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पढ़िए, कश्मीर घाटी में प्रेस पर सेंसरशिप को लेकर क्या है दिग्गजों की राय...

सैफ अहमद खान ।। हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकी बुरहान वानी की मौत के बाद कश्मीर घाटी में हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है। सुरक्षा बल और प्रदर्शनकारियों के बीच अब तक हुई हिंसक झड़पों में कथित तौर पर 47 लोग मारे गए और 1500 से भी ज्यादा लोग घायल हो गए हैं।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

सैफ अहमद खान ।।

हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकी बुरहान वानी की मौत के बाद कश्मीर घाटी में हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है। सुरक्षा बल और प्रदर्शनकारियों के बीच अब तक हुई हिंसक झड़पों में कथित तौर पर 47 लोग मारे गए और 1500 से भी ज्यादा लोग घायल हो गए हैं।

एक हफ्ते पहले पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की राज्य सरकार ने प्रेस पर दबाब बनाने का फैसला किया। राज्य के शिक्षा मंत्री नईम अख्तर ने इस कदम के पीछे के तर्क दिया कि था कि सूचना पर रोक लोगों की जान बचाने और शांति प्रयासों को मजबूत बनाने के लिए लगाई गई थी। इस दौरान पुलिस ने अखबारों के दफ्तरों और प्रिंटिंग प्रेस पर छापा मार कर हजारों कॉपियां जब्त कर ली थीं।

राइजिंग कश्मीर के एडिटर शुजात बुखारी इस घटना से बिलकुल भी हैरान नहीं है, क्योंकि उनका मानना है कि कश्मीर में प्रेस इमर्जेंसी है और यह कोई पहली बार नहीं है कि जब कश्मीर में प्रेस का गला घोटा जा रहा हो।

बुखारी ने बीबीसी की वेबसाइट पर लिखा है कि जब 2013 में भारतीय संसद पर हमले के आरोपी अफजल गुरु को जब फांसी दी गई तब भी कश्मीर सुलग उठा था। उन्होंने कहा, ‘प्रेस से अखबारों की कॉपियां जब्त कर ली गईं थीं और चार दिनों तक मुझे प्रकाशन बंद रखना पड़ा था। जबकि 2010 के आंदोलन के दौरान तो हमें दस दिनों तक अपना प्रकाशन बंद रखना पड़ा था।’

हालांकि, मिलेनियम पोस्ट के कंसल्टिंग एडिटर सिद्धार्थ मिश्रा इस बात से सहमत नहीं हैं। उन्होंने कहा कि ‘सिर्फ कश्मीर के बारे में ही क्यों बात होती है? कहीं भी दंगों के दौरान प्रतिबंध हमेशा मीडिया पर ही लगाया जाता है। 1989 में मैंनें भागलपुर दंगों को कवर किया था उस समय भी अखबार के प्रकाशन पर अंकुश लगा दिया गया था।’

मिश्रा ने आगे कहा, ‘कश्मीरी प्रेस में मेरे कई दोस्त हैं और वे सभी मुझसे नाखुश होंगे और कहेंगे कि इस पूरे प्रकरण के दौरान स्थानीय मीडिया की कवरेज उचित नहीं रही।’ उन्होंने कहा, ‘बुरहान वानी कौन था?  वह एक आतंकी था, जिसे एक एनकाउंटर में मार दिया गया तो फिर हम इस तरह जोर-शोर से क्यों रो रहें हैं?’

वहीं दूसरी तरफ ‘द मिली गैजेट’ के एडिटर जफरुल इस्लाम खान का कहना है कि कश्मीरी प्रेस में सेंसरशिप स्वीकार नहीं की जा सकती।

उन्होंने कहा कि हर लोकतांत्रिक समाज में प्रेस की आजादी अटल है और इस तरह से पूरे प्रेस को बैन कर देना स्वीकार नहीं किया जा सकता और इस तरह के कदम उठाने से स्थिति को काबू नहीं किया जा सकता है।

उन्होंने तर्क दिया कि इस तरह से अखबारों को जब्त कर लेने से देश पर इसका बुरा असर पड़ेगा। खान ने कहा कि एक ही ब्रश से सभी कश्मीर अखबारों को पेंट करना उचित नहीं होगा, यानी अनुचित कवरेज के आरोप में सभी को बैन कर देना ठीक नहीं है।

खान ने कहा कि कश्मीर घाटी से हजारों अखबार प्रकाशित होते हैं। पीडीपी, नेशनल कांफ्रेंस और आतंकवादियों को लेकर सभी की अपनी अलग-अलग विचारधारा है।’ कुछ इसी तरह का विचार टाइम्स ऑफ इंडिया की सीनियर असिसटेंट एडिटर आरती टीकू सिंह ने भी रखे।

आरती ने कहा कि मेरे खयाल से बोलने की और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार हर परिस्थिति में बरकरार रखा जाना चाहिए। मुझे नहीं लगता कि इंटरनेट और सोशल मीडिया के इस दौर में अखबारों को बैन कर देने से कोई फर्क पड़ता है। उन्होंने कहा कि कश्मीर में खबरों को दबा देने से पाकिस्तान को अफवाहें फैलाने का मौका मिल जाता है।

उन्होंने कहा कि राज्य सरकार को गैरजिम्मेदाराना रिपोर्टिंग और प्रेस में कट्टर विचाराधारा वाले लोगों पर चिंता करना सही है, लेकिन इसका हल यह तो नहीं है कि आप पूरे प्रेस को ही बैन कर दो। क्या वास्तव में यह जरूरी है कि सरकार खुद पर की जा रही रिपोर्टिंग को ही स्थानीय और राष्ट्रीय समाचार पत्रों को ध्यान से देखें और जांचें, जो हिंसा भड़का रहे है उनको नहीं?

उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार को उन मीडिया घरानों से विज्ञापनों को वापस ले लेना चाहिए जो पत्रकारिता के आदर्शों का उल्लंघन करते हैं।

जामिया मिलिया इस्लामिया के प्रोफेसर विश्वजीत दास ने कहा, ‘सेंसरशिप कभी भी मदद नहीं करता। प्रेस को बैन करना एक गंभीर चिंता का विषय है। सरकार फायर ब्रिगेड की राह पर चल रही है जैसाकि आग के केस में आस-पास की सभी दुकानों को बंद कर दिया जाता है। यह लंबे समय तक चलने वाली रणनीति नहीं है।’

उन्होंने कहा, ‘मैं हर शाम न्यूज चैनल देखता हूं। हर कोई आग में घी डाल रहा है। कोई भी ऐहतियात बरतने की कोशिश नहीं कर रहा है। इसलिए अब हमें इस देश में प्रेस रेगुलेशन की जरूरत है।’

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