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पढ़िए, क्यों मनाई जाती है 'बकरीद'

बकरीद को बड़ी ईद भी कहा जाता है। मुसलमानों के इस पर्व को बलिदान..

समाचार4मीडिया ब्यूरो 7 years ago

कुंवर सी.पी. सिंह

टीवी पत्रकार ।।

बलिदान का त्योहार... ‘बकरीद’

चुपके से चांद की,
रोशनी छू जाए आपको!
धीरे से ये हवा,
कुछ कह जाए आपको!!
दिल से जो चाहते हो,
मांग लो खुदा से!
हम दुआ करते हैं,
मिल जाए वो आपको!!

जी हां दोस्तों...!

बकरीद को बड़ी ईद भी कहा जाता है। मुसलमानों के इस पर्व को बलिदान का त्योहार को बकरीद है जोकि इस्लामिक कैलेंडर में ज़ु-अल-हज्जा माह की 10वीं तारीख है। इस्लाम में बलिदान का बहुत अधिक महत्व है। इस्लाम धर्म में मान्यता है कि अपनी सबसे प्यारी चीज रब की राह में खर्च करो। रब की राह में खर्च करने का अर्थ नेकी और भलाई के कामों में खर्च करने से है। इस्लामिक मान्यता के अनुसार हजरत इब्राहिम अपने पुत्र हजरत इस्माइल को इसी दिन खुदा के हुक्म पर खुदा कि राह में कुर्बान करने जा रहे थे, तो अल्लाह ने उनके पुत्र को जीवनदान दे दिया जिसकी याद में भी यह पर्व मनाया जाता है।

देश-विदेश में इस पर्व पर बड़ी रौनक रहती है। कुर्बानी के इस त्योहार पर ईद की नमाज अता करने के लिए मस्जिदों में भारी भीड़ होती है। इस त्योहार पर नमाज के बाद लोग बकरे, भैंस, भेड़, ऊंट आदि की कुर्बानी देते हैं। इस पर्व को ईद अल अज़हा भी कहा जाता है।

कुर्बानी कैसे शुरू हुई इसके बारे में एक प्रचलित कहानी है जिसके अनुसार- एक बार आकाशवाणी हुई कि अल्लाह की रजा के लिए अपनी सबसे प्यारी चीज कुर्बान करो, तो हजरत इब्राहिम ने सोचा कि मुझे तो अपनी औलाद ही सबसे प्रिय है। इसलिए उन्होंने बेटे की ही बलि देना स्वीकार किया। हजरत इब्राहिम को लगा कि कुर्बानी देते समय उनकी भावनाएं आड़े आ सकती हैं इसलिए उन्होंने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली थी। जब अपना काम पूरा करने के बाद उन्होंने पट्टी हटाई तो अपने पुत्र को अपने सामने जिंदा खड़े देखा जबकि बेदी पर कटा हुआ मेमना पड़ा था। माना जाता है कि तभी से बकरीद के मौके पर बकरे और मेमनों की बलि देने का प्रचलन शुरू हुआ। कुर्बानी में अल्लाह का नाम लेकर जिन बकरों की बलि दी जाती है वह तन्दुरुस्त होता है। कुर्बानी और गोश्त को हलाल कहा जाता है। इस गोश्त के तीन बराबर हिस्से किए जाते हैं, एक हिस्सा खुद के लिए, एक दोस्तों और रिश्तेदारों के लिए और तीसरा हिस्सा गरीबों के लिए रखा जाता है और इसे तुरंत वितरित किया जाता है। जिस तरह ईद-उल-फितर को गरीबों में पैसा दान के रूप में बांटा जाता है उसी तरह बकरीद को गरीबों में मांस बांटा जाता है। बकरीद का संदेश है कि आपको सच्चाई की राह पर कुछ भी न्यौछावर करने के लिए तैयार रहना चाहिए।

इस्लाम के पांच फर्जों में हज भी शामिल है। हज यात्रा पूरी होने की खुशी में ईद-उल-जुहा (बकरीद) का त्योहार मनाया जाता है। इस्लामिक नियम कहता है कि पहले अपना कर्ज उतारें, फिर हज पर जाएं और उसके बाद बकरीद मनाएं। बकरीद से पहले मुस्लिम बहुल इलाकों में तंदुरुस्त बकरों की बिक्री शुरू हो जाती है और कई बार तो बकरों की कीमत लाखों रुपए तक पहुंच जाती है। स्वस्थ और तंदुरुस्त बकरा कुर्बान करने की प्रथा के चलते पैसे वाले लोग तगड़े से तगड़ा बकरा खरीद कर कुर्बान करना चाहते हैं भले इसके लिए कोई भी कीमत अदा करनी पड़े...!

वही बकरीद के अवसर पर बकरे के गोश को गरीबों में बांटने की परंपरा है। ऐसा करने से गरीब और भूखे लोगों को खाना नसीब होता है और अल्लाह की दुआ मिलती है। ऐसा करने से मुस्लिम समुदाय इस बात का सन्देश देते है की वह दूसरे लोगों की बेहतरी के लिए अपनी सबसे करीबी चीज कुर्बान कर सकते है..!

अल्‍लाह आपको खु़दाई की सारी नेमतें दे,

अल्‍लाह आपको खुशियां और अता करे।

दुआ हमारी है आपके साथ,

बकरा ईद पर आप और सबाब हासिल करें।

हैप्पी बकरीद!

(ये लेखक के अपने निजी विचार हैं)

 

 


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