'राजेंद्र माथुर भविष्यवक्ता नहीं थे, पर समय की नब्ज पहचानते थे'

किसी व्यक्ति के नहीं रहने पर आमतौर पर महसूस किया जाता है कि वो होते तो यह होता...

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Published - Wednesday, 07 August, 2019
Last Modified:
Wednesday, 07 August, 2019
rajendra mathur

मनोज कुमार

वरिष्ठ पत्रकार  ।।

किसी व्यक्ति के नहीं रहने पर आमतौर पर महसूस किया जाता है कि वो होते तो यह होता, वो होते तो यह नहीं होता और यही खालीपन राजेंद्र माथुर के जाने के बाद लग रहा है। यूं तो 7 अगस्त को राजेंद्र माथुर का जन्म दिवस है किन्तु उनके नहीं रहने के छब्बीस बरस की रिक्तता आज भी हिंदी पत्रकारिता में शिद्दत से महसूस की जाती है। राजेंद्र माथुर ने हिंदी पत्रकारिता को जिस ऊंचाई पर पहुंचाया, वह हौसला फिर देखने में नहीं आता है। ऐसा भी नहीं है कि उनके बाद हिंदी पत्रकारिता को आगे बढ़ाने में किसी ने कमी रखी लेकिन हिंदी पत्रकारिता में एक संपादक की जो भूमिका उन्होंने गढ़ी, उसका सानी दूसरा कोई नहीं मिलता है। राजेंद्र माथुर के हिस्से में यह कामयाबी इसलिए भी आती है कि वे अंग्रेजी के विद्वान थे और जिस काल-परिस्थिति में थे, आसानी से अंग्रेजी पत्रकारिता में अपना स्थान बना सकते थे लेकिन हिंदी के प्रति उनकी समर्पण भावना ने हिंदी पत्रकारिता को इस सदी का श्रेष्ठ संपादक दिया। इस दुनिया से फना हो जाने के 26 बरस बाद भी राजेंद्र माथुर दीपक की तरह हिंदी पत्रकारिता की हर पीढ़ी को रोशनी देने का काम कर रहे हैं।

राजेंद्र माथुर की ख्याति हिंदी के यशस्वी पत्रकार के रूप में रही है। शायद यही कारण है कि हिंदी पत्रकारिता की चर्चा हो और राजेंद्र माथुर का उल्लेख न हो, यह शायद कभी नहीं होने वाला है।राजेंद्र माथुर अपने जीवनकाल में हिंदी पत्रकारिता के लिए जितना जरूरी थे, अब हमारे साथ नहीं रहने के बाद और भी जरूरी हो गए हैं। स्वाधीन भारत में हिंदी पत्रकारिता के बरक्स राजेंद्र माथुर की उपस्थिति हिंदी की श्रेष्ठ पत्रकारिता को गौरव प्रदान करता है। पराधीन भारत में जिनके हाथों में हिंदी पत्रकारिता की कमान थी उनमें महात्मा गांधी से लेकर पंडित माखनलाल चतुर्वेदी थे। इन महामनाओं के प्रयासों के कारण ही भारत वर्ष अंग्रेजों की दासता से मुक्त हो सका। इस मुक्ति में हिंदी पत्रकारिता ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। भारत वर्ष के स्वाधीन हो जाने के बाद एकाएक अंग्रेजी ने ऐसी धाक जमायी कि अंग्रेजों के जाने के बाद भी अंग्रेजियत की छाया से भारतीय समाज मुक्त नहीं हो पाया था।

स्वाधीनता के बाद ऐसे में हिंदी पत्रकारिता पर संकट स्वाभाविक था किन्तु इस संकट के दौर में मध्यप्रदेश ने एक बार फिर अपनी भूमिका निभाई और मालवा अंचल से राजेंद्र माथुर नाम के एक ऐसे नौजवान को कॉलम राइटर के रूप में स्थापित किया जिसने बाद के वर्षों में हिंदी पत्रकारिता को नई ऊंचाई दी बल्कि यह कहना भी गैरवाजिब नहीं होगा कि अंग्रेजी पत्रकारिता भी उनसे रश्क करने लगी थी। यह गैरअस्वाभाविक भी नहीं था क्योंकि अखबारों की प्रकाशन सामग्री से लेकर प्रसार संख्या की द्ष्टि से हिंदी के प्रकाशन लगातार विस्तार पा रहे थे। सीमित संचार सुविधायें और आवागमन की भी बहुत बड़ी सुविधा न होने के बावजूद हिंदी प्रकाशनों की प्रसार संख्या लाखों तक पहुंच रही थी। अंग्रेजी पत्रकारिता इस हालात से रश्क भी कर रही थी और भय भी खा रही थी क्योंकि अंग्रेजी पत्रकारिता के पास एक खासवर्ग था जबकि हिंदी के प्रकाशन आम आदमी की आवाज बन चुके थे। हिंदी पत्रकारिता की इस कामयाबी का सेहरा किसी एक व्यक्ति के सिर बंधता है तो वह हैं राजेंद्र माथुर।

बेशक राजेंद्र माथुर अंग्रेजी के ज्ञाता थे, जानकार थे लेकिन उनका रिश्ता मालवा की माटी से था, मध्यप्रदेश से था और वे अवाम की जरूरत और आवाज को समझते थे लिहाजा हिंदी पत्रकारिता के रूप और स्वरूप को आम आदमी की जरूरत के लिहाज से ढाला। उनके प्रयासों से हिंदी पत्रकारिता ने जो ऊंचाई पायी थी, उसका उल्लेख किए बिना हिंदी पत्रकारिता की चर्चा अधूरी रह जाती है। राजेंद्र माथुर के बाद की हिंदी पत्रकारिता की चर्चा करते हैं तो गर्व का भाव तो कतई नहीं आता है। ऐसा भी नहीं है कि राजेंद्र माथुर के बाद हिंदी पत्रकारिता की श्रेष्ठता को कायम रखने में संपादकों का योगदान नहीं रहा लेकिन संपादकों ने पाठकों के भीतर अखबार के जज्बे को कायम नहीं रख पाये। उन्हें एक खबर की ताकत का अहसास कराने के बजाय प्रबंधन की लोक-लुभावन खबरों की तरफ पाठकों को धकेल दिया। अधिक लाभ कमाने की लालच ने अखबारों को प्रॉडक्ट बना दिया। संपादक मुंहबायें खड़े रहे, इस बात से असहमत नहीं हुआ जा सकता है। हालांकि इस संकट के दौर में प्रभाष जोशी जैसे एकाध संपादक भी थे जिन्होंने ऐसा करने में साथ नहीं दिया और जनसत्ता जैसा अवाम का अखबार पाठकों के साथ खड़ा रहा।

ज्यादातर अखबारों बल्कि यूं कहें कि हिंदी के प्रकाशन फैशन, सिनेमा, कुकिंग और इमेज गढ़ने वाली पत्रकारिता करते रहे। इनका पाठक वर्ग भी अलग किस्म का था और इन विषयों के पत्रकार भी अलहदा। सामाजिक सरोकार की खबरें अखबारों से गायब थीं क्योंकि ये खबरें राजस्व नहीं देती हैं। इसी के साथ हिंदी पत्रकारिता में पनपा पेडन्यूज का रोग। पत्रकारिता के स्वाभिमान को दांव पर रखकर की जाने वाली बिकी हुई पत्रकारिता। यह स्थिति समाज को झकझोरने वाली थी लेकिन जिन लोगों को राजेंद्र माथुर का स्मरण है और जो लोग जानते हैं कि जिलेवार अखबारों के संस्करणों का आरंभ राजेंद्र माथुर ने किया था, वे राहत महसूस कर सकते हैं कि इस बुरे समय में भी उनके द्वारा बोये गए बीज मरे नहीं बल्कि आहिस्ता आहिस्ता अपना प्रभाव बनाये रखे। अपने अस्तित्व को कायम रखा और इसे आप आंचलिक पत्रकारिता के रूप में महसूस कर सकते हैं, देख और समझ सकते हैं।

हिंदी के स्वनाम-धन्य अखबार जब लाखों और करोड़ों पाठक होने का दावा ठोंक रहे हों। जब उनके दावे का आधार एबीसी की रिपोर्ट हो और तब उनके पास चार ऐसी खबरें भी न हो जो अखबार को अलग से प्रतिष्ठित करती दिखती हों तब राजेंद्र माथुर का स्मरण स्वाभाविक है। राजेंद्र माथुर भविष्यवक्ता नहीं थे लेकिन समय की नब्ज पर उनकी पकड़ थी। शायद उन्होंने आज की स्थिति को कल ही समझ लिया था और जिलेवार संस्करण के प्रकाशन की योजना को मूर्तरूप दिया था। उनकी इस पहल ने हिंदी पत्रकारिता को अकाल मौत से बचा लिया। राष्ट्रीय एवं प्रादेशिक स्तर पर हिंदी पत्रकारिता की दुर्दशा पर विलाप किया जा रहा हो या बताया जा रहा हो कि यह अखबार बदले जमाने का अखबार है किन्तु सच यही है कि जिस तरह महात्मा गांधी की पत्रकारिता क्षेत्रीय अखबारों में जीवित है उसी तरह हिंदी पत्रकारिता को बचाने में राजेंद्र माथुर की सोच और सपना इन्हीं क्षेत्रीय अखबारों में है।

हिंदी पत्रकारिता को बहुत शिद्दत से सोचना होगा, उनके शीर्षस्थ संपादकों को सोचना होगा कि वे हिंदी पत्रकारिता को किस दिशा में ले जा रहे हैं? पत्रकारिता के ध्वजवाहकों द्वारा तय दिशा और दृष्टि से हिंदी पत्रकारिता भटक गई है। हां, आधुनिक टेक्रालॉजी का भरपूर उपयोग हो रहा है और संपादक मोहक तस्वीरों के साथ मौजूद हैं। आज के पत्रकार राजेंद्र माथुर थोड़े ही हैं जिनकी तस्वीर भी ढूंढ़े से ना मिले। यकिन नहीं होगा, किन्तु सच यही है कि जब आप हिंदी के यशस्वी संपादक राजेंद्र माथुर की तस्वीर ढूंढऩे जाएंगे तो दुर्लभ किस्म की एक ही तस्वीर हाथ लगेगी लेकिन उनका लिखा पढऩा चाहेंगे तो एक उम्र की जरूरत होगी।

 (लेखक वरिष्ठ पत्रकार और भोपाल से प्रकाशित शोध पत्रिका ‘समागम’ के संपादक हैं)

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MRUCI में प्रताप पवार-शशि सिन्हा को फिर मिली ये बड़ी जिम्मेदारी

मीडिया रिसर्च यूजर्स काउंसिल इंडिया (MRUCI) ने मंगलवार, 29 सितंबर, 2020 को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अपनी 26वीं वार्षिक आम बैठक (AGM) आयोजित की

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Published - Tuesday, 29 September, 2020
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Tuesday, 29 September, 2020
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मीडिया रिसर्च यूजर्स काउंसिल इंडिया (MRUCI) ने मंगलवार, 29 सितंबर, 2020 को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अपनी 26वीं वार्षिक आम बैठक (AGM) आयोजित की, जो वर्तमान में फैली महामारी के चलते सभी लोगों की सुरक्षा व स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए आयोजित की गई थी।

इस बैठक में घोषणा की गई कि मीडिया रिसर्च यूजर्स काउंसिल इंडिया (MRUCI) के चेयरमैन साकाल मीडिया के चेयरमैन प्रताप पवार और आईपीजी वाइस चेयरमैन मीडियाब्रैंड्स इंडिया के सीईओ शशि सिन्हा अपनी-अपनी भूमिकाओं में बने रहेंगे। MRUCI की 26वीं वार्षिक आम बैठक के तुरंत बाद आयोजित की गई बोर्ड मीटिंग में सर्वसम्मति से इन दोनों को फिर से चुना गया।

दो नए सदस्यों को भी बोर्ड ऑफ गवर्नर्स में नियुक्त किया गया है:

1. बेनेट, कोलमैन एंड कंपनी लिमिटेड (BCCL) की एग्जिक्यूटिव कमेटी के चेयरमैन शिवकुमार सुंदरम

2. पब्लिसिज मीडिया एक्सचेंज (पीएमएक्स-मेनलाइन) के मैनेजिंग पार्टनर व हेड सेजल शाह

इस मौके पर प्रताप पवार ने कहा, ‘सबसे पहले, मैं अपने नए नियुक्त किए गए बोर्ड मेंबर्स का अभिनंदन और स्वागत करता हूं। विशेष रूप से इन विषम परिस्थितियों में हमें उनके बहुमूल्य विचारों और सुझावों का इंतजार रहेगा।’  

इस मौके पर पवार ने बीते वर्षों में रिटायर हुए सभी सदस्यों को उनके मूल्यवान मार्गदर्शन के लिए धन्यवाद दिया और परिषद में उनका सहयोग लगातार बना रहे, ऐसी इच्छा जाहिर की।

वहीं शशि सिन्हा ने कहा, ‘मीडिया और मार्केटिंग इंडस्ट्री धीरे-धीरे ही सही, लेकिन लगातार पटरी पर लौट रही है। हमारा ध्यान जमीनी वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए जल्द से जल्द आईआरएस स्टडी को फिर से शुरू करना और सामान्य होती दुनिया में इसे आगे ले जाने पर काम करना होगा।’

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बदमाशों ने मॉर्निंग वॉक पर निकले पत्रकार को मारी गोली, हालत गंभीर

बिहार के गोपालगंज जिले से एक बड़ी खबर सामने आई है। यहां बेखौफ अपराधियों ने एक दैनिक अखबार के पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता राजन पांडेय को दिनदहाड़े गोली मार दी है

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Published - Tuesday, 29 September, 2020
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Tuesday, 29 September, 2020
Rajan Pandey

बिहार के गोपालगंज जिले से एक बड़ी खबर सामने आई है। यहां बेखौफ अपराधियों ने एक दैनिक अखबार के पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता राजन पांडेय को दिनदहाड़े गोली मार दी है। बता दें कि पत्रकार राजन पांडेय सुबह अपने घर से मॉर्निंग वॉक के लिए निकले थे। इसी दौरान बुलेट पर आए तीन अपराधियों ने उन्हें गोली मार दी और मौके से फरार हो गए। 

यह घटना मंगलवार को मांझागढ़ थाना क्षेत्र के पुरानी बाजार में घटित हुई। राजन पांडेय जैसे ही मांझागढ़ पुरानी बाजार पहुंचे तभी उन्हें सरेआम गोली मार दी गई। गोली लगने के बाद पत्रकार वहीं पर गिर गए जिन्हें स्थानीय लोगों की मदद से गोपालगंज सदर अस्पताल के आपातकालीन वार्ड में भर्ती कराया गया। अस्पताल के डॉक्टरों ने प्राथमिक इलाज करने के बाद गंभीर हालत में उन्हें गोरखपुर मेडिकल कॉलेज के लिए रेफर कर दिया। इस बीच पत्रकार राजन पांडेय को गंभीर हालत में गोरखपुर मेडिकल कॉलेज ने भी लखनऊ रेफर कर दिया। लीवर में गोली फंसने की वजह से उनकी स्थिति नाजुक बनी हुई है।

एसपी मनोज कुमार तिवारी ने बताया कि गोली मारने वाले अपराधियों की पहचान कर ली गई है और एक पुलिस टीम को अपराधियों की गिरफ्तारी के लिए लगा दिया गया है। उन्होंने कहा कि संभावित ठिकानों पर छापेमारी की जा रही है और अपराधियों की गिरफ्तारी या पत्रकार के बयान के बाद ही पता चल सकेगा की गोली मारने की असल वजह क्या है।

बता दें कि वारदात के बाद जब पत्रकार राजन को गोरखपुर ले जाया जा रहा था, तभी रास्ते में उन्होंने हमलावरों के नाम बताए हैं। राजन के मुताबिक वो बच्चों को पढ़ाते भी हैं और इसी सिलसिले में मंगलवार की सुबह वो कोचिंग क्लास देने जा रहे थे। तभी रास्ते में राजेंद्र यादव (अदमापुर निवासी) , राजकुमार सिंह (कोइनी निवासी) और नन्हे सिंह ने इनका पीछा किया और इन्हें गोली मार दी।

पत्रकार राजन पांडेय समाजिक कार्यों में भी बढ़ चढ़कर भाग लेते रहे हैं। कोरोना काल और गोपालगंज में आई बाढ़ के दौरान भी राजन पांडेय ने जरूरतमंदों के बीच राहत सामग्री पहुंचाई थी। इस वारदात के बाद पूरे इलाके में खौफ का माहौल बन गया है।

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TRAI के नए चेयरमैन की हुई नियुक्ति, एक अक्टूबर को संभालेंगे कार्यभार

ट्राई के वर्तमान चेयरमैन आरएस शर्मा इस साल 30 सितंबर को सेवानिवृत्त हो रहे हैं।

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Published - Monday, 28 September, 2020
Last Modified:
Monday, 28 September, 2020
TRAI

डॉ. पीडी वाघेला को ‘टेलिकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया’ (TRAI) का नया चेयरमैन नियुक्त किया गया है। कैबिनेट की नियुक्ति समिति ने इस पद पर डॉ. पीडी वाघेला के नाम पर मुहर लगा दी है। इस पद पर वाघेला का कार्यकाल तीन वर्ष के लिए होगा। डॉ. वाघेला की इस पद पर नियुक्ति संबंधी आदेश में कहा गया है, ‘कैबिनेट की नियुक्ति समिति (ACC) ने ट्राई चेयरमैन के रूप में गुजरात कैडर के 1986 बैच के आईएएस अधिकारी डॉ. पीडी वाघेला की नियुक्ति को अपनी अनुमति दे दी है। उनका कार्यकाल तीन वर्ष के लिए अथवा 65 वर्ष की आयु तक अथवा अगले आदेश तक (जो भी पहले हो) प्रभावी होगा।’

वाघेला की गिनती उन चुनिंदा अधिकारियों में होती है, जिन्होंने जीएसटी को लागू कराने में अहम भूमिका निभाई। गुजरात कैडर के आईएएस अधिकारी वाघेला वर्तमान में फार्मास्यूटिकल्स विभाग में सेक्रेट्री के पद पर कार्यरत हैं। वह एक अक्टूबर को ट्राई चेयरमैन के रूप में अपना पदभार ग्रहण करेंगे।  

बता दें कि वाघेला, आरएस शर्मा की जगह लेंगे जो 30 सितंबर को सेवानिवृत्त हो रहे हैं। 1978 बैच के आईएएस अधिकारी आरएस शर्मा को अगस्त 2015 में इस पद पर नियुक्त किया गया था। वह एकमात्र ऐसे चेयरपर्सन हैं, जिनका कार्यकाल अगस्त 2018 में दो साल के लिए बढ़ाया गया था।

ट्राई के नए चेयरमैन के रूप में डॉ. पीडी वाघेला को नियुक्त किए जाने संबंधी सरकारी आदेश की कॉपी आप यहां देख सकते हैं।

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इस पद पर Netflix से जुड़ीं करुणा गुलयानी

करुणा इससे पहले ‘उबर’ (Uber) के साथ जुड़ी हुई थीं और बतौर कॉरपोरेट एंड पॉलिसी कम्युनिकेशंस हेड (भारत और दक्षिण एशिया) की जिम्मेदारी संभाल रही थीं।

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Published - Monday, 28 September, 2020
Last Modified:
Monday, 28 September, 2020
Netflix

करुणा गुलयानी (Karuna Gulyani) ने ‘नेटफ्लिक्स’ (Netflix) के साथ अपनी नई पारी शुरू की है। उन्होंने यहां पर बतौर कॉरपोरेट एंड पॉलिसी कम्युनिकेशंस लीड जॉइन किया है। इस बात की जानकारी उन्होंने लिंक्डइन पोस्ट के जरिये दी है।

करुणा इससे पहले ‘उबर’ (Uber) के साथ जुड़ी हुई थीं और बतौर कॉरपोरेट एंड पॉलिसी कम्युनिकेशंस हेड (भारत और दक्षिण एशिया) की जिम्मेदारी संभाल रही थीं। गुलयानी को कम्युनिकेशन इंडस्ट्री में काम करने का 15 साल से ज्यादा का अनुभव है।

गुलयानी ने अपने करियर की शुरुआत ‘Text 100 Pvt. Ltd’के साथ बतौर अकाउंट मैनेजर की थी। इसके बाद उन्होंने ‘Turner Broadcasting’, ‘Discovery Networks Asia Pacific’ और ‘Facio Communication Pvt. Ltd’ जैसे बड़े ब्रैंड्स के साथ काम किया। वह अब तक कई मार्केटिंग व कम्युनिकेशन कैंपेन का नेतृत्व कर चुकी हैं।

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The Quint में अब नई भूमिका निभाएंगी देविका दयाल

डिजिटल न्यूज प्लेटफॉर्म ‘द क्विंट’ (The Quint) ने नेशनल रेवेन्यू हेड देविका दयाल को प्रमोट कर नई जिम्मेदारी सौंपी है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Friday, 25 September, 2020
Last Modified:
Friday, 25 September, 2020
Devika Dayal

डिजिटल न्यूज प्लेटफॉर्म ‘द क्विंट’ (The Quint) ने नेशनल रेवेन्यू हेड देविका दयाल को चीफ रेवेन्यू ऑफिसर के पद पर प्रमोट किया है। देविका दयाल को ऐड सेल्स के क्षेत्र में काम करने का करीब दो दशक का अनुभव है। नई भूमिका में ‘The Quint’ के रेवेन्यू से जुड़े सभी प्रकार के कार्यों की जिम्मेदारी उन्हीं के ऊपर होगी।

इस बारे में ‘द क्विंट’ की सीईओ और को-फाउंडर रितु कपूर का कहना है, ‘मैंने पूर्व में नेटवर्क18 और अब द क्विंट में देविका का काम देखा है। बढ़ते मार्केट और कंटेंट की गतिशीलता के साथ प्रयोग करना उनकी खासियत है और यह उन्हें आगे रखती है। डिजिटल न्यूज पब्लिशिंग ईकोसिस्टम तेजी से बदल रहा है और देविका ने नए रेवेन्यू ब्लूप्रिंट तैयार करने के लिए टेक्नोलॉजी और सेल्स स्ट्रैटेजी दोनों का सहारा लिया है। मुझे पूरा विश्वास है कि चीफ रेवेन्यू ऑफिसर के रूप में देविका रेवेन्यू जुटाने में काफी बेहतर प्रदर्शन करेंगी।’

बता दें कि ‘द क्विंट’ को जॉइन करने से पूर्व देविका ‘आईटीवी नेटवर्क’ (ITV Network) से जुड़ी हुई थीं और  ‘न्यूजएक्स’(NewsX) में बतौर सीओओ अपनी जिम्मेदारी संभाल रही थीं। इसके अलावा ‘नेटवर्क18’में करीब 10 साल तक उन्होंने विभिन्न पदों पर अपनी भूमिका निभाई है। वह वर्ष 2011 में देश में ‘हिस्ट्रीटीवी18’ (History TV18) को लॉन्च कराने वाली लीडरशिप टीम का हिस्सा भी रही हैं। पूर्व में वह ‘डिस्कवरी कम्युनिकेशंस इंडिया’ (Discovery Communications India) और ‘जी नेटवर्क’ (Zee Network) में भी अपनी जिम्मेदारी निभा चुकी हैं।

वहीं, अपनी नई भूमिका के बारे में देविका दयाल का कहना है, ‘द क्विंट में पिछले तीन साल का सफर काफी अच्छा रहा है। द क्विंट में चीफ रेवेन्यू ऑफिसर के रूप में नई जिम्मेदारी मिलने को लेकर मैं काफी उत्साहित हूं।’

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पत्रकारों के हित में यूपी सरकार ने लिया ये बड़ा फैसला

संक्रमण काल के दौरान अपनी जान जोखिम में डालकर पत्रकार ग्राउंड रिपोर्टिंग कर रहे हैं। ऐसे में कई पत्रकारों के कोरोना से संक्रमित होने की खबरें भी सामने आई हैं

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Published - Friday, 25 September, 2020
Last Modified:
Friday, 25 September, 2020
Covid19

संक्रमण काल के दौरान अपनी जान जोखिम में डालकर पत्रकार ग्राउंड रिपोर्टिंग कर रहे हैं। ऐसे में कई पत्रकारों के कोरोना से संक्रमित होने की खबरें भी सामने आई हैं, जिनमें कई पत्रकारों की तो जान तक चली गई है। ऐसे में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राज्य के पत्रकारों के परिवार के हित में एक अहम फैसला लिया है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शुक्रवार को कहा कि राज्य में मान्यता प्राप्त पत्रकारों को प्रतिवर्ष पांच लाख रुपए का स्वास्थ्य बीमा कवर दिया जाएगा। साथ ही कोरोना वायरस संक्रमण से किसी पत्रकार की मौत होने पर उसके परिजनों को को दस लाख सरकार रुपए की आर्थिक सहायता दी जाएगी। मुख्यमंत्री ने ये घोषणाएं राजधानी में नवनिर्मित पंडित दीन दयाल उपाध्याय सूचना परिसर भवन के उद्घाटन के दौरान कीं।

उन्होंने कहा कि सूचना विभाग शासन और प्रशासन के कार्यों को मीडिया तक पहुंचाने के लिए एक सेतु का काम करता है। उन्होंने कहा, ‘किसी भी सरकार के कार्यों का आम जनमानस तक पहुंचाने का एक सशक्त माध्यम सूचना एवं जनसंपर्क कार्यालय होता है। शासन का काम योजनाएं बनाना होता है प्रशासन उसे विभिन्न माध्यमों से आम जन तक पहुंचाता है, लेकिन जनता, शासन और प्रशासन के बीच में एक महत्तवपूर्ण सेतु के रूप में मीडिया की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। 

उन्होंने कहा कि प्रदेश के मान्यता प्राप्त पत्रकारों को राज्य सरकार प्रतिवर्ष पांच लाख रुपए का स्वास्थ्य बीमा कवर देगी, इसके अलावा कोरोना वायरस संक्रमण से किसी पत्रकार की मृत्यु होने पर उसके परिजन को दस लाख रुपए की आर्थिक सहायता दे जाएगी। उन्होंने कहा कि कोरोना काल में मीडियाकर्मी काम कर रहे है और पत्रकारों को पूरी सुरक्षा और जागरुकता के साथ काम करते हुए संक्रमण से बचना चाहिए। 

योगी आदित्यनाथ ने कहा कि राज्य में इन्सेफलाइटिस कुछ साल तक एक जानलेवा बीमारी थी जो धीरे धीरे पूरे पूर्वी उत्तर प्रदेश को अपनी चपेट में ले चुकी थी, लेकिन प्रधानमंत्री स्वच्छता मिशन कार्यक्रमों और प्रदेश सरकार की योजनाओं की बदौलत इस बीमारी को समाप्त करने में सफलता मिली।

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Indian Broadcasting Foundation में के.माधवन का कद बढ़ा, अब संभालेंगे यह जिम्मेदारी

माधवन को पिछले साल दिसंबर में ‘स्टार’ (Star) और ‘डिज्नी इंडिया’ (Disney India) का नया कंट्री मैनेजर नियुक्त किया गया था।

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Published - Friday, 25 September, 2020
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Friday, 25 September, 2020
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‘स्टार’ (Star) और ‘डिज्नी इंडिया’ (Disney India) के मैनेजिंग डायरेक्टर के. माधवन को ‘इंडियन ब्रॉडकास्टिंग फाउंडेशन’ (Indian Broadcasting Foundation) का नया प्रेजिडेंट नामित किया गया है। वह ‘सोनी पिक्चर्स नेटवर्क्स’ (Sony Pictures Networks) के सीईओ और एमडी एनपी सिंह की जगह यह जिम्मेदारी संभालेंगे। टेलिविजन ब्रॉडकास्टर्स के प्रतिनिधित्व वाले इस प्रमुख संगठन में माधवन इससे पहले वाइस प्रेजिडेंट (रीजनल अफेयर्स) पद की जिम्मेदारी संभाल रहे थे।

बता दें कि माधवन को पिछले साल दिसंबर में ‘स्टार’ (Star) और ‘डिज्नी इंडिया’ (Disney India) का नया कंट्री मैनेजर नियुक्त किया गया था। अपनी इस भूमिका में माधवन ‘स्टार’ और ‘डिज्नी इंडिया’ के टेलिविजन बिजनेस (एंटरटेनमेंट, स्पोर्ट्स और रीजनल चैनल्स) के साथ ही भारत में इसके स्टूडियो बिजनेस का काम संभालते हैं।

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ईमानदार मीडिया हाउसेज के लिए यह काफी मुश्किल घड़ी है: सुधीर चौधरी

‘जी न्यूज’, ‘जी बिजनेस’ और ‘विऑन’ के एडिटर-इन-चीफ सुधीर चौधरी का कहना है कि न्यूज प्रोफेशन ऑर्गेनिक (organic) होता है।

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Published - Friday, 25 September, 2020
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Friday, 25 September, 2020
Sudhir Chaudhary

‘जी न्यूज’ (Zee News), ‘जी बिजनेस’ (Zee Business) और ‘विऑन’ (Wion) के एडिटर-इन-चीफ सुधीर चौधरी का कहना है कि न्यूज प्रोफेशन ऑर्गेनिक (organic) होता है। इसमें काफी जिम्मेदारी व अनुशासन की जरूरत होती है और गलती के लिए जगह नहीं होती है। ऐसे में सटीकता (accuracy) के उच्च मानदंडों को बनाए रखने के लिए न्यूजरूम में अनुशासन की जरूरत होती है। ‘गवर्नेंस नाउ’ (Governance Now) के एमडी कैलाशनाथ अधिकारी के साथ एक बातचीत में सुधीर चौधरी का कहना था कि टेलिविजन के टीआरपी आधारित बिजनेस मॉडल की वजह से न्यूजरूम्स में अनुशासन व जिम्मेदारी की कमी है।

पब्लिक पॉलिसी प्लेटफॉर्म पर ‘विजिनरी टॉक सीरीज’ (Visionary Talk series) के 13वें एपिसोड के तहत होने वाले इस वेबिनार के दौरान सुधीर चौधरी का यह भी कहना था, ‘दुर्भाग्य से इन दिनों आप जितने गैरजिम्मेदार होंगे, उतनी ही टीआरपी आपको मिलेगी। ईमानदार और विवेकशील मीडिया संस्थानों के लिए यह मुश्किल घड़ी है और धैर्य बनाए रखने की जरूरत है।’

न्यूज टीवी के इस बिजनेस मॉडल के बारे में सुधीर चौधरी ने कहा कि यह एक निश्चित सीमा से अधिक निवेश की अनुमति नहीं देता है। उनका कहना था, ‘एक न्यूज संस्थान बिजनेस चला रहा है, लेकिन हमारे देश में लोग फिर भी इसे मुफ्त मानते हैं और एंटरटेनमेंट के विपरीत इसके लिए भुगतान नहीं करना चाहते हैं।’ उन्होंने टीवी चैनल के संपादक की तुलना एक फिल्म प्रड्यूसर से की, जहां बॉक्स ऑफिस की किस्मत हर गुरुवार को तय होती है और सफलता के फॉर्मूले के बारे में सोचने के लिए कहा जाता है।

चौधरी ने तुष्टिकरण की पत्रकारिता पर भी बात की और कहा कि हमारे देश में 60-70 वर्षों से पद्मश्री प्रकार की पत्रकारिता रही है, जब विभिन्न सरकारों ने प्लाट्स/मकानों के आवंटन और पुरस्कारों समेत तमाम तरीकों से कई पत्रकारों और मीडिया संस्थानों को उपकृत किया। सुधीर चौधरी के अनुसार, ‘यदि मैं सरकार के अच्छे कामों को सपोर्ट करता हूं या उनके बारे में बात करता हूं तो आपको देखना होगा कि सरकार के साथ कोई छिपा हुआ हित अथवा कोई डीलिंग तो नहीं हुई है या क्या सरकार मुझसे किसी प्रकार का लाभ हासिल करने की कोशिश कर रही है। आपको देखना होगा कि क्या ऐसे लोग सरकार से कोई लाभ ले रहे हैं या क्या पत्रकार-मीडिया संस्थान और सरकार के साथ कोई छिपी डीलिंग हुई है। अगर ऐसा नहीं है तो सवाल नहीं उठाए जाने चाहिए।’

इस पूरी बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं

 

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भारतीय चैनल्स के प्रभाव को कम करने के लिए नेपाल ने चली ये चाल

भारत-चीन के बीच बढ़ते तनाव के बाद चीन, भारत के पड़ोसी देश नेपाल का इस्तेमाल कर रहा है, जिसका नतीजा है कि नेपाल चीन के सुर में सुर मिला रहा है। लिहाजा ऐसे में नेपाल से एक बड़ी खबर सामने आई है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Friday, 25 September, 2020
Last Modified:
Friday, 25 September, 2020
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भारत-चीन के बीच बढ़ते तनाव के बाद चीन, भारत के पड़ोसी देश नेपाल का इस्तेमाल कर रहा है, जिसका नतीजा है कि नेपाल चीन के सुर में सुर मिला रहा है। लिहाजा ऐसे में नेपाल से एक बड़ी खबर सामने आई है। दरअसल ‘दैनिक जागरण’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, नेपाल ने अब भारतीय चैनलों को बाहर का रास्ता दिखाने की तैयारी की है, जिसके लिए उसने बकायदा क्लीन फीड (विज्ञापन मुक्त) नीति जारी की है।

यह रिपोर्ट दैनिक जागरण के हलद्वानी संवाददाता अभिषेक राज की है, जिसमें बताया गया है कि इसके तहत भारतीय टीवी चैनल कार्यक्रम के बीच में विज्ञापन का प्रसारण नहीं कर सकते हैं। यह नीति आठ अक्टूबर से पूरे नेपाल में प्रभावी होगी, जिसका पालन नहीं करने वाले चैनलों का प्रसारण रोक दिया जाएगा।

रिपोर्ट के मुताबिक, नेपाल में भारतीय न्यूज चैनल्स के अलावा एंटरटेनमेंट टीवी चैनल भी काफी लोकप्रिय हैं। करीब सातों प्रदेशों में नेपाली चैनल्स की अपेक्षा हिंदी चैनल्स की बेहतर पैठ है। मधेश में तो भारतीय चैनल्स की टीआरपी पहले पायदान पर रहती है। नेपाली चैनलों की पूछ तक नहीं। बात चाहे फिल्म की हो या फिर धारावाहिक। यहां घर-घर में भारतीय चैनलों की पैठ है। ऐसे में नेपाली और विदेशी कंपनियां भारतीय चैनलों में ही विज्ञापन प्रसारित करती हैं। इनकी अपेक्षा नेपाली चैनलों की आमदनी एक चौथाई भी नहीं होती।

नेपाल सरकार का मानना है कि भारतीय चैनल्स के प्रभाव के कारण नेपाली चैनल्स की स्थिति दयनीय हो गई है। ऐसे में उसने आठ अक्टूबर से विदेशी चैनल्स के लिए विज्ञापन मुक्त प्रसारण नीति लागू कर दी है। इसके बाद भारतीय चैनल्स को नेपाल से विज्ञापन मिलना करीब बंद हो जाएगा। ऐसे में बगैर आय प्रसारण मुश्किल हो जाएगा।  

वहीं रिपोर्ट में यह बताया गया है कि नेपाल विज्ञापन संघ के अनुसार विदेशी चैनल्स के विज्ञापन मुक्त प्रसारण से नेपाली चैनल्स को सीधे-सीधे लाभ होगा। इससे भारतीय चैनल्स को सालाना करीब आठ अरब नेपाली रुपए की होने वाली आमदनी नेपाली चैनल्स के हिस्से आएगी। इससे उनकी स्थिति बेहतर होगी।

नेपाल ने भारत सीमा विवाद को तूल देने का आरोप लगाकर जुलाई में भी पांच न्यूज चैनल्स के प्रसारण पर रोक लगाई थी। हालांकि बाद में भारत सरकार के दखल के बाद नेपाल ने प्रतिबंध वापस ले लिया था।

नेपाल फेडरेशन ऑफ केबल टेलीविजन एसोसिएशन के अध्यक्ष सुशील पुराजुली ने दैनिक जागरण को बताया कि विज्ञापन मुक्त नीति नेपाली चैनल्स के लिए संजीवनी साबित होगी। इसके लिए भारतीय सहित सभी विदेशी चैनल्स को शीघ्र ही अपने प्रसारण प्रारूप में बदलाव करना होगा। ऐसा नहीं हुआ तो सरकार की नीति के अनुसार उनका प्रसारण आठ अक्टूबर से रोक दिया जाएगा।

(साभार: दैनिक जागरण)

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अब इस ग्रुप से जुड़े PTI के पूर्व CEO एम.के.राजदान

गौरतलब है कि एम.के. राजदान की बेटी निधि राजदान भी पत्रकारिता जगत से जुड़ी हुई हैं और इस समय एनडीटीवी 24X7 में वरिष्‍ठ पत्रकार हैं।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 24 September, 2020
Last Modified:
Thursday, 24 September, 2020
MK Razdan

प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (पीटीआई) के पूर्व सीईओ व एडिटर-इन-चीफ एम.के.राजदान अब वेदांता ग्रुप में कॉरपोरेट कम्युनिकेशन टीम के वरिष्ठ सलाहकार के तौर पर शामिल होंगे। वे दिल्ली से अपना कार्यभार संभालेंगे।

वेदांता में कम्युनिकेशंस एंड ब्रैंड के डायरेक्टर रोमा बलवानी ने ट्वीट कर राजदान का 'टीम वेदांत' में स्वागत किया।

वरिष्ठ पत्रकार राजदान पीटीआई के एक सदस्यीय ब्यूरो में ब्यूरो चीफ के पद पर काम करने के बाद 1995 में संस्थान के जनरल मैनेजर बनें। एक युवा पत्रकार के रूप में राजदान नवंबर, 1965 में पीटीआई के साथ जुड़े थे और तब से लेकर सितंबर, 2016 तक यानी करीब 51 वर्षों तक उन्होंने यहां विभिन्न पदों पर अपना योगदान दिया। 21 वर्षों तक वे पीटीआई के एडिटर-इन-चीफ के पद पर बने रहे। सितंबर, 2016 में उनका यहां से रिटायरमेंट हुआ।

गौरतलब है कि एम.के. राजदान की बेटी निधि राजदान भी पत्रकारिता जगत से जुड़ी हुई हैं और इस समय एनडीटीवी 24X7 में वरिष्‍ठ पत्रकार हैं।

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