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प्रेस काउंसिल के सदस्यों का फूटा गुस्सा, चेयरमैन के इस कदम का किया विरोध

काउंसिल के कई सदस्यों ने कहा, 22 अगस्त को हुई बैठक में इस बारे में कोई निर्णय नहीं लिया गया था और न ही यह मामला एजेंडे में शामिल था

समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago

कश्मीर में अनुच्छेद-370 खत्म करने के बाद मीडिया पर प्रतिबंध लगाने के सरकार के फैसले का प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) ने भी समर्थन किया है। काउंसिल ने इस बारे में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका भी दायर की है। वहीं, काउंसिल के इस कदम को लेकर कुछ सदस्यों ने अपनी नाराजगी जताई है। इन सदस्यों का कहना है कि इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में ले जाने से पहले न तो उनसे सलाह ली गई और न ही उन्हें इस बारे में बताया गया।    

बता दें कि प्रेस काउंसिल ने सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका कश्मीर टाइम्स (Kashmir Times) की कार्यकारी संपादक अनुराधा भसीन द्वारा दायर याचिका के खिलाफ दायर की है। अपनी याचिका में अनुराधा भसीन का कहना था कि घाटी में मीडिया पर प्रतिबंध लगाए गए हैं और पत्रकारों को उनका काम नहीं करने दिया जा रहा है।

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वहीं, एडवोकेट अंशुमान अशोक की तरफ से शुक्रवार को दायर याचिका में पीसीआई ने मीडिया पर लगाए गए प्रतिबंधों को यह कहते हुए सही ठहराया है कि सुरक्षा चिंताओं के मद्देनजर मीडिया पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। पीसीआई का कहना है कि चूंकि भसीन की याचिका में एक तरफ स्वतंत्र और निष्पक्ष रिपोर्टिंग के लिए पत्रकारों/मीडिया के अधिकारों पर चिंता जताई गई है, वहीं दूसरी ओर अखंडता और संप्रभुता का राष्ट्रीय हित है। ऐसे में काउंसिल का मानना है कि उसे शीर्ष अदालत के समक्ष अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करना चाहिए। पीसीआई की ओर से इस बारे में सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप करने की मांग की गई है।

इस बीच प्रेस एसोसिएशन के प्रेजिडेंट और प्रेस काउंसिल के मेंबर जयशंकर गुप्ता ने इस निर्णय को मनमाना बताते हुए कहा कि प्रेस काउंसिल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक संस्था है और यह सरकार का टूल नहीं बन सकती है। वहीं, अन्य सदस्यों का कहना है कि दिल्ली के पत्रकार पीसीआई की इस याचिका के खिलाफ हैं और वे चेयरमैन के साथ नहीं हैं।

सदस्यों का कहना है कि पीसीआई ने सुप्रीम कोर्ट का रुख करने से पूर्व उन्हें औपचारिक रूप से कोई जानकारी नहीं दी और न ही यह विषय एजेंडा में शामिल था। नियमों के मुताबिक इस तरह का निर्णय लेने से पूर्व काउंसिल को सूचित किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट जाने का निर्णय लेना चेयरमैन का अपना दृष्टिकोण हो सकता है, लेकिन यह काउंसिल का दृष्टिकोण नहीं है। इन सदस्यों का कहना है, ‘काउंसिल के सद्स्यों की 22 अगस्त को हुई बैठक में इस याचिका के बारे में कोई निर्णय नहीं लिया गया था।’

जयशंकर गुप्ता ने काउंसिल के एक अन्य सदस्य और प्रेस एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी सीके नायक के साथ एक बयान जारी करते हुए कहा कि याचिका दायर करने में प्रेस काउंसिल के चेयरमैन के कदम पर प्रेस एसोसिशशन ने गंभीर रुख अपनाया है। दोनों सदस्यों ने इस बात पर भी काफी आश्चर्य जताया है कि इस मामले में काउंसिल को भरोसे में नहीं लिया गया।

वहीं, प्रेस काउंसिल के चेयरमैन और सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस (रिटायर्ड) सीके प्रसाद का कहना है कि देश में पत्रकारिता की सुरक्षा के लिए काउंसिल ने यह कदम उठाया। काउंसिल के सदस्यों को इस बारे में भरोसे में न लिए जाने के बारे में उनका कहना था कि आवेदन 15 दिन पहले दायर किया गया था, क्योंकि यह मामला अदालत के सामने एक-दो दिन में आना था और इतनी जल्दी काउंसिल की बैठक बुलाना संभव नहीं था। उन्होंने कहा कि इमरजेंसी में चेयरमैन को यह अधिकार है कि वह इस तरह के निर्णय ले सकता है और यह जरूरी नहीं है कि हर समय काउंसिल की मीटिंग बुलाई जाए।


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