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किस तरह न्यूज चैनल से पीछे रह गए 'गंभीर' होने के दावा करने वाले अखबार, बताया IIMC के डीजी केजी सुरेश ने
विकास सक्सेना ।। भारत में आधुनिक टेलिविजन पत्रकारिता के जनक और ‘आजतक’ के संस्थापक संपादक रहे स्वर्गीय सुरेन्द्र प्रताप सिंह (एसपी सिंह) की याद में दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में हाल ही में एसपी सिंह स्मृति व्याख्यान का आयोजन किया गया। इस दौरान ‘हैशटैग की पत्
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
विकास सक्सेना ।।
भारत में आधुनिक टेलिविजन पत्रकारिता के जनक और ‘आजतक’ के संस्थापक संपादक रहे स्वर्गीय सुरेन्द्र प्रताप सिंह (एसपी सिंह) की याद में दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में हाल ही में एसपी सिंह स्मृति व्याख्यान का आयोजन किया गया। इस दौरान ‘हैशटैग की पत्रकारिता और खबरों की बदलती दुनिया’ विषय पर परिचर्चा हुई।
‘हैशटैग की पत्रकारिता और खबरों की बदलती दुनिया’ विषय पर बोलते हुए भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) के महानिदेशक (डायरेक्टर जनरल) के.जी. सुरेश ने कहा, ‘मैं सोशल मीडिया का समर्थक हूं और इस पर सक्रिय हूं। लेकिन तीन महीने पहले जब मैं डीजी का पद संभाला से तो मुझे हैरानी हुई कि जो संस्था न्यू मीडिया सिखाती है, वो खुद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सक्रिय नहीं है। इसलिए मैंने सबसे पहले वहां सोशल मीडिया पर आईआईएमसी की मौजूदगी दर्ज कराई और एक न्यू मीडिया का नया डिपार्टमेंट शुरू कराया।
उन्होंने कहा कि जब मैं हैशटैग की पत्रकारिता को देखता हूं खासकर टेलिविजन के संदर्भ में तो मेरे में मन में कुछ सवाल उठते हैं। दरअसल आंकड़े बताते हैं कि लगभग तीन करोड़ लोग ही सिर्फ ट्विटर से जुड़े हैं। इसलिए सवा सौ करोड़ देशवासियों में से तीन करोड़ लोगों के लिए ये जो मुद्दें उठाए जाते हैं वो सवा सौ करोड़ देशवासियों के लिए कितने सार्थक हैं? दूसरा सवाल है ये है कि खबरों में जो खर्चा होता है उसे बचाने के लिए क्या सोशल मीडिया आसान जरिया बना गया है?
उन्होंने कहा कि आज टीवी चैनल देश-दुनिया के अहम मुद्दों पर चर्चा को छोड़कर लोकप्रिय नेता क्या कहते हैं उन पर चर्चा करते हैं। जब डिबेट में एक विषय को उठाया जाता है तो ये तय कर लिया जाता है कि चर्चा केवल उसके मुख्य बिंदु पर ही करनी है और उसके जो विभिन्न पहलू हैं उसके बारे में चर्चा नहीं करनी है और यह चिंता का विषय है। उन्होंने सवाल उठाया कि इस पूरे हैशटैग जर्नलिज्म में वो ऑब्जेक्टिवी कहां है, जिसे हम सीखते आए हैं और जिसकी प्रैक्टिस करते आए हैं।
उन्होंने बताया कि बार्क के ताजा आंकडों की मानें, तो जो हर दिन प्राइम टाइम स्लॉट में शोर मचाने वाले चैनलों से दस गुना ज्यादा व्युअरशिप दूरदर्शन न्यूज के पास है और इसकी वजह है कि दर्शक आज हैशटैग और इस तरह के अन्य टेलिविजन न्यूज से हटकर खबर देखना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि इस अपडेट को क्या हम देख रहे हैं या फिर बार्क के आंकड़ों स्वीकार करना नहीं चाहते हैं और इसलिए इस पर सोचने की जरूरत कि क्यों डीडी न्यूज की पहुंच (रीच) बढ़ रहा है। ये सच है कि सत्ताधारी सरकार को दूरदर्शन प्रमुखता देती है, लेकिन इसके बावजूद ये भी हकीकत है कि यदि आपको देश-विदेश के समाचार देखने हो तो दूरदर्शन के एक बुलेटिन देख लीजिए आपको आइडिया लग जाएगा।
एक अध्ययन का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि मैं एक जगह पढ़ रहा था कि अलजजीरा ने एक अध्ययन कराया था कि देश भर के 6 बड़े न्यूज चैनलों में कितने ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को दिखाया जाता है। लेकिन इसके नतीजे चौंकाने वाले थे। नतीजों में खुलासा हुआ कि इन चैनलों में 0.19 प्रतिशत से 7.0 प्रतिशत तक ग्रामीण क्षेत्र के लोग दिखाए जाते हैं। उन्होंने बताया कि यह अध्ययन दो महीने तक किया गया। उन्होंने आगे कहा जो अखबार अपने आपको गंभीर होने के दावा करते हैं, इस अध्ययन में उन अखबारों का ग्रामीण क्षेत्रों की खबरों का फोकस जीरो निकला यानी टीवी से भी कम। अकेला एक 'द हिन्दू' अखबार था जिसका आंकड़ा था 1.37 प्रतिशत। इसलिए हमें इस पर सोचना चाहिए कि ये आंकड़ें सवा सौ करोड़ लोगों के देश में कितने सार्थक हैं।
इस देश में पत्रकारिता की शुरुआत एक मिशन के तौर पर शुरू हुई थी, पत्रकारिता में ‘नो प्रॉफिट, नो लॉस’ समझ में आता है, लेकिन शुद्ध रूप से मुनाफा कमाने आए हैं तो मुझे लगता है कि कहीं न कहीं पत्रकारिता में भटकाव आ गया है।
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