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'बदलाव हर जगह है केवल हिंदी पत्रकारिता में नहीं'
संतोष कुमार पाण्डेय ।। राजनीति, मनोरंजन, खेल, देश की हालत, संचार यहां तक कि अंग्रेजी पत्रकारिता में बदलाव जारी है बस हिंदी पत्रकारिता में नहीं। मुझे भी इस पेशे में आये लगभग 7 साल हो गया। कई शहरों और अखबारों में कुछ नामचीन संपा
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
संतोष कुमार पाण्डेय ।।
राजनीति, मनोरंजन, खेल, देश की हालत, संचार यहां तक कि अंग्रेजी पत्रकारिता में बदलाव जारी है बस हिंदी पत्रकारिता में नहीं। मुझे भी इस पेशे में आये लगभग 7 साल हो गया। कई शहरों और अखबारों में कुछ नामचीन संपादकों और लोगों के साथ काम करने का अवसर मिला। हमेशा कुछ न कुछ सीखा जो बताया गया। बेसिक ठीक था क्योंकि पत्रकारिता में मास्टर डिग्री थी। उस दौरान काम भी किया। लेकिन हिंदी पत्रकारिता को मैं आगे जाने के बजाय दिनों दिन पीछे या कह लीजिए अंत, अपमान और बेइज्जती की ओर जाते महसूस कर रहा हूं। माथा घूम गया है। इस लिए काफी सोचना पड़ा है। जिस आधार पर इसकी कई किस्त तैयार है मेरे पास आज केवल पहला पड़ाव।
कंटेंट का रोना
शुरुआती दौर में हर फिल्ड में परेशानी थी और लोगों को संघर्ष भी करना पड़ा। इसका मतलब यह नहीं की उसमे बदलाव नहीं होना चाहिए। आज भी हिंदी पत्रकारिता में कंटेंट का रोना रोता है। कारण साफ महसूस हुआ है मुझे। कुछ साहित्यकार संपादकों ने कंटेंट और कुछ दलाल संपादकों ने खबर का स्वरूप खत्म कर दिया है। ये लोग समय समय पर सामने आते रहे हैं। इनके नाम बताने की जरूरत नहीं मुझे। अच्छे पत्रकारों को इन दलाल संपादकों ने परेशान कर कंटेंट को कमजोर करना सिखा दिया। अब वह प्रचलन में चल गया है। हिंदी पत्रकारिता में मेरा दावा है आप पता करिए कोई भी रिपोर्टर संतुष्ट मिले। कंटेंट जो जनता को चाहिए उस पर काम बहुत कम हुआ। जो इन दलालों को चाहिए उस पर ज्यादा काम हुआ। अब प्रचलन में सब वही उदाहरण देते फिरते हैं। हिंदी पत्रकारिता में कोई मानक है। बस गिरावट जारी है और जारी रहेगा। इस पर चिंतन की बहुत जरूरत है। नहीं तो आने वाले दिन बहुत भयानक आने वाला है।
खबर लिखने की वही साहित्यकारों की स्टाइल और मुहावरों का सहारा लिया जाता है। जो आम पाठक को पल्ले नहीं पड़ता। बस लिखने वाला समझता और उसका साहित्यकार संपादक।
आज यही वजह है कि हिंदी पत्रकारों की हालत खराब है। एक अखबार आज के दौर का कंटेंट तैयार कर रहा है। मैं नाम नहीं लूंगा। हां, उस अखबार में काम करने का अवसर मिल चुका है। अच्छा अनुभव भी रहा है। यह बदलाव हर जगह क्यों नहीं। साहित्यकारों और दलाल संपादकों से कब निजात मिलेगी।
(लेखक एक युवा पत्रकार है और ये उसके अपने विचार हैं)
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