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जानिए, सोशल मीडिया पर राजदीप सरदेसाई, राहुल कंवल और बरख दत्त पर क्यों हुआ हमला...
रुहैल अमीन ।। कश्मीर घाटी में चल रही अशांति की वजह से पत्रकार और मीडिया घरानें अब यहां के दैनिक घटनाओं की कवरेज को लेकर दो भागों में बंट गए हैं। हिंदी न्यूज चैनल हो, अंग्रेजी या फिर रीजनल न्यूज चैनल इस मुद्दे पर हर कोई अलग-अलग रिपोर्टिंग कर रहा है। कुछ चैनल उत्तेज
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
रुहैल अमीन ।।
कश्मीर घाटी में चल रही अशांति की वजह से पत्रकार और मीडिया घरानें अब यहां के दैनिक घटनाओं की कवरेज को लेकर दो भागों में बंट गए हैं। हिंदी न्यूज चैनल हो, अंग्रेजी या फिर रीजनल न्यूज चैनल इस मुद्दे पर हर कोई अलग-अलग रिपोर्टिंग कर रहा है। कुछ चैनल उत्तेजक बहस को दिखा रहें हैं, तो कुछ एक स्टैंड पर कायम हैं और कुछ देशभक्ति पर जोर दे रहे हैं और जबकि कुछ को अपनी कवरेज उदार लग रही है और वे अपने नजरिए को संतुलित बनाए हुए हैं।
8 जुलाई से 13 जुलाई 2016 की घटनाओं की कवरेज को देखें तो कुछ वरिष्ठ पत्रकार जैसे एनडीटीवी की बरखा दत्त, इंडिया टुडे के राहुल कंवल और राजदीप सरदेसाई ने कश्मीर की रिपोर्टिंग पर अंत तक नजर बनाए हुए थे।
बरखा दत्त
विवाद तब शुरू हुआ जब एनडीटीवी की कंसल्टिंग एडिटर बरखा दत्त ने कुछ दिन पहले मारे गए मोस्ट वॉन्टेड आतंकवादी बुरहान वानी को लेकर ट्वीट किया। उन्होंने अपने ट्वीट में ‘कमांडर’ शब्द का प्रयोग कर बुरहान वानी के बारे में बताया। लेकिन उनके इस ट्वीस से ऑनलाइन कम्युनिटी हैरान रह गईं और कई लोगों ने मारे गए आतंकवादी का वर्णन करने के लिए 'आतंकवादी' जैसे शब्दों का प्रयोग न करने पर उन्हे 'देशद्रोही' तक कह डाला।
राजदीप सरदेसाई
दिग्गज पत्रकार राजदीप सरदेसाई की ट्वीट पर उस समय यूजर्स ने अपना गुस्सा निकालना शुरू कर दिया जब उन्होंने एक ट्वीट के जरिए भगत सिंह और बुरहान वानी के बीच की समानता बताईं।
यहां तक कि इंडियन एक्सप्रेस पर भी फॉलोअर्स तब भड़क गए जब उसने बुरहान वानी की अंतिम संस्कार फोटोग्राफ अपने कवर पेज पर अपलोड कर दी। मुख्यधारा की मीडिया द्वारा इस तरह का कदम उठाए जाने पर लोगों ने सवाल खड़े कर दिए:
राहुल कंवल
और आखिर में जब इंडिया टुडे के मैनेजिंग एडिटर राहुल कंवल कश्मीर में अशांति के कवरेज को समझाने के लिए इन शब्दों को चुना है, तो उन्हें यहां इसके बदले में क्या मिला वो नीचे देखिए:
सोशल मीडिया पर कश्मीर के हालातों की कवरेज का इस तरह से वर्णन करने से एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है कि क्या मीडिया घरानों को राज्य तंत्र के विस्तार के रूप में कार्य करना चाहिए या फिर तथ्यों के जरिए उन्हें अपने नजरिया रखना चाहिए?
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