भारत की मीडिया और एडवर्टाइजिंग इंडस्ट्री में CCI की जांच के बीच TAI और तीन Debenture Trustees पर आए ताजा Cartel Order से Media Agencies की चिंता बढ़ गई है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
इमरान फजल, असिसटेंट एडिटर ।।
भारत की मीडिया व ऐडवर्टाइजिंग इंडस्ट्री में भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग यानी CCI की चल रही जांच के बीच Trustees’ Association of India (TAI) और तीन Debenture Trustees के खिलाफ आया ताजा Cartel Order अब मीडिया एजेंसीज के लिए भी चिंता बढ़ाने वाला माना जा रहा है। इस मामले में CCI ने TAI, IDBI Trusteeship Services, Axis Trustee Services और SBI CAP Trustee Company को सेवाओं की फीस तय करने और उस तय व्यवस्था को लागू कराने के मामले में दोषी पाया है।
हालांकि, CCI ने इस मामले में कोई Monetary Penalty यानी आर्थिक जुर्माना नहीं लगाया है। रेगुलेटर ने संबंधित पक्षों की परिस्थितियों और कुछ Mitigating Circumstances को देखते हुए उन्हें ऐसा आचरण बंद करने का आदेश दिया है। लेकिन इस आदेश का असर सिर्फ Financial Sector तक सीमित नहीं माना जा रहा है। इसकी वजह यह है कि CCI ने साफ कर दिया है कि किसी इंडस्ट्री एसोसिएशन का इस्तेमाल प्रतिस्पर्धी कंपनियों के बीच कीमतों को लेकर सामूहिक फैसला लेने के लिए किया जाता है, तो वह Competition Law से बचने की ढाल नहीं बन सकता।
यही बात भारत की मीडिया एजेंसीज के लिए महत्वपूर्ण हो जाती है। ऐडवर्टाइजिंग इंडस्ट्री में Commission, Rebate, Discount और दूसरे Commercial Terms को लेकर पहले से CCI की जांच चल रही है। ऐसे में TAI मामले का फैसला यह संकेत देता है कि रेगुलेटर किसी Industry Practice को Cartel का सबूत मानने के लिए किन चीजों पर ध्यान दे सकता है।
सिर्फ बातचीत नहीं, उसके बाद क्या हुआ यह भी अहम
2 सितंबर को जारी CCI के आदेश में एक महत्वपूर्ण बात सामने आई है। रेगुलेटर ने सिर्फ यह नहीं देखा कि अलग-अलग कंपनियों ने Pricing को लेकर आपस में बातचीत की थी या नहीं। उसने यह भी देखा कि बातचीत के बाद उस व्यवस्था को लागू कैसे किया गया।
CCI के मुताबिक, मार्च 2021 में TAI के सदस्यों ने Listed Debt Securities से जुड़ी सेवाओं के लिए एक Benchmark Pricing Structure पर सहमति बनाई थी। जांच में पाया गया कि यह Benchmark असल में एक तरह का Minimum Price या Floor बन गया था। Association की तरफ से यह सुनिश्चित करने की कोशिश भी की गई कि कोई सदस्य इससे कम कीमत पर अपनी सेवा न दे।
मामला तब और गंभीर हो गया जब CCI को ऐसे सबूत मिले कि TAI ने केवल Benchmark तय करने तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि इसके पालन को लेकर भी हस्तक्षेप किया।
एक मामले में MITCON ने HUDCO के एक Mandate के लिए कम फीस का Quote दिया था। आरोप के मुताबिक, TAI ने इस मामले में हस्तक्षेप किया और Trustee ने अपनी कम बोली वापस लेकर उससे ज्यादा कीमत का नया Quote दिया। CCI ने इसे इस बात के सबूत के तौर पर देखा कि Benchmark सिर्फ एक Recommendation नहीं था, बल्कि उसे लागू भी कराया जा रहा था।
यही फर्क मीडिया Industry की जांच में भी बेहद महत्वपूर्ण हो सकता है।
मीडिया एजेंसीज की जांच में क्यों महत्वपूर्ण है TAI का मामला?
ऐडवर्टाइजिंग इंडस्ट्री में CCI पहले से ही बड़ी मीडिया एजेंसीज के बीच कथित Coordination की जांच कर रहा है। मार्च 2025 में CCI ने कई Agency Offices और Industry Bodies पर कार्रवाई की थी। इनमें Advertising एजेंसीज Association of India यानी AAAI, Indian Society of Advertisers यानी ISA और Indian Broadcasting and Digital Foundation यानी IBDF भी शामिल थे।
यह जांच CCI के Leniency Framework के तहत मिली जानकारियों के बाद शुरू हुई थी। इस मामले में Dentsu की ओर से भी disclosures किए जाने की बात सामने आई थी।
जांच के दौरान CCI ने Senior Agency Executives के बीच हुई WhatsApp बातचीत और Meetings की भी पड़ताल की। शुरुआती जांच में आरोप लगाया गया कि कुछ प्रतिस्पर्धी एजेंसीज ने Clients को दिए जाने वाले जवाब, Pitches और Pricing को लेकर आपस में Coordination किया और एक-दूसरे से कम कीमत पर Quote नहीं करने जैसी व्यवस्था पर सहमति बनाई।
जांच में Rebates और ऐसे Commercial Arrangements को लेकर भी बातचीत का जिक्र किया गया, जिनका पालन नहीं करने वाली एजेंसीज पर दबाव डालने की बात सामने आई थी।
ऐसे में TAI का फैसला मीडिया एजेंसीज के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि CCI अब यह देखने पर ज्यादा ध्यान दे सकता है कि एजेंसीज ने सिर्फ आपस में बातचीत की थी या उस बातचीत के बाद वास्तव में अपने Commercial Decisions को एक-दूसरे के हिसाब से बदल दिया था।
WhatsApp Messages बन सकते हैं बड़ा सबूत
मीडिया Cartel Investigation में Digital Communication भी एक अहम मुद्दा है। CCI की शुरुआती सामग्री में प्रतिस्पर्धी एजेंसीज के Senior Executives के बीच WhatsApp Group में हुई बातचीत की जांच का भी जिक्र है।
बताया गया कि इन बातचीत में Pitches, Client Responses और Commercial Terms जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई थी। CCI ने शुरुआती तौर पर इसे Competing Advertising एजेंसीज के बीच संभावित "Alignment" से जोड़कर देखा।
Cartel की जांच में यह अंतर काफी महत्वपूर्ण है। किसी इंडस्ट्री एसोसिएशन की तरफ से जारी कोई सामान्य Guideline यह कहकर बचाई जा सकती है कि वह सिर्फ Industry Recommendation थी। लेकिन अगर WhatsApp बातचीत में प्रतिस्पर्धी कंपनियां यह तय करती दिखाई दें कि वे कितना Charge करेंगी, कितना Discount देंगी या किसी खास Client के सामने किस तरह का Commercial Proposal रखेंगी, तो इसे Coordination के सबूत के तौर पर देखा जा सकता है।
एक Competition Lawyer के मुताबिक, अब असली सवाल यह होगा कि बातचीत में सिर्फ अलग-अलग Businesses ने अपनी राय साझा की थी या बातचीत के बाद कोई Agreement हुआ और फिर उसके मुताबिक व्यवहार भी किया गया।
अगर Agreement और उसके बाद उसी के अनुरूप Conduct साबित हो जाता है, तो "यह तो Industry Practice थी" वाला बचाव कमजोर पड़ सकता है।
‘Industry Practice’ का बचाव भी मुश्किल हो सकता है
TAI मामले से मीडिया Industry के लिए सबसे बड़ा सबक यही निकलता है। Trustees ने अपने Pricing Structure को बढ़ी हुई रेगुलेटरy Responsibilities और SEBI के साथ उनकी भूमिका से जोड़कर देखा था। लेकिन CCI ने यह तर्क स्वीकार नहीं किया कि रेगुलेटरy Oversight की वजह से प्रतिस्पर्धी Trustees को मिलकर अपनी कीमत तय करने की अनुमति मिल जाती है।
इसका असर ऐडवर्टाइजिंग इंडस्ट्री में भी पड़ सकता है। मीडिया एजेंसीज यह तर्क दे सकती हैं कि कुछ Common Commercial Practices एजेंसीज, Advertisers, Broadcasters और इंडस्ट्री एसोसिएशनs के बीच चर्चा से विकसित हुई थीं।
लेकिन CCI के सामने असली सवाल इससे अलग हो सकता है।
क्या Industry Body ने एजेंसीज को आपस में Coordination करने के लिए कहा था, या एजेंसीज ने खुद यह तय किया था कि वे एक-दूसरे के साथ Coordination करेंगी?
अगर दूसरी स्थिति साबित होती है, तो किसी Industry Body या रेगुलेटरy Environment की मौजूदगी उन्हें Competition Law से सुरक्षा नहीं दे सकती।
Price Fixing से ज्यादा गंभीर हो सकता है Enforcement
TAI Order का शायद सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा सिर्फ Benchmark Pricing नहीं, बल्कि उसके पालन को लेकर हुई Monitoring और Enforcement है।
CCI ने पाया कि TAI ने यह सुनिश्चित करने की कोशिश की कि उसके Members Benchmark का पालन करें। जब किसी Member ने तय सीमा से कम Quote किया, तो हस्तक्षेप भी किया गया।
मीडिया Industry की जांच में भी ऐसी ही बातें सामने आने का दावा किया गया है। CCI के दस्तावेजों में कथित तौर पर ऐसे प्रयासों का जिक्र है, जिनके तहत तय Commercial Positions का पालन नहीं करने वाली एजेंसीज को Business से दूर रखने या उन पर दबाव बनाने की कोशिश की गई।
अगर CCI इस तरह के Conduct को साबित कर देता है, तो TAI मामले और मीडिया Cartel Investigation के बीच समानता और मजबूत हो सकती है।
Experts के मुताबिक, सिर्फ Price Fixing का आरोप एक बात है, लेकिन अगर यह भी साबित हो जाए कि प्रतिस्पर्धी कंपनियों ने मिलकर उस कंपनी को रोकने की कोशिश की जो तय व्यवस्था से हट रही थी, तो मामला ज्यादा गंभीर हो जाता है।
इससे यह संकेत मिल सकता है कि मकसद सिर्फ Industry Consensus बनाना नहीं था, बल्कि पूरे Market के व्यवहार को बदलना था।
Smaller मीडिया एजेंसीज पर भी पड़ सकता है असर
इस मामले का एक और महत्वपूर्ण पहलू Smaller और Independent मीडिया एजेंसीज से जुड़ा है।
मीडिया Cartel Investigation में बड़ी एजेंसीज के अलावा ऐसी एजेंसीज से जुड़े कथित Conduct पर भी ध्यान दिया गया है जो सबसे बड़े Networks का हिस्सा नहीं हैं। ऐसे में TAI-HUDCO मामले की तरह यह भी देखा जा सकता है कि क्या बड़ी एजेंसीज ने छोटी या Independent एजेंसीज को कम कीमत पर Commercial Offer देने से रोकने की कोशिश की।
अगर कोई छोटी Agency किसी Client को ज्यादा Aggressive Commercial Proposal देती है और बड़ी एजेंसीज मिलकर उसे मीडिया Inventory या Clients तक पहुंचने से रोकने की कोशिश करती हैं, तो CCI इसे Competition को Restrict करने के प्रयास के रूप में देख सकता है।
इस स्थिति में मामला सिर्फ Price Coordination तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि Market Competition को प्रभावित करने का सवाल भी उठ सकता है।
सिर्फ कंपनियां ही नहीं, Executives पर भी नजर
मीडिया एजेंसीज के लिए TAI Order का एक और महत्वपूर्ण पहलू Individual Executives की जिम्मेदारी से जुड़ा है।
CCI ने इस मामले में कुछ Individuals को Competition Act की Section 48 के तहत जिम्मेदार माना है, जहां उनके Anti-Competitive Conduct में शामिल होने और उनकी भूमिका स्थापित हुई।
इसका मतलब यह है कि अगर मीडिया Cartel Investigation में भी Cartel Conduct साबित होता है, तो जांच सिर्फ Agency की Corporate Entity तक सीमित नहीं रह सकती।
Investigators यह भी देख सकते हैं कि बातचीत किसने शुरू की, Commercial Position को किसने मंजूरी दी, Competitors के साथ किसने बातचीत की और किसी Agreement को लागू कराने में किसकी भूमिका रही।
इस वजह से Senior Agency Executives के लिए अनौपचारिक बातचीत भी भविष्य में ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकती है।
CCI ने जुर्माना नहीं लगाया, लेकिन मीडिया एजेंसीज को राहत मानना ठीक नहीं
TAI मामले में CCI ने Monetary Penalty नहीं लगाई है। पहली नजर में यह मीडिया एजेंसीज के लिए राहत जैसी बात लग सकती है, लेकिन इसे भविष्य के मामले का संकेत मानना सही नहीं होगा।
CCI ने TAI मामले में Penalty नहीं लगाने के पीछे कई Mitigating Circumstances का उल्लेख किया। इनमें संबंधित अवधि में Association की Income नहीं होना, कुछ Trustees की ओर से Benchmark से कम Fees लेना और जांच में Cooperation करना शामिल था।
किसी बड़े Advertising Network का मामला इससे काफी अलग हो सकता है। अगर CCI भविष्य में किसी मीडिया Cartel को लंबे समय तक चलने वाला और बड़ी Revenue से जुड़ा Coordination साबित करता है, तो परिस्थितियां अलग हो सकती हैं।
इसके अलावा Financial Penalty ही एकमात्र जोखिम नहीं है। Cartel साबित होने पर एजेंसीज को Reputational Damage, प्रभावित Clients की तरफ से Litigation, Commercial Contracts की जांच और Commission, Rebates तथा मीडिया Buying Arrangements के तरीके में बड़े बदलाव का सामना करना पड़ सकता है।
CCI का संदेश मीडिया Industry के लिए भी साफ
TAI का यह आदेश भारत की Advertising और मीडिया Industry के लिए एक बड़ा संकेत माना जा सकता है। किसी इंडस्ट्री एसोसिएशन का Meeting Room कंपनियों को Competition Law से Immunity नहीं दे सकता।
अगर एजेंसीज अपने Prices, Discounts और Commercial Strategies स्वतंत्र रूप से तय करती हैं, तो Competition बनी रहती है। लेकिन अगर प्रतिस्पर्धी एजेंसीज मिलकर इन Terms को तय करती हैं और फिर किसी Association, WhatsApp Group, Broadcaster Relationship या किसी दूसरे माध्यम से यह सुनिश्चित करने की कोशिश करती हैं कि सभी उसी व्यवस्था का पालन करें, तो Conduct की कानूनी स्थिति पूरी तरह बदल सकती है।
इसलिए मीडिया एजेंसीज के लिए CCI की मौजूदा जांच का अगला चरण काफी अहम होने वाला है। रेगुलेटर के लिए सिर्फ यह साबित करना काफी नहीं होगा कि एजेंसीज के बीच बातचीत हुई थी। उसे यह भी स्थापित करना होगा कि कोई Agreement हुआ था या नहीं, उसमें कौन-कौन शामिल थे, उसे किस तरह लागू किया गया और उसका Competition पर क्या असर पड़ा।
अब मीडिया Industry के सामने असली सवाल सिर्फ यह नहीं है कि एजेंसीज ने Pricing पर चर्चा की थी या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या कोई ऐसा सबूत है जिससे यह साबित हो सके कि एजेंसीज ने कीमत पर आपस में सहमति बनाई और फिर यह भी सुनिश्चित किया कि बाकी खिलाड़ी उसी नियम के मुताबिक काम करें।
अगर ऐसा साबित होता है, तो TAI मामले में CCI की ओर से अपनाया गया दृष्टिकोण मीडिया Cartel Investigation के लिए बेहद महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।
अगर आप चाहें, तो इसी खबर के लिए मैं और ज्यादा दमदार, एक्सक्लूसिव और न्यूज़ पोर्टल वाली 8-10 हेडलाइन भी बना सकता हूं।
सरबजीत घडियोक को सोडेक्सो में हेड ऑफ मार्केटिंग नियुक्त किया गया है। वह मार्केटिंग पहलों का नेतृत्व करने के साथ संगठन की ग्रोथ और बिजनेस उद्देश्यों में योगदान देंगे।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
सरबजीत घडियोक (Sarbjeet Ghadiok) को सोडेक्सो (Sodexo) में हेड ऑफ मार्केटिंग (Head of Marketing) नियुक्त किया गया है। नई भूमिका में वह मार्केटिंग से जुड़ी पहलों का नेतृत्व करेंगे और संगठन की ग्रोथ व बिजनेस उद्देश्यों में योगदान देंगे।
घडियोक ने लिंक्डइन (LinkedIn) पर पोस्ट के जरिए अपनी नई जिम्मेदारी की जानकारी साझा की। उन्होंने कहा कि उन्होंने सोडेक्सो में हेड ऑफ मार्केटिंग के रूप में नई जिम्मेदारी संभाली है।
सोडेक्सो से पहले घडियोक टैबूला (Taboola) में सीनियर क्लाइंट पार्टनर (Sr. Client Partner) के पद पर कार्यरत थे। नई भूमिका को लेकर उन्होंने कहा कि वह संगठन के लिए वैल्यू बढ़ाने और सोडेक्सो की निरंतर ग्रोथ में योगदान देने पर काम करेंगे।
घडियोक ने इस नए प्रोफेशनल अध्याय को लेकर उत्साह जताया और सोडेक्सो के साथ आगे की यात्रा में योगदान देने की इच्छा व्यक्त की।
सरकार ने साफ कर दिया है कि मोबाइल फोन और दूसरे उपकरण बनाने वाली कंपनियों के लिए अपने डिवाइस में D2M तकनीक से जुड़ी चिप लगाना या डिवाइस को D2M के अनुकूल बनाना अनिवार्य नहीं होगा।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
इमरान फजल, असिसटेंट एडिटर, एक्सचेंज4मीडिया ।।
भारत में डायरेक्ट-टू-मोबाइल यानी D2M प्रसारण को व्यावसायिक रूप से शुरू करने की दिशा में सरकार आगे बढ़ रही है। हालांकि, सरकार ने साफ कर दिया है कि मोबाइल फोन और दूसरे उपकरण बनाने वाली कंपनियों के लिए अपने डिवाइस में D2M तकनीक से जुड़ी चिप लगाना या डिवाइस को D2M के अनुकूल बनाना अनिवार्य नहीं होगा। यानी फिलहाल कंपनियों के लिए D2M को अपनाना पूरी तरह स्वैच्छिक रहेगा।
इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने सुझाव दिया है कि डिवाइस बनाने वाली कंपनियों के लिए D2M सुविधा स्वैच्छिक रखी जाए। इसका मतलब है कि स्मार्टफोन और दूसरे संबंधित उपकरणों में इस तकनीक को अनिवार्य करने की सरकार की योजना नहीं है।
यह फैसला D2M के व्यावसायिक इस्तेमाल को लेकर लंबे समय से चल रही चर्चा के एक अहम सवाल का जवाब देता है। इंडस्ट्री में यह इंतजार था कि क्या सरकार भविष्य में मोबाइल और अन्य डिवाइस बनाने वाली कंपनियों को D2M सपोर्ट देना अनिवार्य करेगी।
470-582 MHz स्पेक्ट्रम बैंड को मंजूरी
सूचना और प्रसारण मंत्रालय (MIB) ने D2M प्रस्ताव को सीधे केंद्रीय मंत्रिमंडल के सामने रखने के बजाय इसे सचिवों की समिति (Committee of Secretaries-CoS) के पास भेजा था। इस समिति में दूरसंचार विभाग (DoT), MeitY, अंतरिक्ष विभाग (DoS) और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के प्रतिनिधि शामिल हैं।
समिति ने D2M प्रसारण के लिए 470-582 MHz स्पेक्ट्रम बैंड के इस्तेमाल को मंजूरी दे दी है। इसके साथ ही इसे लागू करने के लिए पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल को भी मंजूरी दी गई है। इससे D2M को व्यावसायिक रूप से आगे बढ़ाने के लिए एक नीतिगत ढांचा तैयार हो गया है।
अब सरकारी प्रसारक प्रसार भारती टेंडर की प्रक्रिया की तरफ बढ़ने की तैयारी कर रहा है। माना जा रहा है कि अगले एक महीने में रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (RFP) जारी किया जा सकता है।
डिवाइस कंपनियों के लिए D2M पूरी तरह स्वैच्छिक
प्रसार भारती के सीईओ गौरव द्विवेदी ने बताया कि सरकार ने यह साफ कर दिया है कि डिवाइस कंपनियों के लिए D2M अनिवार्य नहीं होगा।
उन्होंने कहा कि डिवाइस बनाने वाली कंपनियों पर D2M सिग्नल सपोर्ट करने या D2M तकनीक वाले डिवाइस बनाने की कोई बाध्यता नहीं है। यह पूरी तरह स्वैच्छिक है। कुछ कंपनियां पहले ही ऐसे डिवाइस के प्रोटोटाइप बना चुकी हैं, जो D2M सिग्नल हासिल कर सकते हैं। अगर बाजार में मांग बढ़ती है तो दूसरी कंपनियां भी इस तकनीक को अपनाएंगी।
इसका मतलब यह है कि सरकार शुरुआत में स्मार्टफोन और दूसरे डिवाइस निर्माताओं पर कोई नियामकीय दबाव नहीं डालना चाहती। अब D2M का इकोसिस्टम उपभोक्ताओं की मांग, प्रसारकों की भागीदारी, D2M वाले डिवाइस की उपलब्धता और कारोबारी फायदे के आधार पर विकसित होने की उम्मीद है।
DPR का काम लगभग पूरा
गौरव द्विवेदी के मुताबिक अब अगला कदम डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट (DPR) को अंतिम रूप देना और उसके बाद RFP जारी करना है। DPR का काम लगभग पूरा हो चुका है और उसका ड्राफ्ट प्रसार भारती को सौंप दिया गया है। उन्होंने कहा कि RFP तैयार किया जा रहा है और इसे अक्टूबर के अंत तक जारी किया जा सकता है।
यह RFP D2M के लिए काफी अहम माना जा रहा है, क्योंकि इस तकनीक पर कई साल से काम और परीक्षण चल रहे हैं। RFP के जरिए यह साफ होने की उम्मीद है कि परियोजना का व्यावसायिक ढांचा किस तरह होगा और निजी कंपनियों की इसमें क्या भूमिका होगी।
क्या है D2M तकनीक?
D2M ऐसी तकनीक है, जिसके जरिए टेलीविजन और दूसरे प्रसारण कंटेंट को सीधे मोबाइल फोन और दूसरे D2M-सक्षम डिवाइस तक पहुंचाया जा सकता है। इसके लिए मोबाइल डेटा या इंटरनेट कनेक्शन पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं होती। यानी अगर किसी डिवाइस में D2M की सुविधा मौजूद है तो उसमें प्रसारण कंटेंट सीधे प्रसारण नेटवर्क के जरिए पहुंचाया जा सकता है।
इस तकनीक का इस्तेमाल खास तौर पर लाइव टीवी, खेल और दूसरे बड़े कार्यक्रमों के प्रसारण में किया जा सकता है। इससे मोबाइल नेटवर्क पर पड़ने वाला डेटा ट्रैफिक कम करने में भी मदद मिल सकती है।
डिवाइस सपोर्ट स्वैच्छिक होने से इंडस्ट्री में चिंता
हालांकि सरकार के इस फैसले को लेकर इंडस्ट्री के कुछ हिस्सों में चिंता भी है। कुछ प्रसारकों और इंडस्ट्री से जुड़े अधिकारियों का मानना है कि अगर डिवाइस कंपनियों के लिए D2M सपोर्ट अनिवार्य नहीं होगा तो बड़ी संख्या में D2M-सक्षम डिवाइस बाजार में लाना मुश्किल हो सकता है।
इंडस्ट्री से जुड़े एक अधिकारी के मुताबिक, सबसे बड़ी चुनौती D2M-सक्षम डिवाइस का पर्याप्त बड़ा आधार तैयार करना होगी। उनका कहना है कि अगर कंपनियों के लिए D2M सपोर्ट देना जरूरी नहीं है और ग्राहक भी अभी इस सुविधा की मांग नहीं कर रहे हैं तो डिवाइस निर्माता अपने उत्पादों में इसके लिए अतिरिक्त हार्डवेयर जोड़ने में तुरंत रुचि नहीं दिखा सकते।
इससे एक तरह की ‘चिकन एंड एग’ वाली स्थिति बन सकती है। प्रसारकों को कंटेंट और बुनियादी ढांचे में निवेश के लिए बड़ी संख्या में D2M डिवाइस चाहिए होंगे, जबकि डिवाइस कंपनियां तभी बड़े स्तर पर इस तकनीक को अपनाना चाहेंगी जब उन्हें इसमें पर्याप्त कारोबारी अवसर दिखाई देगा।
स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म से भी होगी चुनौती
D2M को पहले से मौजूद मोबाइल ब्रॉडबैंड, कनेक्टेड टीवी और ओटीटी प्लेटफॉर्म से भी मुकाबला करना होगा। इन तकनीकों का इस्तेमाल उपभोक्ता पहले से बड़े स्तर पर कर रहे हैं। ऐसे में D2M की सफलता इस बात पर काफी निर्भर करेगी कि प्रसारक और पूरी D2M इंडस्ट्री उपभोक्ताओं के सामने इस तकनीक का कितना मजबूत फायदा पेश कर पाती है।
अगर लोगों को D2M के इस्तेमाल का कोई खास फायदा नजर नहीं आता है तो मोबाइल कंपनियां भी इसे प्राथमिकता देने से बच सकती हैं। खासकर स्मार्टफोन बाजार में कंपनियां पहले से ही डिवाइस की लागत को नियंत्रित करने और दूसरे फीचर्स के जरिए अपने उत्पादों को अलग दिखाने पर ध्यान देती हैं।
चिपसेट और ऐप की उपलब्धता भी अहम
इंडस्ट्री से जुड़े लोगों का कहना है कि D2M की सफलता सिर्फ स्पेक्ट्रम और प्रसारण ढांचे पर निर्भर नहीं करेगी। इसके लिए D2M-सक्षम चिपसेट, डिवाइस और एप्लिकेशन की उपलब्धता भी जरूरी होगी।
अगर अलग-अलग कंपनियों के डिवाइस में D2M सपोर्ट का स्तर अलग-अलग रहा तो प्रसारकों की पहुंच सीमित हो सकती है। इससे निजी कंपनियों के लिए भी इस तकनीक में निवेश करने का आकर्षण कम हो सकता है।
हालांकि सरकार फिलहाल बाजार के जरिए D2M को आगे बढ़ाने पर भरोसा कर रही है। पहले से तैयार D2M-सक्षम डिवाइस के प्रोटोटाइप शुरुआती आधार तैयार कर सकते हैं। इसके बाद अगर उपभोक्ताओं की मांग बढ़ती है तो ज्यादा कंपनियां D2M सपोर्ट वाले डिवाइस बाजार में ला सकती हैं।
अब प्रसार भारती की नजर RFP पर
प्रसार भारती के लिए फिलहाल सबसे बड़ा काम DPR को पूरा करना और RFP जारी करना है। इस टेंडर से परियोजना के व्यावसायिक ढांचे, निजी कंपनियों की भूमिका और बड़े स्तर पर D2M सेवाएं शुरू करने के तरीके को लेकर ज्यादा स्पष्टता मिलने की उम्मीद है।
प्रसारक, टेक्नोलॉजी कंपनियां और डिवाइस निर्माता भी इस RFP पर नजर रखेंगे। इसकी वजह यह है कि इससे काफी हद तक यह तय हो सकता है कि D2M सरकारी परीक्षणों और प्रयोगों से आगे बढ़कर एक व्यावसायिक रूप से टिकाऊ प्रसारण प्लेटफॉर्म बन पाता है या नहीं।
सरकार का D2M को अनिवार्य नहीं करने का फैसला डिवाइस निर्माताओं के लिए एक नियामकीय बाधा जरूर कम करता है, लेकिन इसके साथ ही इंडस्ट्री पर इस तकनीक की मांग पैदा करने की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है।
स्पेक्ट्रम आवंटन को मंजूरी, PPP मॉडल को हरी झंडी और DPR के लगभग पूरा होने के साथ D2M अब एक अहम चरण में पहुंच गया है। इसकी असली सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि प्रस्तावित व्यावसायिक मॉडल प्रसारकों, टेक्नोलॉजी कंपनियों और डिवाइस निर्माताओं को D2M के इकोसिस्टम में निवेश के लिए कितना तैयार कर पाता है।
दिल्ली पुलिस की ओर से धरना-प्रदर्शन कवर करने वाले पत्रकारों के लिए जारी गाइडलाइंस को लेकर वरिष्ठ पत्रकार सुमित अवस्थी ने सवाल उठाए हैं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
दिल्ली पुलिस की ओर से धरना-प्रदर्शन कवर करने वाले पत्रकारों के लिए जारी गाइडलाइंस को लेकर वरिष्ठ पत्रकार सुमित अवस्थी ने सवाल उठाए हैं। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर दिल्ली पुलिस की पोस्ट को साझा करते हुए पूछा कि अगर पत्रकारों के लिए प्रदर्शन कवर करने को लेकर दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं, तो पुलिसकर्मियों के लिए भी ऐसी गाइडलाइन होनी चाहिए कि वे पत्रकारों को अपना काम करने दें।
सुमित अवस्थी ने दिल्ली पुलिस की पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा, “दिल्ली पुलिस ने धरना-प्रदर्शन कवर करने वाले पत्रकारों के लिये गाइडलाइंस जारी कीं… बहुत धन्यवाद 🙏!! पुलिसवालों के लिये क्या गाइडलाइन होंगी पत्रकारों को काम करने देने के लिये?? ये भी बताना चाहिये था….”
उन्होंने अपने पोस्ट में आगे कुछ ऐसे मुद्दे भी उठाए, जिन्हें लेकर उन्होंने सवाल किया है कि क्या प्रदर्शन के दौरान ऐसी चीजें पत्रकारों और प्रदर्शनकारियों के साथ इस्तेमाल या की जानी चाहिए।
सुमित अवस्थी ने सवाल करते हुए लिखा, “वैसे क्या ये सब मान्य है??” इसके बाद उन्होंने नुकीली कीलों वाले डंडे, सादी वर्दी में तैनात ‘गुंडे’, पैलेट गन, लाठियां, बिना नेमप्लेट वाले पुलिसकर्मी और अनुचित तरीके से पत्रकारों और प्रदर्शनकारियों को छूने या टच करने का जिक्र किया।
दिल्ली पुलिस ने धरना-प्रदर्शन कवर करने वाले पत्रकारों के लिये गाइडलाइंस जारी कीं… बहुत धन्यवाद 🙏!! पुलिसवालों के लिये क्या गाइडलाइन होंगी पत्रकारों को काम करने देने के लिये?? ये भी बताना चाहिये था …. वैसे क्या ये सब 👇 allowed है ??— - नुकीली कीलों वाले डंडे / सादी वर्दी में तैनात ‘गुंडे’/ पैलेट गन / लाठियां / बगैर नेमप्लेट वाले पुलिस वाले / अनुचित तरीके से पत्रकारों और प्रदर्शनकारियों को छूना या touch करना … .??
— awasthis (@awasthis) October 5, 2026
उनका यह पोस्ट ऐसे समय आया है, जब दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन कवर करने वाले पत्रकारों को लेकर कुछ दिशा-निर्देश जारी किए हैं। पुलिस ने पत्रकारों से वैध पहचान पत्र साथ रखने और उसे स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करने की सलाह दी है।
पुलिस की गाइडलाइंस में कहा गया है कि प्रदर्शन स्थल पर मौजूद पत्रकारों की पहचान आसानी से हो सके, इसके लिए उन्हें अपने संबंधित मीडिया संस्थान का वैध पहचान पत्र और/या वैध PIB/DIP मान्यता कार्ड साथ रखना चाहिए और उसे हर समय स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करना चाहिए।
इसके अलावा पत्रकारों से यह भी कहा गया है कि उनकी मौजूदगी या गतिविधियों से पुलिस की कार्रवाई या कानून-व्यवस्था संभाल रहे कर्मचारियों की आवाजाही में किसी तरह की रुकावट नहीं आनी चाहिए।
दिल्ली पुलिस ने तनावपूर्ण स्थिति में पत्रकारों को उचित और सुरक्षित दूरी बनाए रखने की सलाह भी दी है। पुलिस के मुताबिक, कवरेज और रिकॉर्डिंग के दौरान पत्रकारों को ऐसी स्थिति में रहना चाहिए जिससे वे प्रदर्शनकारियों से अलग स्पष्ट रूप से नजर आएं और अपनी सुरक्षा का भी ध्यान रख सकें।
इसी गाइडलाइन को लेकर सुमित अवस्थी ने पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा है कि पत्रकारों को भी अपना काम करने का मौका मिलना चाहिए और इस संबंध में पुलिसकर्मियों के लिए भी स्पष्ट दिशा-निर्देश होने चाहिए।
उन्होंने अपने पोस्ट में जिन नुकीली कीलों वाले डंडों, पैलेट गन, लाठियों, बिना नेमप्लेट वाले पुलिसकर्मियों और पत्रकारों या प्रदर्शनकारियों को अनुचित तरीके से छूने जैसे मामलों का जिक्र किया है, उन्हें सवाल के रूप में उठाया है।
दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन और विरोध-प्रदर्शनों को कवर करने वाले पत्रकारों के लिए कुछ जरूरी दिशा-निर्देश जारी किए हैं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन और विरोध-प्रदर्शनों को कवर करने वाले पत्रकारों के लिए कुछ जरूरी दिशा-निर्देश जारी किए हैं। पुलिस ने कहा है कि किसी भी खबर को कवर करना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी यह भी है कि पत्रकार सुरक्षित तरीके से अपना काम करें। दिल्ली पुलिस ने पत्रकारों से अपनी पहचान स्पष्ट रखने और पुलिस की कार्रवाई में किसी तरह की रुकावट न डालने की अपील की है।
दिल्ली पुलिस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर कहा, “कहानी महत्वपूर्ण है, लेकिन उसे कवर करने का तरीका भी उतना ही महत्वपूर्ण है।” इसके साथ ही प्रदर्शन कवर करने वाले पत्रकारों के लिए कुछ गाइडलाइंस साझा की गई हैं।
वैध पहचान पत्र जरूर रखें
दिल्ली पुलिस ने कहा है कि प्रदर्शन कवर करने के लिए मौके पर जाने वाले सभी पत्रकार अपने संबंधित मीडिया संस्थान की ओर से जारी वैध पहचान पत्र जरूर साथ रखें। यदि यह नहीं है तो पत्रकारों के पास वैध PIB या DIP मान्यता कार्ड होना चाहिए। पुलिस के मुताबिक, इन पहचान पत्रों से मौके पर मौजूद कानून-व्यवस्था संभालने वाली एजेंसियों के लिए पत्रकारों की पहचान करना आसान होगा।
पहचान पत्र साफ दिखाई देना चाहिए
पुलिस ने पत्रकारों को सलाह दी है कि वे अपना पहचान पत्र हर समय ऐसी जगह लगाकर रखें, जहां वह साफ दिखाई दे। इसका मकसद यह है कि मौके पर मौजूद पुलिस और अन्य कानून-व्यवस्था से जुड़े अधिकारियों को यह आसानी से पता चल सके कि कौन व्यक्ति पत्रकार है।
पुलिस की कार्रवाई में रुकावट न डालें
दिल्ली पुलिस ने पत्रकारों से यह भी कहा है कि प्रदर्शन की कवरेज के दौरान उनकी मौजूदगी या गतिविधियों से पुलिस की कार्रवाई या कानून-व्यवस्था संभाल रहे जवानों की आवाजाही में किसी तरह की रुकावट नहीं आनी चाहिए।यानी पत्रकार अपना काम करते हुए इस बात का ध्यान रखें कि पुलिसकर्मियों के काम में बाधा न पड़े और उन्हें मौके पर कार्रवाई करने या आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त जगह मिले।
तनावपूर्ण स्थिति में सुरक्षित दूरी बनाए रखें
पुलिस ने खास तौर पर तनावपूर्ण परिस्थितियों में पत्रकारों को उचित और सुरक्षित दूरी बनाए रखने की सलाह दी है। प्रदर्शन की कवरेज और रिकॉर्डिंग करते समय पत्रकारों को ऐसी जगह खड़ा होना चाहिए, जहां से वे सुरक्षित तरीके से पूरी स्थिति को कवर कर सकें। साथ ही उनकी स्थिति ऐसी होनी चाहिए जिससे उन्हें प्रदर्शनकारियों से अलग पहचानना आसान हो।
दिल्ली पुलिस के मुताबिक, पत्रकारों को अपनी सुरक्षा का ध्यान रखते हुए इस तरह से कवरेज करनी चाहिए कि वे पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच चल रही कार्रवाई में अनजाने में शामिल न हों।
पत्रकारों की सुरक्षा के साथ कवरेज पर जोर
दिल्ली पुलिस की इन गाइडलाइंस का मकसद प्रदर्शन और तनावपूर्ण परिस्थितियों में पत्रकारों को अपना काम करने के दौरान सुरक्षित रखना और पुलिस की कार्रवाई को सुचारु बनाए रखना है। पुलिस ने पत्रकारों को वैध पहचान पत्र साथ रखने, उसे स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करने, पुलिस की कार्रवाई में बाधा नहीं डालने और तनावपूर्ण स्थिति में सुरक्षित दूरी बनाए रखने की सलाह दी है।
दिल्ली पुलिस ने अपने संदेश के जरिए यह भी स्पष्ट किया है कि खबर को कवर करना महत्वपूर्ण है, लेकिन उसे सुरक्षित और जिम्मेदारी के साथ कवर करना भी उतना ही जरूरी है।
The story matters, So does how you get it! Guidelines for journalists. #DPUpdates #EthicsofJournalism https://t.co/Uu4nguCbJk
— Delhi Police (@DelhiPolice) October 5, 2026
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने निवेशकों को जागरूक करने और निवेश को आसान तरीके से समझाने के लिए ‘समझ से इन्वेस्टिंग सिम्पल' कैंपेन शुरू किया है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने निवेशकों को जागरूक करने और निवेश को आसान तरीके से समझाने के लिए ‘समझ से इन्वेस्टिंग सिम्पल' कैंपेन शुरू किया है। यह कैंपेन Project Jagrook के तहत शुरू किया गया है। इसके साथ ही SEBI ने कॉलेज और विश्वविद्यालय के छात्रों के बीच वित्तीय जागरूकता बढ़ाने के लिए MUST पहल शुरू करने और WhatsApp पर अपनी आधिकारिक मौजूदगी की भी घोषणा की है।
SEBI ने यह कैंपेन 5 अक्टूबर 2026 को चंडीगढ़ स्थित पंजाब यूनिवर्सिटी में शुरू किया। यह कार्यक्रम World Investor Week (WIW) 2026 के मौके पर आयोजित किया गया।
5 से 11 अक्टूबर तक World Investor Week
World Investor Week का यह 10वां संस्करण है। इसका आयोजन हर साल International Organization of Securities Commissions (IOSCO) के तहत किया जाता है। भारत में इस साल World Investor Week 5 से 11 अक्टूबर 2026 तक मनाया जा रहा है। इस साल की थीम ‘समझ से Investing Simple’ रखी गई है।
यह कैंपेन SEBI और उसके सिक्योरिटीज मार्केट पार्टनर्स की ओर से चलाया जा रहा है। इनमें स्टॉक एक्सचेंज BSE, NSE और MCX, डिपॉजिटरी CDSL और NSDL, Association of Mutual Funds in India (AMFI) और National Institute of Securities Markets (NISM) शामिल हैं।
निवेश को आसान तरीके से समझाने पर जोर
‘समझ से Investing Simple’ का मकसद निवेश से जुड़ी जानकारी को आसान बनाना और लोगों को सोच-समझकर निवेश करने के लिए प्रोत्साहित करना है।
कैंपेन के तहत निवेशकों को अलग-अलग निवेश उत्पादों, उनके जोखिम और खूबियों को समझने के लिए जागरूक किया जाएगा। साथ ही निवेशकों से कहा जा रहा है कि वे किसी भी निवेश प्लेटफॉर्म या भुगतान से जुड़ी मांग की प्रामाणिकता जरूर जांचें और उसके बाद ही निवेश का फैसला लें। इसका एक अहम मकसद निवेशकों को वित्तीय धोखाधड़ी से बचाना भी है।
छात्रों के लिए शुरू हुई MUST पहल
SEBI ने वित्तीय साक्षरता और सिक्योरिटीज मार्केट के बारे में छात्रों की समझ बढ़ाने के लिए ‘Mentoring of University/College Students by Trainers (MUST)’ पहल भी शुरू की है।
इस पहल के तहत विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के चुने हुए फैकल्टी, स्टाफ या वरिष्ठ छात्रों को SEBI, उसके सिक्योरिटीज मार्केट पार्टनर्स और NISM की ओर से ट्रेनिंग दी जाएगी। ट्रेनिंग के बाद इन्हें Partner Trainers (PTs) के रूप में प्रमाणित किया जाएगा।
ये Partner Trainers अपने कॉलेज या विश्वविद्यालय में छात्रों को वित्तीय साक्षरता और सिक्योरिटीज मार्केट से जुड़ी बुनियादी जानकारी देंगे। MUST पहल में खास तौर पर बुनियादी वित्तीय जानकारी, सोच-समझकर निवेश करने और वित्तीय धोखाधड़ी से बचाव पर ध्यान दिया जाएगा।
AIU के साथ भी सहयोग
SEBI ने बताया कि वह Association of Indian Universities (AIU) के साथ भी सहयोग कर रहा है। इसका मकसद Project Jagrook और MUST पहल को ज्यादा से ज्यादा विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों तक पहुंचाना है।
छात्रों के लिए MUST पहल के तहत एक इंटरैक्टिव लीफलेट भी जारी किया गया है। इसमें निवेश को एक ट्रेक यानी पहाड़ी यात्रा से जोड़कर समझाया गया है।
इसमें ‘Spot the Differences’ नाम का गेम भी शामिल है, जिसका मकसद छात्रों में निवेश से जुड़ी अच्छी आदतों को बढ़ावा देना है। गाइड में बताया गया है कि निवेश और ट्रेकिंग, दोनों यात्राओं में उतार-चढ़ाव आते हैं और सही तैयारी इनसे बेहतर तरीके से निपटने में मदद करती है।
WhatsApp पर भी SEBI की आधिकारिक मौजूदगी
SEBI ने WhatsApp पर अपनी आधिकारिक मौजूदगी की भी घोषणा की है। इसके जरिए निवेशकों को जागरूकता से जुड़ी जानकारी और संसाधन उपलब्ध कराए जाएंगे।
SEBI ने बताया कि उसका आधिकारिक WhatsApp चैनल 1800 22 7575 के जरिए उपलब्ध है। इसकी पहचान के लिए चैनल पर सत्यापित नीला टिक होगा, ताकि लोग असली और आधिकारिक खाते की पहचान कर सकें।
SEBI का कहना है कि WhatsApp जैसे बड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए निवेश से जुड़ी जागरूकता और जानकारी ज्यादा लोगों तक पहुंचाई जा सकेगी।
कुल मिलाकर, Project Jagrook के तहत शुरू की गई ये पहलें निवेशकों और खासकर युवाओं को निवेश के जोखिम समझने, सही जानकारी के आधार पर फैसला लेने और वित्तीय धोखाधड़ी से बचने के लिए जागरूक करने पर केंद्रित हैं।
SAB इवेंट्स एंड गवर्नेंस नाउ मीडिया लिमिटेड (SAB Events & Governance Now Media Limited) ने बताया है कि उसने मंजूर किए गए रिजॉल्यूशन प्लान के तहत सभी बकाया भुगतान पूरे कर दिए हैं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
SAB इवेंट्स एंड गवर्नेंस नाउ मीडिया लिमिटेड (SAB Events & Governance Now Media Limited) ने बताया है कि उसने मंजूर किए गए रिजॉल्यूशन प्लान के तहत सभी बकाया भुगतान पूरे कर दिए हैं। कंपनी ने यह जानकारी 5 अक्टूबर 2026 को भारतीय स्टॉक एक्सचेंज को दी।
कंपनी के मुताबिक, उसने अनपेड पीपीआईआरपी कॉस्ट (PPIRP Costs), वित्तीय लेनदारों (Financial Creditors) और परिचालन लेनदारों (Operational Creditors) से जुड़ी सभी बकाया रकम का भुगतान तय समयसीमा के भीतर कर दिया है।
NCLT ने 10 जुलाई को मंजूर किया था प्लान
कंपनी ने बताया कि यह भुगतान नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) के 10 जुलाई 2026 के आदेश के तहत मंजूर किए गए रिजॉल्यूशन प्लान के मुताबिक किया गया है।
यह आदेश इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड, 2016 (IBC) की धारा 54K(12) और 54L के साथ धारा 31 तथा इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी बोर्ड ऑफ इंडिया (IBBI) के प्री-पैकेज्ड इंसॉल्वेंसी रिजॉल्यूशन प्रोसेस रेगुलेशंस, 2021 के लागू प्रावधानों के तहत जारी किया गया था।
मॉनिटरिंग कमेटी के मार्गदर्शन में हुआ भुगतान
कंपनी ने कहा कि रिजॉल्यूशन प्लान को लागू करने के तहत ये सभी भुगतान किए गए हैं। इस पूरी प्रक्रिया में NCLT के आदेश के तहत गठित मॉनिटरिंग कमेटी के मार्गदर्शन और निर्देशों का पालन किया गया।
कंपनी के अनुसार, इस तरह उसने मंजूर किए गए रिजॉल्यूशन प्लान में तय किए गए भुगतान संबंधी सभी दायित्वों को पूरा कर लिया है।
कंपनी ने स्टॉक एक्सचेंजों से इस जानकारी को रिकॉर्ड में लेने का अनुरोध किया है। यह जानकारी कंपनी के चेयरमैन एवं मैनेजिंग डायरेक्टर कैलासनाथ मार्कंड अधिकारी की ओर से जारी की गई है।
पैनोरमा स्टूडियोज इंटरनेशनल लिमिटेड की 46वीं सालाना आम बैठक (AGM) में रखे गए सभी 7 प्रस्ताव जरूरी बहुमत के साथ पास हो गए हैं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
पैनोरमा स्टूडियोज इंटरनेशनल लिमिटेड की 46वीं सालाना आम बैठक (AGM) में रखे गए सभी 7 प्रस्ताव जरूरी बहुमत के साथ पास हो गए हैं। कंपनी ने 5 अक्टूबर 2026 को स्टॉक एक्सचेंजों को AGM के मतदान परिणाम और स्क्रूटिनाइजर रिपोर्ट की जानकारी दी।
कंपनी की AGM 30 सितंबर 2026 को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए हुई थी। बैठक दोपहर 3:25 बजे शुरू हुई और 3:43 बजे खत्म हुई। इसमें कुल 48 सदस्य शामिल हुए, जिनमें कंपनी के 2 प्रमोटर भी शामिल थे।
फाइनेंशियल स्टेटमेंट्स को मंजूरी
पहले प्रस्ताव में वित्त वर्ष 2025-26 के फाइनेंशियल स्टेटमेंट्स को मंजूरी देने की बात थी। इस प्रस्ताव के पक्ष में 16,67,21,114 वोट पड़े, जबकि सिर्फ 487 वोट इसके खिलाफ रहे। इस तरह प्रस्ताव को 99.99% वैध वोटों का समर्थन मिला।
दूसरे प्रस्ताव में रिटायर हो रहे निदेशक की जगह निदेशक की नियुक्ति से जुड़ा प्रस्ताव था। इसे भी 99.99% वोटों के साथ मंजूरी मिली।
1,500 करोड़ रुपये तक संबंधित पक्ष लेनदेन को मंजूरी
तीसरे प्रस्ताव में कंपनी के महत्वपूर्ण संबंधित पक्ष लेनदेन (Material Related Party Transactions) की सीमा को बढ़ाकर 1,500 करोड़ रुपये तक करने की मंजूरी मांगी गई थी। इस प्रस्ताव के पक्ष में 99.97% वोट पड़े और यह प्रस्ताव पास हो गया।
कर्ज लेने की सीमा बढ़ाने को भी मंजूरी
चौथे प्रस्ताव में कंपनी के लिए कंपनी कानून, 2013 की धारा 180(1)(C) के तहत कर्ज लेने की शक्तियों को मंजूरी देने का प्रस्ताव था। इसे भी 99.99% वोट के साथ मंजूरी मिल गई। पांचवें प्रस्ताव में कंपनी कानून की धारा 186 के तहत लोन, गारंटी, सिक्योरिटी और निवेश की सीमा बढ़ाने से जुड़ा प्रस्ताव था। इसे भी 99.99% वोटों के साथ मंजूरी मिली।
दो स्वतंत्र निदेशकों का दोबारा नियुक्ति को मंजूरी
छठे प्रस्ताव में संदीप कुमार साहू को लगातार दूसरे पांच साल के कार्यकाल के लिए स्वतंत्र निदेशक के तौर पर दोबारा नियुक्त करने का प्रस्ताव था। इसे 99.99% वोटों के साथ मंजूरी मिली। वहीं, सातवें और आखिरी प्रस्ताव में रेखा अग्रवाल को भी लगातार दूसरे पांच साल के कार्यकाल के लिए स्वतंत्र निदेशक के तौर पर दोबारा नियुक्त करने की मंजूरी मांगी गई थी। इस प्रस्ताव को भी 99.99% वोट मिले।
स्क्रूटिनाइजर की रिपोर्ट के मुताबिक, सभी 7 प्रस्ताव जरूरी बहुमत के साथ पास हुए हैं।
मल्टीप्लेक्स कंपनी PVR INOX लिमिटेड ने अपने शेयर बायबैक की प्रक्रिया के तहत 20,68,965 पूरी तरह चुकता इक्विटी शेयरों (fully paid-up Equity Shares) को रद्द (Extinguish) कर दिया है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
मल्टीप्लेक्स कंपनी PVR INOX लिमिटेड ने अपने शेयर बायबैक की प्रक्रिया के तहत 20,68,965 पूरी तरह चुकता इक्विटी शेयरों (fully paid-up Equity Shares) को रद्द (Extinguish) कर दिया है। कंपनी ने 5 अक्टूबर 2026 को स्टॉक एक्सचेंजों को इसकी जानकारी दी।
कंपनी के मुताबिक, बायबैक के लिए शेयर टेंडर करने की अवधि 10 सितंबर 2026 को शुरू हुई थी और 17 सितंबर 2026 को बंद हुई। इसके बाद बायबैक के तहत खरीदे गए शेयरों को रद्द करने की प्रक्रिया पूरी की गई।
शेयर पूंजी में आया बदलाव
20,68,965 शेयर रद्द होने के बाद कंपनी की जारी शेयर पूंजी में कमी आई है। बायबैक से पहले कंपनी के कुल जारी शेयर 9,81,99,962 थे, जिनकी कुल शेयर पूंजी 98,19,99,620 रुपये थी। अब 20,68,965 शेयर रद्द किए जाने के बाद कंपनी के जारी शेयरों की संख्या घटकर 9,61,30,997 रह गई है। इसके साथ ही कंपनी की जारी शेयर पूंजी घटकर 96,13,09,970 रुपये हो गई है।
कंपनी ने बताया कि रद्द किए गए सभी 20,68,965 शेयर डीमैट/इलेक्ट्रॉनिक रूप में थे। भौतिक रूप में कोई शेयर रद्द नहीं किया गया है।
25 सितंबर को दी गई थी मंजूरी
कंपनी की बायबैक समिति ने 25 सितंबर 2026 को 20,68,965 इक्विटी शेयरों को रद्द करने की मंजूरी दी थी। यह प्रक्रिया सेबी के बायबैक नियमों और कंपनी कानून, 2013 के प्रावधानों के अनुसार पूरी की गई है।
कंपनी ने यह भी बताया कि KFin Technologies, बायबैक के रजिस्ट्रार, कंपनी के सेक्रेटेरियल ऑडिटर और कंपनी की ओर से 5 अक्टूबर को शेयरों के रद्द किए जाने का प्रमाणपत्र जारी किया गया है। वहीं, नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड (NSDL) ने 1 अक्टूबर 2026 को डीमैट रूप में 20,68,965 शेयरों के रद्द होने की पुष्टि की थी।
बायबैक के बाद शेयरहोल्डिंग में बदलाव
बायबैक से पहले 4 सितंबर 2026 के रिकॉर्ड डेट के आधार पर कंपनी में प्रमोटर्स और उनके साथ काम करने वाले लोगों की हिस्सेदारी 27.53% थी। बायबैक के बाद 1 अक्टूबर 2026 को यह बढ़कर 27.60% हो गई। वहीं, बाकी शेयरधारकों की कुल हिस्सेदारी 72.40% रही। कंपनी की कुल जारी शेयर पूंजी में अब 9,61,30,997 इक्विटी शेयर हैं। बायबैक से पहले विदेशी निवेशकों के साथ भारतीय वित्तीय संस्थानों, बैंकों, म्यूचुअल फंड और सरकारी कंपनियों तथा पब्लिक और अन्य कॉरपोरेट निकायों की हिस्सेदारी अलग-अलग थी।
कंपनी ने कहा है कि बायबैक के बाद की शेयरहोल्डिंग का विवरण पहले ही 25 सितंबर 2026 के पोस्ट-बायबैक पब्लिक अनाउंसमेंट में जारी किया जा चुका है।
द्विजेंद्र तिवारी एक सक्रिय लेखक और वेब पत्रकार भी हैं। वह इन दिनों स्वर्ण भस्म से भरपूर एक ग्रह पर आधारित एक कथा का ताना बाना बुन रहे हैं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
वरिष्ठ के वरिष्ठ हिंदी राजनीतिक पत्रकार, संपादक और लेखक द्विजेंद्र तिवारी को महाराष्ट्र के प्रमुख हिंदी दैनिक ‘हमारा महानगर’ का एग्जिक्यूटिव एडिटर नियुक्त किया गया है। समाचार4मीडिया से बातचीत में उन्होंने अपनी नई जिम्मेदारी की पुष्टि की।
द्विजेंद्र तिवारी को मीडिया में काम करने का तीन दशक से अधिक का अनुभव है। उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले के एक छोटे से गांव में शिक्षक परिवार में 1964 में जन्मे द्विजेंद्र तिवारी ने अपनी उच्च शिक्षा उत्तर प्रदेश में ही पूरी की और 1984 में वाराणसी से विज्ञान स्नातक (B.Sc.) की डिग्री हासिल की। इसके साथ ही, आधुनिक तकनीकों से तालमेल बिठाते हुए उन्होंने 2024 में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) बॉम्बे से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) में विशेष प्रशिक्षण भी प्राप्त किया।
द्विजेंद्र तिवारी के अनुसार, उनके पत्रकारिता करियर की शुरुआत ‘आज’ दैनिक और ‘अवकाश’ पत्रिका (वाराणसी) में स्वतंत्र विज्ञान लेखन से हुई। इसके बाद वह मुंबई आए, जहाँ माधुरी (टाइम्स ग्रुप), पॉपुलर बॉलीवुड पत्रिका ‘फ़िल्म सिटी’ से शुरुआत करने बाद, अल्पकाल के लिए लोकमत समाचार (लोकमत समूह नागपुर) के मुंबई ब्यूरो से जुड़े। इसके बाद मार्च 1989 में जनसत्ता और संझा जनसत्ता (इंडियन एक्सप्रेस समूह) के मुंबई संस्करण से जुड़े, जहां उन्होंने शुरुआती वर्षों में फ़िल्म, संगठित अपराध, राजनीतिक भ्रष्टाचार और नागरिक विषयों पर रिपोर्टिंग की। वहां उन्होंने वर्ष 1992 से 2000 तक मुख्य संवाददाता के रूप में सेवाएं दीं। जून 2000 से जून 2005 तक उन्होंने नवभारत (नागपुर समूह) के मुंबई संस्करण के प्रभारी संपादक का पद संभाला और महाराष्ट्र के राजनीतिक परिदृश्य को प्रमुखता से कवर किया।
इसके बाद जुलाई 2005 में वरिष्ठ मराठी पत्रकार निखिल वागले के स्वामित्व वाले हिंदी दैनिक ‘हमारा महानगर’ के अधिग्रहण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के बाद अगस्त 2013 तक उन्होंने इस दैनिक के संपादक के रूप में मुंबई में काम किया। सितंबर 2013 में उन्होंने 'एब्सोल्यूट इंडिया' (अंग्रेजी और हिंदी दैनिक) के मुंबई और भोपाल संस्करणों को लांच करने में अहम योगदान दिया और संपादक के रूप में जून 2020 तक कार्य किया। कोविड महामारी और उसके बाद के छह वर्षों में उन्होंने उपन्यास लेखन, स्वतंत्र स्तंभ लेखन, वेबसाइट परिचालन, राजनीतिक दलों को परामर्श सहित विभिन्न प्रकार के पत्रकारीय कार्य किए।
अब वह एक बार फिर मुंबई, पुणे और नासिक से प्रकाशित होने वाले 'हमारा महानगर' समूह में एग्जिक्यूटिव एडिटर के रूप में शामिल हुए हैं। उन्होंने अपने करियर में स्वर्गीय बालासाहेब ठाकरे और अमिताभ बच्चन जैसी देश की कई दिग्गज हस्तियों के साक्षात्कार लिए हैं। इसके अलावा, उन्होंने हिंदुस्तान (नई दिल्ली), दोपहर का सामना (मुंबई) और कई अन्य प्रमुख राष्ट्रीय व क्षेत्रीय दैनिक समाचार पत्रों में नियमित रूप से प्रभावशाली राजनीतिक कॉलम भी लिखे हैं। वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं और अप्रैल 2007 में अमेरिकी विदेश विभाग वाशिंगटन द्वारा संचालित प्रतिष्ठित 'इंटरनेशनल विजिटर लीडरशिप प्रोग्राम' (IVLP) का हिस्सा रहे हैं, जिसके तहत उन्होंने द वाशिंगटन पोस्ट, लॉस एंजिल्स टाइम्स, द न्यूयॉर्क टाइम्स और वॉइस ऑफ अमेरिका जैसे प्रमुख अमेरिकी मीडिया संस्थानों का दौरा किया था। अमेरिका के अलावा वह इंग्लैंड, फ्रांस, स्विट्जरलैंड सहित कई यूरोपीय देशों का दौरा कर चुके हैं।
इसके अतिरिक्त, वह एक सक्रिय लेखक और वेब पत्रकार भी हैं। अंग्रेजी और हिंदी भाषा में लिखे उपन्यास जैसे 'प्लूटोनियम गंगा' (हिंदी), 'एलियन इन मुंबई', 'इथरियल इविल' और 'सीक्रेट्स ऑफ पार्वती' (अंग्रेजी) एमेजॉन और एप्पल बुक्स जैसे वैश्विक प्लेटफार्मों पर उपलब्ध हैं। उनके उपन्यास वैज्ञानिक तथ्यों को आधार बनाकर विज्ञान फैंटेसी पर आधारित होते हैं। वह इन दिनों स्वर्ण भस्म से भरपूर एक ग्रह पर आधारित एक कथा का ताना बाना बुन रहे हैं। समाचार4मीडिया की ओर से द्विजेंद्र तिवारी को ढेर सारी बधाई और शुभकामनाएं।
करण अरोड़ा ने वोल्वो ऑटो इंडिया में डायरेक्टर, मार्केटिंग एंड पीआर के रूप में ज्वाइन किया है। उनके पास लग्जरी ऑटोमोटिव और रियल एस्टेट मार्केटिंग में 15 साल से अधिक अनुभव है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
करण अरोड़ा (Karan Arora) ने वोल्वो ऑटो इंडिया (Volvo Auto India) में डायरेक्टर, मार्केटिंग एंड पीआर (Director, Marketing & PR) के पद पर ज्वाइन किया है। उनके पास लग्जरी ऑटोमोटिव और लग्जरी रियल एस्टेट मार्केटिंग में 15 साल से अधिक का अनुभव है।
वोल्वो ऑटो इंडिया से पहले करण अरोड़ा ने ऑडी इंडिया (Audi India) में छह साल से अधिक समय तक हेड ऑफ मार्केटिंग कम्युनिकेशंस एंड एक्सपीरिएंशियल (Head of Marketing Communications & Experiential) के तौर पर काम किया। इस दौरान उन्होंने ब्रांड लॉन्च, इवेंट्स और कस्टमर एक्सपीरिएंस से जुड़े कार्यक्रमों की जिम्मेदारी संभाली।
इससे पहले वह जगुआर लैंड रोवर (Jaguar Land Rover) में रीजनल बिजनेस मैनेजर, नॉर्थ इंडिया (Regional Business Manager, North India) के पद पर भी रह चुके हैं। ऑटोमोटिव सेक्टर के अलावा उन्होंने गोदरेज प्रॉपर्टीज (Godrej Properties), सेंट्रल पार्क (Central Park), स्मार्टवर्ल्ड डेवलपर्स (Smartworld Developers) और लिक्सिल इंडिया (LIXIL India) में मार्केटिंग से जुड़ी जिम्मेदारियां संभाली हैं।
लिक्सिल इंडिया में उन्होंने ग्रोहे (GROHE) और अमेरिकन स्टैंडर्ड (American Standard) जैसे ब्रांड्स पर काम किया। वोल्वो ऑटो इंडिया से जुड़ने से पहले करण क्रिसुमी कॉरपोरेशन (Krisumi Corporation) में वाइस प्रेसिडेंट – मार्केटिंग (Vice President – Marketing) के पद पर कार्यरत थे।