविष्य सबसे उज्जवल आने वाला है। इसका कारण यह है कि जब ट्रुथ के तमाम वर्जन सामने आने लगे हैं, तो उसे उसी के अनुसार बिना मिलावट के रखने के लिए नौजवानों  के पास तमाम तरह के मीडियम्स आ गए हैं। जब मैं काफी युवा था तो तमाम मैगजींस में हाथ से लिखकर भेजता था, कभी छपता था तो कभी नहीं भी छपता था। आज तो इतने सारे मीडियम्स हैं कि हम अपनी बात को पहुंचा सकते हैं और उसके आर्थिक पक्ष भी काफी अच्छे हैं। मैं एक्सचेंज4मीडिया का उदाहरण देना चाहूंगा कि आपने कितना सफल वेंचर खड़ा किया है। आज से 15-20 साल पहले लगता नहीं था कि मीडिया पर इस तरह से कोई साइट करेगी, ईमानदारी से काम करके। मैं यूक्रेन के एक वीडियो चैनल का भी उदाहरण देना चाहूंगा। तीन लड़कों ने उसे मिलकर बनाया और वह आज काफी सफल चैनल है और वे सिर्फ अपने फोन से शूट करते हैं। फिलीपींस का एक चैनल भी यही कर रहा है। दुनिया में ऐसे बहुत से उदाहरण हैं, जहां सच को लेकर लोग सामने आए लोगों ने उन्हें अपने सिर पर बिठाया।

आपने 40 साल के इस लंबे कार्यकाल में बहुत लोगों के साथ काम किया है, आप प्रसार भारती के बोर्ड में भी रहे हैं। आपकी नजर में ऐसे कौन से लोग हैं, जिन्होंने पत्रकारिता में काफी बड़ा योगदान दिया है? मीडिया मालिकों और संपादकों के बीच के रिलेशंस पर आप क्या कहेंगे?

मुझे ऐसा लगता है कि एडिटर्स भी अपनी बात को ठीक से कहते नहीं हैं। मुझे कभी भी बहुत दबाव का सामना नहीं करना पड़ा। आपके अंदर शक्ति होनी चाहिए जो उस समय की स्थिति है, उससे रूबरू होने की। मुझे लगता है कि एडिटर में यह शक्ति होनी चाहिए कि वह आंख में आंख डालकर बात कर सके। फिर चाहे सामने लीडर हो या कोई और हो और जब आप ऐसे बोलते हैं तो कोई दिक्कत नहीं होती। दरअसल, हम जब खुद अंदर से कांप रहे होंगे, तो बड़ी खराब बात होगी। दूसरी बात ये कि पत्रकार को सेलिब्रिटी नहीं बनना चाहिए। तीसरी बात ये यदि पत्रकार पैकेज सिस्टम के पीछे भागेंगे तो वैल्यू सिस्टम पर आघात लगेगा। मैंने जब टीवी छोड़ा और अखबार में गया तो आधी सैलरी पर गया था। कहने का मतलब है कि हमारा सच यही है कि हम सच के साथ खड़े रहें, इसके अलावा कुछ नहीं।  

चालीस साल के पत्रकारिता जीवन के बाद भी क्या आपको ऐसा लगता है कि कुछ चीजें रह गई हैं जो आप नहीं कर पाए हैं और करना चाहते हैं?

नहीं, ऐसा कुछ नहीं है। मैंने बकेट लिस्ट कभी बनाई ही नहीं। मेरे लिए आज का काम बहुत महत्वपूर्ण होता है। हम खबर में जीते हैं। हम खबर बनाते नहीं, बल्कि उसे कवर करते हैं। खबर कभी भी, कैसी भी आ सकती है, मुझे ऐसा लगता है कि हम आज का काम बेहतर तरीके से करें, क्योंकि आने वाले कल की बुनियाद सिर्फ इस आज पर टिकी हुई है। ईश्वर ने मुझे 24 साल की उम्र में एडिटर के पद पर बैठा दिया। मैं अपने आप को एडिटर भी नहीं कहता, मैं खुद को पत्रकार या प्रोफेशनल ट्रुथ टैलर बोलता हूं। ये एक पद है, लेकिन 24 साल की उम्र में हासिल हो गया था। आज 36 सालों से मैं अलग-अलग संस्थानों में उसी कुर्सी पर बैठा हुआ हूं। मुझे ऐसा लगता है कि यह अचीवमेंट नहीं है। अचीवमेंट यह है कि इन 36 सालों में जिस संस्थान में रहा, उस संस्थान में थोड़ी सी भूमिका अदा कर पाया और उसके जरिये उस समय समाज में भूमिका अदा कर पाया। ये सारी बातें बाद में होती हैं कि किसने क्या किया, किसने क्या नहीं तिया। ये सब बातें दूसरों के हवाले कर देता हूं। कुछ तारीफ करते हैं, कुछ बुराई करते हैं। बुराई करने वाले भी मुझे नहीं जानते और तारीफ करने वाले भी बहुत कम मुझसे मिले हुए हैं तो उससे फर्क नहीं पड़ता। आज का काम करता हूं बस।  

यहां देखें इस बातचीत का पूरा वीडियो:

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वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता ने बताया, कैसा रहेगा कोविड के बाद अखबारों का भविष्य

ऐसा संकट काल मैंने कभी नहीं देखा, फिर चाहे युद्ध का समय ही क्यों न हो। जब मैंने पढ़ाई की या पत्रकारिता की तब भी मैंने इस तरह का दौर नहीं देखा

Last Modified:
Sunday, 26 July, 2020
Alokmehta

'ऐसा संकट काल मैंने कभी नहीं देखा, फिर चाहे युद्ध का समय ही क्यों न हो। जब मैंने पढ़ाई की या पत्रकारिता की, तब भी मैंने इस तरह का दौर नहीं देखा, लेकिन ये सच है कि ये समय कठिन परीक्षा का है।' ये कहना है वरिष्ठ पत्रकार व पद्मश्री आलोक मेहता का। उन्होंने 'न्यूज टेलीविजन के 20 साल और इसकी बढ़ती प्रासंगिकता' पर अपने विचार व्यक्त किए। ‘बिजनेस वर्ल्ड’ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा ने शनिवार को वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता के साथ ‘वन टू वन’ (One To One) बातचीत की। वेबिनार सीरीज के तरह दोपहर दो बजे से 3 बजे तक बातचीत हुई, जिसका टॉपिक  '20 Years of News TV and its Growing Relevance' रखा गया था, जिसमें आलोक मेहता ने खुलकर अपने विचार व्यक्त किए।

इस दौरान आलोक मेहता ने कहा कि हमने जमीनी स्तर पर अपना काम शुरू किया था और आज भी इसी तरह से कर रहे हैं। लिहाजा कोरोना काल में लिखने पढ़ने का काम ही चलता रहा है। मैंने कभी भी लिखने पढ़ने का काम बंद नहीं किया, फिर चाहे जर्मनी में रहा हूं या फिर भारत में। कई मौके ऐसे भी आए जब अस्पताल में ही लिखना पढ़ना होता रहा। लेकिन ये दिक्कत कई बार आती है कि आप कितनी देर पढ़ेंगे, लिहाजा अपडेट रहने के लिए कई बार मैं टीवी देख लेता हूं, क्योंकि जैसा कि जानते हैं कि कई टीवी चैनल्स की डिबेट में भी मेरा योगदान रहता है, इसके लिए भी मुझे तैयारी भी करनी पड़ती है।   

उन्होंने कहा कि मैं हमेशा अपने आपको ट्रेनी ही मानता हूं और ट्रेनी मानने से ही पत्रकारिता सही मायने में सार्थक होती है। जीवन भर सीखते रहना चाहिए। मनोहर श्याम जोशी, राजेश माथुर जैसे संपादक रहे, जिनके साथ मैंने काम किया है। इसलिए मुझे लगता है कि जीवनभर सीखते रहना है और इसके लिए चाहे टेलीविजन का काम हो, लिखने का काम हो, जहां तक हो सके उसमें सही बात सही तथ्यों के साथ आए, निष्पक्षता भी दिखाई दे। हां ये जरूर है कि जहां विचार हैं, वहां मतभेद होंगे ही।      

जब उनसे सवाल पूछा गया कि आपने भारतीय मीडिया के 20 वर्ष पूरे होने की पूरी जर्नी देखी है। ये जर्नी कैसी रही है और हम किस तरफ जा रहे हैं?  तो अपने जवाब में उन्होंंने कहा कि देखिए, ये सही बात है कि टेलीविजन आने से एक क्रांति हुई है। जब कलर टेलीविजन आया उस समय मैं जर्मनी में रेडियो चैनल ‘वॉयस ऑफ जर्मनी’ तीन साल काम करके वापस भारत आया था। वहां के टेलिविजन ‘डॉयचे वैले’ का भी शुरुआती दौर था, तब वे न्यूज चैनल के विस्तार की तैयारी कर ही रहे थे। उस समय मैंने ‘वॉयस ऑफ अमेरिका के लिए दिल्ली से बतौर कोऑर्डिनेटर दस वर्ष तक काम किया। भारत में  उस समय एक चैनल ‘स्टार’ की शुरुआत हो रही थी, जिसमें हमारे पुराने मित्र रजत शर्मा भी थे। इस चैनल के आने से एक क्रांति सी आयी। कलर टेलिविजन राजीव गांधी लाए, जिसके बाद प्राइवेट चैनल्स आना शुरू हुए और अब बड़े पैमाने पर भारत में चैनल्स हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मैंने कई देशों की यात्राएं की है और वहां रहा भी हूं। इसलिए मैं कह सकता हूं कि यहां चैनल्स का बहुत ज्यादा विस्तार हुआ है। टेलिविजन आने से रीजनल्स चैनल्स स्कोप बढ़ा है। यहां तक कि अब रीजनल्स अखबारों का भी बढ़ गया है। अखबार हो या टेलीविजन, कोई ये कहे कि यहां मेरा ही संपूर्ण एकाधिकार है, उससे मैं असहमत हूं। संपादक राजेंद्र माथुर जी ने हमेशा मुझे यही सिखाया करते थे कि राष्ट्रीय अखबार तब बनता है, जब हर जिले में या हर प्रदेश में आपका एक एडिशन हो। भारत में टेलीविजन ने न्यूज के या कहें एंटरटेनमेंट के इतने दरवाजे खोल दिए हैं, जितने किसी और देश में नहीं है।

उन्होंने कहा कि टेलीविजन हो, प्रिंट हो या फिर डिजिटल मैं इसे एक दूसरे का पूरक मानता हूं, प्रतियोगिता नहीं। जैसे एक पीढ़ी जाती है, तो दूसरी पीढ़ी को विरासत में कुछ देती है वैसे ही मैं इसे मानता हूं। टेलीविजन जागरूकता बढ़ाने में, भारतीय भाषाओं व हिंदी को बढ़ाने में, अंग्रेजी को सीखाने में क्रांति लाया है। और यहां कहना चाहूंगा कि कमियां हर किसी में है। आप में है, मुझमें है, ऐसे ही टेलीविजन में भी है, लिहाजा इसके लिए आपके पास विकल्प हैं। 

मेहता ने आगे कहा कि हमारे यहां खरीदकर पढ़ने की आदत पहले रही है, लेकिन अब मुफ्त की आदत भी पढ़ गई है। हालांकि इससे गरीब लोगों को तो फायदा है, लेकिन जिनकी तनख्वाह 5 लाख है, उन्हें मुफ्त में क्यों पढ़ाया-दिखाया जाए। मैं बताना चाहूंगा कि मैं जिन अखबारों में संपादक रहा हूं, उन अखबारों को भी हॉकर्स से खरीदकर पढ़ता था। यहां तक कि अपने सभी सहयोगियों के लिए भी यह अनिवार्य किया हुआ था, कि वे अखबार को खरीद कर ही पढ़ें, इसके लिए कंपनी उन्हें पैसा देगी। उनके बिल को मैं पास करता था। ऐसा इसलिए, क्योंकि जब आप कोई चीज खरीद कर पढ़ते हैं, तो उसकी वैल्यू होती है, लेकिन जब मुफ्त में मिलता है तो इंसान सोचता है कि बाद में पढ़-देख लेंगे।  

उनसे जब पूछा गया कि कोविड के बाद अखबारों का भविष्य कैसा रहेगा, तो उन्होंने कहा कि देखिए, संकट का दौर कई बार आता है। पहले भी आया है। 1988 से 1992 के बीच भी संकट का दौर आया था, तब दिल्ली में खासकर हिंदी के कई अखबारों के पेजों की संख्या घट गई थी। तो कई बार अखबार कम हुए, मुश्किलें आईं, न्यूजप्रिंट का क्राइसेस आया, इम्पोर्ट में भी दिक्कतें आईं, पर ठीक होने में थोड़ा समय जरूर लगा। हां इस मुश्किल घड़ी में कई लोगों ने अखबार बंद किए। मैंने भी बंद किए। इस बीच कम्प्यूटर पर अखबार पढ़ने का अभ्यास जारी रखा। हालांकि ये सही है कि ज्यादा अखबार मंगाने की संख्या कम कर हुई है। मेरा मानना है कि मीडिया में ये संकट कम से कम एक साल और रहेगा।

उन्होंने कहा कि यहां कहना चाहूंगा कि यदि आप संकट काल को छोड़ दीजिए तो देखिए कि अंग्रेजी अखबार एक पीक पर पहुंच गए हैं। हालांकि इस समय कई विज्ञापनदाता विज्ञापन देने की कंडीशन में नहीं है, जिसके चलते ही कई बड़े अखबारों ने अपनी पृष्ठ संख्या कम भी की है। लेकिन ये स्थिति आज की है। पर पिछले कई वर्षों के दौरान अखबारों की प्रसार संख्या बढ़ी ही है, फिर चाहे आप मराठी अखबारों को या फिर गुजराती अखबारों की प्रसार संख्या को देख लीजिए। हां, अखबारों को अब एक चीज देखना जरूरी है कि उन्हें अब किसके पास पहुंचना है। यानी जो पहले से ही पढ़ चुका है, पहले से ही जानता है, वो आपका अखबार क्यों लेगा। नया पाठक हिन्दुस्तान में आज भी सबसे ज्यादा है, जोकि युवा भी हैं और रूरल में भी हैं। क्योंकि मेरा मानना है कि ये लोग जितना ज्यादा योगदान देते हैं, उतना दिल्ली में बैठे लोग नहीं देते हैं। आज भी भारतीय मीडिया को ये सोचना होगा कि हमारा व्युअर कौन हैं।

किसान चैनल की बात करें तो ये सिर्फ चल रहा है, लेकिन मेरा अनुभव ये है कि इस ओर जितना होना चाहिए उतना नहीं हो रहा है। इसलिए रूरल एरिया की ओर ध्यान देने की ज्यादा जरूरत है। जब मैंने ‘नईदुनिया’ दिल्ली में लॉन्च किया तो मेरी शर्त उस समय के प्रबंधन से ये थी कि मैं गांव के लिए एक अखबार निकालना चाहता हूं इसलिए मैं आउटलुक छोड़कर नहीं आना चाहता हूं। तो उन्होंने कहां कि हम निकालेंगे, इसके लिए एक प्रिटिंग मशीन दिखाई भी गई और कहा गया कि हमने गुड़गांव से एक मशीन ऑर्डर की है। लेकिन चार-पांच साल गुजर गए लेकिन वो अखबार नहीं निकला। हालांकि क्या वजह रहीं, इसकी कहानी अलग है। लेकिन कहना चाहूंगा कि मेरा सपना तब भी ये था और आज भी है। इसलिए हमें ये देखना होगा कि नया पाठक कहां है।  

देखिए बातचीत का पूरा अंश-         

  

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अच्छा कंटेंट तैयार करने का इससे बेहतर नहीं है कोई 'फॉर्मूला': मार्कंड अधिकारी

‘एक्सचेंज4मीडिया’ की फ्यूचर टॉक सीरीज के पहले एपिसोड में ‘श्री अधिकारी ब्रदर्स’ समूह के चेयरमैन मार्कंड अधिकारी ने तमाम मुद्दों पर अपने विचार रखे

Last Modified:
Tuesday, 14 July, 2020
Markand Adhikari

‘एक्सचेंज4मीडिया’ की फ्यूचर टॉक सीरीज (e4m FutureTalk Series) के पहले एपिसोड में ‘श्री अधिकारी ब्रदर्स’ (SAB) समूह के चेयरमैन मार्कंड अधिकारी के साथ ‘बिजनेस वर्ल्ड’ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा ने तमाम मुद्दों पर बातचीत की। इंडस्ट्री में करीब चार दशक से सक्रिय मार्कंड अधिकारी ने इस बातचीत के दौरान ‘सब ग्रुप’ की अब तक की यात्रा, ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के बढ़ते दायरे और अच्छा कंटेंट तैयार करने के लिए प्लेबुक समेत तमाम मुद्दों पर अपने विचार रखे। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:  

सब ग्रुप के अब तक के सफर को आप किस रूप में देखते हैं?

समूह का अब तक का सफर काफी रोमांचक रहा है। हमने नब्बे के दशक की शुरू में इसकी शुरुआत की थी और मुझे याद है कि हमें प्रति एपिसोड 1.25 लाख रुपये मिलते थे। मैं ‘जी’ (Zee) के सुभाष चंद्रा को अपना गुरु मानता हूं, वह सच्चे बिजनेसमैन हैं और उस समय वह हमें प्रति एपिसोड 1.25 लाख रुपये देने के लिए सहमत हो गए थे, वह इस मामले में आगे बातचीत करना चाहते थे। हालांकि, जब मैंने उन्हें शो के कॉपीराइट की पेशकश की और पूरा पेमेंट करने की गुजारिश की तो वह मान गए। इंडस्ट्री में बाद में यह ट्रेंड बन गया।

वर्ष 1995 में हमने ‘डीडी मेट्रो’ (DD Metro) के लिए शो बनाने शुरू किए और पांच साल में हमने 3500 से ज्यादा एपिसोड पूरे कर लिए। इसके बाद वर्ष 2020 में हमने ‘सब टीवी’ (SAB TV) की स्थापना की। जैसा कि मैंने कहा कि यह सफर काफी रोमांचक रहा है। आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं तो सोचता हूं कि हमारे पक्ष में यह खास रहा कि हमने कॉमेडी का बेहतर ब्रैंड तैयार किया और सोनी-सब के बीच डील होने तक कम पूंजी में इसे चलाया। वर्ष 2000 के बाद से अब तक, सिर्फ दो जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स (GECs) ने अच्छा प्रदर्शन किया है। इनमें एक ‘सब टीवी’ और दूसरा ‘कलर्स’ है। अन्य ने भी जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स के क्षेत्र में काफी प्रयास किया है, लेकिन वे इतने सफल नहीं हुए हैं।  

सफल कॉमेडी कंटेंट से लेकर न्यूज और फिर म्यूजिक में आपने काम किया, इस विविधता के पीछे क्या आइडिया रहा?

वर्ष 2005 में सोनी-सब (Sony-SAB) डील के बाद मैं अगले कदम के बारे में सोच रहा था। इस बीच हमने न्यूज जॉनर में ट्राई किया था, लेकिन मुझे एक अच्छी डील मिली थी और एक सच्चे बिजनेसमैन की तरह मैंने एक इंडस्ट्रियलिस्ट को चैनल बेच दिया। हमारा मानना था कि जनरल एंटरटेनमेंट चैनल (GEC) के क्षेत्र में काफी प्लेयर्स हैं, इसलिए मैं म्यूजिक जॉनर में आ गया। इस बार भी हमने कॉमेडी और म्यूजिक को लेकर एक अलग पेशकश की। हमारे साथ उस समय कॉमेडी जॉनर के जाने-माने नाम जैसे राजू श्रीवास्तव और सुरेश मेनन शामिल थे। कुछ ही समय में चैनल काफी सफल चैनल बन गया। ‘मस्ती’ (Mastiii) को चार जुलाई 2010 को लॉन्च किया गया था और पांच अगस्त 2010 की रेटिंग की बात करें तो यह नंबर वन चैनल था और पिछले 10 वर्षों में इसका प्रदर्शन बहुत अच्छा रहा है।

क्या अच्छा कंटेंट तैयार करने के लिए कोई प्लेबुक (playbook) है?

मैं कहना चाहूंगा कि एक चैनल को सफलतापूर्वक चलाने के लिए अच्छे कंटेंट की समझ होना बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण है। अच्छा कंटेंट तैयार करने के लिए कोई तय प्लेबुक नहीं है। चूंकि मैं एक मध्यम वर्गीय परिवार से आता हूं। मैंने स्ट्रगल का अनुभव किया है और इस बात ने मुझे लोगों को समझने में मदद की है और इसी के अनुसार हम शो में इसका चित्रण करते हैं। यह मशहूर कार्टूनिस्ट आरके लक्ष्मण के आम आदमी की तरह है और इसी तरह मैंने अपनी जिंदगी में लोगों को देखा है। मेरा मानना है कि कंटेंट एक तात्कालिक रचना है। यह बिल्कुल ‘थम्बमार्क’ (thumbmark) की तरह होता है, यानी इसका प्रत्येक हिस्सा अपने आप में अलग होता है। यदि आप जनता की नब्ज पहचानते हैं तो आप अच्छा कंटेंट क्रिएट कर पाएंगे।

प्राइवेट टीवी चैनल्स की बात आती है तो आपकी गिनती अग्रणी में होती है। आज हम जो न्यूज टीवी चैनल्स देखते हैं, उसके बारे में आपके क्या विचार हैं?

इन दिनों न्यूज और एंटरटेनमेंट का आपस में मिश्रण हो गया है। टॉप 30-40 चैनल्स को छोड़कर बाकी के लाइजनिंग प्लेटफॉर्म्स बन गए हैं। न्यूज के लिए अब लोग डिजिटल की तरफ मुड़ रहे हैं और इस डोमेन में डिजिटल बड़ी भूमिका निभाने जा रहा है।  

ओवर द टॉप (OTT) कंटेंट के इस्तेमाल में काफी तेजी से बढ़ोतरी देखने को मिली है। आपकी नजर में क्या ओटीटी अगला मेनस्ट्रीम बन जाएगा?  

इस बात में कोई शक नहीं है कि OTT आने वाला भविष्य है। डिजिटल का यह फायदा है कि आप कहीं पर भी इसे इस्तेमाल कर सकते हैं, लेकिन टीवी के साथ ऐसा नहीं है। यही इसका एक मजबूत पॉइंट भी बन जाता है। हालांकि, हमारी संस्कृति काफी हद तक पारिवारिक है और हम रात को खाने के समय पूरे परिवार को एक साथ बैठे देखना पसंद करते हैं। परिवार के लिए यह समय ओटीटी कंटेंट देखने के लिए उपयुक्त नहीं है। इसलिए, इस तथ्य को देखते हुए कि यह मार्केट में सबस्क्रिप्शन पर निर्भर करता है और ऐड रेवेन्यू कम हो रहा है, मैं अभी भी यही कहूंगा कि टीवी लाखों लोगों के जीवन का हिस्सा है और तमाम घरों में लोग इसे अपने परिवार के साथ मिलकर देखते हैं और यह आगे भी बना रहेगा।

इस पूरी बातचीत को आप यहां इस वीडियो में देख सकते हैं।

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SAB Goup के MD मार्कंड अधिकारी ने बताया, आने वाले वर्षों में कैसा होगा मीडिया का परिदृश्य

‘श्री अधिकारी ब्रदर्स’ (SAB) द्वारा की गई ‘सब’ (SAB) टीवी की लॉन्चिंग को 20 साल पूरे हो गए हैं। इसके अलावा समूह के म्यूजिक चैनल 'मस्ती' ने भी दस साल का सफर तय कर लिया है।

Last Modified:
Friday, 10 July, 2020
Markand Adhikari

‘श्री अधिकारी ब्रदर्स’ (SAB) द्वारा की गई ‘सब’ (SAB) टीवी की लॉन्चिंग को 20 साल पूरे हो गए हैं। इसके साथ ही ग्रुप के म्यूजिक चैनल ‘मस्ती’ (Mastii) ने भी एक दशक का सफर तय कर लिया है। हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ एक बातचीत के दौरान ‘सब ग्रुप’ (SAB Goup) के वाइस चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर मार्कंड अधिकारी ने इस सफर से लेकर आगे की प्लानिंग समेत तमाम मुद्दों पर अपने विचार रखे। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

20 साल से अधिक समय से एक ब्रॉडकास्टर और मीडिया समूह के मालिक के रूप में आपका अब तक का तजुर्बा क्या रहा है?

हम इस इंडस्ट्री में पिछले 40 वर्षों से हैं और ब्रॉडकास्टिंग के क्षेत्र में हम पिछले 20 साल से हैं। ब्रॉडकास्टिंग के सफर में हमारी शुरुआत ‘सब टीवी’ (SAB TV) के साथ हुई थी। मुझे लगता है कि ब्रॉडकास्टिंग के क्षेत्र में हम अभी काफी युवा हैं, इसलिए हमें अभी लंबा रास्ता तय करना है। एक बात निश्चित है कि टेलिविजन (टीवी चैनल्स) यहां बने रहेंगे और सर्वाइव करेंगे। एक कंट्री के रूप में हम पारिवारिक (फैमिली ओरिएंटेड) हैं और तमाम वर्षों से हमने इस पारिवारिक संस्थान का पोषण किया है। टीवी लाखों लोगों के जीवन का हिस्सा है और तमाम घरों में लोग इसे अपने परिवार के साथ मिलकर देखते हैं और यह आगे भी बना रहेगा। हालांकि लॉकडाउन के दौर में डिजिटल काफी आगे बढ़ा है, लेकिन तमाम लोगों को अभी भी सुबह की चाय के साथ अखबार पढ़ने की आदत है। पश्चिमी देशों की बात करें तो अखबार वहां पर अभी भी काफी सम्मानित हैं और राय निर्माता (opinion makers) बने हुए हैं।   

क्या कंटेंट पर कोई किताब (playbook) है? इसे कैसे प्राप्त करें और कैसे व्युअर्स की नब्ज को पहचान सकते हैं?

कंटेंट एक तात्कालिक रचना है। यह बिल्कुल ‘थम्बमार्क’ (thumbmark) की तरह होता है, यानी इसका प्रत्येक हिस्सा अपने आप में अलग होता है। मुझे लगता है कि कंटेंट को समझने के लिए व्यक्ति को जनता की नब्ज की जानकारी होनी चाहिए। मैंने जीवन के सभी पहलुओं और रंगों को देखा है। इसी को कंटेंट में ट्रांसलेट करना सरल है, क्योंकि तमाम लोग इसी तरह की स्थिति से होकर गुजर चुके हैं।

डिजिटल आपकी योजना का एक बड़ा हिस्सा कैसे बन रहा है?

डिजिटल ही फ्यूचर है। टीवी अब केवल टीवी स्क्रीन नहीं रह गया है। यह एक मॉनिटर है। इसलिए, आने वाले समय में एक बड़ा हिस्सा डिजिटल की ओर रुख करेगा। हमारी अगली पीढ़ी रवि और कैलाश ने दो मार्च 2020 को ‘डिज्नी हॉटस्टार’ पर अपनी वेब फिल्म ‘ढीठ पतंगे’ (Dheet Patange) का प्रीमियर किया है। उनके पास कई फिल्में और वेब सीरीज हैं। जिस तरह से तमाम पब्लिकेशंस ने डिजिटल की ओर रुख कर लिया है, हमारा ‘गवर्नेंस नाउ’ (Governance Now) भी डिजिटल हो चुका है। यहां तक कि अब इवेंट्स भी डिजिटल हो रहे हैं। डिजिटल की ब्यूटी यह है कि यह अनंत है। इसलिए, आपको भविष्य में तमाम प्रतिस्पर्धा देखने को मिलेगी।

अगले पांच से दस साल के भीतर मीडिया परिदृश्य के बारे में आपका क्या अनुमान है?

सामान्य रूप से, इसका उत्तर डिजिटल ही होगा, लेकिन हमारे जैसे देश में सभी सर्वाइव करेंगे। डिजिटल काफी फल-फूल रहा है, लेकिन सच कहूं तो ऐसे भी तमाम लोग हैं, जिन्हें इसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। इसलिए, अब यही वास्तविकता है, लेकिन हम सभी एक उद्योग के रूप में अगले 5 से 10 वर्षों में एक बड़े कैनवास में होंगे। मीडिया में टेक्नोलॉजी एक अहम भूमिका निभाएगी और कंज्यूमर्स की भागीदारी से इसमें और तेजी आएगी। हमारे देश में युवाओं की आबादी काफी है, इसलिए हम अच्छी पोजीशन पर होंगे।

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फेसबुक इंडिया के अविनाश पंत ने बताया, किस तरह सेफ होते हैं वॉट्सऐप से भेजे जाने वाले मैसेज

हमारी सहयोगी वेबसाइट एक्सचेंज4मीडिया के साथ बातचीत में फेसबुक इंडिया के मार्केटिंग डायरेक्टर अविनाश पंत ने वॉट्सऐप के पहले इंडियन कैंपेन औऱ यूजर्स के डाटा की सुरक्षा समेत कई मुद्दों पर रखे अपने विचार

Last Modified:
Saturday, 04 July, 2020
Avinash Pant

इंस्टेंट मैसेजिंग ऐप ‘वॉट्सऐप’ (WhatsApp) ने शनिवार को अपने पहले भारतीय कैंपेन ‘It’s Between You’ को लॉन्च किया है। हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ एक बातचीत में ‘फेसबुक इंडिया’ के मार्केटिंग डायरेक्टर अविनाश पंत ने बताया कि अमेरिका की इस दिग्गज कंपनी के लिए भारतीय मार्केट कितना महत्वपूर्ण है। उन्होंने बताया कि वॉट्सऐप में डिजिटल तौर पर समावेशी समाज के रूप में भारत की क्षमता को बढ़ाने में मदद करने की क्षमता है। उन्होंने उम्मीद जताई कि डिजिटल टूल्स को अपनाने और जागरूकता फैलाने में यह एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि वॉट्सऐप एक सुरक्षित प्लेटफॉर्म के साथ देश के लोगों की सेवा के लिए प्रतिबद्ध है, जो लोगों को अपनों से जुड़ने और व्यवसायों को उनके कस्टमर्स से जुड़ने में मदद करता है। इस दौरान पंत ने इस कैंपेन के साथ ही अपने यूजर्स के डाटा की सुरक्षा को लेकर वॉट्सऐप की प्रतिबद्धता और भारतीय मार्केट के साथ-साथ तमाम पहलुओं पर अपनी बात रखी। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:   

अपने 'It’s Between You' कैंपेन के बारे में कुछ बताएं, क्या कोई विशेष कारण है कि आपने भारत में इस कैंपेन को लॉन्च करने का विकल्प चुना?

यह कैंपेन इस तरह की रियल स्टोरीज को दर्शाता है कि हमारे देश के लोग कैसे अपने प्रियजनों के साथ अपने रिश्तों की गहराई के लिए वॉट्सऐप का इस्तेमाल कर रहे हैं। गोपनीयता के कारण ही लोग खुद को किसी भी प्लेटफॉर्म पर पूरी तरह अभिव्यक्त कर पाते हैं। जब गोपनीयता को गहराई से महसूस किया जाता है, तो रिश्ते अधिक खास और वास्तविक लगते हैं। इन विज्ञापनों में यही बताने की कोशिश की गई है। यह सही बात है कि सोशल डिस्टेंसिंग के इस दौर में लॉकडाउन के दौरान तमाम लोगों के लिए वॉट्सऐप एक लाइफलाइन की तरह रहा है।

ऐसे समय में जब विभिन्न सेक्टर्स में प्रत्येक स्तर पर प्राइवेसी को लेकर तमाम चर्चाएं हो रही हैं, तो यह सुनिश्चित करने के लिए वॉट्सऐप क्या कर रहा है कि भारत में उसके 400 मिलियन से अधिक यूजर्स का डाटा सुरक्षित है?

अपने यूजर्स की प्राइवेसी का सम्मान करना हमारे डीएनए में है। वॉट्सऐप के द्वारा भेजा जाने वाला प्रत्येक प्राइवेट मैसेज डिफॉल्ट रूप से ‘एंड टू एंड एनक्रिप्शन’ (end-to-end encryption) के साथ सुरक्षित होता है। यानी भेजे गए कंटेंट को केवल आप और रिसीव करने वाला ही देख सकता है। आज के आधुनिक युग में मजबूत एनक्रिप्शन की आवश्यकता है, क्योंकि हमारा जीवन बहुत ज्यादा ऑनलाइन की तरफ मुड़ गया है। हमारा मानना है कि आपकी बातचीत बिल्कुल सेफ होनी चाहिए। हमारे प्राइवेसी पॉलिसी संबंधी डॉक्यूमेंट ओपन फोरम में हैं, जहां से कोई भी इन्हें देख सकता है और समझ सकता है कि वॉट्सऐप पर अपने यूजर्स के डाटा की सिक्योरिटी और प्राइवेसी के लिए हम क्या कदम उठाते हैं।

लॉकडाउन के इस दौर में जब अधिकांश लोग ‘घर से काम’ (working from home) कर रहे हैं, ऐसे में आपने किस तरह से एक कैंपेन को इस तरह मैनेज किया? क्या इस तरह के कैंपेन अन्य मार्केट्स में भी लॉन्च किए जा रहे हैं?

लॉकडाउन के दौरान लोग भले ही दूर-दूर हों और एक-दूसरे से न मिल पा रहे हों, लेकिन वॉट्सऐप के द्वारा वे एक दूसरे से निजी रूप से जुड़ा हुआ महसूस कर सकते हैं। इन फिल्मों की शूटिंग दूर से करना निश्चित रूप से एक नया और चुनौतीपूर्ण अनुभव था। लॉकडाउन के शुरुआती दिनों में तमाम सुरक्षा मानकों को ध्यान में रखते हुए शूटिंग को दूर से किया गया। कलाकारों का चयन भी इस बात को ध्यान में रखकर किया गया था कि एक्टर्स और छायाकार एक साथ रहने वाले हों, ताकि बाहर का कोई व्यक्ति परिसर में प्रवेश न कर सके। परिवार के अन्य सदस्यों को हेयर, मेकअप आर्टिस्ट और कॉस्ट्यूम सहायक बनाया गया। इसी का नतीजा था कि हमने ‘एक्शन’ के स्थान पर पहली बार ‘एक्शन मम्मा’ सुना। क्लाइंट की एजेंसी और यहां तक कि डायरेक्टर ने भी पूरी शूटिंग को वॉट्सऐप वीडियो कॉल से देखा और दिशा-निर्देश दिए। इसी तरह से उन्होंने प्री-प्रॉडक्शन मीटिंग और प्रजेंटेशन को पूरा किया। हमने ब्राजील में भी ऐसे ही विज्ञापन चलाए।

इस कैंपेन के लिए आपका टार्गेट ग्रुप (TG) क्या है, यानी आपने वास्तव में किनके लिए इस कैंपेन को तैयार किया है? इसे प्रमोट करने के लिए आपका क्या प्लान है?  क्या आप इसे सिर्फ डिजिटल रूप से ही प्रसारित कर रहे हैं अथवा आप पारंपरिक रास्ता भी अख्तियार कर रहे हैं?

इस कैंपेन को सभी वॉट्सऐप यूजर्स को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है, फिर वे चाहे कहीं भी रहते हों और कोई सी भी भाषा बोलते हों। कैंपेन के दौरान ये फिल्में हिंदी और तमाम अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध होंगी। पूरे भारत में विभिन्न मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर जहां पर हमारे कंज्यूमर्स हैं, इस कैंपेन को 10 हफ्तों के लिए चलाया जाएगा। इनमें फेसबुक, इंस्टाग्राम, टीवी, ओटीटी और अन्य डिजिटल माध्यम जैसे-यूट्यूब आदि शामिल हैं।  

पिछले करीब ढाई साल में भारत में आपके यूजर्स की संख्या दोगुनी हो गई है, भारत के लिए अब आपका क्या प्लान है? मुद्रीकरण (monetization) की बात करें तो यह मार्केट आपके लिए कितना महत्वपूर्ण है? भारतीय मार्केट के लिए आपका क्या प्लान है, इस बारे में कुछ बताएं?

भारत में वॉट्सऐप यूजर्स की संख्या 400 मिलियन से ज्यादा है, जो हमारे प्राइवेट मैसेजिंग प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल लोगों से संपर्क के लिए कर रहे हैं। फिर चाहे उनके दोस्त हों, परिवार हो, डॉक्टर्स हो, वकील हों या अन्य। हम अपने प्लेटफॉर्म पर यूजर्स को ऐसा अनुभव प्रदान करना चाहते हैं जो लोगों और व्यवसायों को मूल्यवान लगे और लोगों को मजबूत रिलेशनशिप तैयार करने में मदद करता है।

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