'वह एक काला दिन था, जब टीवी पर खबरों का संसार रचने वाला शख्स सदा के लिए चला गया'

कोई कहता है कि सफल होने के लिए टैलेंट चाहिए, कोई कहता है कि पैसा चाहिए, कोई कहता है कि अच्छा दिमाग चाहिए।

Last Modified:
Sunday, 27 June, 2021
Nirmalendu


निर्मलेंदु, वरिष्ठ पत्रकार ।।

कोई कहता है कि सफल होने के लिए टैलेंट चाहिए, कोई कहता है कि पैसा चाहिए, कोई कहता है कि अच्छा दिमाग चाहिए। मैं कहता हूं कि सफल होने के लिए इनमें से कुछ भी नहीं है तो चलेगा, लेकिन नैतिकता और प्रामाणिकता जरूर चाहिए। सच्चा अभिगम चाहिए, काम के प्रति लगाव चाहिए, मेहनत करने का जज्बा चाहिए, लगन चाहिए, अपनी गलती को स्वीकार करने की हिम्मत चाहिए, जीवन में कृतज्ञता और भाव-पूर्णता का संगम चाहिए, कभी न थकने वाला जुनून चाहिए और खुद एवं ईश्वर पर विश्वास चाहिए। अगर इतनी सारी चीजें किसी के पास हैं तो सफलता उनके कदम जरूर चूमेगी। जी हां, ये सभी गुण एसपी सिंह में थे और शायद इसलिए उतनी कम उम्र में वह संपादक रूपी सिंहासन पर आसीन हो सके, जहां अधिकांश लोग पचास के बाद ही पहुंच पाते हैं। 'रविवार' पत्रिका और 'आजतक' चैनल को जन्म देने, उसे बनाने, सजाने और संवारने और दृश्य खबरों के संसार में नई क्रांति लाकर खबरों के संसार में नंबर वन बन बैठे एसपी ने 'आजतक' को ही अपना पूरा जीवन दान कर दिया।

एसपी। जी हां, एसपी यानी मेरे लिए सब कुछ। एसपी सिंह, एक ऐसा नाम जो पत्रकार से ऊपर एक इंसान थे। एक सरल इंसान, स्वाभाविक, मृदुभाषी, कम बोलने वाला हंसता मुस्कुराता हुआ एक चेहरा। छोटा हो या बड़ा, सबसे एक साधारण इंसान की तरह मिलते थे। आप यदि नौकरी मांगने उनके घर जाएंगे, तो आपको नहीं लगेगा कि वह इतने बड़े इंसान हैं। आपके साथ पल्थी मारकर बैठ जाएंगे। आपको माछ भात भी खिलाएंगे, आपके घर की माली हालत के बारे में भी जानेंगे और उसके बाद आपके रेज्यूमे पर गौर करेंगे। मेरे साथ भी कुछ-कुछ ऐसा ही हुआ था। पापा के कहने पर नौकरी मांगने गये थे उनके कोलकाता स्थित श्यामनगर वाले घर में। मेरे पापा के ऑफिस सहकर्मी साउ जी ने इंट्रोड्यूस करवाया था। घर पहुंचे, वो गेट पर ही मिल गये। पहले तो लुंगी पहन कर वे आये। चूंकि दोपहर का समय था तो मुझे माछ भात खिलाया और उसके बाद उन्होंने रेज्यूमे पर चर्चा की। नौकरी मिल गयी और उनके निधन के पहले तक मै उनके साथ छोटे भाई की तरह लगा रहा, लेकिन 27 जून 1997 के दिन वह हमसे बिछड़ गये।

दरअसल, जिस दिन एसपी सिंह का देहांत हुआ, मैं दिल्ली लेट पहुंचा। कोलकाता में 'अक्षर भारत' में काम करते हुए 13 दिनों तक मैं लगातार कोलकाता और दिल्ली का चक्कर काट रहा था। हुआ यह था कि 16 जून 1997 की सुबह-सुबह पत्रकार शैलेष जी का फोन आया। उन्होंने कहा कि एसपी बीमार हैं। फिर उन्होंने कहा कि निर्मल अभी किसी को कुछ मत बताना। बस, उनके घरवालों का फ्लाइट का टिकट कटवा दो। मैंने कल्याण मजुमदार को कहकर स्पेशल कोटे में बड़े भइया से लेकर सबका टिकट कटवाया, दोपहर की फ्लाइट थी। 27 जून 1997 को भी सुबह 11.30 बजे शैलेष जी का फोन आया कि एसपी सिंह नहीं रहे। दरअसल, दूरदर्शन के 11 बजे के बुलेटिन में यह खबर आयी कि एसपी सिंह नहीं रहे। मैं तब कोलकाता में था, लेकिन मुझे दोपहर का टिकट नहीं मिला। शाम की फ्लाइट पांच बजे की थी। वह फ्लाइट लेट हो गयी। सात बजे कोलकाता से छूटी। मैं रात को साढ़े नौ बजे पहुंचा। निजामुद्दीन घाट जाने के लिए स्कूटर में बैठा। रास्ते में स्कूटर चालक ने पूछा कि वहां कहां जाना है तो मैंने कहा कि घाट जाना है। उन्होंने पूछा क्यों? मैंने कहा कि वो एक सज्जन हैं, जिनकी मौत हो गयी है। उन्होंने पूछा कि आजतक वाले। मैंने कहा हां। उन्होंने कहा कि वह सब कुछ तो शाम सात बजे ही खत्म हो चुका है। बाद में जानकारी मिली कि अटल बिहारी वाजपेयी, गुजराल, सीताराम केसरी, जयपाल रेड्डी माधव राव सिंधिया, सुषमा स्वराज सबसे पहले वहां पहुंचे। सबसे बाद में दो मिनट के लिए दिल्ली के सीएम साहब सिंह वर्मा भी वहां पहुंचे थे। आज ये सभी लोग इस दुनिया में नहीं हैं। शायद एसपी के साथ वे भी ऊपर बैठकर गुफ्तगू कर रहे होंगे। खबर सुनकर मुझे लगा कि मेरी दुनिया खत्म हो चुकी है। मैं भइया को देख नहीं पाया। यह दुख, यह पीड़ा आज भी मुझे सताती है, लेकिन थोड़ी देर बाद मुझे इस बात का अहसास हो जाता है कि वो मेरे आसपास हैं। मुझे निहार रहे हैं। मुझे सिखा रहे हैं। मुझे पढ़ा रहे हैं। मुझ पर प्यार बरसा रहे हैं। दरअसल, आज भी उन्हीं की यादों में मेरे दिन की शुरुआत होती है और ऑफिस पहुंचते ही उनकी यादों को दूसरों से बांटने में दिन बीत जाता है।

कुछ लोग दूसरी रिपोर्टों को पढ़कर एसपी सिंह के बारे में कुछ भी लिखते हैं, लेकिन मेरा तो उनके साथ अप्रैल 1977 से संबंध है। उनके बारे मे क्या लिखूं और क्या बताऊं, समझ में नहीं आता। अनगिनत बातें और अनगिनत यादें। 1977 से 1997 तक। बीस साल तक उनके साथ मैं साये की तरह लगा रहा। वे मेरे लिए क्या थे। शायद मैं इसे किसी को समझा नहीं सकता। पथ प्रदर्शक, संपादक, बड़े भाई, पिता या कुछ और। उन्होंने 'रविवार' क्यों छोड़ा, छोड़ने से पहले क्या हुआ, 'आनंद बाजार पत्रिका' के ऑनर अरूप बाबू ने उन्हें कितनी देर तक बिठाकर रखा, अभीक सरकार ने क्या कहा। 'नवभारत टाइम्स' क्यों छोड़ा, उस दिन 'नवभारत टाइम्स' के ऑनर समीर जैन के साथ क्या हुआ था। मैं घर से दौड़ा दौड़ा सुबह-सुबह क्यों उनके घर गया। उन्होंने मुझे उस दिन क्या हिदायत दी थी। जिस दिन उन्होंने 'नवभारत टाइम्स' छोड़ा था, कपिल देव की एजेंसी में क्यों अचानक गये। जॉइन करने से पहले उनकी क्या-क्या बातें हुईं । एजेंसी में जॉइन करने से पहले कपिल देव से वे कब मिले,  'राष्ट्रीय सहारा' में उन्होंने जॉइन क्यों किया और किसके कहने पर किया। चार दिन बाद उन्होंने 'राष्ट्रीय सहारा' कयों छोड़ा? जब मैं और भइया रोज उनके घर से 'राष्ट्रीय सहारा' जाते तो मुझे वे क्या-क्या सलाह देते और मुझे क्या कहते। किस तरह से वह टेलिविजन की दुनिया में गये। अरुण पुरी से क्या-क्या बातें हुईं और मैं कैसे बिछड़ गया, वे सारी बातें आज यादें बनकर रह गई हैं।

जिस दिन वह सदा के लिए हमसे बिछड़ गये, उस दिन की यादें। सच तो ये ही है कि टेलिविजन और प्रिंट की दुनिया में आज जितने भी बड़े नाम हैं, वे सब उन्हीं की देन हैं। संतोष भारतीय, कमर वहीद नकवी, शैलेष दा, जयशंकर गुप्त, अरुण रंजन, उदयन शर्मा, राजेश बादल, रामकृपाल सिंह, संजय पुगलिया, अजय चैधरी, पुण्य प्रसून वाजपेयी, आशुतोष गुप्ता, दीपक चौरसिया, अनिल ठाकुर, राजकिशोर और आजतक के सुप्रिय प्रसाद ऐसे ही बहुत सारे पत्रकार। 'न्यूज24' के ऑनर राजीव शुक्ला भी उन्हीं की देन हैं। हमें पता नहीं कि ये लोग एसपी सिंह को याद करते हैं या नहीं, लेकिन मैं उन्हें किसी न किसी बहाने लगभग रोज याद कर ही लेता हूं। कभी संपादक के रूप में, कभी एक अच्छे इंसान के रूप में, कभी उन्हें लोगों को माफ करने के कारण, कभी एक मसीहा के रूप में, तो कभी एक खबरचीलाल के रूप में, तो कभी दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए एक बड़े भाई के रूप में और कभी पिता के रूप में।

सच तो ये ही है कि मैंने अपनी पूरी जिंदगी में जितनी बातें पिता की नहीं सुनीं, उनकी सुनी हैं। उनकी बातें मेरे लिए ब्रह्म वाक्य थे। और हां, मैं एक नाम लेना तो भूल ही गया। वह नाम है नीरेंद्र नागर का, जो आज भी एसपी की चर्चा चलते ही उन्हें याद करते हैं। उन्होंने ही मेरी लिखी एसपी की किताब के संपादन का भार संभाला और खूब संभाला। मैं आज भी नीरेंद्र नागर को नहीं भूल पाया। इसके साथ ही अरुणरंजन और संतोष भारतीय को भी नहीं भूल पाऊंगा, जो कि उनके साथ साये की तरह लगे रहे। उनके एक और परम मित्र कोलकाता में थे, अक्षय उपाध्याय, वो भी एसपी भइया के पहले ही चले गये और सतन कुमार पांडे को मैं कैसे भूल सकता हूं, क्योंकि उनके साथ उनके कॉलेज के दिनों से ही संबध थे। दोनों मे बहुत ही गहरी मित्रता थी। अंतिम दिनों तक उनके साथ लगे रहे, लेकिन इन लोगों ने एसपी भइया के साथ रहने का दंभ कभी नहीं भरा और चुपचाप दोस्ती निभाते रहे। एक नाम और है, जो अब इस दुनिया में नहीं रहे। आनंद बाजार पत्रिका के बिजित बसु। एसपी भइया के परम मित्रों में से एक और राजदार। राज की बातें उन्हीं से शेयर करते थे।

दरअसल, एसपी भइया के.दो और परम मित्र थे। एमजे अकबर, अंग्रेजी पत्रकारों में एक बड़े ख्याति प्राप्त पत्रकार, उदयन शर्मा जो कि अब नहीं रहे। एसपी सिंह, उदयन शर्मा और एमजे अकबर की दोस्ती 'टाइम्स ऑफ इंडिया' मुंबई से शुरू हुई। ये तीनों विचारों के धनी और दोस्तों के दोस्त। बस यादें रह गयी हैं।

जी हां, यादें ही रह गयी हैं। वह एक काला दिन था, जब टेलिविजन पर खबरों का गजब का संसार रचने वाला एक शख्स हमारे बीच से सदा के लिए चला गया। तब दूरदर्शन ही था, जिसे पूरे देश में समान रूप से सनातन सम्मान के साथ स्वीकार किया जाता था। ये भी एक सच है कि देश के इस राष्ट्रीय टेलिविजन के मेट्रो चैनल की इज्जत एसपी सिंह की वजह से ही बढ़ी थी, क्योंकि वे उस पर रोजाना रात दस बजे खबरें लेकर आते, मुस्कुराते हुए, हंसी ठट्ठा करते हुए, खबरों पर कटाक्ष करते हुए, टीवी के परदे से इस पार झांकते, खबरों को जीते, दृश्यों को शब्द देते और शब्दों को तौलते और बीच बीच में उनका कटाक्ष कभी राजनीतिज्ञों पर, तो कभी ब्यूरोक्रेट्स पर तो कभी विपक्ष पर। सीधा वार। वह समाचार पुरुष खबरों की दुनिया में जो काम कर गया, पत्रकारों को जो इज्जत उन्होंने दी, टेलिविजन जगत में हिंदी पत्रकारिता को जो मुकाम दिया, वह आज तक कोई और नहीं कर पाया।

लेकिन हम सबको इस संसार को एक न एक दिन त्यागना ही पड़ता है। वो भी त्याग कर चले गये, लेकिन वे जरा जल्दी चले गये। हालांकि वे शाही अंदाज में गये। शायद ही ऐसा कोई पत्रकार होगा, जिसे शाही अंदाज मे जाने का मौका मिला हो। हां रफी साब भी जल्दी चले गये थे। मेरे दादा-दादी कहा करते कि जो अच्छे लोग होते हैं, उन्हें भगवान जल्दी बुला लेते हैं। रफी साब को भी जल्दी बुला लिया था। शायद इसलिए इन दोनों को बुला लिया था, क्योंकि भगवान को भी अच्छे लोगों की सोहबत में रहना अच्छा लगता है। गीता में कहा गया है कि जन्म लेने वाले के लिए मृत्यु उतनी ही निश्चित है, जितना कि मृत होने वाले के लिए जन्म लेना। इसलिए जो अपरिहार्य है, उस पर शोक नहीं करना चाहिए। लेकिन किसी की अच्छाइयों को भूल पाना कितना कठिन काम है, यह वही समझ सकता है जिसके साथ यह घटित होता है ...

27 जून 1997 को दूरदर्शन के दोपहर के बुलेटिन पर खबर आई। ये थीं खबरें अब तक। एसपी सिंह नहीं रहे। दुनिया को दुनिया भर की खबरें देने वाला एक खबरची एक झटके में खुद खबर बनकर रह गया। लेकिन दरअसल, यह खबर नहीं थी। एक वार था, एक प्रहार था, जो देश और दुनिया के लाखों दिलों पर बहुत गहरे असर कर गया। शुक्रवार का दिन था। काला शुक्रवार। इतना काला कि वह काल बनकर आया और हमारे एसपी भइया को काल के गर्भ में समा लिया। 27 जून 1997 को भारतीय मीडिया के इतिहास में सबसे दारुण और दर्दनाक दिन कहा जा सकता है। उस दिन से आज तक पूरे 23 साल हो गए। एसपी सिंह हमारे बीच में नहीं हैं, ऐसा बहुत लोग मानते हैं, लेकिन हम नहीं मानते, क्योंकि हमारा मानना है कि वे जिंदा हैं, हम में, आप में, और उन सब में, जो खबरों को खबरों की तरह नहीं, जिंदगी की तरह जीते हैं। हर इंसान की कद्र करते हैं। उन सबमें हम उन्हें देखते हैं, जिन्हें उन्होंने माफ कर दिया।

अनगिनत नाम हैं, जिन्हें उन्होंने माफ कर दिया। मेरे पास उन नामों की लिस्ट भी है, जो एसपी के पीछे उन्हें कोसते थे और एसपी भइया के सामने आते ही बिल्ली की तरह मिमियाते थे। एसपी भइया ने जिस तरह से समाज को दिया, जो प्यार और सरल स्वभाव लोगों में बांटा, जिस तरह से जर्नलिस्ट्स की एक कौम को आगे बढ़ाया, वे अद्भुत, अतुलनीय, अकाट्य और अस्वाभाविक है। वे सिखा ही रहे थे कि हमें छोड़कर चले गये। अपने जीवन के आखिरी न्यूज बुलेटिन में बाकी बहुत सारी बातों के अलावा एसपी भइया ने तनिक व्यंग्य में कहा था, मगर जिंदगी तो अपनी रफ्तार से चलती रहती है। जी हां, जिंदगी अपनी रफ्तार से चलती रहती है। दरअसल, रात के दस बजे पूरे देश को जिस खिचड़ी दाढ़ी वाले चेहरे ने खबरों के माध्यम से जागृति पैदा की थी, वह शख्स चला गया। देश के लाखों लोगों के साथ अपने लिए भी वह सन्न कर देने वाला प्रहार था।

संगीत प्रेमी थे। सूफी संगीत प्रेमी, लेकिन बांग्ला और हिंदी गीतों को भी वे सुनते थे। मैं जब रफी साब का कोई गीत गुनगुनाता तो मुझे कहते कि निर्मल तुम बहुत अच्छा गाते हो। मजाक में व्यंग्य भी करते ... क्योंकि वह भी उनकी एक शैली थी। कहते-कहां तुम 'रविवार' में पड़े हो, तुम्हारे लिए तो मुंबई ही ठीक है। बस, ये ही कहते-कहते वे हमसे बिछड़ गये। मैं आज कुछ भी नहीं हूं, लेकिन मैं जो कुछ भी हूं, उनके कारण ही हूं। उनके सिखाये हुए कदमों पर ही चलने की कोशिश कर रहा हूं। एक नेक इंसान बनने की कोशिश् कर रहा हूं। मैं नहीं जानता उनका पांच प्रतिशत भी मैं बन पाउंगा या नहीं, लेकिन आज भी मेरी कोशिश जारी है उन्हें छूने की, उनसे बात करने की निर्मल बुलाते ही दौड़कर उन तक पहुंचने की। दरअसल, उनको किसी भी चीज का लोभ नहीं था। निर्लोभी थे। धन, दौलत, राजसी ठाट बाट, अहंकार को उन्होंने कभी नहीं ओढ़ा। उन्होंने काम करने की आजादी दी और मैं आजादी का फायदा उठाकर सीखता गया, सीखता गया, और सीखता गया। आज उनके जाने के बाद मुझे वह गीत याद आ गया। ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है...

(लेखक दैनिक भास्कर में नोएडा संस्करण के संपादक हैं और ये उनके निजी विचार हैं)

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

‘हिंदी दिवस: महज एक कर्मकांड दिवस’

कालजयी कवियों, लेखकों, भक्तों, विद्वानों ने हिंदी भाषा और साहित्य को नई ऊंचाई दी विस्तार दिया और लोकप्रिय बनाया। हिंदी संघर्ष और स्वतंत्रता आंदोलन की भाषा बनी।

Samachar4media Bureau by
Published - Monday, 14 September, 2026
Last Modified:
Monday, 14 September, 2026
Vinod Agnihotri

विनोद अग्निहोत्री,

सलाहकार संपादक, अमर उजाला।।

आज हिंदी दिवस है। हर साल की तरह इस बार भी हिंदी के प्रचार प्रसार के दावों और वादों के साथ देश में सरकारी गैर सरकारी कार्यक्रम आयोजित हैं। रविवार की छुट्टी होने के कारण इस बार सरकारी दफ़्तरों में हिंदी में कामकाज का ढोंग नहीं हो पा रहा है वरना एक दिन के लिए ये भी हो जाता और साल भर के लिए हिंदी के प्रयोग को विदा कह दिया जाता।

हिंदी की स्वीकार्यता और प्रसार में दो तीन बड़ी बाधायें हैं। पहली हिंदी को कथित सरकारी सरंक्षण जिसने हिंदी को न सिर्फ़ सरकारों पर आश्रित बना कर उसे वैसा लाड़ला बच्चा बना दिया जिसकी संघर्ष क्षमता कमजोर पड़ती है साथ ही वो दूसरों की ईर्ष्या का पात्र भी बनता है। हिंदी के साथ यही हुआ। कथित सरकारी सरंक्षण ने उसे सरकारी कामकाज और संस्थानों में अनुवाद की भाषा बना कर उसके विकास को पंगु कर दिया और अन्य भारतीय भाषा भाषी उसे अपने ऊपर थोपे जाने के भय से उसके अकारण विरोधी हो गये। सरकारी शब्दकोषीय अनुवाद की भाषा ने हिंदी के प्रयोग को दुरूह और अरुचिकर बना दिया।

इसके साथ ही कथित सरकारी सरंक्षण ने हिंदी के विकास के नाम पर भाषायी ठेकेदारों की ऐसी जमात भी पैदा की जो सरकारी अनुदानों पद और सम्मानों के लिए हिंदी की नहीं अपनी चिंता गुटबाज़ी में उलझे रहे। इसने हिंदी को कई मठों में बदल दिया और हिंदी क्षेत्र की बोलियों और भाषाओं की अस्मिता भी हिंदी से टकराने लगी। उनके समर्थकों का आग्रह हिंदी से ज़्यादा अपनी बोलियों और भाषाओं को मान्यता दिलाने के लिए हो गया। जब देश में मुस्लिम बादशाहों और अंग्रेजों का राज था तब हिंदी स्वाभाविक और सहज ढंग से फूली फली।

कालजयी कवियों, लेखकों, भक्तों, विद्वानों ने हिंदी भाषा और साहित्य को नई ऊंचाई दी विस्तार दिया और लोकप्रिय बनाया। हिंदी संघर्ष और स्वतंत्रता आंदोलन की भाषा बनी। गांधी, पटेल, सुभाष, नेहरू जैसे नेताओं ने हिंदी को संवाद और संप्रेषण की भाषा के रूप में स्वीकार किया। अनेक कालजयी रचनाओं ने हिंदी और हिंदी क्षेत्र की बोलियों और भाषाओं को एक सूत्र में पिरोया।

अन्य भारतीय भाषाओं के साथ हिंदी का स्वाभाविक रिश्ता बना। कोई टकराव नहीं बहनों जैसा प्रेम विकसित होने लगा। ये सिलसिला आज़ादी के कुछ वर्षों तक जारी रहा। लेकिन जैसे-जैसे हिंदी को सरकारी सरकारी सरंक्षण और उसे राष्ट्रभाषा बनाने का आग्रह बढ़ा हिंदी का विरोध और उसकी दुर्दशा का दौर भी शुरू हो गया। भाषाई राजनीति और मठवाद ने हिंदी को सिर्फ़ हिंदी क्षेत्र की भाषा में बदल दिया और रही सही कसर बाज़ार की भाषा के नाम पर शुरू हुए हिंग्लिश के प्रयोग ने हिंदी को बाजारू भाषा में बदलना शुरू कर दिया।

हिंदी के सहज शब्दों की जगह ज़बरन अंग्रेज़ी के शब्दों को ठूँसने से भाषा का वर्ण संकरीकरण होने लगा।बचाव की जगह रेस्क्यू और विस्फोट या धमाके की जगह ब्लास्ट जैसे शब्दों का प्रयोग इसका उदाहरण है। हिंदी की रचनाओं को अंग्रेज़ी रचनाओं की तुलना में कमतर मानना अंग्रेज़ी ज्ञान से ज़्यादा अंग्रेज़ीयत झाड़ना हिंदी भाषी मध्यवर्ग की आम प्रवृत्ति है। जब तक हिंदी क्षेत्र इस हीन भावना से मुक्त होकर बिना सरकारी सरंक्षण के हिंदी के समृद्ध रचना संसार को अपनी पूँजी और थाती नहीं बनाता तब तक कितने भी हिंदी दिवस मना लीजिए हिंदी की दशा नहीं सुधरेगी।

इसकी पहल हिंदी भाषियों को अपने घरों परिवारों से करनी होगी। अपने घरों परिजनों के साथ बोलचाल पठन पाठन में हिंदी का प्रयोग बेहिचक करना होगा। बच्चे अंग्रेज़ी और अन्य भाषायें सीखें पर हिंदी न छोड़ें। हिंदी अख़बार पढ़ें हिंदी साहित्य जानें और हिंदी में कामकाज में हीनता नहीं गौरव का भाव रखें। सिर्फ़ मजबूरी में सब्ज़ी वाले रिक्शे वाले से हिंदी में बात न करें बल्कि जब तक मजबूरी और ज़रूरी न हो अंग्रेज़ी न बोलें। हिंदी भाषियों से हिंदी में ही बात करें। अपने अध्ययन कक्ष में तुलसी कबीर प्रेमचंद प्रसाद दिनकर समेत सभी हिंदी के महान रचनाकारों की रचनाएँ प्रमुखता से रखें।

हिंदी क्षेत्र की बोलियों भाषाओं को हिंदी के मुक़ाबले खड़ा करने की बजाय उन्हें सहोदरी बनायें।जिस दिन से हम हिंदी भाषी ये सब करने लगेंगे तब हिंदी को किसी सरकारी सरंक्षण दिवस मनाने की ज़रूरत नहीं रहेगी। वरना मानते रहिए हिंदी दिवस का कर्मकांड। वैसे भी पितृ पक्ष चल रहा है जो कर्मकांड का ही समय है। आख़िर में हिंदी कर्मकांड दिवस की बधाई।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

संचार और प्रबंधन के गुण सिखाते हैं श्रीगणेश: प्रो.संजय द्विवेदी

गणेश जी के बड़े कान इस बात की गवाही हैं कि वे हर बात को ध्यान से सुनते हैं। सुनना एक साधना है। ध्यान से सुनना उससे बड़ी साधना है। उन्होंने श्रवण कौशल को साध लिया है।

Samachar4media Bureau by
Published - Monday, 14 September, 2026
Last Modified:
Monday, 14 September, 2026
sanjaydwivedi

प्रो.संजय द्विवेदी, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के जनसंचार विभाग के अध्यक्ष।

भारतीय संस्कृति अपने नायकों, प्रतीकों और उनकी कथाओं से जीवन रस लेकर ही आज तक प्राणवान है। जीवंत है। उसके नायक चिरयुवा हैं और संकटों से जूझकर सुंदर दुनिया बनाने की आकांक्षा से भरे-पूरे हैं। राम, कृष्ण, शिव, गणेश और ऐसे न जाने कितने देव हमें प्रेरित करते हैं। सबका जीवन सरल नहीं है। सब जूझते हैं और समाधान पाते हैं। आदर पाते हैं। लोकमंगल ही सबका ध्येय है। इन सबमें श्री गणेश की महिमा सबसे अलग है। गणेश चतुर्थी के प्रसंग पर उनकी पूजा के साथ यह जानना जरूरी है कि आखिर उनमें ऐसा क्या खास है, जो उन्हें सबसे अलग बनाता है।

वे असाधारण संचारकर्ता और कुशल प्रबंधक की तरह हमारे सामने आते हैं। गणेश जी के बड़े कान इस बात की गवाही हैं कि वे हर बात को ध्यान से सुनते हैं। सुनना एक साधना है। ध्यान से सुनना उससे बड़ी साधना है। उन्होंने श्रवण कौशल को साध लिया है। दूसरों को ध्यान से सुने बिना न आप समझ सकते हैं, न ही उचित निदान तक पहुंच सकते हैं। फैसले लेने हों या न लेने हों, सुनना तो पड़ेगा। गणेश जी ने इसे साध लिया है।

इसलिए उन्हें विघ्नहर्ता कहा गया, वे सुनकर हमारी समस्याओं का हल करने की क्षमता से लैस हैं। नजर से ही नजरिया बनता है। आंखें सबके पास होती हैं, किंतु दृष्टि सबके पास नहीं होती। सूक्ष्म विश्लेषण का गुण ऐसे ही अर्जित नहीं होता। संकट या सामान्य दिनों में भी बारीक और पैनी नजर रखना व्यक्ति का विलक्षण गुण है। गणेश जी इसी गुण से समादृत हुए। उनकी छोटी आंखें पैनी नजर और तीक्ष्ण एकाग्रता का प्रतीक हैं। वे किसी भी संकट का सूक्ष्म विश्लेषण करते हैं। श्री गणेश समय के साथ चलते हैं। मौके पर वे अनुकूलन कर लेते हैं और लचीलापन उनका स्वभाव है।

कलाकारों को देखिए, वे उनकी कितनी तरह की प्रतिमाएं बनाते हैं। उनका व्यक्तित्व ऐसा है कि उनमें प्रयोग संभव है। उनकी लचीली सूंड यह बताती है कि एक अच्छा कम्युनिकेटर (संचारक) कभी भी अपने रवैये में कठोर नहीं होता। लचीलापन, स्वीकार्यता और समावेशिता उसका मूल गुण है। समय और वातावरण को पहचान कर आचरण ही एक सफल संचारक की पहचान होती है। लोगों को प्रभावित करने में वे इसीलिए सफल होते हैं। आप देखें तो गणेश जी सकारात्मक संचार करते हैं। उनकी सर्वाधिक प्रतिमाएं इसलिए भेंट की जाती हैं, क्योंकि वे शुभ और सकारात्मकता का संचार करती हैं।

कम से कम संसाधनों के उपयोग से वे बेहतर जिंदगी का पाठ पढ़ाते हैं। उनके माता-पिता पूज्य शिव और मां पार्वती उनके सामने ब्रह्मांड का चक्कर लगाने की शर्त रखते हैं तो कार्तिक अपने तेज वाहन मयूर से तत्काल यात्रा पर निकल जाते हैं। किंतु श्री गणेश अपनी अप्रतिम बुद्धिमत्ता और सीमित संसाधनों के प्रयोग के संकल्प पर कायम रहते हुए अपने वाहन मूषक (चूहा) की सीमाओं को भी समझते हुए 'आउट ऑफ बॉक्स' निर्णय लेते हैं। वे अपने माता-पिता की परिक्रमा करके ही स्मार्ट वर्क और रिसोर्स मैनेजमेंट का उदाहरण देते हैं।

ऐसे कौशल ने उन्हें अप्रतिम बना दिया। वे रुकना नहीं जानते, निरंतर काम पर हैं। बाधाएं आती हैं तो आएं, इससे वे प्रभावित नहीं होते। महाभारत लिखने की कथा को आप याद करें। उस समय महर्षि वेदव्यास तेज गति से बोल रहे थे। गणेश जी उनके सहयोगी लेखक हैं। उनकी लेखनी (कलम) टूट जाती है। वे पल भर का समय नहीं देखते। तत्काल अपना एक दांत तोड़कर लिखना प्रारंभ कर देते हैं। इसलिए उनको 'एकदंत' के रूप में भी पूजा जाता है। अपनी समय सीमा में रहते हुए काम को वक्त पर पूरा करना ऐसी ही प्रतिबद्धता है, जिसके वे उदाहरण बने।

अपने ऐसे प्रबंधकीय और लेखकीय गुणों से उन्होंने मानवता की सेवा की। वे सब करते हैं। सब जानते हैं। संकटों के समाधान का रास्ता बताने वाले हैं, किंतु सबके प्रिय गणेश जी कभी भी अपनी जमीन नहीं छोड़ते। पद और ज्ञान का अहंकार उन्हें छू तक नहीं गया है। वे जो हैं, वह होना कठिन है। उनका विशाल शरीर है, वे असीम बुद्धिमत्ता से भरे हैं। इसके बाद भी वे छोटे से वाहन मूषक पर चल रहे हैं। आज जरा सी पद-प्रतिष्ठा पाते ही लोग बड़े वाहनों पर चलने लगते हैं। हवाई यात्राओं में ही उनका जीवन और समय बीतता है। गणेश जी के पास सब कुछ है।

लक्ष्मी साथ ही विराजमान हैं, किंतु वे अपने पुराने वाहन और पुराने सहयोगियों को नहीं भूलते। अहंकार उनके आसपास भी नहीं है। लोगों का मंगल करते हुए, लोगों के कष्ट दूर करते हुए वे सतत प्रवास करते हैं। संवाद करते हैं। उनका बड़ा उदर (पेट) साधारण नहीं है। वे सब कुछ पचा जाते हैं। समाज और संगठन में हो रही हर अच्छी-बुरी बातों को संभालते हैं। उनका बड़ा पेट इस बात को बताता है कि कैसे लीडर को काम करना चाहिए। किस तरह उसको बिना विचलित हुए बहुत सारी निंदा, आलोचना और सुझावों को आत्मसात करते हुए पचा जाना चाहिए।

वे निरंतर परिशुद्ध होते जाते हैं। समस्याओं का समाधान करते हुए लोकमंगल का व्रत निभाते हुए। वे कड़े भी हैं, सरल भी। उनके हाथ में अंकुश भी है और पाश भी है। वे जानते हैं कि कब उन्हें कठोर होना है और कब सामान्य जनों को अपने प्रेम पाश में बांध कर रखना है। इसलिए देखिए तो गणेश जी बच्चों के सबसे प्रिय देवता हैं, वे अपने से लगते हैं। तो श्रेष्ठ जनों में उनको लेकर अलग पूज्य भाव दिखते हैं। इस तरह गणेश जी का कवरेज एरिया बहुत व्यापक है। गणेश जी संकटों से घबराते नहीं, रास्ता दिखाते हैं। वे ही हैं जिन्हें विघ्नहर्ता कहा गया।

'रिस्क मैनेजमेंट' उनकी विशेषज्ञता का क्षेत्र है। उनको समाधान ही दिखते हैं, संकट नहीं। वे संकट को भांपकर उपयुक्त समाधान देते हैं। विविधता की स्वीकार्यता उनका गुण है। वे अपने पिता शिव के समस्त गणों से भी संवाद रखते हैं, जिनमें भूत, प्रेत, पशु, देवता सभी शामिल हैं। इतने विविध समुदायों से संवाद और उनका साहचर्य प्राप्त करते हुए वे विविधता को साधने वाले देवता बन जाते हैं, जिनके लिए कोई भी अलग नहीं है, पराया नहीं है। सभी उनके हैं।

महान प्रबंधक कैसे विविध लोगों को साधते हैं, गणेश इसके उदाहरण हैं। वे माता-पिता दोनों के प्रिय हैं। दुलारे हैं। वे सभी के लिए गणपति हैं। सभी उन्हें प्रथम पूज्य मानते हैं। अपने जीवन के आरंभ में ही हुई महान दुर्घटना से उन्होंने खुद को उबार लिया। उसका दुख उन्होंने कभी प्रकट नहीं किया। वे बताते हैं, जिंदगी रुकती नहीं, आगे भी चलती है। आइए, हम अपने देवों की सिर्फ प्रतीकात्मक पूजा न करें, बल्कि उनके जीवन से सीखें भी और अनुसरण भी करें।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

हिंदी दिवस पर विशेष: कब तक हिंदी से 'कमाने' वाले दबाते रहेंगे अंग्रेजी के पांव

हिंदी आज भी अंग्रेजी की छाया में जीने को मजबूर है, कभी उसकी अधीन बनकर, तो कभी उसकी सहायिका बनकर।

Samachar4media Bureau by
Published - Monday, 14 September, 2026
Last Modified:
Monday, 14 September, 2026
HindiDiwas89562

आज जब हम हिंदी दिवस मना रहे हैं, यह सवाल बार-बार दिल और दिमाग में गूंजता है कि स्वतंत्रता के इतने दशकों बाद भी हिंदी को उसका वास्तविक स्थान क्यों नहीं मिला। यह वही हिंदी है, जिसने करोड़ों लोगों को जोड़ने का सेतु बनाया, जिसने हमारी मिट्टी की खुशबू और हमारी संस्कृति की आत्मा को दुनिया तक पहुंचाया। लेकिन अफसोस की बात यह है कि वही हिंदी आज भी अंग्रेजी की छाया में जीने को मजबूर है, कभी उसकी अधीन बनकर, तो कभी उसकी सहायिका बनकर।

नीति-नियंताओं ने हमेशा हिंदी को सम्मान देने और उसके प्रचार-प्रसार की बात जरूर की, लेकिन उनके प्रयास अधूरे ही रहे। हकीकत यह है कि हिंदी ने हमारे समाज और अर्थव्यवस्था को सहारा दिया, रोजगार दिया, उद्योगों को खड़ा किया, लेकिन स्वयं अपने हक से वंचित रही। हिंदी फिल्मों से लेकर हिंदी पत्रकारिता और मीडिया उद्योग तक- सबकी नींव हिंदी पर खड़ी है। इनसे करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी चल रही है, फिर भी विडंबना यह है कि हिंदी आज तक राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं पा सकी।

प्रिंट, टीवी या डिजिटल- मीडिया का हर माध्यम हिंदी की ताकत से फल-फूल रहा है, लेकिन संवैधानिक रूप से हिंदी आज भी राजभाषा होकर एक “सहायिका” भर है। यह स्थिति हर उस भारतीय को चुभती है, जो अपनी मातृभाषा को सिर्फ संवाद का नहीं, बल्कि आत्मसम्मान का प्रतीक मानता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हिंदी को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पहचान और सम्मान दिलाने का जो साहसिक कदम उठाया है, वह काबिले-तारीफ है। लेकिन असली सवाल यही है कि क्या यही सरकार आने वाले समय में हिंदी को राष्ट्रभाषा का संवैधानिक दर्जा दिलाने की हिम्मत दिखाएगी? अगर इस हिंदी दिवस पर यह बड़ा फैसला हो जाता है, तो न सिर्फ हिंदी दिवस सफल होगा बल्कि यह देश के हर उस दिल को तसल्ली देगा, जो वर्षों से हिंदी के हक की प्रतीक्षा कर रहा है।

समाचार4मीडिया ने इस अवसर पर मीडिया में हिंदी की बदलती भूमिका पर विशेष आलेखों का संग्रह प्रस्तुत किया है। यह प्रयास केवल लेखों का संग्रह नहीं है, बल्कि हिंदी के उत्थान और उपेक्षा के बीच के संघर्ष का आईना है। उद्देश्य यही है कि पाठकों तक हिंदी की ताकत, उसकी चुनौतियां और उसके भविष्य की दिशा एक ही मंच पर पहुंच सके।

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

क्या AI हम सबको मार डालेगा? पढ़िए इस सप्ताह का 'हिसाब किताब'

जैकब की आशंका पर Anthropic के CEO और फाउंडर डारियो अमोडेई ने भी एक तरह से मुहर लगा दी है। उन्होंने जैकब के आरोपों पर सीधे जवाब तो नहीं दिया।

Samachar4media Bureau by
Published - Monday, 14 September, 2026
Last Modified:
Monday, 14 September, 2026
milind

मिलिंद खांडेकर, वरिष्ठ पत्रकार।

Artificial Intelligence (AI) ने चार साल में हमारी दुनिया बदल कर रख दी है। कभी वो गणित के अनसुलझे सवालों को सुलझा लेता है तो कभी हमारी नौकरी खाने पर आ जाता है। अब Anthropic AI के रिसर्चर ने यह कहकर इस्तीफा दिया है कि AI दस साल में मानवता को खत्म कर सकता है। इस दावे से सनसनी फैल गई है कि क्या AI की अंधी दौड़ में सावधानी से मुंह मोड़ लिया जा रहा है? हिसाब-किताब AI के खतरे का।

जैकब कॉक्सन Anthropic (Claude) में रिसर्च का काम करते थे। यह कंपनी दावा करती रही है कि OpenAI (ChatGPT) के मुकाबले ज्यादा जिम्मेदार है, बल्कि Claude बनाने वाले डारियो अमोडेई ने OpenAI को यह कहकर छोड़ा था कि वो पैसे बनाने के लिए जल्दबाजी कर रही है। जैकब भी OpenAI में काम कर चुके हैं। उन्होंने Anthropic से पिछले हफ्ते इस्तीफा दे दिया। उनका आरोप है कि मानवता पर खतरे को लेकर AI कंपनियां गंभीर नहीं हैं।

जैकब की आशंका पर Anthropic के CEO और फाउंडर डारियो अमोडेई ने भी एक तरह से मुहर लगा दी है। उन्होंने जैकब के आरोपों पर सीधे जवाब तो नहीं दिया है, लेकिन उन्होंने AI के खतरे पर ब्लॉग लिखा है। उन्होंने AI कंपनियों से अपील की है कि डेवलपमेंट के काम को धीमा करें। AI के खतरे को देखकर सुरक्षा चाक-चौबंद की जानी चाहिए, वरना 6 से 12 महीनों में AI एजेंट का झुंड इंटरनेट को ठप करने की ताकत रखता है। OpenAI के फाउंडर सैम अल्टमन और xAI के फाउंडर एलन मस्क ने डारियो का समर्थन किया है।

डारियो के ब्लॉग से पहले Anthropic की सुरक्षा रिपोर्ट भी आई है। रिपोर्ट में बताया गया है कि Claude AI का दुरुपयोग करने की कोशिश कैसे और कहाँ की गई है। Claude की मदद से Bio Weapon बनाने की कोशिश भी हुई है। चिकनगुनिया और एवियन इन्फ्लूएंजा वायरस के साथ छेड़छाड़ की गई थी। इसका इस्तेमाल बीमारी फैलाने के लिए हो सकता था। मतलब मानवता को नष्ट करने की कोशिश में AI की मदद लेने के सबूत मिले हैं।

जैकब जिस खतरे की बात कर रहे हैं, वो यह नहीं है। अभी तो आदमी ही AI का इस्तेमाल करते हुए खतरे पैदा कर रहा है, लेकिन AI हमसे तेज हो गया तो क्या होगा? अभी तो वो हमारे कहने पर चल रहा है, लेकिन साथ में वो खुद भी सीख रहा है। जब वो हमारे काबू से बाहर निकल जाएगा तो दो तरह के खतरों की बात हो रही है।

AI खुद Bio Weapon बनाकर हमें खत्म कर सकता है, मानो कोई वायरस ही बनाकर छोड़ दे। दूसरा खतरा है कि AI हमारी जिंदगी के हर हिस्से में है। बिजली सप्लाई हो, एयरपोर्ट, रेलवे, सेना। वहाँ से भी AI तबाही मचा सकता है।

सबको इन खतरों के बारे में पता है, लेकिन कोई इस रेस में पीछे नहीं छूटना चाहता है। एक रेस अमेरिका और चीन में चल रही है। दूसरी रेस अमेरिकी कंपनियों जैसे OpenAI और Anthropic में चल रही है। ये कंपनियां IPO लाने की तैयारी कर रही हैं। अमेरिका की सरकार भी कंपनियों को कसने के मूड में नहीं है, क्योंकि चीन के आगे बढ़ने का डर है। एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ दुनिया को खतरे में डाल सकती है और यह बात तो अब डारियो ही कह रहे हैं।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

मोदी ने विश्व राजनीति में भारत को कैसे अग्रणी बनाया: आलोक मेहता

ताजा प्रमाण ब्रिक्स (पांच देशों का संगठन) शिखर सम्मेलन में 12 देशों की उपस्थिति और भारत की भूमिका की स्वीकार्यता मोदी की वैश्विक रणनीति का महत्वपूर्ण स्तंभ कहा जा सकता है।

Samachar4media Bureau by
Published - Monday, 14 September, 2026
Last Modified:
Monday, 14 September, 2026
aalokmehta

आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।

इस साल फरवरी में जब मेरी किताब 'रिवालूशनरी राज - नरेंद्र मोदी रूल ऑफ 25 इयर्स' प्रकाशित हुई, तो कुछ कार्यक्रमों में मुझसे इस क्रांतिकारी राज में विश्व राजनीति में भारत को मोदी के कार्यकाल में कोई बड़ी उपलब्धि के सवाल हुए, तो मैंने उन्हें 1971 से अब तक अपनी पत्रकारिता और तथ्यों के आधार पर उत्तर दिए। इसमें सबसे बड़ा तर्क यही है कि इंदिरा गांधी से मनमोहन सिंह के राज तक संयुक्त राष्ट्र या अन्य अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भारत को 'गुट निरपेक्षता' का ठप्पा लगाकर पेश किया जाता था, लेकिन मुझे 1983 के प्रारम्भ में दिल्ली के विज्ञान भवन में हुए गुट निरपेक्ष देशों के सम्मेलन के कवरेज के समय ही लगा था कि यह ठप्पा केवल अमेरिका और चीन से नाराज या सोवियत रूस समर्थक देशों का समूह है।

इसके विपरीत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में सत्ता संभालने के साथ असली निर्गुट नीति अपनाकर रूस, अमेरिका, चीन, ब्रिटेन, अफ्रीका, मध्य पूर्व, पश्चिम और पूर्वी एशिया और यूरोपीय समुदाय के देशों के शीर्ष नेताओं से सीधे कूटनीतिक और कुछ हद तक अपनत्व के साथ संबंध जोड़ने शुरू कर दिए।

ताजा प्रमाण ब्रिक्स (पांच देशों का संगठन) शिखर सम्मेलन में 12 देशों की उपस्थिति और भारत की भूमिका की स्वीकार्यता मोदी की वैश्विक रणनीति का महत्वपूर्ण स्तंभ कहा जा सकता है। भारत ने 2016 में ब्रिक्स सम्मेलन की मेजबानी की थी और अब 2026 में अध्यक्षता की है। 2026 के सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन जैसे नेताओं के साथ भारत का संवाद इस रणनीति को और महत्वपूर्ण बनाता है। दुनिया की लगभग आधी आबादी और अर्थव्यवस्था का करीब 40 प्रतिशत इस समूह से जुड़ा है।

अमेरिका या उससे जुड़े देश थोड़े विचलित हो सकते हैं, लेकिन उन्हें भारत के सहारे ही चीन, रूस, ईरान से भी आर्थिक संबंध रखने की तमन्ना है। ब्रिक्स सम्मेलन की सबसे बड़ी सफलता केवल चीन, रूस, ईरान, सऊदी अरब, इंडोनेशिया और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों के राष्ट्र प्रमुखों द्वारा स्वीकार किए गए घोषणा पत्र में पाकिस्तान द्वारा जम्मू-कश्मीर में अप्रैल 2025 में किए गए आतंकी हमले की भर्त्सना किया जाना है।

यही नहीं, किसी भी सत्ता द्वारा आतंकियों की फंडिंग और आतंकवाद के विरुद्ध मिलकर लड़ने का संकल्प लिया गया। यह मोदी की कूटनीतिक सफलता है, क्योंकि चीन, सऊदी अरब तो पाकिस्तान के सबसे प्रमुख समर्थक रहे हैं। टैरिफ की बंदर घुड़की देने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत आने और उससे पहले नवंबर में चीन-रूस के राष्ट्रपतियों से मिलने के इंतजार में हैं।

इसलिए यहाँ निराश पिटे हुए चिदंबरम जैसे कुछ कांग्रेसी नेता भले ही ब्रिक्स या किसी से कुछ न मिलने का रुदन करें, संयुक्त राष्ट्र, विश्व बैंक, विश्व मुद्रा कोष भारत के नेतृत्व और आर्थिक विकास में सबसे अग्रणी होने की सराहना सम्मेलन में ही कर रहे हैं। मोदी के लिए ब्रिक्स का महत्व ग्लोबल साउथ की अवधारणा, पश्चिमी देशों के प्रभुत्व वाले संगठनों में सुधार, वैकल्पिक वित्तीय मेकेनिज्म, व्यापार, ऊर्जा, टेक्नोलॉजी, विकास के वित्तीय प्रबंध, बहुध्रुवीय विश्व के लिए है।

इसे संयोग कहा जाए अथवा मोदी के सलाहकारों की रणनीति कि ब्रिक्स में मोदी की जयकार उनके जन्मदिन (17 सितंबर) से तीन दिन पहले से हो रही है। वहीं उनकी भारतीय जनता पार्टी नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री तक के सफल 25 वर्षों के सत्ता काल के उत्सव मनाने जा रही है। मैंने अपनी किताब और लेखों में तो इस तथ्य को रेखांकित किया है कि पुतिन, शी जिनपिंग या ट्रंप सहित दुनिया के किसी देश के नेता के पास एकसाथ 25 वर्ष सत्ता चलाने का अनुभव नहीं है। ध्यान देने की बात यह है कि मोदी की अंतरराष्ट्रीय समझ 2014 के बाद अचानक पैदा नहीं हुई।

वे लंबे समय तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े रहे और बाद में भाजपा संगठन में आए। 1978 में वे संघ के क्षेत्रीय स्तर के प्रचारक बने और 1979 में दिल्ली में संघ के काम से जुड़े। 1980 के दशक के उत्तरार्ध में भाजपा संगठन में उनकी भूमिका बढ़ी। 1990 में लालकृष्ण आडवाणी की राम रथयात्रा और 1991–92 में मुरली मनोहर जोशी की एकता यात्रा के संगठन में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। यही वह दौर था, जिसमें मोदी ने देश के अलग-अलग हिस्सों को संगठन की दृष्टि से समझा और बाद में विदेशों में भारतीय समुदाय से संपर्क का अनुभव भी प्राप्त किया। बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि 1993 में नरेंद्र मोदी अमेरिका गए थे, उस समय वे न मुख्यमंत्री थे, न सांसद और न ही केंद्र सरकार में कोई पद था।

वे भाजपा-संघ संगठन से जुड़े नेता थे। उनका पहल प्रशिक्षण दौरा अमेरिकन कौंसिल ऑफ यंग पॉलिटिकल लीडर्स संस्था के निमंत्रण पर हुआ था। यह संगठन अमेरिकी सरकार के सहयोग से दुनिया, खासकर उस समय के विकासशील देशों के चुनिंदा युवा नेताओं को एक महीने के लिए आमंत्रित करता रहा है। इस अवधि में अमेरिका भ्रमण के दौरान विचारों के आदान-प्रदान, नेताओं और प्रशासन के वरिष्ठ नेताओं के साथ संवाद आदि के कार्यक्रम होते हैं। यह वही दौर था, जब राव राज में भारत ने उदार अर्थव्यवस्था के लिए खिड़की-दरवाजे खोलने शुरू हुए थे। इस तरह मोदीजी को अमेरिकी राजनीतिक व्यवस्था, नेतृत्व, चुनावी राजनीति और संस्थागत कामकाज देखने का अवसर मिला।

दिलचस्प बात यह है कि उस समय का यह अनुभव बाद के मोदी में दिखाई देता है—विदेश जाकर केवल सरकारों से बात नहीं करना, बल्कि राजनीतिक व्यवस्था, कारोबारी समुदाय और प्रवासी भारतीयों को भी समझना। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में विदेश नीति का पहला प्रयोग शुरू किया। 2001 में नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने। उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी कि उन्होंने मुख्यमंत्री के पद को केवल प्रशासनिक पद नहीं माना।

उन्होंने गुजरात को एक सफल आर्थिक प्रगति वाले मॉडल प्रदेश के रूप में प्रस्तुत करना शुरू किया। उनका लक्ष्य था: विदेशी निवेश, उद्योग, तकनीक, इंफ्रास्ट्रक्चर, बंदरगाह, ऊर्जा, फार्मास्यूटिकल, हीरा उद्योग, ऑटोमोबाइल, प्रवासी भारतीयों को निवेश से जोड़ना रहा। इसी रणनीति के केंद्र में वाइब्रेंट गुजरात के अंतरराष्ट्रीय आयोजन शुरू किए। इन आयोजनों को अहमदाबाद, गांधीनगर में जाकर मैंने स्वयं देखा है। देश-विदेश के उद्यमी और संबंधित नेताओं के आने से मोदी को राजनीतिक-आर्थिक क्षेत्र में पैर मजबूत करने में सुविधा हुई।

भारत में उनके विरोधियों और केंद्र में कांग्रेस की सरकार के कारण 2005 में अमेरिका ने उन्हें वीजा देने से इनकार किया। इसके बावजूद उन्होंने अपनी विदेश नीति को रोकने के बजाय एशिया की ओर ज्यादा केंद्रित किया। वे चीन, जापान, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, ताइवान, मलेशिया, थाईलैंड और अन्य एशियाई केंद्रों से आर्थिक संपर्क बढ़ाते रहे। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में उनकी यात्राओं में रूस और चीन की तीन-तीन यात्राएँ, इजरायल, स्विट्जरलैंड, युगांडा और केन्या जैसी यात्राएँ भी शामिल थीं। मुख्यमंत्री रहते हुए मोदी ने चीन को केवल राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी की तरह नहीं देखा।

उन्होंने चीन की विशेष इकोनॉमिक जोन, इंफ्रास्ट्रक्चर, पोर्ट्स, लघु-मध्यम श्रेणी के उद्यम, शहरी विकास जैसे कार्यों का अध्ययन किया। उनकी 2006, 2007 और 2011 में चीन की यात्राओं का उल्लेख मिलता है। 2011 की यात्रा में बीजिंग, शंघाई और चेंगडु शामिल थे तथा उनके साथ कारोबारी प्रतिनिधिमंडल भी था। यानी मोदी का संदेश था: “जिस देश से प्रतिस्पर्धा करनी है, उससे भी सीखो।” यही शायद उनकी विदेश नीति की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक है।

जापान से चीन तक—मुख्यमंत्री के रूप में विकास की कूटनीति सार्थक होती गई। 2007 और 2012 में जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे के साथ उनकी मुलाकातों ने व्यक्तिगत संबंध बनाने में भूमिका निभाई। गुजरात में जापानी निवेश आकर्षित करने की कोशिशें आगे बढ़ीं। बाद में प्रधानमंत्री बनने पर यही सोच मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना के रूप में सामने आई। मुख्यमंत्री मोदी विदेश यात्रा को केवल औपचारिक यात्रा नहीं बनाते हैं, वे वहाँ से नए आइडिया लेकर लागू करने की कोशिश करते हैं।

26 मई 2014 को नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने। उनकी पहली विदेश यात्रा जून 2014 में भूटान की थी। इसके बाद ब्राजील में ब्रिक्स सम्मेलन में शामिल हुए। इसके बाद उनकी विदेश यात्राओं की गति असाधारण रही। सितंबर 2026 तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार मोदी ने प्रधानमंत्री के रूप में 100 से अधिक अंतरराष्ट्रीय यात्राएँ की हैं और 80 से अधिक देशों तक पहुँचे हैं। मोदी की विदेश नीति का मूल मंत्र: “सबसे संबंध, किसी से गुलामी नहीं।” मोदी की विदेश नीति को केवल “अमेरिकी या रूसी ओरिएंटेड” नहीं कही जा सकती है।

वे एक साथ अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस, जर्मनी, ईरान, इजराइल, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, आसियान, अफ्रीका के साथ संबंध बनाए रखने की कोशिश करते हैं। यही स्ट्रैटिजिक ऑटोनोमी जैसा मॉडल है। यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत ने रूस से संबंध नहीं तोड़े, लेकिन यूक्रेन के साथ भी संवाद रखा। पश्चिम एशिया में इजराइल के साथ रणनीतिक संबंध हैं, लेकिन ईरान और खाड़ी के देशों से भी भारत के संबंध जारी रहे। चीन के साथ सीमा विवाद गंभीर है, लेकिन ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन जैसे मंचों पर संवाद जारी है।

अगर मोदी के प्रधानमंत्री काल की एक बड़ी कूटनीतिक सफलता चुननी हो तो 2023 में जी-20 की अध्यक्षता सबसे महत्वपूर्ण कही जा सकती है। नई दिल्ली में जी-20 सम्मेलन के दौरान भारत ने अफ्रीकन देशों के संगठन यानी अफ्रीकी देशों को जी-20 का स्थायी सदस्य बनाने में भूमिका निभाई। दिल्ली घोषणा पत्र पर सहमति बनाने में सफलता पाई। भारत मध्य पूर्व-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर की घोषणा में भूमिका निभाई।

यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण था, क्योंकि यूक्रेन युद्ध के कारण जी-20 के भीतर मतभेद बहुत गहरे थे। फिर भी भारत ने सर्वानुमति से घोषणा जारी करवाई। सबसे बड़ा काम भारत की पाकिस्तान के आतंकवाद पर हर मंच से न केवल भर्त्सना की, नाम लिए बिना सबको साथ देने का संकल्प करवाया। भारत जी-7 का सदस्य नहीं है। लेकिन मोदी को कई वर्षों में जी-7 के विशेष सत्रों में आमंत्रित किया गया। यानी मोदी ने जी-7 की सदस्यता प्राप्त नहीं की—बल्कि जी-7 के बाहर रहकर भारत को उस बातचीत का आवश्यक पक्ष बना दिया।

क्वाड यानी अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत के लिए भारत-प्रशांत क्षेत्र की रणनीति कारगर है। प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत की भूमिका को भी अधिक सक्रिय बनाया। उन्होंने सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता की मांग दोहराई। उनकी विदेश नीति का एक बड़ा हिस्सा यह रहा है कि भारत केवल नियमों का पालन करने वाला देश नहीं, बल्कि नियम बनाने में भाग लेने वाली शक्ति बने। इसी सोच के तहत संयुक्त राष्ट्र सुधार, आतंकवाद से संघर्ष, पर्यावरण संरक्षण, सौर ऊर्जा अलायंस, योग से स्वास्थ्य जैसे मुद्दों को विश्वव्यापी बना दिया। इसलिए चाहें उन्हें न कहें, लेकिन मोदी के भारत को विश्व गुरु के रूप में स्वीकारा जाना चाहिए। तभी उनके जन्मदिन और 25 वर्षों के सत्ता काल की बधाई और शुभकामनाएं।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

आंकड़ों में बढ़ती हिंदी की ताकत, फिर भी सम्मान के मोर्चे पर क्यों पीछे?

14 सितंबर को देश में हर साल हिंदी दिवस मनाया जाता है। 1949 में इसी दिन संविधान सभा ने हिंदी को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था।

Vikas Saxena by
Published - Monday, 14 September, 2026
Last Modified:
Monday, 14 September, 2026
HindiDiwas589

देश में हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। 1949 में इसी दिन संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में लिखी हिंदी को भारतीय गणराज्य की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था और तभी से हर वर्ष यह दिन हिंदी के प्रति सम्मान जताने के लिए मनाया जाता है। लेकिन एक सवाल जो हर साल इस मौके पर उठता है, वह यह है कि क्या हिंदी को वाकई वह स्थान मिला है जिसकी वह हकदार है? इस सवाल का जवाब खोजने के लिए सिर्फ भावनाओं पर नहीं, आंकड़ों पर भी नजर डालनी जरूरी है।

दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी भाषा

भाषा विशेषज्ञों के मुताबिक, हिंदी आज अंग्रेजी और मैंडरिन (चीनी) के बाद दुनिया में तीसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। एथ्नोलॉग जैसे वैश्विक भाषा डेटाबेस के अनुसार दुनिया भर में करीब 61.5 करोड़ लोग हिंदी बोलते या समझते हैं। संयुक्त राष्ट्र के मंच पर भी यह बात दोहराई जा चुकी है कि आज दुनिया भर में लगभग 60 करोड़ लोग हिंदी बोलते और समझते हैं, जबकि लगभग 45 करोड़ लोग इसे अपनी मातृभाषा के रूप में इस्तेमाल करते हैं। भारत के अलावा नेपाल, मॉरीशस, फिजी, गुयाना, सूरीनाम, त्रिनिदाद, दक्षिण अफ्रीका, अमेरिका, ब्रिटेन और खाड़ी देशों में भी बड़ी संख्या में हिंदीभाषी समुदाय बसे हैं, जो इसे एक वास्तविक वैश्विक भाषा बनाते हैं।

भारत के भीतर देखें तो 2011 की जनगणना (जो अब तक की आखिरी उपलब्ध पूर्ण जनगणना है) के अनुसार 43.63 प्रतिशत यानी करीब 52.8 करोड़ भारतीयों ने हिंदी को अपनी मातृभाषा बताया था- यह 2001 की जनगणना के 41 प्रतिशत से अधिक था। यानी देश की करीब आधी आबादी के लिए हिंदी पहली भाषा है और इससे कहीं ज्यादा लोग इसे दूसरी या तीसरी भाषा के रूप में समझते और इस्तेमाल करते हैं। भारत की मौजूदा अनुमानित आबादी करीब 145 करोड़ मानी जा रही है; 2011 के बाद देश में जनगणना नहीं हुई है, लेकिन हिंदी भाषी राज्यों में अपेक्षाकृत अधिक जनसंख्या वृद्धि दर को देखते हुए विशेषज्ञ मानते हैं कि हिंदी मातृभाषियों का अनुपात और भी बढ़ा है।

डिजिटल दुनिया में हिंदी की तेज छलांग

यदि हिंदी दिवस को सिर्फ इतिहास और परंपरा तक सीमित रखा जाए तो यह अधूरी तस्वीर होगी। असली बदलाव पिछले एक दशक में डिजिटल क्षेत्र में आया है। इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (IAMAI) और कांतार की संयुक्त "इंटरनेट इन इंडिया रिपोर्ट 2025" (फरवरी 2026 में जारी) के अनुसार भारत में सक्रिय इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या अब 95.8 करोड़ (958 मिलियन) तक पहुंच चुकी है, जो पिछले साल की तुलना में करीब 8 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर्शाती है और अब ग्रामीण भारत में शहरी भारत से ज्यादा इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं। इससे एक साल पहले की रिपोर्ट (2024) में यह भी सामने आया था कि भारत के करीब 98 प्रतिशत इंटरनेट उपयोगकर्ता किसी न किसी भारतीय भाषा में ही कंटेंट देखना पसंद करते हैं। सरकार ने इंडिया मोबाइल कांग्रेस 2025 में यह अनुमान भी जताया था कि वित्तीय वर्ष 2026 के अंत तक देश का इंटरनेट उपयोगकर्ता आधार 1 अरब यानी 100 करोड़ के आंकड़े को पार कर जाएगा और मौजूदा रुझान इस लक्ष्य के काफी करीब हैं।

इस विस्फोटक इंटरनेट विस्तार में हिंदी की भूमिका बेहद अहम रही है। सस्ते स्मार्टफोन और किफायती डेटा योजनाओं के आने के बाद जो करोड़ों नए लोग पहली बार ऑनलाइन आए, उनमें एक बड़ा हिस्सा हिंदीभाषी क्षेत्रों से रहा है, जिसने हिंदी सामग्री की मांग को कई गुना बढ़ा दिया। हिंदी अब सिर्फ किताबों और अखबारों की भाषा नहीं रही, बल्कि यह सर्च इंजन, सोशल मीडिया, ओटीटी प्लेटफॉर्म और यूट्यूब जैसी जगहों पर भी अंग्रेजी को कड़ी टक्कर देने लगी है और उद्योग विश्लेषकों के मुताबिक वैश्विक स्तर पर आज भी हिंदी को अंग्रेजी के बाद इंटरनेट पर सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाली भाषाओं में गिना जाता है।

तकनीक की दुनिया भी अब हिंदी को गंभीरता से ले रही है। गूगल असिस्टेंट, एलेक्सा और सिरी जैसी वॉयस सेवाओं में हिंदी सपोर्ट, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित अनुवाद उपकरण और सरकार का भाषिणी जैसा राष्ट्रीय भाषा मिशन- ये सभी संकेत हैं कि हिंदी और भारतीय भाषाओं को डिजिटल ढांचे का स्थायी हिस्सा बनाने की कोशिशें तेज हुई हैं। स्वायाम (SWAYAM), दीक्षा (DIKSHA) और ई-पाठशाला (ePathshala) जैसे शिक्षा पोर्टल भी अब बड़े पैमाने पर हिंदी में गुणवत्तापूर्ण कंटेंट उपलब्ध करा रहे हैं, जिससे टियर-2 और टियर-3 शहरों तथा ग्रामीण इलाकों के छात्रों को सीधा फायदा मिल रहा है।

मीडिया और मनोरंजन उद्योग की रीढ़

हिंदी की आर्थिक ताकत का सबसे बड़ा प्रमाण मीडिया और मनोरंजन उद्योग है। प्रिंट अखबारों से लेकर टीवी न्यूज चैनलों, हिंदी सिनेमा और अब ओटीटी वेब सीरीज तक- हर माध्यम की रीढ़ हिंदी ही है। हिंदी समाचार पत्र आज भी देश में सबसे ज्यादा प्रसार संख्या रखने वाले अखबारों में शुमार हैं और हिंदी न्यूज चैनल दर्शक संख्या के मामले में लगातार शीर्ष पर बने रहते हैं। हिंदी सिनेमा दशकों से न केवल भारत बल्कि दुनिया भर में करोड़ों दर्शकों तक भारतीय संस्कृति पहुंचाने का माध्यम रहा है और अब ओटीटी प्लेटफॉर्मों पर हिंदी वेब सीरीज और फिल्में दर्शकों की पहली पसंद बनी हुई हैं। इस पूरे इकोसिस्टम से करोड़ों लोगों की आजीविका जुड़ी है- पत्रकार, लेखक, कलाकार, तकनीशियन, विज्ञापन पेशेवर, कंटेंट क्रिएटर- इन सबका रोजगार सीधे तौर पर हिंदी भाषा पर ही टिका है।

संवैधानिक स्थिति: राजभाषा, राष्ट्रभाषा नहीं

आंकड़ों में इतनी मजबूत उपस्थिति के बावजूद विडंबना यह है कि हिंदी को आज तक संविधान में "राष्ट्रभाषा" का दर्जा हासिल नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 343 के तहत हिंदी को देवनागरी लिपि में संघ की "राजभाषा" घोषित किया गया था, जबकि अंग्रेजी को भी सहायक राजभाषा के रूप में जारी रखा गया। मुंशी-आयंगर फॉर्मूले  के तहत हुए इस ऐतिहासिक समझौते ने हिंदी को केंद्र सरकार के कामकाज की भाषा तो बनाया, लेकिन "राष्ट्रभाषा" जैसा प्रतीकात्मक और संवैधानिक दर्जा आज भी अधूरा है। मुंशी-आयंगर फॉर्मूला 1949 में संविधान सभा द्वारा भारत की राजभाषा के विवाद को सुलझाने के लिए अपनाया गया एक भाषाई समझौता था। इसे कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी (K.M. Munshi) और एन. गोपालस्वामी आयंगर (N. Gopalaswami Ayyangar) ने पेश किया था। यह समझौता उत्तर और दक्षिण भारत के बीच भाषाई विवाद को सुलझाने के लिए हुआ था। यही वजह है कि हर साल हिंदी दिवस पर यह मांग दोहराई जाती है कि जब हिंदी आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर देश को इतना कुछ दे रही है, तो उसे उसका पूरा संवैधानिक सम्मान क्यों नहीं मिलता।

चुनौतियां भी कम नहीं

आंकड़े जितनी उम्मीद जगाते हैं, उतनी ही कुछ चुनौतियां भी सामने खड़ी हैं। भाषा विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल विस्तार के साथ-साथ "हिंग्लिश" (हिंदी-अंग्रेजी मिश्रित भाषा) का प्रचलन तेजी से बढ़ा है, जिससे शुद्ध हिंदी के व्याकरणिक स्वरूप पर असर पड़ रहा है। तकनीकी और वैज्ञानिक शब्दावली के सीमित विकास, की-बोर्ड और फॉन्ट से जुड़ी तकनीकी दिक्कतें और उच्च शिक्षा व शोध में अंग्रेजी के दबदबे जैसी समस्याएं आज भी बनी हुई हैं। इसके अलावा शहरी मध्यम वर्ग में अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा को लेकर बढ़ता आकर्षण भी एक ऐसी प्रवृत्ति है, जो हिंदी के दीर्घकालिक भविष्य के लिए चिंता का विषय बनी हुई है।

भारत की भाषाई विविधता में हिंदी की जगह

यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि हिंदी की मजबूती का मतलब बाकी भारतीय भाषाओं की उपेक्षा नहीं होना चाहिए। बांग्ला, मराठी, तेलुगू, तमिल, पंजाबी जैसी भाषाएं भी करोड़ों लोगों की मातृभाषा हैं और भारत की सांस्कृतिक विविधता की जीवंत मिसाल हैं। हिंदी दिवस का असली संदेश यही होना चाहिए कि हिंदी को उसका हक मिले, लेकिन साथ ही देश की सभी भाषाओं का सम्मान और संरक्षण भी उतना ही जरूरी समझा जाए। भारत की असली ताकत उसकी भाषाई विविधता में ही निहित है।

आगे की राह

आंकड़े साफ बताते हैं कि हिंदी न सिर्फ जीवित है, बल्कि डिजिटल युग में नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ रही है- करोड़ों मातृभाषी, दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी भाषा का दर्जा, इंटरनेट पर दूसरी सबसे लोकप्रिय भाषा की हैसियत और मीडिया-मनोरंजन उद्योग की रीढ़ जैसी उपलब्धियां किसी भी भाषा के लिए गर्व की बात हैं। लेकिन असली चुनौती इस उपलब्धि को संस्थागत और संवैधानिक मान्यता में बदलने की है। सरकारी कामकाज, न्यायपालिका, उच्च शिक्षा और तकनीकी क्षेत्रों में हिंदी के प्रयोग को और सरल तथा व्यावहारिक बनाना होगा, ताकि आम आदमी बिना किसी हीन भावना के अपनी भाषा में काम कर सके।

हिंदी दिवस केवल एक प्रतीकात्मक आयोजन बनकर न रह जाए, बल्कि यह हर साल हमें यह याद दिलाए कि आंकड़ों में जो ताकत हिंदी के पास है, वही ताकत उसे नीति, शिक्षा और शासन के हर स्तर पर भी मिलनी चाहिए। तभी यह दिन सही मायनों में सार्थक होगा- जब हिंदी सिर्फ आंकड़ों में नहीं, बल्कि व्यवस्था में भी उतनी ही मजबूत नजर आएगी।  

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

करियर की अंधी दौड़ में हांफती युवा पीढ़ी: प्रो.संजय द्विवेदी

सोशल मीडिया ने समाज में अलग तरह की स्पर्धा की छवियां प्रस्तुत की हैं। अपने सुखद, आनंद के क्षणों को वायरल करने की बीमारी दूसरे की पीड़ा का कारण बन जाती है।

Samachar4media Bureau by
Published - Monday, 07 September, 2026
Last Modified:
Monday, 07 September, 2026
sanjaydwivedi

प्रो.संजय द्विवेदी, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष।

भारत युवाओं का देश है। जाहिर है ऐसे देश की चिंताएं बहुत अलग होती हैं। उसकी ज्यादातर आबादी को शिक्षा, रोजगार और सुंदर जीवन की कामना होती है। उनकी महत्वाकांक्षाएं, अवसरों की होड़ और दौड़, पाने की खुशी और न मिलने का आक्रोश सब साझा होते हैं। करियर में सफल होने, जल्दी और ज्यादा पाने की कामनाएं इस दौर का मूल्य हैं। ऐसे में शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों को गहरी चुनौती है। संकट के बादल गहरे हैं, समाधान के सूत्र न्यूनतम। सरकारों में नौकरियों के दरवाजे सिकुड़ रहे हैं। ज्यादातर नौकरियां निजी क्षेत्रों में ही हैं।

नौ से पांच बजे की पक्की नौकरियां अब स्वप्न ही हैं। उनकी जगह गिग इकोनॉमी (फ्रीलांस, कॉन्ट्रैक्ट वर्क) ने ले ली है। आर्थिक स्वतंत्रता की तो छोड़िए, यह मॉडल भविष्य की अनिश्चितता और वित्तीय अस्थिरता भी ला रहा है, जिसके नाते बढ़ता मानसिक तनाव और अवसाद संकट को गहरा कर रहा है। हिंदुस्तान अलग तरह से चलता रहा है। परिवार इसकी प्राणवायु रहे हैं। परिवार का कोई एक आदमी नौकरी पर रहता था, शेष अपने घर-इलाके-गांव में बैठकर स्थानीय स्तर पर जो कर सकते थे, करते थे। परिवार की छाया में सुरक्षा थी, संरक्षण था, बच्चों को संस्कारित करने के पारिवारिक उपक्रम थे।

नई व्यवस्था ने एक परिवार में कई परिवार खड़े कर दिए हैं। इससे एक की जगह अब चार परिवार, चार चूल्हे और चार व्यवस्थाएं खड़ी करनी पड़ रही हैं। आप कितना भी कमा रहे हैं, वह कम ही है। इसने नई पीढ़ी को ईएमआई के दुष्चक्र में फंसा कर नई व्यवस्थाओं का गुलाम बना दिया है। परिवार व्यवस्था भारत की संस्कृति का आधार रही है। वह संस्कारशाला भी है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने हमारे सामने नई चुनौतियां पेश की हैं। वे बेहतर सहायक से ज्यादा तनाव के वाहक हैं। युवाओं में एआई के कारण नौकरियां जाने और खुद के अप्रासंगिक हो जाने का भय बैठ गया है।

वे इस पूरे दृश्य को बहुत चिंता से देख रहे हैं। री-स्किलिंग का दबाव उन्हें गहरे भय में डाल रहा है। इससे मानसिक थकान होना स्वाभाविक ही है। इस समय सबसे बड़ी चिंता कार्य और जीवन संतुलन की है। वर्क फ्रॉम होम और डिजिटल कनेक्टिविटी ने सारा कुछ बदलकर रख दिया है। काम के घंटे अब प्रायः 24 घंटे ही हैं। देर रात तक ई-मेल, रिपोर्ट्स और मैसेज का जवाब देते हुए युवा ‘ऑलवेज ऑन’ मोड में रहते हैं, जिससे पारिवारिक जीवन, व्यक्तिगत समय और नींद सब प्रभावित हो रही है। बर्नआउट की बढ़ती दर, काम के अनिश्चित घंटे, स्पर्धा का वातावरण और टारगेट पूरे करने का दबाव साथ चलता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने बर्नआउट को प्रोफेशनल बीमारी मान लिया है। यह अब भारतीय कॉरपोरेट जगत में एक अनिवार्य समस्या बन गई है। सोशल मीडिया ने समाज में अलग तरह की स्पर्धा की छवियां प्रस्तुत की हैं। अपने सुखद, आनंद के क्षणों को वायरल करने की बीमारी दूसरे की पीड़ा का कारण बन जाती है। किसी की बड़ी पदस्थापना, उसकी पार्टियां, रील्स, पर्यटन की तस्वीरें, महंगी जीवनशैली का विज्ञापन करना, सफलताओं के हाइलाइट्स देखकर तुलना और स्पर्धा की बातें तेज होती हैं। इससे हीनभावना और तनाव का जन्म भी होता है।

परिजन और बच्चे भी अपने पालकों से ऐसी ही जीवनशैली की अपेक्षा करते हैं। ऐसे समय में युवाओं के लिए तनाव प्रबंधन की विधियां समझने और उन्हें जीवन की ठोस सच्चाइयों से जोड़ने की जरूरत है। योग, ध्यान के अनेक अभ्यास जीवन में शांति ला सकते हैं। जिंदगी के हमारे दृष्टिकोण में परिवर्तन ला सकते हैं। रील्स की तुरंतवादी जीवनशैली और जीवन के सतत संघर्ष को समझने की जरूरत है। सोशल मीडिया से प्रक्षेपित हो रही छवियों से प्रभावित होने के बजाय, लोगों के संघर्ष और उससे उपजी सफलताओं के पाठ भी पढ़े जाने चाहिए।

नए समय ने युवाओं को उद्यमिता के गुर दिए हैं। यह पीढ़ी जोखिम उठाने और सफलताओं के नए शिखर छूने वाली पीढ़ी है। इसके मंत्र अलग हैं। वे जल्दी से सफलताओं के नए क्षितिज को छूना चाहते हैं। छू भी रहे हैं। कम आयु में उनकी सफलताएं विस्मित करने वाली हैं। उनके स्टार्टअप धूम मचा रहे हैं। सफलता की बड़ी कहानियां लिख रहे हैं। प्रेरित कर रहे हैं। इसके दूसरे पक्ष का विचार भी जरूरी है।

हमें पता है कि 90 प्रतिशत से अधिक स्टार्टअप शुरुआती सालों में ही अन्यान्य कारणों से विफल हो जाते हैं। विफलता का डर, निवेशकों का दबाव, फंडिंग का संकट संस्थापकों और शुरुआती कर्मचारियों में मानसिक तनाव पैदा कर ही देता है। इतने बड़े देश में हर साल लाखों युवा हाथ काम मांगने के लिए खड़े हो जाते हैं। उनके पास डिग्रियां भी होती हैं, किंतु वे कौशलयुक्त नहीं होते। वे डिग्रीधारी हैं, किंतु किसी काम के नहीं हैं। बाजार की जरूरतें अलग हैं, उनके कौशल अलग हैं। ऐसे में बहुत योग्य लोगों को भी अपेक्षित नौकरी नहीं मिल पाती, अच्छे वेतन की तो जाने ही दीजिए।

युवाओं के ज्यादातर संकट वास्तविक हैं। वे जानकारी से भरपूर हैं, उनके पास अवसरों का जनतंत्र है। आकांक्षाओं की बाढ़ है। वे सूचनाओं से लदे-फंदे हैं। यह ज्यादा सूचनाएं भी दुख और भ्रम का कारण बन रही हैं। आकांक्षाओं का बड़ा आकाश उतनी ही गहरी निराशा लेकर लाता है। यह साधारण नहीं है कि आईआईटी के विद्यार्थी आत्महत्या कर रहे हैं। ऐसे प्रतिभाशाली विद्यार्थियों का अवसान उनके परिवार, देश और समाज के लिए भी बड़ी क्षति है। परीक्षाओं में मिलती असफलताएं, लीक होते प्रश्नपत्र, परीक्षाओं की नष्ट होती शुचिता, सरकारी-प्रशासनिक तंत्र की कदाचार रोकने की विफलताओं ने युवाओं को गहरी चिंताएं दी हैं।

शिक्षा के निजीकरण और उससे उपजे बाजारीकरण ने हालात बहुत बदल दिए हैं। महंगी शिक्षा के लिए परिवार कर्ज में डूब रहे हैं। प्रतिभा पलायन का संकट तो है ही। समाज में यह बात बहुत गहरे पैठ रही है कि इस देश में प्रतिभाशाली युवाओं की जगह नहीं बची है। यह तथ्य नहीं, किंतु गहराई से फैलती धारणा है। आप बिना जुगाड़ के इस व्यवस्था में सफल नहीं हो सकते। किसी राष्ट्र जीवन में ऐसी धारणाएं ठीक नहीं हैं।

हमें समझना होगा कि राष्ट्र से हम सबकी सामूहिक आकांक्षाएं, साझा प्रयासों से ही फलीभूत होंगी। भारत की आजादी के आठ दशक अभूतपूर्व प्रगति, एकत्व और जीवंत लोकतंत्र के प्रमाण हैं। हर राष्ट्र जीवन में चुनौतियां होती हैं, उससे जूझकर हम अपने संकटों का हल खोजते हैं। देश की युवा पीढ़ी भी अपने संकटों के बीच इस राष्ट्र जीवन के समक्ष उपस्थित प्रश्नों के ठोस और वाजिब हल जरूर तलाशेगी। युवा शक्ति की तेजस्विता, नवाचारों और आत्मविश्वास को देखकर यह विश्वास सहज ही होता है।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

जीडीपी बढ़ी, फिर भी लोग भरोसा क्यों नहीं कर रहे? पढ़िए हिसाब-किताब

अब आइए रोज़गार पर। सरकार के आँकड़े कहते हैं कि अगर 100 लोग लेबर फ़ोर्स में हैं तो सिर्फ़ 23 लोगों के पास सैलरी वाली नौकरी है, जबकि 43 लोग अब भी खेतों में काम कर रहे हैं।

Samachar4media Bureau by
Published - Monday, 07 September, 2026
Last Modified:
Monday, 07 September, 2026
gdpgrowth

मिलिंद खांडेकर, वरिष्ठ पत्रकार।

जीडीपी के आँकड़े पर बहस छिड़ी हुई है कि 2.6% हुई है या 7.8%? हफ़्ते भर पढ़ने-लिखने के बाद मैं इतना तो कह सकता हूँ कि 2.6% की गिनती ग़लत है। 7.8% के आँकड़े को भी ग़लत मानने का कोई कारण मुझे नहीं मिला। फिर भी सोशल मीडिया पर लोग मान नहीं रहे हैं कि 7.8% ग्रोथ हुई है? हिसाब-किताब में समझेंगे कि लोग विश्वास क्यों नहीं कर रहे हैं?

जीडीपी की बहस को ब्लैक एंड व्हाइट में देखेंगे तो समझ नहीं पाएँगे। सरकार के आँकड़े मोटे तौर पर सही हैं, लेकिन जनता महसूस नहीं कर रही है। इसका कारण यह ग़लतफ़हमी है कि जीडीपी ग्रोथ का मतलब इनकम ग्रोथ है। अच्छी ग्रोथ से इनकम बढ़ना चाहिए, लेकिन यह बढ़ोतरी असमान होती है। किसी को ज़्यादा मिलती है तो किसी को कम। फिर हमारी प्रति व्यक्ति आय भी कम है। हमारी और ब्रिटेन की जीडीपी लगभग बराबर है। जीडीपी अगर 12 इंच का पिज़्ज़ा है तो वो ब्रिटेन में एक आदमी खा रहा है, वहीं भारत में वो 20 लोगों में बंट जाता है। हरेक व्यक्ति के हिस्से में छोटा स्लाइस आ रहा है।

अब आइए रोज़गार पर। सरकार के आँकड़े कहते हैं कि अगर 100 लोग लेबर फ़ोर्स में हैं तो सिर्फ़ 23 लोगों के पास सैलरी वाली नौकरी है, जबकि 43 लोग अब भी खेतों में काम कर रहे हैं। बाकी लोग स्वरोज़गार कर रहे हैं या दिहाड़ी मज़दूरी। विकसित देशों में सैलरी पर काम करने वाले लोगों की संख्या 80-90 होती है। चीन आबादी के लिहाज़ से लगभग हमारे बराबर है, वहाँ खेतों में सिर्फ़ 22 लोग काम कर रहे हैं।

खेतों से लोगों को निकाले बिना समृद्धि नहीं आ सकती है। इसमें दिक़्क़त है कि सर्विस सेक्टर में उतनी ज़्यादा संख्या में नौकरियाँ नहीं हैं, जबकि मैन्युफ़ैक्चरिंग में हम पिछड़ गए हैं। मैन्युफ़ैक्चरिंग का जीडीपी में योगदान 16-17% पर अटका हुआ है, जबकि मेक इन इंडिया जैसी स्कीम लाई गई थी।

बात सिर्फ़ रोज़गार की नहीं है। सरकार के आँकड़े ही कहते हैं कि पिछले पाँच सालों में लोगों की आमदनी तो बढ़ी है, लेकिन बढ़ी हुई आमदनी महंगाई खा जा रही है। इससे लोगों को लगता है कि हम तो जहाँ थे, वहीं पर अटके पड़े हैं। यह भावना कोई नई नहीं है। पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा को हजारीबाग में उनके वोटरों ने कहा था कि हम जीडीपी को खाएँगे क्या? यह 2004 चुनाव की बात है। लोगों को आँकड़ों से मतलब नहीं है, उन्हें अपनी ज़िंदगी बेहतर करने से मतलब है।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

दलित राजनीति की दीवारों पर खून के पुराने गहरे दाग मिटाना कठिन: आलोक मेहता

खरगे की रैली के बाद कथित मंच शुद्धिकरण के प्रयास का मुद्दा उठाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इस अपमान पर पुलिस में प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज किए जाने की मांग की।

Samachar4media Bureau by
Published - Monday, 07 September, 2026
Last Modified:
Monday, 07 September, 2026
aalokmehta

आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।

उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड चुनाव से पहले राहुल गांधी और कांग्रेस ने दलित राजनीति के दांवपेंच शुरू कर दिए। हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की रैली के बाद हुए कथित 'शुद्धिकरण' (हवन) विवाद पर मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी ने दोषियों पर एफआईआर दर्ज करने का अजीबोगरीब अभियान चला दिया। खरगे की रैली में क्या कोई हमला हुआ? अगले दिनों उसी मैदान में कार्यक्रम से पहले हुई सफाई, पूजा इत्यादि में खरगे के विरुद्ध गालियों या तंत्र-मंत्र की कोई रिकॉर्डिंग या अन्य सबूत राहुल के पास हैं?

अब तक तो सामने नहीं आए। फिर भी खरगे और उनके नेता राहुल गांधी लगातार दलित अपमान पर संसद से सड़क तक हाहाकार कर रहे हैं। राहुल ने तो प्रेस कॉन्फ्रेंस और सोशल मीडिया में इस मुद्दे को तूल देते हुए आरोप लगाया कि आज भी हर जगह दलितों का अपमान हो रहा। खरगे की रैली के बाद कथित मंच शुद्धिकरण के प्रयास का मुद्दा उठाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इस अपमान पर पुलिस में प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज किए जाने की मांग की।

भारत में यह पहला अवसर है, जब प्रतिपक्ष का शीर्ष नेता एक दिन एफआईआर दर्ज कराने या दूसरे दिन दो सौ एफआईआर रद्द करने के लिए पीएम निवास तक धरना देने लगे, जैसे एफआईआर पीएम मंत्रियों के दफ्तरों में दर्ज होती हो। बाईस वर्षों की सांसदी और अदालतों में हाजिरी लगाने के बावजूद उन्हें नहीं पता कि प्राथमिकी शिकायत मात्र है, न सबूत है और न ही सजा? फैसला वर्षों बाद अदालत में होगा। मतलब जनता में भ्रम से भड़काने की राजनीति के अलावा कुछ नहीं।

दूसरी तरफ भाजपा का कहना है कि इस घटना का किसी जाति से कोई लेना-देना नहीं है। उनका दावा है कि रैली के बाद वहां गंदगी छोड़ी गई थी और कुछ लोगों ने केवल उस जगह की सफाई के उद्देश्य से धार्मिक प्रक्रिया की थी। वह संगठन भी पार्टी का नहीं है। इसके साथ ही, भाजपा ने कांग्रेस पर इस मुद्दे को लेकर विभाजनकारी राजनीति करने और दलित समाज को राजनीतिक टूल की तरह इस्तेमाल करने का आरोप लगाया है।

यह मामला कानूनी रूप ले चुका है। अब तो हवन में शामिल दलित युवक ने ही राहुल गांधी द्वारा नफरत फैलाने के खिलाफ शिकायतें दर्ज करा दी हैं। स्वाभाविक है, इस तरह के मामले कानूनी गलियारों में वर्षों तक घूमते रह सकते हैं। इसीलिए पिछले दिनों वाराणसी से एक वरिष्ठ पत्रकार ने मुझे फोन करके कहा कि 'विपक्ष के लिए चुनाव में सदा गुंजाइश है, लेकिन राहुल और उनके सलाहकार इतना भी नहीं समझते कि दीवारों पर वर्षों पहले लगे दाग आसानी से नहीं हटते। और इस देश के गरीब दलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक कम शिक्षित होने पर भी कांग्रेस राज में हुए अत्याचार आसानी से नहीं भूल पाते। दलितों पर हुए अत्याचार के रिकॉर्ड की रिपोर्ट्स और संपादकीय टिप्पणियां उपलब्ध हैं।'

सचमुच इस मुद्दे पर मुझे पिछले दशकों में अपनी रिपोर्ट्स और टिप्पणियों की फाइल का ध्यान आ गया। खरगे इस समय कांग्रेस के अध्यक्ष हैं और दलित नेता के मान-अपमान के मुद्दे पर कांग्रेस के ही शीर्ष दलित नेता माने जाने वाले बाबू जगजीवन राम को याद किया जाना चाहिए। वह भी सत्तर के दशक में पार्टी के अध्यक्ष थे और वरिष्ठ मंत्री रहे।

पत्रकार के नाते 1972 से लगातार उनसे मिलने, बात करने के अवसर मिले। आपातकाल की ज्यादतियों और दलितों की हालत से दुखी रहने के कारण 1977 में चुनाव की घोषणा के साथ उन्होंने विद्रोह कर दूसरे बड़े नेता हेमवतीनंदन बहुगुणा के साथ नई पार्टी बनाई। वहीं जनता पार्टी में भी पुरानी संगठन कांग्रेस के अधिकांश कांग्रेसी नेता थे। लेकिन उन कांग्रेसियों ने भी जगजीवन राम को प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया।

उपप्रधानमंत्री पद दिलवाने के लिए कई दिनों तक उनके निवास के बाहर और अन्य ठिकानों पर समर्थकों के प्रदर्शनों की रिपोर्ट मेरी फाइल में आज भी रखी है। तब तो उन्हें इंदिरा कांग्रेस ने विद्रोही करार दिया था। लेकिन 1979 में जनता पार्टी के टूटने पर भी उपप्रधानमंत्री पद पर रहे सबसे अनुभवी नेता जगजीवन राम के बजाय इंदिरा कांग्रेस ने श्रीमती गांधी को जेल भिजवाने वाले चौधरी चरण सिंह को समर्थन देकर प्रधानमंत्री बनवाया।

चरण सिंह पर इंदिरा गांधी और उनके पुत्र संजय गांधी के विरुद्ध चल रहे मामलों को लेकर दबाव था। चरण सिंह ने इन मामलों को वापस लेने से इनकार किया। परिणामतः इंदिरा कांग्रेस ने विश्वासमत से ठीक पहले समर्थन वापस ले लिया और चरण सिंह को इस्तीफा देना पड़ा। जगजीवन राम ने दावा किया कि वे बहुमत जुटा सकते हैं। वे विपक्ष/जनता गठबंधन के नेता थे और उनके पास काफी सांसदों का समर्थन था। तब जगजीवन राम को मौका क्यों नहीं मिला? इसलिए दलित नेताओं का उपयोग और अपमान का रिकॉर्ड क्या भुलाया जा सकता है? आज भी क्या कांग्रेस पार्टी राहुल गांधी के बजाय खरगे को अगले प्रधानमंत्री की तरह पेश कर रही है?

जहाँ तक दलितों पर अत्याचार की बात है, दलितों के सामाजिक और राजनीतिक अधिकारों का प्रश्न केवल संविधान और कानूनों का प्रश्न नहीं रहा है। प्रश्न है—जब इन घटनाओं के समय कांग्रेस की सरकार थी, तब प्रशासन और राजनीतिक नेतृत्व ने क्या किया? कांग्रेस सरकार के अधीन पुलिस प्रशासन ने दलित नागरिकों की रक्षा क्यों नहीं की और दोषियों को दंड दिलाने में कितनी सफलता मिली?

शायद 1978 के बाद बिहार में दलितों पर हुई हिंसा से जुड़े चर्चित बेलछी कांड के समय श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा सहानुभूति जताने और दोषियों को दंडित कराने की मांग से उनकी राजनीतिक वापसी होने की बात राहुल को समझाई गई होगी। लेकिन सत्ता की वापसी केवल एक घटना से नहीं हुई थी। बड़ा कारण जनता पार्टी का बिखरना और एक हद तक कांग्रेस की पुरानी संगठन क्षमता थी।

आज संगठन कहाँ है? अत्याचार में उत्तर प्रदेश और बिहार में कांग्रेस राज में दलितों पर सर्वाधिक हिंसक हमले हुए और अपराधियों को कांग्रेस नेताओं के संरक्षण के आरोप रहे। पराकाष्ठा यहाँ तक रही है कि दलितों के हत्याकांड के पीछे कांग्रेस नेता के हाथ का आरोप रहते उस पूर्व सांसद को पार्टी ने राष्ट्रपति पर दबाव डालकर राज्यसभा में नामजद श्रेणी में फिर से सांसद तक बनवा दिया। राष्ट्रपति ने एक बार प्रस्ताव पर सहमति न देकर फाइल लौटा दी थी। तब दोबारा भेजी गई और उन्हें दस्तखत करना पड़े। तत्कालीन राष्ट्रपति ने स्वयं यह बात दुखी स्वर में बताई थी।

असल में दलितों के सामाजिक और राजनीतिक अधिकारों का प्रश्न केवल संविधान और कानूनों का प्रश्न नहीं रहा है। शायद राहुल गांधी को 1978 में बिहार में दलित हिंसा के बेलछी कांड से इंदिरा गांधी की वापसी के रास्ते की बात समझाई जाती होगी। लेकिन उनकी वापसी एक घटना में सहानुभूति जताने से नहीं, बल्कि जनता पार्टी बिखरने और कांग्रेस की पुरानी संगठन क्षमता से हुई। आज क्या उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे राज्यों में कांग्रेस की संगठन क्षमता है? यही नहीं, दलित बस्तियों में आज भी कांग्रेस राज में हुई हिंसा की बातें दुःख से सुनाई-बताई जाती हैं।

1980 में कांग्रेस बिहार में सत्ता में लौटी। मुख्यमंत्री बने जगन्नाथ मिश्र। इसी दौर की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में पिपरा नरसंहार है। 25 फरवरी 1980 को जहानाबाद क्षेत्र के पिपरा गांव में दलित बस्ती पर हमला हुआ। अनेक घर जला दिए गए और महिलाओं तथा बच्चों सहित दलितों की हत्या की गई। रिपोर्ट में पांच महिलाओं, तीन वयस्क पुरुषों और छह बच्चों सहित 14 मृतकों का उल्लेख है। 1985–86 का दौर कांग्रेस शासन में मध्य बिहार के सबसे गंभीर जातीय संघर्षों में से था। 1987 में नोनाही-नगवां में दलितों की हत्या हुई। जून 1987 की घटना में 18 दलितों के मारे जाने का उल्लेख मिलता है।

2004 में केंद्र में यूपीए सरकार बनी। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह थे और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी। इस दशक में भी कई कांग्रेस-शासित राज्यों में दलित अत्याचार के बड़े मामले सामने आए। 29 सितंबर 2006 को महाराष्ट्र के भंडारा जिले के खैरलांजी गांव में भोतमांगे परिवार के चार सदस्यों की हत्या। सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड में परिवार के सदस्यों और उनकी अनुसूचित जाति पहचान का स्पष्ट उल्लेख है।

हरियाणा में कांग्रेस के सत्ता काल में 2005 का गोहाना कांड सामने आया। दलित/वाल्मीकि बस्ती के अनेक घरों को आग लगा दी गई। 21 अप्रैल 2010 को हिसार जिले के मिर्चपुर गांव में हिंसक भीड़ ने वाल्मीकि दलित बस्ती के घरों में आग लगा दी। दिल्ली की अदालत में दर्ज न्यायिक रिकॉर्ड के अनुसार 18 दलित घर जलाए गए और एक 60 वर्षीय व्यक्ति तथा उसकी दिव्यांग बेटी आग में जलकर मारे गए।

प्रश्न यह है कि कांग्रेस सरकार के अधीन पुलिस प्रशासन ने दलित नागरिकों की रक्षा क्यों नहीं की और दोषियों को दंड दिलाने में कितनी सफलता मिली? 2004 से 2014 तक अविभाजित आंध्र प्रदेश में कांग्रेस की सरकार रही। 2004–14 के दौरान दलितों पर अत्याचार के अपराध के 42,060 मामले दर्ज हुए, जिनमें 539 हत्या और 1,084 बलात्कार के अपराध के रिकॉर्ड सरकारी अपराध ब्यूरो में दर्ज हैं। इस हिसाब-किताब को देखते हुए राहुल गांधी की दलित राजनीति से उनकी पार्टी के लिए होने वाले खतरों को देखा जा सकता है।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

नग़मा सहर के NDTV छोड़ने पर संजय किशोर बोले-कुछ आवाजें एक दौर की पहचान बन जाती हैं

वरिष्ठ टीवी पत्रकार और लोकप्रिय न्यूज एंकर नग़मा सहर के एनडीटीवी से विदा लेने के बाद वरिष्ठ पत्रकार संजय किशोर ने उनके साथ करीब 20 साल तक काम करने के अनुभव साझा किए हैं।

Samachar4media Bureau by
Published - Monday, 31 August, 2026
Last Modified:
Monday, 31 August, 2026
Sanjay Kishore Ji

वरिष्ठ टीवी पत्रकार और लोकप्रिय न्यूज एंकर नग़मा सहर के एनडीटीवी से विदा लेने के बाद वरिष्ठ पत्रकार संजय किशोर ने उनके साथ करीब 20 साल तक काम करने के अनुभव साझा किए हैं। संजय किशोर ने सोशल मीडिया पर लिखी अपनी पोस्ट में नग़मा सहर की पत्रकारिता, एंकरिंग के अंदाज़ और उनके शांत एवं गरिमापूर्ण व्यक्तित्व को याद किया है। उन्होंने नग़मा के साथ अपने लंबे जुड़ाव के कई अनुभव साझा करते हुए उनके आगे के सफर के लिए शुभकामनाएं भी दी हैं।

संजय किशोर ने अपनी पोस्ट में लिखा है-

नग़मा ने भी उस ‘सहर’ को छोड़ दिया

नग़मा सहर। तक़रीबन बीस साल साथ काम किया। इतने लंबे साथ में किसी इंसान को सिर्फ़ सहकर्मी की तरह नहीं, उसकी शख़्सियत की कई परतों के साथ जानने का मौक़ा मिलता है। नग़मा को भी कुछ ऐसा ही जाना।

एक ऐसी शख़्सियत, जिसे न कभी आपा खोते देखा, न खुलकर ठहाके लगाते हुए। ग़म में ग़मगीन नहीं और ख़ुशी के मौक़े पर भी जश्न में अपनी गरिमा खोते हुए नहीं। शांत आवाज़, संयमित भाषा, बातों में ठहराव, चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान और वह ट्रेडमार्क डिंपल।

और फिर उनका एंकरिंग का अपना एक अलग अंदाज़ था।

जब भी स्पोर्ट्स की कोई बड़ी ख़बर होती, स्टूडियो जाने के ठीक पहले हमसे ब्रीफ़ लेना वह कभी नहीं भूलती थीं। हम अपनी तरफ़ से उन्हें जितना बताते, उतना ही लगता कि अब शायद उन्हें विषय की पूरी जानकारी हो गई होगी। लेकिन ऑन एयर होते ही जब वह डिबेट शुरू करतीं, तो कई बार मन में यही आता था, “हमने तो इन्हें थोड़ा-सा ही बताया था, इन्हें तो पहले से ही सब पता था!”

असल बात यह थी कि वह सिर्फ़ ब्रीफ़ नहीं लेती थीं, उसे आत्मसात करती थीं। सवाल पूछने से पहले विषय को समझती थीं। और यही एक अच्छे एंकर और सिर्फ़ सवाल पूछने वाले एंकर के बीच का फ़र्क़ था।

उनकी एक और बात मुझे हमेशा याद रहेगी। रिपोर्टर हो या कोई सहकर्मी, वह उसे बोलने का पूरा और पर्याप्त मौक़ा देती थीं। अपनी बात मनवाने या अपनी आवाज़ सुनाने की बेचैनी नहीं होती थी। आज के दौर के कई एंकरों की तरह लंबे-लंबे सवालों में ही आधा जवाब ठूँस देने की आदत नहीं थी। वह सवाल करती थीं, फिर सामने वाले को सुनती थीं। सचमुच सुनती थीं।

शायद इसलिए उनकी डिबेट में शोर कम और संवाद ज़्यादा होता था।

और शायद यही वजह थी कि उनकी आवाज़ सिर्फ़ सुनाई नहीं देती थी, ठहरती थी। न्यूज़रूम के शोर में भी उनकी आवाज़ का अपना एक सुकून था। ऊँची आवाज़ के बिना अपनी बात कह देना और बिना हावी हुए अपनी मौजूदगी दर्ज करा देना, यह हुनर हर किसी के पास नहीं होता।

आपने ऐसे समय में पत्रकारिता की अपनी पहचान बनाई, जब टेलीविज़न न्यूज़ धीरे-धीरे आवाज़ की ऊँचाई को पत्रकारिता की ताक़त समझने लगा था। लेकिन आपकी ताक़त हमेशा आपकी आवाज़ की ऊँचाई नहीं, उसका ठहराव और उसकी विश्वसनीयता रही।

पटना वीमेंस कॉलेज से शुरुआत, दिल्ली विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय और फिर ‘हम लोग’ तथा ‘इंटरनेशनल एजेंडा’ जैसे यादगार कार्यक्रमों तक का सफ़र अपने आप में प्रेरणादायक है। लेकिन मेरे लिए आपकी सबसे बड़ी पहचान उन उपलब्धियों से कहीं आगे है।

आप उस दौर की याद हैं, जब न्यूज़ एंकर होना सिर्फ़ स्क्रीन पर दिखाई देना नहीं था। उसमें पढ़ना था, समझना था, सुनना था और सबसे बढ़कर, गरिमा के साथ अपनी बात रखना था।

टेलीविज़न न्यूज़ के उस सुनहरे दौर में आपके साथ इतने वर्षों तक काम करना और आपको इतने क़रीब से देखना मेरे लिए हमेशा एक विशेष अनुभव रहेगा।

और एक साथी पटना वाले के तौर पर, आपके सफ़र पर हमेशा एक अलग तरह का गर्व रहेगा।

नग़मा, आप सचमुच उस शांत, संयमित और गरिमापूर्ण आवाज़ की आख़िरी मज़बूत कड़ी थीं, जो आज के शोर में कहीं खोती जा रही है।

बहुत कुछ बदला, बहुत लोग आए और चले गए। लेकिन कुछ आवाज़ें सिर्फ़ याद नहीं रहतीं, एक दौर की पहचान बन जाती हैं।

आप भी ऐसी ही एक आवाज़ हैं।

आगे का सफ़र और भी ख़ूबसूरत हो, नग़मा।

उसी ठहराव, उसी गरिमा और उसी ट्रेडमार्क डिंपल के साथ।

(वरिष्ठ पत्रकार संजय किशोर की फेसबुक वॉल से साभार)

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए