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शिकायत के बाद भी कार्रवाई न करने का गूगल इंडिया को यूं भुगतना पड़ेगा खामियाजा

कार्यवाही से बचने के लिए ‘गूगल इंडिया’ ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन यहां भी उसे कोई राहत नहीं मिली है

समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago

कथित मानहानि के मामले में ‘गूगल इंडिया’ को आपराधिक मुकदमे का सामना करना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी को राहत देने से इनकार करते हुए कहा है कि वह इस संबंध में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79 में 2009 के संशोधन से पहले के मानहानि मामले में सुरक्षा कवर का दावा नहीं कर सकती।

गौरतलब है कि इस कानून के पास होने के बाद किसी भी प्रकाशित कंटेंट के मामले में थर्ड पार्टी इंटरमीडियरी की लायबिलिटी घट गई थी। पूरा मामला ‘गूगल’ की ब्लॉग प्रकाशन सेवा से संबंधित है। दरअसल, ‘गूगल ग्रुप्स’ में ‘विशाखा इंडस्ट्रीज’ के उत्पादों पर सवाल उठाते हुए ब्लॉग पोस्ट किये गए थे।

कंपनी ने नोटिस भेजकर ‘गूगल इंडिया’ से पोस्ट हटाने के लिए कहा, लेकिन उसने कोई कार्रवाई नहीं की। इसके बाद ‘विशाखा इंडस्ट्रीज’ द्वारा ‘गूगल इंडिया’ पर केस चलाने के लिए अदालत में अपील की गई, जिस पर कोर्ट ने उसके पक्ष में फैसला सुनाया। इस पर ‘गूगल इंडिया’ ने कार्यवाही से बचने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन यहां भी उसे कोई राहत नहीं मिली है।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून की धारा 79 (बदलाव से पहले), आईपीसी की धारा 499/500 के तहत दर्ज अपराध के संबंध में किसी इंटरमीडियरी की रक्षा नहीं करती। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब ‘गूगल इंडिया’ को आपराधिक मुकदमे का सामना करना होगा। इस पूरे मामले में वरिष्ठ वकील श्रीधर पोटाराजू की भूमिका बेहद अहम् रही। जिन्होंने ‘विशाखा इंडस्ट्रीज’ का पक्ष अदालत के समक्ष रखा और ‘गूगल इंडिया’ को अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने का कोई मौका नहीं दिया।

बता दें कि शिकायतकर्ता ‘विशाखा इंडस्ट्रीज’ एक लिस्टेड कंपनी है, जो एसबेस्टस सीमेंट की शीट बनाती है। उसने अपनी याचिका में कहा था कि उसके सभी प्लांट में एसबेस्टस सीमेंट की शीटों का उत्पादन पर्यावरण के अनुकूल तरीके से होता है, मगर बैन एसबेस्टस नेटवर्क इंडिया के को-ऑर्डिनेटर गोपाल कृष्ण द्वारा उसके बारे में गलत बातें प्रचारित की जा रही हैं। गोपाल ने उसके खिलाफ ब्लॉग पोस्ट लिखा था, जिसकी वजह से उसकी मानहानि हुई।

चूंकि ‘गूगल इंडिया’ के विरुद्ध मानहानि का मामला 2009 में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79 में हुए संशोधन से पहले दर्ज किया गया था, इसलिए कंपनी की इस दलील को अस्वीकार कर दिया गया कि साइट का संचालन उसकी मूल कंपनी गूगल द्वारा किया जा रहा था और साइट से सामग्री को हटाने के अधिकार उसके पास नहीं थे।

समाचार4मीडिया से बातचीत में वरिष्ठ वकील श्रीधर पोटाराजू ने कहा, ‘सोशल मीडिया के दुरुपयोग पर लगाम लगाना संबंधित कंपनी की जिम्मेदारी है और वह इससे मुकर नहीं सकती। इस मामले में ‘गूगल इंडिया’ सबकुछ जानते हुए भी खामोश रही, यही उसकी सबसे बड़ी गलती है। ‘विशाखा इंडस्ट्री’ द्वारा ‘गूगल इंडिया’ को यह बताया गया था कि उसकी प्रतिस्पर्धी कंपनी बैन एसबेस्टस इंडिया द्वारा उसे बदनाम करने के लिए गूगल ब्लॉग प्रकाशन सेवा का इस्तेमाल किया जा रहा है, लेकिन इसके बावजूद उसने कोई कार्रवाई नहीं की। ऐसे पोस्ट नहीं हटाये गए, जो विशाखा इंडस्ट्री की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाते थे। तो फिर किस आधार पर गूगल इंडिया को खुद को निर्दोष करार दे सकती है?’

पोटाराजू का यह भी कहना था, ‘हमने शीर्ष अदालत में इन्हीं बातों को मजबूती के साथ रखा, जिस पर सहमति जताते हुए कोर्ट ने ‘गूगल इंडिया’ के खिलाफ क्रिमिनल ट्रायल चलाने का आदेश दिया। अब साक्ष्य-सबूतों के आधार पर यह तय होगा कि ‘गूगल इंडिया’ दोषी है या नहीं, लेकिन इतना साफ हो गया है कि ‘थर्ड पार्टी’ की आड़ में कोई कंपनी अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती।’ 

श्रीधर पोटाराजू ने आगे कहा, ‘गूगल इंडिया ने अपनी दलील में कहा कि वह थर्ड पार्टी है और केवल लोगों को अपने विचार व्यक्त करने के लिए एक प्लेटफार्म प्रदान करती है। जो कुछ हुआ, उसमें उसकी कोई गलती नहीं है, क्योंकि लोग क्या लिखते हैं, इस पर उसका कोई नियंत्रण नहीं। हालांकि, अदालत ने इस दलील को खारिज कर दिया। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि जब कोई कंपनी आपको यह बता रही है कि उसके साथ कुछ गलत हो रहा है, तो आप थर्ड पार्टी का हवाला देकर खामोश नहीं बैठा सकते। जानकारी मिलने के बाद भी कोई करवाई नहीं करने का खामियाजा तो ‘गूगल इंडिया’ को उठाना होगा।’ 

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