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मिस्टर मीडिया: एग्जिट पोल पर इतना 'खेलते' हैं तो उसे गंभीरता से कराइए भी

Published At: Wednesday, 12 December, 2018 Last Modified: Wednesday, 12 December, 2018

राजेश बादल
वरिष्ठ पत्रकार।।

चुनाव आते हैं तो चैनलों की बांछें खिल जाती हैं। टीआरपी को उछलने का मौका मिलता है। एग्जिट पोल के बहाने ख़ुद को राजनीतिक ज्योतिषी साबित करने की होड़ शुरू हो जाती है। सबको लगता है कि उनका एग्जिट पोल अलादीन का चिराग़ है, जो एकदम नतीज़ों की कार्बन कॉपी उन्हें थमा देगा। पहले ऐसा होता था। अब नहीं होता। एग्जिट पोल की साख़ दांव पर लगी है। कारण क्या है? पहले क्यों सटीक आकलन होते थे? अब क्यों नहीं होते? इसका उत्तर किसी तिलिस्मी परदे में नहीं है।

पहले एग्जिट पोल देख दर्शक हैरान हो जाते थे। समझ नहीं आता था कि एग्जिट पोल करने वालों के पास कौन सी जादू की छड़ी है, जिससे नतीजों का सच सामने आ जाता है। कुछ चुनावों में क़रीब क़रीब वही परिणाम आते रहे, जो एग्जिट पोल में होते थे। एग्जिट पोल  एजेंसियों की साख़ का ग्राफ़ सातवें आसमान पर रहा। फिर घटनाक्रम बदला। एजेंसियों की प्रतिष्ठा को बट्टा लगा। एग्जिट पोल परिणामों से एकदम उलट निकलने लगे। लोग चौंक गए। राजनीतिक पार्टियों ने कहना शुरू कर दिया कि एग्जिट पोल पर भरोसा मत करिए। नतीज़े अलग आएंगे। अनेक बार ऐसा भी हुआ। फिर कहा जाने लगा कि एग्जिट पोल एजेंसियों को भी 'मैनेज' किया जाता है। अभी भी इस धारणा का पूरी तरह खंडन नहीं हुआ है।

दरअसल जब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मंदी का पहला दौर आया था तो चैनलों तथा मीडिया घरानों पर भी असर पड़ा। एग्जिट पोल एजेंसियों की फ़ीस मीडिया-मालिकों को फ़िज़ूलख़र्च लगने लगी। इसके बाद मीडिया घरानों ने अपने सर्वेक्षण कराने आरंभ कर दिए। दूसरा, एग्जिट पोल कराने वाली एजेंसियों ने भी अपनी फ़ीस कम कर दी। इसका नुकसान दोनों पक्षों को हुआ। एजेंसियां कम बजट में सर्वेक्षण के लिए मजबूर थीं, इसलिए उन्होंने आकार घटा दिया। उन्होंने प्राथमिकता दी कि उनका सर्वेक्षक कम पैसे में अधिक से अधिक लोगों का फीडबैक ले। इससे गड़बड़ यह हुई कि विविधताओं से भरे भारतीय समाज के गुलदस्ते की समग्र तस्वीर एग्जिट पोल में नहीं आई। एजेंसियां जातियों, धर्मों, आर्थिक आधारों में बंटे परिवारों से राय शुमारी नहीं कर सकीं। यह अजीब था कि मीडिया-समूहों के रिपोर्टर-संपादक जातियों-उप जातियों, अगड़े, पिछड़े, ग़रीब-अमीर और मज़हबों में बांटकर वोटर का मूड समझने की कोशिश करते थे, लेकिन एजेंसियां सौ फ़ीसदी न्याय नहीं कर पाती थीं। इस कारण परदे पर गड्डमड्ड तस्वीर दिखती थी। चैनल का रिपोर्टर कुछ कहता था और उसी चैनल का एग्जिट पोल कुछ अलग बोलता था।

दूसरी ओर मीडिया घरानों के अपने सर्वेक्षण भी ख़तरे से खाली नहीं थे। चैनलों ने अपने एग्जिट और ओपिनियन पोल अपनी रिसर्च टीम के भरोसे किए। इस टीम ने मैदानी दौरे नहीं किए, बल्कि अपने नेटवर्क का सहारा लिया। उनके प्रादेशिक ब्यूरो और संवाददाताओं ने यह काम किया। बड़ी तादाद स्ट्रिंगर्स की थी। स्ट्रिंगर अपने सामाजिक, राजनीतिक, पारिवारिक और कारोबारी हितोँ के कारण निष्पक्ष नहीं हो पाते। उन्हें वेतन नहीं मिलता, इसलिए रोज़ी-रोटी का जुगाड़ कहीं और से करते हैं। एग्जिट पोल इसी चरण में झटका खा जाता है। इसके अलावा चैनलों के रिसर्च विभाग को सारे दुखों की दवा मान लिया गया है। रिसर्च टीम के सदस्य न तो एग्जिट-ओपिनियन पोल के लिए प्रशिक्षित होते हैं और न उसकी मेथेडोलॉजी जानते हैं। हकीकत है कि वे चैनल में एक ऐसे विभाग का सदस्य होते हैं ,जो हर दम अन्य विभाग में तबादला चाहते हैं। रिसर्च विभाग में वह भविष्य नहीं देखता। इस कारण भी रायशुमारी के नतीजे ठीक नहीं आते। जिस दिन एग्जिट पोल आता है, उसमें अनेक पैबंद लग जाते हैं।

याद करिए सात दिसंबर की शाम सभी के एग्जिट पोल आए थे। इनमें मतदान प्रतिशत, जीतने वाली सीटों और मुख्यमंत्री के लिए लोकप्रिय चेहरों पर पसंद का इज़हार किया गया था। अपवाद छोड़ दें तो छत्तीसगढ़ में ये पोल रमनसिंह सरकार को काफी सुरक्षित मान रहे थे। हुआ इसका  उल्टा। पिछले विधानसभा चुनाव में वहां कांग्रेस और बीजेपी के मतों का अंतर सिर्फ़ 0.75 फ़ीसदी था।, लेकिन बीजेपी 49 और कांग्रेस 39 स्थान पर जीती थी। इस बार क्या हुआ?

इसके अलावा, किसी भी एग्जिट पोल ने नोटा का रोल नहीं बताया। पिछले चुनाव में छत्तीसगढ़ में नोटा के वोट 3 फीसदी थे। इन वोटों ने दस-पंद्रह सीटों के परिणाम उलट दिए थे। नोटा का इस्तेमाल सबसे अधिक आदिवासी इलाक़ों में हुआ था। यह आश्चर्यजनक है। उन सीटों पर किस दल ने उम्मीदवार बदले और किसने सबक लिया। एग्जिट पोल इसकी गवाही नहीं देते। मध्यप्रदेश में भी कमोबेश यही सवाल है। पिछले चुनाव में इस राज्य में बीजेपी का वोट प्रतिशत कांग्रेस से आठ फ़ीसदी अधिक था। दोनों दलों की सीटों में 107 का अंतर था। इस बार क्या हुआ? वोट बराबर और कमोबेश सीटें भी आगे पीछे। वास्तव में अब एग्जिट पोल की प्रश्नावली तक बारीक़ी से तैयार नहीं होती और मैनेजमेंट भी जेब ढीली नहीं करना चाहता। अब लोक सभा चुनाव सर पर हैं। अभी से मेहनत कीजिए, अच्छे ढंग से प्रोफेशनल्स की ट्रेनिंग कराइए, उन्हें फील्ड में भेजिए, तभी सार्थक एग्जिट पोल आएंगे, अन्यथा चुटकुले बनने को तैयार रहिए मिस्टर मीडिया!



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