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'प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में बिन पिए जो खाए, सो पछताए, कमेटी के लोगों को मयखाना मैनेज करने से फ़ुर्सत नहीं '
मैं आमतौर पर प्रेस क्लब जाता नहीं क्योंकि मैं पीता नहीं। साल म
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
पूरा तंदूरी चिकन प्रेस क्लब के लिए प्लेट में ही छोड़कर निकल आया। चिकन, पनीर और फ़िश का स्नैक्स कितना घटिया बनाया जा सकता है, ये जानना हो तो एक बार यहां आकर देख सकते हैं।
शिल्पा-राजीव को कोसता भी रहा और तय किया कि भूख से निजात का कोई दूसरा विकल्प जब तक होगा, यहां खाने तो नहीं आऊंगा। हां, पीने वालों को ये मयखाना मुबारक। किसी ज़माने में यहां का खाना भी अच्छा होता था आज लगा कि ये मयखाना ही अच्छा...
प्रेस क्लब के आसपास फुटपाथ पर या जंतर- मंतर के ढाबे पर इससे लाख गुना बेहतर खाना आपको मिल जाएगा।
प्रेस क्लब के मैनेजिंग कमेटी के साथी पता नहीं क्या-क्या मैनेज करते हैं कि किचन तक मैनेज नहीं कर पा रहे हैं। हर साल वोट मांगने के लिए झुंड बनाकर नेताओं की तरह निकलते हैं और प्रेस क्लब का कायाकल्प करने के वादे करते हैं। जीतने के बाद लगता है सब पीने पिलाने में मगन हो जाते हैं। पच्चीस साल में कुछ तो बेहतर होना चाहिए था लेकिन यहां तो उल्टी गंगा बह रही है।
मैं नहीं जानता कि यहां मैनेजिंग कमेटी में कौन लोग हैं और क्या मैनेज करते हैं। या तो उन्हें मयखाना मैनेज करने से फ़ुर्सत नहीं है। तो खाने की फ़िक्र कैसे करें।
भाई लोगों, आप पीने पिलाने में लगे रहिए और किचेन का ज़िम्मा वहीं सामने फुटपाथ के ढाबे वालों को दे दीजिए। सस्ते में अच्छा खाना तो खिला ही देंगे। बाक़ी मयखाना चलाने के लिए तो आप सक्षम हैं ही। या फिर बाहर एक बोर्ड लगा दीजिए-
पीने वालों का स्वागत है
खाने वाले माफ़ करें
(साभार: वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम की फेसबुक वॉल से)
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