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60 वर्षों तक हिंदी पत्रकारिता की सेवा करने वाला ये कलम का सिपाही अब दुनिया को कह गया अलविदा...

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। पिछले 6 दशक से पत्रकारिता कर रहे हिंदी के जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार जवाहरलाल राठौर का मंगलवार सुबह निधन हो गया। उन्होंने इंदौर के नईदुनिया समेत विभिन्न अखबारों में पत्रकारिता की। राठौर कलम के सिपाही तो थे ही, वे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।

पिछले 6 दशक से पत्रकारिता कर रहे हिंदी के जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार जवाहरलाल राठौर का मंगलवार सुबह निधन हो गया। उन्होंने इंदौर के नईदुनिया समेत विभिन्न अखबारों में पत्रकारिता की। राठौर कलम के सिपाही तो थे ही, वे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी थे। वे 85 वर्ष के थे।

16 अगस्त 1947 से करीब पांच वर्ष तक उन्होंने अपनी जन्मभूमि झाबुआ में नईदुनिया संवाददाता के रूप में कार्य किया, फिर इंदौर आकर विभिन्न अखबारों में संवाददाता, विशेष संवाददाता, घूमंतू संवाददाता रहने के बाद करीब 30 वर्ष तक स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर सक्रिय रहे।

गरीब परिवार में जन्मे जवाहरलालजी राठौड़ 11 वर्ष की उम्र में सातवीं कक्षा में पढ़ते हुए 9 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन के तहत विद्यालय में झंडा फहराने के आरोप में झाबुआ स्टेट की प्रताड़ना के शिकार हुए। तीन अध्यापकों को निष्कासित कर दिया गया। 1946 में राष्ट्रीय सेवादल से जुड़े। 4 मार्च 1946 को वंदे मातरम गाने वालों की गिरफ्तारी शुरू हुई तो भागकर बुआ की बेटी के यहां नरसिंहगढ़ चले गए, जहां 15 अगस्त 1947 तक रहे।

आजाद भारत में प्रजा मंडल के नेताओं की सिफारिश पर 16 अगस्त 1947 से वे झाबुआ में नईदुनिया के संवाददाता नियुक्त कर दिए गए। इसके बाद वे शेष जीवन पत्रकार के तौर पर समर्पित हो गए। पांच बरस तक इस भूमिका को निभाने के बाद उन्हें लगा कि ऊंची उड़ान भरने के लिए वे अक्टूबर 1952 में इंदौर चले आए। हाईस्कूल के दौरान गणेशोत्सव में राजमहल के दरबार हॉल में महाराजा की उपस्थिति में राजशाही के खिलाफ एक नाटक खेलने पर उन्हें सजा दी गई थी। राजा के सामने खेलने के बदले बेंतों से पिटाई हो गई तो उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी। जवाहरलाल राठौर उस दौरान दमन करने वाली हुकूमत के खिलाफ लड़ते रहे।

इंदौर आने के बाद वे जागरण में नगर प्रतिनिधि हो गए। इसके बाद कुछ वर्षों तक इंदौर समाचार में भी काम किया। फिर इंटक से जुड़कर मजदूर संदेश के संपादक का दायित्व 1964 से 1977 तक निभाया। इस दौरान वे 1961 में दैनिक हिन्दुस्तान के संवाददाता नियुक्त हुए, जिससे वे 2003 तक जुड़े रहे। 1977 से 2003 तक वे नईदुनिया में घूमंतू संवाददाता के तौर पर संबद्ध रहे तो 2004-05 में वे भास्कर के समीक्षक की भूमिका में भी रहे।

वे नियमित रूप से करीब 10 अखबार पढ़ा करते और खुद का जो संदर्भ उन्होंने तैयार किया, वैसा अनेक अखबारों का आज भी नहीं है। अपने उसी संदर्भ को जवाहरलालजी राठौड़ ने 2008 में देवी अहिल्या विश्वविद्यालय को दान कर दिया, ताकि आने वाली पीढ़ी उससे लाभान्वित हो सके।

बताया जाता है कि उनके आलेखों से कई बार विधानसभा में हलचल मच जाती और अनेक सरकारी योजनाओं की कमियों को उजागर कर उन्हें दुरुस्त तक कराने में उन्होंने कोई कसर नहीं रखी। अपनी सक्रियता के दौर में वे जब भी प्रेस क्लब आते तो कम उम्र पत्रकारों से चर्चा करना पसंद करते।

जवाहर लाल राठौड़ जी को जीवन में अनेक पुरस्कार और सम्मान मिले, फिर भी शासन की ओर से यथोचित सम्म्मान दिया जाना बाकी है। सही मायनों में वे अपनी सक्रियता के दौर में पत्रकारिता की चलित पाठशाला रहे हैं।

प‍त्रकारिता के साथ वे समाजसेवा में भी सक्रिय रहे। झाबुआ में आदिवासियों के लिए कल्याण के लिए स्थापित गांधी आश्रम में 1948 से 1952 तक निस्वार्थ रूप से नि:शुल्क सहयोग दिया। इंदौर के श्रीरामकृष्ण आश्रम की स्थापना से ही आजीवन सदस्य रहे। इसके अलावा उन्होंने कई सामाजिक संगठनोंमें सक्रिय भूमिका निभाई।

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