अरनब गोस्वामी का पंजा नहीं झुका पाए बाबा रामदेव

अरनब गोस्वामी के हिंदी चैनल 'रिपब्लिक भारत' पर बाबा रामदेव पहली बार नजर आए। आधा-एक घंटा नहीं, बल्कि पूरे डेढ़ घंटे तक बाबा रामदेव का इंटरव्यू करते रहे अरनब गोस्वामी

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Monday, 11 November, 2019
Last Modified:
Monday, 11 November, 2019
Arnab goswami Baba Ramdev

हिंदी के न्यूज चैनल्स ने सालों तक टीआरपी के लिए बाबा रामदेव के प्रोग्राम्स, उनके इंटरव्यूज और बाद में उनके विज्ञापनों से खूब लाभ कमाया है, लेकिन अरनब गोस्वामी के हिंदी चैनल 'रिपब्लिक भारत' पर बाबा रामदेव पहली बार नजर आए और वह भी तब, जब राम मंदिर पर फैसले के बाद एक डिबेट में बाबा रामदेव के बयान की क्लिप का जादू यूट्यूब पर अरनब गोस्वामी ने देखा। बाबा रामदेव ने भी अरनब गोस्वामी की ताकत का उस वक्त लोहा मान लिया, जब स्टूडियो में उनका पंजा नहीं गिरा पाए।

दरअसल, ओवैसी के बयान के बाद ‘रिपब्लिक भारत’ पर अरनब गोस्वामी ने एक डिबेट आयोजित की। उसमें थोड़ी देर के लिए बाबा रामदेव को भी लाइव लिया गया। फिर बाबा रामदेव के बयान की वह क्लिप अलग से ‘रिपब्लिक भारत’ के यूट्यूब चैनल पर डाली गई। 24 घंटों के अंदर उस पर 3.5 मिलियन व्यूज‌ आ गए। उसको देख कर पहली बार अरनब गोस्वामी को बाबा रामदेव की ताकत का अहसास हुआ। गोस्वामी ने अगले दिन ही बाबा रामदेव को फोन किया और इंटरव्यू के लिए अपने स्टूडियो में इनवाइट किया। फिर आधा-एक घंटा नहीं, बल्कि पूरे डेढ़ घंटे तक बाबा रामदेव का इंटरव्यू करते रहे अर्नब गोस्वामी।

बाबा रामदेव को स्टूडियो में बुलाने की वजह यानी 3.5 मिलियन व्यूज वाला वाकया खुद अरनब गोस्वामी ने शो के शुरू में बताया। बाबा रामदेव ने भी स्टूडियो में आकर, स्टूडियो को देखकर अरनब गोस्वामी की जमकर तारीफ की। बाबा रामदेव ने कहा कि उन्होंने अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों के तमाम स्टूडियोज देखे हैं, बीबीसी के कई देशों के स्टूडियो में वह गए हैं, ‘रिपब्लिक भारत’ का यह स्टूडियो भी इंटरनेशनल लेवल का है। बाबा रामदेव का यह भी कहना था, ‘जिस तरह से मैं किसान का बेटा होकर इतनी ऊंचाइयों तक पहुंच गया हूं, उसी तरह कभी आम पत्रकार की तरह करियर शुरू करने वाले अरनब गोस्वामी इतने बड़े मीडिया ग्रुप के मालिक बन गए।’अरनब गोस्वामी ने बताया कि कैसे वह (बाबा रामदेव) रिपब्लिक की समिट में मुंबई आए थे और जब हमने यह बताया था कि हिंदी चैनल भी ला रहे हैं तो बाबा रामदेव ने उन्हें आशीर्वाद दिया था और उसी आशीर्वाद की बदौलत यह चैनल खुल पाया है। इसके बाद इंटरव्यू शुरू हुआ। बाबा रामदेव ने राम मंदिर से जुड़ीं अपनी यादों को शेयर किया। इस दौरान तमाम राजनीतिक मुद्दों के साथ बाबा रामदेव के कामों पर चर्चा हुई, योगा पर चर्चा हुई।

आखिर में बाबा रामदेव की तारीफ करते हुए अरनब गोस्वामी ने कहा, ‘सुना है कि आपकी बॉडी काफी फ्लैक्सिबल है, जो आप कर सकते हैं, वह कोई नहीं कर सकता तो आप कुछ करके हमें दिखाइए, कुछ योगा के पोज। तब बाबा रामदेव ने पहले हाथों पर चलकर दिखाया, फिर शीर्षासन करके दिखाया। बाबा रामदेव का फोकस था कि अरनब गोस्वामी भी उनके साथ योगा के कुछ आसन करें, लेकिन गोस्वामी भी लगातार बचने की कोशिश में लगे रहे। उनका फोकस था कि ऑडियो पूरा आना चाहिए, इसलिए खुद माइक हाथ उठाकर बाबा रामदेव के पास लगा दिया। इधर बाबा की कोशिश रही कि अरनब गोस्वामी एक-दो आसन कर लें। फाइनली बाबा रामदेव ने अरनब को पहले सूर्य नमस्कार करवाया।

उसके बाद बाबा रामदेव ने अरनब को अपने साथ दंड कसरत करवाने की कोशिश की, एक दंड लगाने के बाद अरनब गोस्वामी उठ गए। उसके बाद बाबा ने अपनी ताकत दिखाई और अरनब गोस्वामी को लाइव कैमरों के सामने अपनी गोद में उठा लिया। सबसे आखिर में बाबा ने अरनब गोस्वामी से पंजा लड़ाया।

अब ये पंजा लड़ाने का ‘मैच’ फिक्स था या नहीं, यह तो पता नहीं, लेकिन बाबा रामदेव ने जैसे ही अरनब गोस्वामी से पंजा लड़ाया, फौरन बोले कि अरनब के हाथों में बहुत ताकत है। दोबारा बोले कि बहुत स्ट्रॉन्ग हैं। यह भी बोले की अरनब गोस्वामी से कोई पंगा लेने की कोशिश मत करना। इधर, गोस्वामी ने भी कहा कि बाबा चीटिंग मत करिए, लेकिन बाबा रामदेव उनका पंजा नहीं गिरा पाए। लेकिन जितने भी दर्शक अब तक अरनब गोस्वामी को चीखते चिल्लाते, गुस्सा करते टीवी पर देखते आए हैं, उनके लिए ये शो इसलिए अलग होगा, क्यों वह पहली बार आपको इतना हंसते हुए दिखेंगे, वह भी ठहाके मारकर। आप यह पूरा शो यहां देख सकते हैं।

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कोरोना संकट से निपटने की Network18 की क्या हैं तैयरियां, बताया CEO अविनाश कौल ने

‘नेटवर्क18’ के टेलिविजन न्यूज के सीईओ अविनाश कौल ने वर्तमान स्थिति के बारे में बातचीत की। इसके अलावा उन्होंने कोरोना वायरस के प्रकोप व लॉकडाउन से आगे आने वाली चुनौतियों के बारे में भी बात की।

Last Modified:
Tuesday, 07 April, 2020
Avinash Kaul

टीवी दर्शकों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ रही है, लेकिन क्या इसका प्रभाव विज्ञापन बिलों पर दिखाई देता है? शायद नहीं। दर्शकों की संख्या में तेजी से हुई वृद्धि के बीच, टीवी न्यूज मीडिया एक तरफ कम वर्कफोर्स के बावजूद इस मोर्चे पर बहादुरी से काम रही है, वहीं दूसरी तरफ कम एडवर्टाइजमेंट का सामना भी कर रही है, क्योंकि लॉकडाउन के इस दौर में एडवर्टाइजर्स विज्ञापन देने में ज्यादा रुचि नहीं दिखा रहे हैं।

हमारी सहयोगी वेबसाइट एक्सचेंज4मीडिया की सीनियर कॉरेस्पोंडेंट तस्मयी रॉय से ‘नेटवर्क18’ (Network18) के टेलिविजन न्यूज के सीईओ अविनाश कौल ने वर्तमान स्थिति के बारे में बातचीत की। इसके अलावा उन्होंने कोरोना वायरस के प्रकोप व लॉकडाउन के कारण आगे आने वाली चुनौतियों के बारे में भी बात की।

जानिए क्या कुछ कहा-

न्यूज जॉनर की बात करें तो दर्शकों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि देखने को मिली है। ऐसे में क्या आपको लगता है कि यह वृद्धि आगे भी जारी रहेगी? दर्शकों की संख्या में किस तरह का उछाल आने की उम्मीद है?

देश में 25 मार्च से लॉकडाउन है। BARC इंडिया ने 12वें हफ्ते के जो आंकड़े जारी किए वह ‘जनता कर्फ्यू’ वाले दिन और लॉकडाउन के तीन दिन को कवर करते हैं। लॉकडाउन में हर दिन हुई वृद्धि को देखें तो टीवी के साप्ताहिक आंकड़े निश्चित रूप से बढ़ेंगे। अन्य जॉनर के मुकाबले यदि न्यूज जॉनर के दर्शकों की संख्या की बात करें तो इसमें तेजी से वृद्धि देखने को मिली है और वह इसलिए क्योंकि जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स पर फ्रेश कंटेंट का अकाल पड़ा हुआ है, जबकि इसके मुकाबले न्यूज जॉनर ने बहुत ही फ्रेश और लाइव कंटेंट उपलब्ध कराया है। इसलिए, हम उम्मीद करते हैं कि न्यूज जॉनर के साप्ताहिक आंकड़े आगे 10-15% तक और बढ़ेंगे। इसके साथ ही नेटवर्क18 के न्यूज चैनल्स का वृद्धि प्रतिशत अन्य चैनलों के मुकाबले काफी बेहतर होगा। हम नेटवर्क18 के न्यूज चैनल्स के साप्ताहिक आंकड़े 20-25% तक और बढ़ने की उम्मीद कर रहे हैं।  हम अपने दर्शकों को जोड़े रखने और कोरोना के संक्रमण के बारे में सूचित करने के लिए उन्हें अन्य न्यूज प्रोग्राम देने की योजना भी बना रहे हैं।

इस दौरान विशेष प्रोग्रामिंग योजनाओं के बारे में थोड़ा सा बताएं?

व्युअरशिप पैटर्न में आया बदलाव और जो बाहरी मौजूदा स्थिति है, वह प्रोग्रामिंग में कुछ नयापन का आह्वान करती है। चूंकि मरीजों की बढ़ती संख्याओं के बीच लोग COVID-19 से जुड़ी खबरों का अपडेट देख रहे हैं। दर्शकों को इसको लेकर पूरी जानकारी हो इसके लिए हम उन्हें हेल्पलाइन भी प्रदान कर रहे हैं। डॉक्टरों के जरिए हम उन्हें काउंसिलिंग की सुविधा भी दे रहे हैं। दर्शकों में जो गलत धारणाएं और डर है, हम उन्हें दूर कर उनकी मदद भी कर रहे हैं।

हमारे पास ऐसे स्पेशल प्रोग्राम्स हैं, जो हेल्थकेयर और फिटनेस टिप्स प्रदान करते हैं ताकि दर्शकों को लॉकडाउन से निपटने के लिए बेहतर तरीका सुझा सकें। वहीं हमारा CNBC क्लस्टर महामारी के आर्थिक प्रभाव का विश्लेषण कर रहा है। ऐसे समय पर फंड को बेहतर तरीके से कैसे मैनेज करें, इस पर हर दिन सर्वोत्तम तरीके से अपने विचार भी साझा कर रहा है। CNN-News18 ने विशेष कार्यक्रमों का एक सेट तैयार किया है, जिनमें ‘कोरोना वारियर्स’, ‘कोरोना फाइल्स’, ‘कोरोना कंट्रोल रूम’ और ‘डॉक्टर कॉल-इन’ शामिल हैं। ये कार्यक्रम सर्वाइवर की कहानियां बताते हैं, हर दिन मरीजों की संख्या की सही जानकारी देते हैं, क्या कुछ पॉजिटिव हो रहा है, इसके बारे में बताते हैं और इस महामारी को लेकर दुनिया में क्या कुछ चल रहा है, इसको लेकर भी नियमित अपडेट प्रदान करते हैं। हमने दर्शकों के लिए एक कोरोना नियंत्रण कक्ष भी स्थापित किया है, जिससे दर्शकों को उन सवालों के जवाब मिल सकें, जो बीमारी के संबंध में हैं। इसलिए आप देख सकते हैं कि हमारा पूरा फोकस दर्शकों को बनाए रखने और लॉकडाउन से बचे रहने के लिए उन्हें सभी तरह की जानकारियां देने पर है। हमारा स्पेशल फोकस तो पॉजिटिव न्यूज और उपलब्धियों की कहानियां बताने पर है क्योंकि बाहर के वातावरण में बहुत ज्यादा निराशा बढ़ रही है।

News18 India ने उत्सव की भावना को बनाए रखने के लिए राम नवमी पर विशेष शो किया। 'खबर पक्की है' के माध्यम से चैनल ने इस महामारी से जुड़े तरह-तरह के मिथक को तोड़ने का प्रयास किया और सोशल मीडिया पर फैलाए जा रही फेक न्यूज की सही जानकारी प्रदान करने की कोशिश की है। इसलिए, हमारा फोकस तरह-तरह के मिथक को तोड़ना और लोगों को और शिक्षित करना है। 26 राज्यों में हमारे चैनल ज्यादा से ज्यादा लोकल खबरें प्रदान करने, निराशा और साहस की कहानियों को उजागर करने और स्थिति के बारे में संतुलित दृष्टिकोण बनाए रखने में सक्षम हैं।

न्यूजरूम के कुछ लोग घर से काम कर रहे हैं। कम वर्कफोर्स के बावजूद आप सिस्टम को कैसे बचाए हुए हैं? कर्मचारियों की सुरक्षा के लिए आप क्या कुछ कर रहे हैं?

हमने इस वैश्विक संकट से निपटने के लिए मानवीय दृष्टिकोण अपनाया है, क्योंकि हम जो भी करते हैं, लोगों को अपने दिल में रखकर करते हैं। हमें अपनी प्रतिभाशाली लोगों की टीम के लिए बहुत ज्यादा चिंता हैं और हम उनके साथ खड़े हैं। लेकिन 70 करोड़ दर्शकों के साथ भी हम कोई समझौता नहीं कर सकते, क्योंकि वह भी हमारी जिम्मेदारी है।  

हम नया वर्किंग प्रोटोकॉल्स फॉलो कर रहे हैं। अपने कर्मचारियों को आराम से काम करने की छूट दी हुई है, ऐसे में भी हमारी संपादकीय टीम्स विभिन्न स्थानों से 24 घंटे काम कर रही है और COVID-19 से जुड़ी खबरों को सबसे तेजी से दर्शकों तक पहुंचा रहीं हैं। मुझे यह भी कहते हुए गर्व हो रहा है कि हमारे फ्रंटलाइन रिपोर्टर्स का साहस और उनका तप वाकई प्रशंसनीय है।

एक ऑर्गनाइजेशन के तौर पर, हम अपने कर्मचारियों की सुरक्षा और उनके स्वास्थ्य को लेकर सबसे अधिक चिंतित हैं। हम नेटवर्क18 ग्रुप को कोविड-19 से मुक्त रखने और अपने सहयोगियों व उनके परिजनों को सभी तरह की सहायता प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

इसे सुविधाजनक बनाने के लिए ऑर्गनाइजेशन के अंदर एक कोरोना रिस्पांस टीम बनाई गई है। हमारी एचआर और एडमिन टीम्स स्व-घोषित टूल के माध्यम से यानी जिसे सिम्प्टम ट्रैकर कहते हैं, उसके जरिए सभी कर्मचारियों के स्वास्थ्य पर नजर बनाए रखने का काम कर रहीं हैं। मुझे एक बार फिर यह घोषणा करते हुए गर्व हो रहा है कि हम अपने सभी चैनलों और डिजिटल संपत्तियों का सफलतापूर्वक संचालन कर रहे हैं, जिसे हमने पहले से ही अच्छी तरह से बनाए रखा है। ऐसा इसलिए हो पा रहा है क्योंकि हमने बिजनेस प्लान को पहले से ही इस तरह से तैयार किया हुआ है।

सामान्य परिस्थितियों में इस तरह की रेटिंग विज्ञापन बिलों के लिए खुशी की बात होती है, लेकिन मार्केट की परिस्थितियों को देखते हुए कई ब्रैंड्स विज्ञापन को लेकर उत्साहित नहीं हैं। आप उससे कैसे निपट रहे हैं? विज्ञापनदाताओं से आपकी क्या अपील है?

अप्रैल में विज्ञापन में निश्चित रूप से धीमी शुरुआत देखी गई है। लेकिन अर्थव्यवस्था में पहले से मौजूद मंदी, नए वित्तीय वर्ष की योजनाओं और ऑनलाइन ऐप्स के माध्यम से काम करने के विभिन्न तरीकों के साथ इसकी तुलना करनी होगी। चीजों को नए तरीके से काम करने में समय लगता है और हम पहले से ही विभिन्न विज्ञापनदाताओं की अधिक रुचि को देख रहे हैं, जो दर्शकों तक पहुंचने के विभिन्न रचनात्मक तरीके अपना रहे हैं।

क्लाइंट के नए क्रिएटिव आने वाले नहीं हैं और कुछ पुराने क्रिएटिव वर्तमान परिदृश्य में फिट नहीं बैठते हैं। इसलिए, नेटवर्क18 ने क्रिएटिव सॉल्यूशंस के जरिए ग्राहकों के साथ सक्रिय रूप से जुड़ना शुरू कर दिया है, ताकि वे ज्यादा से ज्यादा खबरों देखें और इससे ज्यादा से ज्यादा रेटिंग में इजाफा हो सके। वैसे आने वाले दिनों को लेकर हम आशावादी हैं।

टीवी रेटिंग सस्पेंड करने को लेकर बातें हो रही हैं। इसे लेकर आपके क्या विचार हैं?

कोविड-19 एक वैश्विक महामारी है, लेकिन दुनिया में कहीं भी रेटिंग्स डेटा को बंद नहीं किया गया है, सिवाय डायरी पद्धति के आधार पर। हमें BARC द्वारा आश्वासन दिया गया है कि उनके रेटिंग संग्रह तंत्र इलेक्ट्रॉनिक हैं और उन्हें मैन्युअल हस्तक्षेप की जरूरत नहीं होती है, तो ऐसे में इसमें स्वास्थ्य का जोखिम पैदा ही नहीं होता है। ऐसी परिस्थितियों में मेजरमेंट रोक देने का कोई मतलब नहीं है और वह भी इस माध्यम के लिए, जिसमें दर्शकों की संख्या सबसे अधिक है। डिजिटल और टीवी मेजरमेंट सुरक्षित है और इसमें स्वास्थ्य संबंधी कोई जोखिम नहीं है। इसलिए ऐडवर्टाइजर्स और प्रोग्रामर्स को यह जानने का अधिकार है कि क्या काम कर रहा है और क्या नहीं।

इस संकट से प्रभावित लोगों की मदद व सपोर्ट करने के लिए नेटवर्क ने कई मुहिम शुरू की हैं। इस बारे में कुछ बताएं?

हमने लॉकडाउन के दौरान देश में सबसे कमजोर वर्ग के लिए आर्थिक रूप से मदद करने का एक अभियान #IndiaGives शुरू किया है। अपने पहले कदम के तहत, नेटवर्क18 ग्रुप के 6,000 से अधिक एम्प्लॉयीज ने प्रधानमंत्री के राष्ट्रीय राहत कोष में अपना एक दिन का वेतन देकर इस मुहिम की शुरुआत की है। इस मुहिम का उपयोग दैनिक वेतन भोगी श्रमिकों के लिए किया जा रहा है, जिनकी आजीविका लॉकडाउन की वजह से प्रभावित हुई है। हमारे अभियान का एक मुख्य अंतर यह है कि इसका एक ऐसी एडिटोरियल टीम नेतृत्व कर रही है, जिसमें हमारे पत्रकारों को महारथ है और हमारी प्रोग्रमिंग में भी यह दिखाई दे रहा है। इससे इनमें विश्वसनीयता भी जुड़ जाती है। प्रतिदिन 19 करोड़ लोगों की पहुंच के साथ, यह जरूरी है कि हम सामाजिक भलाई के लिए एक साहसिक कदम उठाएं।

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न्यूज चैनल्स की रेटिंग के मुद्दे पर iTV Network के कार्तिकेय शर्मा ने रखी अपनी बात

लॉकडाउन के दौरान लगभग सभी लोग कोरोनावायरस से जुड़ी खबरों के अपडेट्स के लिए न्यूज चैनल्स देख रहे हैं

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 01 April, 2020
Last Modified:
Wednesday, 01 April, 2020
Kartikeya Sharma

पूरी दुनिया में इन दिनों कोरोनावायरस (कोविड-19) का कोहराम मचा हुआ है। इस महामारी के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए सरकार ने देश में लॉकडाउन की घोषणा की है और लोगों को 21 दिनों तक घरों में रहने की सलाह दी है। लॉकडाउन के दौरान लगभग सभी लोग कोरोनावायरस से जुड़ी खबरों के अपडेट्स के लिए न्यूज चैनल्स देख रहे हैं। यही कारण है कि पिछले कुछ हफ्तों के दौरान टीवी न्यूज की खपत में बहुत ज्यादा बढ़ोतरी देखी गई है।

हालांकि, इस ग्रोथ की बीच इस तरह की खबरें भी सामने आ रही हैं कि देश में टीवी दर्शकों की संख्या मापने वाली संस्था ‘ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल’ (BARC) इंडिया चार हफ्तों के लिए टीवी रेटिंग्स को स्थगित करने की योजना बना रही है। हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) ने न्यूज ब्रॉडकास्टर ‘आईटीवी नेटवर्क’ (iTV Network) के फाउंडर और ‘न्यूज ब्रॉडकास्टर्स फेडरेशन’ (NBF) के वाइस प्रेजिडेंट कार्तिकेय शर्मा से बार्क के इस प्रस्तावित कदम और लॉकडाउन के बीच न्यूज चैनल्स की कार्यप्रणाली के बारे में बातचीत की।

इस बातचीत के दौरान कार्तिकेय शर्मा का कहना था कि वर्तमान दौर में टीवी न्यूज तमाम चुनौतियों और मुश्किलों से जूझ रही है, लेकिन यह एक वैश्विक समस्या है। ऐसे समय में व्यवसाय में शामिल लोगों की सेफ्टी और सिक्योरिटी को देखना प्राथमिकता है। कार्तिकेय शर्मा का कहना है, ‘आईटीवी नेटवर्क में हम अपनी टीमों की सुरक्षा व देखभाल के लिए हरसंभव प्रयास कर रहे हैं। इस दौरान सैनिटेशन के नियमों का कड़ाई से पालन किया जा रहा है। यही नहीं, इस बीमारी से बचाव में सोशल डिस्टेंस एक कारगर उपाय है, इसलिए नेटवर्क ने अपने 50 प्रतिशत एंप्लाईज को ‘घर से काम’ (Work From Home) करने की सुविधा दी है, ताकि कोरोना वायरस के संक्रमण को फैलने से रोका जा सके।’

प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

पिछले हफ्तों के दौरान न्यूज व्युअरशिप में काफी इजाफा देखने को मिला है, विज्ञापन के लिहाज से देखें तो कितना असर हुआ है और विज्ञापनदाता इसे किस रूप में देख रहे हैं?

विज्ञापनदाताओं के बारे में तभी स्पष्ट हो पाएगा, जब लॉकडाउन खत्म होगा। हां, लोग टीवी पर न्यूज देख रहे हैं और लंबे समय से जो धारण बनी हुई थी कि जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स के मुकाबले टीवी न्यूज को कम देखा जाता है, पूरी तरह नष्ट हो चुकी है। वर्तमान में काफी सारी चीजें पूरी तरह स्पष्ट हो चुकी हैं। जैसा कि आप सभी जानते हैं कि टीवी न्यूज घटनाओं पर आधारित बिजनेस है। यानी जब कोई बड़ी घटना होती है तो टीवी न्यूज की व्युअरशिप बढ़ जाती है। तमाम लोग फिर इस निष्कर्ष पर पहुंच चुके हैं कि टीवी न्यूज लोगों पर काफी प्रभाव डालती है। अभी मैं केवल इतना कह सकता हूं कि बुनियादी धारणाएं सही हो रही हैं और बहुत सारा विज्ञापन खर्च इन पर आधारित था।  

संकट की इस घड़ी में कोविड-19 से प्रभावित लोगों की ‘आईटीवी फाउंडेशन’ (iTV Foundation) किस तरह से मदद कर रहा है?

‘आईटीवी फाउंडेशन’ करीब तीन साल से चल रहा है। अभी तो हम लोगों को जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे बहुत से लोग हैं जो मदद करना चाहते हैं, लेकिन उन्हें नहीं पता कि कैसे करें। एक मीडिया प्लेटफॉर्म के रूप में हम लोगों को एक साथ ला रहे हैं और हम ऐसा करना आगे भी जारी रखेंगे।

सुनने में आ रहा है कि चैनल्स की रेटिंग को बार्क चार हफ्ते के लिए स्थगित कर सकती है। इस बारे में आपका क्या कहना है?

टीवी न्यूज इंडस्ट्री के लिए यह काफी दुर्भाग्यपूर्ण बात होगी, जिसने हमेशा रेवेन्यू जुटाने के लिए काफी संघर्ष किया है, खासकर इस तथ्य को देखते हुए कि इसमें बहुत ज्यादा पूंजी लगती है। इस धारणा के तहत कि न्यूज चैनल्स पर्याप्त रिटर्न नहीं देते, उनके साथ इस तरह का व्यवहार किया जा रहा है। लेकिन सिर्फ इसलिए कि जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स (GECs) फ्रेश कंटेंट नहीं दे सकते, इसका ये मतलब नहीं कि न्यूज प्लेयर्स के लिए इस तरह का कदम उठाया जाए। न्यूज व्युअरशिप बढ़ रही है। यह सच्चाई है और इसे स्वीकार किए जाने की जरूरत है। ऐसे समय में न्यूज चैनल्स की रेटिंग को रोकना एक कठोर कदम होगा।

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अरनब गोस्वामी ने बताया, कोरोना की कवरेज को लेकर किस तरह जूझ रहे हैं न्यूज चैनल्स

एनबीएफ के प्रेजिडेंट अरनब गोस्वामी ने कहा, न्यूज ब्रॉडकास्टर्स अपनी कवरेज बढ़ा रहे हैं और उन्हें ज्यादा इंफ्रॉस्ट्रक्चर, ज्यादा लोग और ज्यादा संसाधनों की जरूरत है

Last Modified:
Tuesday, 31 March, 2020
arnab

कोरोनावायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए चल रहे 21 दिन के लॉकडाउन के दौरान दर्शकों को न्यूज से अपडेट रखने और उन्हें जागरूक करने के लिए न्यूज ब्रॉडकास्टर्स अपने प्रयासों में जीजान से जुटे हुए हैं। इन सबके बीच ‘न्यूज ब्रॉडकास्टर्स फेडरेशन’ (NBF) के प्रेजिडेंट अरनब गोस्वामी ने एडवर्टाइजिंग जगत से समर्थन की अपील की है, ताकि न्यूज चैनल्स अपना काम सुचारु रूप से कर सकें।  

एक्सचेंज4मीडिया से बातचीत में अरनब गोस्वामी ने कहा कि इस समय न्यूज व्युअरशिप कैसे आसमान छू रही है और आने वाले दिनों में यह कैसे आगे बढ़ेगी। गोस्वामी के अनुसार, दिन का हर एक घंटा अब प्राइम टाइम है। चूंकि दर्शकों की संख्या पहले की तरह ही बढ़ रही है, लिहाजा निकट भविष्य में निवेश करने वाले विज्ञापनदाताओं को भी इसका लाभ मिलेगा।
प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश-

टीवी विशेषकर न्यूज जॉनर में पिछले कुछ दिनों में दर्शकों की संख्या में अधिक वृद्धि देखी गयी है, तो क्या आप निकट भविष्य में दर्शकों की संख्या में और अधिक वृद्धि देखते हैं?

BARC ने नेल्सन रिपोर्ट के साथ जो आंकड़े पेश किए हैं, वे पहले हफ्ते का एक हिस्सा हैं। यानी ये आंकड़े मुख्य तौर पर देश में लॉकडाउन किए जाने से पहले के हैं। वहीं अगले शुक्रवार को रिपोर्ट सामने आएगी, वो लॉकडाउन के लागू किए जाने के बाद की होगी। यदि आप इन रुझानों को देखें, तो मुझे लगता है लॉकडाउन के दौरान दर्शकों की संख्या में कम से कम 50% से 100% की उछाल दर्ज की जाएगी। मुझे लगता है कि जनता कर्फ्यू के दिन से ही न्यूज देखने वालें दर्शकों की संख्या बढ़ी है। इसलिए हां, लॉकडाउन के समय सभी सेगमेंट में न्यूज के दर्शकों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि होगी, क्योंकि खबरें अब केवल खबरें नहीं रहीं, बल्कि इस समय यह लोगों के लिए सूचना भी हैं। 

हम इंफोटेनमेंट को भी देख रहे हैं। हमारे पास विभिन्न क्षेत्रों के कलाकार, कलाकार, कवि, सेवानिवृत्त सैन्यकर्मी, अभिनेता और अन्य पर्सनेलिटी हैं, जो जागरूकता के प्रयासों को जारी रखने में योगदान दे रहे हैं। चूंकि यह एक सामूहिक राष्ट्रीय उद्यम सा हो गया है, इसलिए मैं आने वाले दिनों में दर्शकों के आंकड़ों को पूरी तरह से आसमान छूने की उम्मीद करता हूं। 

संकट की इस घड़ी में जहां कई न्यूज चैनल्स दर्शकों के साथ जुड़े रहने और उन्हें प्रेरित करने के लिए विशेष प्रोग्राम्स शुरू करने की योजना बना रहे हैं, ऐसे समय में रिपब्लिक टीवी किस तरह के स्पेशल कंटेंट पर फोकस कर रहा है?

वैसे एक सेगमेंट है, जिसे मैं हर दिन करता हूं और यह अब लोगों के बीच काफी पॉपुलर भी हो गया है, जिसे ‘Hashtag Lockdown Questions’ कहते हैं। बता दूं कि इसमें सरकार के द्वारा जारी बहुत सी ऐसी सूचनाएं दी जाती हैं, जो बहुत ही महत्वपूर्ण होती हैं और वह भी जो कभी-कभी बहुत ही ज्यादा टेक्निकली होती हैं, जिसे हम आसान बनाकर दर्शकों को दिखाते हैं। हम इस सेगमेंट में उन सभी सवालों का जवाब भी देने की कोशिश करते हैं, जिन्हें दर्शक जानना चाहते हैं। जैसे- मेडिकल से संबंधित मुद्दें, लोगों की समस्याएं, हर दिन की उत्पन्न होती समस्याएं, इमरजेंसी की स्थिति में यात्रा करने को लेकर कहां से अनुमति लें... इत्यादि। हर दिन मुझे लगभग 50 से 60 कॉल आते हैं और लोग हजारों सवालों से पूछते हैं।

टीवी दर्शकों के सवालों का जवाब देने के लिए बहुत से लोकप्रिय चेहरे हमारे यहां टीवी स्क्रीन पर दिखायी देते हैं, जैसे संगीतकार सुलेमान मर्चेंट, अदनान सामी, पलाश सेन। वहीं खेल जगत से लिएंडर पेस और बाईचुंग भूटिया हैं, जो लोगों को प्रेरित करने के लिए अकसर ऑन एयर दिखायी देते हैं। इसके अलावा फिटनेस एक्सपर्ट में रुजुता दीवेकर, मिकी मेहता और बाबा रामदेव जैसे लोग भी हैं। लिहाजा हमारी कोशिश रहती है कि हम खबरों से परे जाकर भी लोगों के लिए कुछ अलग कर सकें और उनसे जुड़ सकें।  इस लॉकडाउन को सफल बनाने के लिए, हमें एहसास हुआ कि 99% नहीं, हमें भाग लेने के लिए 100% भारतीयों की आवश्यकता है। जैसे कई लोग हैं और कई अन्य लोग हमारे चैनल पर दिखाई देते हैं। खेल बिरादरी से हमारे पास लिएंडर पेस और बाईचुंग भूटिया हैं जो लोगों को प्रेरित करने के लिए नियमित रूप से ऑनएयर हो रहे हैं। हमारे पास रुजुता दीवेकर, मिकी मेहता और बाबा रामदेव जैसे फिटनेस विशेषज्ञ भी हैं। यानी हम दर्शकों को न्यूज कवरेज से हटकर भी कुछ अलग देने का प्रयास कर रहे हैं। इस लॉकडाउन को सफल बनाने के लिए हमें 99% नहीं, बल्कि 100% भारतीयों की सहभागिता की जरूरत है। सिर्फ हमारा चैनल ही नहीं हैं, तमाम अन्य चैनल इन्फॉर्मेशन और इन्फॉटेनमेंट को मिक्स करने की कोशिश कर रहे हैं। मुझे लगता है कि यह दौर हम सब के लिए व्युअरशिप के मामले में रिकॉर्ड होगा। 

इस समय इकनॉमी की रफ्तार काफी धीमी है, यह ब्रॉडकास्टर्स को किस तरह प्रभावित करती है?

सबसे पहली बात मैं कहना चाहूंगा कि न्यूज चैनल्स के पास ज्यादा पैसा रिजर्व में नहीं होता है। हम पब्लिक ब्रॉडकास्टर्स है और हमारे संसाधन बहुत जल्दी खत्म हो सकते हैं। दूसरी बात ये कि हम इस समय अपनी कवरेज को काफी बढ़ाने जा रहे हैं, ताकि इसे काफी विस्तार से दर्शकों तक पहुंचाया जा सके। इसके लिए ज्यादा इंफ्रास्ट्रक्चर, ज्यादा लोग और ज्यादा संसाधनों की जरूरत होती है। इस समय जब कोई पब्लिक ट्रांसपोर्ट नहीं है, हमें अपने स्टाफ के आने-जाने के लिए अलग से व्यवस्था करनी होगी। इससे खर्च बढ़ेंगे। हम अपने इन खर्चों में कटौती नहीं कर रहे हैं, क्योंकि हमें हर हालत में अपना काम करना है।  इसलिए मैं पूरी न्यूज ब्रॉडकास्टिंग इंडस्ट्री की ओर से एडवर्टाइजिंग जगत से अपील करता हूं कि वे हमारी मददे के लिए आगे आएं। कई न्यूज ब्रॉडकास्टर्स के पास ज्यादा धन नहीं हैं, इसलिए सुचारु रूप से चैनल्स चलाने और लोगों को बेहतर क्वालिटी की कवरेज देने के लिए हमें विज्ञापन जगत की मदद की जरूरत है। इस समय हमारी व्युअरशिप काफी बढ़ रही है। हम दिन में 19 से 20 घंटे का ऑरिजिनल कंटेंट तैयार कर रहे हैं और हमारे रिपोर्टर्स, प्रड्यूसर्स और पूरी टीम इसे आपातकालीन सेवा के रूप में लेते हुए उसी के अनुसार काम कर ही है।

आपको विज्ञापन जगत से किस तरह की मदद की जरूरत है?
पूरी न्यूज ब्रॉडकास्टर्स फेडरेशन की ओर से जिनमें कई छोटे मार्केट के प्लेयर्स हैं, कई विभिन्न भाषाओं के ब्रॉडकास्टर्स हैं और कई चैनल्स के पास सीधे स्टेकहोल्डर्स तक पहुंचने की सुविधा नहीं है, मैं चाहता हूं कि विज्ञापन जगत सपोर्ट के लिए आगे आए। आखिर, हमारे एडवर्टाइजर्स हमारे व्युअर्स हैं, जब मैंने ‘रिपब्लिक’ को लॉन्च किया था, लोगों ने मेरी काफी मदद की थी, क्योंकि वे भी हमारे व्युअर्स थे। उस समय मैंने लोगों से सपोर्ट करने के लिए कहा था। मैं एडवर्टाइजर्स के पास गया था और अपना चैनल लॉन्च करने में उनका सपोर्ट मांगा था, क्योंकि वे मेरे व्युअर्स हैं। आज मैं पूरी न्यूज इंडस्ट्री की ओर से उनसे मदद करने के लिए कह रहा हूं। मेरा मानना है कि यदि एडवर्टाइजिंग इंडस्ट्री आगे बढ़कर न्यूज इंडस्ट्री में पैसा लगाती है तो यह काफी अच्छा रहेगा। हम भविष्य में इस बात को याद रखेंगे। 

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क्या लॉकडाउन सही है? बरखा दत्त ने इंटरव्यू में जाना इसका जवाब

कोरोना के खौफ के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील पर लगाया गया जनता कर्फ्यू और अब लॉकडाउन क्या वायरस को कमजोर कर पाएगा? यह सवाल सबसे ज्यादा पूछा जा रहा है।

Last Modified:
Monday, 23 March, 2020
mojo

कोरोना के खौफ के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील पर लगाया गया जनता कर्फ्यू और अब लॉकडाउन क्या वायरस को कमजोर कर पाएगा? यह सवाल सबसे ज्यादा पूछा जा रहा है। कुछ लोग इस फैसले की आलोचना भी कर रहे हैं, उनकी नजर में कोरोना से लड़ाई का यह कारगर तरीका नहीं है, लेकिन सेंटर फॉर डिजीज डायनेमिक्स के निदेशक डॉ. रामानन लक्ष्मीनारायण इसकी हिमायत करते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार बरखा दत्ता को दिए इंटरव्यू में उन्होंने लॉकडाउन को बेहद जरुरी बताया है। बरखा ने अपने वेंचर ‘मोजो’ मीडिया के लिए हाल ही में डॉक्टर लक्ष्मीनारायण का इंटरव्यू लिया था। कोरोना वायरस को लेकर देश में चल रहे माहौल में यह इंटरव्यू कई बातों को स्पष्ट करता है। एक तरफ जहां ये संभावित खतरे को रेखांकित करता है, वहीं समाधान भी बताता है। बरखा ने डॉक्टर लक्ष्मीनारायण से कई ऐसे सवाल पूछे जिनका जवाब देश बेसब्री से जानना चाहता है। मसलन, पहला तो यही कि क्या कोरोना वायरस से लड़ाई के लिए हमारी तैयारी पर्याप्त है?

गौरतलब है कि इंडियन मेडिकल काउंसिल द्वारा कोरोना की टेस्टिंग से जुड़े प्रोटोकॉल में बदलाव किये गए हैं, जिसके तहत अब कोरोना की जांच निजी लैब में भी कराई जा सकती है। इस पर बरखा ने पूछा, ‘आप पहले से ही आगाह करते रहे हैं कि भारत में कोरोना के मामलों की सूनामी आ सकती है, तो क्या प्रोटोकॉल में बदलाव करना काफी है? डॉ. लक्ष्मीनारायण का जवाब था, ‘भारत में अब स्थिति पहले जैसी नहीं है, वायरस फैल रहा है। अब तक हम केवल उन्हीं लोगों की जांच करते आये हैं, जो या तो संक्रमित देशों से आये हैं या फिर जिनमें संक्रमण की पुष्टि हो गई है। लेकिन इस सब में हमने उन लोगों को छोड़ दिया, जो समुदाय में संक्रमण फैलाने के वाहक बने हुए हैं और ऐसा हो भी रहा है। हम यह नहीं कह सकते कि ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि हमने उन्हें टेस्ट ही नहीं किया। वायरस की प्रकृति ऐसी है कि यह तेजी से फैलता है। एक संक्रमित व्यक्ति कम से कम दो-तीन लोगों को पीड़ित बना सकता है। इसलिए इससे प्रभावितों का आंकड़ा लगातार बढ़ता जाता है। चीन, इटली, ईरान फ्रांस और अब यूके में हम यह देख रहे हैं।

बरखा दत्त ने यह भी जानने का प्रयास किया कि वायरस संक्रमित लोगों से जुड़े जो आधिकारिक आंकड़े बताये जा रहे हैं, क्या वे एकदम सटीक हैं। डॉ. लक्ष्मीनारायण ने इसके जवाब में कहा कि ‘मुझे नहीं लगता कि कोई भी यह मानेगा कि जो आंकड़े हमारे सामने हैं वह कदम सही हैं। भारत में अभी बहुत ही कम मामले सामने आए हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि लोगों के टेस्ट कम किए गए हैं। आने वाले सप्ताह में जब ज्यादा लोगों के टेस्ट किए जाएंगे तो कोरोना से संक्रमित लोगों की संख्या में इजाफा हो सकता है। भारत में कोरोना का ट्रांसमिशन बहुत आसान है क्योंकि इस देश की जनसंख्या काफी ज्यादा है’।

अमेरिका या ब्रिटेन में लागू गणितीय मॉडल भारत में लागू करने से जुड़े सवाल पर लक्ष्मीनारायण ने स्पष्ट किया कि भारत में किसी दूसरे देश का मॉडल लागू नहीं किया जा रहा है, बल्कि हम एक समान मापदंड अपना रहे हैं। जो मॉडल हम इस्तेमाल कर रहे हैं वह पूरी तरह से भारत को ध्यान में रखकर करीब 8 से 9 साल पहले बनाया गया था। इसलिए कृपया यह न समझें कि हम किसी दूसरे देश का मॉडल यहां अपना रहे हैं।

इंटरव्यू में कोरोना वायरस से हो रही मौतों पर भी बात हुई। बरखा ने पूछा, ‘मैं यह समझना चाहती हूं कि हर देश की अपनी जनसांख्यिकी होती है। इटली की बात करें तो वहां मृतकों का आंकड़ा इसलिए ज्यादा रहा क्योंकि वहां बुजुर्गों की संख्या अधिक है और वहां के लोग सामाजिक मेल-मिलाप में ज्यादा यकीन रखते हैं, लेकिन अमेरिका में ऐसा नहीं है। तो आप इसे भारत के परिप्रेक्ष्य में देखते हुए क्या आंकड़ा बताएंगे’?

जिस पर डॉक्टर लक्ष्मीनारायण ने जवाब में कहा, ‘हमारा मानना है कि जुलाई से पहले 300 से 500 मिलियन मामले सामने आ सकते हैं। भारत में हर व्यक्ति को COVID-19 हो सकता है ठीक वैसे ही जैसे लोगों को सामान्य बुखार होता है। लेकिन फिर भी ज़रूरत से ज्यादा घबराने की आवश्यकता नहीं है। कृपया इसे बुखार के रूप में देखें, लेकिन अधिक खतरनाक रूप में, जो खासकर बुजुर्गों के लिए जानलेवा साबित हो सकता है’।

लॉकडाउन के सवाल पर डॉ. लक्ष्मीनारायण ने कहा कि सबसे पहले आपको वायरस के बारे में समझना होगा। कोई व्यक्ति कोरोना से संक्रमित है या नहीं ये तुरंत पता नहीं चलता। इसमें कुछ वक़्त लगता है, इसलिए लॉकडाउन का आशय इस चेन को तोड़ना और वायरस की रफ़्तार को धीमा करना है। हम टेस्ट के मामले में पहले से ही पीछे चल रहे हैं। अगर हम ज्यादा लोगों का टेस्ट करते तो संभव है कि और अधिक मामले अब तक सामने आ चुके होते, लेकिन हमने ऐसा नहीं किया और मैं नहीं जानता कि क्यों। अगर हमें लॉकडाउन करना है, तो अभी समय है। हम दो से तीन सप्ताह का लॉकडाउन कर सकते हैं। मेरा मानना है कि यह बेहद जरूरी है। अमेरिका भी ऐसा कर रहा है, क्योंकि उसने यह जान लिया है कि अगर हम आज लॉकडाउन करते हैं, तो हम दो-तीन हफ़्तों में वायरस के फैलाव के रफ़्तार को काफी धीमा कर देंगे। लेकिन यदि हम इंतजार करते हैं, तो फिर बहुत देरी हो जाएगी’।

कोरोना संक्रमण के मामले सामने आने के बाद भारत ने अपनी सीमायें सील कर दी हैं। कई देशों से आने वालों को भारत में प्रवेश नहीं दिया जा रहा है। क्या इसका यह कदम सही है? इस पर डॉ. रामानन लक्ष्मीनारायण का मानना है कि अब इसका कोई फायदा नहीं है, क्योंकि संक्रमण पहले ही देश में प्रवेश कर चुका है। इस इंटरव्यू में यह भी सामने आया कि भारत वायरस के मामले में फेस-3 में प्रवेश कर गया है। हालांकि, सरकार की तरफ से ऐसा कोई बयान नहीं आया है, लेकिन लक्ष्मीनारायण का कहना है कि हम फेस-3 में आ गए हैं। लिहाजा अब जो भी करना है जल्दी करना होगा। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय बच्चे पोषण के मामले में चीनी बच्चों से कमजोर हैं, इसलिए उनमें संक्रमण का खतरा अधिक हो सकता है।

कोरोना के मुकाबले में अहम् कदम क्या होगा? इससे जुड़े सवाल के जवाब में डॉक्टर लक्ष्मीनारायण ने कहा कि व्यापक स्तर पर टेस्टिंग करनी होगी, ताकि यह साफ हो सके कि संक्रमितों का असल आंकड़ा कितना है। उन्होंने उम्मीद जताई कि प्राइवेट सेक्टर ज़िम्मेदार भूमिका निभाते हुए मुफ्त में टेस्ट करेगा या फिर इसके लिए बाजिब शुल्क ही वसूला जाएगा। अगर संक्रमित लोगों की संख्या तेजी से बढ़ती है, जैसी की आशंका जताई जा रही है, तो क्या हमारी स्वास्थ्य सेवाएं इतनी सक्षम हैं कि वो इतनी बड़ी तादाद में लोगों को बेहतर इलाज उपलब्ध करा पाएंगी? इस बारे में उन्होंने कहा ‘बड़ी तादाद में लोग बीमार होंगे, लेकिन हमें यह सुनिश्चित करना है कि उनकी मौत न हो। इसके लिए हमें बड़े पैमाने पर अस्थायी अस्पताल बनाने होंगे। स्टेडियम को कुछ वक़्त के लिए अस्पताल में तब्दील किया जा सकता है, अधिक से अधिक वेंटिलेटर तैयार रखने होंगे। बड़े शहरों के अस्पतालों में सभी व्यवस्थाएं करनी होंगी। मौजूदा समय में इन अस्पतालों के हाल अच्छे नहीं हैं’।  

पूरा इंटरव्यू आप यहां देख सकते हैं:

  

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सहारा के मनोज मनु ने त्रासदी के उस पल को किया याद, जब फंसी थी उनकी जान

मनोज मनु ‘सहारा’ के साथ काफी लंबे समय से जुड़े हुए हैं और सहारा न्यूज नेटवर्क में बतौर ग्रुप एडिटर इसे नई ऊंचाइयों की ओर ले जाने में जुटे हुए हैं। 

Last Modified:
Saturday, 14 March, 2020
manoj

किसी समय देश-दुनिया की खबरों के लिए मशहूर ‘सहारा न्यूज नेटवर्क’ अब अपनी पुरानी स्थिति में लौट रहा है। हालांकि, तमाम विवादों को लेकर इसकी राह में कई कठिनाइयां भी आईं, लेकिन इस नेटवर्क ने हार नहीं मानीं और मजबूती के साथ बुरे दौर के सामने डटा रहा। मनोज मनु ‘सहारा’ के साथ काफी लंबे समय से जुड़े हुए हैं और सहारा न्यूज नेटवर्क में बतौर ग्रुप एडिटर इसे नई ऊंचाइयों की ओर ले जाने में जुटे हुए हैं। 

समाचार4मीडिया के डिप्टी न्यूज एडिटर विकास सक्सेना और पंकज शर्मा से बातचीत के दौरान मनोज मनु ने अपने अब तक के सफर के बारे में बताया। साथ ही, नेटवर्क के सामने आने वाली चुनौतियों और इसे नए मुकाम तक ले जाने केे बारे में खुलकर बातचीत की।  

आप आज जिस मुकाम पर हैं, वहां तक पहुंचने के सफर के बारे में कुछ बताएं?

मैं ग्वालियर का रहने वाला हूं। मेरी पढ़ाई-लिखाई वहीं पर हुई। इसके बाद शुरुआत में मैंने हिंदी दैनिक ‘स्वदेश’ और फिर ‘दैनिक भास्कर’ में काम किया। इसके बाद मैं दिल्ली आ गया और वर्ष 2003 से ‘सहारा’ के साथ जुड़ा हुआ हूं। शुरुआत में मैं एक कार्टूनिस्ट था। लेकिन मुझे लगा कि सिर्फ कार्टूनिस्ट रहने से काम नहीं चलेगा, क्योंकि अखबार में एक ही कार्टूनिस्ट होता है, इसलिए मुझे यहां से बाहर निकलना ही पड़ेगा। इसके बाद मैंने वहीं रिपोर्टिंग शुरू कर दी और फिर यहां आ गया। वर्ष 2003 में मेरी ‘सहारा’ में जॉइनिंग हुई। उस समय मुझे दिल्ली में एमपी/छत्तीसगढ़ चैनल के लिए रिपोर्टिंग सौंपी गई। इसके बाद 2009/10 में मुझे इस चैनल का हेड बना दिया गया। बाद में एमपी/छत्तीसगढ़ के साथ ही राजस्थान की कमान भी मुझे सौंप दी गई। इसके बाद नेशनल चैनल की जिम्मेदारी भी मुझे दी गई। उस समय इस चैनल की टीआरपी 2.5 प्रतिशत थी, जिसे मैंने आठ प्रतिशत तक पहुंचा दिया और कई नेशनल चैनल्स को पीछे छोड़ दिया। इस बीच पुण्य प्रसून बाजपेयी ने चैनल में जिम्मेदारी संभाली और मुझे न्यूज एंकरिंग के लिए कहा। इसके बाद मैंने एंकरिंग शुरू कर दी। धीरे-धीरे समय गुजरता रहा और फिर मुझे यहां ग्रुप एडिटर बना दिया गया। अभी मैं ‘सहारा न्यूज नेटवर्क’ के ग्रुप एडिटर पद की जिम्मेदारी संभाल रहा हूं। इस नेटवर्क में छह चैनल हैं, जिनकी कमान मेरे हाथों में है।

जैसा कि आपने बताया कि करियर की शुरुआत में आप कार्टूनिस्ट बनना चाहते थे, तो फिर बतौर प्रोफेशन कार्टूनिस्ट बनने के बारे में क्यों नहीं सोचा? 

शुरुआत में जब मैं दिल्ली आया था तो कार्टूनिस्ट की नौकरी के लिए ही आया था और मशहूर कार्टूनिस्ट सुधीर तैलंग से मिला था। जब मैंने उन्हें अपना कार्टून दिखाया तो उन्होंने काफी तारीफ की और यहां तक कहा कि इस कार्टून को उन्होंने ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ के कार्टून कॉन्टेस्ट में सलेक्ट भी किया था। हालांकि, अखबार की ओर से इस बारे में मुझे सूचना नहीं मिल पाई थी। जब मैंने तैलंग जी को कार्टूनिस्ट बनने की अपनी इच्छा के बारे में बताया तो उन्होंने मुझसे कहा कि यदि तुम्हारी फैमिली में कोई बिजनेस होता है तो ठीक है। इसे साइड बिजनेस बनाना चाहते हो तो भी ठीक है, लेकिन यदि तुम कार्टूनिस्ट को बतौर करियर चुनते हो तो तुम्हें अपनी आजीविका चलाने के लिए दूसरे साधन भी तलाशने होंगे, क्योंकि एक अखबार में एक ही कार्टूनिस्ट होता है, ज्यादातर अखबारों में कार्टूनिस्ट पहले से हैं और वे कम से कम दस साल तो वहां काम करेंगे ही, ऐसे में आर्थिक तौर पर काफी मुश्किल होगी। मुझे उनकी बात समझ में आ गई। फिर मैं ग्वालियर लौटा और कार्टूनिंग के साथ-साथ रिपोर्टिंग भी शुरू कर दी। 

क्या आप अब भी कार्टून बनाते हैं?

नहीं, अभी मैं कार्टून नहीं बनाता हूं, क्योंकि समय ही नहीं मिल पाता है। हालांकि, कभी-कभार मौका मिलता है तो बना भी लेता हूं। अभी दिल्ली में शाहीन बाग का मुद्दा हुआ था तो मैंने एक कार्टून बनाया था, जो ‘राष्ट्रीय सहारा’ में पब्लिश भी हुआ था। वैसे- मेरे बनाए कार्टून समय-समय पर राष्ट्रीय सहारा में पब्लिश होते रहते हैं।

अब तक के सफर में कोई ऐसा पल अथवा घटना रही हो, जो आपको अभी तक याद हो, उसके बारे में कुछ बताएं?

उत्तराखंड त्रासदी से जुड़ी एक घटना मुझे अभी भी याद है। जब उत्तराखंड में त्रासदी हुई थी, उस दौरान मेरे एक राजनेता दोस्त बद्रीनाथ जा रहे थे। दरअसल, उनकी विधानसभा क्षेत्र के कुछ लोग वहां फंसे हुए थे, जिन्हें लेने वह जा रहे थे। मैं भी उनके हेलिकॉप्टर में गया था। मैंने उनसे कहा कि मुझे केदारनाथ उतार दें, लेकिन वहां का मौसम खराब होने के कारण उन्होंने मुझे बद्रीनाथ में ही उतार दिया और कहा कि अभी कुछ लोगों को छोड़कर आने के बाद अगले राउंड में आपको वापस ले चलेंगे। लेकिन वहां का मौसम इतना खराब हो गया कि हेलिकॉप्टर की आवाजाही बंद हो गई। मैं अपने साथ गर्म कपड़े लेकर नहीं गया था, क्योंकि मुझे लग रहा था कि मैं हेलिकॉप्टर से जाउंगा और उसी में वापस आ जाउंगा। अगर उस समय मैं केदारनाथ उतर गया होता तो आज आपके सामने नहीं होता, क्योंकि तीन दिन तक वहां फिर कोई नहीं जा पाया। मेरे पास कपड़े नहीं थे और हो सकता है कि ठंड के कारण मेरी जान भी चली जाती। बद्रीनाथ में जब मैं गया तो करीब दस हजार लोग वहां फंसे हुए थे। देश का एक भी मीडियाकर्मी वहां नहीं था। मैं वहां रहा दो दिन। दो दिन तो सेना ने भी बचाव कार्य में लगे अपने हवाई जहाज वहां ले जाने बंद कर दिए थे, क्योंकि मौसम काफी खराब था और वे वहां उतर ही नहीं पाते। हमने वहां रिपोर्टिंग की, चूंकि वहां लाइव्यू और ओवी वैन नहीं थी, इसलिए जब विमानों की आवाजाही शुरू हुई तो मैं उसमें बैठकर पास की एक जगह गया, जहां लाइव्यू  से इंजस्ट किया, वहां 10 हजार लोग फंसे हुए थे।

किसी जमाने में ‘सहारा समय’ यूपी का एक ब्रैंड बन चुका था। लोग यदि खबर देखते थे तो सहारा समय देखते थे, लेकिन अभी मार्केट में कई चैनल्स आ गए हैं। ऐसी स्थिति में आप अभी इस चैनल को कहां देखते हैं?

टाटा का नमक, बाटा का जूता और रीजनल चैनल्स में सहारा, ये ब्रैंड हैं। सहारा-सेबी विवाद के कारण आज हमारी कुछ परिस्थितियां हैं, जिस वजह से हम थोड़ा कमजोर हुए हैं, क्योंकि टेलिविजन में डिस्ट्रीब्यूशन का रोल काफी महत्वपूर्ण होता है। डिस्ट्रीब्यूशन के लिए करीब सौ करोड़ रुपए चाहिए होते हैं, लेकिन हमारी कंपनी का पैसा सहारा-सेबी विवाद में फंसा हुआ है। आपने देखा होगा कि कई सारे चैनल्स जरा सी परेशानी होते ही अथवा टीआरपी गिरते ही 100-150 लोगों की छंटनी कर देते हैं। हम इतने बुरे दौर से गुजरे हैं, जब एंप्लाईज को सैलरी देने के लिए भी पैसे नहीं थे, तो भी चैनल बंद नहीं हुआ। क्योंकि हम सहारा को परिवार कहते हैं और यहां के चेयरमैन और कर्मचारियों के बीच जो रिश्ता है, वह एक परिवार की तरह है, इसलिए हम उस स्थिति से उबर पाए और आज बेहतर स्थिति की ओर अग्रसर हैं। आज हम टाटा स्काई पर हैं, एयरटेल पर हैं और अपने-अपने स्टेट में बेहतर पोजीशन पर हैं। मध्य प्रदेश में हम तीसरे नंबर पर हैं। यूपी में भी अच्छी पोजीशन पर हैं। उर्दू का हमारा चैनल टॉप थ्री चैनल्स में आता है। कहने का मतलब है कि चीजें पहले से बेहतर हुई हैं। हालांकि, अभी भी फंड का संकट बना हुआ है, क्योंकि केस अभी सॉल्व नहीं हुआ है। इसके बावजूद कंपनी के चेयरमैन अपने एंप्लाईज की बेहतरी के लिए हरसंभव काम कर रहे हैं। मुझे लगता है कि बहुत जल्द ये सारी चीजें भी ठीक हो जाएंगी। डिस्ट्रीब्यूशन बेहतर होने के बाद चैनल और मजबूत स्थिति में आ जाएगा। 

आप अभी अपने कॉम्पटीटर के रूप में किसे देखते हैं?

देखिए, नेशनल चैनल में काफी कुछ ऐसी स्थिति हुई कि हम उसमें प्रोफेशनली तौर पर उस तरह से बिहेव नहीं कर पाए, जिस तरह से मार्केट में करना पड़ता है। लेकिन, रीजनल में हम अब भी ब्रैंड हैं। रीजनल में हमारी अभी भी पकड़ बनी हुई है। आप कहीं भी जाएंगे तो वहां आप देखेंगे कि अभी भी कई ऐसे चैनल हैं जो खुल तो गए हैं, शुरू तो हुए हैं, लेकिन उनके माइक-आईडी को देखकर लोग कहते हैं कि ‘सहारा’ आ गया। 

पहले यह चैनल सहारा समय था, लेकिन अब समय से सहारा कैसे अलग हो गया?

हमारे बीच में मैनेजमेंट स्तर पर कुछ बदलाव हुए थे। नए मैनेजमेंट के फैसले के बाद इसे 'समय' किया गया था, लेकिन हमारा मानना था कि हमारी पहचान सहारा से ही है और शुरू भी यह सहारा समय के नाम से ही हुआ था। इसके बाद वापस इसे सहारा समय किया गया।  

आपका प्रोग्राम ‘एडिटर्स चॉइस’ दूसरे प्रोग्राम से कैसे बेहतर है?

इस प्रोग्राम में लड़ाई-झगड़ा नहीं होता है। लोगों को अब लड़ाई-झगड़े से चिढ़ हो गई है। टेलिविजन में चर्चा होनी चाहिए, बहस नहीं। क्योंकि जब चर्चा होगी तो वो निष्कर्ष तक पहुंचेगी और बहस कभी भी निष्कर्ष तक नहीं पहुंचती। बहस होती है तो लोग एक दूसरे पर चिल्लाते हैं, अपने विचार एक दूसरे पर थोपते हैं, लेकिन निष्कर्ष निकालने की कोशिश नहीं करते और निष्कर्ष तभी निकलती है जब चर्चा होती है। इसलिए हमारे इस प्रोग्राम में बहस नहीं चर्चा होती है। अगर कोई बड़ी राजनीतिक घटना नहीं हुई हो, तो हम इस प्रोग्राम में पार्टी प्रवक्ताओं से दूरी बनाकर रखते हैं और उन लोगों को शामिल करते हैं जो उस विषय के जानकार हों, जिस विषय को लेकर चर्चा हो रही हो। इसके साथ ही वरिष्ठ पत्रकारों को भी शामिल किया जाता है, ताकि पूरी चर्चा को अंजाम तक ले जाया जा सके।

इसके अतिरिक्त हिंदू-मुस्लिम से जुड़े मुद्दों, किसी समुदाय विशेष मुद्दों के बजाय हमारा फोकस इस बात पर ज्यादा रहता है कि हम ज्यादातर समसमायिक मुद्दों को ही अपनी चर्चा में शामिल करें। वहीं अगर ऐसे मुद्दे दिखाने ही पड़े तो हमारा ध्यान इस बात पर रहता है कि हम उन पहलुओं को अपनी चर्चा में शामिल करें, जिसे आज का मीडिया नहीं दिखाता है।    

राष्ट्रीय सहारा में शनिवार को प्रकाशित होने वाले ‘हस्तक्षेप’ ने अब टीवी की दुनिया में भी अपनी मौजूदगी दर्ज करायी है, इस बारे में कुछ बताएं?

‘हस्तक्षेप’ प्रोग्राम हमारे सीईओ व एडिटर-इन-चीफ उपेंद्र राय ने शुरू किया है। दरअसल, एक बार हम सभी बैठे थे और उसी समय चर्चा चली कि ‘हस्तक्षेप’ हमारे अखबार राष्ट्रीय सहारा का एक ब्रैंड रहा है। देश के बड़े-बड़े दिग्गज उसमें लिख चुके हैं। क्यों न आज के दौर में जब सारी चीजें डिजिटलाइज हो रही हैं, सारी चीजें टीवी में कन्वर्ट हो रही हैं, तो फिर हस्तक्षेप को भी कन्वर्ट किया जाए। लिहाजा चर्चा के दौरान ये तय हुआ कि ‘हस्तक्षेप’ नाम से ही इस प्रोग्राम की शुरुआत की जाए। फिलहाल अब यह कार्यक्रम हाल ही में शुरू हो चुका है, जिसका बड़ा अच्छा रिस्पॉन्स मिल रहा है। खास बात ये है कि उपेंद्र राय ने इस प्रोग्राम से ही पहली बार एंकरिंग की दुनिया में कदम रखा है। वैसे तो वे ‘स्टार न्यूज’, ‘सीएनबीसी आवाज’ में भी अपना योगदान दे चुके हैं, देश के जाने-माने रिपोर्टर भी रहे हैं। उन्होंने कई बड़ी-बड़ी स्टोरीज भी ब्रेक की हैं, लेकिन एंकरिंग उन्होंने पहले कभी नहीं की। ‘हस्तक्षेप’ के जरिए ही उन्होंने पहली बार एंकरिंग शुरू की है और खास बात ये है कि लोग उन्हें पसंद भी कर रहे हैं।  

क्या टीवी और प्रिंट के लिए आप डिजिटल मीडिया को एक बड़ी चुनौती के तौर पर देखते हैं?

हां थोड़ा बहुत, क्योंकि कारण यह है कि आप मोबाइल को अपने हाथ में रखते हैं, पर टीवी को तो आप अपने साथ लेकर नहीं घूम सकते हैं। मैंने देखा है कि ज्यादातर लोग मोबाइल पर ही न्यूज देखना पसंद करते हैं। हालांकि इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता कि एक बड़ी आबादी टीवी को देखती है। लेकिन जो प्रोफेशनल्स हैं, वे न्यूज देखने के लिए मोबाइल का ही ज्यादा इस्तेमाल करते हैं। वैसे बहुत सी ऐसी काम की खबरें होती हैं, जो टीवी पर नहीं दिखाई देती हैं। इसलिए वे इस तरह के कंटेंट को मोबाइल पर ही देख लेते हैं।     

डिजिटल से अभी सहारा समय बहुत दूर है, क्या भविष्य में इसे लेकर कोई रणनीति बनायी गई है, जिससे इस पर भी मजबूती दर्ज करायी जा सके?   

ये सही है कि सहारा समय डिजिटल से अभी बहुत दूर है, ऐसा इसलिए क्योंकि कभी हमने इस ओर ध्यान नहीं दिया। पिछले मैनेजमेंट ने भी इस पर ज्यादा काम नहीं किया। फिलहाल, डिजिटल को लेकर हमारी एक टीम है, जो इस पर काम कर रही है। मैनेजमेंट का फोकस भी अब इस पर है, लिहाजा इसे लेकर कुछ भर्तियां भी की गईं हैं। बहुत ही जल्द डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सहारा समय अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराएगा। फिलहाल अभी सहारा समय के फेसबुक पेज पर 5 लाख से ज्यादा फॉलोअर्स सक्रिय हैं।

रीजनल मीडिया में स्ट्रिंगर्स का रोल काफी अहम होता है, लेकिन पेशेवर पत्रकार के तौर पर न उन्हें मान्यता मिलती है और न ही उन्हें मूलभूत सुविधाएं, इस बारे में आप क्या कहेंगे?

देखिए, कोई भी रीजनल चैनल है, वो विशेषकर स्ट्रिंगर्स की दम पर ही चलता है और इसलिए स्ट्रिंगर्स को रखा जाता है। वैसे देखा जाए तो ये उनके लिए पार्ट टाइम जॉब है, क्योंकि ये जरूरी नहीं हो पाता है कि हर दिन उनके जिले की खबर चलाई ही जाए। इसलिए देखा गया है कि जिस तरह से नेशनल चैनल ब्यूरो में अपने लोग रखता है, वैसे ही रीजनल चैनल जिले में अपने स्ट्रिंगर्स को रखता है। हां, ये बात सही है कि उन्हें मूलभूत सुविधाएं तो मिलनी ही चाहिए, क्योंकि उनका पेमेंट खबरों के आधार पर होता है। जिस तरह से अखबारों के लिए मजीठिया को लागू किया गया है, ऐसे ही मेरा मानना है कि टीवी के लिए भी मजीठिया लागू होनी चाहिए और बहुत ही जल्द लागू भी होगी, क्योंकि सरकार शायद इस पर काम भी कर रही है।          

पत्रकारिता में आने वाली पीढ़ी को आप किस तरह से देखते हैं और क्या आप उन्हें कोई संदेश देना चाहेंगे?

थोड़ा सा ज्ञान का अभाव है। उन्हें पता ही नहीं वे कर क्या रहे हैं और करना क्या चाहते हैं। बहुत सारी भर्तियां हमने की है, जिसमें एंकर्स, रिपोर्ट्स और इंटर्न्स आदि शामिल हैं। इंटरव्यू के दौरान कई ऐसे लोग देखने को मिले हैं कि जिन्हें अपने राज्य की ही जानकारी नहीं है। यहां तक कि वे अपने राज्य के राज्यपाल और मुख्यमंत्री का नाम भी नहीं जानते हैं। उपराष्ट्रपति कौन है, उन्हें नहीं पता होता है। खबर क्या है, खबर का तथ्य क्या है, खबर कैसे लिखी जाती है, उन्हें नहीं पता होता है। पढ़ाई तो कर लेते हैं, पर कहीं न कहीं ज्ञान की कमी रहती है। हम लोग व्यवहारिक पत्रकारिता कर आगे बढ़े हैं। यानी पढ़ाई तो बाद में की, लेकिन पत्रकारिता पहले ही शुरू कर दी। लेकिन मुझे लगता है कि अब जो नई पौध आ रही है, उन्होंने किताबें तो पढ़ ली हैं, लेकिन व्यवहारिक पत्रकारिता का ज्ञान नहीं है। और ऐसा नहीं कि सभी ऐसे हैं, कुछ ऐसे बच्चे भी हैं, जो बहुत अच्छे हैं और बहुत कम समय में बहुत आगे निकल गए हैं।

दूसरी बात यहां कहना चाहूंगा कि हर किसी को एंकर या रिपोर्टर बनना है। वे ये जानते ही नहीं है कि एंकर और रिपोर्टर जिन लोगों के भरोसे रहते हैं वह उन्हीं लोगों से ही जाना जाता है। इसलिए उन्हें ये जान लेना चाहिए कि एंकर और रिपोर्टर के अलावा भी बहुत से लोग हैं इस मीडिया इंडस्ट्री में।  

इतनी बड़ी जिम्मेदारी के बीच आप परिवार के लिए कैसे समय निकाल पाते हैं और वीकेंड पर क्या कुछ खास प्लान करते हैं?

परिवार को मैं पूरा समय देता हूं, क्योंकि मैं ऑफिस खत्म करने के बाद इधर-उधर नहीं भागता हूं। मैं अपने शरीर पर भी ध्यान देता हूं। अपने दोस्तों को भी समय देता हूं, क्योंकि बहुत ज्यादा मेरे दोस्त नहीं है। वीकेंड पर मैं बच्चों के साथ प्लास्टिक की बॉल से क्रिकेट खेलना पसंद करता हूं।  

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सुधीर चौधरी ने बताया, लोगों का न्यूज चैनल्स से भरोसा क्यों हो रहा है कम

टीवी चैनल्स की टीआरपी और ज्यादा से ज्यादा राजस्व जुटाने के ‘खेल’ में न्यूज का प्रसार और उसके इस्तेमाल के तरीकों में काफी बदलाव देखा गया है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 20 February, 2020
Last Modified:
Thursday, 20 February, 2020
Sudhir Chaudhary

टीवी चैनल्स की टीआरपी और ज्यादा से ज्यादा राजस्व जुटाने के ‘खेल’ में न्यूज का प्रसार और उसके इस्तेमाल के तरीकों में काफी बदलाव देखा गया है। डिजिटाइजेशन ने इंडस्ट्री को एक नई रफ्तार दी है। इससे टेक्नोलॉजी में विकास के साथ न्यूज इस्तेमाल करने के नए रास्ते भी खुले हैं। टेलिविजन पत्रकारिता कई बदलावों से गुजरी है और अब दर्शकों की राय को एक आकार देने में भी सहायक बनी है। हमारी सहयोगी वेबसाइट एक्सचेंज4मीडिया (exchange4media) ने खबरें प्राप्त करने के पैटर्न में आए बदलावों, खबरों के डिजिटलीकरण आदि तमाम मुद्दों पर ‘जी न्यूज’ (Zee News) के एडिटर-इन-चीफ सुधीर चौधरी से विस्तार से बातचीत की। पेश हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:  

वर्ष 2019 में न्यूजरूम्स में किस तरह की बड़े बदलाव देखने को मिले हैं? कोई ऐसा व्यवधान आया हो, जिसके बारे में आप बताना चाहें?

2019 बहुत ही रोमांचक साल रहा। जहां तक खबरों की बात करें तो कई ऐसी खबरें रहीं, जो हफ्तों तक ही नहीं बल्कि महीनों तक चर्चा में बनी रहीं। बालाकोट, आम चुनाव, कश्मीर में अनुच्छेद 370 को हटाया जाना जैसी कई अन्य खबरें रहीं, जिसकी वजह से 2019 न केवल रोमांचक साल रहा, बल्कि यह खबरों से भरा हुआ रहा।

न्यूज रूम में सबसे बड़ी चुनौती थी कि फेक न्यूज का मुकाबला कैसे किया जाए। अब कौन सी खबर या खबर को किस तरह से पेश किया जाए यही सबसे बड़ी चुनौती नहीं रह गई है, बल्कि खबरों को सत्यापित करना भी एक बड़ी चुनौती है। इसलिए, एक बड़ा अंतर यह है कि अब हमारे पास खबरों के कई स्रोत हैं। खबरें अब हर जगह से आ रही हैं और हमारे पास बहुत अधिक असत्यापित स्रोत और असत्यापित खबरें हैं। इसलिए अब कम्पटीशन और ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो गया है। अब कई लोग हर तरह की खबरों को तोड़-मरोड़कर पेश करना चाहते हैं, फिर चाहे वह सत्यापित हों या न हो। हर खबर को फिल्टर करना अब बहुत मुश्किल हो रहा है, क्योंकि खबरें बहुत ही ज्यादा हैं। न्यूज के डिजिटाइजेशन के कारण भी चीजें काफी बदली हैं। अब न्यूज के लिए लोगों के पास तमाम विकल्प हैं। टेक्नोलॉजी का बेहतर और व्यापक इस्तेमाल करना भी काफी महत्वपूर्ण है। रोजाना नई-नई टेक्नोलॉजी आ रही हैं, इससे न्यूज इस्तेमाल करने के तरीके भी बदल रहे हैं।   

ऐसे समय में जब डिजिटल मीडिया में भारी वृद्धि देखी जा रही है, क्या आपको लगता है कि यह टीवी न्यूज चैनल्स के लिए खतरा है?

मेरा मानना है कि डिजिटल मीडिया से टीवी न्यूज चैनल्स को कोई खतरा नहीं है। न्यूज प्रसार के सभी रूप बने रहेंगे और इससे लोगों के पास तमाम विकल्प होंगे। न्यूज के इस्तेमाल को और आसान बनाने में डिजिटल भी एक अन्य माध्यम बन गया है।  

खबरों के लिहाज से वर्ष 2019 काफी अच्छा साल रहा और उस दौरान कई मौकों पर न्यूज की व्युअरशिप जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स (GEC) से ज्यादा निकल गई। आपके लिए पिछले साल ऐसी तीन कौन सी बड़ी घटनाएं रहीं, जिन्हें आपने नेटवर्क पर चलाया?

पिछले साल ‘जी न्यूज’ ने तमाम महत्वपूर्ण खबरें चलाईं, लेकिन मेरी नजर में कठुवा बलात्कार कांड की इन्वेस्टीगेटिव न्यूज काफी बड़ी खबर थी, जिसे ‘जी’ ने पिछले साल कवर किया था। इस मामले में हमने एक युवा को झूठा फंसने से बचाया था। इसके अलावा जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाने और सीएए-एनआरसी को लेकर की गई कवरेज भी हमारी बड़ी न्यूज कवरेज में शामिल रही।   

टीवी पत्रकारिता में मोजो (MoJo) और तमाम नई-नई टेक्नोलॉजी शुरू की जा रही हैं। ऐसे में आपने अपने न्यूजरूम्स में किस तरह की टेक्नोलॉजी को शामिल किया है?

‘जी’ में हमने न्यूजरूम के वर्कफ्लो को बदलने के लिए ‘Integrated Multimedia Newsroom’ (IMN) जैसी पहल शुरू की है। दरअसल, यह एक कॉमन किचन की तरह काम करता है, जहां पर हम हर तरह का कंटेंट तैयार कर रहे हैं, जो टीवी, डिजिटल, सोशल मीडिया, लॉन्ग फॉर्मेट, शॉर्ट फॉर्मेट, रेडियो, प्रिंट सबके लिए है। एक ही टीम व्युअर्स के अनुसार, डिजिटल से लेकर प्रिंट और टीवी समेत अन्य प्लेटफॉर्म के लिए कंटेंट तैयार कर रही है। दूसरी बात ये है कि हमने अपने इंटरनेशनल चैनल ‘विऑन’ (WION) के द्वारा देश से बाहर भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। इसके द्वारा हम दुनिया के लगभग हर हिस्से से जुड़े हुए हैं। इसलिए, आजकल न्यूज ज्यादा से ज्यादा टेक्नोलॉजी पर आधारित होती जा रही है। लगभग सभी मोजो किट्स का इस्तेमाल कर रहे हैं और हम भी कर रहे हैं। पहले के बड़े-बड़े और भारी उपकरणों की तुलना में अब हल्के और आसानी से कहीं भी ले जाने वाले उपकरण आ गए हैं, जिससे काम काफी आसान और तेज हो गया है।

आपकी नजर में वर्ष 2019 की तुलना में यह साल न्यूज के हिसाब से कैसा रहेगा। क्या आपको लगता है कि इस साल टीवी पत्रकारिता में कुछ बड़ा हो सकता है?

जी हां, मेरा मानना है कि पिछली साल की तुलना में खबरों के लिहाज से यह साल ज्यादा बड़ा और रोमांचक होगा। पहले के मुकाबले न्यूज और ज्यादा महत्वपूर्ण होने जा रही हैं। अब लोग सिर्फ न्यूज और ब्रेकिंग न्यूज देखना नहीं चाहते, बल्कि उन्हें इसमें ओपिनियन भी चाहते हैं। मेरा मानना है कि आने वाले समय में ज्यादा से ज्यादा लोग न्यूज चैनल्स को देखेंगे। न्यूज की संख्या भी पहले के मुकाबले दिनोंदिन बढ़ रही है और बड़ी खबरें आ रही हैं। इसलिए मेरा मानना है कि पिछली साल की तुलना में यह साल न्यूज के हिसाब से काफी महत्वपूर्ण रहने वाला है और कई बड़ी न्यूज मिलेंगी।  

मुझे यह भी लगता है कि जैसे-जैसे हम समय के साथ आगे बढ़ रहे हैं, खबरों की विश्वसनीयता घट रही है। लोगों का न्यूज चैनल्स पर भरोसा कम हो रहा है। मेरी नजर में ऐसा होने के दो मुख्य कारण हैं। पहला ये कि तमाम चैनल्स द्वारा टीआरपी की दौड़ में आगे बढ़ने के चक्कर में न्यूज की क्रेडिबिलिटी कम हो रही है और दूसरा यह कि आज के दौर में कई चैनल्स एजेंडा पर आधारित पत्रकारिता कर रहे हैं। स्वस्थ पत्रकारिता करने और लोकतंत्र में समाज को चौथे स्तंभ के रूप में अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए न्यूज चैनल्स को इन दो चुनौतियों से मुकाबला करना होगा।

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कार्तिकेय शर्मा ने बताया, मीडिया के लिए क्यों बेहतर रहेगा यह साल

'ट्राई’ के नए टैरिफ ऑर्डर (NTO 2.0) को लेकर काफी आशावादी ‘आईटीवी नेटवर्क’ के फाउंडर और प्रमोटर कार्तिकेय शर्मा को अंग्रेजी डिजिटल कंटेंट पर काफी भरोसा है

Last Modified:
Friday, 31 January, 2020
Kartikeya Sharma

‘आईटीवी नेटवर्क’ (iTV Network) के फाउंडर और प्रमोटर कार्तिकेय शर्मा का मानना है कि वर्ष 2019 की तरह मीडिया को इस साल भी तमाम बड़ी घटनाएं कवर करने को मिलेंगी। साल के शुरु में ही ‘नागरिकता संशोधन कानून’ (सीएए) को लेकर चल रहे विरोध-प्रदर्शनों से इसकी शुरुआत भी हो चुकी है। इसके साथ ही दिल्ली विधानसभा चुनाव को लेकर भी न्यूज रूम इन दिनों काफी व्यस्त हो गए हैं।

रीजनल चैनल्स पर भी अपनी मजबूत स्थिति के साथ नेटवर्क ने कम समय में ही अच्छी-खासी व्युअरशिप हासिल कर ली है। ‘ट्राई’ के नए टैरिफ ऑर्डर (NTO 2.0) को लेकर काफी आशावादी कार्तिकेय शर्मा को अंग्रेजी डिजिटल कंटेंट पर काफी भरोसा है। हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ एक बातचीत में कार्तिकेय शर्मा ने न्यूज रूम में तकनीकी व्यवधानों से लेकर, टीवी पत्रकारिता और वर्ष 2020 के बारे में अपने विचार रखे। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:    

वर्ष 2019 में न्यूजरूम्स में किस तरह की बड़े बदलाव देखने को मिले हैं? कोई ऐसा व्यवधान आया हो, जिसके बारे में आप बताना चाहें?

न्यूज में बदलाव होना एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। मेरे अनुसार, सोशल मीडिया ने न्यूज रूम को काफी प्रभावित किया है। सोशल मीडिया ने न्यूज रूम की गतिविधियों को बदलकर रख दिया है, इसलिए इस बारे में बात होना लाजिमी है। सोशल मीडिया के विकास के साथ इसे लेकर चिंताएं भी बढ़ रही हैं। यही कारण है कि ट्रेडिशनल मीडिया इतना महत्वपूर्ण है। मेरी नजर में न्यूज इंडस्ट्री के लिए यह साल काफी अच्छा रहेगा। रही बात नए टैरिफ ऑर्डर (NTO 2.0) की तो इससे न्यूज चैनल्स को कम मूल्यों पर न्यूज और कंटेंट उपलब्ध कराने में बड़ी सहूलियत होगी। इसके साथ ही आने वाले समय में डिजिटल कंटेंट और ताकतवर हो जाएगा।

ऐसे समय में जब डिजिटल मीडिया में भारी वृद्धि देखी जा रही है, क्या आपको लगता है कि यह टीवी न्यूज चैनल्स के लिए खतरा है?

सच कहूं तो मुझे नहीं लगता कि टीवी न्यूज चैनल्स के लिए डिजिटल किसी तरह का खतरा है। यह तो एंप्लीफायर है। यह न्यूज के विभिन्न पहलुओं को और स्पष्ट करता है। न्यूज के विभिन्न जॉनर्स (genres) अपने-अपने टार्गेट ऑडियंस के हिसाब से डिजिटल मीडिया का इस्तेमाल कर रहे हैं। अन्य भाषाओं की तुलना में अंग्रेजी के डिजिटल कंटेंट की ज्यादा खपत है और अंग्रेजी न्यूज चैनल्स के लिए यह जानने का सबसे अच्छा तरीका डिजिटल कंटेंट है कि किस प्रकार का कंटेंट काम कर रहा है। मेरा मानना है कि डिजिटल इस सफर का हिस्सा तो हो सकता है लेकिन टेलिविजन जर्नलिज्म को रिप्लेस नहीं कर सकता यानी उसकी जगह नहीं ले सकता है।     

खबरों के लिहाज से वर्ष 2019 काफी अच्छा साल रहा और उस दौरान कई मौकों पर न्यूज की व्युअरशिप जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स (GEC) से ज्यादा निकल गई। आपके लिए पिछले साल ऐसी तीन कौन सी बड़ी घटनाएं रहीं, जिन्हें आपने नेटवर्क पर चलाया?

पिछला साल खबरों के लिहाज से काफी अच्छा था। इस दौरान तमाम बड़ी घटनाएं हुईं। चूंकि वर्ष 2019 में चुनाव भी था, इसलिए हमने अपने सभी प्लेटफॉर्म्स चाहे वो हिंदी हो, अंग्रेजी हो अथवा रीजनल, चुनाव को लेकर काफी व्यापक कवरेज की। हमारे यूट्यूब प्रोग्राम ‘तीखी मिर्ची’ (Tikhi Mirchi) को 35 मिलियन व्यूज मिले और ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ (Art of Living) के साथ मिलकर शुरू की गई हमारी पहल ‘सेव वाटर’ (Save Water) अन्य सभी न्यूज चैनल्स में सबसे बड़ी पहल है।  

टीवी पत्रकारिता में मोजो (MoJo) और तमाम नई-नई टेक्नोलॉजी शुरू की जा रही हैं। ऐसे में आपने अपने न्यूजरूम्स में किस तरह की टेक्नोलॉजी को शामिल किया है?

मेरा मानना है कि न्यूज इंडस्ट्री कोई पहली बार टेक्नोलॉजी को नहीं अपना रही है। टेक्नोलॉजी की भूमिका काफी महत्वपूर्ण होती है और इसने काम को काफी आसान और सुविधाजनक बना दिया है, लेकिन यही टेक्नोलॉजी ट्रेडिशनल मीडिया के लिए वास्तविक खतरा भी है।

आपकी नजर में वर्ष 2019 की तुलना में न्यूज के लिहाज से वर्ष 2020 कैसा रहेगा, इस बारे में थोड़ा बताएं। क्या आपको लगता है कि इस साल टीवी पत्रकारिता में कुछ बड़ा व्यवधान आ सकता है?

मुझे लगता है कि न्यूज के लिहाज से वर्ष 2019 की तुलना में इस साल ज्यादा घटनाएं होंगी। इस साल दिल्ली विधानसभा चुनाव के साथ ही अन्य राज्यों में चुनाव भी पाइप लाइन में हैं। ऐसे में न्यूज चैनल्स के लिए काफी कंटेंट होगा। पॉलिटिक्स, क्रिकेट और एंटरटेनमेंट के क्षेत्र से काफी बड़ी खबरें निकलेंगी।

आप अपनी राय, सुझाव और खबरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। (हमें फेसबुक,ट्विटर, लिंक्डइन और यूट्यूब पर फॉलो करें)

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इस साल कैसे नई ऊंचाइयां छुएगा ABP न्यूज नेटवर्क, CEO ने बताई स्ट्रैटेजी

एक्सचेंज4मीडिया के साथ बातचीत में अविनाश पांडे ने कहा- इस साल ब्रॉडकास्ट इंडस्ट्री की ग्रोथ में रीजनल और डिजिटल अहम भूमिका निभाएंगे

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 09 January, 2020
Last Modified:
Thursday, 09 January, 2020
Avinash

दर्शकों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी और नए साल पर मजबूत रोडमैप के साथ ‘एबीपी न्यूज नेटवर्क’ ने वर्ष 2020 में नई ऊंचाइयां छूने की पूरी तैयारी कर ली है। इस बारे में ‘एबीपी न्यूज नेटवर्क’ (ANN) के सीईओ अविनाश पांडे का कहना है कि आने वाला समय डिजिटल और रीजनल का होगा और वर्ष 2020 में यह दोनों ब्रॉडकास्ट इंडस्ट्री की ग्रोथ में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। ग्रुप का फोकस भी इन्हीं पर है।

हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ एक बातचीत के दौरान अविनाश पांडे ने इस साल ब्रॉडकास्टिंग सेक्टर में पिछले साल के साथ ही इस साल होने वाले संभावित प्रमुख बदलावों के बारे में विस्तार से बताया। डिजिटल माध्यम में नेटवर्क की ग्रोथ से उत्साहित अविनाश पांडे ने इस माध्यम की पहुंच के साथ ही इस बात पर भी चर्चा की कि इस साल सबसे बड़े ट्रेंडसैटर्स में किसकी अहम भूमिका होगी। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

चाहे नए टैरिफ ऑर्डर की बात हो, लैंडिंग पेज को लेकर ट्राई के रेगुलेशंस का मुद्दा हो अथवा बार्क की नई लीडरशिप की बात ही क्यों न हो, पिछला साल ब्रॉडकास्टर्स के लिए कई घटनाओं का गवाह रहा है। ऐसे में आपकी नजर में इंडस्ट्री में क्या अहम बदलाव हुए हैं?    

देश में टेलिविजन के लिए पिछले साल लागू हुआ न्यू टैरिफ ऑर्डर सबसे बड़े बदलावों में से एक रहा है। ‘ट्राई’ (TRAI) और उसके नियमों ने ‘डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्म ऑपरेटर्स’ (DPO) और ब्रॉडकास्टर्स के बीच काम करने के तरीके को परिभाषित करने के साथ ही कॉल नेटवर्क कैपेसिटी फीस और फ्री टू एयर चैनल्स की संख्या को लेकर 2019 में ब्रॉडकास्टिंग का परिदृश्य पूरी तरह से बदल दिया है। हालांकि शुरुआती स्तर पर कुछ कंज्यूमर्स को कुछ असुविधा हुई, लेकिन इससे सभी को फायदा होता भी देखा गया। ट्राई द्वारा कैरिज फीस तय करने और क्षेत्रों को परिभाषित करने से ब्रॉडकास्टर्स और डीपीओ के बीच पारदर्शिता बनी है। लैंडिंग पेज को लेकर जो चिंता थी, उसे बार्क और इंडस्ट्री से जुड़ी इकाइयों ने सुलझा लिया।

कई ब्रॉडकास्टर्स का कहना है कि न्यूज चैनल्स को फ्री टू एयर नहीं होना चाहिए, इस बारे में आपका क्या मानना है?

यदि मैं अपनी बात करूं तो मैं ब्रॉडकास्टिंग की तरफ से किसी फ्री टू एयर चैनल के पक्ष में नहीं हूं, क्योंकि केबल चैनल्स के लिए कंज्यूमर 130 रुपए और टैक्स का भुगतान तो कर ही रहा है। ऐसे में कंज्यूमर के लिए तो कुछ भी फ्री नहीं है। यह तो ‘डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्म ऑपरेटर्स’ के लिए है कि चैनल फ्री हो जाता है  और जो फ्री टू एयर चैनल के लिए भी कैरिज फीस ले रहे हैं। ऐसे में यह पूरा सिस्टम ‘डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्म ऑपरेटर्स’ के लिए एकतरफा रूप से फायदेमंद होता है। इसलिए, भुगतान करना न्यूज इंडस्ट्री के हित में है। हालांकि, अभी इंडस्ट्री में काम करने का जो तरीका है, उसमें किसी एक चैनल अथवा छोटे नेटवर्क के लिए भुगतान करना काफी मुश्किल अथवा लगभग असंभव ही है। इसलिए न्यूज इंडस्टी को आपस में मिलकर इस तरह के रास्ते तलाशने चाहिए, जिससे कंज्यूमर को डिलीवर किए जाने वाले कंटेंट के लिए उचित फीस ली जा सके।

पिछले कुछ महीनों में ‘एबीपी’ के रेटिंग में काफी सुधार देखने को मिला है। व्युअरशिप में हुई इस ग्रोथ का श्रेय आप किसे देते हैं? क्या बार्क की लीडरशिप में बदलाव की मांग ब्रॉडकास्टर्स की ओर से की गई थी? इससे कितनी मदद मिली?

एबीपी न्यूज नेटवर्क की बात करें तो हम ज्यादा नाटकीयता में भरोसा नहीं रखते हैं। हम हमेशा रोचक अंदाज में आपको सच्चाई बताएंगे। हम कभी भी किसी का पक्ष नहीं लेंगे। फिर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह कौन है और क्या है। किसी भी मामले में हम हमेशा सिर्फ तथ्यों की बात करेंगे। पिछला साल खबरों से भरपूर रहा, जिसकी शुरुआत लोकसभा चुनाव के साथ ही हो गई थी। निष्पक्ष कवरेज और अवॉर्ड विजेता रिपोर्टर्स के कारण हमारे नेटवर्क को इसका काफी फायदा मिला। यही नहीं, खबर जुटाने के काम में हमारी डिजिटल टीम भी पूरी तरह से जुटी हुई है, इसका परिणाम ही रहा कि पूरे नेटवर्क की व्युअरशिप में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई। बार्क के नेतृत्व में हुए परिवर्तन से इसका कोई लेना-देना नहीं है। एक्सक्लूसिव कंटेंट से व्युअरशिप आती है। बदलते ट्रेंड्स और व्युअर्स की पसंद का अनुमान लगाने में दूरदर्शिता और सक्रियता दोनों समान रूप से महत्वपूर्ण हैं और इसी के अनुसार, चैनल को अपना कंटेंट उपलब्ध कराने में मदद मिलती है। इन्हीं सिद्धांतों का पालन करते हुए हम जमीन से जुड़े रहते हैं।

आजकल सभी ब्रॉडकास्टर विभिन्न भाषाओं के चैनल्स पर पैसा लगा रहे हैं। रीजनल न्यूज के मोर्चे पर आपका नेटवर्क ज्यादा मजबूत है। नए साल को लेकर इस सेगमेंट में आपका क्या प्लान है? आप इस ग्रोथ को आर्थिक रूप से कैसे भुनाएंगे? क्या आप हिंदी और अंग्रेजी की तुलना में विज्ञापन से रीजनल में ज्यादा कमाई देखते हैं?

मैं दूसरे ब्रॉडकास्टर्स के बारे में नहीं बता सकता हूं, लेकिन एबीपी न्यूज नेटवर्क में हमने रीजनल चैनल के मॉडल को रीजनल स्वायत्ता के साथ हमेशा बिजनेस मॉडल के रूप में देखा है। कहने का मतलब है कि बेशक हमारे पास कॉरपोरेट ऑफिस है, लेकिन हमारे सभी रीजनल चैनल्स निष्पक्ष खबरें दिखाने के हमारे मूल सिद्धांत पर चलते हुए सभी मायनों में पूरी तरह से स्वतंत्र हैं। इसलिए, हमारे रीजनल न्यूज चैनल्स जैसे-‘एबीपी आनंदा’ (ABP Ananda), ‘एबीपी माझा’ (ABP Majha), ‘एबीपी अस्मिता’ (ABP Asmita) और ‘एबीपी गंगा’ (ABP Ganga) ने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया है। वास्तव में ‘एबीपी सांझा’ (ABP Sanjha) पंजाबी दर्शकों के लिए काफी अच्छा कर रहा है। वर्तमान की बात करें तो हमारे पूरे रेवेन्यू में रीजनल चैनल्स का योगदान 40 प्रतिशत से ज्यादा है और जल्द ही यह बढ़कर 50 प्रतिशत से अधिक हो जाएगा। मेरा मानना है कि रीजनल्स निश्चित रूप से सभी प्लेटफॉर्म्स से बेहतर करेंगे और किसी भी हिंदी अथवा अंग्रेजी न्यूज चैनल से बेहतर होंगे।  

डिजिटल की ग्रोथ के बारे में कुछ बताएं। क्या डिजिटल से आ रहा एडवर्टाइजिंग रेवेन्यू अभी भी शुरुआती दौर में है? एबीपी में इसकी ग्रोथ को आप किस तरह से देखते हैं?

डिजिटल की बात करें तो एबीपी नेटवर्क काफी अच्छा कर रहा है। हमारे 250 मिलियन से ज्यादा पेज व्यूज हैं और 58 मिलियन से ज्यादा यूजर्स हैं। विडियो की बात करें तो 60 मिलियन से ज्यादा यूनिक विजिटर्स के साथ हम तीसरे नंबर पर हैं। डिजिटल के मोर्चे पर हमारे रेवेन्यू में 50 प्रतिशत की दर से बढ़ोतरी हो रही है। हम विडियो फर्स्ट फॉर्मेट पर काम कर रहहे हैं और जल्द ही आपको ‘एबीपी लाइव’ (ABP Live) एक नए रूप में दिखाई देगा, जहां से आप अपनी पसंद के अनुसार किसी भी भाषा में कोई भी न्यूज चुन सकते हैं। हमने इस पर काफी निवेश किया है और आने वाले दो वर्षों में हम इसमें 50 प्रतिशत की दर से बढ़ोतरी देख रहे हैं।  

वर्ष 2019 खबरों से भरपूर रहा है। लोकसभा चुनाव के साथ ही इसकी शुरुआत हो गई थी, इसके बाद क्रिकेट वर्ल्ड कप भी था। ऐसे में एडवर्टाइजर्स ने विज्ञापनों पर काफी खर्च किया। दूसरी तरफ इस वित्तीय वर्ष में आर्थिक मंदी का सामना भी करना पड़ा। क्या आपको लगता है कि पहली दो तिमाही के मुकाबले आखिरी की दो तिमाही की चाल काफी सुस्त रही है? इस बारे में आपका क्या मानना है?  

आमतौर पर एक के बाद एक चुनाव से व्युअरशिप बढ़ती है। ऐसे में चुनाव के दौरान एडवर्टाइजिंग रेवेन्यू का प्रतिशत भी बढ़ जाता है। 2019 भी इससे अलग नहीं था, सिवाय इसके कि मौद्रिक स्थिति को देखते हुए कुछ एडवर्टाइजर्स ने अपने बजट घटा दिए। लेकिन आर्थिक मोर्चे पर विपरीत परिस्थितियों और मार्केट में अनिश्चितता के कारण उम्मीद है कि पिछले वर्षों की तुलना में अब यह खर्च कम होगा।

साल की शुरुआत नए टैरिफ ऑर्डर (NTO 2.0) से हुई है। आपकी नजर में ब्रॉडकास्टर्स के लिए इसके क्या मायने हो सकते हैं?  

न्यूज जॉनर में हम फ्री टू एयर ब्रॉडकास्टर हैं और नए टैरिफ ऑर्डर (NTO 2.0) ने डीपीओ के साथ हमारी बिजनेस डीलिंग को और स्पष्ट किया है। हमारे लिए, यह सही दिशा में उठाया गया बेहतर कदम है।   

वर्ष 2020 में ब्रॉडकास्ट इंडस्ट्री में आपकी नजर में तीन कौन से बड़े बदलाव हो सकते हैं?

मेरी नजर में 2020 में डिजिटल और रीजनल इस इंडस्ट्री की ग्रोथ में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। जिन चैनलों के पास काफी साधन हैं और पूरे देश में जिन्होंने अपने पैर पसार रखे हैं, उन्हें काफी फायदा होगा। हालांकि, डिजिटल की ओर से चुनौती मिलेगी, लेकिन शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में न्यूज और एंटरटेनमेंट के द्वारा ब्रॉडकास्टर इसकी बढ़त को बरकरार रखेंगे। कुल मिलाकर रीजनल न्यूज और हिंदी न्यूज की ग्रोथ में काफी इजाफा होगा। 2020 में लाइव अथवा विडियो ऑन डिमांड (VOD) की स्थिति भी मजबूत होगी। जहां तक मुझे लगता है कि वर्ष 2020 की आखिरी छमाही में टीवी और डिजिटल टीवी (ऐप, वेबसाइट और यूट्यूब) की ग्रोथ दोहरे अंकों में होगी। पहली छमाही में अभी भी आर्थिक मंदी, जीएसटी और इंडस्ट्री से जुड़े अन्य मुद्दों का प्रभाव देखने को मिलेगा।

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'हमारे अखबार में नहीं लगा है कॉरपोरेट का पैसा, इसलिए करते हैं जनसरोकारी पत्रकारिता'

‘देशबंधु’ के समूह संपादक राजीव रंजन श्रीवास्तव ने सोशल मीडिया के इस दौर में फेक न्यूज को रोकने के लिए जनजागरूकता फैलाने पर दिया जोर

अभिषेक मेहरोत्रा by
Published - Sunday, 15 December, 2019
Last Modified:
Sunday, 15 December, 2019
Rajeev Ranjan Srivastava

छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और दिल्ली का प्रमुख अखबार ‘देशबंधु’ (Deshbandhu) अपने साठ साल पूरे करने जा रहा है। अपनी दमदार और जनसरोकार वाली पत्रकारिता के दम पर यह अखबार न सिर्फ नए आयाम छू रहा है, बल्कि समय के साथ कदम से कदम मिलाते हुए मीडिया के अन्य प्लेटफॉर्म्स पर भी आगे बढ़ रहा है। पाठकों की रुचि को ध्यान में रखते हुए अखबार के कलेवर पर भी खास ध्यान दिया जा रहा है। मीडिया के लिए मुश्किल माने जा रहे इस दौर में टिके रहने के लिए अखबार कौन सी स्ट्रैटेजी अपना रहा है और इतने सालों तक किस तरह पाठकों के मन में अपनी जगह बनाए हुए है, इन्हीं सब के बारे में ‘समाचार4मीडिया डॉट कॉम’ के एग्जिक्यूटिव एडिटर अभिषेक मेहरोत्रा ने ‘देशबंधु’ के समूह संपादक राजीव रंजन श्रीवास्तव से बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

आपका अखबार 60 साल का हो रहा है, पर तेवर और कलेवर बिल्कुल नए होते जा रहे हैं। वर्तमान दौर में अखबार को आगे ले जाने की आपकी क्या स्ट्रैटेजी है? 

देशबंधु के 60 साल हमारी सबसे बड़ी पूंजी हैं। इस पूंजी को मेरे पूर्वजों ने मेरे हवाले किया है और मुझे लगता है कि मेरे पूर्वजों ने जो मुझे दिया है, उसे मैं आगे बढ़ाकर उसमें आने वाली पीढ़ी (पाठक) के लिए कुछ और जोड़ दूं। हमारी पूरी ताकत हमारे पाठक हैं। क्योंकि अगर हम कुछ गलती करते हैं तो वह पाठक ही बताते हैं और यदि हम कुछ अच्छा करते हैं तो सराहना भी उन्हीं के द्वारा मिलती है। पाठक ही हमारे सच्चे मार्गदर्शक हैं। ये दोनों ही चीजें हमारे लिए बहुत बड़ा तमगा हैं। मेरी इच्छा है कि हम सब मिलकर 'देशबंधु' को उस मुकाम तक ले जाएं कि आज तक जो यह पाठकों को देता आया है, आने वाले समय में उससे ज्यादा दे। वर्तमान में मीडिया इंडस्ट्री खासकर अखबारों की आज जो स्थिति है, उनमें अपनी साख को बचाए रखना भी एक चुनौती है। उस चुनौती का सामना करते हुए आगे बढ़ने की हमारी कोशिश चल रही है। इस दिशा में हम लगातार प्रयास कर रहे हैं, ताकि हमारी साख हमेशा बनी रहे।

माना जा रहा है कि प्रिंट अब खत्म हो रहा है। इसकी अर्थव्यवस्था भी बिगड़ रही है। ऐसे में अखबार की साख और अर्थव्यवस्था में सामंजस्य बिठाने के लिए आप क्या कर रहे हैं?

वर्तमान समय में कहा जा रहा है कि प्रिंट मीडिया खत्म होने की ओर बढ़ रहा है और आने वाला समय डिजिटल व टेलिविजन समेत तमाम अन्य चीजों का होगा और प्रिंट मीडिया नहीं बचेगा, लेकिन मेरा मानना है कि एक दस्तावेज के रूप में आप हमेशा प्रिंट को ही इस्तेमाल करेंगे और वह कभी खत्म नहीं होगा। ये हो सकता है कि प्रिंट का सर्कुलेशन कम हो जाए और मैं मान रहा हूं कि वह दौर आ गया है।

कहने का मतलब है कि चुनौतियां सर्कुलेशन के स्तर पर हैं, क्योंकि आज के दौर में अधिकांश लोगों के हाथ में मोबाइल है, वहीं कंप्यूटर और लैपटॉप का इस्तेमाल भी बढ़ा है। ई-पेपर के रूप में भी अधिकांश अखबार लोगों तक पहुंच रहे हैं। लेकिन कुछ चीजें है जो आज भी लोगों को पढ़ने के लिए छपी-छपाई चाहिए। इन चीजों को यदि आप ई-पेपर के रूप में भी लोगों तक पहुंचाते हैं, तब भी कहीं न कहीं दस्तावेज चाहिए। ऐसे में मुझे लगता है कि प्रिंट मीडिया कभी खत्म होने वाला नहीं है। रही बात चुनौतियों की तो प्रिंट मीडिया के साथ चुनौतियां नई नहीं हैं। यदि हम गुजरे जमाने की बात करें तो रेडियो के दौर में भी प्रिंट मीडिया के सामने चुनौतियां थीं। इसके बाद टेलिविजन का दौर आया, तब भी चुनौतियां थीं और अब भी बनी हुई हैं। अब सोशल मीडिया के दौर में जब लगभग हर हाथ में मोबाइल है और इंटरनेट की सुविधा है, तब भी यह चुनौतियां बनी हुई हैं। लेकिन अखबार तब भी जिंदा थे और आज भी जिंदा हैं। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि आज से 20 साल बाद भी अखबार इसी तरह चलते या यूं कहें कि दौड़ते रहेंगे।

आज के डिजिटल युग के दौर में ‘देशबंधु’ किस तरह अपने पाठकों तक अपनी पहुंच बनाएगा?

प्रिंट के साथ-साथ ‘देशबंधु’ हमेशा नए माध्यमों पर भी फोकस करता रहा है। यही कारण है कि करीब 20 साल पहले जब अन्य अखबारों के वेब पोर्टल शुरू हुए थे, तभी ‘देशबंधु’ भी इंटरनेट पर आ गया था और deshbandhu.co.in के नाम से हमने भी अपना वेब पोर्टल शुरू कर दिया था, जो पिछले 20 साल से लगातार चल रहा है। इसे विडियो प्लेटफॉर्म पर लाने के लिए हमने करीब पांच साल पहले 2015 में तैयारी शुरू की थी और 2017 में हमने पूरी तरह इसे dblive के नाम से विडियो फॉर्मेट में लॉन्च कर दिया। मुझे यह बताते हुए खुशी है कि आज हमारे विडियो प्लेटफॉर्म पर 10 लाख से ज्यादा सबस्क्राइबर्स हैं और यह संख्या रोजाना हजारों की संख्या में बढ़ती जा रही है। प्रिंट के अलावा वेब पोर्टल और विडियो प्लेटफॉर्म के द्वारा हम लोगों को एक पैकेज देने की कोशिश कर रहे हैं कि जिस भी रूप में लोग हमसे जुड़ना चाहते हैं, वे हमसे जुड़ सकते हैं। कह सकते हैं कि हम आज की तारीख में हर प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध हैं।‘

पत्रकारिता को जनसरोकार से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन कहीं न कहीं मीडिया इसमें चूक कर रहा है। ऐसे में देशबंधु किस तरह से आज भी जनसरोकार की पत्रकारिता से जुड़ा हुआ है?

‘देशबंधु’ की बैकबोन यानी रीढ़ जनसरोकार की पत्रकारिता ही है। हम हमेशा मूल्यपरक और जनभागीदारी के रूप में पत्रकारिता करते रहे हैं और यही कारण है कि आज 60 सालों बाद भी हमारा अखबार इस बाजार में टिका हुआ है। बाजार शब्द इसलिए इस्तेमाल कर रहा हूं कि आज कई मीडिया संस्थानों में बाजार का पैसा लगा हुआ है, कॉरपोरेट घरानों का पैसा लगा हुआ है। ऐसे में बिना किसी कॉरपोरेट घराने के पैसे के 60 साल से हमारा अखबार चल रहा है और मार्केट में लोग पसंद कर रहे हैं, तो इसका मतलब है हम जनसरोकार की पत्रकारिता कर रहे हैं। बिना जनसरोकार की पत्रकारिता के यह संभव नहीं है। छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश जहां से हमारा उदय हुआ है, वहां हमारे अखबार का सर्कुलेशन बहुत ज्यादा है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 17 अप्रैल 1959 में हमारे अखबार की शुरुआत हुई थी। पहले छत्तीगढ़ अविभाजित मध्य प्रदेश हुआ करता था, लेकिन अब यह अलग राज्य है। आप देखेंगे कि हर गांव में हमारे संवाददाता और पाठक मिल जाएंगे। कई गांवों में तो लोग चौपाल लगाकर ‘देशबंधु’ पढ़ते हैं। इसका कारण यही है कि हम उनसे जुड़े हुए हैं। यदि जनसरोकारों नहीं होगा तो लोग हमसे नहीं जुड़ेंगे और हमें पसंद नहीं करेंगे। पत्रकारिता में आज जब हम जनसरोकार की कमी की बात कर रहे हैं तो दिल्ली में बैठकर आज जब पत्रकारिता की बात की जाती है तो यहां कहीं न कहीं ग्रामीण पत्रकारिता की कमी दिखती है। लेकिन जैसे ही दिल्ली से बाहर निकलें तो देखेंगे कि सिर्फ ‘देशबंधु’ ही नहीं, कई ऐसे अखबार हैं जो ग्रामीण स्तर पर निकल रहे हैं और जनसरोकार का काम कर रहे हैं। जनभागीदारी के साथ चल रहे हैं औऱ वहां के लोगों की समस्याओं को उठा रहे हैं। ऐसे अखबार आज भी किसी न किसी रूप में जिंदा हैं।

ऐसे कई अखबार हैं, जो बिना किसी कॉरपोरेट घराने के पैसे के आज भी चल रहे हैं और टिके हुए हैं। ऐसी स्थिति में ‘देशबंधु’ के लिए बहुत अच्छी बात ये रही है कि 1978 से लेकर अभी तक 13 बार ग्रामीण पत्रकारिता में इस अखबार को ‘स्टेट्समैन’ अवॉर्ड मिला है। यह अवॉर्ड ‘स्टेट्समैन’ अखबार द्वारा ग्रामीण पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए राष्ट्रीय स्तर पर दिया गया है। 

‘देशबंधु’ ऐसा पहला अखबार है, जिसे ग्रामीण पत्रकारिता में सबसे ज्यादा बार ‘स्टेट्समैन’ अवॉर्ड मिला है, यह भी अपने आप में एक रिकॉर्ड है। ऐसा इसलिए है कि हमने ग्रामीण पत्रकारिता पर शुरू से जोर दिया है। इसके साथ ही ‘देशबंधु’ ही ऐसा अखबार है, जिसने मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में ग्रामीण पत्रकारिता की शुरुआत की। इसके बाद अन्य अखबारों ने इस बारे में हमसे काफी कुछ सीखा और आगे बढ़े। आप देखें कि आज तो हमारे पास मोबाइल फोन है, इंटरनेट है और खबर हम लोगों तक तत्काल पहुंच जाती है, लेकिन वो जमाना भी था जब लोग टेलिग्राम के द्वारा समाचार भेजते थे। हमारे संवाददाता गांवों में जाते थे और वहां दो-तीन दिन लगाकर समस्याओं को देखते थे और फिर आकर खबर लिखते थे। इसके बाद अखबार वहां तक पहुंचता था।

सिर्फ गांवों में ही नहीं, इन खबरों की गूंज दिल्ली तक होती थी। ’देशबंधु’ के साथ कई ऐसी चीजें हुई हैं कि अखबार में हमने जो रिपोर्ट छापी है, उसकी खबर दिल्ली तक आई है। यही नहीं, दिल्ली के जिम्मेदार लोगों जैसे-तत्कालीन प्रधानमंत्री, मंत्री और संबंधित अधिकारियों ने इन रिपोर्ट्स को संज्ञान में लिया और इन मामलों में कार्रवाई भी हुई है। हमारा प्रयास यही रहता है कि जनसरोकार से संबंधित जो खबरें हैं, वो जनता तक पहुंचाई जाएं।

छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में आपके अखबार का काफी प्रभाव रहता है। दिल्ली में भी इसका एडिशन है। दिल्ली में पिछले दिनों अखबार की एडिटोरियल लीडरशिप में भी बदलाव हुआ है। दिल्ली में अखबार को और प्रभावशाली बनाने के लिए आपकी क्या स्ट्रैटेजी है?

 ये बहुत बड़ा सवाल है। जहां तक छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश की बात है तो पिछले 60 साल से हम वहां टिके हुए हैं और वहां पर पहले से पूरा नेटवर्क है। वहां समाचार जुटाने से लेकर सर्कुलेशन तक पहले से एक प्रभावशाली सिस्टम बना हुआ है। रही बात दिल्ली को तो यहां हम करीब 12 साल पहले आए थे। हमने वर्ष 2008 में दिल्ली में लॉन्चिंग की थी और हमारी कोशिश यही रही थी कि दिल्ली से एक ऐसा अखबार निकाला जाए जो पूरे देश का अखबार हो और जो राष्ट्रीय संस्करण के रूप में हो। यानी यह नेशनल एडिशन के तौर पर यहां से निकले और हर राज्य के लिए एक भूमिका निभाए। हमारी यही कोशिश थी कि हम यहां से एक ही एडिशन निकालेंगे, अलग-अलग एडिशन नहीं निकालेंगे, लेकिन जितने भी हिंदी भाषी प्रदेश हैं, उनकी खबरें दिल्ली में छापेंगे। होता क्या है कि जैसे छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री दिल्ली आ रहे हैं या बिहार के मुख्यमंत्री अथवा कोई मंत्री दिल्ली आ रहे हैं और यदि यह खबर दिल्ली के अखबारों में छप जाती है तो उनके लिए यह काफी गर्व की बात होती है। उन्हें लगता है कि दिल्ली में भी उन्हें अहमियत मिली। दिल्ली से अखबार शुरू करने की जब बात चली थी तो एक सर्वे के दौरान मुझे इस तरह की कमी दिखाई दी। इन बातों को ध्यान में रखकर ही हमने अखबार की तैयारी की। इसके लिए हमने हिंदी भाषी प्रदेशों के लिए अलग-अलग पेज की शुरुआत की। हालांकि हम पेजों पर राज्य का नाम नहीं देते हैं, लेकिन प्रादेशिक के नाम से निकलने वाले पेजों पर हम अलग-अलग प्रदेशों की खबरों को कवर करते हैं। इसके लिए हमने पिछले 10-12 साल में एक तरह से पूरा नेटवर्क तैयार कर लिया है, जिससे हमें इन राज्यों की खबरें मिलती रहती हैं। रही बात आगे की प्लानिंग की तो बता दूं कि हम अपनी टीम को बढ़ा रहे हैं। कुछ नए चेहरे टीम में शामिल भी किए गए हैं और आने वाले समय में और भी नए चेहरे शामिल किए जाएंगे।

हम चाहते हैं कि दिल्ली के मार्केट में हमारा अखबार अच्छी तरह से पहुंचे। यदि अखबार की कॉपी किसी कारण से कहीं नहीं भी पहुंच पाती है तो हम चाहते हैं कि ई-पेपर अथवा अन्य माध्यमों से पाठकों तक हम अपनी पहुंच बनाने में सफल रहें। रही बात आर्थिक पक्ष की तो इसके लिए विज्ञापन जरूरी है। विज्ञापनों के लिए भी पूरी टीम काम कर रही है। मेरा मानना है कि यदि आपका कंटेंट अच्छा है और सर्कुलेशन बेहतर है तो विज्ञापन वालों के लिए काफी सहूलियत हो जाती है। हम कंटेंट और सर्कुलेशन पर लगातार बहुत ध्यान दे रहे हैं। हमारी पूरी योजना है कि दिल्ली-एनसीआर के साथ ही अन्य हिंदीभाषी क्षेत्रों की आवाज को ‘देशबंधु’ दिल्ली में बुलंद करे। हम इस दिशा में लगातार काम कर रहे हैं।

 आर्थिक मोर्चे पर तो मीडिया संघर्ष कर ही रहा है, सबसे बड़ा सवाल मीडिया की क्रेडिबिलिटी का है। पिछले एक दशक की बात करें तो मीडिया की क्रेडिबिलिटी में काफी कमी आई है। इस क्रेडिबिलिटी को कैसे वापस लाया जा सकता है, इस बारे में आप क्या सोचते हैं?

 देखा जाए तो आज की तारीख में ये बहुत ही गंभीर सवाल है। गंभीर इसलिए क्योंकि लोग अब क्रेडिबिलिटी को लेकर मीडिया पर सीधा आरोप लगाने लगे हैं। हालांकि पहले ये आरोप सीधे-सीधे नहीं लगाए जाते थे। मीडिया पर अब उंगली उठने लगी है। इस बारे में मेरा कहना है कि हमें हमेशा इस तरह का काम करना चाहिए, जिससे लोग हमारे ऊपर उंगली न उठाएं। इसके बाद भी यदि उंगली उठ रही है तो उससे कैसे बचा जाए और यदि उंगली उठ गई है तो कैसे अपने आप को पाक साफ करके निकला जाए, यह एक बड़ा सवाल है। यदि मैं ‘देशबंधु’ की बात करूं तो पत्रकारिता के मूल सिद्धांत यानी पक्ष-विपक्ष की बात खने के साथ ही जो आईना दिखाने का काम मीडिया का होना चाहिए, वह हम करते हैं। इसमें कई बार ऐसा होता है कि लोग हमसे नाराज भी हो जाते हैं। यदि आप मीडिया लाइन में हैं और सही बात कर रहे हैं तो ये मानकर चलिए कि लोग आपसे नाराज होंगे और आपको परेशान करेंगे। मीडिया के साथियों से मेरा यही कहना है कि उनमें इतनी हिम्मत होनी चाहिए कि वे उन परेशानियों का सामना कर पाएं। यदि वे इन परेशानियों का सामना नहीं कर पाते हैं तो वे मीडिया के लायक नहीं बने हैं। मैं तो यही कहूंगा कि ऐसे लोगों को मीडिया को छोड़कर कोई दूसरा धंधा कर लेना चाहिए। इन लोगों से मेरा यही कहना है कि यदि आपको अपनी क्रेडिबिलिटी कायम करनी है तो आपको उस लाइन पर चलना पड़गा, जिस लाइन के ऊपर लोग आपके ऊपर उंगली न उठा पाएं। ऐसा आपको रोजाना देखने-सुनने में मिल सकता है। किसी खबर की बात आपको करनी है, अथवा किसी मुद्दे की बात करनी है। किसी खबर अथवा किसी मुद्दे को उजागर करने की बात हो, हर मामले पर आप देखेंगे कि तात्कालिक निर्णय काफी महत्वपूर्ण होता है, वही आपकी क्रेडिबिलिटी को बनाता है और बचाता है। यदि आपकी क्रेडिबिलिटी बनी हुई है तो बचाकर चलनी है और यदि नहीं बनी हुई है तो बनानी है।

ऐसे पत्रकार साथियों के लिए मैं यही कहूंगा कि यह आपके ऊपर निर्भर करता है कि आप अपने अखबार के साथ अथवा अपने मीडिया हाउस के साथ क्या निर्णय कर रहे हैं, लेकिन मैं ये कहूंगा कि पत्रकारिता में करने के लिए बहुत कुछ है और ऐसे समय में जब मीडिया की क्रेडिबिलिटी खत्म हो रही है, तो अपने अंदर झांकना होगा कि आखिर हम कर क्या रहे हैं?  अगर आपको लगता है कि आप सही कर रहे हैं तो सही दिशा में जाइए, लेकिन यदि आप गलत कर रहे हैं तो मुझे पता है कि आपकी अंतर्रात्मा जरूर कहीं न कहीं कहेगी कि आप गलत कर रहे हैं और आपने रास्त गलत चुन लिया है। ऐसे में आप उस रास्ते से अलग हटिए और सही रास्ते पर जाइए। मेरा विश्वास है कि आपकी क्रेडिबिलिटी आपके पास लौट आएगी।

 सोशल मीडिया के इस दौर में फेक न्यूज की समस्या तेजी से उभरी है। आपके अनुसार फेक न्यूज को कैसे रोका जाए और कैसे इससे निजात पाई जा सकती है?

सोशल मीडिया काफी बड़ा प्लेटफॉर्म है। यह ऐसा प्लेटफॉर्म है जो आज की तारीख में सही मायने में बेलगाम है। सोशल मीडिया पर कोई लगाम नहीं है। ऐसे में फेक न्यूज को रोकने के लिए जागरूक होने की जरूरत है। हालांकि, कुछ लोग जागरूक होकर जागरूकता फैला भी रहे हैं। आपको याद होगा कि पहले अखबारों के जरिये हम लोग ‘अंध श्रद्धा निर्मूलन’ यानी लोगों को जागरूक करने का काम करते थे। मैंने छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, बिहार और बाकी जगह भी तमाम ऐसी समितियां देखी हैं, जो लोगों को जागरूक करने का काम करती हैं। जैसे-कई बार इस तरह की खबरें उड़ा दी जाती हैं कि फलां व्यक्ति आग पर चल लेता है या कोई कहता है कि वह आग को अपने मुंह में रख लेता है तो कोई इसी तरह कुछ और कहता है। इन चीजों के बारे में हम अखबारों के द्वारा लोगों को जागरूक करते रहे हैं, ऐसी ही जनजागरूकता आज फेक न्यूज को लेकर करने की जरूरत है। अभी हो यह रहा है कि जैसे ही कोई जानकारी आती है, हम (मीडियाकर्मी) बिना जांचे-परखे उसे फॉरवर्ड कर दे रहे हैं। अखबारों की बात करें तो पहले की तरह कोई भी खबर आने पर हम आज भी कई बार उसकी पुष्टि करते हैं कि वह सही है अथवा नहीं। कंफर्म होने पर ही उसे अखबार में पब्लिश किया जाता है, लेकिन हम जब सोशल मीडिया पर किसी चीज को फॉरवर्ड करते हैं तो हम उसकी कोई तहकीकात नहीं करते।

एक पत्रकार होने के बावजूद अखबार के लिए जो काम किया जा रहा है, वो काम सोशल मीडिया पर नहीं हो रहा है। यही कारण है कि पिछले दो-तीन सालों में फेक न्यूज का अंबार लग गया है। लेकिन कुछ लोग हैं जो अच्छा काम कर रहे हैं। इसमें मैं ‘अल्ट न्यूज’ (Alt News) का नाम लेना चाहूंगा, यह काफी अच्छा काम कर रहा है। ‘बीबीसी’ समेत कई और भी हैं जो फेक न्यूज को रोकने के लिए काफी अच्छा काम कर रहे हैं। लेकिन मैं यहां हर मीडिया घराने के लिए कहना चाहूंगा कि सभी का ये कर्तव्य है कि फेक न्यूज को फैलने से रोकने में अपनी भागीदारी निभाएं, क्योंकि यह रोकना सरकार का काम नहीं है। मैं दावे के साथ कह रहा हूं कि फेक न्यूज को फैलने से रोकना मीडिया संस्थानों का काम है।

मेरा सभी से यही कहना है कि यदि आपके पास फेक न्यूज आती है तो उसे फॉरवर्ड होने से बचाइए। यदि आपको पता है कि यह न्यूज गलत है तो आप इस बात की जानकारी दीजिए। इसके लिए सिर्फ चार लाइन ही तो लिखनी हैं। यदि तहकीकात कर सकते हैं तो इसके लिए टीम बनाइए। कई जगह तो फैक्ट चेक टीम बनाना शुरू भी कर दिया गया है। हम लोग भी इस पर काम कर रहे हैं। हालांकि, हम अभी इस पर वीकली काम कर रहे हैं, हमारी कोशिश है कि धीरे-धीरे इस टीम को बढ़ाया जाए।

गूगल और बाकी जगहों पर ऐसे टूल्स उपलब्ध हैं, जहां से फेक न्यूज अथवा फेक विडियो की तहकीकात की जा सकती है। इसके लिए जनजागरूकता फैलाने की जरूरत है। यदि हम लोग अलर्ट नहीं रहेंगे और लोगों को अलर्ट नहीं करेंगे तो आने वाले समय में पता नहीं क्या हो जाए। लेकिन इस दिशा में अन्य लोगों के साथ हम भी काम कर रहे हैं। मुझे उम्मीद है कि आने वाले समय में अन्य मीडिया संस्थान भी फेक न्यूज की पहचान के लिए फैक्ट चेक टीम बनाएंगे और इस तरह की फेक न्यूज को बाहर आने से पहले उसकी तहकीकात करेंगे, जैसा कि प्रिंट में होता है।

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अमिश देवगन के सवालों पर अमित शाह ने यूं खोले मन के ‘राज’

सवाल-जवाब का सिलसिला अमित शाह की चुनौतियों से शुरू हुआ और फिर घूमते हुए महाराष्ट्र पर आकर रुक गया

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Monday, 02 December, 2019
Last Modified:
Monday, 02 December, 2019
Amish Devgan Amit shah

महाराष्ट्र के सियासी संग्राम के बाद हर कोई यह जानना चाह रहा है कि भाजपा के दिल में 30 साल पुराना रिश्ता तोड़ने वाली शिवसेना के लिए आखिर क्या है? क्या पार्टी भविष्य में शिवसेना के साथ चुनाव लड़ेगी या फिर दोस्ती अब पूरी तरह से दुश्मनी में तब्दील हो चुकी है? लोगों की इस जिज्ञासा को शांत करने का प्रयास किया है ‘न्यूज18’ के एग्जिक्यूटिव एडिटर अमिश देवगन ने।

झारखंड में होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर चैनल के शो ‘एजेंडा झारखंड’ में बतौर अतिथि उपस्थित गृहमंत्री अमित शाह से अमिश देवगन ने कई सवाल पूछे, जिनमें महाराष्ट्र की बात भी शामिल है। सवाल-जवाब का सिलसिला अमित शाह की चुनौतियों से शुरू हुआ और फिर घूमते हुए महाराष्ट्र पर आकर रुक गया। मौजूदा वक्त में इस विषय से जुड़े सवालों के बिना कोई इंटरव्यू पूरा नहीं हो सकता। हालांकि, ये बात अलग है कि भाजपा नेता इस पर ज्यादा कुछ कहना नहीं चाहते।

जब अमिश देवगन ने शाह से पूछा, ‘क्या आपको लगता है कि शिवसेना ने यह तय कर लिया था कि वो चुनाव के बाद भाजपा के साथ सरकार नहीं बनाएगी?’ तो शाह ने शिवसेना पर टिप्पणी करने से इनकार करते हुए बस इतना कहा, ‘जो तय नहीं था उसकी मांग की गई। इसलिए हमें कदम वापस खींचने पड़े।‘

महाराष्ट्र के संदर्भ में अजित पवार एपिसोड भी भाजपा के लिए गले की फांस बन गया है। क्योंकि कल तक भाजपा अजित पर निशाना लगाती रहती थी और सत्ता की आस में उन्हीं से हाथ मिला लिया। जायज है कि इससे जुड़े सवाल पार्टी नेताओं को विचलित कर सकते हैं, लेकिन इसकी परवाह किये बिना अमिश ने अमित शाह पर सवाल दागे। उन्होंने पूछा, ‘अजित पवार पर आपने और देवेन्द्र फडणवीस ने चुनावी रैलियों के दौरान जमकर आरोप लगाये थे, मगर आपने ही उन्हें उपमुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा दिया? ’ इसका शाह ने कोई सीधा जवाब नहीं दिया। उन्होंने बीच का रास्ता निकालते हुए इतना जरूर कहा कि यदि सरकार कायम रहती तो आरोपों की जांच में कोई समझौता नहीं किया जाता।

इस इंटरव्यू के दौरान कई ऐसे मौके भी आये, जब अमित शाह के चेहरे पर सवालों की चुभन का दर्द साफ नजर आया। मसलन, अमिश ने राज्यों का हवाला देते हुए पूछना चाहा कि मई 2017 से नवंबर 2019 तक काफी बदलाव आया है। पहले 70 प्रतिशत देश की आबादी पर भाजपा का शासन था, अब 40 प्रतिशत राज्यों पर शासन है...लेकिन शाह ने पूरा सवाल सुने बिना ही अपनी बात शुरू कर दी। उन्होंने उल्टा अमिश को गलत ठहराते हुए कहा, ‘ठहर जाओ, मध्यप्रदेश और राजस्थान हारने के साथ ही यह चित्र बदल चुका है। इसके बाद 2019 का जनादेश आया, आप थोड़ा डाटा सही रखो, किसी के वॉट्सऐप पर मत चले जाओ। कोई वॉट्सऐप करता है उसे तुरंत उठा देते हो।’ अमिश सवाल समझाते रहे, लेकिन शाह को जो कुछ समझ आया उसी पर कायम रहे।     

इसी तरह जब देवगन ने महाराष्ट्र के संदर्भ में एक और सवाल दागा तो भी अमित शाह सीधा जवाब देने से बचते रहे। अमिश देवगन का सवाल था, ‘30 साल पुराना गठबंधन टूटने का आपको दुःख है? ’ तो भाजपा नेता से जवाब मिला, ‘आप गलत सवाल पूछ रहे हो। मैंने गठबंधन नहीं तोड़ा है, उन्होंने तोड़ा है।’ इसके अलावा राम मंदिर सहित कई विषयों पर सवाल-जवाब हुए। 

बता दें कि अमिश के पास पत्रकारिता के क्षेत्र में 16 साल से ज्यादा का अनुभव है। वह ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ और ‘जी मीडिया’ जैसे जाने-माने मीडिया समूहों में काम कर चुके हैं। मई 2014 से नवंबर 2015 तक वे ‘जी बिजनेस’ चैनल के चीफ एडिटर रहे। इससे पहले ‘जी बिजनेस’ में बतौर डिप्टी एडिटर, एडिटर (आउटपुट0 और एडिटर (स्पेशल प्रोजेक्ट्स) के तौर पर काम किया। ‘जी बिजनेस’ में रहते हुए बिजनेस चैनल के नंबर-1 डिबेट शो ‘बिग स्टोरी बिग डिबेट’ को नए मुकाम तक पहुंचाया। इसके अलावा ‘बिग एनकाउंटर’ नाम के इंटरव्यू शो में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत कई शीर्ष हस्तियों का इंटरव्यू किया। अमिश अपने अब तक के करियर में कोयला घोटाला, ओडिशा का खनन घोटाला और हवाला कारोबारी मोईन कुरैशी से जुड़े कई बड़े खुलासे कर चुके हैं।

आप पूरा इंटरव्यू यहां देख सकते हैः

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