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'नवभारत टाइम्स' अख़बार का नाम ‘न्यूट्रीचार्ज टाइम्स’ नजर आया...
प्रमोद जोशी वरिष्ठ पत्रकार ।। नवभारत टाइ
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
वरिष्ठ पत्रकार ।।
नवभारत टाइम्स, दिल्ली के 3 नवम्बर के अंक में विज्ञापनदाता का जैकेट है। जैकेट इस तरह डिजाइन किया गया है, जिससे बाहर से देखने पर अख़बार का नाम ‘न्यूट्रीचार्ज टाइम्स’ नजर आता है। अखबारों के चलन को देखते हुए यह बात विस्मयकारी नहीं लगती, पर अखबारों की बिगड़ती साख पर यह प्रतीकात्मक टिप्पणी जरूर है। यह कारोबार का मामला है। अखबारों में इनोवेटिव विज्ञापनों के नाम पर ऐसे विज्ञापनों की भरमार है। इनमें कभी-कभार इनोवेशन नजर आता है, पर जो बात सबसे ज्यादा दिखाई पड़ती है वह है विज्ञापनों को वहां जगह दिलाना जहां पहले वे नजर नहीं आते थे। भारतीय भाषाओं के कुछ अखबारों ने अब सम्पादकीय पेज पर विज्ञापन देने शुरू कर दिए हैं।
मान लिया कि अखबारों के सामने अपने आर्थिक आधार को मजबूत करने की चुनौती है। पर उन्हें अपनी साख को भी तो बचाना है। साख भी कमाई है। कहा जा सकता है कि मास्टहैड पर विज्ञापन जाने से अख़बार की साख नहीं बिगड़ती। एक जमाने में ईयर पैनल पर विज्ञापन होते ही थे। नब्बे के दशक में टाइम्स ऑफ इंडिया के पहले सफे पर मास्टहैड के फॉन्ट से ही एक तरफ अंग्रेजी में LET और मास्टहैड के बाद WAIT ईयर पैनल की जगह लगा दिए। इससे मास्टहैड बना “LET THE TIMES OF INDIA WAIT। यह अख़बार पर ही टिप्पणी थी। विज्ञापन की यह परम्परा आज की नहीं है। सन 1948 में मद्रास के हिन्दू में महात्मा गांधी की हत्या की खबर आखिरी सफे पर थी, क्योंकि पहले सफे पर विज्ञापन था।
क्या नवभारत टाइम्स को, आभासी रूप में ही सही ‘न्यूट्रीचार्ज टाइम्स’ नजर आना ठीक लगता है? सच है कि विज्ञापन को लेकर अखबारों के बीच भारी मारामारी है। एक समय ऐसा भी था जब कम से कम कुछ प्रतिष्ठित अख़बार पहले पेज पर ‘सोलस’ विज्ञापन लेते थे, जिनका अधिकतम आकार तय था। अब शायद ही कोई अख़बार केवल एक विज्ञापन पहले पेज पर लेने की शर्त लगाता हो। न्यूयॉर्क टाइम्स पहले पेज के विज्ञापन नहीं लेता था। अब लेने लगा है।
सोलस विज्ञापन भी कारोबारी रणनीति थी। केवल एक विज्ञापन के लिए विज्ञापनदाता दुगनी-तिगुनी राशि देता था। अब चूंकि अखबारों को भारी डिस्काउंट देना पड़ता है, इसलिए सोलस का वक्त नहीं रहा। पर अख़बार की प्रतिष्ठा तो बनानी ही होगी।
सवाल है कि आप इनोवेशन के चक्कर में किस हद तक जाएंगे? अखबारों में सरकारों के प्रायोजित परिशिष्ट इस रूप में प्रकाशित होते हैं जैसे सम्पादकीय विभाग सरकारों की तारीफ कर रहा है। उनके आलेखों का फॉन्ट अलग होना चाहिए, साथ ही साफ लिखा जाना चाहिए कि यह विज्ञापन का पेज है। विज्ञापनों को खबरों की तरह पेश करना खबरों की प्रतिष्ठा कम करता है। पेड़ न्यूज का विकास इसी तरह हुआ था। टाइम्स ऑफ इंडिया समूह के स्वामी विनीत जैन ने कहीं कहा था, हम विज्ञापन के कारोबार में हैं। सच है, पर इसका आधार सम्पादकीय साख ही तो है।
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