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LSTV के दस साल: स्थायित्व की आस में सुनहरी सुबह का इंतजार
लोकसभा टीवी के दस साल पूरे होने के उपलक्ष्य में चैनल के पूर्व सीईओ व ईटीवी-टीवी18 न्यूज ग्रुप के बिजनेस हेड राजीव मिश्र ने समाचार4मीडिया के लिए विशेष तौर पर एक संस्मरण लिखा है जिसे आप नीचे पढ़ सकते हैं:
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
लोकसभा टीवी के दस साल पूरे होने के उपलक्ष्य में चैनल के पूर्व सीईओ व ईटीवी-टीवी18 न्यूज ग्रुप के बिजनेस हेड राजीव मिश्र ने समाचार4मीडिया के लिए विशेष तौर पर एक संस्मरण लिखा है जिसे आप नीचे पढ़ सकते हैं:
लोकसभा सचिवालय ने सदन की कार्यवाही के सीधे प्रसारण को लेकर ऐसे कई बेवजह के नियम बना रखे थे जिनसे ‘विजुवल’ तौर पर प्रसारण आकर्षक नहीं बन पाती थी। ‘कैमरा मूवमेन्ट, फ्रेम और मल्टीस्क्रीन’ को लेकर कई पाबंदियों को मैंनें बड़ी शालीनता से खत्म करवाया और इस मुद्दे पर लोकसभा सचिवालय द्वारा प्रस्तावित फाइलों पर अपने रुख और आक्रमकता में कोई कमी नहीं आने दी।
ऐसे कई उदाहरण हैं जिन्हें सार्वजनिक करना लोकसभा की मर्यादा के खिलाफ होगा। कार्यक्रम को लेकर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष दबाव में तो सभी चैनल या मीडिया समूह रहता है चाहे वह व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के विज्ञापन से प्राप्त धन से चल रहे निजी चैनल हों या कर दाताओं के पैसे से चल रहे सार्वजनिक क्षेत्र के चैनल हों, लेकिन लोकसभा टीवी का मामला कुछ हटकर है। लोकसभा टीवी, लोकसभा सचिवालय द्वारा संचालित है और तकनीकी तौर पर लोकसभा, सरकार के अधीन नहीं है। लोकसभा टीवी इसलिए प्रसार भारती की तुलना में कई मामलों में अलग है।
अब, सवाल यह है कि, फिर लोकसभा टीवी इस तरह के नागपाश में क्यों फंसा है? दरअसल लोकसभा सचिवालय व इसके नौकरशाह इस चैनल को बंधक बनाये रखने की उत्कट इच्छा से ग्रस्त हैं। यही कारण है कि एक सोची-समझी साजिश व रणनीति के तहत लोकसभा टीवी में कार्यरत कर्मचारियों-पत्रकारों को सालाना अनुबंध पर रखा गया है, और प्रतिवर्ष इन कर्मियों की अनुबंध नवीनीकरण पर प्रश्न चिह्न रूपी तलवार लटकी होती है और उस पर तुर्रा यह कि इन सबकी औसत मासिक आमदनी लोकसभा सचिवालय में कार्य कर रहे चतुर्थ वर्गीय कर्मचारियों से भी कम है। मैं यह नहीं कह रहा कि इन चतुर्थ वर्गीय कर्मचारियों की मासिक आय कम होनी चाहिए बल्कि उनकी भी मासिक आय निःसन्देह और बढ़नी चाहिए, यह सिर्फ एक तुलनात्मक उदाहरण है।
ऐसे कई मार्मिक क्षण आये हैं जब लोकसभा टीवी में पांच साल से भी ज्यादा समय से कार्यरत व्यक्ति बीमारी और तकलीफ से तड़पती अपनी मां का इलाज सिर्फ इसलिये नहीं करवा पाया क्योंकि किसी बैंक से ऋण मिलने की उसकी पात्रता उसकी नौकरी के सालाना अनुबंध पर आधारित होने के कारण रद्द कर दी गई। इस लोकसभा टीवी कर्मी के मां की मृत्यु समुचित इलाज के अभाव में कलप-कलप कर हो गयी और वह अपने भाग्य को कोसता रह गया। लोकसभा टीवी के सभी कर्मी ना तो अपना एक छोटा सा आशियाना बनाने के लिए ऋण की पात्रता रखते हैं और ना ही कोई वाहन लेने के लिए।
मैने अपने कार्यकाल में इस मकरजाल को तोड़ने की भरपूर कोशिश की और, ऐसा हम इसलिए कर पाये क्योंकि पहली बार लोकसभा टीवी की आमदनी में हजार प्रतिशत से ज्यादा की बढोतरी हुई थी और हम लोकसभा सचिवालय के अनुदान पर आश्रित रहने के बजाय स्वयं अपने पांव पर खड़े हो गये थे।
अथक प्रयास के बावजूद हम इस मकरजाल को तोड़ने में सफल नहीं हो पाये और ‘ऊंट के मुंह में जीरा का स्वाद’ की तर्ज पर सचिवालय ने हमारे टीवी कर्मियों की सैलरी में कुछ प्रतिशतों की बढ़ोतरी कर दी और हमारी लोकसभा टीवी सेवा को लोकसभा सचिवालय सेवा से जोड़ने की मांग को ठंडे बस्ते में डाल दिया। इस बीच लोकसभा चुनाव के घोषणा के साथ हम अगली सरकार की आस में नई सुनहरी सुबह का इन्तजार करने लगे।
आश्चर्य है, लोकसभा और, हमारे माननीय नीति-निर्माता गण कश्मीर से केरल व राजस्थान से मणिपुर तक कोई अन्याय न हो इस बात को सुनिश्चित करने के लिए कृत संकल्पित है, फिर अपने नाक के नीचे हो रहे इस अन्याय पर उनकी नजर क्यों नही पड़ती? हम आशान्वित हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन सहित सभी गणमान्य राजनीतिज्ञ व राजनीतिक दल इस मुद्दे पर सकारात्मक रूख अख्तियार करेंगे और जल्द ही लोकसभा टी.वी. को भी लोकसभा सचिवालय सेवा के एक अंग के रूप में मान्यता मिल जायेगी।
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