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पढ़ें: हिंदी पखवाड़ा और श्राद्ध पक्ष का अजीब संयोग...
<p style="text-align: justify;"><strong>व्यंग्य राही की कलम से</strong></p> <p style="text-align: justify;">इन दिनों हिंदी पखवाड़ा और श्राद्ध पक्ष का अजीब संयोग है। सरकारी महकमे हिंदी का 'तर्पण' करने में जुटे हैं। हिंदी के कथित विद्वान भी नए कुर्ते-पायजामे सिलवाकर विभिन्न कार्यालयों में हिंदी दिवस मनाने के लिए वैसे ही तत्पर हो रहे हैँ जैसे कनागतों
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
व्यंग्य राही की कलम से
इन दिनों हिंदी पखवाड़ा और श्राद्ध पक्ष का अजीब संयोग है। सरकारी महकमे हिंदी का 'तर्पण' करने में जुटे हैं। हिंदी के कथित विद्वान भी नए कुर्ते-पायजामे सिलवाकर विभिन्न कार्यालयों में हिंदी दिवस मनाने के लिए वैसे ही तत्पर हो रहे हैँ जैसे कनागतों में जीमने के लिए कर्मकांडी बामण। विद्वान जाते हैं, हिंदी की दशा का दुर्दशा के रूप में इस हाहाकारी ढंग से बयान करते हैं।
सरकारी कार्यालयों में बैठे अफसरों को संतुष्टि प्राप्त हो जाती है- हम ठीक करते हैं जो हिंदी में काम नहीं करते। लेकिन आपको अपने मन की बात कहें। हमारा बस चले तो हिंदी दिवस और हिंदी पखवाड़ा मनाने पर ही तुरंत रोक लगा दें। जो भाषा हमारी मां है, जो हमारे तन-मन में रक्त की तरह रच-बस गई है उसका पखवाड़ा मनाना क्या एक छलावा नहीं? हिंदी का सबसे बड़ा कबाड़ा उन कथित हिंदी विद्वानों ने ही किया है, जो ऐसी भाषा लिखते हैं जिसे समझना कांटों भरी राह से गुजरने से भी अधिक दुष्कर होता है। कुछ लोग कहते हैं कि हिंदी मर रही है, समाप्त हो रही है।
कसम से उनकी बातों पर हमें हंसी आती है। माना कि इस देश के अफसरों की भाषा इंगलिश है। राजकाज हिंदी में करने में वे तौहीन समझते हैं। तथाकथित अभिजात्य वर्ग हिंदी में बोलना अपमान समझता है लेकिन यही वर्ग हिंदी से पल रहा है। हिंदी से पनप रहा है।
देश के एक बड़े राजनेता ने तो एक बार कह ही दिया था कि वे प्रधानमंत्री सिर्फ इसलिए नहीं बन पाए क्योंकि उन्हें हिंदी बोलना नहीं आता था। हम तो अपने यार-भायलों, चेले-चेलियों से यही कहते हैं अपनी जुबान में बोलो। अपनी बोली में बतियाओ। हम गांवों में इसलिए जाते हैं कि दो नए शब्द सीख सकें। उन लफ्जों को याद कर सकें जो हमारी नानी और दादी बोला करती थी। श्राद्ध हम पूर्वजों का निकालते हैं। हिंदी में तो हम जश्न मनाते हैं। कभी मन करें तो सांझ को आ जाना हिंदी उत्सव क्या होता है, बता देंगे।
(साभार: पत्रिका)
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