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मिस्टर मीडियाः परदा बदलने से भौंडी नक़ल जायज़ नहीं हो जाती

आत्ममुग्ध हैं फ़िल्मवाले। भ्रम में हैं। सोचते हैं कि बड़े परदे पर कुछ भी...

राजेश बादल 7 years ago

राजेश बादल
वरिष्ठ पत्रकार।। 

आत्ममुग्ध हैं फ़िल्मवाले। भ्रम में हैं। सोचते हैं कि बड़े परदे पर कुछ भी परोस दो, दर्शक सब मंज़ूर कर लेते हैं? भगवान के प्रसाद की तरह। क्यों भई? दर्शक ने तुम्हारे नाम से खीर खाई है? क्या देखने वाले को किसी डॉक्टर ने कहा है कि एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर देख लो?

वैसे तो यह फ़िल्म देखना वाकई एक एक्सीडेंट से कम नहीं है। अभिव्यक्ति की आज़ादी का खुल्लम खुल्ला दुरुपयोग। समकालीन तथ्यों और दस्तावेज़ों के साथ खिलवाड़। संप्रेषण के नाम पर एक मज़ाक़। विकृत सच को बड़े परदे पर वास्तविक पद, नाम, प्रतीक,न्यूज़ चैनल्स के लोगो, उनकी फुटेज के साथ प्रस्तुत किया गया। इससे पहले डिस्क्लेमर भी लगा है। यह कहता है कि फ़िल्म का हक़ीक़त से कोई रिश्ता नहीं है।

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डॉक्टर मनमोहन सिंह चाहें तो माथा पीट लें। किसी को क्या फ़र्क़ पड़ता है। संजय बारू ने पद और गोपनीयता की शपथ नहीं ली थी। वह तो मनमोहन सिंह ने ली थी। उससे वे आख़िरी सांस तक बंधे रहेंगे और संजय बारू उनकी खिल्ली उड़ाते रहेंगे-उनके ही परिवार के सामने। उन्हें सबसे कमज़ोर, लाचार और असहाय बताते रहेंगे। जिस काल खंड में भारत ने भीषण अंतरराष्ट्रीय मंदी का सीना तानकर मुक़ाबला किया, उसका कहीं ज़िक्र ही नहीं। इस मंदी से पश्चिम-यूरोप के देश कराह उठे थे। वहां बरबादी की आंधियों ने जनजीवन अस्तव्यस्त कर दिया था। ऐसे में भारत का चेहरा मुस्कुराता रहा, इसका श्रेय संजय बारू को नहीं, डॉक्टर मनमोहन सिंह को है।

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अमेरिका के साथ परमाणु समझौते पर प्रधानमंत्री को कमज़ोर बताते हुए इतिहास बदलने का काम। उसकी आधी कहानी ही परदे से ग़ायब है। क्या विडंबना है कि जिस मनमोहनसिंह को बतौर अर्थशास्त्री सबसे योग्य प्रधानमंत्री के तौर पर सारे संसार में मान मिलता है, उसका अपने घर में ही अपमान, उसके अपने मीडिया सलाहकार के हाथों।

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फ़िल्म में अनेक बार संजय बारू नाम का किरदार अपनी तारीफ़ के पुल बांधता नज़र आता है। वह दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के पीएमओ के तंत्र का उपहास उड़ाता है। वरिष्ठतम नौकरशाहों को दोयम दर्ज़े का समझता है। उनसे कहता है, 'मेरी रिपोर्टिंग तो सीधे पीएम को है। मैं उनके लिए काम करता हूं। यह क्या दिखाता है? संजय बारू को पीएमओ का लोकतांत्रिक अंदाज़ पसंद नहीं था। ख़ुद को पीएम से अधिक क़ाबिल बताने वाले बारूजी कहते हैं कि पाकिस्तान पर क्या बोलना है-पीएम उनसे राय लेते थे, उनकी स्पीच वे खुद लिखते थे। पूरी फ़िल्म में यह किरदार मनमोहनसिंह को यूपीए चेयरपर्सन के ख़िलाफ़ भड़काता है, जिन्होंने दो बार उन्हें प्रधानमंत्री बनाया। अंत में यह किरदार अपनी किताब का सेल्समेन बन जाता है। उसे चिंता है कि किताब बिक नहीं रही। जब पीएमओ के अफसर अपनी ब्रीफ़िंग करते हैं तो किताब बिकने लग जाती है। यह किरदार गदगद हो जाता है।

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किताब ही क्यों, फिल्म बेचने के लिए भी नियम क़ानून ताक में रख दिए जाते हैं। फिल्म से जो डायलॉग सेंसर बोर्ड ने संपादित कर दिए, वे बिना काट छांट के ट्रेलर यानी प्रोमो में चल रहे हैं। सेंसर सोया है। सिस्टम सोया है। देखे कौन?

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वाह! मीडिया। वाह! मीडिया सलाहकार। वाह! पत्रकारिता का यह रूप। आज एक प्रधानमंत्री के बारे में इस तरह चित्रण किया गया। कल के रोज़ कोई दूसरा किसी अन्य प्रधानमंत्री के बारे में ऐसा ही विकृत चेहरा पेश करेगा। उसे कैसे रोकेंगे मिस्टर मीडिया?  हालांकि अच्छा है कि प्रिंट और टेलिविजन पर भी फ़िल्म के बारे में ऐसी ही प्रतिक्रियाएं आईं। इसके लिए आप तारीफ़ के क़ाबिल भी हैं मिस्टर मीडिया!


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