OpenAI अपने लोकप्रिय AI चैटबॉट में विज्ञापन (ads) लाने की तैयारी कर रहा है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
OpenAI अपने लोकप्रिय AI चैटबॉट ChatGPT में विज्ञापन (ads) लाने की तैयारी कर रहा है। कंपनी ने इसके लिए अपने अंदरूनी विज्ञापन टीम का गठन किया है, जिसका नेतृत्व नए नियुक्त एप्लीकेशंस हेड फिडजी सिमो कर रही हैं। सिमो पिछले महीने जुड़ी हैं और इससे पहले वह Instacart की CEO और Facebook ऐप की हेड रह चुकी हैं।
सिमो पहले ही OpenAI की मुनाफा कमाने की कोशिशों के लिए सीनियर लीडर की भर्ती कर रही हैं, जिसमें विज्ञापन और वर्तमान सब्सक्रिप्शन सेवाएं दोनों शामिल हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, उन्होंने इस भूमिका के लिए कई उम्मीदवारों से बातचीत की है।
मौका बहुत बड़ा है। ChatGPT के अनुमानित 700 मिलियन यूज़र हैं, लेकिन केवल करीब 20 मिलियन सब्सक्रिप्शन के लिए भुगतान करते हैं। विज्ञापन नई आय के अरबों डॉलर खोल सकते हैं और कंपनी के उच्च खर्च को पूरा करने में मदद कर सकते हैं। इस साल OpenAI ने $12.7 बिलियन का राजस्व कमाया, जो 2024 की तुलना में तीन गुना है, फिर भी कंपनी खर्च से ज्यादा कमाई नहीं कर रही है, इसलिए विज्ञापन बढ़ोतरी का एक महत्वपूर्ण जरिया बन सकता है।
कंपनी ने तकनीकी भूमिकाओं के लिए भी भर्ती शुरू कर दी है, जैसे “Growth Paid Marketing Platform Engineer,” जिससे यह संकेत मिलता है कि वह अभियान प्रबंधन उपकरण बनाएगी, बड़े विज्ञापन नेटवर्क्स के साथ इंटीग्रेशन करेगी और रियल-टाइम अट्रिब्यूशन सिस्टम स्थापित करेगी।
फिर भी, OpenAI ने कहा है कि विज्ञापन धीरे-धीरे और सावधानीपूर्वक पेश किए जाएंगे। ChatGPT के हेड निक टर्ले ने The Verge को बताया कि कंपनी को “बहुत सोच-समझकर और स्वादपूर्ण तरीके से” विज्ञापन पेश करने होंगे ताकि यूज़र अनुभव प्रभावित न हो।
सिमो का फेसबुक में विज्ञापन उत्पादों का गहरा अनुभव OpenAI की योजना को स्पष्ट करता है: ChatGPT को सिर्फ सांस्कृतिक घटना से बदलकर राजस्व की शक्ति केंद्र बनाना। यूज़र्स के लिए अब सवाल यह नहीं है कि विज्ञापन आएंगे या नहीं — बल्कि कब आएंगे।
Yaap Digital Limited के बोर्ड में बड़ा बदलाव हुआ है। कंपनी ने विजयकुमार मालपानी को अतिरिक्त गैर-कार्यकारी निदेशक (Additional Non-Executive निदेशक) नियुक्त किया है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
Yaap Digital Limited के बोर्ड में बड़ा बदलाव हुआ है। कंपनी ने विजयकुमार मालपानी को अतिरिक्त गैर-कार्यकारी निदेशक (Additional Non-Executive निदेशक) नियुक्त किया है। उनकी नियुक्ति 14 अगस्त 2026 से प्रभावी हो गई है। कंपनी ने यह जानकारी नेशनल स्टॉक एक्सचेंज को दी है।
कंपनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ने सर्कुलर रेजोल्यूशन के जरिए उनकी नियुक्ति को मंजूरी दी है। यह नियुक्ति 14 अगस्त 2026 से प्रभावी हो गई है।
कंपनी ने 14 अगस्त को स्टॉक एक्सचेंजों को दी जानकारी में बताया कि विजयकुमार मालपानी फिलहाल अतिरिक्त गैर-कार्यकारी निदेशक के तौर पर बोर्ड का हिस्सा होंगे। उनकी नियुक्ति को आगे जारी रखने के लिए कंपनी के शेयरधारकों की मंजूरी जरूरी होगी।
अगली AGM में शेयरधारकों से मांगी जाएगी मंजूरी
कंपनी के मुताबिक, मालपानी अगली वार्षिक आम बैठक (AGM) तक अतिरिक्त गैर-कार्यकारी निदेशक के पद पर रहेंगे। अगर तय समय के भीतर AGM आयोजित नहीं होती है, तो जिस तारीख तक AGM हो जानी चाहिए थी, उस तारीख पर उनका यह कार्यकाल समाप्त माना जाएगा।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि उनका कंपनी से जुड़ना केवल AGM तक ही सीमित है। अगली AGM में शेयरधारकों के सामने उनकी नियमित निदेशक के तौर पर नियुक्ति का प्रस्ताव रखा जा सकता है। शेयरधारकों की मंजूरी मिलने के बाद वह बोर्ड में डायरेक्टर के तौर पर आगे भी बने रह सकते हैं।
कौन हैं विजयकुमार मालपानी?
विजयकुमार मालपानी चार्टेड अकाउटेंट और Institute of Chartered Accountants of India (ICAI) के फेलो मेंबर भी हैं। उन्हें अकाउंटिंग, फाइनेंस, टैक्सेशन और कमर्शियल के क्षेत्र में 20 साल से ज्यादा का प्रोफेशनल अनुभव है।
वर्तमान में वह Dorf Ketal Chemicals India Limited में चीफ फाइनेंशियल ऑफिसर (CFO) के पद पर हैं। वह 1 अगस्त 2004 से इस कंपनी के साथ जुड़े हुए हैं।
अपने दो दशक से ज्यादा लंबे करियर के दौरान मालपानी ने फाइनेंस, अकाउंटिंग, टैक्सेशन और कमर्शियल मामलों में काम किया है। कंपनी के मुताबिक, उनका यह अनुभव Yaap Digital के बोर्ड में भी उपयोगी साबित हो सकता है।
Yaap Digital ने अपने खुलासे में यह भी साफ किया है कि विजयकुमार मालपानी का कंपनी के किसी भी मौजूदा डायरेक्टर के साथ कोई संबंध नहीं है।
विजयकुमार मालपानी की नियुक्ति 14 अगस्त 2026 से प्रभावी है। उन्हें फिलहाल अतिरिक्त गैर-कार्यकारी निदेशक के तौर पर बोर्ड में शामिल किया गया है।
आने वाली AGM में शेयरधारकों के सामने उनकी नियुक्ति को नियमित निदेशक के तौर पर मंजूरी के लिए रखा जा सकता है। इसके बाद शेयरधारकों की मंजूरी मिलने पर वह कंपनी के बोर्ड में नियमित रूप से निदेशक के तौर पर काम कर सकेंगे।
बता दें कि Yaap Digital Limited कंपनी पहले Yaap Digital Private Limited के नाम से जानी जाती थी।
क्विंट डिजिटल लिमिटेड (Quint Digital Limited) की राइट्स इश्यू समिति की बैठक 19 अगस्त 2026 को होने वाली है।
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केंद्र सरकार ने सही और भरोसेमंद जानकारी लोगों तक पहुंचाने के लिए PIB फैक्ट चेक, प्रसार भारती के सार्वजनिक प्रसारण और डिजिटल मीडिया से जुड़े नियमों को अहम माध्यम बताया है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
केंद्र सरकार ने सही और भरोसेमंद जानकारी लोगों तक पहुंचाने के लिए PIB फैक्ट चेक, प्रसार भारती के सार्वजनिक प्रसारण और डिजिटल मीडिया से जुड़े नियमों को अहम माध्यम बताया है। सरकार का कहना है कि अलग-अलग मीडिया प्लेटफॉर्म और क्षेत्रीय भाषाओं के जरिए लोगों तक समय पर और सटीक जानकारी पहुंचाई जा रही है।
यह जानकारी केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण तथा संसदीय कार्य राज्य मंत्री डॉ. एल. मुरुगन ने बुधवार को लोकसभा में डॉ. आलोक कुमार सुमन के सवाल के लिखित जवाब में दी।
फेक न्यूज से निपटने के लिए PIB में फैक्ट चेक यूनिट
सरकार ने सरकारी योजनाओं और नीतियों से जुड़ी फेक न्यूज को रोकने के लिए प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) में फैक्ट चेक यूनिट (FCU) बनाई है। यह यूनिट केंद्र सरकार के मंत्रालयों, विभागों, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU) और अन्य केंद्रीय सरकारी संगठनों से जुड़े दावों की जांच करती है।
PIB की फैक्ट चेक यूनिट एक तय प्रक्रिया के तहत दावों का सत्यापन करती है और इसके बाद सही जानकारी को अलग-अलग प्लेटफॉर्म के जरिए लोगों तक पहुंचाती है।
दूरदर्शन और आकाशवाणी भी फैक्ट चेक जानकारी पहुंचा रहे
सरकार के मुताबिक, दूरदर्शन और आकाशवाणी भी अपने समाचार बुलेटिन, कार्यक्रमों और डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए सत्यापित जानकारी लोगों तक पहुंचाते हैं।
डीडी न्यूज में खबरों को प्रसारित करने से पहले कई स्तरों पर संपादकीय जांच की जाती है। इसमें तथ्यों की जांच, एक से ज्यादा भरोसेमंद स्रोतों से जानकारी का मिलान और संपादकीय समीक्षा शामिल है।
PIB फैक्ट चेक की सत्यापित सामग्री को नियमित रूप से दूरदर्शन और आकाशवाणी के न्यूज और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी शामिल किया जाता है, ताकि गलत सूचना और झूठे नैरेटिव का मुकाबला किया जा सके।
डिजिटल मीडिया और OTT के लिए भी नियम
सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के तहत सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 अधिसूचित किए हैं।
इन नियमों के तहत सोशल मीडिया और दूसरे ऑनलाइन मध्यस्थों के लिए कुछ जरूरी जिम्मेदारियां तय की गई हैं। साथ ही डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स और OTT प्लेटफॉर्म के लिए आचार संहिता भी बनाई गई है।
नियमों में शिकायतों के समाधान के लिए तीन स्तर की व्यवस्था रखी गई है। इसमें पहले प्रकाशकों का स्व-नियमन, उसके बाद स्व-नियामक संस्थाएं और फिर केंद्र सरकार की निगरानी व्यवस्था शामिल है।
फिल्म और मीडिया सेक्टर को बढ़ावा देने के लिए योजनाएं
सरकार ने बताया कि फिल्म और मीडिया सेक्टर को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं भी चलाई जा रही हैं। इनमें Development, Communication and Dissemination of Filmic Content (DCDFC) Scheme, India Cine Hub (ICH) और National Film Heritage Mission (NFHM) शामिल हैं।
DCDFC योजना के तहत फिल्म समारोहों, भारतीय सिनेमा के प्रचार, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भागीदारी, फिल्मों के संरक्षण और इससे जुड़ी दूसरी गतिविधियों के लिए वित्तीय मदद दी जाती है।
वहीं, India Cine Hub के जरिए फिल्मों की शूटिंग के लिए सिंगल-विंडो व्यवस्था के तहत अनुमति दिलाने की सुविधा दी जाती है। इसका उद्देश्य भारत को एक प्रमुख फिल्म शूटिंग डेस्टिनेशन के रूप में बढ़ावा देना भी है।
National Film Heritage Mission के तहत भारत की सिनेमाई विरासत को संरक्षित करने, पुरानी फिल्मों को बहाल करने, उनका डिजिटलीकरण और आर्काइविंग करने का काम किया जा रहा है।
ग्लोबल मीडिया सहयोग पर भी सरकार का जोर
सरकार ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मीडिया सहयोग बढ़ाने की दिशा में भी अपने प्रयासों की जानकारी दी। इसके तहत भारत वैश्विक स्तर पर मीडिया और प्रसारण क्षेत्र में अपनी भागीदारी मजबूत कर रहा है।
सरकार ने बताया कि मई 2025 में मुंबई में पहला World Audio Visual & Entertainment Summit (WAVES 2025) आयोजित किया गया था। इसका उद्देश्य ‘Create in India, Create for the World’ की सोच के साथ भारत को कंटेंट निर्माण का वैश्विक केंद्र बनाने की दिशा में आगे बढ़ना था।
इस समिट में भारतीय क्रिएटर्स, प्रोड्यूसर्स और स्टार्टअप्स को दुनिया के अलग-अलग देशों के खरीदारों, निवेशकों, OTT प्लेटफॉर्म और टेक्नोलॉजी से जुड़े प्रमुख लोगों के साथ जुड़ने का मौका मिला। इसमें 100 से ज्यादा देशों के प्रतिनिधियों की भागीदारी रही।
48 देशों के ब्रॉडकास्टर्स के साथ समझौते
प्रसारण क्षेत्र में भी प्रसार भारती दुनिया के अलग-अलग देशों के प्रसारण संगठनों के साथ सक्रिय रूप से काम कर रहा है। इसके तहत अंतरराष्ट्रीय ब्रॉडकास्टर्स के साथ कंटेंट शेयरिंग और दूसरे संगठनों के साथ प्रसारण समझौते किए गए हैं।
सरकार के मुताबिक, प्रसार भारती के अलग-अलग देशों के ब्रॉडकास्टर्स के साथ 48 सक्रिय समझौता ज्ञापन (MoU) हैं। इन समझौतों के जरिए प्रसारण क्षेत्र में कंटेंट, पेशेवर विशेषज्ञता और बेहतर कामकाजी तौर-तरीकों का आदान-प्रदान किया जा रहा है।
सरकार का कहना है कि PIB फैक्ट चेक, दूरदर्शन, आकाशवाणी, डिजिटल मीडिया नियमों और अंतरराष्ट्रीय मीडिया सहयोग के जरिए लोगों तक भरोसेमंद जानकारी पहुंचाने और गलत सूचना का मुकाबला करने की कोशिश की जा रही है।
सारेगामा इंडिया (Saregama India) ने अपनी सब्सिडियरी कंपनी Pocket Aces की लीडरशिप टीम में बड़ा बदलाव किया है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
सारेगामा इंडिया (Saregama India) ने अपनी सब्सिडियरी कंपनी Pocket Aces की लीडरशिप टीम में बड़ा बदलाव किया है। कंपनी ने 12 अगस्त को घोषणा की कि Pocket Aces की को-फाउंडर, मैनेजिंग डायरेक्टर और CEO अदिति श्रीवास्तव 1 अक्टूबर 2026 से अपनी एग्जिक्यूटिव भूमिका से हटकर कंपनी के बोर्ड में स्ट्रैटेजिक जिम्मेदारी संभालेंगी। उनके स्थान पर मौजूदा चीफ बिजनेस ऑफिसर (CBO) विनय पिल्लई को कंपनी का नया CEO बनाया जाएगा।
बता दें कि यह बदलाव 1 अक्टूबर 2026 से प्रभावी होगा।
2021 से CEO की जिम्मेदारी संभाल रही थीं अदिति
अदिति श्रीवास्तव ने 2021 में Pocket Aces की CEO की जिम्मेदारी संभाली थी। उनके नेतृत्व में कंपनी ने भारत की प्रमुख डिजिटल एंटरटेनमेंट कंपनियों में अपनी जगह मजबूत की।
Pocket Aces के तहत FilterCopy, Dice Media और Clout जैसे डिजिटल ब्रांड हैं। कंपनी ने शॉर्ट-फॉर्म कंटेंट, वेब सीरीज और क्रिएटर मैनेजमेंट के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई है।
Pocket Aces का Saregama ने 2023 में अधिग्रहण किया था। इसके बाद भी कंपनी ने अपने डिजिटल कंटेंट और क्रिएटर इकोसिस्टम को आगे बढ़ाना जारी रखा।
अब अदिति श्रीवास्तव एग्जिक्यूटिव लीडरशिप से हटकर बोर्ड की रणनीतिक भूमिका में रहेंगी। माना जा रहा है कि इससे कंपनी में उनके अनुभव और विजन का इस्तेमाल लंबे समय की रणनीति बनाने में जारी रहेगा।
विनय पिल्लई को मिली बड़ी जिम्मेदारी
मौजूदा CBO विनय पिल्लई 1 अक्टूबर से Pocket Aces के CEO का पद संभालेंगे। Saregama ने इसे कंपनी के भीतर मौजूद टैलेंट को आगे बढ़ाने की अपनी रणनीति का हिस्सा बताया है।
विनय पिछले करीब छह साल से Pocket Aces के साथ जुड़े हैं। उन्होंने कंपनी के क्रिएटर मैनेजमेंट बिजनेस Clout को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई और बाद में चीफ बिजनेस ऑफिसर की जिम्मेदारी संभाली।
विनय ने कोलंबिया यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की है। उनके पास Booz Allen Hamilton में कंसल्टिंग का अनुभव भी है। इसके अलावा उन्होंने खुद का स्ट्रीमिंग स्टार्टअप Dekkho भी शुरू किया था। कंपनी के मुताबिक, उनका कॉर्पोरेट और एंटरप्रेन्योरियल अनुभव Pocket Aces को अगले चरण में ले जाने में काम आएगा।
युवाओं के बीच मजबूत पकड़
Pocket Aces ने भारत में शॉर्ट-फॉर्म कंटेंट, वेब सीरीज और क्रिएटर मैनेजमेंट के बाजार को आकार देने में अहम भूमिका निभाई है। कंपनी के FilterCopy और Dice Media जैसे ब्रांड युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय हैं, जबकि Clout के जरिए कंपनी क्रिएटर्स और टैलेंट मैनेजमेंट का कारोबार करती है।
कंपनी आगे भी युवाओं के लिए डिजिटल कंटेंट तैयार करने पर फोकस करेगी। इसके लिए वह अपने डायरेक्ट-टू-कंज्यूमर और क्रिएटर चैनलों के साथ-साथ बड़े विज्ञापनदाताओं और स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स के साथ काम जारी रखेगी।
इसके अलावा Pocket Aces, Saregama के नए और पुराने म्यूजिक कैटलॉग के लिए एक महत्वपूर्ण मार्केटिंग आर्म के तौर पर भी काम करती रहेगी।
Saregama के लिए भी अहम बदलाव
Pocket Aces का नेतृत्व बदलाव Saregama की डिजिटल एंटरटेनमेंट रणनीति के लिहाज से भी अहम माना जा रहा है। Saregama, RP-Sanjiv Goenka Group का हिस्सा है और 1902 से मनोरंजन कारोबार में मौजूद है।
कंपनी का कारोबार म्यूजिक, डिजिटल सीरीज, टीवी कंटेंट, फिल्म प्रोडक्शन, शॉर्ट-फॉर्म कंटेंट, आर्टिस्ट और इंफ्लुएंसर मैनेजमेंट, लाइव इवेंट्स और Carvaan जैसे प्रोडक्ट्स तक फैला हुआ है।
Saregama ने 2023 में Pocket Aces का अधिग्रहण किया था। अब नए CEO के नेतृत्व में Pocket Aces के सामने डिजिटल कंटेंट और क्रिएटर इकोसिस्टम को और बड़े स्तर पर ले जाने की जिम्मेदारी होगी।
भारत सरकार ने सोशल मीडिया कंपनी मेटा को साफ कर दिया है कि भारत में उसके प्लेटफॉर्म्स को सिर्फ ग्लोबल कंटेंट पॉलिसी के हिसाब से नहीं चलाया जा सकता।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
भारत सरकार ने सोशल मीडिया कंपनी मेटा को साफ कर दिया है कि भारत में उसके प्लेटफॉर्म्स को सिर्फ ग्लोबल कंटेंट पॉलिसी के हिसाब से नहीं चलाया जा सकता। कंपनी को भारतीय कानून और नियमों के मुताबिक अपने प्लेटफॉर्म पर कंटेंट की पहचान, मॉडरेशन और उसे हटाने की व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी। ANI की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार ने मेटा से सिर्फ आश्वासन देने के बजाय अपने सिस्टम में ठोस सुधार दिखाने को कहा है।
यह मामला मेटा की टेक्निकल टीम और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के बीच हुई कई बैठकों के बाद सामने आया है। इन बैठकों में अधिकारियों ने कंपनी से यह समझने की कोशिश की कि उसके प्लेटफॉर्म भारत में हानिकारक और नियमों का उल्लंघन करने वाले कंटेंट की पहचान और कार्रवाई कैसे करते हैं।
पूरा एल्गोरिदम बदलने का निर्देश नहीं
सरकारी सूत्रों ने उन खबरों को भी खारिज किया है, जिनमें दावा किया गया था कि केंद्र ने मेटा को अपने पूरे एल्गोरिदम को बदलने के लिए कहा है।
सरकार का कहना है कि वह मेटा की पूरी टेक्नोलॉजी को नए सिरे से तैयार करवाने की मांग नहीं कर रही है। उसका फोकस यह सुनिश्चित करना है कि कंपनी की Content Policy, Platform Guidelines और Moderation Mechanism भारतीय कानून के अनुरूप काम करें।
भारत की भाषाओं और संस्कृति को लेकर चिंता
सरकार ने मेटा की ग्लोबल कंटेंट मॉडरेशन टीमों की क्षमता को लेकर भी सवाल उठाए हैं। अधिकारियों का मानना है कि ग्लोबल टीमों को भारत की अलग-अलग भाषाओं और सांस्कृतिक संदर्भों की पूरी समझ हमेशा नहीं हो सकती।
इसी वजह से सरकार चाहती है कि भारतीय भाषाओं और सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील मामलों में लोकल एक्सपर्ट्स और स्थानीय स्तर की समझ को ज्यादा महत्व दिया जाए।
CSAM को लेकर Zero Tolerance
बैठकों में Child Sexual Abuse Material (CSAM) यानी बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री को लेकर सरकार ने सख्त रुख अपनाया है।
सरकार ने मेटा से कहा है कि इस तरह की सामग्री को उसके प्लेटफॉर्म पर रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती। अधिकारियों ने कंपनी से केवल यह बताने के बजाय कि वह इसे रोकने के लिए प्रतिबद्ध है, ठोस और सक्रिय कार्रवाई दिखाने को कहा है।
Deepfake पर भी सरकार की नजर
सरकार ने Deepfake और AI से तैयार किए गए Synthetic Content को लेकर भी मेटा से जवाब मांगा है।
एक चिंता यह है कि किसी बड़े या चर्चित व्यक्ति के Verified या अधिकृत अकाउंट से पोस्ट की गई असली सामग्री को मेटा का ऑटोमेटेड सिस्टम गलती से Deepfake या Manipulated Content न मान ले। इसीलिए अधिकारियों ने संवेदनशील मामलों में Human-in-the-loop सिस्टम की जरूरत बताई है। यानी सिर्फ AI सिस्टम को अंतिम फैसला लेने देने के बजाय जरूरत पड़ने पर इंसान भी कंटेंट की जांच करे।
हटाया गया कंटेंट दोबारा कैसे लौटता है?
सरकार ने यह भी पूछा है कि मेटा ऐसे Synthetic Content को दोबारा प्लेटफॉर्म पर आने से कैसे रोकता है, जिसे पहले पहचानकर हटा दिया गया हो।
सरकार की चिंता है कि एक बार हटाए गए कंटेंट को किसी नए अकाउंट या दूसरे तरीके से दोबारा अपलोड करके लोगों तक न पहुंचाया जा सके।
रिकमंडेशन एल्गोरिदम्स भी जांच के दायरे में
मेटा के रिकमंडेशन और Virality Systems को लेकर भी सरकार ने सवाल उठाए हैं।
अधिकारियों ने पूछा है कि कई बार यूजर्स को उनकी रुचि से अलग कंटेंट क्यों दिखाया जाता है और क्या कंपनी के रिकमंडेशन एल्गोरिदम्स अनजाने में Synthetic या AI-generated कंटेंट को ज्यादा लोगों तक पहुंचा रहे हैं।
सरकार चाहती है कि जिस कंटेंट को Problematic या नियमों का उल्लंघन करने वाला माना गया है, उसे बाद में रिकमंडेशन सिस्टम के जरिए फिर से यूजर्स तक न पहुंचाया जाए।
Section 79 और Safe Harbour पर भी चर्चा
इस बातचीत में मेटा की Intermediary Obligations और Information Technology Act की Section 79 के तहत मिलने वाली Safe Harbour Protection का मुद्दा भी शामिल है।
सरकार पहले भी यह देख चुकी है कि यूजर्स को कौन-सा कंटेंट दिखाया जाए, इसे तय करने में मेटा के एल्गोरिदमs की भूमिका उसकी एक Intermediary के तौर पर जिम्मेदारियों पर क्या असर डाल सकती है।
सरकार को चाहिए काम का सबूत
शुक्रवार को हुई ताजा बैठक में मेटा की टेक्निकल टीम ने अधिकारियों को बताया कि कंपनी ऑनलाइन Harmful Content की पहचान और उसे संभालने के लिए अभी कौन-कौन से सिस्टम इस्तेमाल करती है। इस मुद्दे पर अगले हफ्ते भी तकनीकी स्तर पर बातचीत होने की उम्मीद है।
कुल मिलाकर सरकार का संदेश साफ है- मेटा को भारत में सिर्फ अपनी ग्लोबल पॉलिसी के भरोसे काम नहीं करना है, बल्कि यह साबित करना होगा कि उसके सिस्टम भारतीय कानून, भाषाओं और सांस्कृतिक संवेदनशीलताओं को ध्यान में रखकर काम कर रहे हैं।
सरकार का जोर मेटा की पूरी टेक्नोलॉजी बदलने के बजाय उसके मौजूदा सिस्टम को भारतीय नियमों के मुताबिक लागू करने पर है। यानी अब सरकार को सिर्फ आश्वासन नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाला बदलाव और उसके ठोस सबूत चाहिए।
OpenAI ने प्रेजेंटेशन बनाने वाले स्टार्टअप NextSlide का अधिग्रहण कर लिया है। इस डील के बाद NextSlide की टीम OpenAI से जुड़ गई है और अब ChatGPT के लिए काम करेगी।
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OpenAI ने प्रेजेंटेशन बनाने वाले स्टार्टअप NextSlide का अधिग्रहण कर लिया है। इस डील के बाद NextSlide की टीम OpenAI से जुड़ गई है और अब ChatGPT के लिए काम करेगी। इस अधिग्रहण की जानकारी NextSlide के फाउंडर अहमद बेश्री ने दी है।
Beshry के मुताबिक, यह डील इसी साल की शुरुआत में पूरी हो गई थी, लेकिन इसकी घोषणा हाल ही में की गई है। हालांकि, OpenAI ने NextSlide को कितनी रकम में खरीदा है, इसकी जानकारी सामने नहीं आई है।
बिना डिजाइन एक्सपीरियंस के भी बना सकते थे प्रेजेंटेशन
NextSlide की शुरुआत करीब एक साल पहले हुई थी। इसका मकसद ऐसे लोगों के लिए प्रेजेंटेशन बनाना आसान करना था, जिन्हें डिजाइनिंग का ज्यादा अनुभव नहीं है।
स्टार्टअप का प्रोडक्ट Prompts, Notes, Documents और Research Material को एडिटेबल प्रजेंटेशन में बदलने के लिए बनाया गया था। यानी यूजर को हर स्लाइड खुद तैयार करने की जरूरत कम हो जाती थी और AI की मदद से जल्दी एक प्रेजेंटेशन तैयार की जा सकती थी।
विजुअल कम्युनिकेशन को आसान बनाना था मकसद
Ahmed Beshry ने कहा कि NextSlide का बड़ा उद्देश्य विजुअल कम्युनिकेशन को ज्यादा आसान और ज्यादा लोगों तक पहुंचाना था, ताकि लोग अपने विचारों को बेहतर तरीके से पेश कर सकें।
अब OpenAI में भी NextSlide की टीम इसी लक्ष्य पर काम करेगी। टीम ऐसे AI प्रोडक्ट्स विकसित करने में मदद करेगी, जो लोगों को कंटेंट बनाने और अपने विचारों को बेहतर तरीके से कम्युनिकेट करने में मदद करें।
वेबसाइट पर दी टीम के OpenAI से जुड़ने की जानकारी
NextSlide की वेबसाइट पर अब Ahmed Beshry की ओर से एक संदेश दिया गया है, जिसमें उन्होंने बताया कि टीम OpenAI से जुड़ गई है। उन्होंने उन सभी यूजर्स का भी धन्यवाद किया, जिन्होंने NextSlide पर प्रेजेंटेशन बनाए, अपना फीडबैक दिया और स्टार्टअप को आगे बढ़ाने में मदद की।
Beshry का पहले भी Startup का अनुभव
NextSlide शुरू करने से पहले Ahmed Beshry Caper AI के को-फाउंडर रह चुके हैं। यह Smart Cart और Cashier-less Checkout टेक्नोलॉजी पर काम करने वाला स्टार्टअप था, जिसे Instacart ने 2021 में अधिग्रहण कर लिया था।
NextSlide का सफर भले ही करीब एक साल का रहा, लेकिन OpenAI के साथ जुड़ने के बाद इसकी टीम अब AI के क्षेत्र में बड़े स्तर पर काम करेगी। माना जा रहा है कि इस टीम का अनुभव ChatGPT में प्रजेंटेशन और विजुअल कंटेंट क्रिएशन जैसे फीचर्स को बेहतर बनाने में काम आ सकता है।
कंप्यूटर वैज्ञानिक संजय घेमावत ने 27 वर्षों बाद Google छोड़कर Discovery Loop नामक AI स्टार्टअप की स्थापना की है, जो वैज्ञानिक शोध और इंजीनियरिंग प्रयोगों को स्वचालित बनाने पर काम करेगा।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
भारतीय मूल के प्रसिद्ध कंप्यूटर वैज्ञानिक संजय घेमावत (Sanjay Ghemawat) ने लगभग 27 वर्षों तक गूगल (Google) में सेवाएं देने के बाद कंपनी छोड़ दी है। उन्होंने अपने लंबे समय के सहयोगियों जेफ डीन (Jeff Dean), ओरियोल विन्याल्स (Oriol Vinyals) और क्वॉक ले (Quoc Le) के साथ मिलकर 'डिस्कवरी लूप' (Discovery Loop) नामक नई आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Artificial Intelligence-AI) कंपनी की स्थापना की है। इसका उद्देश्य AI की मदद से वैज्ञानिक और इंजीनियरिंग प्रयोगों को स्वचालित बनाकर नई खोजों की रफ्तार बढ़ाना है।
संजय घेमावत का जन्म वर्ष 1966 में अमेरिका के इंडियाना (Indiana) में हुआ था। उन्होंने कॉर्नेल यूनिवर्सिटी (Cornell University) से शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 1995 में मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (Massachusetts Institute of Technology-MIT) से पीएचडी पूरी की। गूगल से जुड़ने से पहले वह डीईसी सिस्टम्स रिसर्च सेंटर (DEC Systems Research Center) में कार्यरत थे, जहां उनकी मुलाकात जेफ डीन से हुई।
वर्ष 1999 में Google से जुड़ने के बाद संजय घेमावत और जेफ डीन ने Google File System, MapReduce, Bigtable और Spanner जैसी कई महत्वपूर्ण तकनीकों के विकास में अहम भूमिका निभाई। इन तकनीकों ने बड़े पैमाने पर डेटा प्रोसेसिंग और आधुनिक क्लाउड कंप्यूटिंग की नींव मजबूत की।
नई कंपनी Discovery Loop को अल्फाबेट (Alphabet) का रणनीतिक क्लाउड और कंप्यूटिंग सहयोग मिलेगा। इसके अलावा रेडिकल वेंचर्स (Radical Ventures), खोसला वेंचर्स (Khosla Ventures), क्लेनर पर्किन्स (Kleiner Perkins), लाइटस्पीड (Lightspeed) और डोअर कैपिटल (Doerr Capital) जैसे प्रमुख निवेशकों का समर्थन भी प्राप्त हुआ है।
गूगल और अल्फाबेट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) सुंदर पिचाई (Sundar Pichai) ने संजय घेमावत और जेफ डीन के योगदान की सराहना करते हुए कहा कि दोनों ने कंपनी की शुरुआती सर्च तकनीकों से लेकर आधुनिक AI युग तक कई ऐतिहासिक तकनीकी उपलब्धियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि Google, Discovery Loop का संस्थापक निवेशक और क्लाउड पार्टनर बना रहेगा।
केंद्र सरकार ने AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) से तैयार होने वाले डीपफेक (Deepfake) और अन्य सिंथेटिक कंटेंट पर सख्ती को लेकर संसद में विस्तृत जानकारी दी है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
केंद्र सरकार ने AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) से तैयार होने वाले डीपफेक (Deepfake) और अन्य सिंथेटिक कंटेंट पर सख्ती को लेकर संसद में विस्तृत जानकारी दी है। सरकार ने कहा कि फरवरी 2026 में नियमों को और कड़ा किए जाने के बाद अब उनका प्रभावी तरीके से पालन कराया जा रहा है। इसके तहत ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स की जिम्मेदारियां बढ़ाई गई हैं, कंटेंट हटाने की समय-सीमा घटाई गई है और साइबर अपराधों के खिलाफ कार्रवाई भी तेज की गई है।
लोकसभा में 5 अगस्त को इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री जितिन प्रसाद ने लिखित जवाब में कहा कि सरकार का लक्ष्य देश में "खुला, सुरक्षित, भरोसेमंद और जवाबदेह साइबर स्पेस" सुनिश्चित करना है।
फरवरी 2026 में हुए थे नियमों में बड़े बदलाव
सरकार ने बताया कि 10 फरवरी 2026 को सूचना प्रौद्योगिकी (इंटरमीडियरी गाइडलाइंस एंड डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड) नियम, 2021 में संशोधन किए गए थे। इन संशोधनों के बाद अब AI से तैयार किए गए वैध (Permissible) कंटेंट पर स्पष्ट लेबल लगाना और उसके साथ ट्रेसेबल मेटाडेटा रखना अनिवार्य कर दिया गया है।
इसका उद्देश्य यह है कि यूजर आसानी से पहचान सकें कि कोई कंटेंट इंसान ने बनाया है या AI की मदद से तैयार किया गया है। इसके अलावा, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि यूजर्स को AI के जरिए गैरकानूनी कंटेंट बनाने या साझा करने के कानूनी परिणामों की जानकारी दी जाए।
डीपफेक और फर्जी कंटेंट पर कड़ी नजर
सरकार ने स्पष्ट किया कि नए नियम बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री, बिना अनुमति के साझा की गई निजी तस्वीरें या वीडियो, फर्जी पहचान (Impersonation), डीपफेक और अन्य गैरकानूनी AI कंटेंट पर लागू होंगे।
सोशल मीडिया कंपनियों और अन्य इंटरमीडियरी को ऐसे कंटेंट को बनने और फैलने से रोकने के लिए जरूरत पड़ने पर ऑटोमेटेड तकनीकी टूल्स का इस्तेमाल करना होगा।
अब सिर्फ 3 घंटे में हटाना होगा गैरकानूनी कंटेंट
सरकार ने कहा कि नियमों में सबसे बड़ा बदलाव कंटेंट हटाने की समय-सीमा को लेकर किया गया है। अब यदि किसी अदालत या सरकार की ओर से वैध आदेश मिलता है, तो ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स को 3 घंटे के भीतर गैरकानूनी कंटेंट हटाना होगा। पहले इसके लिए 36 घंटे का समय दिया जाता था।
इसी तरह, नग्नता, फर्जी पहचान जैसे संवेदनशील मामलों से जुड़ी शिकायतों पर अब 2 घंटे के भीतर कार्रवाई करनी होगी।
बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की बढ़ी जिम्मेदारी
सरकार ने दोहराया कि बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स (Significant Social Media Intermediaries) को रेप, बाल यौन शोषण से जुड़ी सामग्री और पहले हटाए जा चुके गैरकानूनी कंटेंट की पहचान कर उसे दोबारा फैलने से रोकने के लिए सक्रिय तकनीकी उपाय अपनाने होंगे।
सरकार ने चेतावनी दी कि यदि कोई प्लेटफॉर्म इन नियमों का पालन नहीं करता है, तो उसे आईटी एक्ट, 2000 की धारा 79 के तहत मिलने वाली "सेफ हार्बर" सुरक्षा का लाभ नहीं मिलेगा और उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकेगी।
साइबर अपराधों पर कार्रवाई के नए आंकड़े
सरकार ने Samanvaya प्लेटफॉर्म के जरिए साइबर अपराधों पर हुई कार्रवाई के नए आंकड़े भी साझा किए।
सरकार के अनुसार, इसके Pratibimb मॉड्यूल की मदद से अब तक—
सरकार का कहना है कि इससे संगठित साइबर धोखाधड़ी के नेटवर्क को तोड़ने में जांच एजेंसियों को काफी मदद मिली है।
कई एजेंसियां मिलकर कर रही हैं निगरानी
सरकार ने बताया कि डीपफेक और अन्य गैरकानूनी ऑनलाइन कंटेंट से निपटने के लिए कई संस्थाएं मिलकर काम कर रही हैं। इनमें- Indian Cyber Crime Coordination Centre (I4C), SAHYOG पोर्टल, National Cyber Crime Reporting Portal, Grievance Appellate Committees, CERT-In जैसी एजेंसियां शामिल हैं।
AI गवर्नेंस पर भी जारी है काम
सरकार ने कहा कि नवंबर 2025 में जारी India AI Governance Guidelines के तहत भारत ने AI के लिए जोखिम आधारित (Risk-based) नीति अपनाई है। इसके अलावा IndiaAI Mission के Safe & Trusted AI कार्यक्रम के तहत IIT जोधपुर, IIT मद्रास और IIT खड़गपुर जैसे संस्थानों में डीपफेक पहचानने वाली तकनीकों पर शोध जारी है।
लोगों को भी किया जा रहा जागरूक
सरकार ने बताया कि वर्ष 2026 के दौरान सोशल मीडिया कंपनियों को AI से तैयार गलत सूचना और हानिकारक कंटेंट से निपटने के लिए कई एडवाइजरी जारी की गई हैं। साथ ही Cyber Security Awareness Month, Cyber Jagrookta Diwas और Safer Internet Day जैसे अभियानों के जरिए लोगों को भी साइबर सुरक्षा और डीपफेक के खतरों के प्रति जागरूक किया जा रहा है।
सरकार ने स्पष्ट किया कि फिलहाल कोई नया कानून लाने की घोषणा नहीं की गई है, लेकिन फरवरी 2026 में लागू किए गए नियम अब पूरी तरह अमल के चरण में हैं। इसके साथ ही सरकार ने साफ संकेत दिए हैं कि AI और डीपफेक से जुड़े मामलों में ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है।
'वार्ता24 मीडिया' के मैनेजिंग एडिटर आलोक मेहता ने पत्रकारिता के बदलते स्वरूप, तकनीक के बढ़ते प्रभाव और विभिन्न मीडिया प्लेटफॉर्म्स के बीच तालमेल की जरूरत पर विस्तार से अपनी बात रखी।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
समाचार4मीडिया की ओर से आयोजित 'पत्रकारिता 40 अंडर 40' कार्यक्रम में 'वार्ता24 मीडिया' के मैनेजिंग एडिटर व चीफ स्ट्रैटजिक ऑफिसर आलोक मेहता ने पत्रकारिता के बदलते स्वरूप, तकनीक के बढ़ते प्रभाव और विभिन्न मीडिया प्लेटफॉर्म्स के बीच तालमेल की जरूरत पर विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि मीडिया के अलग-अलग माध्यम एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, बल्कि सभी एक-दूसरे के पूरक हैं। समय के साथ तकनीक जरूर बदली है, लेकिन पत्रकारिता का मूल उद्देश्य आज भी वही है।
अपने संबोधन की शुरुआत में आलोक मेहता ने मंच पर मौजूद सभी वक्ताओं और आयोजकों का अभिवादन किया। उन्होंने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा कि उनसे पहले कई वक्ता अपनी बातें विस्तार से रख चुके हैं, इसलिए वे ज्यादा समय नहीं लेंगे। उन्होंने मजाकिया लहजे में कहा कि लंच का समय होने वाला है, इसलिए वे नहीं चाहते कि उनके लंबे भाषण की वजह से किसी का लंच खराब हो जाए।
इसके बाद उन्होंने उपस्थित लोगों से पूछा कि कितने लोग टेलीग्राम का इस्तेमाल करते हैं। जब अधिकांश लोगों ने मोबाइल ऐप वाले टेलीग्राम की बात समझी, तो उन्होंने कहा कि वे उस दौर की पत्रकारिता से आते हैं, जब 'टेलीग्राम' का मतलब डाकघर से खबर भेजना होता था। उस समय संवाददाता डाकघर जाकर टेलीग्राम के जरिए समाचार भेजते थे और संदेश 'टिक-टिक' की आवाज के साथ आगे पहुंचता था।
आलोक मेहता ने कहा कि उन्होंने अपने लंबे पत्रकारिता जीवन में न्यूज एजेंसी, अखबार, पत्रिका, रेडियो और अन्य कई माध्यमों में काम किया है। इसी अनुभव के आधार पर वे पूरे विश्वास के साथ कहते हैं कि मीडिया के सभी प्लेटफॉर्म एक-दूसरे के पूरक हैं। समय के साथ तकनीक बदलती रही है। आज टेलीग्राम एक मोबाइल ऐप बन चुका है, लेकिन पत्रकारिता की मूल भावना वही बनी हुई है।
उन्होंने कहा कि समय-समय पर तकनीक से जुड़े कई प्लेटफॉर्म विवादों में भी रहे हैं। टेलीग्राम ऐप पर भी कई बार प्रतिबंध लगाए गए, लेकिन इससे यह साबित होता है कि तकनीक का इस्तेमाल सही और गलत दोनों तरह से हो सकता है। इसलिए जरूरी यह है कि हम तकनीक का सही उपयोग करें, न कि उसे अपना दुश्मन मान लें।
आलोक मेहता ने अपने शुरुआती पत्रकारिता के दिनों को याद करते हुए कहा कि जब वे न्यूज एजेंसी में काम करते थे, तब बड़ी खबरें या बजट जैसे लंबे भाषण एक साथ नहीं भेजे जा सकते थे। उन्हें छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर अलग-अलग टेलीग्राम के जरिए भेजना पड़ता था। कई बार खबर का पहला हिस्सा, फिर दूसरा, तीसरा और चौथा भाग अलग-अलग भेजा जाता था। उस दौर में अंग्रेजी एजेंसियों के पत्रकारों को शॉर्टहैंड आने की वजह से काफी सक्षम माना जाता था, जबकि हिंदी पत्रकारों के सामने संसाधनों की कमी के बावजूद बेहतर काम करने की चुनौती रहती थी।
उन्होंने कहा कि प्रतियोगिता पहले भी थी और आज भी है, लेकिन प्रतिस्पर्धा का मतलब एक-दूसरे को खत्म करना नहीं होना चाहिए। पत्रकारिता का उद्देश्य लोगों की जरूरतों को समझना और उन्हें सही जानकारी उपलब्ध कराना है। इसी वजह से मीडिया के हर माध्यम की अपनी अलग भूमिका है।
आलोक मेहता ने कहा कि आज मीडिया को एक और बड़ी चुनौती नई पीढ़ी के बदलते व्यवहार को समझने की है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि उनका 10 साल का नाती मोबाइल फोन और नई तकनीक के बारे में उनसे कहीं ज्यादा जानकारी रखता है। कई बार वह उन्हें ही मोबाइल चलाना सिखाता है। इससे साफ है कि आज के बच्चे बहुत कम उम्र में ही डिजिटल दुनिया से जुड़ रहे हैं।
उन्होंने एक और उदाहरण देते हुए कहा कि उनके यहां काम करने वाली एक महिला, जिसे ठीक से पढ़ना-लिखना भी नहीं आता और जो अपना नाम तक सही तरह से नहीं भर पाती, वह भी इंस्टाग्राम पर अपने वीडियो बनाती है। दूसरी ओर, उन्होंने स्वीकार किया कि वे खुद इंस्टाग्राम देखते तो हैं, लेकिन उसमें उतने दक्ष नहीं हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि डिजिटल तकनीक समाज के हर वर्ग तक पहुंच चुकी है।
उन्होंने कहा कि ऐसे समय में मीडिया की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। समाज के हर वर्ग को साथ लेकर चलना होगा। पढ़े-लिखे लोगों से लेकर सामान्य नागरिक तक, हर व्यक्ति आज डिजिटल माध्यमों का उपयोग कर रहा है। इसलिए पत्रकारिता को भी उसी के अनुरूप खुद को ढालना होगा।
आलोक मेहता ने दोहराया कि प्रिंट, टीवी और डिजिटल मीडिया को एक-दूसरे का प्रतिस्पर्धी नहीं मानना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर किसी प्लेटफॉर्म पर किसी खबर की सिर्फ झलक मिलती है, तो उसका विस्तृत विश्लेषण किसी दूसरे माध्यम पर उपलब्ध हो सकता है। किसी भाषण का छोटा हिस्सा सोशल मीडिया पर दिखाई दे सकता है, जबकि उसका पूरा वीडियो टीवी या डिजिटल प्लेटफॉर्म पर देखा जा सकता है। इसी तरह किसी विषय की गहराई और विस्तार अखबार या पत्रिका में पढ़ने को मिल सकता है।
उन्होंने कहा कि अक्सर यह कहा जाता है कि अब अखबार कौन पढ़ता है, लेकिन यह पूरी तरह सही नहीं है। आज भी बड़ी संख्या में युवा ऑनलाइन अखबार पढ़ते हैं। बिजनेस, अर्थव्यवस्था, शिक्षा और अन्य क्षेत्रों से जुड़े लोग नियमित रूप से डिजिटल संस्करणों के जरिए समाचार पढ़ रहे हैं। यानी माध्यम बदल सकता है, लेकिन पढ़ने की आदत खत्म नहीं हुई है।
उन्होंने अपना निजी अनुभव साझा करते हुए बताया कि हाल ही में दिल्ली के कुछ इलाकों में अखबार वितरित करने वाले हॉकर हड़ताल पर थे, जिसके कारण उनके घर अखबार नहीं पहुंचा। उन्होंने स्वयं हॉकर से बात की और उसकी समस्या समझने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि वे अखबार का सब्सक्रिप्शन इस तरह लेना पसंद करते हैं, जिससे हॉकर को भी उचित आय मिल सके। उनका मानना है कि मीडिया की पूरी व्यवस्था में हॉकर भी उतना ही महत्वपूर्ण हिस्सा है, इसलिए उसकी चिंता करना भी जरूरी है।
आलोक मेहता ने अपने संबोधन के इस हिस्से का समापन करते हुए कहा कि पत्रकारिता में प्रतिस्पर्धा जरूर होनी चाहिए, लेकिन वह स्वस्थ प्रतिस्पर्धा हो। मीडिया के सभी माध्यम और उनसे जुड़े लोग एक-दूसरे के सहयोगी हैं। यदि सभी मिलकर अपनी-अपनी ताकत का सही उपयोग करें, तो पत्रकारिता पहले से कहीं ज्यादा मजबूत और प्रभावी बन सकती है।
इसके बाद आलोक मेहता ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और उसकी विश्वसनीयता पर अपनी राय रखते हुए कहा कि नई तकनीक का स्वागत जरूर करना चाहिए, लेकिन आंख बंद करके उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि AI अभी भी कई बार गलत जानकारी देता है और पत्रकारों को उसके इस्तेमाल में सतर्क रहने की जरूरत है।
उन्होंने अपना उदाहरण देते हुए कहा कि जब उन्होंने AI से अपना ही बायोडाटा निकलवाया, तो उसमें ऐसे संस्थान का नाम भी शामिल था, जहां उन्होंने कभी काम ही नहीं किया था। हालांकि उस समूह के एक चैनल से उनका जुड़ाव जरूर रहा था, लेकिन AI ने उसे गलत तरीके से प्रस्तुत कर दिया। उन्होंने कहा कि अगर नई पीढ़ी के पत्रकार बिना जांच-पड़ताल के सिर्फ AI पर भरोसा करेंगे, तो वे गलत जानकारी का शिकार हो सकते हैं। इसलिए किसी भी जानकारी को अंतिम सच मानने से पहले उसकी पुष्टि करना जरूरी है।
आलोक मेहता ने कहा कि वे अब एक कड़वी बात कहना चाहते हैं और उम्मीद जताई कि इसके बावजूद उन्हें भविष्य में भी ऐसे कार्यक्रमों में बुलाया जाएगा। उन्होंने मुस्कुराते हुए समाचार4मीडिया के संस्थापक अनुराग बत्रा और उनकी टीम का धन्यवाद किया कि उन्होंने मीडिया जगत के लोगों को एक मंच पर आकर खुलकर चर्चा करने का अवसर दिया।
इसके बाद उन्होंने पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर चर्चा करते हुए कहा कि आज जिस तरह मीडिया की साख पर सवाल उठाए जा रहे हैं, वैसी या उससे भी खराब परिस्थितियां पहले भी रही हैं। इसलिए यह मान लेना गलत होगा कि मीडिया में गिरावट सिर्फ आज के दौर की समस्या है।
उन्होंने अपने शुरुआती पत्रकारिता जीवन का एक अनुभव साझा करते हुए बताया कि वर्ष 1974 के आसपास जब वे न्यूज एजेंसी में काम करते थे, तब चुनावों के दौरान राजनीतिक दल कुछ पत्रकारों तक पैसे पहुंचाकर अपने पक्ष में खबरें प्रकाशित कराने की कोशिश करते थे। उस समय दिल्ली में अखबारों की संख्या भी बहुत कम थी और एजेंसियों की खबरों का काफी प्रभाव होता था।
उन्होंने बताया कि उस दौर में कार्बन कॉपी के जरिए नेताओं के बयान विभिन्न अखबारों तक पहुंचाए जाते थे। कई बार कुछ राजनीतिक दल इन खबरों को अपने पक्ष में प्रकाशित कराने के लिए पैसे भी खर्च करते थे। उन्होंने एक वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार से जुड़ा प्रसंग सुनाते हुए कहा कि चुनाव के समय उन्हें भी ऐसी जिम्मेदारी दी गई थी और बाद में चुनाव परिणाम आने पर पैसे खर्च करने वालों को निराशा हाथ लगी।
आलोक मेहता ने कहा कि इससे यह साबित होता है कि पेड न्यूज या पत्रकारिता को प्रभावित करने की कोशिशें नई नहीं हैं। उन्होंने अपनी पुस्तक 'Power, Press and Politics' का उल्लेख करते हुए कहा कि उसमें उन्होंने विस्तार से इस विषय पर लिखा है। उन्होंने यह भी कहा कि एडिटर्स गिल्ड की रिपोर्टों में भी पेड न्यूज का जिक्र पहले से मिलता रहा है। इसलिए यह कहना कि पहले सब कुछ आदर्श था और आज ही समस्याएं पैदा हुई हैं, सही नहीं होगा।
उन्होंने कहा कि पत्रकारों को यह सोचने की जरूरत है कि उनका असली दुश्मन कौन है। क्या नेता, माफिया या सड़क पर चलने वाला कोई व्यक्ति पत्रकारिता का सबसे बड़ा विरोधी है? उनका मानना था कि कई बार पत्रकार खुद अपने पेशे को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं।
उन्होंने कहा कि अक्सर पत्रकार और मीडिया से जुड़े लोग ही सार्वजनिक मंचों पर यह कहते दिखाई देते हैं कि मीडिया बिक गया है या पूरी पत्रकारिता खत्म हो चुकी है। उनके मुताबिक, जब पत्रकार खुद अपने पेशे को इस तरह बदनाम करते हैं, तो समाज में भी मीडिया की छवि कमजोर होती है।
आलोक मेहता ने कहा कि हाल के दिनों में उन्होंने एक बड़े न्यूज चैनल के कार्यक्रम में मीडिया के लोगों को आपस में इतनी तीखी बहस करते देखा कि वह नेताओं की बहस से भी ज्यादा आक्रामक लगी। उनका मानना है कि स्वस्थ बहस होनी चाहिए, लेकिन एक-दूसरे की साख को नुकसान पहुंचाने वाली भाषा से बचना चाहिए।
उन्होंने कहा कि कई बार किसी विषय पर बिना तथ्यों के यह कह दिया जाता है कि पूरे देश की शिक्षा व्यवस्था खत्म हो गई है या सब कुछ बर्बाद हो चुका है। उन्होंने कहा कि अगर लाखों भारतीय छात्र विदेशों में जाकर सफल हो रहे हैं, तो यह भी उनकी मेहनत और शिक्षा का परिणाम है। किसी एक कमी के आधार पर पूरे सिस्टम को नकार देना उचित नहीं है।
उन्होंने अपना उदाहरण देते हुए कहा कि वे मध्य प्रदेश से आए हैं। उस समय वहां नकल की घटनाएं होती थीं, लेकिन उन्होंने मेहनत से पढ़ाई की और अपनी योग्यता के आधार पर नौकरी हासिल की। इसलिए कुछ लोगों की गलतियों के लिए पूरे समाज या पूरी व्यवस्था को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। गलत करने वालों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन ईमानदारी से काम करने वालों का सम्मान भी होना चाहिए।
आलोक मेहता ने कहा कि मीडिया की विश्वसनीयता बचाने के लिए सबसे पहले पत्रकारों को खुद अपने पेशे का सम्मान करना होगा। लगातार एक-दूसरे पर आरोप लगाने और पूरे मीडिया को कठघरे में खड़ा करने से सबसे ज्यादा नुकसान पत्रकारिता को ही होता है।
यह भाग-3 है। इसमें आलोक मेहता के संबोधन का अंतिम हिस्सा शामिल है, जहां उन्होंने पत्रकारों की आपसी एकजुटता, संपादकों की भूमिका, मीडिया की विश्वसनीयता, ईमानदार पत्रकारिता और युद्धकाल में सूचना की जिम्मेदारी पर अपने विचार रखे। यह पूरी तरह पर आधारित है।
इसके बाद आलोक मेहता ने कहा कि पत्रकारिता की विश्वसनीयता को सबसे ज्यादा नुकसान तब होता है, जब पत्रकार और संपादक खुद एक-दूसरे को सार्वजनिक रूप से निशाना बनाते हैं। उन्होंने कहा कि बड़े-बड़े संपादकों के बीच भी मतभेद रहे हैं, लेकिन कई बार इन मतभेदों ने पूरी पत्रकारिता की साख को प्रभावित किया।
उन्होंने अपने लंबे अनुभव का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने अपनी पुस्तक में भी लिखा है कि कई प्रतिष्ठित संपादकों को अपने ही सहयोगियों के विरोध का सामना करना पड़ा। कई बार जिन लोगों को नौकरी दी गई, वही बाद में उनके खिलाफ खड़े हो गए। उनका मानना है कि पत्रकारिता की विश्वसनीयता को जितना नुकसान बाहरी ताकतों ने नहीं पहुंचाया, उससे कहीं ज्यादा नुकसान मीडिया जगत के लोगों ने आपसी खींचतान और एक-दूसरे की छवि खराब करके पहुंचाया है।
आलोक मेहता ने कहा कि कई बार यह आरोप लगाया जाता है कि राजनीतिक दबाव की वजह से मीडिया अपनी बात नहीं रख पाता। लेकिन उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि देश के कई बड़े समाचार पत्र और टीवी चैनल ऐसे भी रहे हैं, जिन्होंने अलग-अलग समय में सत्ता के खिलाफ भी खुलकर खबरें प्रकाशित और प्रसारित की हैं। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि हर मीडिया संस्थान एक जैसी सोच या दबाव में काम करता है।
उन्होंने कहा कि पत्रकारों को अपनी पेशेवर स्वतंत्रता बनाए रखने का साहस रखना चाहिए। उन्होंने अपने करियर का उदाहरण देते हुए बताया कि उन्होंने भी कई संस्थानों में काम किया है और जरूरत पड़ने पर नौकरियां बदली हैं। इसलिए यदि किसी पत्रकार को लगता है कि वह अपनी स्वतंत्रता के साथ काम नहीं कर पा रहा है, तो उसके पास अपने रास्ते चुनने का विकल्प भी होता है।
आलोक मेहता ने कहा कि पत्रकारों को एक-दूसरे की बुराई करने से बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने लंबे करियर में कई मालिकों और संपादकों के साथ काम किया, लेकिन कभी किसी सहयोगी की पीठ पीछे बुराई नहीं की। यदि किसी बात पर असहमति होती थी, तो वे सामने बैठकर अपनी बात रखते थे। उनका मानना है कि पीठ पीछे आलोचना करने से सामने वाले का ही नहीं, बल्कि अपना भी नुकसान होता है।
उन्होंने कहा कि पत्रकारिता की विश्वसनीयता सिर्फ मीडिया संस्थानों की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि पत्रकारों, शिक्षकों और पूरे समाज की भी जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि आज भी राजनीति में कई ईमानदार नेता हैं, प्रशासन में कई ईमानदार अधिकारी हैं और समाज में भी बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जो पूरी निष्ठा से अपना काम कर रहे हैं। इसी वजह से देश आगे बढ़ रहा है और सुरक्षित भी है। इसलिए पूरे सिस्टम को एक साथ खारिज कर देना उचित नहीं है।
आलोक मेहता ने अपने संबोधन के अंतिम हिस्से में युद्ध और अंतरराष्ट्रीय घटनाओं की रिपोर्टिंग का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि कई बार विदेशी मीडिया की रिपोर्टिंग को लेकर भी सवाल उठते हैं। उनका मानना है कि युद्ध जैसी परिस्थितियों में सूचना का इस्तेमाल रणनीतिक रूप से भी किया जाता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि अगर किसी खबर से दुश्मन देश का मनोबल कमजोर होता है, तो उसके पीछे भी अलग तरह की सोच और रणनीति हो सकती है।
उन्होंने महाभारत का उदाहरण देते हुए कहा कि भगवान कृष्ण ने भी युद्ध के दौरान परिस्थितियों के अनुसार रणनीति अपनाई थी। इसलिए किसी भी सूचना या खबर को समझते समय उसके पूरे संदर्भ को देखना जरूरी होता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी सरकार, किसी देश या किसी नेता का समर्थन या विरोध करना नहीं है, बल्कि यह बताना है कि सूचना का इस्तेमाल कई बार युद्ध जैसी परिस्थितियों में अलग तरीके से भी किया जाता है।
अपने संबोधन का समापन करते हुए आलोक मेहता ने सभी पत्रकारों से अपील की कि वे एक-दूसरे की अनावश्यक आलोचना करने के बजाय एक-दूसरे पर भरोसा करें और निष्पक्ष सोच के साथ काम करें। उन्होंने कहा कि किसी भी व्यक्ति या संस्था के बारे में अंतिम फैसला देने से पहले उसे संदेह का लाभ (Benefit of Doubt) देना चाहिए और निष्पक्ष तरीके से तथ्यों की जांच करनी चाहिए। उन्होंने उम्मीद जताई कि पत्रकार एक-दूसरे के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करेंगे और बदले में उन्हें भी वही सम्मान और न्याय मिलेगा।
अंत में उन्होंने कहा कि पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताकत उसकी विश्वसनीयता और आपसी विश्वास है। यदि मीडिया जगत के लोग एक-दूसरे का सम्मान करेंगे, स्वस्थ आलोचना करेंगे और तथ्यों के आधार पर काम करेंगे, तो पत्रकारिता की साख और मजबूत होगी।
समाचार4मीडिया पत्रकारिता 40 अंडर 40 में डबल चेक मीडिया के फाउंडिंग एडिटर ने कहा- कंटेंट क्रिएटर और पत्रकार में फर्क समझना होगा, लोकप्रियता नहीं बल्कि सत्य पत्रकारिता की पहली शर्त है
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
समाचार4मीडिया के प्रतिष्ठित 'पत्रकारिता 40 अंडर 40' कार्यक्रम में डबल चेक मीडिया के फाउंडिंग एडिटर संकेत उपाध्याय ने बदलते मीडिया परिदृश्य, डिजिटल पत्रकारिता, कंटेंट क्रिएशन और पत्रकारिता की मूल आत्मा पर विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि आज जिस मीडिया को लोग 'मुख्यधारा का मीडिया' कहते हैं, उसकी परिभाषा बदल चुकी है।
संकेत उपाध्याय ने कहा कि आज जिसे मुख्यधारा का मीडिया कहा जा रहा है, वह वास्तव में 'मेनस्ट्रीम मीडिया' नहीं बल्कि 'मनी स्ट्रीम मीडिया' और 'लेगेसी मीडिया' है। उनके मुताबिक, आज के दौर में असली मुख्यधारा डिजिटल मीडिया है, क्योंकि लोग सबसे ज्यादा कंटेंट वहीं देख और पढ़ रहे हैं।
उन्होंने कहा कि किसी भी माध्यम को मुख्यधारा वही बनाती है, जिसे सबसे ज्यादा लोग इस्तेमाल करते हैं। आज अखबार पढ़ने वालों की संख्या लगातार घट रही है। टीवी दर्शकों के आंकड़े भी सभी के सामने हैं। दूसरी ओर मोबाइल, स्मार्ट टीवी और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर कंटेंट की खपत तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में यह साफ है कि मीडिया की मुख्यधारा अब डिजिटल की ओर बढ़ चुकी है।
संकेत उपाध्याय ने इस धारणा को भी खारिज किया कि डिजिटल मीडिया में आने वाले अधिकांश लोग नौकरी से निकाले गए हैं। उन्होंने कहा कि वह खुद कभी किसी नौकरी से नहीं निकाले गए। उनके अनुसार कई पत्रकार अपनी इच्छा से स्वतंत्र पत्रकारिता करने के लिए बाहर आए हैं, क्योंकि अब अच्छी पत्रकारिता के लिए बड़े मीडिया संस्थानों और भारी-भरकम निवेश की जरूरत नहीं रह गई है।
उन्होंने कहा कि आज एक अच्छा कैमरा वाला मोबाइल फोन, दो-तीन हजार रुपये का माइक्रोफोन, छह-सात सौ रुपये की लाइट और एक यूट्यूब चैनल ही पर्याप्त है। यदि आपकी कहानी में दम है और आपकी बात लोगों तक असरदार तरीके से पहुंचती है, तो दर्शक अपने आप जुड़ जाते हैं। इसलिए मीडिया के इस बदलाव को जितनी जल्दी स्वीकार किया जाए, उतना बेहतर होगा।
संकेत उपाध्याय ने कहा कि मीडिया चाहे कल का हो, आज का हो या आने वाले समय का, एक चीज हमेशा समान रहेगी और वह है लोगों की जानने की भूख। लोगों को सही और विश्वसनीय जानकारी चाहिए। अब यह मीडिया को तय करना है कि वह लोगों को वह जानकारी दे पा रहा है या नहीं।
उन्होंने कहा कि यदि लोगों का भरोसा मीडिया से उठता है, तो वे दूसरे विकल्प तलाशेंगे। आज उनके पास डिजिटल प्लेटफॉर्म, इंस्टाग्राम और अन्य सोशल मीडिया माध्यम मौजूद हैं, जहां वे जानकारी खोज सकते हैं। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि वह सिटिजन जर्नलिज्म के समर्थक नहीं हैं।
संकेत उपाध्याय ने कहा कि केवल हाथ में कैमरा होने से कोई पत्रकार नहीं बन जाता। पत्रकारिता एक गंभीर जिम्मेदारी है, जिसके लिए प्रशिक्षण, अनुभव और वर्षों की मेहनत चाहिए। उन्होंने कहा कि पत्रकार बनने के लिए तपस्या करनी पड़ती है। पत्रकारिता की बारीकियों को समझे बिना कोई व्यक्ति सिर्फ वीडियो बनाकर खुद को पत्रकार नहीं कह सकता।
उन्होंने डिजिटल दौर में पत्रकारिता और कंटेंट क्रिएशन के बीच स्पष्ट अंतर करने की जरूरत पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि पत्रकार और कंटेंट क्रिएटर एक जैसे नहीं होते। किसी कंटेंट क्रिएटर के लिए लोकप्रिय होना गलत नहीं है, क्योंकि उसका पैमाना व्यूज़ और लोकप्रियता है। लेकिन यदि किसी पत्रकार का लक्ष्य केवल लोकप्रिय होना रह जाए, तो यह पत्रकारिता की भावना के खिलाफ है।
उन्होंने कहा कि पत्रकार का पहला दायित्व सही तथ्य सामने रखना है। उसकी खबर लोकप्रिय हो या न हो, यह दूसरी बात है। जबकि कंटेंट क्रिएटर पर तथ्यात्मक जिम्मेदारी उसी स्तर की नहीं होती, क्योंकि उसका मूल्यांकन लोकप्रियता से होता है।
संकेत उपाध्याय ने कहा कि आने वाले समय में पत्रकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वे लोकप्रियता और पत्रकारिता के बीच की सीमा को न भूलें। उन्होंने अपने कई युवा साथियों का उदाहरण देते हुए कहा कि 22-23 साल की उम्र में कई लोगों ने डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सफल मीडिया संस्थान खड़े किए हैं। उन्होंने गंभीर पत्रकारिता भी की और पत्रकारिता तथा कंटेंट क्रिएशन के बीच की सीमा का सम्मान भी किया। लेकिन कई लोग शुरुआती सफलता के लिए इस सीमा को पार कर देते हैं। उन्हें लाखों व्यूज़ जरूर मिल जाते हैं, लेकिन अंततः उन्हें खुद से यह सवाल पूछना पड़ता है कि उन्होंने लोकप्रियता को प्राथमिकता दी या सत्य को।
अपने नए डिजिटल प्लेटफॉर्म 'डबल चेक' का जिक्र करते हुए संकेत उपाध्याय ने कहा कि इसकी प्रेरणा उन्हें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से मिली। उन्होंने बताया कि जब भी कोई व्यक्ति Google Gemini पर कुछ खोजता है, तो नीचे लिखा होता है कि "AI गलतियां कर सकता है, कृपया डबल चेक करें।" यही बात उन्हें पत्रकारिता का सबसे बड़ा सिद्धांत लगी।
उन्होंने कहा कि पत्रकारिता का मूल मंत्र हमेशा से यही रहा है कि कुछ भी बोलने या प्रकाशित करने से पहले तथ्यों की दोबारा जांच की जाए। वरिष्ठ पत्रकारों से यही सीख मिली है कि बोलने से पहले एक बार फिर जांच लें कि कहीं कोई गलती तो नहीं हो रही।
संकेत उपाध्याय ने कहा कि चाहे अखबार हो, टीवी हो या डिजिटल मीडिया, यदि पत्रकारिता को भविष्य में मजबूत बनाए रखना है तो 'शास्त्रीय पत्रकारिता' को बचाना होगा। जिस तरह शास्त्रीय संगीत और शास्त्रीय नृत्य कभी पुराने नहीं होते, उसी तरह तथ्यों पर आधारित पत्रकारिता भी कभी पुरानी नहीं होगी। उसकी सबसे बड़ी ताकत हर तथ्य को डबल चेक करना है।
उन्होंने यह भी कहा कि हर व्यक्ति की अपनी राय होती है और राय रखना गलत नहीं है। समस्या तब पैदा होती है, जब लोग पहले राय बना लेते हैं और बाद में उसके समर्थन में तथ्य ढूंढने लगते हैं। उन्होंने कहा कि आज पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ा संकट यही है कि तथ्यों के आधार पर राय बनाने के बजाय राय के आधार पर तथ्य खोजे जा रहे हैं। खासकर डिजिटल मीडिया में यह चुनौती तेजी से बढ़ रही है।
अपने संबोधन के अंत में संकेत उपाध्याय ने कहा कि यदि पत्रकार हमेशा तथ्यों की दोबारा जांच करने की आदत बनाए रखें, तो पत्रकारिता कभी पुरानी नहीं होगी और हमेशा युवा बनी रहेगी। उनके अनुसार पत्रकारिता की असली ताकत 'डबल चेक' करने की संस्कृति में ही छिपी है।