केजरीवाल से अलग हुए आशुतोष के बारे में आप ये सब कतई नहीं जानते होंगे...

जनवरी 2014 की कोई तारीख थी। मैं ‘न्यूज 24’ के अपने दफ्तर में बैठा था। तभी...

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 22 August, 2018
Last Modified:
Wednesday, 22 August, 2018
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अजीत अंजुम

वरिष्ठ पत्रकार

जनवरी 2014 की कोई तारीख थी। मैं ‘न्यूज 24’ के अपने दफ्तर में बैठा था। तभी ‘आईबीएन7’ में काम करने वाले दोस्त संजीव पालीवाल का उदयपुर से फोन आया। उठाते ही एक सूचना ठक्क से कान में गिरी- ‘आशुतोष ने इस्तीफा दे दिया है।’ मेरे जुबान से बेसाख्ता निकला- क्या? इस्तीफा दे दिया? कैसे? कब? क्यों? सारे बेसब्र सवाल एक साथ मैंने झोंक दिए। हमेशा की तरह ठंडे दिमाग से बात करने वाले शांत चित्त संजीव पालीवाल ने जो बताया, उससे एक बार फिर चौंका।

संजीव से पता चला कि अब आशुतोष केजरीवाल की पार्टी जॉइन करने जा रहा है। मैंने उनसे एक-दो सवाल और पूछे फिर तुरंत उनका फोन काटा। मेरे भीतर तब तक इतनी बेचैनी पैदा हो चुकी थी, जो संजीव के जवाबों से शांत नहीं होने वाली थी। मैंने तुरंत आशुतोष को फोन मिलाया। उसका फोन लगातार बिजी आ रहा था। मेरा वश चलता तो उसके फोन में जबरन प्रवेश कर उस तक पहुंचता कि ये सब कर दिया और हमें बताया तक नहीं लेकिन ये मुमकिन न था।


बेचैन आत्मा की तरह मैंने ‘आईबीएन7’ के ही पत्रकार मित्र अनंत विजय समेत उनके कुछ सहयोगियों को फोन किया और जानने की कोशिश की कि क्या आशुतोष दफ्तर में हैं? बताया गया कि वो लोगों से मिल-जुल रहे हैं। उनकी विदाई की तैयारी हो रही है। मैंने इतनी देर में ‘आजतक’ के एडिटर सुप्रिय प्रसाद और ‘एबीपी न्यूज’ के मिलिंद खांडेकर से लेकर ‘इंडिया टीवी’ के एडिटर रहे विनोद कापड़ी तक, कई लोगों को फोन खटखटा दिया, इसी बेचैनी में कि आशुतोष के बारे में अब तक किसे क्या पता है? सबको तब तक उतना ही पता था, जितना मुझे। किसी को पहले से कोई भनक नहीं थी और आशुतोष ने बम फोड़ दिया था। कुछ ऐसे भी थे, जिनके लिए ये कोई चौंकाने वाली जानकारी नहीं थी क्योंकि बीते कुछ महीनों से आशुतोष अपने विचारों, अपनी बहसों और अपनी टिप्पणियों की वजह से आम आदमी पार्टी के करीबी और सिंपेथाइजर माने जाने लगे थे।


उन दिनों दिल्ली में कांग्रेस के बाहरी समर्थन से सरकार चला रहे केजरीवाल के ‘वृहद सलाहकार मंडल’ के सदस्य के तौर पर आशुतोष, एनके सिंह, अभय दूबे, पुण्य प्रसून बाजपेयी समेत कई पत्रकारों का जिक्र होता रहता था। दोस्त होकर भी मैंने कभी आशुतोष से इस बारे में पूछा नहीं और उन्होंने कभी कुछ बताया भी नहीं। पूछता तो भी नहीं बताता, शायद इस वजह से भी मैं अपनी जिज्ञासाओं को दूसरों से मिली आधी-अधूरी जानकारियों से शांत करता रहा। आशुतोष पेट का जितना गहरा है, मैं उतना ही हल्का। मेरे पेट में बात पचती नहीं, जब तक एक -दो मित्रों से ये कहते हुए बता न दूं कि किसी से कहिएगा मत, सिर्फ आपको बता रहा हूं। इस मामले में आशुतोष का हाजमा इतना दुरुस्त है कि उसे किसी किस्म के हाजमोला की जरुरत नहीं होती।


बीते चार-पांच महीनों के दौरान भी हम कई बार आशुतोष से मिलते रहे। घंटों बैठते रहे। दुनिया भर की बातें करते रहे। लिखी जा रही उसकी किताब पर पर बात होती रही। इतना तो समझ चुके थे कि अब वो लंबे समय तक केजरीवाल की पार्टी में नहीं रहेगा। मंगलवार को भी उनके पढ़ने-लिखने को लेकर बात हुई लेकिन ये नहीं कहा कि कल उसके इस्तीफे की खबर सरेआम होने वाली है। पिछली बार की तरह इस बार भी संजीव पालीवाल ने ही अमर उजाला वेबसाइट की खबर का लिंक भेजा तो पता चला कि हो गया, जो होना था।


‘आईबीएन7’ से इस्तीफे के दिन भी मैं आशुतोष से बात होने के पहले और बाद होने के बाद बहुत देर तक चिढ़ा रहा कि इतना बड़ा फैसला कर लिया और हमें बताया तक नहीं। घंटा दोस्त हैं हम लोग। एक हम हैं कि सारी बातें एकतरफा पाइपलाइन से सप्लाई करते रहते हैं, एक ये आदमी है कि कुछ भनक ही नहीं लगने देता।


खैर, आशुतोष ‘आईबीएन7’ से अपना सामान समेटकर बाहर निकला और दो-चार दिन यार-दोस्तों के बीच बैठकी के बाद केजरीवाल की 'अंतरंग मंडली' में समाहित हो गया। उसके इस्तीफे के साथ ही चर्चा होने लगी थी कि वो दिल्ली के किसी इलाके से लोकसभा चुनाव लड़ेंगे। मैंने दो-चार ये भी पूछा तो उसने हां -ना -देखेंगे टाइप का ही जवाब दिया लेकिन उनकी बातों से लगता था कि रास्ता उसी तरफ जा रहा है। भले वो खुलकर न बोले। खैर, वो दौर केजरीवाल के उठान का दौर था। दिल्ली में अन्ना आंदोलन के गर्भ गृह से निकली आम आदमी पार्टी की कांग्रेस के बाहरी सपोर्ट से सरकार बन गई थी। मीडिया के बड़े हिस्सा देश में वैकल्पिक राजनीति के योद्धा के तौर पर केजरीवाल को प्रोजेक्ट कर रहा था। उनके नाम की मुनादी की जा रही थी। तो लोगों ने यही माना कि आशुतोष ने लोकसभा के लिए ही संपादक की नौकरी और पत्रकारिता छोड़ी है। चैनल में रहते हुए पहले अन्ना आंदोलन, फिर केजरीवाल की पार्टी का सपोर्ट करते दिखने की वजह से पहले भी उनकी आलोचना होती रही थी। हम जैसे दोस्ते भी गाहे-बगाहे तंज कसकर उसे सुलगा देते थे। अपने को सही मानने के उसके तर्क जब तू-तू-मैं-मैं का माहौल क्रिएट करना लगता तो या तो मैं चुप हो जाता, या वो।


आशुतोष का हमेशा यही तर्क होता था कि देश एक नए किस्म की क्रांति का चश्मदीद बन रहा है और इस क्रांति का हिस्सा बनने के लिए मैं एक बार अपने रास्ते बदलना चाहता हूं। वो क्रातंकारी इतिहास का किरदार बनने पर आमादा था, अदना ही सही। एक दोस्त के नाते मुझे हर वक्त लगता था कि ये आदमी राजनीति में चलेगा कैसे? वोट मांगने से लेकर चंदा मांगने तक और कार्यकर्ताओं को खुश रखने से लेकर केजरीवाल के गुड बुक में लंबे समय तक बने रहने के लिए जरुरी शर्तें कैसे पूरा करेगा? औपचारिक मुलाकातों, बातों या मीटिगों में टू द पॉइंट बात करने वाला, ‘मैं सही सोचता हूं’ जैसे आत्मरचित इगो को ढ़ोने वाला, जरूरी मौकों पर भी कदम पीछे खीचने की बजाय दो कदम आगे बढ़ जाने वाला और किसी के प्रति अपनी नापसंदगी को अक्सर सहेजकर रखने वाला आशुतोष नेतागीरी की मायावी दुनिया में टिकेगा कैसे?


जिस दिन आशुतोष ने औपचारिक तौर 'केजरीवाल की टोपी' पहनी, उस दिन उसे मैंने 'न्यूज 24' पर अपने शो 'सबसे बड़ा सवाल' में गेस्ट के तौर पर बुलाया और पत्रकार के नेता बने आशुतोष को बेमुरौवत होकर जितना छील सकता था, छीलने की कोशिश की। वो हंस-हंसकर जवाब देता रहा। ऐसा लगा जैसे वो कायांतरण करके ही स्टूडियो आया था। कुछ ये भी कह सकते हैं कि मेरा लिहाज था कि तीखे तंज झेलता रह गया। शायद किसी दूसरे को अपनी आदत के मुताबिक थोड़ा जवाब देता।

इसी बीच 2014 के लोकसभा चुनाव का ऐलान हो गया। आशुतोष चांदनी चौक से ‘आप’ के उम्मीदवार घोषित हो गए। मैं ‘न्यूज24’ का मैनेजिंग एडिटर था, लिहाजा एक दोस्त होकर भी उनके साथ कभी उनके लोकसभा क्षेत्र में नहीं गया। न जाने और साथ न खड़े होने का मलाल भी कभी हुआ, लेकिन नेता हो चुके मित्र के साथ मैं संपादक रहते मैदान में नहीं दिख सकता था। हां, कभी-कभार उसका हालचाल उससे या उनकी पत्नी मनीषा से पूछता रहा। उसके प्रचार में लगे कुछ लोगों से भी बात होती रही। चुनाव के दौरान लाखों के फंड के जरूरत होती है। आशुतोष के हाथ तंग थे। पार्टी ने भी शायद उसे चुनाव मैदान में उतारकर खुद अपना इंतजाम करने के लिए छोड़ दिया था। कुछ दोस्तों ने उसकी कुछ मदद भी की।

कांग्रेस के अरबपति उम्मीदवार कपिल सिब्बल और बीजेपी के दिग्गज हर्षवर्धन के मुकाबले आशुतोष मजबूती से लड़ा, लेकन तीन लाख वोट पाकर भी करीब एक लाख से हार गया। लोकसभा के दरवाजा उसके लिए खुलने से पहले ही बंद हो गए। लगा कि ये आदमी हताश हो जाएगा। लाखों की ग्लैमरस नौकरी छोड़कर राजनीति में धक्के कब तक खाता रहेगा, लेकिन आशुतोष ने कभी ऐसा अहसास ही नहीं होने दिया कि वो अपने फैसले पर पछता रहा हो। उसने लगातार तीन सालों तक पार्टी के लिए पूरी वफादारी से काम किया। निजी बातचीत में भी उसने कभी केजरीवाल या पार्टी के तौर-तरीकों को लेकर नाराजगी नहीं जाहिर की। कई मौकों पर हम जैसे दोस्त उसके बयानों, उसकी पार्टी के फैसलों या तौर-तरीकों को लेकर रपेटते रहे लेकिन वो हमेशा प्रवक्ता ही बना रहा। भिड़कर, लड़कर हमेशा हावी होने की कोशिश करता रहा।

एक बार दिल्ली के फॉरेन कॉरेस्पोंडेंट क्लब में हमारी बहस के दौरान आशुतोष मीडिया में काम कर रहे हम जैसों को रीढ़विहीन और टीवी संपादकों को सत्ता का चाटूकार कहने लगा तो गुस्से में मैंने कई अप्रिय सवालों से उसे घेर दिया। उसे यहां तक कह दिया कि जब सब मिलकर केजरीवाल की डुगडुगी बजा रहे थे, तब आप लोगों को पत्रकारिता सही कैसे लग रही थी? किसी भी नेता के लिए आंख मूंदकर बिछ जाना सही कैसे है, चाहे केजरीवाल हों या मोदी? आईबीएन7 से आपके कार्यकाल में छंटनी हुई तो आप तमाशबीन क्यों बने रहे? उसी समय क्यों नहीं इस्तीफा दे दिया था? आपने इस्तीफा चुनाव के चार-पांच महीने पहले या दिल्ली में केजरीवाल सरकार बनने के बाद क्यों दिया? ये वो सवाल थे, जो सोशल मीडिया पर भी लगातार आशुतोष का पीछा कर रहे थे। जवाब उसके पास भी था लेकिन बहस ने इतना आक्रामक रुख ले लिया कि हम दोनों एक दूसरे की बात सुनने-समझने के दायरे से बाहर निकल गए। वहां मौजूद वरिष्ठ पत्रकार शैलेश के साथ हमारी पत्नियों को बीच-बचाव करना पड़ा। मैं जानता हूं कि आईबीएन7 के अपने उस दौर में भी आशुतोष बहुत बेचैनियों से गुजरा था। अपने तरीके से उसने संस्थान में अपना विरोध भी दर्ज कराया था। कुछ हद तक कॉरपोरेट पत्रकारिता की मजबूरियों के कैदी आशुतोष के लिए आज इतना ही कह सकता हूं कि ‘कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, यूं कोई बेवफा नहीं होता’।

खैर, उस रात की बहस का नतीजा ये हुआ कि हम लंबे समय के लिए एक दूसरे से दूर हो गए। दोनों ने सोचा कि ऐसी बाता-बाती और लड़ाई होने से बेहतर है कम मिलना। तो हम कम मिलने लगे। मुझे लगता था कि यार कभी तो अपनी कमियां भी मानों। रैली में मत मानों। मीटिंग में मत मानों। सार्वजनिक जगहों पर मत मानों। मीडिया के सामने मत मानों। विरोधियों के सामने मत मानों लेकिन जब आपस में दोस्त की तरह बात कर रहे हैं, तब तो अपने को थोड़ा ढ़ीला छोड़ो। आशुतोष की दाद देनी पड़ेगी कि उसने कभी अपने को ढीला नहीं छोड़ा। आप इसे खूबी मानें या खामी। उसके जाने के बाद हम जरूर कहते कि यार ये कैसा आदमी है, कभी तो मान ले कि इसकी पार्टी या ये खुद भी गलत हो सकता है।

आशुतोष ऐसा ही है। उसे जो बात जहां कहनी और जहां माननी होगी, वहीं कहेगा और वहीं मानेगा। चैनल में राजदीप सरदेसाई अगर उसके बॉस थे, तो संस्थान के बारे कुछ कहना होगा तो उन्हीं से कहेगा। पार्टी में जो कहना होगा, पार्टी नेतृ्त्व से कहेगा। बाकी जगह वो लूज कैनन बनकर हल्का नहीं होगा। यही उसकी खासियत है। यही उसकी ताकत है और यही बात उसे औरों से अलग करती है।

आशुतोष ने पत्रकारिता में अपने करियर का पीक देखा है। लंबे अरसे तक ‘आजतक’ जैसे चैनल के ऊंचे ओहदे पर रहा। नामचीन एंकर रहा। उसके बाद करीब आठ साल तक आईबीएन7 का संपादक रहा। चैनल का प्रमुख चेहरा रहा। लाखों की सैलरी सालों-साल पाता रहा लेकिन उसका रहन-सहन और लापरवाह अंदाज किसी संघर्षशील पत्रकार की तरह ही रहा। दो जींस। ढीले-ढाले, एक दो पैजामे, कुछ पुराने टी-शर्ट। पत्नी मनीषा की खरीदी हुई दो-तीन शर्ट्स और साधारण सी सैंडिल। गाड़ी के नाम पर जब कंपनी ने लंबी गाड़ी दे दी तो आशुतोष ने वो गाड़ी अपनी पत्नी के हवाले करके अपने लिए छोटी गाड़ी ले ली। कई बाहर जाना हो अपने बैग पैक में दो मुड़े-तुड़े कपड़े रख लिया और चलने को तैयार। एंकर था तो सबसे घटिया और पुरानी टाई और बेमेल शर्ट पहनकर टीवी पर अवतरित हो जाता। मैं कई बार मनीषा को फोन करता कि इस बंदे को स्क्रीन के लिए कुछ कायदे के कपड़े खरीदवा दीजिए। वो कहतीं क्या करें अजीत जी, ला भी देती हूं तो पता नहीं कहां रख देता है और वही घिसी हुई टाई पहनकर बैठ जाता है। कोई दिखावा नहीं। भौतिक चीजें हासिल करने का कोई शौक नहीं, जो दुर्भाग्य से हम जैसों के भीतर कुछ हद तक पैदा हो गया है।

हां, ये ठीक है कि अच्छी सैलरी होने की वजह से नोएडा में दो फ्लैट हो गया, जिसका मोटा लोन अब भी उसके माथे पर चिपका है। कुछ बैंक बैलेंस हो गया। इसका भी हिसाब-किताब आशुतोष को पक्के तौर पर नहीं पता होता है। कॉलेज में प्रोफेसर पत्नी ही उनकी वित्त मंत्री भी हैं और तमाम ऐसे मामलों में उनकी जरुरतों का ख्याल रखने वाली दोस्त भी। नौकरी छोड़ने के बाद आशुतोष मेट्रो में चलते रहे हैं। बाद में उन्होंने मारुति की सबसे छोटी गाड़ी खरीद ली। बड़ी गाड़ी के नाम पर उनके पास सरकारी मेट्रो तो है ही। आशुतोष ने कभी ऐसे शौक पाले ही नहीं, जो उसे गुलाम बना ले।

आशुतोष ने जब लोकसभा चुनाव का पर्चा भरा तो लोन पर खरीदे गए उसके फ्लैट और उसके बैंक बैलेंस को जोड़जाड़ कर उसे करोड़पति घोषित करके ट्रोल किया जाने लगा। जबकि मैं दावे के साथ कह सकता हूं आशुतोष ने जो भी अर्जित किया, उसमें सेटिंग-गेटिंग का एक टका भी नहीं है। सैलरी से मिले और टैक्स काटकर अकाउंट में ट्रांसफर हुए पैसे के अलावा एक पैसा इधर-उधर का उसके पास आया नहीं। आ ही नहीं सकता। उसे कोई खरीद नहीं सकता। कोई कीमत देकर उससे कोई फायदा नहीं उठा सकता। दमदार और वजनदार संपादक रहते हुए आशुतोष नेताओं, मंत्रियों, नौकराशाहों से सजे सत्ता के गलियारों में कभी देखा नहीं गया। नार्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक में बैठने वाले सत्ताधीशों की निकटता पाने में कभी उसमें चाह ही नहीं रही।

यूपीए -2 के दौर में जब आनंद शर्मा के सूचना प्रसारण मंत्रालय मीडिया के हाथ बांधने की साजिशें कर रहा था, तब आशुतोष सबसे अधिक मुखर और आक्रामक था। ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स के साथ संपादकों की बैठक में कपिल सिब्बल समेत बड़े मंत्रियों की मौजूदगी में भी अगर सबसे अधिक बेफिक्र होकर कोई मनमोहन सरकार के मठाधीशों को खरी -खोटी सुना सकता था, तो वो आशुतोष था। ऐसे एकाध मौकों पर तो दूसरे संपादकों को बीच-बचाव करके आशुतोष को शांत करना पड़ा। वो चाहता तो इतने लंबे अरसे तक संपादक रहते हुए कुछ दूसरे पत्रकारों की तरह ‘मालदार’ और ‘नेटवर्कर’ बन ही सकता था, लेकिन वो नहीं बना। ठोक कर खबरें चलाता रहा। तमाम बड़े नेताओं को अपनी हॉट सीट के सामने बैठाकर तीखे और बेखौफ सवाल पूछता रहा। किसी भी कीमत पर नहीं बिकने वाले संपादकों की फेहरिश्त में टॉप पर बना रहा, क्योंकि सत्ता के अंत!पुर में अपनी जगह बनाने का ख्वाहिशमंद कभी वो रहा ही नहीं। हां, विचार के तौर पर उसे केजरीवाल में संभावना दिखी तो लाखों की नौकरी छोड़कर उनकी रथयात्रा में शामिल हो गया। विचार रखना कोई गुनाह नहीं। विचारहीन तो मुर्दे होते हैं।

आशुतोष ने करियर में जो हासिल किया, अपने दम पर किया। अपनी मेहनत से किया। किसी बड़े बॉस को मस्का नहीं लगाया। किसी को खुश करने-रखने की कोशिशें कभी नहीं की। ये उनका स्वभाव ही नहीं है। तभी मेरे भीतर हमेशा ये ख्याल कौंधता रहा कि आशुतोष ‘आप’ के नेताओं से कैसे तालमेल बिठाएगा? तमाम तरह की विरोधाभासी छवियों वाले केजरीवाल के साथ कैसे और कितनी दूर तक चल पाएगा? जैसे-तैसे ही सही, चार साल तक तो आशुतोष चले ही। चार साल के इस सियासी सफर में आशुतोष ने बहुत कुछ देखा और झेला होगा लेकिन उनसे मीडिया वाला कोई उनके भीतर की भड़ास नहीं निकलवा सकता। आगे की बात तो राम जाने।

कभी अपने बयानों की वजह से तो कभी पार्टी के स्टैंड की वजह से आशुतोष ट्विटर पर लगातार गालियां पड़ती रही। आलोचनाओं का शिकार होना पड़ा। ‘देशभक्त’ ट्रोल्स की जमात तो उसके पीछे आए दिन दाना-पानी लेकर लगी रही लेकिन उसने कभी इसकी परवाह नहीं की।

कुत्ते-बिल्लियों से प्यार करने वाला आशुतोष आए दिन अपने ‘पोको-लोको’ के साथ अपनी तस्वीरें ट्विटर पर चिपका देता हैं, बदले में न जाने क्या सुनता है। दिन भर में उसके ट्विटर टाइम लाइन पर उसे नीचा दिखाने वाले बेहूदे किस्म के कमेंट थोक भाव से गिरते रहते हैं। मैंने भी कई बार कहा कि यार क्यों कुत्ते-बिल्ली की इतनी पिक्चर लगाकर लोगों को गालियों के इतने आविष्कार का मौका देते हो, लेकिन उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। देखता-पढ़ता भी नहीं कि उसका मनोबल तोड़ने में जुटे भक्तों की ब्रिगेड उसके ट्विटर टाइम लाइन पर कितने तरह की ‘गटर गैस’ छोड़कर गई है।

आशुतोष इस मामले में बहुत क्लियर है। जो सोच लिया, सोच लिया। एक बार स्टैंड ले लिया तो ले लिया। अपने दोस्तों से ज्यादा रायशुमारी करने में भी शायद उसका यकीन नहीं। इसका कई बार उसे नुकसान भी उठाना पड़ा है लेकिन वो ऐसा ही है। पिछले साल के आखिरी महीनों में ये चर्चा जोरों पर थी कि राज्यसभा के लिए खाली हो रही सीटों के लिए केजरीवाल की तरफ से आशुतोष की उम्मीदवारी पक्की है। हम सबने आशुतोष के दर्जनों बार पूछा लेकिन हर बार उसने ये कहा कि पता नहीं किसका नाम होगा, किसका नहीं। पार्टी को जो तय करना होगा, करेगी। कभी उसने राज्यसभा के लिए बेचैनी या अपनी महत्वकांक्षाओं का इजहार नहीं किया। उसके भीतर कुछ चलता भी होगा, भीतर ही दबाए रखा उसने। बावजूद इसके, हम जैसे तमाम लोग मानकर चल रहे थे कि जिस ढंग से उसने अपना करियर छोड़कर इतने लंबे समय के लिए पार्टी के लिए दिन रात काम किया है और दिल्ली से गोवा तक में अपनी ड्यूटी निभाई है, उसकी उम्मीदवारी तो पक्की ही होगी। कुमार विश्वास की केजरीवाल से तनातनी और मतभेद की खबरें इस बात की तस्दीक कर रही थी कि शायद कुमार का नंबर न आए लेकिन आशुतोष के नाम कटने या नहीं होने की कोई वजह नहीं दिखती थी।

तभी एक दिन दिल्ली से आम आदमी पार्टी के तीन उम्मीदवारों के नामों का ऐलान हुआ। इन नामों में आशुतोष का नाम नहीं था। पता नहीं आशुतोष को कितना झटका लगा था, हम जैसे कई लोगों को जरूर लगा था। कोई वजह समझ में नहीं आई कि ऐसा क्यों हुआ? मैंने इस बारे में आशुतोष से बहुत ज्यादा पूछताछ नहीं की। उसने भी हमेशा की तरह कुछ बताया नहीं लेकिन इस बीच वो खुद पार्टी से लगभग कट गया। मीटिंगों में जाना बंद कर दिया। इस बीच वो लिखने-पढ़ने में पहले से ज्यादा वक्त देने लगा। कई वेबसाइट के लिए कॉलम भी लिखने लगा। यानी वो अपनी उसी दुनिया में लौट रहा था, जहां से वो सियासत में आया था। अब जब उसके पार्टी छोड़ने की खबर आई है तो ये जानकारी भी सरेआम हुई है कि ‘केजरीवाल ने सुशील गुप्ता जैसे उद्योगपति को टिकट दिया था। साथ ही वह आशुतोष और संजय सिंह को राज्यसभा भेजना चाहते थे लेकिन आशुतोष ने स्पष्ट कहा कि उनका जमीर उन्हें सुशील गुप्ता के साथ राज्यसभा जाने की इजाजत नहीं देता है। चाहें उन्हें टिकट मिले या न मिले, सुशील गुप्ता को राज्यसभा नहीं भेजा जाना चाहिए। तब केजरीवाल ने उनकी जगह चार्टर्ड अकाउंटेंट एनडी गुप्ता का नामांकन करा दिया।’ 

आशुतोष के नाम नहीं होने और दिल्ली के सियासी सर्किल में पैसे वाले सेटर के तौर जाने-पहचाने वाले सुशील गुप्ता की उम्मीदवारी पर केजरीवाल की खूब आलोचना हुई लेकिन आशुतोष ने तब भी अपना मुंह बंद रखा। अब जब आशुतोष पार्टी का हिस्सा नहीं रहा, तब भी उसने मीडिया से यही गुजारिश की है कि बयान देने के लिए कोई रिपोर्टर उसे तंग नहीं करे।

केजरीवाल ने उसके इस्तीफे को अस्वीकार करते हुए ट्विटर पर इतना लिख दिया कि ‘हम आपका इस्तीफा कैसे स्वीकार कर सकते हैं। न, इस जन्म में तो नहीं।’ आप के कई और नेताओं ने भी ऐसी ही प्रतिक्रया दी है लेकिन आशुतोष को जानने वाले जानते हैं कि एक बार उसने फैसला कर लिया तो कर लिया। अब वो टस से मस नहीं होगा।

केजरीवाल के साथ रहते हुए आशुतोष ने थोक भाव से अपने दुश्मन बनाए। मोदी और मोदी की बीजेपी के खिलाफ अपने तीखे तेवरों और अतिरेकी बयानों की वजह से सोशल मीडिया पर खूब नश्तर झेले। टीवी चैनलों पर कई बार एंकर से इस कदर उलझा कि बहसें बदमगजी में तब्दील हो गई। मीडिया वालों को लंबे समय तक बीजेपी के खिलाफ बोलने-लिखने के लिए ललकारता रहा, इस वजह से अपने हमपेशा रहे कई रिपोर्टरों, संपादकों और एंकरों से उसके रिश्ते खराब हुए। शाम को चैनलों पर जमने वाले मजमों में केजरीवाल के प्रवक्ता के तौर पर बैठे आशुतोष ने कई बार आपा खोया। पार्टी की प्रेस कान्फ्रेंस के दौरान रिपोर्टर्स से उलझा। कई बार मुझे लगता था कि आशुतोष खुद को अपने को ‘डबल रोल’ में क्यों देख रहा है। संपादक भी। नेता भी। वो रिपोर्टर और एंकर से कहने लगता था कि मैं भी पत्रकार रहा हूं। बलां… बलां… तब मुझे भी गुस्सा आता था कि अरे भाई रहे होगे पत्रकार, अब आप नेता हैं और आपका एक एजेंडा है। आप अपने केजरीवाल के एजेंडे से चलिए। हमें सामूहिक नसीहत मत दीजिए। ज्ञान मत दीजिए। कुछ दोस्तों की मौजूदगी में एक दो मौकों पर यही सब मैंने मुंह पर बोल दिया तो हमारे बीच फिर तनाव पैदा हो गया। वहां भी किसी को बीच बचाव करना पड़ा।

आशुतोष मानें या न मानें लेकिन शायद आज उन्हें लगता होगा कि जिन लोगों के लिए, जिस ‘क्रांतिकारी पार्टी’ के लिए उन्होंने अपना सब कुछ दांव पर लगाया, वो इसकी हकदार नहीं थी। या ये कहें कि वो सुशील गुप्ताओं की तरह पार्टी के ‘लायक’ नहीं थे। चार साल में आशुतोष को इस पार्टी ने क्या दिया? उसकी पत्नी नौकरी नहीं कर रही होती और सेविंग न की होती तो घर चलाना मुश्किल हो जाता। वो तो उसकी जररुतें ही इतनी कम हैं कि हताश हुए बगैर चार साल तक वो टिका रहा।

आशुतोष जब चैनल में था, तब उसने छुट्टी लेकर अन्ना पर अंग्रेजी में किताब लिख दी। जब राजनीति में आया तो केजरीवाल के आंदोलन को अपनी किताब का विषय बनाया। मुझे लगता है कि किताब तो उसे अब लिखनी चाहिए। अपने अनुभवों पर। अपने साथ हुए गच्चे पर। आंदोलन के गर्भगृह से निकली और उम्मीदों की कब्र पर टिकी ‘क्रांतिकारी पार्टी’ पर। सैकड़ों लेख और तीन किताबें लिख चुके आशुतोष के घर में सैकड़ों किताबों की लाइब्रेरी है। पढ़ना-लिखना उसका सबसे खास शौक है। अब उसके पास इन सब के लिए पहले से ज्यादा वक्त होगा। उसकी एक और किताब लगभग लिखी जा चुकी है। अगली किताब का विषय वो चाहें तो खुद हो सकते हैं - ‘मैं आशुतोष’।

आशुतोष जब तक केजरीवाल की पार्टी में रहे, मैं सार्वजनिक मौकों पर उनके साथ ली जाने वाली तस्वीरों से भी बचता रहा कि कहीं सोशल मीडिया पर खामखा ट्रोल होने का कोई बहाना ये तस्वीर न बन जाए। उसके हिस्से की गालियों में मैं साझेदार नहीं बनना चाहता था। नेता बनने से पहले दोस्तों की महफिल में जब तस्वीरें खींची जाती थी, तो आशुतोष मुझे चिढ़ाते हुए कहता था कि ये फेसबुक पर मत डाल दीजिएगा। नेता बनने के बाद अगर कभी किसी मौके पर तस्वीर खींची भी गई तो मैंने कहा कि मैं आपके साथ फोटो खिंचा रहा हूं, यही बहुत है। फेसबुक पर डालने का जोखिम मैं नहीं मोल लूंगा। चार साल में मैंने आशुतोष के साथ अपनी तस्वीरें सार्वजनिक होने से बचता रहा। अब मैं अपनी तरफ से लगाई गई इस पाबंदी से मुक्त हूं क्योंकि हमारा आशु मुक्त है।

2002 में ‘आजतक’ में हम सब साथ काम करते थे। मैं, सुप्रिय प्रसाद, अमिताभ श्रीवास्तव, आशुतोष और संजीव पालीवाल। हमने अपने इस पांच सदस्यीय मंडली का नाम ‘पी-5’ रखा था। ‘पी-5’ के हम पांच अक्सर दफ्तर से फ्री होने के बाद किसी न किसी के घर पर आधी रात या सुबह तक बैठकी जमाया करते थे। बाद में अलग अलग चैनलों के हिस्सा बने और ‘पी-5’  की बैठकें भी कम हो गईं। अब एक बार फिर हम बैठेंगे आशुतोष। उस आशुतोष के साथ, जो अब नेता नहीं हैं। वैसे ही कभी साथ छुट्टियां मनाने जाएंगे, जैसे नेता बनने से पहले वाले आशुतोष के साथ जाया करते थे।


आखिरी बात, ऐसा नहीं है कि आशुतोष ने जिंदगी में समझौते नहीं किए होंगे या अपने संपादन काल में अपने चैनल की रेटिंग के लिए ‘स्वर्ग की सीढ़ी’ नहीं बनाई होगी, मैं सिर्फ इतना ही कहूंगा कि ‘हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी। जिस को भी देखना हो कई बार देखना’

देखें विडियो: आशुतोष का ये अलहदा अंदाज, जो आपने कभी न देखा होगा- 


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ZEE-इनवेस्को विवाद में ‘संरक्षक’ की भूमिका निभा रहे हैं पुनीत गोयनका: डॉ.अनुराग बत्रा

मुझे विश्वास है कि इस लेख में मैंने जो कुछ भी लिखा है, वह इस बारे में मेरे गहरे ज्ञान और समझ से आया है।

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Published - Wednesday, 13 October, 2021
Last Modified:
Wednesday, 13 October, 2021
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डॉ.अनुराग बत्रा ।।

मैं लगभग तीन सप्ताह से इस विषय पर लिखना चाहता था, लेकिन मैंने संतुलित दृष्टिकोण बनाए रखने के लिए इस दौरान कुछ नहीं लिखा। मैं इस परिप्रेक्ष्य में अपनी बात रखने के लिए स्थिति पूरी तरह से स्पष्ट होने की प्रतीक्षा कर रहा था। हालांकि, हर दिन नए और असंगत तथ्य सामने आने के कारण मैं आज इसे लिखने से खुद को रोक नहीं पाया। मैं 21 वर्षों से मीडिया का विद्यार्थी रहा हूं। गतिशील भारतीय मीडिया के बारे में सीखना, अवलोकन करना और लिखना मेरा जुनून और पेशा दोनों रहा है।

मैंने वर्ष 2000 में ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) समूह की सह-स्थापना की और करीब आठ साल पहले ‘बिजनेस वर्ल्ड’ (BW Businessworld) का अधिग्रहण (acquired) किया। मेरे करियर का अधिकांश समय भारतीय मीडिया और मनोरंजन उद्योग का बारीकी से अध्ययन करने पर केंद्रित रहा है। मुझे सभी प्रमुख हितधारकों (stakeholders) के साथ बातचीत के माध्यम से इस बिजनेस की प्रकृति को जानने और समझने का सौभाग्य मिला है। मीडिया मालिकों, सीईओ और बड़े निवेशकों के साथ मेरा करीबी जुड़ाव, पेशेवर संबंध और गहरी दोस्ती रही है। इसलिए, मुझे विश्वास है कि इस लेख में मैंने जो कुछ भी लिखा है, वह इस बारे में मेरे गहरे ज्ञान और समझ से आया है।

इस समय नवरात्रि चल रही हैं और आज अष्टमी है, जो हिंदुओं के लिए काफी शुभ दिन है। एक आस्थावान व्यक्ति के रूप में मैं अपने देवताओं की ‘त्रिमूर्ति’ में विश्वास करता हूं यानी भगवान ब्रह्मा-निर्माता, भगवान विष्णु-पालनकर्ता और भगवान शिव-संहारक हैं। मेरे हिसाब से ‘जी’ और उसके निवेशकों के बीच चल रहा विवाद इस ‘त्रिमूर्ति’ के साथ अपने सांसारिक तरीके से तुलना करता है। 

इस विवाद में मैं ‘एस्सेल ग्रुप’ (Essel Group) के चेयरमैन डॉ. सुभाष चंद्रा को ‘जी’ का रचयिता (creator), उनके बेटे और एक दशक से ज्यादा समय से ‘जी’ के एमडी व सीईओ पुनीत गोयनका को इस समूह द्वारा बनाई गई शानदार शेयरधारक संपत्ति के संरक्षक (preserver) के रूप में और शेयरधारकों में से एक इनवेस्को (Invesco) को शेयरधारक मूल्य के विध्वंसक (destroyer) के रूप में देखता हूं।

इस बारे में कुछ तथ्य आपके सामने हैं-

कल रात एक चौंकाने वाला रहस्योद्घाटन हुआ कि ‘इनवेस्को डेवलपिंग मार्केट फंड्स’ ने 'जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड’ को पहले एक बड़े भारतीय समूह के साथ कंपनी का विलय करने की पेशकश की थी। इस तरह की डील में ‘जी’ का काफी कम मूल्यांकन किया गया था, यह तथ्य बाद में ‘सोनी‘ के साथ सौदे में मीडिया दिग्गज को दिए गए मूल्यांकन से साबित हुआ।

आखिर इनवेस्को ऐसा ‘तांडव’ क्यों कर रहा था? हालांकि इस बारे में कोई यह तर्क दे सकता है कि नए सिरे से निर्माण करने के लिए रचनात्मक विनाश करने की आवश्यकता है। लेकिन इस तरह के विनाश से सिर्फ नए शेयरधारकों के लिए मूल्य निर्मित होंगे, जबकि मौजूदा शेयरधारकों को नुकसान उठाना पड़ेगा।

इस पूरे मामले में एक सवाल यह भी उठता है कि ‘जी’ के शेयरों की कीमतों को किस दबाव में कम रखा जा रहा है, जबकि वास्तव में इसका वित्तीय प्रदर्शन लगातार अच्छा बना रहता है, जो पिछले समय में दोगुना तक बढ़ गया है। इसी के मद्देनजर इनवेस्को की मंशा पर लगातार सवाल उठ रहे हैं कि उसके पीछे किसका हाथ है? शेयर की कीमतों को कम करने के पीछे क्या कारण हैं? क्या उसे किसी से मदद मिल रही है?

इन सब सवालों के बीच इन तथ्यों को ध्यान में रखने की जरूरत है- 

  • डील की शुरुआत इनवेस्को ने की थी, ‘जी’ ने नहीं।
  • इस डील में पेशकश की गई थी कि उपरोक्त विलय के पूरा होने पर रणनीतिक समूह के पास विलय की गई इकाई में बहुमत हिस्सेदारी होगी और पुनीत गोयनका को एमडी और सीईओ के रूप में नियुक्त किया जाएगा। अब बेहतर डील होने के बाद इस बात से क्यों पलटा जा रहा है, क्या डील में शेयरहोल्डर्स को ज्यादा वैल्यू देने की पेशकश की गई थी?
  • उस डील ने नई विलय की गई इकाई में प्रमोटर समूह को 7-8 प्रतिशत शेयरों की गारंटी दी थी। ऐसे में इनवेस्को सोनी डील के साथ प्रमोटर्स के संरक्षण को कमजोर पड़ने को लेकर क्यों सवाल उठा रहा है?
  • यह सर्वविदित है कि पुनीत गोयनका ‘जी’ में बड़ी योजनाओं के मामले में डॉ. सुभाष चंद्रा का प्रतिनिधित्व करते हैं और कंपनी वर्षों से अच्छा प्रदर्शन कर रही है।  ऐसा लगता है कि चूंकि वह इस विशेष निवेशक के पसंदीदा सौदे के साथ आगे नहीं बढ़ रहे हैं, इसलिए इनवेस्को का इरादा उन्हें हटाने और कई नए निदेशकों को बोर्ड में लाने का प्रस्ताव इस सौदे को घुमाना है।
  • प्रश्न यह उठता है कि इनवेस्को इस सार्वजनिक कॉर्पोरेट विवाद के लिए चालक के रूप में एक अन्य बड़े व्यापारिक समूह के साथ सौदे का खुलासा करने में विफल क्यों रहा। ऐसा लगता है कि इनवेस्को द्वारा लगाए जा रहे आरोप उनके निहित संकीर्ण हितों को छिपाने का प्रयास है।
  • बोर्ड एक इकाई के रूप में कार्य करता है और इसमें इनवेस्को के नामांकित व्यक्ति भी शामिल हैं। तो वर्षों से बोर्ड की बैठकों के दौरान उनके नामांकित व्यक्तियों की टिप्पणियों के अभाव में, क्या इनवेस्को का सिर्फ भारतीय प्रमोटरों के नामांकित व्यक्तियों को लक्षित करना औचित्य की कसौटी पर खरा उतरता है?

सही नेतृत्व

मैंने जो तथ्य बताए हैं उसके आधार पर मुझे उम्मीद है कि ये स्थिति को एक अलग दृष्टिकोण देते हैं। मेरा यह भी मानना है कि इस मामले पर अपने विचार रखना महत्वपूर्ण है। मेरा विचार है कि पुनीत गोयनका विलय होने वाली इकाई के एमडी और सीईओ बने रहें। इसकी पीछे मेरे ये आठ कारण हैं:

1:- पुनीत अपने पिता डॉ सुभाष चंद्र के लिए एक आदर्श संतान हैं। पुनीत गोयनका के साथ काम करने वाला कोई भी व्यक्ति आपको बताएगा कि डॉ. सुभाष चंद्र जहां श्रेष्ठ रचनाकार, एक दयालु व्यक्ति और काफी मानवीय दृष्टिकोण वाले हैं, पुनीत, अपने पिता के इन गुणों के साथ ही बहुत ही तार्किक, निष्पक्ष और व्यावसायिक दृष्टिकोण रखते हैं।

2:- एमडी और सीईओ के रूप में वह कंपनी के प्रदर्शन को बढ़ाने में बेहद सफल रहे हैं और लगातार बेहतर परिणाम दे रहे हैं।

3:- विशेष रूप से यह बताना महत्वपूर्ण है कि वह प्रत्येक एम्प्लॉयी-चाहे वह कनिष्ठ हो या वरिष्ठ, सभी से काफी प्यार करते हैं। यह एक संगठन की सफलता के लिए महत्वपूर्ण है।

4:- वह हमेशा ही शीर्ष टैलेंट को पहचानते हैं और यही एक क्वॉलिटी नहीं है, जो उनके पास है। एक संगठन के तौर पर ‘जी’ को आगे बढ़ाने, स्थिरता और विकास सुनिश्चित करने के लिए सही समय पर सही प्रतिभा को पहचानना एक महत्वपूर्ण कारक है।

5:- एक्सचेंज4मीडिया में हमने पुनीत गोयनका के इन गुणों को देखा है और दिग्गज जूरी ने उन्हें नौ साल पहले 'इम्पैक्ट पर्सन ऑफ द ईयर' के रूप में चुना। एक विजेता के रूप में वह उदय शंकर जैसे अन्य समकालीन दिग्गजों के बीच खड़े हैं।

6:- पुनीत गोयनका ने दिखाया है कि वह शेयरधारकों का सबसे अच्छा हित देखते हैं। इस लड़ाई में भी जिस तरह से उन्होंने संयमित तरीके से अपने आप को पेश किया है, वह बाकई में काबिले तारीफ है।

7:- पूरा मीडिया और मनोरंजन जगत खुले तौर पर और पूरे दिल से उनके द्वारा दिए गए सम्मान और स्नेह को प्रदर्शित करता है।

8:- सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पुनीत टेक्नोलॉजी और कंटेंट दोनों को गहराई से समझते हैं। न केवल यह एक बेहतरीन संयोजन है, बल्कि यह आज के विकसित मीडिया और मनोरंजन परिदृश्य में सबसे अच्छा कौशल भी है, खासकर जब उनमें लीडरशिप के तमाम अन्य गुण मौजूद हैं। 

अगर मुझे खुदरा निवेशक (retail investor) के रूप में विलय की गई इकाई में शेयर खरीदना पड़ा, तो यह तभी हो सकता है जब डॉ सुभाष चंद्रा के नेतृत्व वाले प्रमोटर समूह की पर्याप्त हिस्सेदारी का प्रतिनिधित्व करते हुए पुनीत गोयनका कंपनी के लीडर बने रहें। इन 25 वर्षों में डॉ. चंद्रा ने जो रचना की, वह एक उत्कृष्ट कृति है,जिसे इस डिजिटल युग में पुनीत गोयनका द्वारा फिर से बनाया जा सकता है। उन्होंने अपने पिता को ‘जी’ का निर्माण करते देखा है और उनसे सीखा है, जबकि साथ ही वह अपनी शैली, दृष्टि और परिवर्तनकारी क्षमताओं को पेश करते हैं। मेरी नजर में वह बेजोड़ हैं और वह वास्तव में संरक्षक हैं।

(लेखक बिजनेसवर्ल्ड समूह के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ और एक्सचेंज4मीडिया समूह के को-फाउंडर व एडिटर-इन-चीफ हैं।)

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‘उधार का सिंदूर’ संसद टीवी की प्रतिष्ठा नहीं बढ़ाएगा मिस्टर मीडिया!

भारतीय संसद का नया टेलिविजन चैनल शुरू हो चुका है। करीब एक दशक तक ‘राज्यसभा टीवी‘ और डेढ़ दशक तक ‘लोकसभा टीवी‘ पर लगभग एक हजार करोड़ रुपये खर्च करने के बाद उन्हें ‘स्वर्ग की सीढ़ी’ दिखा दी गई।

राजेश बादल by
Published - Tuesday, 12 October, 2021
Last Modified:
Tuesday, 12 October, 2021
Sansad TV

राजेश बादल,  वरिष्ठ पत्रकार।।

भारतीय संसद का नया टेलिविजन चैनल शुरू हो चुका है। करीब एक दशक तक ‘राज्यसभा टीवी‘ और डेढ़ दशक तक ‘लोकसभा टीवी‘ पर लगभग एक हजार करोड़ रुपये खर्च करने के बाद उन्हें ‘स्वर्ग की सीढ़ी’ दिखा दी गई। अब ‘संसद टीवी‘ ने कोरी स्लेट पर इबारत लिखनी शुरू कर दी है। इन दोनों चैनलों के रहते भारत उन-गिने चुने देशों में शुमार था, जिसके दोनों सदनों के अपने चैनल थे।

सिफर से किसी भी नए काम की शुरुआत आसान नहीं होती। नए चैनल के लिए भी यह एक बड़ी चुनौती है। इस चैनल को पूर्व के दोनों चैनलों से बड़ी लकीर खींचनी होगी। यह नामुमकिन तो नहीं, पर बेहद कठिन जरूर है। अपने अनुभव से कह सकता हूं कि संसद में फाइलों के जंगल और कायदे कानूनों के जाल से निकलकर चैनल को दौड़ाना अत्यंत टेढ़ी खीर है। चैनल के नियंताओं को यकीनन इसका अंदाजा होना चाहिए। शायद इसलिए उन्होंने ‘कब्र में दफन‘ हो चुके चैनलों की खाक को माथे से लगाना शुरू कर दिया है।

अपनी बात स्पष्ट करता हूं। आप लोगों ने नई बोतल में पुरानी शराब वाली कहावत अवश्य सुनी होगी। ‘संसद टीवी‘ के यूट्यूब तथा अन्य डिजिटल अवतारों पर दोनों ‘स्वर्गीय चैनलों‘ के कार्यक्रमों की कुल दर्शक तथा सबस्क्राइबर्स की संख्या भी ‘संसद टीवी‘ में जोड़ दी गई है। यानी जो चैनल अलग लाइसेंस के साथ अवतरित हुए थे, वे अब मर चुके हैं, मगर उनके कार्यक्रम ‘संसद टीवी‘ के खाते में धड़क रहे हैं।

जो चैनल आज पैदा हुआ है, उसके कार्यक्रम पुराने चैनलों के लिए बनाए गए हैं तो उन चैनलों के लाइक्स, दर्शक संख्या और सबस्क्राइबर्स की संख्या का कोई नया चैनल कैसे इस्तेमाल कर सकता है? मान लिया जाए कि वे कार्यक्रम संसद के ‘मृत चैनलों‘ की संपत्ति हैं तो 2021 में जन्म लेने वाला चैनल अपने खाते में 2010 से 2020 तक के कार्यक्रमों की लाइक्स, टिप्पणियां और सबस्क्राइबर्स की संख्या कैसे जोड़ सकता है? कोई निजी प्रसारण कंपनी ऐसा करती तो शायद उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो जाती। लेकिन चूंकि मामला संसद का है तो बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे?

तनिक सख्त भाषा का इस्तेमाल करना चाहूं तो कह सकता हूं कि यह दर्शकों के साथ कंटेंट की धोखाधड़ी से अलग मामला नहीं है। बेहतर होता कि ‘संसद टीवी‘ का आलाकमान अपनी कमाई हुई पूंजी से यश पाने की कोशिश करता। उधार का सिंदूर उसकी प्रतिष्ठा नहीं बढ़ाएगा। आज दर्शक इतने अक्लमंद हैं कि वे समझते हैं कि जो कार्यक्रम उन्हें परोसे जा रहे हैं, वे साल भर से लेकर दस साल तक पुराने हैं और अगर वही पुराने कार्यक्रम दिखाने इतने जरूरी हैं तो फिर ‘संसद टीवी‘ की जरूरत ही क्या थी? संसद के इस भव्य और गरिमापूर्ण नए नवेले चैनल से यह उम्मीद तो नहीं ही थी।

यह ठीक वैसा ही है कि एक अखबार चलाने वाली कंपनी पुराना अखबार बंद कर दे और जब नया टाइटल लेकर नया समाचारपत्र प्रारंभ करे तो पुराने अखबार के साल भी उसमें जोड़ दे। वैसे जानकारी के लिए बता दूं कि आजकल दर्शक बढ़ाने, लाइक्स और सबस्काइबर्स बढ़ाने का उद्योग भी खूब फल-फूल रहा है। अभी इस कारोबार पर लगाम लगाने की भी जरूरत है। क्या इस तरफ कोई ध्यान देगा मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

इतना पेशेवर दृष्टिकोण तो आज के संपादक भी नहीं रखते मिस्टर मीडिया!

सुप्रीम कोर्ट की चिंता संवैधानिक है मिस्टर मीडिया!

इस हकीकत को समझिए, फर्जी खबरों से मुकाबला करना आसान हो जाएगा मिस्टर मीडिया!

मुश्किल दौर में है अफगानी मीडिया, भारतीय पत्रकारों को आगे आना होगा मिस्टर मीडिया! 

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साल भर से सत्याग्रह कर रहे किसानों पर व्यवस्था का गुस्सा फूटने लगा: राजेश बादल

तो वह नौबत आ ही गई। गांधी मार्ग पर चलते हुए साल भर से सत्याग्रह कर रहे किसानों पर व्यवस्था का गुस्सा फूटने लगा।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 05 October, 2021
Last Modified:
Tuesday, 05 October, 2021
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राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

तो वह नौबत आ ही गई। गांधी मार्ग पर चलते हुए साल भर से सत्याग्रह कर रहे किसानों पर व्यवस्था का गुस्सा फूटने लगा। कोई आंदोलन लंबे समय तक अहिंसक और शांतिपूर्वक तरीके से संचालित भी हो सकता है, किसान आंदोलन उसकी एक मिसाल है।

हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने जिस ढंग से इस किसान आंदोलन के बारे में अराजक और असंसदीय टिप्पणी की है, उसकी निंदा करने के अलावा और क्या हो सकता है। एक बैठक में उन्होंने कहा कि किसानों पर डंडे उठाने वाले कार्यकर्ता हर जिले में होने चाहिए। ऐसे पांच-सात सौ लोग जैसे को तैसा जवाब दे सकते हैं। एक निर्वाचित और संविधान की शपथ लेकर मुख्यमंत्री के पद पर बैठे राजनेता की यह टिप्पणी बताती है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन भी अब राज्य सरकार के गले की फांस बन गए हैं।

पिछले चुनाव में उन्होंने विपक्ष के साथ मिलकर जैसे-तैसे सरकार बनाई थी, लेकिन अब किसान आंदोलन के कारण खिसक रहे जनाधार ने उन्हें इस तरह का धमकी भरा बयान देने के लिए बाध्य कर दिया है।

प्रश्न यह है कि क्या किसी भी सभ्य लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों को हिंसा और टकराव का खुलेआम समर्थन करना चाहिए? जिन वर्गो के हितों की हिफाजत के लिए अवाम उन्हें चुनकर भेजती है, उनमें किसान बहुसंख्यक है। 

यह देश सदियों से किसानों को अन्नदाता तो मानता रहा है, लेकिन उनके आर्थिक और सामाजिक कल्याण की उपेक्षा भी करता रहा है। आजादी के पहले से ही यह सिलसिला जारी है। किसानों को कई बार खेतीबाड़ी छोड़कर सड़कों पर उतरना पड़ा है। उन पर पुलिस की गोलियां भी बरसीं मगर कृषि के लिए रियायतें और उत्पादन का वाजिब मूल्य कभी नहीं मिला, चाहे किसी भी राजनीतिक दल की सरकार रही हो। 

एक कृषि प्रधान देश के लिए इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि किसान सबका पेट भरने की चिंता अपने धर्म पालन की तरह करें और समाज उनके सरोकारों को रद्दी की टोकरी में फेंक दे।

हरियाणा के मुख्यमंत्री धरने पर बैठे किसानों के मुकाबले बेशक जिले-जिले में कार्यकर्ताओं की हथियारबंद फौज उतार दें, पर क्या वे भूल सकते हैं कि आंदोलनकारी लाखों किसान भी उन्हें वोट देते आए हैं और वे भारतीय प्रजातंत्र का अभिन्न अंग भी हैं।

आत्मरक्षा का अधिकार तो भारतीय दंड विधान भी देता है। कल्पना करें कि उन पांच-सात सौ लोगों की सेना से लड़ने के लिए हर किसान ने अगर एक-एक डंडा उठा लिया तो सरकार के लिए कानून-व्यवस्था की स्थिति संभालना कठिन हो जाएगा।

पाकिस्तान में तानाशाह जनरल अयूब खान को ऐसे ही जनआंदोलन के सामने अपनी सत्ता छोड़कर भागना पड़ा था। भारत में भी जनता के व्यापक प्रतिरोध का परिणाम हम 1977 में देख चुके हैं।   

क्या यह संयोग मात्र है कि चौबीस घंटे के भीतर हरियाणा के पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में एक शर्मनाक घटना घट गई। जिस अंदाज में केंद्रीय गृह राज्यमंत्री ने खुलेआम सत्याग्रह कर रहे किसानों को धमकाया और अपने आपराधिक अतीत का हवाला दिया, उसने किसानों के खिलाफ सीधी कार्रवाई के लिए समर्थकों को उकसाया। मंत्री ने साफ-साफ कहा था कि वे केवल मंत्री, सांसद या विधायक ही नहीं हैं। जो लोग उन्हें जानते हैं, उन्हें अतीत के बारे में भी पता होना चाहिए। यह बाहुबली मंत्री की साफ-साफ धमकी थी।

पिता से प्रोत्साहित बेटा और चार कदम आगे निकला। उसने गुस्से में जिस तरह किसानों को अपनी गाड़ी से रौंदा, वह भयावह और विचलित करने वाला है। इससे गुस्साए किसान भी हिंसा पर उतर आए। दोनों पक्ष अपने-अपने तर्क दे रहे हैं, लेकिन यह सच है कि जनप्रतिनिधियों के बयान किसानों की भावनाओं को आहत करने वाले थे।

दो पड़ोसी प्रदेशों में एक मुख्यमंत्री और एक केंद्रीय मंत्री का रवैया इस बात का प्रमाण है कि हुकूमतं अब किसान आंदोलन को हरसंभव ढंग से कुचलने पर आमादा हैं। वे किसानों के साथ अपराधियों की तरह सुलूक कर रही हैं। इसके अलावा लखीमपुर खीरी की यह घटना एक आशंका और खड़ी करती है। एक मंत्री पुत्र का आचरण यह साबित करता है कि भारतीय लोकतंत्र अब जो नई नस्लें तैयार कर रहा है, वे मुल्क को मध्ययुगीन सामंती बर्बरता के युग में ले जाना चाहती हैं। इस तरह की हैवानियत यकीनन हताशा और कुंठा का नतीजा है।

उत्तर प्रदेश आने वाले दिनों में विधानसभा चुनावों का सामना करने जा रहा है। लखीमपुर खीरी की घटना के बाद सवाल खड़े हो रहे हैं कि क्या बंदूक की नोंक पर नागरिकों से उनके अधिकार तो नहीं छीने जा रहे हैं। 

हमें याद रखना चाहिए कि स्वतंत्रता से पहले महात्मा गांधी के अहिंसक और सविनय अवज्ञा आंदोलनों से तत्कालीन हुकूमत बौखला उठी थी। फिर उसने दमनचक्र चलाया था। उस भयावह दौर में तात्कालिक नुकसान भले ही सत्याग्रहियों या स्वतंत्रता सेनानियों को उठाना पड़ा हो, मगर जीत अंतत: सच की हुई थी। सच सिर चढ़कर बोलता है और झूठ के पांव नहीं होते। यह बात सियासी नुमाइंदों को ध्यान में रखनी चाहिए।

(साभार: लोकमत)

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इतना पेशेवर दृष्टिकोण तो आज के संपादक भी नहीं रखते मिस्टर मीडिया!

अनुभव से बड़ा कोई ज्ञान नहीं है। जब कोई उमरदराज बूढ़ा इस लोक से जाता है तो अपने साथ एक विशाल पुस्तकालय ले जाता है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 02 October, 2021
Last Modified:
Saturday, 02 October, 2021
gandhi454874

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

अनुभव से बड़ा कोई ज्ञान नहीं है। जब कोई उमरदराज बूढ़ा इस लोक से जाता है तो अपने साथ एक विशाल पुस्तकालय ले जाता है। इसी कारण कहा जाता है- जो बुजुर्ग दें, उसे सहेज कर रखना चाहिए। न जाने कब काम आ जाए। जो कौम अपने पूर्वजों को भूलने का अपराध करती है, उसके लिए हर सजा कम है। हम पत्रकारों ने इस कारण अपने पूर्वज शिखर पत्रकार गांधी को भूलने का अपराध किया है। उसके लिए कटघरे में खड़े हैं। कम से कम मैं तो यही महसूस करता हूं। आज उनके जन्मदिन पर गांधी की निर्भीक पत्रकारिता को याद करना जरूरी है। 

जब हम गांधी के संप्रेषण की बात करते हैं तो एक दुर्लभ संयोग देखते हैं। वो जितने बेहतर अंदाज में माइक पर या सभा में अपने विचारों को सुनने वालों तक पहुंचाते थे, उससे कहीं शानदार ढंग से वो पत्रकार या संपादक के रूप में लिखकर अपने भावों को बयान करते थे। करीब करीब सत्ताईस-अट्ठाईस साल तक गांधीजी संपादक के रूप में जिस तरह से  विचार व्यक्त करते रहे, वे वास्तव में आज के समाज तक पहुंचे ही नहीं। हम उन्हें स्वराज दिलाने वाले महानायक के रूप में जानते हैं, लेकिन पत्रकार के रूप में उनकी भूमिका पर ज्यादा चर्चा नहीं होती। आजादी से पहले पत्रकारिता मिशन थी और इसका मकसद सिर्फ आजादी था। इसलिए भारतीय इतिहास के अनेक महापुरुषों की संप्रेषण शैली और पत्रकारिता पर आज ज्यादा चर्चा नहीं होती। इन महापुरुषों को केवल स्वतंत्रता सेनानी मानकर हम उनके समग्र मूल्यांकन पर क्यों ध्यान नहीं दे पाए- यह बात मेरी समझ में कभी नहीं आई।

गांधी को याद करते समय एक तो राष्ट्रपिता जैसा कुछ भाव मन में आता है। दो अक्टूबर और तीस जनवरी पर रस्म अदायगी होती है। इसके बाद अगले अवसर तक के लिए हमारी आंख लग जाती है। अगली तारीख आती है। हम फिर जाग जाते हैं। दरअसल गांधी का चेहरा जब भी जेहन में उभरता है तो वह आजादी दिलाने वाले महापुरुष का होता है। इसलिए गांधी के अन्य रूप हमें याद ही नहीं आते। खास तौर पर गांधी का पत्रकार वाला रूप। सिर्फ  इक्कीस साल की उमर में लंदन के ‘द वेजिटेरियन’ में प्रकाशित नौ लेखों की श्रृंखला से तहलका मचा देता है और तेईस साल का होने तक वह नियमित पत्रकार बन जाता है।  

गांधी जब दक्षिण अफ्रीका पहुंचे तो भरपूर नौजवान थे। वहां अदालत में पहला मुकदमा लड़ते हैं। तीसरे दिन ही गोरे अदालत में उनका अपमान करते हैं। विरोध में वे तमाम अखबारों में अपने लेखों की झड़ी लगा देते हैं। माहौल गांधी के पक्ष में बन जाता है। लंदन से ‘इंडिया’ नामक अखबार का प्रकाशन शुरू कराते हैं और दक्षिण अफ्रीका से उसके संवाददाता की तरह लंबे समय तक काम करते हैं।

एक सौ अठारह साल पहले दक्षिण अफ्रीका से 1903 में ‘इंडियन ओपिनियन’ का प्रकाशन शुरू करते हैं। अंग्रेजी में ही नहीं, हिंदी, गुजराती और तमिल में भी उसके संस्करण प्रकाशित होते हैं। उसका कोई अंक महात्मा गांधी की रिपोर्ट के बिना नहीं छपता। हर महीने गांधी अपनी जेब से 1200 रुपए खर्च करते हैं। भारत आने तक वे अपनी जेब से 26000 रुपए इस समाचार पत्र में लगा चुके थे। अपने लेखन के बारे में उन्होंने कहा, ‘मैंने एक भी शब्द बिना विचारे, बिना तौले या किसी को खुश करने के लिए नहीं लिखा। सन 1915 में वे हिन्दुस्तान आते हैं। भारत भर में घूमते हैं। देश की समझने का प्रयास करते हैं और फिर लोगों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए पत्रकार बनते हैं। सन 1919 में यानी करीब एक सौ दो साल पहले गुजराती में ‘नवजीवन’ अखबार शुरू करते हैं। ‘यंग इंडिया’ के संपादक बनते हैं और उद्वेलित करने वाले विचारों की नदी बहा देते हैं। ‘यंग इंडिया’ का संपादक बनते ही पहला पत्र अखबार में उन लोगों को लिखते हैं, जो उनसे असहमत होते थे या उनका विरोध करते थे। दूसरा पत्र वे उन गोरों को लिखते हैं, जिसमें वे उन्हें भारत की आजादी के लिए सहमत करने वाले तर्क देते हैं। दोनों अखबार करीब करीब तेरह-चौदह साल निकलते रहे। इनमें प्रकाशित गांधी के विचार पढ़ जाइए। आज के भारत की समस्त चुनौतियों और समस्याओं का हल  उसमें है।

गांधी की संपादकीय दृढ़ता और साहस आज के पत्रकारों और संपादकों के लिए मिसाल है। सात मई, 1944 को यंग इंडिया में उन्होंने लोकतंत्र के समर्थन में लिखा था कि लोकतंत्र से अच्छी प्रणाली कोई दूसरी नहीं है। इतनी बड़ी आबादी के कारण हो सकता है कि उसमें कुछ दोष हों, लेकिन हमें उन दोषों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए। यंग इंडिया की पत्रकारिता के लिए ही गांधी जी पहली बार जेल गए थे।  

एक उदाहरण- सन1919 में एक एक्ट लागू हुआ। इसके मुताबिक प्रकाशित होने वाली हर सामग्री की पूर्व अनुमति गोरी हुकूमत ने जरूरी बना दी थी। विरोध में गांधी ‘सत्याग्रह’ का  प्रकाशन करते हैं। अखबार के प्रकाशन की अनुमति भी वे नहीं लेते। पहले अंक में ही लिखते हैं कि सत्याग्रह का प्रकाशन तब तक होता रहेगा, जब तक कि एक्ट वापस नहीं लिया जाता। यह साहस दिखाने वाले सिर्फ गांधी ही हो सकते थे। इसके बाद 1933 में उनकी पहल पर हरिजन कल्याण के लिए नया अखबार निकलता है। यह पहले अंग्रेजी फिर हिंदी में निकला। उनका इस समाचार पत्र के लिए उद्देश्य एकदम साफ था- सेवा। आज विचारों की खुराक हमें कहां मिलती है। न के बराबर। गांधी ने उस समय कहा था कि एक विचार पत्र होना चाहिए। यही वह समय है, जब गांधी साबरमती आश्रम हमेशा के लिए छोड़ देते हैं। कहते हैं, जब तक मुल्क आजाद नही होगा, साबरमती आश्रम नहीं लौटेंगे।

सरकार के दबाव और सेंसरशिप के विरोध में वे लिखते हैं- एक एक पंक्ति अगर दिल्ली में बैठे प्रेस सलाहकार को भेजना पड़े तो मैं स्वतंत्रतापूर्वक काम नही कर सकता। प्रेस की आजादी तो विशेषाधिकार है। गांधी के तेवर से सरकार परेशान हो चुकी थी। जब उन्होंने 1942 में अंग्रेजों! भारत छोड़ों आन्दोलन छेड़ा तो ‘हरिजन’ बंद करना पड़ा। गांधी जेल गए और इधर हरिजन पर ताला पड़ गया। बरतानवी सरकार ने एक-एक प्रति जला दी या जब्त कर ली। दो बरस बाद गांधी जी जेल से छूटे तो हरिजन का प्रकाशन फिर प्रारंभ कर दिया। सेवाग्राम से ही उन्होंने ‘सर्वोदय’ का प्रकाशन शुरू किया। यह उनके अंत समय तक जारी रहा। गांधी ने अपने को हमेशा पूर्णकालिक पत्रकार ही माना। उनका कहना था कि मैं पूर्णकालिक पत्रकार हूं, लेकिन इस समय सबसे बड़ा काम देश की आजादी है। इसके बाद मेरा काम पत्रकारिता है। उन्होंने साफ साफ कहा था, संपादक को कोई भी परिणाम भुगतना पड़े, लेकिन अपने विचार खुलकर व्यक्त करना चाहिए। अखबार के बारे में उनकी स्पष्ट धारणा थी कि प्रकाशन के बाद वह संपादक और मालिक का समाचारपत्र नहीं रह जाता। वह पाठक का हो जाता है। एक संपादक-पत्रकार के रूप में इतना पेशेवर दृष्टिकोण तो आज के संपादक भी नहीं रखते। इस राष्ट्र-राज्य को इस युगपुरुष के प्रति कृतज्ञ क्यों नहीं होना चाहिए मिस्टर मीडिया?

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

सुप्रीम कोर्ट की चिंता संवैधानिक है मिस्टर मीडिया!

इस हकीकत को समझिए, फर्जी खबरों से मुकाबला करना आसान हो जाएगा मिस्टर मीडिया!

मुश्किल दौर में है अफगानी मीडिया, भारतीय पत्रकारों को आगे आना होगा मिस्टर मीडिया! 

टकराव की स्थिति में पत्रकारिता और सरकार दोनों को नुकसान होगा मिस्टर मीडिया!

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खुशदीप सहगल का यूट्यूबर्स से बड़ा सवाल, इस तरह कब तक व्युअरशिप की रोटियां सेंकोगे?

यूट्यूबर्स की दुनिया भी गजब है। व्यूज पाने की ललक यहां भी सनक की हद तक है। कुछ वैसी ही जैसे कि मेनस्ट्रीम मीडिया में टीआरपी और डिजिटल में हिट्स या विजिट्स के लिए होती है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Monday, 27 September, 2021
Last Modified:
Monday, 27 September, 2021
Khushdeep Sehgal

यूट्यूबर्स की दुनिया भी गजब है। व्यूज पाने की ललक यहां भी सनक की हद तक है। कुछ वैसी ही जैसे कि मेनस्ट्रीम मीडिया में टीआरपी  और डिजिटल में हिट्स या विजिट्स के लिए होती है। यहां सेल्फ रेगुलेशन जैसी कोई व्यवस्था नहीं, इसलिए खुला खेल फर्रूखाबादी है। किसी का जब चाहे मानमर्दन कर दो, किसी को जो मर्जी कह दो, कोई रोकने वाला नहीं। इस तरह से व्यूज बड़ी संख्या में आ जाएं तो फिर तो खुद को तोप समझना लाजमी है। फिर दूसरों के कंधे पर बंदूक चलाने का ये शौक दुस्साहस की सीमा भी पार कर जाता है।

दरअसल देश में पॉलिटिकल डिवाइड इतना बढ़ गया है, इतने खांचे बंट गए हैं कि हर एक ने अपना कम्फर्ट जोन ढूंढ लिया है। राजनीति के इस तरफ या उस तरफ। दोनों तरफ देश के करोड़ों नागरिक भी हैं। नागरिक क्यों देश के अधिकांश पत्रकार भी खेमाबंद हैं। ये खेमाबंदी इतनी स्पष्ट है कि ये खेमे दिन के 24 घंटे दूसरे खेमे के कपड़े उतारने में लगे हैं। यूट्यूबर्स भी इससे अलग नहीं।

देश में एक और चलन दिख रहा है। अब नेताओं की जगह चर्चित पत्रकारों को अधिक निशाना बनाया जा रहा है। ऐसा माहौल बना है तो पत्रकारों के साथ उनके संस्थानों को अन्तर्मन में झांकना चाहिए कि ऐसा क्यों हुआ?

लेकिन साथ ही मेरा कुकुरमुत्तों की तरह उग आए यूट्यूबर्स से पूछना है कि वो किस मुंह से अपने चौबारों पर चढ़ कर चिल्लाते रहते हैं कि फलाने या फलानी एंकर की फुलटू बेइज्जती हो गई। माफ कीजिए इन यूट्यूबर्स के लिए उनकी दुकानें चलने के लिए वही लोग मसाला हैं, जिनके पीछे ये दिन-रात पड़े रहते हैं। ये पत्रकार मान लीजिए किसी राजनीतिक विचारधारा विशेष के हैं, फिर भी उनका नाम जो बना है उसमें भी उनकी मेहनत का भी बड़ा हाथ है। ऐसे ही नहीं वो इस मुकाम तक पहुंच गए।

ये निशाना साधने वाले यूट्यूबर्स खुद भी गिरेबान में झांके, उन्होंने खुद कौन से तीर मारे हैं जो उन्हें दूसरों का मान मर्दन का अधिकार मिल गया। इन बड़े नामों के इस्तेमाल से कब तक व्युअरशिप की रोटियां सेंकोगे। दम है तो इनके नाम का इस्तेमाल किए बिना अच्छे, सार्थक, सकारात्मक कंटेट पर बड़ी इमारत बना कर दिखाइए।

काफी हद तक यूट्यूब चलाने वाले कुछ चर्चित पत्रकार भी ऐसी स्थिति बनने के लिए कैटेलिस्ट्स का काम कर रहे हैं। वो अपनी तरह की ब्रैंडेड पत्रकारिता को खाद पानी देने वाला मसाला ढूंढकर उसे ही परोसते रहते हैं। स्क्रीन पर हर वक्त दिखते रहने के शौक के साथ वही चंद नेताओं के साथ सियासी जुगाली, ग्राउंड रिपोर्टिंग के नाम मनमुताबिक पॉकेट्स में जाकर अपने एजेंडे को सूट करने वाली लोगों की बातचीत...इसके अलावा क्या।

इसकी एक बड़ी वजह ये भी है कि देश का हर वक्त चुनाव मोड में रहना...सत्तापक्ष अपनी दिनरात स्तुति करने वाले पत्रकारों से बहुत खुश रहता हो लेकिन वो जान ले कि स्वस्थ आलोचना को दरकिनार करना, जिस डाल पर बैठे हो उसी को काटना होता है।

ऐसे में निष्पक्ष, सच्चा कंटेट सामने लाना समुद्र से मोती निकालने समान हो गया है। राजनीति से इतर देखा जाए तो दुनिया में और भी बहुत कुछ है। देश की आबादी जल्दी ही डेढ़ अरब के आंकड़े को छूने वाली है तो यकीनन इतनी ही उनसे जुड़ी कहानियां भी होंगी लेकिन उन्हें सामने लाने में मेहनत कौन करे। इसके मुकाबले राजनीतिक बकर-बकर में कोई लागत नहीं।

कंटेट कैसा मिले, इसके लिए व्यूअर्स खुद भी जिम्मेदार हैं। वो हर वक्त राजनीतिक नकारात्मकता में ही डूबे रहना चाहते हैं या इसके बाहर की बहुत बड़ी सकारात्मक दुनिया में भी झांकना चाहते हैं। वो ये भी देखें कि जिन यूट्यूब चैनल्स पर वो जाते हैं, सब्सक्राइब करते हैं, उनके कर्ताधर्ताओं का पिछला ट्रैक रिकॉर्ड क्या है, सिर्फ़ भड़काऊ हैडिंग, फोटो से व्यूज लेने वालों को कितना बढ़ावा देना है ये आपके ही हाथ में है...

यूनिक कंटेंट की साख रातोंरात नहीं बन जाती, उसके लिए बार बार लगातार परफॉर्म करके दिखाना होगा, बिना भड़काए, बिना किसी बड़े नाम वाले के कंधे पर बंदूक चलाए। ‘देशनामा’ की कोशिश इसी दिशा में बढ़ने की है, देखना है कि ये छोटा सा कदम कितनी दूर तक जा पाता है।

(वरिष्ठ पत्रकार खुशदीप सहगल की फेसबुक वॉल से साभार)

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अब सभी राजनीतिक दलों में यह 'महामारी' फैल चुकी है: राजेश बादल

भारतीय लोकतंत्र एक चिकने घड़े में तब्दील होता जा रहा है। संवैधानिक व्यवस्थाओं और बहुमत से नेता के चुनाव की परंपरा हाशिये पर जाती दिखाई दे रही है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 22 September, 2021
Last Modified:
Wednesday, 22 September, 2021
rajeshbadal545

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

चुनाव से पहले मुख्यमंत्री बदलना ठीक नहीं

भारतीय लोकतंत्र एक चिकने घड़े में तब्दील होता जा रहा है। संवैधानिक व्यवस्थाओं और बहुमत से नेता के चुनाव की परंपरा हाशिये पर जाती दिखाई दे रही है। सभी राजनीतिक दलों में यह महामारी फैल चुकी है।

जिला पंचायतों, प्रदेश विधानसभाओं और संसद के लिए नेता चुनने की प्रक्रिया में प्रदूषण घुलता हुआ देखना विवशता है। हजार साल तक राजशाही का दंश झेल चुके देश में सामंती चरित्र एक बार फिर दाखिल हो चुका है। अब नेता पद का चुनाव निर्वाचित जनप्रतिनिधि नहीं करते और न उन्हें वापस घर बैठाने की प्रक्रिया में कोई नुमाइंदा शरीक होता है।

सारा उपक्र म सिर्फ चुनाव जीतने के लिए किया जाता है। इस उद्देश्य से कुछ राज्यों में चुनाव के पहले विधायक दल नेता को आलाकमान के इशारे पर हटाने का सिलसिला इन दिनों चल रहा है। यह अभी जारी है। मतदाता अपने साथ इस ठगी की शिकायत आखिर किस मंच पर करे?

कर्नाटक, उत्तराखंड, गुजरात और पंजाब में मुख्यमंत्रियों को जिस तरीके से हटाया गया, उसकी यकीनन कोई तारीफ नहीं करेगा। इन प्रदेशों के उदाहरण साफ करते हैं कि नेता बदलने के खेल में दोनों शिखर पार्टियां शामिल हैं। जिन दो बड़े दलों को यह देश लोकतांत्रिक कमान सौंपता रहा है, उनमें इस प्रवृत्ति का पनपना गंभीर संकेत देता है।

उत्तराखंड को तो इन दलों ने शर्मनाक प्रयोगशाला बना दिया है। वहां मुख्यमंत्री जाते ही अपने विदाई संदेश की प्रतीक्षा करने लगता है। गंभीर बात इसलिए है कि चार साढ़े चार साल तक एक मुख्यमंत्री सरकार चलाता है, कार्यकाल में वह पार्टी घोषणापत्र के आधार पर मुद्दों का क्रियान्वयन करता है, साढ़े चार बरस वह फसल बोता है, सिंचाई करता है तो उत्पादन क्यों नहीं देखना चाहेगा।

अर्थात मुख्यमंत्री अपने काम का मतदाताओं की नजर में मूल्यांकन भी देखना चाहता है। इसमें कुछ भी अनुचित नहीं है। यह कैसे संभव है कि वोटर केवल चेहरा बदल जाने से उस पार्टी को दोबारा वोट दे दे। यदि चार -पांच साल सरकार ने खराब काम किया हो तो परिणाम बुरा ही मिलेगा। यदि येदियुरप्पा या कैप्टन अमरिंदर सिंह पांच से दस साल पार्टी की पतवार थाम सकते हैं तो चुनाव-वैतरणी क्यों पार नहीं लगा सकते?

ताबड़तोड़ हटाने से उनके समर्थकों की उदासीनता अथवा भितरघात का नया मोर्चा खुल जाता है- यह बात आलाकमान को ध्यान में रखनी चाहिए।

वैसे भी भारतीय संवैधानिक ढांचा किसी मुख्यमंत्री को हटाने की वैधानिक प्रक्रिया बताता है। जब मुख्यमंत्री विधायक दल का विश्वास खो दे तो पहले विधायक दल ही नया नेता चुनता है। कुछ दशकों से इस प्रक्रिया के बीच में दल का प्रदेश प्रभारी और आलाकमान का ऑब्जर्वर यानी दूत भी कूद पड़ा है। अब तो वे सीधे बंद लिफाफा लेकर आते हैं और फरमान सुनाते हैं।

कभी-कभी वे सीधे ही राज्यपाल से मिलकर विधायक दल के निर्णय की जानकारी दे देते हैं। यह अनुचित है और स्वस्थ संसदीय परंपरा का हिस्सा नहीं है। यह तो मुख्यमंत्री का अपना अनुशासन है कि वह शिखर नेतृत्व का संदेश पाकर इस्तीफा पेश कर देता है। अन्यथा यदि उसके पास बहुमत हो और वह कोर्ट का दरवाजा खटखटाए तो पार्टियों के शीर्ष नेतृत्व को लेने के देने पड़ जाएं।

इसके अलावा एक नुकसान और है। आलाकमान ताजे चेहरे के नाम पर अपेक्षाकृत कनिष्ठ और प्रशासनिक अनुभव नहीं रखने वाले व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाता है। जो व्यक्ति पहली बार विधायक चुना गया हो, उसे तो संसदीय प्रक्रिया के बारीक पेंचों की समझ ही नहीं होती। उसके सामने चुनाव होते हैं और वह वोटर को लुभाने के लिए अंधाधुंध असंभव सी घोषणाएं करने लगता है।

इनमें से अधिकतर कभी पूरी नहीं होतीं। वह अफसरशाही पर लगाम भी नहीं लगा पाता और न ही अपने हिसाब से उनका मूल्यांकन कर पाता है। नए मुख्यमंत्री को पद संभाले चार-छह महीने भी नहीं बीतते कि चुनाव तारीखों का ऐलान हो जाता है। आचार संहिता लग जाती है। यानी बबुआ मुख्यमंत्री के लिए कुछ भी करने को नहीं रहता। वोट तो पुराने मुख्यमंत्री के काम या सरकार की छवि पर ही मिलता है।

सियासी अतीत को देखें तो ज्यादातर मामलों में चुनाव पूर्व नेता बदलने का कोई लाभ किसी पार्टी को नहीं मिला है। शरद पवार और सुषमा स्वराज जैसे दिग्गज भी चुनाव से पहले भेजे जाने पर पार्टी को जिता नहीं सके थे। अलबत्ता सुशील कुमार शिंदे और एकाध अन्य उदाहरण इसका अपवाद हैं। 

इसी तरह मुख्यमंत्री के मनोनयन का ढंग भी लोकतांत्रिक नहीं रहा। उसके लिए आवश्यक रस्मों का पालन होता है, लेकिन वास्तव में नए विधायकों को नेता चुनने की आजादी नहीं होती। अब तो इसे औपचारिक शक्ल भी दे दी गई है। विधायक दल प्रस्ताव पास करता है। उसमें कहा जाता है कि पार्टी का शिखर नेतृत्व या अध्यक्ष जिसे चुनेगा, वह विधायक दल को मंजूर होगा।

राजशाही में राजा ही तो सेनापतियों का चुनाव करता था। यह भी उसी तरह की कार्रवाई है। यह ठीक नहीं है। कोई अपने मत का अधिकार किसी दूसरे को कैसे दे सकता है? नेता चुनने का हक भारत के जन प्रतिनिधित्व कानून ने उसे दिया है। वह किसी अन्य को स्थानांतरित नहीं किया जा सकता। इससे स्वस्थ्य लोकतांत्रिक परंपरा की हत्या होती है।

मान्यता है कि सियासी तीर अक्सर उलट कर लगते हैं। मुझे याद है कि 1980 में अर्जुन सिंह के साथ बहुमत नहीं था। वे कमलनाथ और संजय गांधी की मेहरबानी से मुख्यमंत्री बने थे, जबकि बहुमत शिवभानु सिंह सोलंकी के पास था और जब 1985 में अर्जुन सिंह के नेतृत्व में पार्टी दोबारा जीत कर आई तो शपथ से पहले ही उन्हें पंजाब का राज्यपाल बना दिया गया। अल्पमत के मोतीलाल वोरा ने मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली थी।

बड़ी पार्टियों पर यह जिम्मेदारी है कि वे संसदीय प्रक्रियाओं की हिफाजत और सम्मान करें। क्षेत्रीय दल तो पहले ही सामंती आचरण कर रहे हैं, उनसे क्या अपेक्षा करें!

(साभार: लोकमत)

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'अजीब भयावह दौर है, दशकों के साथी ईशमधु तलवार भी अपनी अनंत यात्रा पर चले गए'

अजीब सा भयावह दौर है। अब हमारी पीढ़ी का नंबर लग गया। हम लोग इतने बूढ़े हो गए या फिर नियति हमारे प्रति ज्यादा ही क्रूर हो गई।

राजेश बादल by
Published - Friday, 17 September, 2021
Last Modified:
Friday, 17 September, 2021
ishmadhu5454

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

अजीब सा भयावह दौर है। अब हमारी पीढ़ी का नंबर लग गया। हम लोग इतने बूढ़े हो गए या फिर नियति हमारे प्रति ज्यादा ही क्रूर हो गई। करीब तीन दशकों के साथी और दोस्त भाई ईशमधु तलवार भी अपनी अनंत यात्रा पर रात को चले गए। दो दिन पहले ही बात हुई थी। नई किताब के बारे में देर तक बतियाते रहे। मैंने हंसते हुए कहा था, आपकी 'रिनाला खुर्द' ने बहुत रुलाया था। इस किताब में खिलखिलाने का अवसर देना। इस बात पर ठहाका लगाकर हंस दिए थे। क्या जानता था कि हंसते-हंसते वे फिर एक बार रुलाने का इंतजाम कर चुके हैं।

कैसे हमारे संपर्क के इकतीस बरस बीते, पता ही नहीं चला। हम सब उत्साह से भरे 1985 के अगस्त महीने में राजेंद्र माथुर के निर्देश पर ‘नवभारत टाइम्स’ का जयपुर संस्करण शुरू करने के लिए एकत्रित हुए थे। मैं वरिष्ठ उपसंपादक था और वे हमारे मुख्य संवाददाता। आम तौर पर हर अखबार में डेस्क और रिपोर्टिंग टीम में तलवारें तनी रहती थीं, लेकिन तलवार जी के साथ कभी ऐसा नहीं हुआ। हमारे सारे उपसंपादक तलवार जी की कॉपी संपादित करने के लिए लालायित रहते थे। क्या मोतियों जैसे शब्द खबरों के बीच चुनते थे और क्या ही शानदार हैंडराइटिंग थी। संपादन के लिए अपना लाल स्याही का निब वाला पेन चलाते तो लगता कि तलवार जी की कॉपी गंदी कर दी। यहां तक कि शीर्षक तक लिखने की इच्छा नहीं होती थी। कभी कुछ गड़बड़ भी हो जाए तो संवाद मुस्कुराते हुए ही होता था। कभी गुस्सा, तनाव या चीखना चिल्लाना होता ही नहीं था। कभी-कभी उनके किसी रिपोर्टर की कॉपी ऐसी होती कि उसे दोबारा लिखने की जरूरत होती तो डेस्क के लोग बचने की कोशिश करते। फिर आखिर तलवारजी पर ही बात पहुंचती। चाहे रात के कितने ही बज जाएं, वे अपनी टेबल से तभी उठते, जब वे दोबारा लिख कर हमें दे देते। जब घर जाते तो टेबल एकदम साफ रहती थी। एक एक विज्ञप्ति पर उनकी नजर रहती और उसमें से खबर निकालने की अद्भुत कला उन्हें आती थी। जयपुर छोड़ने के बाद चाहे भोपाल रहा, दिल्ली रहा या कुछ समय के लिए अमेरिका रहा, उनसे संपर्क वैसा ही गर्मजोशी भरा था।

दो तीन बरस पहले मित्र हरीश पाठक का आंचलिक पत्रकारिता पर एक विस्तृत शोध प्रबंध आया था। इस यज्ञ में तलवार जी और मैंने भी अपनी आहुतियां डाली थीं। चूंकि यह ग्रन्थ राजेंद्र माथुर फेलोशिप के तहत लिखा गया था, इसलिए हम सब जयपुर में एक कार्यक्रम करना चाहते थे। तलवार जी ने इसकी जिम्मेदारी ली और तय किया कि उनके जन्मदिन 7 अगस्त पर कार्यक्रम करेंगे और इसमें राजेंद्र माथुर पर केंद्रित मेरी फिल्म भी दिखाएंगे। कार्यक्रम हुआ और बेहद गरिमामय रहा। रात हमने दावत के दरम्यान संगीतकार दान सिंह के सुरों से सजा गीत- वो तेरे प्यार का गम... सुना। कुछ हम लोगों ने भी सुनाया। लेकिन उस शाम तलवार जी महफिल की शान थे। संगीतकार दान सिंह तो गुमनामी में खो ही गए थे, लेकिन तलवार जी ने उन्हें पुनःप्रतिष्ठा दिलाई। उनका ‘रिनाला खुर्द’ उपन्यास जिसने भी पढ़ा, उसके आंसू निश्चित ही बहे। चाई जी हमेशा तलवार जी के दिल में धड़कती रहीं।

जयपुर के साहित्य उत्सव को उन्होंने इतना ऊंचा शिखर प्रदान किया कि अन्य सारे उत्सव बौने हो गए। तलवार जी के नाम पर कोई आने से न नहीं कर सकता था। पिछले बरस कोरोना के कारण यह उत्सव ऑनलाइन हुआ लेकिन इसने अपनी अलग छाप छोड़ी। तलवार जी! आपके जाने से हम लोग विकलांगों की श्रेणी में आ गए हैं। क्यू में तो लगे थे, मगर नंबर इतनी तेजी के साथ आगे आ रहा है- इसका अहसास नहीं था। राजकुमार केसवानी, कमल दीक्षित, शिव पटेरिया, जीवन साहू, महेंद्र गगन और भी अनेक मित्र बीते दिनों साथ छोड़ गए। वाकई कुछ खालीपन सा आता जा रहा है-

अब नजा का आलम है मुझ पर, तुम अपनी मोहब्बत वापस लो

जब कश्ती डूबने लगती है, तो बोझ उतारा करते हैं   

जाते जाते एक बार गले मिल लेते तो तसल्ली हो जाती। आपने तो चुपचाप अपने अध्ययन कक्ष में बैठे बैठे विदाई ले ली। सब कुछ आपने ठीक किया, पर यह ठीक नहीं किया। अलविदा  दोस्त!

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सुप्रीम कोर्ट की चिंता संवैधानिक है मिस्टर मीडिया!

पेगासस मामले पर सर्वोच्च न्यायालय की उलझन समझ में आने वाली है। हुक़ूमते हिन्द ने अपना उत्तर देने से इनकार कर दिया है। सॉलिसिटर जनरल का एक तर्क किसी के पल्ले नहीं पड़ा।

राजेश बादल by
Published - Wednesday, 15 September, 2021
Last Modified:
Wednesday, 15 September, 2021
pegasus454544

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

पेगासस मामले पर सर्वोच्च न्यायालय की उलझन समझ में आने वाली है। हुक़ूमते हिन्द ने अपना उत्तर देने से इनकार कर दिया है। सॉलिसिटर जनरल का एक तर्क किसी के पल्ले नहीं पड़ा। उन्होंने कहा कि हमारे पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है। आम नागरिकों की खुफ़ियागिरी पर जनता में चर्चा नहीं होनी चाहिए। अब सॉलिसिटर जनरल साहब को कोई कैसे समझाए कि यह समूचा  देश उत्तर चाहता है।

राष्ट्रीय सुरक्षा के बारे में तो भारतीय मतदाता भी नहीं जानना चाहते। जब एक बार किसी दल को बहुमत से सरकार बनाने का मौक़ा दिया है तो मुल्क़ की हिफाज़त करना भी उसी निर्वाचित सरकार की ज़िम्मेदारी है। एक नागरिक नहीं चाहता कि उनकी हुक़ूमत बताए कि आतंकवादियों से वह कैसे निबट रही है अथवा चीन और पाकिस्तान के षड्यंत्रों का मुक़ाबला कैसे कर रही है? वह तो सिर्फ़ दो तीन जानकारियां चाहता है कि परदेसी जासूसी सॉफ्टवेयर ख़रीदा गया है या नहीं। अगर ख़रीदा गया है तो किस मंत्रालय ने, कितने पैसे में और किन शर्तों पर खरीदा है। यह जानना उसका संविधान प्रदत्त अधिकार है। संसद में इसीलिए पाई पाई का हिसाब रखा जाता है। इसके अलावा संविधान में आम आदमी को अनुच्छेद-21 के तहत दिए गए निजता के अधिकार का उल्लंघन तो नहीं किया गया है? 

अगर इस अदृश्य जासूसी तकनीक से एक पत्रकार, एक राजनेता, एक न्यायाधीश, विपक्षी नेता और सामाजिक कार्यकर्त्ता के घर परिवार, कारोबार और रिश्तेदार की बातें सरकार तक पहुंच रही हैं तो ऐसा क्यों होना चाहिए? यदि इन श्रेणियों में से किसी एक नागरिक की भी खुफ़ियागिरी हुई है तो सरकार को बताना चाहिए कि वह राष्ट्रद्रोही है और उसके सबूत देश की आला अदालत के सामने रख देना चाहिए। खुले तौर पर नहीं रखना चाहते तो बंद लिफ़ाफ़े में अदालत को सौंप दीजिए। फिर माननीय न्यायालय को तय करने दीजिए कि वाकई उस लिफ़ाफ़े में बंद जानकारी को उजागर करना हिन्दुस्तान के हित में नहीं है तो फिर यह देश कभी भी हुकूमत से कोई जवाब तलब नहीं करेगा। अगर अदालत पाती है कि उसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है तो उसे सामने लाना राष्ट्रहित में बेहद ज़रूरी है।

भारतीय मतदाता ने अपनी गाढ़ी कमाई का पैसा टैक्स के रूप में इसलिए सरकारी ख़ज़ाने में जमा नहीं किया है कि उसका दुरूपयोग उसी के विरोध में हो। आख़िर किस देश में ऐसा हो सकता है। कम से कम लोकतंत्र और क़ायदे-क़ानून से चलने वाले किसी राष्ट्र में तो ऐसा नहीं हो सकता।

एक बार कल्पना करिए कि उस अंतर्ध्यान ख़ुफ़िया तकनीक से सरकार अपने किसी एक सर्वर में ये जानकारियां एकत्रित कर ले और वहां से यह लीक हो जाए तो फिर क्या सरकार के हाथों के तोते नहीं उड़ जाएंगे। इसके अलावा इस बात की क्या गारंटी है कि इस सर्वर में मौजूद सूचनाओं की कोई गुप्त कॉपी किसी अन्य देश में नहीं हो रही होगी। पहले भी संसार में ऐसे कई ख़ुलासे हो चुके हैं। अगर उस सूचना भण्डार से कोई जानकारी लीक हो गई तो फिर केंद्र सरकार के हाथ में कुछ नहीं रहेगा। वह अपने ही मतदाताओं के सामने कठघरे में खड़ी हो जाएगी। यही नहीं, इज़रायल समेत संसार के क़रीब एक दर्ज़न देश इसकी औपचारिक जांच कर रहे हैं। यदि उस वैधानिक जांच के दरम्यान किसी चरण में उस देश के अलावा भारत की सूचनाएं भी छप गईं तो कौन मुंह दिखाने के लायक रहेगा? भारत सरकार को यह बात समझ लेनी चाहिए।

दरअसल सुप्रीम कोर्ट की राय में भारत सरकार के लिए एक बेहद बारीक़ छिपा हुआ सन्देश है। अदालत अपनी परिधि में इससे अधिक कुछ नहीं कह सकती। यदि कुपित होकर शिखर न्यायालय ने कोई निर्णय दिया तो फिर कुछ नहीं बचेगा। अभी भी वक़्त है। हुक़ूमत को समय रहते समझ लेना चाहिए। अन्यथा इतिहास बड़े से बड़े शासक को माफ़ नहीं करता मिस्टर मीडिया !

हैं कहां हिटलर, हलाकू, ज़ार या चंगेज़ ख़ां ,मिट गए सब, क़ौम की औक़ात को मत छेड़िए

ऐसे नाज़ुक वक़्त में हालात को मत छेड़िए, अपनी कुर्सी के लिए जज़्बात को मत छेड़िए    

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

इस हकीकत को समझिए, फर्जी खबरों से मुकाबला करना आसान हो जाएगा मिस्टर मीडिया!

मुश्किल दौर में है अफगानी मीडिया, भारतीय पत्रकारों को आगे आना होगा मिस्टर मीडिया! 

टकराव की स्थिति में पत्रकारिता और सरकार दोनों को नुकसान होगा मिस्टर मीडिया!

मिस्टर मीडिया: पत्रकारिता को कुचलने के नतीजे भी घातक होते हैं!

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'हम नए जमाने में हैं, जहां शिक्षा का ही मूल्य, दीक्षा का नहीं'

आज हमारे पड़ोसी शर्माजी इस बात से प्रसन्न थे कि उनका बेटा शिक्षित हो गया। शिक्षित अर्थात उसने बीई की डिग्री हासिल कर ली।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Sunday, 05 September, 2021
Last Modified:
Sunday, 05 September, 2021
Education5457

मनोज कुमार, वरिष्ठ पत्रकार ।।

आज हमारे पड़ोसी शर्माजी इस बात से प्रसन्न थे कि उनका बेटा शिक्षित हो गया। शिक्षित अर्थात उसने बीई की डिग्री हासिल कर ली। बेटे के स्नातक हो जाने की खुशी उनके चेहरे पर टपक रही थी। यह अस्वाभाविक भी नहीं है। एक डिग्री हासिल करने के लिए कई किस्म के जतन करने पड़ते हैं। अपनी जरूरतों और खुशी को आले में रखकर बच्चों की शिक्षा पर खर्च किया जाता है और बच्चा जब सफलतापूर्वक डिग्री हासिल कर ले तो गर्व से सीना तन जाता है। उनके जाने के बाद एक पुराना सवाल भी मेरे सामने आ खड़ा हुआ कि क्या डिग्री हासिल कर लेना ही शिक्षा है? क्या डिग्री के बूते एक ठीकठाक नौकरी हासिल कर लेना ही शिक्षा है? मन के किसी कोने से आवाज आयी ये हो सकता है लेकिन यह पूरा नहीं है। फिर मैं ये सोचने लगा कि बोलचाल में हम शिक्षा-दीक्षा की बात करते हैं तो ये शिक्षा-दीक्षा क्या है? शिक्षा के साथ दीक्षा शब्द महज औपचारिकता के लिए जुड़ा हुआ है या इसका कोई अर्थ और भी है। अब यह सवाल शर्माजी के बेटे की डिग्री से मेरे लिए बड़ा हो गया। मैं शिक्षा-दीक्षा के गूढ़ अर्थ को समझने के लिए पहले स्वयं को तैयार करने लगा।

एक पत्रकार होने के नाते ‘क्यों’ पहले मन में आता है। इस ‘क्यों’ को आधार बनाकर जब शिक्षा-दीक्षा का अर्थ तलाशने लगा तो पहला शिक्षा-दीक्षा का संबंध विच्छेद किया। शिक्षा अर्थात अक्षर ज्ञान। वह सबकुछ जो लिखा हो उसे हम पढ़ सकें। एक शिक्षित मनुष्य के संदर्भ में हम यही समझते हैं। शिक्षा को एक तंत्र चलाता है इसलिए शिक्षा नि:शुल्क नहीं होती है। विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय तक की शिक्षा हासिल करने के लिए हमें उसका मूल्य चुकाना होता है। इस मूल्य को तंत्र ने शब्द दिया शिक्षण शुल्क। यानि आप शिक्षित हो रहे हैं, डिग्री हासिल कर रहे हैं और समाज में आपकी पहचान इस डिग्री के बाद अलहदा हो जाएगी। आप डॉक्टर, इंजीनियर, पत्रकार और शिक्षा जैसे अनेक पदों से सुशोभित होते हैं। चूंकि आपकी शिक्षा मूल्य चुकाने के एवज में हुई है तो आपकी प्राथमिकता भी होगी कि आप चुकाये गए मूल्य की वापसी चाहें तो आप अपनी डिग्री के अनुरूप नौकरी की तलाश करेंगे। एक अच्छी नौकरी की प्राप्ति आपकी डिग्री को ना केवल सार्थक करेगी बल्कि वह दूसरों को प्रेरणा देगी कि आप भी शिक्षित हों। यहां एक बात मेरे समझ में यह आयी कि शिक्षित होने का अर्थ रोजगार पाना मात्र है।

अब दूसरा शब्द दीक्षा है। दीक्षा शब्द आपको उस काल का स्मरण कराता है जब डिग्री का कोई चलन नहीं था। शिक्षित होने की कोई शर्त या बाध्यता नहीं थी। दीक्षा के उपरांत नौकरी की कोई शर्त नहीं थी। दीक्षित करने वाले गुरु कहलाते थे। दीक्षा भी नि:शुल्क नहीं होती थी लेकिन दीक्षा का कोई बंधा हुआ शुल्क नहीं हुआ करता था। यह गुरु पर निर्भर करता था कि दीक्षित शिष्य से वह क्या मांगे अथवा नहीं मांगे या भविष्य में दीक्षित शिष्य के अपने कार्यों में निपुण होने के बाद वह पूरे जीवन में कभी भी, कुछ भी मांग सकता था। यह दीक्षा राशि से नहीं, भाव से बंधा हुआ था। दीक्षा का अर्थ विद्यार्थी को संस्कारित करना था।

विद्यालय-विश्वविद्यालय के स्थान पर गुरुकुल हुआ करते थे और यहां राजा और रंक दोनों की संतान समान रूप से दीक्षित किये जाते थे। दीक्षा के उपरांत रोजगार तलाश करने के स्थान पर विद्यार्थियों को स्वरोजगार के संस्कार दिये जाते थे। जंगल से लकड़ी काटकर लाना, भोजन स्वयं पकाना, स्वच्छता रखना और ऐसे अनेक कार्य करना होता था। यह शिक्षा नहीं, संस्कार देना होता था। दीक्षा अवधि पूर्ण होने के पश्चात उनकी योग्यता के रूप में वे अपने पारम्परिक कार्य में कुशलतापूर्वक जुट जाते थे। अर्थात दीक्षा का अर्थ विद्यार्थियों में संस्कार के बीज बोना, उन्हें संवेदनशील और जागरूक बनाना, संवाद की कला सीखाना और अपने गुणों के साथ विनम्रता सीखाना।

इस तरह हम शिक्षा और दीक्षा के भेद को जान लेते हैं। यह कहा जा सकता है कि हम नए जमाने में हैं और यहां शिक्षा का ही मूल्य है। निश्चित रूप से यह सच हो सकता है लेकिन एक सच यह है कि हम शिक्षित हो रहे हैं, डिग्रीधारी बन रहे हैं लेकिन संस्कार और संवेदनशीलता विलोपित हो रही है। हम शिक्षित हैं लेकिन जागरूक नहीं। हम डॉक्टर हैं, इंजीनियर हैं लेकिन समाज के प्रति जिम्मेदार नहीं। शिक्षक हैं लेकिन शिक्षा के प्रति हमारा अनुराग नहीं, पत्रकार हैं लेकिन निर्भिक नहीं। जिस भी कार्य का आप मूल्य चुकायेंगे, वह एक उत्पाद हो जाएगा। शिक्षा आज एक उत्पाद है जो दूसरे उत्पाद से आपको जोड़ता है कि आप नौकरी प्राप्त कर लें। दीक्षा विलोपित हो चुकी है। शिक्षा और दीक्षा का जो अंर्तसंबंध था, वह भी हाशिये पर है। शायद यही कारण है कि समाज में नैतिक मूल्यों का हस हो रहा है क्योंकि हम सब एक उत्पाद बन गए हैं। शिक्षा और दीक्षा के परस्पर संबंध के संदर्भ में यह बात भी आपको हैरान करेगी कि राजनीति विज्ञान का विषय है लेकिन वह भी शिक्षा का एक प्रकल्प है लेकिन राजनेता बनने के लिए शायद अब तक कोई स्कूल नहीं बन पाया है। राजनेता बनने के लिए शिक्षित नहीं, दीक्षित होना पड़ता है। यह एक अलग विषय है कि राजनेता कितना नैतिक या अनैतिक है लेकिन उसकी दीक्षा पक्की होती है और एक अल्पशिक्षित या अपढ़ भी देश संभालने की क्षमता रखता है क्योंकि वह दीक्षित है। विरासत में उसे राजनीति का ककहरा पढ़ाया गया है। वह हजारों-लाखों की भीड़ को सम्मोहित करने की क्षमता रखता है और यह ककहरा किसी क्लास रूम में नहीं पढ़ाया जा सकता है। शिक्षक दिवस तो मनाते हैं हम लेकिन जिस दिन दीक्षा दिवस मनाएंगे, उस दिन इसकी सार्थकता सिद्ध हो पाएगी।

(लेखक शोध पत्रिका ‘समागम’ के संपादक हैं)

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'कोरोना काल में शिक्षकों की डिजिटल चुनौतियां'

भारत में ऑनलाइन शिक्षा की नई और चुनौतीभरी दुनिया में आवश्यकता, आविष्कार की या कहें कि नवाचार की जननी बन गई है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Sunday, 05 September, 2021
Last Modified:
Sunday, 05 September, 2021
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प्रो. संजय द्विवेदी, महानिदेशक, भारतीय जन संचार संस्थान ।।

साल 2020 में ये मार्च का महीना था। कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया को एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया था, जहां सबकी गति मानो थम सी गई थी। भागते-दौड़ते शहर रुक से गए थे। शिक्षा का क्षेत्र अपने सामने गंभीर संकट को देख रहा था। बच्चे हैरान थे, तो अभिभावक परेशान। लेकिन उस दौर में उत्तर प्रदेश के गोरखपुर शहर में स्थित दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय के 260 शिक्षकों ने जो काम कर दिखाया, वो आज पूरे देश के शिक्षकों के लिए एक मिसाल है। इन शिक्षकों ने दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय के पोर्टल पर लगभग 2,192 ऑडियो-वीडियो लेक्चर अपलोड किए। इनमें से प्रत्येक वीडियो को लगभग एक लाख से ज्यादा छात्रों ने देखा। इन शिक्षकों में से अधिकतर ने अपने अध्यापन काल में कभी भी इस तरह की तकनीक का प्रयोग नहीं किया था। डिजिटल शिक्षा की तरफ बढ़ते भारत के कदमों की ये पहली आहट थी।

भारत में ऑनलाइन शिक्षा की नई और चुनौतीभरी दुनिया में आवश्यकता, आविष्कार की या कहें कि नवाचार की जननी बन गई है। भारत में शिक्षा विशेषज्ञ लंबे अरसे से ब्लैकबोर्ड और चॉक की जगह स्क्रीन और कीबोर्ड को देने की सिफारिश करते रहे हैं, पर इस दिशा में हम कभी भी ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाए। लेकिन शायद हमें इस मामले में कोरोना को धन्यवाद देना चाहिए, क्योंकि कोविड ने भारत में डिजिटल शिक्षा को एक नया आयाम दिया है। आज जब सोशल डिस्टेंसिंग नया नियम बन गई है, कक्षाओं में शारीरिक निकटता ने जानलेवा खतरा पैदा कर दिया है, स्कूल और शिक्षक सभी ऑनलाइन पढ़ाई के इस दौर में शामिल होने की तैयारी कर रहे हैं, तो शिक्षा के शब्दकोष में डेस्क, कुर्सी और पेंसिल की जगह तेजी से कंप्यूटर और कनेक्टिविटी लेते जा रहे हैं।

ऑनलाइन शिक्षा का मतलब केवल डिलिविरी मॉडल बदलना नहीं है। टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके शिक्षक, अवधारणाओं को असरदार ढंग से समझाते हुए पढ़ाई को ज्यादा दिलचस्प बना सकते हैं। टेक्नोलॉजी और डेटा उन्हें फौरन फीडबैक देता है। वे विश्लेषण कर सकते हैं कि छात्र क्या चाहते हैं, उनके सीखने के पैटर्न क्या हैं और इस के आधार पर वे छात्रों की जरुरत के हिसाब से तैयारी कर सकते हैं। ‘अमेरिकन इंस्टिट्यूट फॉर रिसर्च’ की एक रिपोर्ट के अनुसार आमने-सामने पढ़ाई में छात्र जहां 8 से 10 फीसदी बातें याद रख पाते हैं, वहीं ई-लर्निंग ने याद रखने की दर बढ़ाकर 25 से 60 फीसद तक कर दी है। टेक्नोलॉजी छात्रों को सीखने के लिए प्रेरित करती है और शर्मिंदगी या संगी-साथियों के दबाव से मुक्त फीडबैक देती है। असल कक्षाओं की तरह छात्रों को यहां नोट्स नहीं लेने पड़ते और वे शिक्षक की बातों पर ज्यादा ध्यान दे पाते हैं।

ऑनलाइन शिक्षा की शुरुआत, उच्च शिक्षा का सकल नामांकन अनुपात बढ़ाने में भी भारत की मदद कर सकती है। सकल नामांकन अनुपात का अर्थ है कि कितने प्रतिशत विद्यार्थी कॉलेज और विश्वविद्यालय में एडमिशन लेते हैं। 18 से 23 वर्ष के छात्रों की अगर बात करें, तो इस स्तर पर भारत का नामांकन अनुपात लगभग 26 फीसदी है, जबकि अमेरिका में ये आंकड़ा 85 फीसदी से भी ज्यादा है। एक अनुमान के मुताबिक अगर हमें 35 फीसदी के नामांकन अनुपात तक भी पहुंचना है, तो अगले पांच सालों में हमें कॉलेज में 2.5 करोड़ छात्र बढ़ाने होंगे। और इसके लिए हर चौथे दिन एक नया विश्वविद्यालय और हर दूसरे दिन एक नया कॉलेज खोलना होगा। जो लगभग असंभव सा प्रतीत होता है, लेकिन ऑनलाइन क्लासेस से ये सब संभव है।

 हालांकि भारत में ऑनलाइन शिक्षा की अभी भी कुछ दिक्कते हैं। वैश्विक शिक्षा नेटवर्क ‘क्यूएस’ की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में इंटरनेट का बुनियादी ढांचा अभी ऑनलाइन लर्निंग को सक्षम बनाने के लिए तैयार नहीं है। ‘इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2020 के अंत तक भारत में इंटरनेट के लगभग 45 करोड़ मंथली एक्टिव यूजर्स थे और इंटरनेट उपयोगकर्ताओं के मामले में चीन के बाद भारत दूसरे स्थान पर था। शिक्षा पर वर्ष 2018 के ‘नेशनल सैंपल सर्वे’ की रिपोर्ट के अनुसार, 5 से 24 साल की उम्र के सदस्यों वाले सभी घरों में से केवल 8 प्रतिशत के पास ही कंप्यूटर और इंटरनेट कनेक्शन है। ‘नीति आयोग’ की वर्ष 2018 की रिपोर्ट भी ये कहती है कि भारत के 55,000 गांवों में मोबाइल नेटवर्क कवरेज नहीं है। हैदराबाद विश्वविद्यालय के शिक्षकों द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण में छात्रों के बीच डिजिटल पहुंच की विविधता पर भी प्रकाश डाला गया है। इस सर्वेक्षण में शामिल लगभग 2500 छात्रों में से 90 प्रतिशत छात्रों का कहना था कि उनके पास मोबाइल फोन तो है, लेकिन केवल 37 प्रतिशत ने ही कहा कि वे ऑनलाइन क्लासेज से जुड़ सकते हैं। शेष छात्रों का कहना था कि कनेक्टिविटी, डेटा कनेक्शन की लागत या बिजली की समस्याओं के कारण वे ऑनलाइन क्लासेज से नहीं जुड़ पा रहे थे। इसके अलावा ऑनलाइन परीक्षाएं भी बड़ा मुद्दा है। ‘कैंपस मीडिया प्लेटफॉर्म’ द्वारा 35 से अधिक कॉलेजों के 12,214 छात्रों के बीच किए गए एक ऑनलाइन सर्वेक्षण में पाया गया कि 85 प्रतिशत छात्र ऑनलाइन परीक्षाओं से खुश नहीं थे, 75 प्रतिशत के पास उन कक्षाओं में भाग लेने या परीक्षाओं के लिए बैठने के लिए लैपटॉप नहीं था, जबकि 79 प्रतिशत के पास हाईस्पीड वाला ब्रॉडबैंड नहीं था। लगभग 65 प्रतिशत ने कहा कि उनके पास अच्छा मोबाइल इंटरनेट कनेक्शन उपलब्ध नहीं है, जबकि लगभग 70 प्रतिशत ने दावा किया कि उनके घर ऑनलाइन परीक्षा देने के लिए अनुकूल नहीं थे। यानी इस डिजिटल खाई को पाटने के लिए अभी हमें और मेहनत करने की जरुरत है।

सरकार इस दिशा में कई प्रयास भी कर रही है। ‘नेशनल ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क’, जिसे अब ‘भारत नेटवर्क’ कहा जाता है, का उद्देश्य 40,000 करोड़ रुपए से अधिक की लागत के साथ देश की सभी 2,50,000 पंचायतों को आपस में जोड़ना है। भारत नेट के माध्यम से सरकार की, प्रत्येक ग्राम पंचायत में न्यूनतम 100 एमबीपीएस बैंडविड्थ प्रदान करने की योजना है, ताकि ऑनलाइन सेवाओं को ग्रामीण भारत के सभी लोगों तक पहुंचाया जा सके। इस नेटवर्क को स्थापित करने का कार्य पूरा हो जाने के बाद यह संरचना न केवल एक राष्ट्रीय संपत्ति बन जाएगी, बल्कि नवाचार और प्रौद्योगिकी विकास की दिशा में एक गेम चेंजर भी साबित होगी। इसके अलावा ‘नेशनल नॉलेज नेटवर्क’ अखिल भारतीय मल्टी-गीगाबिट नेटवर्क है, जो भारत में कम्युनिकेशन इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास और अनुसंधान को बढ़ावा देता है तथा अगली पीढ़ी के एप्लीकेशन्स और सेवाओं के निर्माण में सहायता देता है। नेशनल नॉलेज नेटवर्क का उद्देश्य ज्ञान बांटने और सहयोगात्मक अनुसंधान की सुविधा के लिये एक हाई स्पीड डाटा कम्युनिकेशन नेटवर्क के साथ उच्च शिक्षा और शोध के सभी संस्थानों को आपस में जोड़ना है।

नई शिक्षा नीति में भी ये कहा गया है कि डिजिटल खाई को पाटे बिना ऑनलाइन शिक्षा का लाभ उठा पाना संभव नहीं है। ऐसे में ये जरूरी है कि ऑनलाइन और डिजिटल शिक्षा के लिए तकनीक का उपयोग करते समय समानता के सरोकारों को नजरअंदाज ना किया जाए। शिक्षा नीति में तकनीक के समावेशी उपयोग यानि सबको साथ लेकर चलने की बात कही गई है, ताकि कोई भी इससे वंचित ना रहे। इसके अलावा शिक्षकों के प्रशिक्षण की बात भी नई शिक्षा नीति में कही गई है, क्योंकि ये जरूरी नहीं कि जो शिक्षक पारंपरिक क्लासरूम शिक्षण में अच्छा है, वो ऑनलाइन क्लास में भी उतना ही बेहतर कर सके। कोविड महामारी ने साफ कर दिया है कि ऑनलाइन कक्षाओं के लिए के लिए ‘टू-वे वीडियो’ और ‘टू-वे ऑडियो’ वाले इंटरफेस की सख्त जरूरत है।

कोरोना के पहले यह माना जाता था कि ऑनलाइन शिक्षा प्रणाली का हर स्तर पर सीमित तथा सहयोगात्मक उपयोग ही होगा, क्योंकि डिजिटल कक्षा और भौतिक कक्षा कभी भी समकक्ष नहीं हो सकते हैं। खेल कंप्यूटर पर भी खेले जाते हैं, मगर स्क्रीन कभी भी खेल के मैदान का विकल्प नहीं बन सकती है। खेल के मैदान पर जो संबंध बनते हैं और जो मानवीय मूल्य सीखे और अन्तर्निहित किये जाते हैं, वह मैदान की विशिष्टता है, उसका विकल्प अन्यत्र नहीं है। इसी तरह अध्यापक और विद्यार्थी का आमने-सामने का संपर्क जिस मानवीय संबंध को निर्मित करता है, वह आभासी व्यवस्था में संभव नहीं होगा। लेकिन डिजिटल शिक्षा ने सब कुछ बदल दिया है। डिजिटल साक्षरता के जरिए बच्चे अपने आसपास की दुनिया से बातचीत करने के लिए टेक्नोलॉजी का जिम्मेदारी से इस्तेमाल करना सीख सकते हैं। बच्चे की जिंदगी में अहम बदलाव लाने में डिजिटल शिक्षा से कई फायदे होते हैं, जैसे मोटर स्किल्स, निर्णय क्षमता, विजुअल लर्निंग, सांस्कृतिक जागरुकता, बेहतर शैक्षिक गुणवत्ता और नई चीजों की खोज। ये सब शिक्षा को इंटरेक्टिव बनाते हैं। सीखना बुनियादी तौर से एक सामाजिक गतिविधि है। इसीलिए बच्चों को ऑनलाइन नेटवर्क से जुड़ने से रोकने के बजाय, हमें उन्हें सुरक्षा के साथ सीखने के लिए प्रोत्सहित करना चाहिए। क्योंकि डिजिटल शिक्षा अब हमारे जीवन का एक अंग बन चुकी है।

शिक्षा में सूचना एवं संचार का प्रयोग, तकनीक के विकास एवं क्रांति का युग है। हर दिन नई-नई तकनीकों तथा माध्यमों का विकास किया जा रहा है। डिजिटल शिक्षा सभी वर्गों के लिये आज शिक्षा का एक आनंददायक साधन है। विशेष रूप से बच्चों के सीखने के लिये यह बहुत प्रभावी माध्यम साबित हो रहा है, क्योंकि ऑडियो-वीडियो तकनीक बच्चे के मस्तिष्क में संज्ञानात्मक तत्त्वों में वृद्धि करती है और इससे बच्चों में जागरुकता, विषय के प्रति रोचकता, उत्साह और मनोरंजन की भावना बनी रहती है। इस कारण बच्चे सामान्य की अपेक्षा अधिक तेज़ी से सीखते हैं। डिजिटल लर्निंग में शामिल इंफोटेंमेंट संयोजन, इसे हमारे जीवन एवं परिवेश के लिये और अधिक व्यावहारिक एवं स्वीकार्य बनाता है।

अंग्रेजी में एक कहावत है Technology knocks at the door of students यानी तकनीक अब छात्रों के घर पहुंच रही है। आधुनिक कम्प्यूटर आधारित तकनीक ने न केवल शैक्षिक प्रसार के स्वरूप को परिमार्जित किया है, बल्कि तकनीक के समावेशन की प्रक्रिया को जन्म देकर, शिक्षा के क्षेत्र को एक प्रामाणिक व सर्वसुलभ आयाम प्रदान किया है। तकनीक के विकास से शिक्षा के क्षेत्र में हम जिस क्रांति की कल्पना करते थे, आज कंप्यूटर आधारित तकनीक ने इस कल्पना को साकार करके शैक्षिक क्षेत्र में नये युग का सूत्रपात किया है। हमारे लिए यही मौका है कि हम शिक्षा को अनुभव-आधारित और अनुसंधान-उन्मुख बनाएं, बजाए इसके कि छात्रों को परीक्षा के लिए रट्टा लगाना सिखाएं। भारत के पूर्व राष्ट्रपति स्वर्गीय प्रणब मुखर्जी ने कहा था कि छात्रों को चरित्र निर्माण की शिक्षा भी दी जानी चाहिए। इसलिए यह ध्यान रखना आवश्यक है कि शिक्षा सिर्फ पढ़ाई-लिखाई और डिग्री भर न रह जाए, बल्कि मानवीय मूल्यों और संस्कारों से युक्त शिक्षा हमारे विद्यार्थियों को बेहतर इंसान भी बनाए।

भविष्य की शिक्षा में तकनीक का हस्तक्षेप बढ़ेगा और अनेक अनजाने तथा अनदेखे विषय अध्ययन के क्षेत्र में आएंगे। बावजूद इसके हमें परंपरागत एवं तकनीक आधारित शिक्षा पद्धति के बीच संतुलन बनाकर अपनी शिक्षा व्यवस्था को लगातार परिष्कृत करना होगा। वर्तमान सदी इतिहास की सबसे अनिश्चित तथा चुनौतीपूर्ण परिवर्तनों की सदी है। इसलिए भविष्य की अनजानी चुनौतियों को ध्यान में रखकर हमें स्वयं को तैयार करना होगा। आने वाले समय में केवल एक विषय के ज्ञान से हमारा भला नहीं हो सकता है, इसलिए हमें हर विषय की जानकारी को शिक्षा का अभिन्न अंग बनाना होगा। सरकार का पूरा प्रयास है कि वह इस दिशा में भविष्यवादी दृष्टि के अनुरूप सुधार तथा बदलाव करती रहेगी। ऐसा करके ही हम शिक्षा के भविष्य को सुरक्षित कर सकते हैं और भविष्य की शिक्षा को समय के अनुरूप बना सकते हैं।

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