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आज संपादक-मालिक लखनऊ के चक्कर लगाते हैं, फिर चैनल पर आधे घंटे का प्रायोजित शो चलाते हैं, बोले सतीश के. सिंह
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 26 जून की शाम को एसपी सिंह स्मृति व्याख्यान में कई मीडिया जगत के दिग्गजों ने भाग लिया। इस मौके पर ‘हैशटैग की पत्रकारिता और खबरों की बदलती दुनिया’ विषय पर परिचर्चा हुई। इस विषय पर बोलते हुए वरिष्ठ पत्रकार सत
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
26 जून की शाम को एसपी सिंह स्मृति व्याख्यान में कई मीडिया जगत के दिग्गजों ने भाग लिया। इस मौके पर ‘हैशटैग की पत्रकारिता और खबरों की बदलती दुनिया’ विषय पर परिचर्चा हुई। इस विषय पर बोलते हुए वरिष्ठ पत्रकार सतीश के.सिंह ने कहा कि आज के वक्त में ये बहुत जरूरी है कि इनफॉर्मेशन, पब्लिसिटी, डिसइनफॉर्मेशन और जर्नलिज्म में बहुत बारीकी से अंतर कर लिया जाए, क्योंकि जितनी इनफॉर्मेशन दी या परोसी जा रही है फिर चाहे वह हैशटैग के जरिए हो, ट्विटर हैंडल के जरिए या फिर किसी अन्य तरीके से, वो जर्नलिज्म नहीं है। जर्नलिज्म का काम वॉचडॉग करना है, उसकी अकाउंटबिलिटी भी है। आपको अकाउंटबिलिटी लोगों से मांगनी होगी, फिर चाहे वह बड़े पदों पर हों।
उन्होंने कहा कि ये बड़ा सवाल है कि आज सरोकार की पत्रिकारिता है भी या नहीं? हैशटैग की पत्रकारिता करने वाले लोग SEO यानी ऑप्टमाइजर का काम कर रहे हैं। इसलिए बिना कंटेंट के हैशटैग की पत्रकारिता को आप जर्नलिज्म नहीं कह सकते हैं।
इतने सारे पीआर फर्म खुल गए हैं, उन्हें बंद देना चाहिए और पीआर से जुड़ें लोगों को जर्नलिस्ट के रूप में टीवी चैनल, अखबार में भर्ती कर देना चाहिए, क्योंकि इन फर्मों की कोई जरूरत नहीं है। आज हर कोई यहीं काम कर रहा है, फिर चाहे वे मीडिया हाउस का मालिक हो, प्रिंट का मालिक हो, टीवी चैनल का या फिर डिजिटल का। और यह बहुत ही ज्यादा खतरनाक है। आज राज्य सरकारों के गीत हम चैनलों पर दिख रहे हैं, बस संपादक और मालिक लखनऊ के चक्कर लगाते हैं और फिर अपने चैनल पर आधे घंटे का शो राज्य सरकार द्वारा प्रायोजित चलाते हैं। हद तो ये है कि लखनऊ के अधिकारी भी कार्यक्रम की रूपरेखा भी नहीं बनाते हैं, बस कह देते हैं कि चला लो आधे घंटे का शो, राज्य सरकार की तारीफों में।
एक पत्रकार पत्रकारिता में बहुत कुछ सोच कर आता है, उसके पास जब कुछ नहीं रहेगा तो भी वे पत्रकार तो कहलाएगा। लेकिन अब ऐसा समय आ गया है कि पत्रकारिता छोड़कर आपके पास सबकुछ हो सकता है लेकिन आप पत्रकार नहीं कहलाएंगे।
उन्होंने दुख प्रकट करते हुए कहा कि पहले तो पीआईएल (Public-Interest Litigation ) का लोगों ने खात्मा किया और अब कॉरपोरेट के पीआर फर्म्स, सरकार, राजनेताओं या फिर ब्यूरोक्रेट्स के आरटीआई (Right to Information) को भी दबाने का काम कर रहे हैं, इसमें पत्रकार भी शामिल हैं, क्योंकि पत्रकार आरटीआई के जरिए बहुत कुछ पता कर सकता था। सोशल मीडिया के जर्नलिस्ट हों, न्यू मीडिया के हों या फिर कोई और जर्नलिस्ट आज लिख तो सुबह से शाम तक रहे हैं लेकिन आरटीआई कितने लोग फाइल कर रहे हैं। शायद एक भी नहीं।
उन्होंने अंत में कहा कि मेरा मानना है कि आज जर्नलिज्म गूंगा हो गया है और यदि इसे जिंदा नहीं रखा गया तो आने वाले समय में हम इस तरह से एसपी को श्रद्धांजलि नहीं दे पाएंगे।
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