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जानिए, वरिष्ठ पत्रकार डॉ. वैदिक ने क्यों कहा, बीजेपी अब भाई-भाई पार्टी बन गई है
‘हम कांग्रेस को प्राइवेट लिमिटेड कंपनी कहते-कहते थक गए। उसे मां-बेटा पार्टी भी कह डाला। अब भाजपा का क्या हाल है? यह भाई-भाई पार्टी बन गई है।’ हिंदी दैनिक अखबार नया इंडिया में छपे अपने आलेख के जरिए ये कहना है वरिष्ठ पत्रकार डॉ. वैदिक का। उनका पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं:
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
‘हम कांग्रेस को प्राइवेट लिमिटेड कंपनी कहते-कहते थक गए। उसे मां-बेटा पार्टी भी कह डाला। अब भाजपा का क्या हाल है? यह भाई-भाई पार्टी बन गई है।’ हिंदी दैनिक अखबार नया इंडिया में छपे अपने आलेख के जरिए ये कहना है वरिष्ठ पत्रकार डॉ. वैदिक का। उनका पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं:
सासू छोटी और बहू बड़ी?
इसमें शक नहीं है कि जावड़ेकर की पदोन्नति ठीक रही और जो नए 19 राज्यमंत्री चुने गए हैं, उनमें से तीन-चार तो पूरे मंत्री होने के योग्य हैं। ज्यादातर मंत्री ऐसे हैं, जिनसे बेहतर काम की आशा की जा सकती है। ये युवा और योग्य मंत्री चाहें तो अपने वरिष्ठ साथियों की काफी मदद कर सकते हैं लेकिन मुख्य प्रश्न यह है कि भाजपा के 64 मंजे हुए और वरिष्ठ मंत्री पिछले दो साल में खास उल्लेखनीय कुछ नहीं कर सके तो ये नए राज्यमंत्री कौन सा आसमान झुका देंगे? उनके हाथ में कौनसी जादू की छड़ी है कि वे मोदी सरकार की कार्यपद्धति में कोई चमत्कार कर देंगे?
मोदी सरकार में मोदी से भी अधिक अनुभवी और योग्य, जो मंत्री लोग हैं, उनकी दशा क्या है? क्या वे अपनी नीति बनाने में स्वतंत्र हैं? क्या उनकी क्षमता का पूरा उपयोग हो रहा है? क्या उन्हें उचित सम्मान मिल रहा है? उनके चेहरे बुझे-बुझे रहते हैं, उनका वजन घट गया है और वे चुप रहने में ही अपना भला समझते हैं। सरकार पर नौकरशाहों का कब्जा हो गया है। पार्टी और सरकार पर गुजरात का शिकंजा कसा हुआ है। भाजपा पर ऐसी नौबत पहले कभी नहीं आई थी।
हम कांग्रेस को प्राइवेट लिमिटेड कंपनी कहते-कहते थक गए। उसे मां-बेटा पार्टी भी कह डाला। अब भाजपा का क्या हाल है? यह भाई-भाई पार्टी बन गई है। दिल्ली में सूं छे? नरेंद्र भाई छे और अमित भाई छे! दोनों भाइयों की नजर प्रांतीय चुनावों पर है। अब उप्र और पंजाब वगैरह भी कहीं बिहार और दिल्ली के रास्ते पर न चल पड़ें। इसीलिए इस विस्तार में इसका ध्यान रखा गया है लेकिन करोड़ों मतदाता अब जात और मजहब से प्रभावित होने वाले नहीं हैं। उन्हें केंद्र सरकार की ठोस उपलब्धियों का इंतजार है। ताश के कुछ पत्ते इधर-उधर करने या उनकी संख्या बढ़ाने से आम जनता को क्या मतलब है?
(साभार: नया इंडिया)
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