2028 तक भारत का विज्ञापन बाजार ₹1.58 लाख करोड़ तक पहुंचने की संभावना: PwC रिपोर्ट

PwC इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय एंटरटेनमेंट व मीडिया (E&M) इंडस्ट्री में आगामी वर्षों में शानदार वृद्धि देखने को मिलेगी।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 10 December, 2024
Last Modified:
Tuesday, 10 December, 2024
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PwC इंडिया की रिपोर्ट "Global Entertainment & Media Outlook 2024–28: India perspective" के अनुसार, भारतीय एंटरटेनमेंट व मीडिया (E&M) इंडस्ट्री में आगामी वर्षों में शानदार वृद्धि देखने को मिलेगी। रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय एंटरटेनमेंट व मीडिया (E&M) इंडस्ट्री की वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) 8.3% रहने का अनुमान है और यह 2028 तक 3,65,000 करोड़ रुपये (19.2 बिलियन अमेरिकी डॉलर) तक पहुंच सकता है। यह वृद्धि वैश्विक औसत 4.6% से कहीं अधिक होगी, जिससे भारत की स्थिति ग्लोबल एंटरटेनमेंट व मीडिया इंडस्ट्री में मजबूत बनी रहेगी।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि आर्थिक चुनौतियों और भूराजनीतिक तनावों के बावजूद, ग्लोबल एंटरटेनमेंट व मीडिया इंडस्ट्री ने 2023 में 5.5% की वृद्धि दर्ज की। इस अवधि में ग्लोबल एंटरटेनमेंट व मीडिया इंडस्ट्री का राजस्व 13,891,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 17,359,000 करोड़ रुपये हो गया। अमेरिका वर्तमान में एंटरटेनमेंट व मीडिया बाजार में सबसे बड़े राजस्व उत्पन्न करने वाले देश के रूप में शीर्ष पर है, जबकि चीन दूसरे स्थान पर और भारत नौवें स्थान पर है।

PwC इंडिया के चीफ डिजिटल ऑफिसर व TMT लीडर मनप्रीत सिंह अहूजा ने कहा, "भारत का एंटरटेनमेंट व मीडिया (E&M) सेक्टर एक बड़े बदलाव के कगार पर है। हमारी 'Global Entertainment & Media Outlook 2024-2028' रिपोर्ट के अनुसार, डिजिटल विज्ञापन, OTT प्लेटफॉर्म, ऑनलाइन गेमिंग और जनरेटिव AI जैसे प्रमुख विकास के तत्व इस इंडस्ट्री के भविष्य को आकार दे रहे हैं। ये तेजी से बढ़ते हुए क्षेत्र भारत को इनोवेशन और ग्रोथ में ग्लोबल लीडर के रूप में स्थापित कर रहे हैं। जो कंपनियां तेजी से बदलते हुए बाजार के रुझानों के साथ अपने उत्पादों और सेवाओं में बदलाव करेंगी, वे उन अद्वितीय और बड़े अवसरों को अपने पक्ष में कर सकती हैं, जो इस तेजी से बदलते इंडस्ट्री में मौजूद हैं।''

भारत में बेहतर कनेक्टिविटी, बढ़ती विज्ञापन आय और विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) को लेकर अनुकूल सरकारी नीतियों के कारण, अगले पांच वर्षों में देश की विकास दर दुनिया में सबसे अधिक रहने की संभावना है। देश की 91 करोड़ से अधिक मिलेनियल और जेन-Z जनसंख्या को दुनिया के सबसे सस्ते डेटा शुल्क का लाभ मिल रहा है। वर्तमान में भारत में 80 करोड़ ब्रॉडबैंड सब्सक्रिप्शन, 55 करोड़ स्मार्टफोन यूजर्स और 78 करोड़ इंटरनेट यूजर्स हैं। वास्तव में, भारतीय अपने मोबाइल फोन पर 78% समय एंटरटेनमेंट और मीडिया (E&M) से जुड़ी ऐप्स पर बिताते हैं। एंटरटेनमेंट और मीडिया क्षेत्र में भारत की मजबूत विकास दर का उपयोग करते हुए, भारत सरकार पहली WAVES समिट की मेजबानी करेगी, जिसका उद्देश्य साझेदारों के सहयोग और नवाचार के माध्यम से इस क्षेत्र को वैश्विक स्तर पर बढ़ावा देना है।

भारत में बढ़ते उपभोग और सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की वृद्धि के साथ, विज्ञापन बाजार के 9.4% की वार्षिक चक्रवृद्धि दर (CAGR) से बढ़कर 2023 के 1,01,000 करोड़ रुपये से 2028 तक 1,58,000 करोड़ रुपये तक पहुंचने की संभावना है, जो वैश्विक औसत से 1.4 गुना अधिक है। इस वृद्धि का अधिकांश हिस्सा डिजिटल क्षेत्र (इंटरनेट विज्ञापन) से आएगा, जो 15.6% की वार्षिक चक्रवृद्धि दर (CAGR) से बढ़कर 2023 के 41,000 करोड़ रुपये से 2028 तक 85,000 करोड़ रुपये तक पहुंचने की संभावना है। इंटरनेट विज्ञापन की वर्ष दर वर्ष (YoY) वृद्धि, जो 2023 में 26.0% थी, 2024-2028 के पूरे अनुमानित अवधि के दौरान दो अंकों में बनी रहेगी और 2028 में यह 12.2% होने की उम्मीद है।

भारत में पारंपरिक टीवी विज्ञापन 2023 से 2028 के बीच 4.2% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) से बढ़ेगा, जबकि वैश्विक स्तर पर इसकी आय -1.6% की गिरावट दर्शाएगी। 2026 तक भारत दुनिया का चौथा सबसे बड़ा टीवी विज्ञापन बाजार बनने की राह पर है। ​​​​​​

भारत में कुल ऑनलाइन गेमिंग और ई-स्पोर्ट्स की आय 2023 में ₹16,480 करोड़ थी, जो 2028 तक 19.2% CAGR से बढ़कर ₹39,583 करोड़ तक पहुंचने की उम्मीद है।

यदि वास्तविक पैसे के साथ गेमिंग (Real Money Gaming) को शामिल करें, तो 2023 में कुल गेमिंग और ईस्पोर्ट्स की आय ₹33,000 करोड़ (4 अरब डॉलर) थी और 2028 तक यह 14.5% CAGR से बढ़कर ₹66,000 करोड़ (8 अरब डॉलर) तक पहुंचने की संभावना है। वैश्विक स्तर पर, वीडियो गेम्स और ईस्पोर्ट्स की आय 8.0% CAGR से बढ़ेगी।  

ओटीटी प्लेटफॉर्म 14.9% CAGR के साथ तीसरा सबसे तेजी से बढ़ने वाला क्षेत्र होगा, जिससे भारत 2028 तक इस क्षेत्र में अग्रणी बन जाएगा। बुनियादी ढांचे में सुधार ने भारत के आउट-ऑफ-होम (OOH) विज्ञापन बाजार में भारी वृद्धि की है, जो 2023 में 12.9% बढ़ा। यह 7.6% CAGR से बढ़ता रहेगा।

वैश्विक स्तर पर प्रिंट विज्ञापन की आय में -2.6% CAGR की गिरावट के बावजूद, भारत का प्रिंट विज्ञापन बाजार 3% की दर से बढ़ने की उम्मीद है, जिससे यह 2028 तक दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा प्रिंट बाजार बन जाएगा। 

इंटरनेट विज्ञापन एशिया-प्रशांत क्षेत्र का सबसे तेजी से बढ़ता हुआ बाजार बनकर उभरा है और वैश्विक स्तर पर दूसरे स्थान पर है। 2023 से 2028 के बीच इसमें 15.6% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) होने की संभावना है।

कंपनियां नियामक अनुपालन को प्राथमिकता देकर और डेटा एनालिटिक्स का उपयोग करके उपभोक्ताओं का विश्वास बढ़ा सकती हैं और लक्षित विज्ञापन रणनीतियां लागू कर सकती हैं।

भारत में ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने 2023 में 20.9% की वृद्धि दर्ज की, जिससे इनका राजस्व ₹17,496 करोड़ तक पहुंच गया। 2028 तक यह दोगुना हो सकता है, जिसमें 14.9% की CAGR का अनुमान है। वहीं, ऑनलाइन गेमिंग और ईस्पोर्ट्स तेजी से बढ़ रहे हैं और 2028 तक एंटरटेनमेंट और मीडिया क्षेत्र (E&M) का 9% हिस्सा बनने की संभावना है।

अंत में, जनरेटिव एआई (GenAI) कंटेंट निर्माण, व्यक्तिगतकरण (personalisation) और मुद्रीकरण (monetisation) में क्रांति लाने वाला है। 2025 तक 70% से अधिक वैश्विक कंपनियों द्वारा इसे अपनाने की उम्मीद है। 

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BARC रेटिंग्स फ्रीज से Meta व Google को मिल सकता है बड़ा फायदा

भारतीय टेलीविजन इंडस्ट्री इस साल के त्योहारी सीजन से पहले बड़ी अनिश्चितता का सामना कर रही है। इसकी वजह ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (BARC) की टीवी रेटिंग्स पर लगी रोक है।

Samachar4media Bureau by
Published - Friday, 03 July, 2026
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Friday, 03 July, 2026
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इमरान फजल, असिसटेंट एडिटर, एक्सचेंज4मीडिया ।।

भारतीय टेलीविजन इंडस्ट्री इस साल के त्योहारी सीजन से पहले बड़ी अनिश्चितता का सामना कर रही है। इसकी वजह ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (BARC) की टीवी रेटिंग्स पर लगी रोक है। इंडस्ट्री से जुड़े लोगों का मानना है कि इससे मीडिया प्लानिंग पर असर पड़ सकता है, ठीक ऐसे समय जब टीवी चैनल अपने बड़े शो लॉन्च करने की तैयारी में हैं और विज्ञापनदाता त्योहारों के लिए अपने विज्ञापन बजट को अंतिम रूप दे रहे हैं।

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) ने BARC को निर्देश दिया है कि वह नई टेलीविजन रेटिंग एजेंसी नीति के तहत लाइसेंस रिन्यू होने तक किसी भी टीवी रेटिंग का प्रकाशन न करे। इस फैसले के बाद ब्रॉडकास्टर्स, विज्ञापनदाताओं और मीडिया एजेंसियों के पास दर्शकों की संख्या मापने का सबसे बड़ा और भरोसेमंद पैमाना फिलहाल उपलब्ध नहीं है।

इंडस्ट्री के जानकारों का कहना है कि इस फैसले का समय बेहद संवेदनशील है। जुलाई से सितंबर का समय आमतौर पर त्योहारी सीजन की मीडिया प्लानिंग का होता है। इसी दौरान कंपनियां गणेश चतुर्थी, ओणम, नवरात्रि, दुर्गा पूजा, दशहरा, दिवाली और साल के आखिर में होने वाली खरीदारी के सीजन के लिए अपने विज्ञापन बजट तय करती हैं। दूसरी ओर, टीवी नेटवर्क भी इसी समय नए फिक्शन शो, रियलिटी शो और बड़े एंटरटेनमेंट कार्यक्रम लॉन्च करते हैं ताकि त्योहारों के दौरान ज्यादा से ज्यादा दर्शकों को आकर्षित किया जा सके।

इंडस्ट्री का मानना है कि अगर दर्शकों के आंकड़े उपलब्ध नहीं होंगे तो विज्ञापनदाता डिजिटल प्लेटफॉर्म की ओर ज्यादा झुक सकते हैं, क्योंकि वहां उन्हें रियल-टाइम डेटा और कैंपेन की पूरी रिपोर्ट मिलती रहती है।

एक प्रमुख मीडिया एजेंसी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) ने कहा कि त्योहारी तिमाही में टीवी पर सबसे ज्यादा विज्ञापन खर्च होता है, क्योंकि इसी दौरान नए शो और बड़े एंटरटेनमेंट प्रोग्राम शुरू होते हैं। लेकिन विज्ञापनदाता यह भी चाहते हैं कि उनके निवेश का सही आकलन हो सके। अगर यह भरोसा खत्म होता है तो बजट खत्म नहीं होगा, बल्कि ऐसे प्लेटफॉर्म पर चला जाएगा जहां प्रदर्शन को मापा जा सकता है।

टीवी इंडस्ट्री के सबसे बड़े विज्ञापन सीजन पर संकट

त्योहारी सीजन टीवी चैनलों के लिए साल का सबसे महत्वपूर्ण कारोबारी समय माना जाता है। इसी दौरान मनोरंजन, समाचार, फिल्म और क्षेत्रीय चैनलों की आय का बड़ा हिस्सा विज्ञापनों से आता है।

एफएमसीजी कंपनियां, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म, ऑटोमोबाइल कंपनियां, इलेक्ट्रॉनिक्स और स्मार्टफोन ब्रांड, ज्वेलरी रिटेलर, वित्तीय सेवा कंपनियां और क्विक-कॉमर्स प्लेटफॉर्म इस दौरान बड़े स्तर पर विज्ञापन अभियान चलाते हैं क्योंकि त्योहारों में उपभोक्ताओं की खरीदारी बढ़ जाती है।

इसी समय टीवी चैनल भी अपने सबसे बड़े शो लॉन्च करते हैं। आने वाले हफ्तों में कई जनरल एंटरटेनमेंट चैनल नए फिक्शन शो शुरू करने वाले हैं, जबकि हिंदी और क्षेत्रीय बाजारों में बड़े रियलिटी शो और विशेष त्योहारी कार्यक्रम भी लॉन्च किए जाएंगे।

आमतौर पर BARC की साप्ताहिक रेटिंग्स से चैनलों को तुरंत पता चल जाता है कि नया शो कैसा प्रदर्शन कर रहा है। इसी आधार पर विज्ञापन दरें तय होती हैं और कंपनियां अपने विज्ञापन बजट में बदलाव करती हैं। लेकिन मौजूदा रेटिंग्स फ्रीज के कारण यह पूरी प्रक्रिया प्रभावित हो गई है।

एक बड़ी एफएमसीजी कंपनी के मार्केटिंग अधिकारी का कहना है कि हर नए शो की पहचान उसकी रेटिंग से बनती है। स्वतंत्र ऑडियंस डेटा के बिना यह साबित करना मुश्किल हो जाता है कि शो कितने लोगों तक पहुंच रहा है और उस पर ज्यादा विज्ञापन दर क्यों ली जाए।

विज्ञापनदाता चाहते हैं साफ और मापने योग्य नतीजे

यह रेटिंग्स फ्रीज ऐसे समय आया है जब कंपनियां अपने मार्केटिंग खर्च का स्पष्ट परिणाम देखना चाहती हैं।

डिजिटल प्लेटफॉर्म विज्ञापनदाताओं को तुरंत जानकारी देते हैं कि उनके विज्ञापन कितने लोगों ने देखे, कितने क्लिक मिले, कितने लोगों ने खरीदारी की और विज्ञापन पर खर्च का कितना फायदा हुआ।

मीडिया एजेंसियों का मानना है कि अगर टीवी लंबे समय तक बिना रेटिंग्स के रहा तो डिजिटल प्लेटफॉर्म की बढ़त और मजबूत हो सकती है।

एक वैश्विक मीडिया बाइंग एजेंसी के अधिकारी ने कहा कि मार्केटिंग बजट सीमित होता है। अगर एक माध्यम अपने प्रदर्शन का डेटा नहीं दे पा रहा है और दूसरा लगातार विस्तृत रिपोर्ट दे रहा है तो कंपनियां स्वाभाविक रूप से अपना अतिरिक्त बजट उसी माध्यम में लगाएंगी।

इंडस्ट्री का मानना है कि अगर यह स्थिति लंबी चली तो Meta और Google जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म, कनेक्टेड टीवी, ऑनलाइन वीडियो और रिटेल मीडिया प्लेटफॉर्म को सबसे ज्यादा फायदा हो सकता है। पिछले कुछ वर्षों में भी कई कंपनियां सोशल मीडिया और स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म की बढ़ती लोकप्रियता के कारण डिजिटल विज्ञापनों पर खर्च बढ़ा चुकी हैं।

ब्रॉडकास्टर्स की मोलभाव करने की ताकत होगी कमजोर

टीवी चैनलों के लिए रेटिंग्स सिर्फ साप्ताहिक रिपोर्ट कार्ड नहीं होती, बल्कि विज्ञापन दरें तय करने, स्पॉन्सरशिप, इन्वेंट्री की कीमत और लंबे समय की मीडिया प्लानिंग का आधार भी होती हैं।

नई रेटिंग्स नहीं मिलने से अब विज्ञापन दरें तय करने में पुराने आंकड़ों, चैनलों के अपने डेटा और अनुमान का सहारा लेना पड़ेगा।

एक वरिष्ठ ब्रॉडकास्टर ने कहा कि टेलीविजन हमेशा स्वतंत्र रेटिंग्स के दम पर अपनी विश्वसनीयता साबित करता रहा है। जब यही पैमाना उपलब्ध नहीं होगा तो व्यावसायिक बातचीत पहले से ज्यादा कठिन हो जाएगी।

मीडिया एजेंसियों का कहना है कि फिलहाल पुराने रेटिंग्स डेटा का इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन नए शो आने के बाद पुराने आंकड़े ज्यादा उपयोगी नहीं रहेंगे।

सबसे ज्यादा परेशानी नए शो को होगी, क्योंकि उनके पास दर्शकों की संख्या साबित करने के लिए कोई ताजा डेटा ही नहीं होगा। एक एजेंसी अधिकारी ने कहा कि नए शो के लिए रेटिंग्स सबसे ज्यादा जरूरी होती हैं, क्योंकि विज्ञापनदाता बड़ा बजट लगाने से पहले उसके प्रदर्शन का प्रमाण चाहते हैं।

मीडिया प्लानिंग भी होगी प्रभावित

कई बड़ी कंपनियां हर सप्ताह रेटिंग्स के आधार पर अपने विज्ञापन अलग-अलग चैनलों और कार्यक्रमों में शिफ्ट करती हैं। लेकिन नए डेटा के बिना ऐसा करना मुश्किल हो जाएगा।

मीडिया प्लानर्स का कहना है कि जब तक स्थिति स्पष्ट नहीं होती, कई विज्ञापनदाता टीवी पर नए विज्ञापन अभियान शुरू करने में सावधानी बरत सकते हैं।

एक मीडिया निवेश विशेषज्ञ ने कहा कि अगर अनिश्चितता लंबे समय तक बनी रही तो कई ब्रांड अपना अतिरिक्त और लचीला बजट डिजिटल प्लेटफॉर्म पर खर्च करना शुरू कर सकते हैं, जहां विज्ञापन अभियान को लगातार बेहतर बनाया जा सकता है।

पूरे टीवी इकोसिस्टम पर पड़ेगा असर

इसका असर सिर्फ टीवी चैनलों तक सीमित नहीं रहेगा। नए शो बनाने वाले प्रोडक्शन हाउस रेटिंग्स के आधार पर अपने कार्यक्रम की सफलता साबित करते हैं और अगला सीजन हासिल करते हैं। डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियां चैनलों की प्लेसमेंट तय करने में रेटिंग्स का इस्तेमाल करती हैं। विज्ञापन एजेंसियां अपने अभियान की सफलता मापती हैं और कंपनियां निवेश पर मिलने वाले रिटर्न का आकलन करती हैं।

इंडस्ट्री के विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो ऐसे समय में टीवी की प्रतिस्पर्धी स्थिति कमजोर हो सकती है, जब दर्शकों का एक बड़ा वर्ग पहले ही डिजिटल प्लेटफॉर्म की ओर बढ़ रहा है।

हालांकि भारत में लाइव इवेंट, मनोरंजन और क्षेत्रीय कंटेंट के मामले में टीवी की पहुंच अब भी सबसे ज्यादा है, लेकिन बेहतर टारगेटिंग और विस्तृत डेटा के कारण डिजिटल प्लेटफॉर्म लगातार अपनी हिस्सेदारी बढ़ा रहे हैं।

एक वरिष्ठ ब्रॉडकास्ट अधिकारी ने कहा कि टीवी इंडस्ट्री ने वर्षों तक भरोसेमंद रेटिंग्स के दम पर अपनी ताकत साबित की है। अगर देश के सबसे बड़े विज्ञापन सीजन में यही रेटिंग्स उपलब्ध नहीं होंगी तो प्रतिस्पर्धी माध्यमों को स्वाभाविक रूप से फायदा मिलेगा।

त्योहारी सीजन बनेगा पहली बड़ी परीक्षा

आने वाले कुछ हफ्तों में त्योहारी विज्ञापन अभियान तेज होने वाले हैं। ऐसे में टीवी चैनलों को उम्मीद है कि रेटिंग्स पर लगी रोक जल्द हट जाएगी। क्योंकि हर गुजरता सप्ताह विज्ञापन खरीद, मीडिया प्लानिंग और नए कार्यक्रमों की रणनीति को और अधिक अनिश्चित बना रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि टीवी रातोंरात अपना महत्व नहीं खोएगा, लेकिन फिलहाल सबसे बड़ी चिंता यह है कि अगर पूरे इंडस्ट्री के पास दर्शकों को मापने का साझा और भरोसेमंद पैमाना नहीं होगा तो त्योहारी सीजन के अतिरिक्त विज्ञापन बजट का बड़ा हिस्सा डिजिटल प्लेटफॉर्म की ओर जा सकता है।

यही वजह है कि इस समय टीवी इंडस्ट्री के लिए BARC रेटिंग्स की वापसी सिर्फ साप्ताहिक रैंकिंग का मामला नहीं रह गई है, बल्कि यह देश के सबसे बड़े त्योहारी विज्ञापन बाजार में अपनी हिस्सेदारी बनाए रखने का भी अहम सवाल बन चुकी है।

 

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Adcounty Media में दो बड़े प्रस्तावों को मंजूरी, प्रतीक भंसाली बने स्वतंत्र निदेशक

डिजिटल मीडिया और विज्ञापन क्षेत्र की कंपनी Adcounty Media India Limited के शेयरधारकों ने पोस्टल बैलेट के जरिए रखे गए दोनों विशेष प्रस्तावों (Special Resolutions) को भारी बहुमत से मंजूरी दे दी है।

Vikas Saxena by
Published - Saturday, 27 June, 2026
Last Modified:
Saturday, 27 June, 2026
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डिजिटल मीडिया और विज्ञापन क्षेत्र की कंपनी Adcounty Media India Limited के शेयरधारकों ने पोस्टल बैलेट के जरिए रखे गए दोनों विशेष प्रस्तावों (Special Resolutions) को भारी बहुमत से मंजूरी दे दी है। कंपनी ने 26 जून 2026 को शेयर बाजार को इसकी जानकारी दी।

कंपनी के अनुसार, पहला प्रस्ताव प्रतीक भंसाली को कंपनी का स्वतंत्र निदेशक (Independent Director) नियुक्त करने से जुड़ा था। शेयरधारकों ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। अब प्रतीक भंसाली अगले 5 वर्षों के लिए कंपनी के स्वतंत्र निदेशक के रूप में कार्य करेंगे।

वहीं, दूसरा प्रस्ताव कुमार सौरव को कंपनी का पूर्णकालिक निदेशक (Whole-time Director) नियुक्त करने, उन्हें Executive Director का पद देने और उनके पारिश्रमिक (Remuneration) को मंजूरी देने से संबंधित था। इस प्रस्ताव को भी शेयरधारकों ने आवश्यक बहुमत के साथ मंजूरी दे दी।

कंपनी ने बताया कि दोनों प्रस्तावों पर मतदान रिमोट ई-वोटिंग के जरिए पोस्टल बैलेट के माध्यम से कराया गया। मतदान में दोनों प्रस्तावों को लगभग सर्वसम्मति से समर्थन मिला।

प्रतीक भंसाली की नियुक्ति वाले प्रस्ताव के पक्ष में 99.99% से अधिक वोट पड़े, जबकि विरोध में केवल 800 वोट दर्ज हुए।

इसी तरह कुमार सौरव की नियुक्ति और पारिश्रमिक से जुड़े प्रस्ताव को भी 99.99% से अधिक वोटों का समर्थन मिला। इस प्रस्ताव पर भी केवल 800 वोट विरोध में पड़े।

कंपनी ने यह भी स्पष्ट किया कि दूसरे प्रस्ताव पर मतदान के दौरान कुमार सौरव, जो स्वयं इस प्रस्ताव से संबंधित थे, उनके द्वारा डाले गए 6,40,400 इक्विटी शेयरों के वोट को मतदान परिणाम में शामिल नहीं किया गया। यह कदम कॉर्पोरेट गवर्नेंस के नियमों और हितों के टकराव (Conflict of Interest) से जुड़े प्रावधानों का पालन करते हुए उठाया गया।

Adcounty Media ने बताया कि पोस्टल बैलेट की वोटिंग का परिणाम और स्क्रूटिनाइज़र की रिपोर्ट कंपनी की आधिकारिक वेबसाइट पर भी उपलब्ध करा दी गई है।

इन दोनों प्रस्तावों के पारित होने के बाद कंपनी के निदेशक मंडल (Board of Directors) को मजबूती मिलने की उम्मीद है। एक ओर स्वतंत्र निदेशक के रूप में प्रतीक भंसाली बोर्ड में शामिल होंगे, वहीं कुमार सौरव कार्यकारी निदेशक के रूप में कंपनी के संचालन और रणनीतिक फैसलों में अहम भूमिका निभाएंगे।

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Signpost India को कर्नाटक हाई कोर्ट से बड़ी राहत, BBMP को PPP समझौते का पालन करने का आदेश

यह मामला Bruhat Bengaluru Mahanagara Palike (BBMP) के साथ किए गए पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) समझौते से जुड़ा है।

Vikas Saxena by
Published - Saturday, 27 June, 2026
Last Modified:
Saturday, 27 June, 2026
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आउटडोर विज्ञापन और स्मार्ट सिटी इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र की कंपनी Signpost India Limited को कर्नाटक हाई कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। कंपनी ने शेयर बाजार को दी जानकारी में बताया कि 23 जून 2026 को कर्नाटक हाई कोर्ट ने एक स्पष्टीकरण आदेश (Clarificatory Order) जारी किया है। यह आदेश 2025 में दिए गए फैसले को और स्पष्ट करता है और कंपनी के अनुबंधित अधिकारों की दोबारा पुष्टि करता है। 

यह मामला Bruhat Bengaluru Mahanagara Palike (BBMP) के साथ कंपनी के पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) समझौते से जुड़ा है। इस परियोजना के तहत Signpost India को बेंगलुरु में पुलिस बूथ, ट्रैफिक अंब्रेला और संबंधित ढांचे विकसित करने थे। इसके बदले कंपनी को तय स्थानों पर विज्ञापन डिस्प्ले पैनल लगाने और उनसे राजस्व कमाने का अधिकार दिया गया था। कंपनी और BBMP के बीच यह समझौता मार्च 2019 में हुआ था और इसकी अवधि 20 वर्ष तय की गई थी।  

विवाद तब शुरू हुआ जब BBMP ने परियोजना के दौरान कंपनी के कुछ विज्ञापन ढांचे हटाने के निर्देश दिए। BBMP का कहना था कि कुछ डिस्प्ले पैनल समझौते की शर्तों के अनुरूप नहीं हैं। इसके बाद Signpost India ने कर्नाटक हाई कोर्ट का रुख किया और कहा कि विज्ञापन पैनल लगाने का अधिकार उसे PPP समझौते के तहत मिला है, इसलिए उन्हें हटाने का आदेश अनुबंध के खिलाफ है। 

20 जून 2025 को कर्नाटक हाई कोर्ट ने कंपनी के पक्ष में फैसला सुनाया। कोर्ट ने BBMP के उन नोटिसों को रद्द कर दिया, जिनमें विज्ञापन ढांचे हटाने को कहा गया था। साथ ही BBMP को कंपनी के साथ हुए PPP समझौते और Joint Memorandum of Compromise का पालन करने का निर्देश दिया। 

अब 23 जून 2026 को जारी स्पष्टीकरण आदेश में हाई कोर्ट ने अपने पिछले फैसले को और स्पष्ट करते हुए कहा है कि Signpost India को PPP समझौते के तहत विज्ञापन डिस्प्ले पैनल लगाने और उनका रखरखाव करने का अनुबंधित अधिकार प्राप्त है। इसमें परियोजना के तहत बने पुलिस बूथ या कियोस्क के पास तथा फुटपाथ से सटे स्थानों पर विज्ञापन पैनल लगाने की भी अनुमति शामिल है, बशर्ते सभी जरूरी सुरक्षा मानकों का पालन किया जाए। कोर्ट ने BBMP को एक बार फिर निर्देश दिया है कि वह अनुबंध की शर्तों का सम्मान करे और कंपनी को समझौते के अनुसार काम करने दे।  

कंपनी ने अपने एक्सचेंज फाइलिंग में स्पष्ट किया है कि यह कोई नया मुकदमा जीतने का फैसला नहीं है, बल्कि पहले दिए गए फैसले को स्पष्ट करने वाला आदेश है। इससे कंपनी के अनुबंधित अधिकारों को लेकर किसी भी तरह की कानूनी अस्पष्टता दूर हो गई है।  

Signpost India ने यह भी कहा है कि इस कोर्ट आदेश का कंपनी की वित्तीय स्थिति पर कोई महत्वपूर्ण प्रभाव नहीं पड़ेगा। हालांकि, यह फैसला बेंगलुरु में चल रही उसकी PPP परियोजना के संचालन के लिए कानूनी रूप से अहम माना जा रहा है।  

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Vertoz ने भारत में दायर किया चौथा पेटेंट, नई तकनीक से डिजिटल ऐड को बनाएगी ज्यादा स्मार्ट

डिजिटल विज्ञापन तकनीक (AdTech) क्षेत्र की कंपनी Vertoz Limited ने भारत में अपना चौथा पेटेंट आवेदन दाखिल किया है।

Vikas Saxena by
Published - Friday, 26 June, 2026
Last Modified:
Friday, 26 June, 2026
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डिजिटल विज्ञापन तकनीक (AdTech) क्षेत्र की कंपनी Vertoz Limited ने भारत में अपना चौथा पेटेंट आवेदन दाखिल किया है। कंपनी ने 24 जून 2026 को शेयर बाजार को इसकी जानकारी देते हुए कहा कि यह कदम उसके बौद्धिक संपदा (Intellectual Property) पोर्टफोलियो को और मजबूत करेगा।

कंपनी ने बताया कि नए पेटेंट का शीर्षक "System and Method for Demand Platform Optimization (DPO) Using Machine Learning-Based DSP Prediction, Ranking, and Real-Time Slot Allotment" है।

Vertoz के मुताबिक, यह नई तकनीक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और मशीन लर्निंग (Machine Learning) की मदद से डिजिटल विज्ञापन प्रक्रिया को अधिक तेज, स्मार्ट और प्रभावी बनाएगी।

आमतौर पर जब किसी वेबसाइट या ऐप पर विज्ञापन दिखाने का मौका मिलता है, तो विज्ञापन अनुरोध (Ad Request) कई अलग-अलग विज्ञापन पार्टनर्स के पास भेजा जाता है। इससे समय भी ज्यादा लगता है और सिस्टम पर अतिरिक्त दबाव भी पड़ता है।

कंपनी की नई तकनीक पहले से ही यह अनुमान लगाएगी कि कौन-से विज्ञापन पार्टनर किसी खास विज्ञापन अवसर पर सबसे अधिक संभावना के साथ प्रतिक्रिया देंगे। इसके बाद सिस्टम उन्हीं पार्टनर्स को प्राथमिकता देगा और गैर-जरूरी अनुरोध भेजने से बचेगा।

Vertoz का कहना है कि इससे डिजिटल विज्ञापन लेनदेन (Ad Transactions) अधिक तेज और कुशल होंगे। साथ ही सर्वर और इंफ्रास्ट्रक्चर पर पड़ने वाला अतिरिक्त बोझ कम होगा, जिससे विज्ञापन तेजी से और बेहतर तरीके से यूजर्स तक पहुंचाए जा सकेंगे।

कंपनी के अनुसार, यह पेटेंट आवेदन उसके रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D) पर लगातार किए जा रहे निवेश का हिस्सा है। Vertoz का उद्देश्य डेटा आधारित और स्केलेबल तकनीकों का विकास करना है, जिससे डिजिटल विज्ञापन उद्योग में प्रदर्शन और कार्यक्षमता दोनों को बेहतर बनाया जा सके।

कंपनी ने कहा कि यह नया पेटेंट उसके बढ़ते इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी पोर्टफोलियो में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इसके जरिए Vertoz उन्नत विज्ञापन तकनीकों में अपनी क्षमताओं को मजबूत करने, नए समाधान विकसित करने और लंबे समय में अपने निवेशकों व अन्य हितधारकों के लिए बेहतर मूल्य सृजित करने पर ध्यान दे रही है।

हालांकि, कंपनी ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि इस पेटेंट को अंतिम मंजूरी कब तक मिल सकती है। फिलहाल यह केवल पेटेंट आवेदन (Patent Application) के रूप में भारत में दाखिल किया गया है।

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विज्ञापन की नई दुनिया: क्या टीवी सितारों से आगे निकल रहे हैं क्रिएटर्स?

भारत में विज्ञापन की दुनिया बीते कुछ वर्षों में जिस तेजी से बदली है, उतनी शायद पिछले दो दशकों में नहीं बदली।

Vikas Saxena by
Published - Friday, 19 June, 2026
Last Modified:
Friday, 19 June, 2026
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भारत में विज्ञापन की दुनिया बीते कुछ वर्षों में जिस तेजी से बदली है, उतनी शायद पिछले दो दशकों में नहीं बदली। एक दौर था जब कोई भी बड़ा ब्रैंड अपनी पहचान के लिए किसी बॉलीवुड सुपरस्टार या क्रिकेटर को करोड़ों रुपये देकर ब्रैंड एंबेसडर बनाता था। इनमें से आज कई ब्रैंड अपने मार्केटिंग बजट का बड़ा हिस्सा हजारों छोटे-बड़े कंटेंट क्रिएटर्स के नेटवर्क पर खर्च कर रहे हैं। यह बदलाव सिर्फ एक ट्रेंड नहीं, बल्कि एक स्ट्रक्चरल शिफ्ट है, जिसके पीछे ठोस आंकड़े मौजूद हैं।

इंडस्ट्री का आकार: कितना बड़ा है यह कारोबार?

भारत में इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग इंडस्ट्री को लेकर अलग-अलग रिसर्च फर्मों के आंकड़े थोड़े अलग हैं, लेकिन ग्रोथ की दिशा सभी में एक जैसी है। EY और Collective Artists Network की संयुक्त रिपोर्ट "The State of Influencer Marketing in India" के अनुसार, भारत में इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग सेक्टर के 2026 तक 3,375 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है और इसकी सालाना वृद्धि दर (CAGR) 18 प्रतिशत है।

वहीं इन्फ्लुएंसर डेटा प्लेटफॉर्म Kofluence की "Decoding Influence: Annual Research Report 2026"- जो 20 लाख से ज्यादा क्रिएटर्स के डेटा, 1,000 से अधिक सर्वे और 50 से ज्यादा इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स के इंटरव्यू पर आधारित है, के मुताबिक भारत का इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग सेक्टर 2025 में 3,000-3,500 करोड़ रुपये के बीच है और 2027 तक 4,500-5,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है, जिसकी सालाना ग्रोथ दर लगभग 22 प्रतिशत बनी हुई है। इस रिपोर्ट के अनुसार भारत के क्रिएटर इकोसिस्टम में अब 40 लाख से 44 लाख तक एक्टिव प्रोफेशनल्स मौजूद हैं, जिनमें से 33-37 लाख क्रिएटर्स इंस्टाग्राम को अपना प्राइमरी प्लेटफॉर्म मानते हैं।

यानी आंकड़ों में अंतर भले हो, लेकिन निष्कर्ष साफ है: यह अब एक छोटा-मोटा प्रयोग नहीं, बल्कि हजारों करोड़ रुपये की संगठित इंडस्ट्री बन चुकी है, जिसमें हर साल 18 से 22 प्रतिशत की दर से बढ़ोतरी हो रही है।

ब्रैंड बजट आखिर शिफ्ट क्यों हो रहा है?

इसकी सबसे बड़ी वजह है रीच और लागत का गणित। पहले के दौर में एक नेशनल टीवी कैंपेन या किसी सुपरस्टार के साथ करार करना ही ब्रैंड अवेयरनेस का सबसे भरोसेमंद तरीका माना जाता था। लेकिन जब किसी ब्रैंड को पूरे देश तक नहीं, बल्कि सिर्फ 18-30 साल की शहरी महिलाओं या किसी खास भौगोलिक क्षेत्र तक पहुंचना हो, तो टारगेटेड इन्फ्लुएंसर कैंपेन कहीं ज्यादा कारगर साबित होता है।

EY की रिपोर्ट इस बदलाव की एक बड़ी वजह भी बताती है। इसके अनुसार मोबाइल पर बिताए जाने वाले समय का 50 प्रतिशत हिस्सा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर खर्च होता है और इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग अब हर चार में से तीन ब्रैंड स्ट्रैटेजी में शामिल किए जाने की उम्मीद है। सीधे शब्दों में कहें तो 75 प्रतिशत ब्रैंड अब अपनी मार्केटिंग योजना में क्रिएटर्स को जगह दे रहे हैं, यह आंकड़ा बताता है कि यह अब "अतिरिक्त" खर्च नहीं, बल्कि मुख्यधारा की रणनीति बन गई है।

माइक्रो बनाम मैक्रो: ब्रैंड किसे चुन रहे हैं?

यहीं से कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा शुरू होता है। EY-Collective Artists Network रिपोर्ट के मुताबिक 47 प्रतिशत ब्रैंड्स कम लागत में बेहतर पहुंच के लिए माइक्रो और नैनो इन्फ्लुएंसर्स के साथ कैंपेन चलाना पसंद करते हैं और रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि अन्य श्रेणियों के मुकाबले नैनो इन्फ्लुएंसर्स की एंगेजमेंट दर सबसे ज्यादा रही।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि बड़े नाम पूरी तरह बाहर हो गए हैं। यही रिपोर्ट यह भी कहती है कि मार्केटर्स मेगा और माइक्रो/नैनो इन्फ्लुएंसर्स का लगभग बराबर इस्तेमाल कर रहे हैं, बड़े नाम अवेयरनेस और ब्रैंड लॉयल्टी के लिए और छोटे क्रिएटर्स एंगेजमेंट बढ़ाने के लिए। असल सवाल "Micro या Macro" का नहीं, बल्कि यह है कि ब्रैंड किस मकसद से कैंपेन चला रहा है, अगर लक्ष्य भरोसा और कनवर्शन है तो माइक्रो क्रिएटर्स आगे हैं, अगर लक्ष्य सिर्फ बड़े पैमाने पर पहचान बनाना है तो बड़े नाम अब भी जरूरी हैं।

पैरामीटर Micro/Nano Influencer Macro/Celebrity Influencer
प्राथमिकता 47% ब्रैंड्स की पहली पसंद अवेयरनेस-केंद्रित कैंपेन में इस्तेमाल
एंगेजमेंट अपेक्षाकृत ज्यादा (नैनो सबसे ऊंचा) अपेक्षाकृत कम
लागत प्रति पोस्ट कम प्रति पोस्ट बहुत ज्यादा
भरोसा भरोसा और कनवर्शन रीच और ब्रैंड लॉयल्टी

इन्फ्लुएंसर अर्थव्यवस्था के पीछे की डिजिटल बुनियाद

यह पूरा बदलाव भारत के विशाल डिजिटल यूजर बेस के बिना संभव नहीं था। DataReportal की Digital 2026: India रिपोर्ट के अनुसार अक्टूबर 2025 के अंत तक भारत में 50 करोड़ सोशल मीडिया यूजर पहचान मौजूद थे, जो देश की कुल आबादी का 34.1 प्रतिशत है। इसी रिपोर्ट के मुताबिक 2025 के अंत में मेटा के विज्ञापन टूल्स के आंकड़ों के हिसाब से भारत में इंस्टाग्राम के 48.1 करोड़ यूजर थे, जो देश की कुल आबादी के 32.8 प्रतिशत के बराबर है।

यह विशाल यूजर बेस ही वह बुनियाद है जिस पर क्रिएटर इकोनॉमी टिकी है। जितने ज्यादा लोग किसी प्लेटफॉर्म पर मौजूद होंगे, उतनी ही बारीकी से ब्रैंड अपनी ऑडियंस को टारगेट कर सकते हैं, चाहे वह उम्र, भाषा, शहर या इंटरेस्ट के आधार पर हो। यही सटीकता पारंपरिक टीवी विज्ञापन में संभव नहीं थी, जहां एक ही विज्ञापन करोड़ों दर्शकों तक एक जैसे ही रूप में पहुंचता था।

रीजनल क्रिएटर्स का उभार: मेट्रो से आगे बढ़ता भारत

शायद इस पूरी कहानी का सबसे भारतीय और सबसे कम चर्चित पहलू है रीजनल (Regional) क्रिएटर्स का उभार। Kofluence की 2026 रिपोर्ट के मुताबिक टियर 3 और टियर 4 शहर अब भारत के कुल इन्फ्लुएंसर कैंपेन का 43 से 48 प्रतिशत हिस्सा बन गए हैं और ये मार्केट मेट्रो शहरों के 3-4 प्रतिशत के मुकाबले 4.5 से 5.5 प्रतिशत तक ज्यादा एंगेजमेंट दे रहे हैं।

लागत के मामले में भी यह बदलाव ब्रैंड्स के लिए बेहद आकर्षक है। रिपोर्ट के अनुसार टियर 3 और टियर 4 मार्केट्स में औसत कैंपेन लागत 35,000 से 90,000 रुपये के बीच है, जबकि मेट्रो शहरों में यह 3.8 लाख से 4.5 लाख रुपये तक पहुंच जाती है। यानी कम खर्च में ज्यादा भरोसा और ज्यादा एंगेजमेंट, यही वजह है कि ब्रैंड अब "भारत" को सिर्फ मेट्रो शहरों के विस्तार के रूप में नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र मार्केट के रूप में देख रहे हैं।

भाषा के स्तर पर भी बदलाव साफ दिखता है। इसी रिपोर्ट के अनुसार 62 प्रतिशत से ज्यादा क्रिएटर्स का कहना है कि ब्रैंड अब उनसे क्षेत्रीय और स्थानीय भाषा में ज्यादा कंटेंट बनाने को कह रहे हैं, जो दिखाता है कि ब्रैंड ब्रीफ का रुख मेट्रो-केंद्रित आकांक्षा से हटकर क्षेत्रीय जुड़ाव की ओर मुड़ रहा है। तमिल, तेलुगु, मराठी, बंगाली जैसी भाषाओं में बने कंटेंट का असर अब सिर्फ संख्या में नहीं, बल्कि भरोसे और कनेक्शन की गहराई में भी नजर आ रहा है।

क्या क्रिएटर इकोनॉमी में बनने लगा है बबल?

जैसे-जैसे यह इंडस्ट्री बढ़ी है, इसके साथ कुछ गंभीर चुनौतियां भी सामने आई हैं और इनमें सबसे बड़ी है फेक फॉलोअर्स की समस्या। इन्फ्लुएंसर एनालिटिक्स प्लेटफॉर्म KlugKlug के विश्लेषण के अनुसार भारत में लगभग दो-तिहाई (58.5 प्रतिशत) इंस्टाग्राम प्रोफाइल्स में 60 प्रतिशत से ज्यादा संदिग्ध या फर्जी फॉलोअर्स पाए गए हैं और जांचे गए 80 लाख प्रोफाइल्स में से सिर्फ 24.8 लाख ही असली और भरोसेमंद फॉलोअर्स वाले निकले।

इसका सीधा आर्थिक असर भी सामने आया है। रिपोर्ट के सह-संस्थापक कल्याण कुमार के अनुसार ब्रैंड हर कैंपेन में फर्जी फॉलोअर्स की वजह से अपने बजट का 30 से 50 प्रतिशत हिस्सा गंवा देते हैं, और भारत इस समय फर्जी फॉलोअर्स का सबसे बड़ा सप्लायर और खरीदार दोनों है। यह आंकड़ा साफ चेतावनी देता है कि सिर्फ फॉलोअर काउंट देखकर इन्फ्लुएंसर चुनना ब्रैंड्स के लिए जोखिम भरा हो सकता है, इसीलिए अब ज्यादातर एजेंसियां और ब्रैंड एंगेजमेंट क्वालिटी, ऑडियंस की प्रामाणिकता और कन्वर्शन डेटा को फॉलोअर्स की संख्या से ज्यादा अहमियत देने लगे हैं।

भविष्य: क्या यह सिर्फ ट्रेंड है या स्थायी बदलाव?

EY की रिपोर्ट क्रिएटर इकोनॉमी को लेकर भविष्य की दिशा भी साफ करती है। रिपोर्ट के मुताबिक, 77 प्रतिशत ब्रैंड्स को भरोसा है कि उनकी एजेंसियां इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग कैंपेन प्रभावी ढंग से चला सकती हैं, और लाइफस्टाइल, फैशन व ब्यूटी जैसी कैटेगरी इस ग्रोथ को आगे बढ़ाने वाली प्रमुख श्रेणियां मानी जा रही हैं। इसके अलावा कंटेंट कंज्म्पशन के मामले में इंस्टाग्राम और YouTube इन्फ्लुएंसर कंटेंट देखने के लिए सबसे पसंदीदा प्लेटफॉर्म बने हुए हैं, हालांकि ब्रैंड खास मकसद के लिए कई दूसरे प्लेटफॉर्म्स का भी इस्तेमाल कर रहे हैं।

यह सारा डेटा मिलाकर एक स्पष्ट तस्वीर बनाता है: यह बदलाव कोई अस्थायी फैशन नहीं है, बल्कि विज्ञापन की बुनियादी संरचना में आया एक स्थायी बदलाव है। पहले एक ब्रैंड के पास एक चेहरा और एक विज्ञापन हुआ करता था; आज उसी ब्रैंड के पास सैकड़ों आवाजें और रोजाना नया कंटेंट है। क्रिएटर अब सिर्फ किसी प्रोडक्ट का एंडोर्सर नहीं, बल्कि खुद एक मीडिया चैनल बन चुका है।

भारत में विज्ञापन की दुनिया एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। 18 से 22 प्रतिशत की सालाना ग्रोथ दर के साथ बढ़ता हजारों करोड़ रुपये का इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग सेक्टर, टियर 3-4 शहरों का तेजी से उभरना, और माइक्रो-नैनो क्रिएटर्स की बढ़ती अहमियत, यह सब मिलकर बताते हैं कि ब्रैंड अब सिर्फ किसी सेलिब्रिटी का चेहरा नहीं खरीद रहे, बल्कि ऑडियंस का भरोसा खरीदने की कोशिश कर रहे हैं।

लेकिन यह तस्वीर पूरी तरह गुलाबी भी नहीं है। फर्जी फॉलोअर्स और भरोसे की कमी जैसी चुनौतियां इस इंडस्ट्री के सामने अब भी मौजूद हैं, और जो ब्रैंड डेटा-आधारित फैसले लेना सीख जाएंगे, वही इस बदलाव का सबसे ज्यादा फायदा उठा पाएंगे। कुल मिलाकर, यह सिर्फ "इन्फ्लुएंसर बनाम टीवी सितारे" की लड़ाई नहीं है, यह विज्ञापन की पूरी सोच का पुनर्निर्माण है, जहां एक बड़े चेहरे की जगह अब हजारों भरोसेमंद आवाजें ले रही हैं।

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'क्रेयॉन्स ऐडवर्टाइजिंग' ने दुबई स्थित अपनी पूर्ण स्वामित्व वाली सब्सिडियरी की बंद

मीडिया और विज्ञापन क्षेत्र की कंपनी क्रेयॉन्स ऐडवर्टाइजिंग (Crayons Advertising Limited) ने अपनी दुबई स्थित पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी Crayons Global Media LLC को बंद कर दिया है।

Vikas Saxena by
Published - Thursday, 18 June, 2026
Last Modified:
Thursday, 18 June, 2026
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मीडिया और विज्ञापन क्षेत्र की कंपनी क्रेयॉन्स ऐडवर्टाइजिंग (Crayons Advertising Limited) ने अपनी दुबई स्थित पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी Crayons Global Media LLC को बंद कर दिया है। कंपनी ने इस संबंध में शेयर बाजार को जानकारी देते हुए बताया कि दुबई के कानूनों और नियामकीय प्रक्रियाओं के तहत इस इकाई को औपचारिक रूप से भंग (Dissolve) कर दिया गया है।

कंपनी के अनुसार, Crayons Global Media LLC का पंजीकृत कार्यालय दुबई के अल-हमरिया क्षेत्र में स्थित था। हालांकि, स्थापना के बाद से इस सहायक कंपनी ने कभी कोई बिजनेस शुरू नहीं किया और न ही किसी तरह की कारोबारी गतिविधि, लेनदेन या संचालन किया।

Crayons Advertising ने स्पष्ट किया है कि यह उसकी कोई महत्वपूर्ण (Material) सहायक कंपनी नहीं थी। चूंकि इस इकाई ने कभी कारोबार शुरू ही नहीं किया, इसलिए वित्त वर्ष 2025-26 में इसका राजस्व, आय, कारोबार और नेटवर्थ शून्य रही।

कंपनी ने यह भी कहा है कि इस सहायक कंपनी को बंद किए जाने से उसके मुख्य कारोबार या राजस्व पर किसी प्रकार का प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसका कारण यह है कि स्थापना के बाद से यह इकाई निष्क्रिय रही और किसी भी तरह का व्यावसायिक योगदान नहीं दे रही थी।

शेयर बाजार को दी गई जानकारी के मुताबिक, Crayons Global Media LLC को 11 जून 2026 से प्रभावी रूप से भंग कर दिया गया है। चूंकि यह कोई बिक्री या अधिग्रहण का मामला नहीं है, इसलिए बिक्री मूल्य, खरीदार, संबंधित पक्ष (Related Party Transaction) या अन्य लेनदेन संबंधी प्रावधान यहां लागू नहीं होते।

यह जानकारी कंपनी के प्रबंध निदेशक कुणाल लालानी ने SEBI के लिस्टिंग नियमों के तहत नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) को भेजी है।

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बदल रही दर्शकों की पसंद: ‘Free’ से ज्यादा पसंद किया जा रहा ‘Ad-Free’ कंटेंट

इंटरनेट के शुरुआती दौर से डिजिटल दुनिया एक सरल फॉर्मूले पर चलती रही है, यूजर्स को मुफ्त कंटेंट मिलता है और बदले में वे विज्ञापन देखते हैं। लेकिन 2026 में यह मॉडल तेजी से बदलता नजर आ रहा है।

Vikas Saxena by
Published - Friday, 12 June, 2026
Last Modified:
Friday, 12 June, 2026
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इंटरनेट के शुरुआती दौर से डिजिटल दुनिया एक सरल फॉर्मूले पर चलती रही है, यूजर्स को मुफ्त कंटेंट मिलता है और बदले में वे विज्ञापन देखते हैं। लेकिन 2026 में यह मॉडल तेजी से बदलता नजर आ रहा है। दुनिया भर में बड़ी संख्या में लोग अब विज्ञापनों से बचने के लिए पैसे खर्च करने को तैयार हैं। वे सिर्फ ऐड्स को नजरअंदाज नहीं कर रहे, बल्कि विज्ञापन-मुक्त अनुभव के लिए प्रीमियम सेवाओं की सदस्यता भी ले रहे हैं।

यही बदलाव ‘Ad Avoidance Economy’ को जन्म दे रहा है, जहां उपभोक्ता का समय और ध्यान पहले से कहीं अधिक मूल्यवान हो गया है। यह केवल एक अस्थायी ट्रेंड नहीं, बल्कि डिजिटल मीडिया, विज्ञापन और कंटेंट इंडस्ट्री की दिशा बदलने वाला बड़ा परिवर्तन है। इसके पीछे मौजूद आंकड़े भी इसी बदलाव की गंभीरता को दिखाते हैं।

Ad Avoidance क्या है?

Ad Avoidance यानी यूजर्स का जानबूझकर ऐड्स से दूर रहना। आज के समय में इसके कई अलग-अलग रूप देखने को मिलते हैं:

ऐड ब्लॉकर्स: ये ऐसे सॉफ्टवेयर टूल्स होते हैं, जिन्हें ब्राउजर में इंस्टॉल किया जाता है। ये वेबसाइट्स पर आने वाले ऐड्स को अपने आप ब्लॉक कर देते हैं, जिससे यूजर को ऐड दिखाई ही नहीं देते।

Skip Culture: जैसे ही मौका मिलता है, यूजर ऐड स्किप कर देता है, चाहे वो वीडियो प्लेटफॉर्म पर “Skip Ad” बटन दबाना हो या OTT पर कंटेंट को आगे बढ़ा देना। यह भी ad avoidance का ही हिस्सा है।

Premium Subscriptions: आज कई लोग ऐड से बचने के लिए पैसे देने को भी तैयार हैं। जैसे Spotify Premium, YouTube Premium, Netflix और JioHotstar Premium, ये सभी “ad-free experience” के बदले यूजर्स से फीस लेते हैं।

Privacy Browsers: कुछ ब्राउजर जैसे Brave पहले से ही ऐसे बनाए गए हैं, जो ऐड्स और ट्रैकर्स को डिफॉल्ट रूप से ब्लॉक कर देते हैं। इससे यूजर को ज्यादा प्राइवेसी और बिना ऐड का अनुभव मिलता है।

कुल मिलाकर, आज का यूजर विज्ञापन देखने से बचने के लिए हर तरीका अपना रहा है, चाहे टेक्नोलॉजी का सहारा लेना हो या फिर पैसे खर्च करना। यह सभी मिलकर एक ऐसी इकनॉमी बना रहे हैं, जहां यूजर की सबसे बड़ी चाहत है- "बस मुझे ऐड मत दिखाओ।"

आंकड़े जो बताते हैं असली तस्वीर

अगर आप सोचते हैं कि सिर्फ कुछ “tech-savvy” (टेक एक्सपर्ट) लोग ही ऐड्स ब्लॉक करते हैं, तो जरा ये आंकड़े देखिए:

Statista और Blockthrough (eyeo) के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक,  2023 की दूसरी तिमाही में दुनियाभर में करीब 91.2 करोड़ (912 मिलियन) लोग नियमित रूप से ऐड ब्लॉकर का इस्तेमाल कर रहे थे और यह संख्या लगातार बढ़ रही है। Backlinko के मार्च 2026 अपडेट के अनुसार, GWI के 2025 की दूसरी तिमाही में डेटा में करीब 29.5% इंटरनेट यूजर्स किसी न किसी रूप में ऐड ब्लॉकिंग का इस्तेमाल करते हैं, जो लगभग 1.77 अरब लोगों के बराबर है। यानी दुनिया का करीब हर तीसरा इंटरनेट यूजर किसी न किसी तरीके से ऐड्स को ब्लॉक या फिल्टर कर रहा है।

मोबाइल पर यह बदलाव और भी तेज है। 2014 में सिर्फ 9.9 करोड़ लोग मोबाइल पर ऐड ब्लॉकर का इस्तेमाल करते थे, लेकिन 2023 तक यह संख्या बढ़कर 49.6 करोड़ हो गई, यानी करीब पांच गुना से ज्यादा उछाल। वहीं डेस्कटॉप पर यह आंकड़ा 41.6 करोड़ के आसपास है।

देशों की बात करें तो जर्मनी में करीब 49% इंटरनेट यूजर्स ऐड ब्लॉकर्स इस्तेमाल करते हैं। इंडोनेशिया, वियतनाम और चीन में यह आंकड़ा 38–40% से ज्यादा है। Statista और GWI के सर्वे के मुताबिक भारत में भी करीब 50% इंटरनेट यूजर्स किसी न किसी रूप में ऐड ब्लॉकिंग टूल्स का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो मोबाइल-फर्स्ट इंटरनेट यूसेज की वजह से तेजी से बढ़ रहा है।

प्राइवेसी पर फोकस करने वाला ब्राउजर Brave भी तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। अक्टूबर 2025 तक इसके 10 करोड़ (100 मिलियन) मंथली एक्टिव यूजर्स हो चुके हैं और इसमें डिफॉल्ट रूप से सभी ऐड्स और ट्रैकर्स ब्लॉक होते हैं।

Spotify और YouTube Premium: सब्सक्रिप्शन इकनॉमी का असली चेहरा

अगर ऐड से बचाव सिर्फ "फ्री में" होता, तो शायद इंडस्ट्री इसे नजरअंदाज कर सकती थी। लेकिन यूजर अब इसके लिए पैसे भी दे रहे हैं और यही सबसे बड़ी बात है।

Spotify की बात करें तो कंपनी के Q1 2026 (जनवरी–मार्च 2026) के आधिकारिक SEC filing के अनुसार, Spotify के 29.3 करोड़ (293 मिलियन) प्रीमियम सब्सक्राइबर्स हो चुके हैं। Q1 2025 में यह 26.8 करोड़ थे, यानी एक साल में 9% की बढ़ोतरी और 2.5 करोड़ (25 मिलियन) नए पेइंग यूजर्स। इन सभी ने मुख्यतः एक ही वजह से प्रीमियम लिया- ऐड-फ्री म्यूजिक सुनने के लिए। Spotify के कुल 76.1 करोड़ मंथली एक्टिव यूजर्स हैं (Q1 2026), जिनमें से 48.3 करोड़ ऐड-सपोर्टेड फ्रीम यूजर्स हैं, जो या तो ऐड्स सहते हैं, या एक दिन प्रीमियम लेने की राह पर हैं।

YouTube Premium की कहानी भी कम रोचक नहीं है। YouTube की आधिकारिक घोषणा और Statista के अनुसार, मार्च 2025 तक YouTube Premium और YouTube Music के मिलाकर 12.5 करोड़ (125 मिलियन) subscribers हो चुके थे — जो फरवरी 2024 में 10 करोड़ थे, यानी एक साल में 25% की छलांग। 2020 में यह सिर्फ 3 करोड़ थे। 2026 पहली तिमाही में एल्फाबेट के सीईओ सुंदर पिचई ने अर्निंग कॉल्स में कंफर्म किया कि

YouTube Music और YouTube Premium ने लॉन्च के बाद से अपने non-trial (यानी पेड) सब्सक्राइबर्स में अब तक की सबसे बड़ी तिमाही बढ़ोतरी दर्ज की है। हालांकि कंपनी ने नई सटीक संख्या सार्वजनिक नहीं की है।

यह सब्सक्रिप्शन इकनॉमी की ताकत है। लोग महीने के ₹149 (India, YouTube Premium Individual Plan) या $13.99 (US) खर्च करने को तैयार हैं, सिर्फ इसलिए कि कोई ऐड न आए।

भारत का OTT बाजार: ऐड से प्रीमियम की ओर सफर

भारत में यह बदलाव और भी नाटकीय है। यहां OTT मार्केट की कहानी "फ्री से प्रीमियम" की तरफ जाने की कहानी है।

FICCI-EY 2026 की रिपोर्ट (मार्च 2026) के अनुसार, भारत में डिजिटल सब्सक्रिप्शन रेवेन्यू 60% बढ़कर ₹16,300 करोड़ (INR 163 billion) हो गईं। 2025 में पेड वीडियो सब्सक्रिप्शन 21.6 करोड़ (216 मिलियन) तक पहुंच गईं, जो 14.3 करोड़ घरों में फैली हैं। तुलना के लिए, 2024 में यह संख्या 11.1 करोड़ थी (FICCI-EY 2025 Report, मार्च 2025)। यानी एक साल में लगभग दोगुनी।

JioHotstar (Disney+ Hotstar और JioCinema का विलय) ने 2025 की शुरुआत में IPL के लिए फ्रीमियम मॉडल से पेड सब्सक्रिप्शन की तरफ शिफ्ट किया और इस एक रणनीतिक कदम ने मार्केट को 14.3 करोड़ भुगतान करने वाले घरों तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई।

भारत में औसत OTT व्युअर अब 3 प्लेटफॉर्म्स सब्सक्राइब करता है और हर महीने ₹1,360 से ज्यादा खर्च करता है। भारत में Connected TV (CTV) यूजर्स की संख्या 2024 के 6.97 करोड़ से बढ़कर 2025 में 12.92 करोड़ हो गई, यानी सालभर में 85% की ग्रोथ (FICCI-EY 2026)। बड़े screen पर देखने वाले प्रीमियम एक्सपीरियंस के लिए ज्यादा भुगतान करते हैं।

यूजर आखिर ऐड्स से क्यों भाग रहा है?

यह समझना जरूरी है कि यह सिर्फ "ऐड्स पसंद नहीं" जैसी बात नहीं है। इसके पीछे कई ठोस कारण हैं:

  1. ऐड्स से बचने की वजहें (Ad Avoidance के कारण):

    ऐड्स की बाढ़: eyeo की 2023 Ad-Filtering रिपोर्ट के मुताबिक, 63.2% यूजर्स ऐड्स इसलिए ब्लॉक करते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि हर जगह बहुत ज्यादा विज्ञापन हैं।

    Intrusive Ads (परेशान करने वाले फॉर्मेट): Auto-play वीडियो जो अचानक आवाज के साथ चल पड़ते हैं, या पॉप-अप्स जो पूरी स्क्रीन ढक लेते हैं—इनको 53.4% से ज्यादा यूजर्स “रुकावट डालने वाला” मानते हैं (eyeo, 2023)।

    प्राइवेसी की चिंता: करीब 40.3% यूजर्स कहते हैं कि वे अपनी प्राइवेसी बचाने के लिए ऐड ब्लॉकर इस्तेमाल करते हैं। eyeo और The Harris Poll के नवंबर 2024 सर्वे के मुताबिक, 96% ad-filtering यूजर्स ऑनलाइन प्राइवेसी के लिए खुद कदम उठाते हैं।

    धीमी वेबसाइट (Slow Loading): जिन वेबसाइट्स पर ज्यादा ऐड होते हैं, वे धीमी खुलती हैं और मोबाइल डेटा भी ज्यादा खर्च करती हैं, खासतौर पर भारत जैसे मोबाइल-फर्स्ट देशों में यह बड़ी वजह है।

    बार-बार वही ऐड (Repetitive Targeting): अगर आपने एक बार कोई प्रोडक्ट देख लिया, तो वही ऐड हर जगह दिखता रहता है। कई यूजर्स इसे “पीछा करने जैसा” अनुभव मानते हैं, जो उन्हें परेशान करता है।

    सख्ती का उल्टा असर: जब YouTube ने 2024–2025 में ऐड ब्लॉकर्स के खिलाफ सख्त कदम उठाए और ऐसे यूजर्स के लिए वीडियो लोडिंग धीमी कर दी, तो इसका उल्टा असर देखने को मिला। All About Cookies के सर्वे के मुताबिक, 22% यूजर्स और ज्यादा ऐड ब्लॉकिंग टूल्स खोजने लगे। वहीं सिर्फ 11% लोगों ने कहा कि वे अब ऐड ब्लॉकर कम इस्तेमाल करेंगे।

ब्रैंड्स और विज्ञापनदाताओं पर असर क्या पड़ रहा है?

eyeo और Blockthrough की 2023 Ad-Filtering रिपोर्ट के मुताबिक, ऐड ब्लॉकर्स की वजह से 2024 में दुनियाभर के पब्लिशर्स को करीब 54 अरब डॉलर का नुकसान हुआ, जो ग्लोबल डिजिटल ऐड स्पेंड का लगभग 8% है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि अगर “Acceptable Ads” जैसे सिस्टम न होते, तो यह नुकसान 116 अरब डॉलर तक पहुंच सकता था।

Ad Fatigue (ऐड्स से थकान) अब एक बड़ी मार्केटिंग समस्या बन चुकी है। eyeo और The Harris Poll के नवंबर 2024 सर्वे में 89% यूजर्स ने कहा कि ऑनलाइन ऐड्स की संख्या और उनकी परेशान करने वाली प्रकृति पर इंडस्ट्री लेवल पर लिमिट लगनी चाहिए।

ROI (रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट) भी लगातार गिर रहा है। पारंपरिक डिस्प्ले ऐड्स का असर कम होता जा रहा है। “Banner blindness” यानी यूजर्स का बैनर ऐड्स को बिना देखे नजरअंदाज करना, अब एक साबित मनोवैज्ञानिक व्यवहार बन चुका है।

ट्रस्ट (विश्वास) भी बड़ा मुद्दा बन गया है।
अगर कोई यूजर सिर्फ ऐड्स से बचने के लिए पैसे देने लगे, तो यह ब्रैंड के लिए साफ संकेत है कि कहीं न कहीं वह यूजर एक्सपीरियंस में फेल हो रहा है।

इंडस्ट्री का जवाब: बदलाव की कोशिश

विज्ञापन इंडस्ट्री अब खुद को बदलने की कोशिश कर रही है:

Native Advertising: ऐसे ऐड्स जो कंटेंट जैसे दिखते और महसूस होते हैं। ये कम ब्लॉक होते हैं क्योंकि ये कंटेंट के साथ घुल-मिल जाते हैं।

Content Marketing: ब्रैंड्स अब खुद कंटेंट बना रहे हैं- वीडियो, ब्लॉग, पॉडकास्ट, जहां ऐड अलग से नहीं, बल्कि कंटेंट का हिस्सा बन जाता है।

Influencer Integration: क्रिएटर इकॉनमी में ब्रैंड्स अब इन्फ्लुएंसर्स के जरिए प्रोडक्ट को “सिफारिश” की तरह पेश कर रहे हैं, जिससे वह ऐड कम और पर्सनल सुझाव ज्यादा लगता है।

Acceptable Ads Program: eyeo (AdBlock Plus बनाने वाली कंपनी) का यह प्रोग्राम ऐसे ऐड्स को अनुमति देता है जो यूजर को परेशान नहीं करते। 2025 तक इसमें करीब 40 करोड़ यूजर्स शामिल हो चुके थे (स्रोत: eyeo; eMarketer 2026)। इससे साफ है कि यूजर्स हर ऐड के खिलाफ नहीं हैं- वे सिर्फ खराब और intrusive ऐड्स से परेशान हैं।

Short-form Subtle Branding: YouTube Shorts और Instagram Reels जैसे फॉर्मेट्स में ब्रैंडिंग इतनी नेचुरल तरीके से होती है कि यूजर उसे स्किप करने की सोचता ही नहीं।

क्या विज्ञापन का भविष्य बदल रहा है?

2026 में एक बात साफ नजर आ रही है- विज्ञापन का पुराना “Interruption Model”, यानी कंटेंट के बीच में जबरदस्ती ऐड दिखाना, अब पहले जैसा असरदार नहीं रहा है। यूजर्स अब ऐसे ऐड्स से बचने लगे हैं और उन्हें नजरअंदाज करना सीख चुके हैं।

अब इंडस्ट्री में धीरे-धीरे बड़ा बदलाव दिख रहा है। पहले जहां ब्रांड्स यूजर्स पर ऐड्स “थोपते” थे, वहीं अब फोकस यूजर को बेहतर अनुभव देने पर शिफ्ट हो रहा है। मतलब Interruption से Experience की तरफ बढ़त हो रही है।

इसी तरह, पहले जहां सिर्फ मैसेज “पुश” करने पर जोर था, अब ब्रांड्स यूजर के साथ जुड़ने और उन्हें एंगेज करने पर ध्यान दे रहे हैं। यानी Push से Engagement की तरफ ट्रेंड बदल रहा है।

साथ ही, डेटा के अंधाधुंध इस्तेमाल के बजाय अब भरोसा जीतना ज्यादा जरूरी हो गया है। इसलिए Data से Trust की तरफ भी साफ बदलाव दिख रहा है।

कुल मिलाकर, अब Privacy-first advertising को भविष्य माना जा रहा है—जहां यूजर को साफ-साफ पता हो कि उसका डेटा कैसे और क्यों इस्तेमाल किया जा रहा है। यही अप्रोच आने वाले समय में विज्ञापन की दिशा तय करेगी।

इंडस्ट्री के लिए साफ चेतावनी

Ad Avoidance Economy अब सिर्फ कुछ लोगों की शिकायत नहीं रही, बल्कि करोड़ों यूजर्स का एक बड़ा संकेत बन चुकी है।

जब Spotify पर Q1 2026 में 29.3 करोड़ लोग पैसे देकर ऐड्स से बच रहे हों, जब YouTube Premium के 12.5 करोड़ सब्सक्राइबर्स (मार्च 2025) ऐड-फ्री एक्सपीरियंस के लिए पैसे दे रहे हों, और भारत में डिजिटल सब्सक्रिप्शन तेजी से बढ़ रहा हो, तो यह इंडस्ट्री के लिए एक साफ संदेश है।

अगर विज्ञापन यूजर के अनुभव का सम्मान नहीं करेंगे, अगर वे लगातार परेशान करने वाले, दोहराव वाले और प्राइवेसी में दखल देने वाले बने रहेंगे—तो यूजर उन्हें पूरी तरह से नजरअंदाज कर देगा। और इसके लिए वह पैसे खर्च करने को भी तैयार है।

जो इंडस्ट्री इस बदलाव को समझ लेगी, वही आगे टिकेगी। जो नहीं समझेगी- वह धीरे-धीरे यूजर के लिए “इनविजिबल” हो जाएगी।

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महंगाई के दौर में भी विज्ञापन पर बढ़ता खर्च, आखिर FMCG कंपनियों की क्या है रणनीति?

जहां एक तरफ कच्चे माल की बढ़ती कीमतें और महंगाई मार्जिन को निचोड़ रही है, वहीं दूसरी तरफ देश की बड़ी FMCG कंपनियां अपने विज्ञापन बजट में कटौती करने की बजाय उसे लगातार बढ़ा रही हैं।

Vikas Saxena by
Published - Monday, 08 June, 2026
Last Modified:
Monday, 08 June, 2026
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भारतीय FMCG सेक्टर में इस वक्त एक अघोषित विज्ञापन युद्ध छिड़ा हुआ है। जहां एक तरफ कच्चे माल की बढ़ती कीमतें और महंगाई मार्जिन को निचोड़ रही है, वहीं दूसरी तरफ देश की बड़ी FMCG कंपनियां अपने विज्ञापन बजट में कटौती करने की बजाय उसे लगातार बढ़ा रही हैं। FY26 के आंकड़े इस रणनीति की साफ तस्वीर पेश करते हैं।

भारत का सबसे बड़ा विज्ञापनदाता: FMCG

भारतीय विज्ञापन उद्योग में FMCG सेक्टर की पकड़ सबसे मजबूत है। dentsu-e4m के डिजिटल ऐडवर्टाइजिंग रिपोर्ट 2026 के अनुसार, 2025 में FMCG का कुल विज्ञापन खर्च ₹36,084 करोड़ रहा, जो भारत के समग्र विज्ञापन बाजार (₹1,21,339 करोड़) का 30% है। वहीं, पिच मेडिसन ऐडवर्टाइजिंग रिपोर्ट 2025 कहती है कि पारंपरिक मीडिया (टीवी, प्रिंट, रेडियो) में भी FMCG की हिस्सेदारी 32-33% के आसपास बनी हुई है। TAM Media Research के मुताबिक 2026 में भी FMCG, रिटेल, ई-कॉमर्स और ऑटोमोबाइल के साथ विज्ञापन वॉल्यूम में अग्रणी बना रहेगा।

कंपनी-दर-कंपनी: FY26 बनाम FY25

हिन्दुस्तान यूनिलीविर (HUL)

देश की सबसे बड़ी FMCG कंपनी HUL ने FY26 में विज्ञापन एवं प्रमोशन पर ₹6,261 करोड़ खर्च किए, जो FY25 के ₹5,989 करोड़ (continuing operations) के मुकाबले करीब 4.5% ज्यादा है। यह कंपनी के कुल टर्नओवर का 9.8% है। अकेले Q4 FY26 में HUL ने ₹1,509 करोड़ विज्ञापन पर लगाए, जो एक साल पहले के ₹1,423 करोड़ से 6% अधिक है।

HUL की 2025-26 की चौथी तिमाही के नतीजों के दौरान कंपनी CEO व MD प्रिया नायर ने कहा था कि कंपनी ने FY26 में ब्रैंड बिल्डिंग में रणनीतिक निवेश जारी रखा, जिसके चलते पूरे साल 5% अंडरलाइंग सेल्स ग्रोथ हासिल हुई।

Nestlé India

Nestlé India ने FY26 में सबसे आक्रामक रणनीति अपनाई। वित्तीय वर्ष 2025-26 की चौथी तिमाही (Q4 FY26) में कंपनी के विज्ञापन एवं प्रमोशन खर्च में साल-दर-साल 50% से भी ज्यादा की बढ़ोतरी हुई। इससे पहले वित्तीय वर्ष 2026 की तीसरी तिमाही (Q3 FY26) में भी विज्ञापन खर्च में 42% की तेज वृद्धि दर्ज की गई थी। यह रणनीति सीधे नतीजों में दिखी, चौथी तिमाही (Q4 FY26) में Nestlé का शुद्ध मुनाफा 27% बढ़कर ₹1,111 करोड़ पहुंच गया और कंपनी ने पांच साल की सबसे तेज वॉल्यूम ग्रोथ दर्ज की। तुलना के लिए, FY25 में Nestlé ने विज्ञापन पर ₹965.86 करोड़ खर्च किए थे, जो कि FY26 में किए गए आक्रामक निवेश की तुलना में काफी कम था। नतीजा साफ है कि जब Nestlé ने विज्ञापन बढ़ाया, बाजार हिस्सेदारी और मुनाफा दोनों बढ़े।

Dabur India

Dabur ने वित्तीय वर्ष 2026 की पहली तिमाही (Q1 FY26) में ₹201.96 करोड़, दूसरी तिमाही में ₹233.57 करोड़, तीसरी तिमाही में ₹238.02 करोड़ और चौथी तिमाही में ₹214.51 करोड़ विज्ञापन पर खर्च किए। पूरे FY26 में Dabur का कुल विज्ञापन खर्च ₹888.06 करोड़ रहा, जो FY25 के ₹864.64 करोड़ से 2.7% अधिक है। Dabur के अनुसार FY26 में कंपनी के भारत कारोबार ने अपने 95% पोर्टफोलियो में बाजार हिस्सेदारी हासिल की।

ITC

ITC ने FY26 में अपने FMCG-Others सेगमेंट (ब्रैंडेड पैकेज्ड फूड, पर्सनल केयर आदि) में ब्रैंड बिल्डिंग जारी रखी। पूरे साल FMCG-Others का राजस्व ₹24,321 करोड़ रहा, जो FY25 के ₹22,015 करोड़ से करीब 10.5% अधिक है। हालाँकि ITC सिगरेट व्यवसाय में 1 फरवरी 2026 से लागू हुए अभूतपूर्व टैक्स बदलाव ने चुनौतियां पैदा कीं।

डिजिटल ने TV को पछाड़ा, ऐतिहासिक बदलाव

FY26 की सबसे बड़ी मीडिया क्रांति यह है कि FMCG सेक्टर में पहली बार डिजिटल विज्ञापन खर्च ने टेलीविजन को निर्णायक रूप से पीछे छोड़ दिया है। dentsu-e4m की रिपोर्ट के अनुसार FMCG का डिजिटल हिस्सा 2024 में 53% था जो 2025 में बढ़कर 64% हो गया। इसके उलट TV की हिस्सेदारी 40% से घटकर 29% रह गई। प्रिंट 4% से 3% और OOH 3% से 2% पर आ गया।

TAM AdEx 2025 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में लीनियर TV के विज्ञापन वॉल्यूम में साल-दर-साल 11% की गिरावट आई, जिसकी बड़ी वजह FMCG ब्रैंड्स का सतर्क रुख रहा।

dentsu-e4m की 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का कुल डिजिटल विज्ञापन खर्च 2025 में 19% बढ़कर ₹71,621 करोड़ हो गया। Ipsos के अनुसार FY26 में यह 15% और बढ़कर ₹56,400 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है, जो कुल मीडिया बजट का 46% होगा। इसी रिपोर्ट के मुताबिक 2025 में भारत में 806 मिलियन इंटरनेट यूजर थे और CTV (Connected TV) के 4 करोड़ यूजर्स हैं, जो 2026 में 5 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है।

FMCG के डिजिटल बजट की आंतरिक बनावट भी बदल रही है। 2025 में ऑनलाइन वीडियो का हिस्सा 45% और सोशल मीडिया का 30% रहा, यानी तीन-चौथाई डिजिटल बजट इन्हीं दो फॉर्मेट में जा रहा है। यहां तक कि Parle जैसी कंपनी ने भी 2025 में अपना डिजिटल खर्च कुल मार्केटिंग बजट का 20% बताया और 2026 में इसे 25% तक ले जाने की योजना है।

क्विक कॉमर्स: नया विज्ञापन अड्डा

FMCG कंपनियों के लिए Blinkit, Zepto और Swiggy Instamart अब सिर्फ डिलीवरी प्लेटफॉर्म नहीं, बल्कि एक नया विज्ञापन चैनल बन चुके हैं। स्पॉन्सर्ड लिस्टिंग, सर्च प्लेसमेंट और प्रीमियम विजिबिलिटी पैकेज के जरिए ये प्लेटफॉर्म तेजी से विज्ञापन राजस्व कमा रहे हैं। Datum Intelligence की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2026 में Blinkit, Zepto और Instamart मिलकर करीब ₹4,900 करोड़ का विज्ञापन राजस्व जुटा सकते हैं।

क्विक कॉमर्स पर विज्ञापन खर्च करने वाले ब्रैंड्स को पारंपरिक डिजिटल चैनलों के मुकाबले काफी ज्यादा कन्वर्जन मिल रहा है। भारत का रिटेल मीडिया खर्च 2025 में 21.9% की रफ्तार से बढ़ रहा है, जो पेड सर्च (6.7%) और पेड सोशल (8.7%) से कहीं आगे है।

इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग बनाम TV सेलिब्रिटी

FMCG ब्रैंड अब बड़े टीवी सेलिब्रिटीज की जगह क्रिएटर इकोनॉमी पर भरोसा बढ़ा रहे हैं। एक सर्वे के अनुसार 61% मार्केटर्स 2026 में क्रिएटर कंटेंट में निवेश बढ़ाने की योजना बना रहे हैं। Instagram, YouTube और OTT पर माइक्रो-इन्फ्लुएंसर कैंपेन तेजी से बढ़ रहे हैं क्योंकि ये न केवल सस्ते होते हैं, बल्कि एक खास दर्शक वर्ग तक सटीक पहुंच भी बनाते हैं।

हालांकि, बड़े टेलीविजन सेलिब्रिटी और क्रिकेट प्रायोजन अभी भी ग्रामीण और अर्ध-शहरी बाजारों में ब्रैंड रिकॉल के लिए जरूरी माने जाते हैं। Britannia जैसी कंपनियां AI और वेदर API का उपयोग करते हुए हाइपर-टार्गेटेड लोकल कैंपेन चला रही हैं, जैसे बारिश वाले दिनों में उत्तर-पूर्व भारत में बटर-चाय के साथ Good Day बिस्किट का प्रचार।

ग्रामीण भारत: एक अलग रणनीति

ग्रामीण बाजार के लिए FMCG कंपनियों की रणनीति शहरों से बिल्कुल अलग है। यहां ₹5 और ₹10 के छोटे पैक का प्रचार अहम है। क्षेत्रीय भाषाओं में विज्ञापन और मोबाइल-फर्स्ट अप्रोच ग्रामीण दर्शकों तक पहुंचने का मुख्य जरिया बन रहे हैं। डिजिटल अब उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में भी टेलीविजन को टक्कर दे रहा है।

लागत का दबाव, फिर भी ब्रैंड बिल्डिंग जारी

एक बड़ा सवाल यह है कि जब कच्चे माल की कीमतें ऊँची हों, मार्जिन पर दबाव हो, तो कंपनियां विज्ञापन क्यों बढ़ा रही हैं? इसका जवाब बाजार हिस्सेदारी की रक्षा में छिपा है। HUL ने कहा है कि भू-राजनीतिक तनाव और कमोडिटी की उठा-पटक के बावजूद ब्रैंड बिल्डिंग में कोई समझौता नहीं किया जाएगा। Nestlé ने तो Q4 FY26 में 50% से ज्यादा विज्ञापन खर्च बढ़ाते हुए भी 26.3% का EBITDA मार्जिन बनाए रखा, यह कुशल लागत प्रबंधन की मिसाल है।

Dabur का उदाहरण भी रोचक है। जिस तिमाही (Q2 FY26) में कंपनी ने विज्ञापन खर्च 16% तिमाही दर तिमाही बढ़ाया, उसी तिमाही टूथपेस्ट में 14.3% और फूड्स में 14% की ग्रोथ आई, और भारत कारोबार के 95% पोर्टफोलियो में मार्केट शेयर गेन हुआ। यह विज्ञापन और बाजार हिस्सेदारी के बीच सीधे संबंध का प्रमाण है।

AI और डेटा-ड्रिवन विज्ञापन: भविष्य की दिशा

FMCG कंपनियां अब प्रोग्रामैटिक ऐडवर्टाइजिंग, पर्सनलाइज्ड एड्स और रिटेल मीडिया नेटवर्क्स का उपयोग तेजी से बढ़ा रही हैं। 2025 में प्रोग्रामैटिक ऐडवर्टाइजिंग ने कुल डिजिटल खर्च का 42% यानी ₹30,081 करोड़ का हिस्सा लिया और 2027 तक इसके ₹42,435 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है (dentsu-e4m)। पहली-पार्टी डेटा (First-party data) और Retail Media Networks FMCG के लिए अगली बड़ी विज्ञापन क्रांति बन रही है।

FY26 भारतीय FMCG विज्ञापन इतिहास में एक मील का पत्थर है। HUL ने ₹6,261 करोड़ खर्च करके रिकॉर्ड बनाया, Nestlé ने Q4 में 50% से ज्यादा की छलांग लगाई, और Dabur ने पूरे साल ₹888.06 करोड़ के खर्च के साथ बढ़त बनाए रखी। डिजिटल ने पहली बार टेलीविजन को पछाड़ा, क्विक कॉमर्स एक नया विज्ञापन युद्धक्षेत्र बना, और AI-आधारित टार्गेटिंग ने मार्केटिंग को नई धार दी।

यह विज्ञापन युद्ध सिर्फ पैसों का खेल नहीं है, यह भारतीय उपभोक्ता के दिमाग में जगह बनाने की होड़ है, जो अगले कुछ वर्षों में और तेज होने वाली है।

 

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मीडिया कार्टेलाइजेशन मामले में AAAI पर गंभीर आरोप, CCI जांच में बढ़ी मुश्किलें

भारत की विज्ञापन इंडस्ट्री की सबसे पुरानी संस्थाओं में शामिल ऐडवर्टाइजिंग एजेंसीज एसोसिएशन ऑफ इंडिया (AAAI) इस साल अपने 80 साल पूरे होने का जश्न मना रही है।

Samachar4media Bureau by
Published - Monday, 25 May, 2026
Last Modified:
Monday, 25 May, 2026
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भारत की विज्ञापन इंडस्ट्री की सबसे पुरानी संस्थाओं में शामिल ऐडवर्टाइजिंग एजेंसीज एसोसिएशन ऑफ इंडिया (AAAI) इस साल अपने 80 साल पूरे होने का जश्न मना रही है। लेकिन इस खास मौके पर संस्था एक बड़ी जांच और विवाद के घेरे में भी आ गई है।

भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) की चल रही जांच ने AAAI की साख और विरासत पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि संस्था ने देश की कुछ बड़ी मीडिया एजेंसियों के बीच कथित कार्टेलबाजी यानी मिलकर बाजार को प्रभावित करने वाली गतिविधियों में मदद की।

मार्च 2024 में CCI की छापेमारी के बाद यह मामला और गंभीर हो गया। इसके बाद विज्ञापन और मीडिया इंडस्ट्री में काम करने के तरीके, पारदर्शिता और इंडस्ट्री संगठनों की भूमिका पर बड़ी बहस शुरू हो गई।

CCI की जांच में क्या सामने आया?

CCI ने विज्ञापन और मीडिया बाइंग नेटवर्क से जुड़े करीब 10 ठिकानों पर छापे मारे थे। इनमें AAAI के अलावा इंडियन ब्रॉडकास्टिंग एंड डिजिटल फाउंडेशन (IBDF) और इंडियन सोसायटी ऑफ ऐडवर्टाइजर्स (ISA) जैसे संगठन भी शामिल थे।

रेगुलेटर यह जांच कर रहा है कि क्या प्रतिस्पर्धी एजेंसियों ने आपस में विज्ञापन दरें, कमीशन और डिस्काउंट स्ट्रक्चर तय करने के लिए मिलकर काम किया। अगर ऐसा हुआ है तो यह Competition Act की धारा 3(3) का उल्लंघन माना जाएगा।

7 फरवरी की एक 16 पन्नों की आंतरिक CCI रिपोर्ट में दावा किया गया कि एजेंसियों के बीच WhatsApp ग्रुप, अनौपचारिक बैठकों और वर्चुअल मीटिंग्स के जरिए संवेदनशील कारोबारी जानकारी साझा की जाती थी।

रिपोर्ट में कहा गया कि AAAI सिर्फ एक इंडस्ट्री फोरम की भूमिका में नहीं था, बल्कि कथित तौर पर कमीशन स्ट्रक्चर तय कराने और एजेंसियों को तय नियमों से अलग न जाने के लिए प्रेरित करने में भी शामिल था।

एक मामले में आरोप है कि संस्था ने सर्विस बेस्ड कॉन्ट्रैक्ट्स के लिए फीस तय करने का एक फॉर्मूला भी बनाया था, जिसे CCI संभावित एंटी-कॉम्पिटिटिव गतिविधि मान रहा है।

CCI दस्तावेज में कहा गया है कि “AAAI और उसके सदस्य कानून का उल्लंघन कर रहे हैं।”

छापेमारी के बाद जारी एडवाइजरी भी जांच के घेरे में

दिलचस्प बात यह है कि छापेमारी के तुरंत बाद AAAI ने अपनी सदस्य एजेंसियों को एक एडवाइजरी जारी की थी। इसमें कहा गया था कि वे WhatsApp ग्रुप, ईमेल या मीटिंग्स में प्राइसिंग, मार्केट शेयर, टेंडर या किसी भी संवेदनशील कारोबारी विषय पर चर्चा न करें।

साथ ही एजेंसियों से कहा गया था कि ऐसे WhatsApp ग्रुप्स से तुरंत बाहर निकल जाएं जहां इस तरह की चर्चाएं होती रही हों।

CCI से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, यही एडवाइजरी अब जांच में अहम सबूत बन गई है।

अधिकारी ने exchange4media से कहा कि मीडिया एजेंसियों के अधिकारियों के बयान, WhatsApp चैट्स और छापों के बाद जारी एडवाइजरी से कथित मीडिया कार्टेलाइजेशन में AAAI की अहम भूमिका का संकेत मिलता है।

कानूनी विशेषज्ञों ने क्या कहा?

कॉम्पिटिशन लॉ के विशेषज्ञों का कहना है कि अब इंडस्ट्री एसोसिएशनों पर भी ज्यादा नजर रखी जा रही है, खासकर तब जब वे प्रतिस्पर्धी कंपनियों के बीच तालमेल का मंच बन जाएं।

King Stubb & Kasiva के पार्टनर अनिकेत घोष के मुताबिक, CCI सिर्फ लिखित समझौतों पर निर्भर नहीं रहती। सर्कुलर, एडवाइजरी, मीटिंग मिनट्स, ईमेल, WhatsApp चैट और डेटा शेयरिंग जैसे सबूत भी जांच में अहम होते हैं।

उन्होंने मशहूर “टायर कार्टेल केस” का उदाहरण देते हुए कहा कि अगर कंपनियों का व्यवहार एक जैसा हो और उनके बीच बातचीत के मंच मौजूद हों, तो बिना लिखित समझौते के भी कार्टेलाइजेशन माना जा सकता है।

पुराने मामलों से भी बढ़ी चिंता

यह मामला भारत के कई बड़े कॉम्पिटिशन लॉ मामलों की याद दिला रहा है।

पहले कंटेंट मैन्युफैक्चर्स एसोसिएशन और ऑटोमोटिव टायर मैन्युफैक्चर्स एसोसिएशन जैसे संगठनों पर भी CCI कार्रवाई कर चुकी है। आरोप था कि इन संस्थाओं ने कंपनियों के बीच प्राइसिंग और प्रोडक्शन से जुड़ी जानकारी साझा करने में मदद की।

हालांकि कानूनी विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि AAAI मामले का अंतिम नतीजा अभी तय नहीं है। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि संस्था की गाइडलाइंस सिर्फ सलाह थीं या इंडस्ट्री पर लागू किए जाने वाले नियम।

Desai & Diwanji की पार्टनर फरीदा धोलकावाला का कहना है कि अगर कोई इंडस्ट्री बॉडी कंपनियों के बीच संवेदनशील कारोबारी जानकारी साझा कराने में मदद करती है, तो वह भी जांच के दायरे में आ सकती है।

KS Legal & Associates की मैनेजिंग पार्टनर सोनम चंदवानी ने कहा कि अब CCI सिर्फ लिखित कार्टेल समझौते नहीं देख रही, बल्कि अनौपचारिक तालमेल भी जांच के घेरे में आ रहा है।

AAAI ने आरोपों से किया इनकार

वहीं AAAI ने सभी आरोपों को खारिज किया है। AAAI के प्रेसिडेंट श्रीनिवास स्वामी ने कहा कि संस्था ने जांच एजेंसियों के साथ पूरा सहयोग किया है, लेकिन मामला अदालत में होने के कारण वे ज्यादा टिप्पणी नहीं कर सकते।

उन्होंने कहा, “AAAI सिर्फ अलग-अलग कमेटियों की मीटिंग आयोजित करने में मदद करता है। संस्था ने किसी भी तरह की कार्टेलाइजेशन गतिविधि में कोई भूमिका नहीं निभाई।”

स्वामी ने यह भी कहा कि संस्था को अब तक CCI की ओर से किसी तरह की गलत गतिविधि का औपचारिक नोटिस नहीं मिला है।

80 साल का जश्न, लेकिन सवालों के बीच

AAAI का 80वां साल भारतीय विज्ञापन जगत के विकास का जश्न होना चाहिए था। प्रिंट विज्ञापनों से लेकर डिजिटल मीडिया तक इंडस्ट्री की लंबी यात्रा को सेलिब्रेट करने का यह बड़ा मौका था। लेकिन अब इस जश्न पर जांच, पारदर्शिता और गवर्नेंस से जुड़े सवाल हावी होते दिख रहे हैं।

भारतीय विज्ञापन जगत की आवाज माने जाने वाले इस संगठन की साख पर अब काफी कुछ CCI जांच के अंतिम नतीजे पर निर्भर करेगा। यह जांच तय कर सकती है कि AAAI की 80 साल पुरानी विरासत पहले जैसी बनी रहेगी या इस विवाद से हमेशा के लिए बदल जाएगी।

 

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हैप्पी बर्थडे नवरोज धोंडी: भारतीय विज्ञापन जगत का मजबूत स्तंभ हैं आप

आज का दिन भारतीय विज्ञापन उद्योग के एक ऐसे नाम को समर्पित है, जिसने अपने काम, सोच और नेतृत्व से इस क्षेत्र पर गहरा असर डाला है- नवरोज धोंडी।

Samachar4media Bureau by
Published - Sunday, 24 May, 2026
Last Modified:
Sunday, 24 May, 2026
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आज का दिन भारतीय विज्ञापन उद्योग के एक ऐसे नाम को समर्पित है, जिसने अपने काम, सोच और नेतृत्व से इस क्षेत्र पर गहरा असर डाला है- नवरोज धोंडी। 'क्रिएटीजीज' (Creatigies) के फाउंडर व मैनेजिंग डायरेक्टर के रूप में, साथ ही कई अन्य उद्यमों के माध्यम से, नवरोज ने न सिर्फ मार्केटिंग की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई, बल्कि इसे दिशा भी दी।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र रहे नवरोज ने अपने करियर की शुरुआत चार दशक पहले लिंटास (Lintas) से की, जहां वे नौ साल तक रहे। इसके बाद वे भारत की प्रतिष्ठित एजेंसी HTA/ JWT से जुड़े और लगभग पांच वर्षों तक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

1995 में, नवरोज धोंडी ने मात्र 30 के दशक में ही ANTHEM का नेतृत्व संभाला और इसे TBWA ANTHEM में बदल दिया। इस बदलाव ने उन्हें भारत के सबसे कम उम्र के CEO में शुमार कर दिया। इसके बाद उन्होंने परसेप्ट ग्रुप जैसी बहुआयामी एजेंसी का संचालन किया और उसे नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।

पिछले 22 वर्षों से नवरोज Creatigies के जरिए बतौर उद्यमी सक्रिय हैं। यह एजेंसी भारत में स्पोर्ट्स मार्केटिंग के क्षेत्र में कई क्रांतिकारी प्रयोगों और मीडिया पार्टनरशिप की अगुवा रही है। उनकी सोच ने खेल और ब्रांडिंग के मेल को जिस तरह नया आकार दिया, वह अपने आप में बेमिसाल है।

लेकिन नवरोज की पहचान सिर्फ एक विज्ञापन पेशेवर तक सीमित नहीं है। वे एक कवि, फोटोग्राफर, लेखक, घुमक्कड़, स्पोर्ट्स लवर और फूड प्रेमी भी हैं। उन्होंने कई प्रतिष्ठित प्रकाशनों में समय-समय पर लिखा और विज्ञापन से आगे भी अपनी रचनात्मकता को जिया।

उनका करियर सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने UK, साउथ अमेरिका, श्रीलंका सहित कई देशों में भारतीय ब्रांड्स को इंटरनेशनल पहचान दिलाई। उनकी कामयाबी का राज सिर्फ रणनीति नहीं, बल्कि अलग-अलग संस्कृतियों को समझने और ब्रांड को उस नजर से प्रस्तुत करने में रहा है।

आज जब नवरोज धोंडी अपना जन्मदिन मना रहे हैं, पूरा इंडस्ट्री उन्हें सलाम करता है- एक ऐसे व्यक्तित्व के रूप में जिसने हर मोड़ पर विज्ञापन को नए मायनों में देखा, समझा और गढ़ा। जन्मदिन की ढेरों शुभकामनाएं, एक ऐसे लीजेंड को जो आज भी उतने ही प्रेरणादायक हैं जितने वह पहले थे।

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