'वह एक काला दिन था, जब टीवी पर खबरों का संसार रचने वाला शख्स सदा के लिए चला गया'

कोई कहता है कि सफल होने के लिए टैलेंट चाहिए, कोई कहता है कि पैसा चाहिए, कोई कहता है कि अच्छा दिमाग चाहिए।

Last Modified:
Saturday, 27 June, 2020
Nirmalendu

निर्मलेंदु, स्थानीय संपादक
दैनिक भास्कर, उत्तरप्रदेश

कोई कहता है कि सफल होने के लिए टैलेंट चाहिए, कोई कहता है कि पैसा चाहिए, कोई कहता है कि अच्छा दिमाग चाहिए। मैं कहता हूं कि सफल होने के लिए इनमें से कुछ भी नहीं है तो चलेगा, लेकिन नैतिकता और प्रामाणिकता जरूर चाहिए। सच्चा अभिगम चाहिए, काम के प्रति लगाव चाहिए, मेहनत करने का जज्बा चाहिए, लगन चाहिए, अपनी गलती को स्वीकार करने की हिम्मत चाहिए, जीवन में कृतज्ञता और भाव-पूर्णता का संगम चाहिए, कभी न थकने वाला जुनून चाहिए और खुद एवं ईश्वर पर विश्वास चाहिए। अगर इतनी सारी चीजें किसी के पास हैं तो सफलता उनके कदम जरूर चूमेगी। जी हां, ये सभी गुण एसपी सिंह में थे और शायद इसलिए उतनी कम उम्र में वह संपादक रूपी सिंहासन पर आसीन हो सके, जहां अधिकांश लोग पचास के बाद ही पहुंच पाते हैं। 'रविवार' पत्रिका और 'आजतक' चैनल को जन्म देने, उसे बनाने, सजाने और संवारने और दृश्य खबरों के संसार में नई क्रांति लाकर खबरों के संसार में नंबर वन बन बैठे एसपी ने 'आजतक' को ही अपना पूरा जीवन दान कर दिया।

एसपी। जी हां, एसपी यानी मेरे लिए सब कुछ। एसपी सिंह, एक ऐसा नाम जो पत्रकार से ऊपर एक इंसान थे। एक सरल इंसान, स्वाभाविक, मृदुभाषी, कम बोलने वाला हंसता मुस्कुराता हुआ एक चेहरा। छोटा हो या बड़ा, सबसे एक साधारण इंसान की तरह मिलते थे। आप यदि नौकरी मांगने उनके घर जाएंगे, तो आपको नहीं लगेगा कि वह इतने बड़े इंसान हैं। आपके साथ पल्थी मारकर बैठ जाएंगे। आपको माछ भात भी खिलाएंगे, आपके घर की माली हालत के बारे में भी जानेंगे और उसके बाद आपके रेज्यूमे पर गौर करेंगे। मेरे साथ भी कुछ-कुछ ऐसा ही हुआ था। पापा के कहने पर नौकरी मांगने गये थे उनके कोलकाता स्थित श्यामनगर वाले घर में। मेरे पापा के ऑफिस सहकर्मी साउ जी ने इंट्रोड्यूस करवाया था। घर पहुंचे, वो गेट पर ही मिल गये। पहले तो लुंगी पहन कर वे आये। चूंकि दोपहर का समय था तो मुझे माछ भात खिलाया और उसके बाद उन्होंने रेज्यूमे पर चर्चा की। नौकरी मिल गयी और उनके निधन के पहले तक मै उनके साथ छोटे भाई की तरह लगा रहा, लेकिन 27 जून 1997 के दिन वह हमसे बिछड़ गये।

दरअसल, जिस दिन एसपी सिंह का देहांत हुआ, मैं दिल्ली लेट पहुंचा। कोलकाता में अक्षर भारत में काम करते हुए 13 दिनों तक मैं लगातार कोलकाता और दिल्ली का चक्कर काट रहा था। हुआ यह था कि 16 जून की सुबह सुबह पत्रकार शैलेष जी का फोन आया। उन्होंने कहा कि एसपी बीमार हैं। उन्होंने कहा कि निर्मल अभी किसी को कुछ मत बताना। बस, उनके घरवालों का फ्लाइट का टिकट कटवा दो। मैंने कल्याण मजुमदार को कहकर स्पेशल कोटे में बड़े भइया से लेकर सबका टिकट कटवाया, दोपहर की फ्लाइट थी। 27 जून को भी सुबह 11.30 बजे शैलेष जी का फोन आया कि एसपी सिंह नहीं रहे। दरअसल, दूरदर्शन के 11 बजे के बुलेटिन में यह खबर आयी कि एसपी सिंह नहीं रहे। मैं तब कोलकाता में था, लेकिन मुझे दोपहर का टिकट नहीं मिला। शाम की फ्लाइट पांच बजे की थी। वह फ्लाइट लेट हो गयी। सात बजे कोलकाता से छूटी। मैं रात को साढ़े नौ बजे पहुंचा। निजामुद्दीन घाट जाने के लिए स्कूटर में बैठा। रास्ते में स्कूटर चालक ने पूछा कि वहां कहां जाना है तो मैंने कहा कि घाट जाना है। उन्होंने पूछा क्यों? मैंने कहा कि वो एक सज्जन हैं, जिनकी मौत हो गयी है। उन्होंने पूछा कि आजतक वाले। मैंने कहा हां। उन्होंने कहा कि वह सब कुछ तो शाम सात बजे ही खत्म हो चुका है। बाद में जानकारी मिली कि अटल बिहारी वाजपेयी, गुजराल, सीताराम केसरी, जयपाल रेड्डी माधव राव सिंधिया, सुषमा स्वराज सबसे पहले वहां पहुंचे। सबसे बाद में दो मिनट के लिए दिल्ली के सीएम साहब सिंह वर्मा भी वहां पहुंचे थे। आज ये सभी लोग इस दुनिया में नहीं हैं। शायद एसपी के साथ वे भी ऊपर बैठकर गुफ्तगू कर रहे होंगे। खबर सुनकर मुझे लगा कि मेरी दुनिया खत्म हो चुकी है। मैं भइया को देख नहीं पाया। यह दुख, यह पीड़ा आज भी मुझे सताती है, लेकिन थोड़ी देर बाद मुझे इस बात का अहसास हो जाता है कि वो मेरे आसपास हैं। मुझे निहार रहे हैं। मुझे सिखा रहे हैं। मुझे पढ़ा रहे हैं। मुझ पर प्यार बरसा रहे हैं। दरअसल, आज भी उन्हीं की यादों में मेरे दिन की शुरुआत होती है और ऑफिस पहुंचते ही उनकी यादों को दूसरों से बांटने में दिन बीत जाता है।

कुछ लोग दूसरी रिपोर्टों को पढ़कर एसपी सिंह के बारे में कुछ भी लिखते हैं, लेकिन मेरा तो उनके साथ अप्रैल 1977 से संबंध है। उनके बारे मे क्या लिखूं और क्या बताऊं, समझ में नहीं आता। अनगिनत बातें और अनगिनत यादें। 1977 से 1997 तक। बीस साल तक उनके साथ मैं साये की तरह लगा रहा। वे मेरे लिए क्या थे। शायद मैं इसे किसी को समझा नहीं सकता। पथ प्रदर्शक, संपादक, बड़े भाई, पिता या कुछ और। उन्होंने 'रविवार' क्यों छोड़ा, छोड़ने से पहले क्या हुआ, 'आनंद बाजार पत्रिका' के ऑनर अरूप बाबू ने उन्हें कितनी देर तक बिठाकर रखा, अभीक सरकार ने क्या कहा। 'नवभारत टाइम्स' क्यों छोड़ा, उस दिन 'नवभारत टाइम्स' के ऑनर समीर जैन के साथ क्या हुआ था। मैं घर से दौड़ा दौड़ा सुबह-सुबह क्यों उनके घर गया। उन्होंने मुझे उस दिन क्या हिदायत दी थी। जिस दिन उन्होंने 'नवभारत टाइम्स' छोड़ा था, कपिल देव की एजेंसी में क्यों अचानक गये। जॉइन करने से पहले उनकी क्या-क्या बातें हुईं । एजेंसी में जॉइन करने से पहले कपिल देव से वे कब मिले,  'राष्ट्रीय सहारा' में उन्होंने जॉइन क्यों किया और किसके कहने पर किया। चार दिन बाद उन्होंने 'राष्ट्रीय सहारा' कयों छोड़ा? जब मैं और भइया रोज उनके घर से 'राष्ट्रीय सहारा' जाते तो मुझे वे क्या-क्या सलाह देते और मुझे क्या कहते। किस तरह से वह टेलिविजन की दुनिया में गये। अरुण पुरी से क्या-क्या बातें हुईं और मैं कैसे बिछड़ गया, वे सारी बातें आज यादें बनकर रह गई हैं।

जिस दिन वह सदा के लिए हमसे बिछड़ गये, उस दिन की यादें। सच तो ये ही है कि टेलिविजन और प्रिंट की दुनिया में आज जितने भी बड़े नाम हैं, वे सब उन्हीं की देन हैं। संतोष भारतीय, कमर वहीद नकवी, शैलेष दा, जयशंकर गुप्त, अरुण रंजन, उदयन शर्मा, राजेश बादल, रामकृपाल सिंह, संजय पुगलिया, अजय चैधरी, पुण्य प्रसून वाजपेयी, आशुतोष गुप्ता, दीपक चौरसिया, अनिल ठाकुर, राजकिशोर और आजतक के सुप्रिय प्रसाद ऐसे ही बहुत सारे पत्रकार। 'न्यूज24' के ऑनर राजीव शुक्ला भी उन्हीं की देन हैं। हमें पता नहीं कि ये लोग एसपी सिंह को याद करते हैं या नहीं, लेकिन मैं उन्हें किसी न किसी बहाने लगभग रोज याद कर ही लेता हूं। कभी संपादक के रूप में, कभी एक अच्छे इंसान के रूप में, कभी उन्हें लोगों को माफ करने के कारण, कभी एक मसीहा के रूप में, तो कभी एक खबरचीलाल के रूप में, तो कभी दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए एक बड़े भाई के रूप में और कभी पिता के रूप में।

सच तो ये ही है कि मैंने अपनी पूरी जिंदगी में जितनी बातें पिता की नहीं सुनीं, उनकी सुनी हैं। उनकी बातें मेरे लिए ब्रह्म वाक्य थे। और हां, मैं एक नाम लेना तो भूल ही गया। वह नाम है नीरेंद्र नागर का, जो आज भी एसपी की चर्चा चलते ही उन्हें याद करते हैं। उन्होंने ही मेरी लिखी एसपी की किताब के संपादन का भार संभाला और खूब संभाला। मैं आज भी नीरेंद्र नागर को नहीं भूल पाया। इसके साथ ही अरुणरंजन और संतोष भारतीय को भी नहीं भूल पाऊंगा, जो कि उनके साथ साये की तरह लगे रहे। उनके एक और परम मित्र कोलकाता में थे, अक्षय उपाध्याय, वो भी एसपी भइया के पहले ही चले गये और सतन कुमार पांडे को मैं कैसे भूल सकता हूं, क्योंकि उनके साथ उनके कॉलेज के दिनों से ही संबध थे। दोनों मे बहुत ही गहरी मित्रता थी। अंतिम दिनों तक उनके साथ लगे रहे, लेकिन इन लोगों ने एसपी भइया के साथ रहने का दंभ कभी नहीं भरा और चुपचाप दोस्ती निभाते रहे। एक नाम और है, जो अब इस दुनिया में नहीं रहे। आनंद बाजार पत्रिका के बिजित बसु। एसपी भइया के परम मित्रों में से एक और राजदार। राज की बातें उन्हीं से शेयर करते थे।

दरअसल, एसपी भइया के.दो और परम मित्र थे। एमजे अकबर, अंग्रेजी पत्रकारों में एक बड़े ख्याति प्राप्त पत्रकार, उदयन शर्मा जो कि अब नहीं रहे। एसपी सिंह, उदयन शर्मा और एमजे अकबर की दोस्ती 'टाइम्स ऑफ इंडिया' मुंबई से शुरू हुई। ये तीनों विचारों के धनी और दोस्तों के दोस्त। बस यादें रह गयी हैं।

जी हां, यादें ही रह गयी हैं। वह एक काला दिन था, जब टेलिविजन पर खबरों का गजब का संसार रचने वाला एक शख्स हमारे बीच से सदा के लिए चला गया। तब दूरदर्शन ही था, जिसे पूरे देश में समान रूप से सनातन सम्मान के साथ स्वीकार किया जाता था। ये भी एक सच है कि देश के इस राष्ट्रीय टेलिविजन के मेट्रो चैनल की इज्जत एसपी सिंह की वजह से ही बढ़ी थी, क्योंकि वे उस पर रोजाना रात दस बजे खबरें लेकर आते, मुस्कुराते हुए, हंसी ठट्ठा करते हुए, खबरों पर कटाक्ष करते हुए, टीवी के परदे से इस पार झांकते, खबरों को जीते, दृश्यों को शब्द देते और शब्दों को तौलते और बीच बीच में उनका कटाक्ष कभी राजनीतिज्ञों पर, तो कभी ब्यूरोक्रेट्स पर तो कभी विपक्ष पर। सीधा वार। वह समाचार पुरुष खबरों की दुनिया में जो काम कर गया, पत्रकारों को जो इज्जत उन्होंने दी, टेलिविजन जगत में हिंदी पत्रकारिता को जो मुकाम दिया, वह आज तक कोई और नहीं कर पाया।

लेकिन हम सबको इस संसार को एक न एक दिन त्यागना ही पड़ता है। वो भी त्याग कर चले गये, लेकिन वे जरा जल्दी चले गये। हालांकि वे शाही अंदाज में गये। शायद ही ऐसा कोई पत्रकार होगा, जिसे शाही अंदाज मे जाने का मौका मिला हो। हां रफी साब भी जल्दी चले गये थे। मेरे दादा-दादी कहा करते कि जो अच्छे लोग होते हैं, उन्हें भगवान जल्दी बुला लेते हैं। रफी साब को भी जल्दी बुला लिया था। शायद इसलिए इन दोनों को बुला लिया था, क्योंकि भगवान को भी अच्छे लोगों की सोहबत में रहना अच्छा लगता है। गीता में कहा गया है कि जन्म लेने वाले के लिए मृत्यु उतनी ही निश्चित है, जितना कि मृत होने वाले के लिए जन्म लेना। इसलिए जो अपरिहार्य है, उस पर शोक नहीं करना चाहिए। लेकिन किसी की अच्छाइयों को भूल पाना कितना कठिन काम है, यह वही समझ सकता है जिसके साथ यह घटित होता है ...

27 जून 1997 को दूरदर्शन के दोपहर के बुलेटिन पर खबर आई। ये थीं खबरें अब तक। एसपी सिंह नहीं रहे। दुनिया को दुनिया भर की खबरें देने वाला एक खबरची एक झटके में खुद खबर बनकर रह गया। लेकिन दरअसल, यह खबर नहीं थी। एक वार था, एक प्रहार था, जो देश और दुनिया के लाखों दिलों पर बहुत गहरे असर कर गया। शुक्रवार का दिन था। काला शुक्रवार। इतना काला कि वह काल बनकर आया और हमारे एसपी भइया को काल के गर्भ में समा लिया। 27 जून 1997 को भारतीय मीडिया के इतिहास में सबसे दारुण और दर्दनाक दिन कहा जा सकता है। उस दिन से आज तक पूरे 23 साल हो गए। एसपी सिंह हमारे बीच में नहीं हैं, ऐसा बहुत लोग मानते हैं, लेकिन हम नहीं मानते, क्योंकि हमारा मानना है कि वे जिंदा हैं, हम में, आप में, और उन सब में, जो खबरों को खबरों की तरह नहीं, जिंदगी की तरह जीते हैं। हर इंसान की कद्र करते हैं। उन सबमें हम उन्हें देखते हैं, जिन्हें उन्होंने माफ कर दिया।

अनगिनत नाम हैं, जिन्हें उन्होंने माफ कर दिया। मेरे पास उन नामों की लिस्ट भी है, जो एसपी के पीछे उन्हें कोसते थे और एसपी भइया के सामने आते ही बिल्ली की तरह मिमियाते थे। एसपी भइया ने जिस तरह से समाज को दिया, जो प्यार और सरल स्वभाव लोगों में बांटा, जिस तरह से जर्नलिस्ट्स की एक कौम को आगे बढ़ाया, वे अद्भुत, अतुलनीय, अकाट्य और अस्वाभाविक है। वे सिखा ही रहे थे कि हमें छोड़कर चले गये। अपने जीवन के आखिरी न्यूज बुलेटिन में बाकी बहुत सारी बातों के अलावा एसपी भइया ने तनिक व्यंग्य में कहा था, मगर जिंदगी तो अपनी रफ्तार से चलती रहती है। जी हां, जिंदगी अपनी रफ्तार से चलती रहती है। दरअसल, रात के दस बजे पूरे देश को जिस खिचड़ी दाढ़ी वाले चेहरे ने खबरों के माध्यम से जागृति पैदा की थी, वह शख्स चला गया। देश के लाखों लोगों के साथ अपने लिए भी वह सन्न कर देने वाला प्रहार था।

संगीत प्रेमी थे। सूफी संगीत प्रेमी, लेकिन बांग्ला और हिंदी गीतों को भी वे सुनते थे। मैं जब रफी साब का कोई गीत गुनगुनाता तो मुझे कहते कि निर्मल तुम बहुत अच्छा गाते हो। मजाक में व्यंग्य भी करते ... क्योंकि वह भी उनकी एक शैली थी। कहते-कहां तुम 'रविवार' में पड़े हो, तुम्हारे लिए तो मुंबई ही ठीक है। बस, ये ही कहते-कहते वे हमसे बिछड़ गये। मैं आज कुछ भी नहीं हूं, लेकिन मैं जो कुछ भी हूं, उनके कारण ही हूं। उनके सिखाये हुए कदमों पर ही चलने की कोशिश कर रहा हूं। एक नेक इंसान बनने की कोशिश् कर रहा हूं। मैं नहीं जानता उनका पांच प्रतिशत भी मैं बन पाउंगा या नहीं, लेकिन आज भी मेरी कोशिश जारी है उन्हें छूने की, उनसे बात करने की निर्मल बुलाते ही दौड़कर उन तक पहुंचने की। दरअसल, उनको किसी भी चीज का लोभ नहीं था। निर्लोभी थे। धन, दौलत, राजसी ठाट बाट, अहंकार को उन्होंने कभी नहीं ओढ़ा। उन्होंने काम करने की आजादी दी और मैं आजादी का फायदा उठाकर सीखता गया, सीखता गया, और सीखता गया। आज उनके जाने के बाद मुझे वह गीत याद आ गया। ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है...

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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भारतीय संसदीय पत्रकारिता के नजरिये से यह एक बड़ा नुकसान है मिस्टर मीडिया!

तो फैसला हो ही गया। दो-ढाई बरस से इस पर कवायद चल रही थी कि भारत की संसद को आखिर दोनों सदनों के लिए अलग-अलग चैनल क्यों चाहिए?

राजेश बादल by
Published - Tuesday, 02 March, 2021
Last Modified:
Tuesday, 02 March, 2021
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।  

तो फैसला हो ही गया। दो-ढाई बरस से इस पर कवायद चल रही थी कि भारत की संसद को आखिर दोनों सदनों के लिए अलग-अलग चैनल क्यों चाहिए? यह बहस सोलह बरस पहले भी चली थी, जब लोकसभा टेलिविजन प्रारंभ करने का निर्णय हुआ था। उस समय भी भारतीय जनता पार्टी का रुख राज्यसभा के अपने अलग चैनल के पक्ष में नहीं था। इसलिए भैरोंसिंह शेखावत के उप राष्ट्रपति रहते इसकी फाइल ठंडे बस्ते में पड़ी रही। वे राज्यसभा के सभापति भी थे। इस वजह से अंतिम निर्णय का हक भी उन्हीं का था। उनके बाद आए उप राष्ट्रपति मोहम्मद हामिद अंसारी ने इसमें रुचि ली और भारत संसार के उन चंद मुल्कों में शुमार हो गया, जिनके दोनों सदनों के अपने अलग-अलग चैनल थे।

इन पंक्तियों के लेखक को संस्थापक, कार्यकारी संपादक और कार्यकारी निदेशक के रूप में राज्यसभा का अपना चैनल शुरू करने का सुअवसर मिला। बताने की जरूरत नहीं कि चैनलों के घटाटोप में यह बेहद चमकदार और धमाकेदार था। इसे करोड़ों दर्शकों का प्यार मिला और इसकी ख्याति समंदर पार जा पहुंची थी। आज जिस काम के लिए निजी चैनल साल भर में दो-ढाई सौ करोड़ रुपये खर्च करते हैं, वही काम सत्तर-अस्सी करोड़ रुपये साल में हम लोग करते रहे। राज्यसभा टीवी की चर्चाओं में सभी दलों का प्रतिनिधित्व होता था। इसके बुलेटिन प्रामाणिक थे। कला-संस्कृति पर इसके कार्यक्रम बेजोड़ थे और हिन्दुस्तान में पहली बार पंद्रह करोड़ से अधिक आदिवासियों को इस चैनल ने स्वर दिया था।

लेकिन यह वक्त अब इस चैनल के गीत गाने का नहीं है और न ही मातम का है। भारतीय शिक्षा प्रणाली की गाड़ी वैसे ही पटरी से उतरी हुई है और जीवन के हर क्षेत्र के पेशेवरों को गणतंत्र की कोई बुनियादी शिक्षा नहीं देती। ऐसी सूरत में लोकतंत्र के सर्वोच्च मंदिर संसद की जिम्मेदारी बनती थी कि वह हिन्दुस्तान के संवैधानिक ढांचे के बारे में जन-जन को जागरूक करे और अपनी शासन प्रणाली की बारीकियों को गंभीरता से समझाए। यही काम लोकसभा और राज्यसभा टीवी कर रहे थे। संसद चैनल जब अस्तित्व में आएगा तो कई मुश्किलें बढ़ जाएंगी। दोनों सदनों के करीब आठ सौ सांसदों की आवाज के साथ न्याय कठिन हो जाएगा। इसके अलावा साल भर काम करने वाली दर्जनों समितियों का कामकाज आम नागरिक तक संप्रेषित करने में बाधा आएगी। जागरूक और जिम्मेदार लोकतंत्र बनाने की दिशा में उठाए गए कदम थम जाएंगे। क्या इससे आम अवाम को प्रशिक्षित करने की गति मंद नहीं पड़ जाएगी?

भारतीय संसदीय पत्रकारिता के नजरिये से यह एक बड़ा नुकसान है। अफसोस कि मौजूदा दौर में समाज की ओर से जायज, पेशेवर और नैतिक हस्तक्षेप भी बंद हो गया है। किसी भी लोकतंत्र में अगर सामाजिक भागीदारी नहीं हो तो उसके विकलांग होने में देर नहीं लगती। जागरूक नागरिक का कर्तव्य सिर्फ वोट डालना ही नहीं है। यह कोई किराने की दुकान नहीं है, जिसका कभी भी शटर गिरा दिया जाए। समाज का अंग होने के नाते पत्रकारिता का दखल भी इसमें होना जरूरी है मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

भारतीय पत्रकारिता को यह तथ्य समझने की आवश्यकता है मिस्टर मीडिया!

मिस्टर मीडिया: आजादी के बाद पहली बार बनी है पत्रकारिता के लिए ऐसी स्थिति

इन प्रपंचों ने भी पत्रकारों की साख को बहुत धक्का पहुंचाया है मिस्टर मीडिया!

मिस्टर मीडिया: कुछ इस तरह की चाहिए एक मीडिया काउंसिल!

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एंटी सोशल मीडिया पर लगाम का पहला कदम है ये: आलोक मेहता

दुनिया के लोकतांत्रिक देशों में मीडिया के लिए मार्गदर्शी नियम कानून हैं और उनका पालन बहुत हद तक होता है।

आलोक मेहता by
Published - Monday, 01 March, 2021
Last Modified:
Monday, 01 March, 2021
Social Media

आलोक मेहता, वरिष्ठ पत्रकार।।

मीडिया के नाम पर नंगे नाच और अराजकता के ढोल बजाने पर अंकुश के नए नियम सामने आने के कुछ घंटे बाद से हाहाकार मच गया। मानो पहाड़ टूट गया, जमीन फट गई, मीडिया को बेड़ियों से जकड़ दिया, लोकतंत्र खत्म और तानाशाही आ गई।  टीवी समाचार चैनलों पर कुछ गंभीर मुद्दे भी उठे, लेकिन मनमानी और स्वछंदता के कुछ समर्थक गुस्से और नकली रोने में सही बात न तो कहने देते हैं और सुनने का तो सवाल ही नहीं। जैसे मीडिया की आजादी को केवल वह समझते हैं और उसके उपयोग का एकाधिकार उनका ही है। चैनल पर समय सीमा है, इसलिए ट्विटर, इंस्टाग्राम, फेसबुक, वेबसाइट, यूट्यूब इत्यादि हैं और नए नियम तीन महीने बाद लागू हो सकते हैं। इस बीच इनमें से कुछ चतुर सुजान विदेशों से वैध या अवैध फंड जुटा लेंगे, ताकि नियम कानून के खिलाफ अभियान चला सकें। जो असहमत हों और नियमों को सही ढंग से लागू करने की हिमायत और आवश्यक सुधार के सकारात्मक सुझाव दें, उन्हें सत्ता के दलाल, चाटुकार आदि गालियां देकर अपने प्लेटफार्म पर रोएं-चिल्लाएं।

दुनिया के लोकतांत्रिक देशों में मीडिया के लिए मार्गदर्शी नियम कानून हैं और उनका पालन बहुत हद तक होता है। नियम तोड़ने पर विश्व मीडिया सम्राट मर्डोक को लंदन में अपना एक अखबार तक बंद करना पड़ा, अमेरिका में गलत और मानहानि के मामलों पर करोड़ों डॉलर का जुर्माना देना पड़ता है। हमसे काबिल कथित मीडिया संपादक, प्रकाशक और विशेषज्ञ क्या पिछले सत्तर वर्षों में किसी मीडिया संस्थान द्वारा करोड़ों न सही लाखों का जुर्माना भरे जाने और तीन साल न सही, दस महीने जेल में रखे जाने का विवरण दे सकते हैं? प्राथमिकी, नोटिस, मुकदमे आदि में वर्षों लगने और न्याय पालिका की उदारता अथवा आपसी समझौते से मामला निपट जाता है। मानहानि के एक बेहद गंभीर मामले में भी सर्वोच्च अदालत ने प्रतीकात्मक एक रूपये का जुर्माना लगा दिया। शक्ति संपन्न आरोपी तो उस एक रुपये की सजा स्वीकारने को तैयार नहीं हैं। जब कानून के जानकार ही कानून और अदालत का सम्मान करने को तैयार नहीं होंगे, तो दूरदराज बंदूक लिए बैठा नक्सली कुछ भी लिखने बोलने और धमकी-हत्या करने से क्यों चूकेगा?

देश के सूचना-प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर प्रारंभिक काल में पत्रकार रहे है और भले राजनेता हैं, लेकिन लगता है कि इमरजेंसी, सेंसरशिप आदि के काल खंड से विचलित रहने के कारण उन्हें यह गलत धारणा और मंत्री के नाते गलत सूचना है कि वर्तमान प्रेस परिषद् के नियम और मार्गदर्शी आचार संहिता का पालन भारत का संपूर्ण प्रिंट मीडिया कर रहा है। तीन-चार दशक पहले कम से कम अखबार या पत्रिका प्रेस परिषद् द्वारा दोषी ठहराए गए निर्णय किसी पृष्ठ पर छाप देते थे। अब तो वह भी नहीं होता। प्रेस परिषद् के अध्यक्ष पूर्व न्यायाधीश होते हैं, विभिन वर्गों के प्रतिनिधि सदस्य होते हैं। दफ्तर, खर्चें, बैठकें व निर्णय होते भी हैं, लेकिन तमाम प्रभावशाली मीडिया कंपनियां कोई परवाह नहीं करतीं और जरूरत हो तो किसी जूनियर मैनेजर और वकील को औपचारिकता पूरी करने का दायित्व सौंप देती हैं।

एडिटर्स गिल्ड में वरिष्ठ संपादकों की सलाह से बनी आचार संहिता का लोकार्पण तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ, एपीजे अब्दुल कलाम ने किया था। इसका ध्यान अब भी कई संपादक और प्रकाशन रखते हैं, लेकिन सूचना मंत्रालय कृपया एक सही सर्वेक्षण करवा ले तो पता चल जाएगा कि देश के हजारों प्रकाशनों में से कितनों को प्रेस परिषद् के नियमों और आचार संहिता की जानकारी तक है? आजादी की लड़ाई 73 साल पहले खत्म हो गई, लेकिन आजादी के नाम पर आज भी एक साधारण कागजी खानापूर्ति करके कोई भी संपादक प्रकाशक बन जाता है और छापने के लिए स्वच्छंदता का इस्तेमाल कर रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने महीनों तक विभिन्न देशी-विदेशी संस्थानों, विशेषज्ञों, विधिवेत्ताओं से विचार विमर्श के बाद आधुनिक डिजिटल मीडिया के लिए आचार संहिता और आवश्यक मार्गदर्शी नियमावली की घोषणा की है। इसलिए यह आलोचना अजीब लगती है कि महीने भर पहले लाल किले पर हुए अपराध और किसान आंदोलन के नाम पर सोशल मीडिया में हुए कुप्रचार अथवा उत्तेजक असत्य सूचनाओं के अंतरराष्ट्रीय प्रसार के कारण यह नियम लादे जा रहे हैं। भारत ही नहीं, अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और जापान जैसे देशों में भी डिजिटल युग में नए नियम कानूनों पर विचार विमर्श ही नहीं हो रहा, पहले से तय नियम सही ढंग से लागू करने के प्रयास हो रहे हैं।

मोदी सरकार ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के संरक्षण के संकल्प के साथ उसमें कोई संवैधानिक संशोधन नहीं किया है, लेकिन उस अधिकार के साथ भारत की सम्प्रभुता, जवाबदेही और समाज से उठने वाली शिकायतों के निवारण, सुधार के लिए स्वायत्तशासी नियामक बनाने का प्रावधान किया गया है। जिस तरह अन्य अपराधों के लिए दंड का प्रावधान है, डिजिटल मीडिया-देशी-विदेशी कंपनी में उत्तरदायी व्यक्ति का नाम तय होने पर सजा दिए जाने की व्यवस्था की जा रही है।

विदेशी कंपनियों को तो फिर भी कड़ाई से नियंत्रित किया जा सकता है, लेकिन महानगर से लेकर सुदूर जंगल में बैठकर वेबसाइट या वीडियो बनाकर सच-झूठ मिलाकर प्रसारित करने वालों की जानकारी भी किसी राज्य, केंद्र सरकार के पास नहीं है। इसमें कोई शक नहीं कि हाल के वर्षों में नए संचार साधनों और  सोशल मीडिया को जिम्मेदारी से उपयोग करने वाले लोगों से समाज में जागरूकता लाने, सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने की सुविधाएं हुई हैं| यही नहीं, इसके सकारात्मक और आर्थिक लाभ के रास्ते भी खुले हैं। डिजिटल टेक्नोलॉजी क्रांति से हाल के वर्षों में पचास हजार नए स्टार्टअप शुरू हुए हैं। हर साल लगभग 11 से 14 अरब डॉलर का पूंजी निवेश हो रहा है। करीब सत्तर करोड़ लोगों तक इंटरनेट सुविधा पहुंचने लगी है और डिजिटल मीडिया कंपनियों के दावों के अनुसार करीब पचास करोड़ लोग सोशल नेटवर्क का इस्तेमाल कर रहे हैं।

आर्थिक पैमाने पर जरूर अमेरिका और चीन भारत से आगे हो सकते हैं, लेकिन लोकतांत्रिक उपयोग की दृष्टि से भारत सबसे आगे है। वहीँ इस बात का ध्यान रखना होगा कि भारत में अब भी शिक्षा के क्षेत्र में बहुत काम होना है। अधिकार के साथ नैतिक और राष्ट्रीय सामरिक हितों को सुरक्षित रखना है। अमेरिका या चीन में सांप्रदायिक, जातीय, भाषाई, सीमावर्ती गंभीर समस्याएं नहीं हैं। जर्मनी या ब्रिटेन में उग्रवादी संगठन और सीमा से घुसपैठ और आतंकवादी गतिविधियों के खतरे भारत की तरह नहीं हैं। कुछ घटनाएं होती हैं तो उनके लड़ाकू विमान सीमा पार कर हमले तक कर देते हैं। वे मानव अधिकार की दुहाई भले ही देते हों, सामान्य केमिकल फॉर्मूले या डिजिटल टेक्नोलॉजी के आरोप में एक-दो साल तक नजरबंद और पांच दस साल तक की सजा हो जाती हैं। रक्षा सौदों में घोटालों पर भारत में मीडिया, राजनीतिक दल और कई संगठन निरंतर आवाज उठाते हैं, लेकिन छोटे प्रकाशन या वेबसाइट अथवा सोशल मीडिया की आड़ में हथियारों की खरीदी या दलाली के बारे में सरकार के पास भी आधिकारिक जानकारी का तंत्र नहीं है। नए नियम से क्या ऐसे लोगों का रिकार्ड सार्वजनिक हो सकेगा?

डिजिटल मीडिया की नई आचार संहिता में अश्लीलता और हिंसा की सारी सीमाओं का उल्लंघन करने वाले सीरियल, फिल्म, गाने आदि का प्रदर्शन करने वाले प्लेटफार्म पर अंकुश की व्यवस्था की गई है। दुनिया भर में बच्चों को इस तरह के डिजिटल दुष्प्रभाव से बचाने के अभियान चल रहे हैं। यह कहना कि आप स्वयं उसे रिमोट से बंद कर न देखें, लेकिन अपने देश में तो सरकारें ही गांवों तक मुफ्त आईपेड, मोबाइल, लैपटॉप बच्चों को बांट रही हैं। वहां मां-बाप चौबीस घंटे कैसे पहरेदारी कर सकेंगे? हाल के वर्षों में बलात्कार, आत्महत्या और अन्य अपराधों की घटनाओं में वृद्धि का एक कारण स्वछंद सोशल डिजिटल मीडिया भी है। इसलिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सरकार की आलोचना और विरोध की पूरी छूट के साथ समाज को पतन के गर्त से बचाने और भविष्य को अधिक स्वस्थ्य, सुखी व सुरक्षित रखने के लिए उचित समय और सही ढंग से आचार संहिता लागू होनी चाहिए। उम्मीद की जानी चाहिए कि यह विषय अदालतों के सामने जाने पर न्यायाधीश आवश्यक सलाह दें व इसे और प्रभावी ढंग से लागू किए जाने का पथ प्रशस्त करें।

(यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक पद्मश्री से सम्मानित संपादक और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष हैं)

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भारतीय पत्रकारिता को यह तथ्य समझने की आवश्यकता है मिस्टर मीडिया!

22 बरस की दिशा रवि को दिल्ली की एक अदालत से जमानत सुखद खबर है। यह असहमति के सुरों की रक्षा के लिए सही समय पर आया सही फैसला है।

राजेश बादल by
Published - Wednesday, 24 February, 2021
Last Modified:
Wednesday, 24 February, 2021
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

22 बरस की दिशा रवि को दिल्ली की एक अदालत से जमानत सुखद खबर है। यह असहमति के सुरों की रक्षा के लिए सही समय पर आया सही फैसला है। इससे एक तरफ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को संरक्षण मिलता है तो दूसरी ओर यह भी सुनिश्चित होता है कि हिंदुस्तान की जम्हूरियत का मजबूत खंभा न्यायपालिका अभी भी किसी किस्म के दबाव से मुक्त है।

कहने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि इस लोकतांत्रिक अंग के बारे में कुछ समय से तनिक तकलीफदेह अहसास हो रहा था। यह धारणा घर करने लगी थी कि वाकई न्यायपालिका दबाव में तो काम नहीं कर रही? असल में कई बार इनसान कुछ दबाव तो अपने हित या स्वार्थों के चलते भी ओढ़ता दिखाई देता है। अगर वह ठान ले कि किसी प्रकार के दबाव में नहीं आएगा तो फिर वाकई वह मुक्त होकर काम करता है। हो सकता है कि फौरी तौर पर उसका कुछ नुकसान भी हो जाए, लेकिन अंततः वह विजेता की शक्ल में सामने आता है। भारतीय पत्रकारिता को यह तथ्य समझने की आवश्यकता है। असहमत होना किसी भी  जिम्मेदार और सभ्य लोकतंत्र की पहली शर्त है और इसको संरक्षण मिलना ही चाहिए।

माननीय न्यायालय ने दिशा रवि के मामले में साहसिक और संवैधानिक टिप्पणियां की हैं। भारतीय संस्कृति में वेदों को सर्वोच्च प्रतिष्ठा प्राप्त है और ऋग्वेद की ऋचाओं का संदर्भ इस देश के चरित्र को स्थापित करता है। कोर्ट का यह कथन पूरी तरह सटीक है कि हुकूमत के जख्मी गुरूर पर मरहम लगाने के लिए किसी को राजद्रोह के आरोप में कारागार नहीं पहुंचाया जा सकता। इस व्यवस्था से हिंदुस्तान की पत्रकारिता पर इन दिनों मंडरा रहे अवसाद और निराशा के वे बादल भी छंट सकते हैं, जो आम अवाम को यह धारणा बनाने का अवसर देते हैं कि इन दिनों मुल्क का मीडिया अपनी साख खो रहा है। सत्ता पक्ष की चिरौरी करते रहना अथवा चौबीसों घंटे उसकी निंदा करना यकीनन स्वस्थ्य पत्रकारिता की निशानी नहीं है। ऐसी करतूतों से संतुलित और निष्पक्ष पत्रकारिता को झटके लगते हैं। संसार में कोई सभ्य समाज पत्रकारिता का अपनी राह से विचलित होना पसंद नहीं करेगा।

बीते दिनों भारत के संपादकों की प्रतिष्ठित संस्था एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने राष्ट्र के अशांत क्षेत्रों में पत्रकारिता पर एक ऑनलाइन कार्यक्रम आयोजित किया था। जाहिर सी बात थी कि उसमें सरकार के गीत तो नहीं ही गाए जाने वाले थे। लेकिन असहमति और निंदा को स्थान नहीं देने वालों ने इसमें इस कदर तकनीकी बाधा डाली कि अंततः कार्यक्रम ही रद्द करना पड़ा। इसकी व्यापक भर्त्सना की गई थी।

असल में आज ऐसे तत्वों का चारों तरफ बोलबाला दिख रहा है, जो अपनी आलोचना पसंद नहीं करते। इस प्रवृति से वे खुद को और लोकतंत्र दोनों को क्षति पहुंचाते हैं। उन्हें तात्कालिक लाभ भले ही मिल जाए, मगर वे अपने ही देशवासियों से असुरक्षित महसूस करते हैं। भारतीय लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के लिए जरूरी है कि वह इनको बेनकाब करे-ताला लगाके आप हमारी जबान को/ कैदी न रख सकेंगे जेहन की उड़ान को/असहमति के सुरों की रक्षा करना ही असली राष्ट्रीय कर्तव्य है। इस हकीकत को जान लीजिए मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

मिस्टर मीडिया: आजादी के बाद पहली बार बनी है पत्रकारिता के लिए ऐसी स्थिति

इन प्रपंचों ने भी पत्रकारों की साख को बहुत धक्का पहुंचाया है मिस्टर मीडिया!

मिस्टर मीडिया: कुछ इस तरह की चाहिए एक मीडिया काउंसिल!

यह कैसी पत्रकारिता का नमूना हम प्रस्तुत कर रहे हैं मिस्टर मीडिया!

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यूपी सरकार के बजट का पूरन डावर ने कुछ यूं किया विश्लेषण

उत्तर प्रदेश सरकार का यह बजट कुल मिलाकर गरीबों, किसानों और इंफ्रॉस्ट्रक्चर को समर्पित है।

पूरन डावर by
Published - Tuesday, 23 February, 2021
Last Modified:
Tuesday, 23 February, 2021
Puran Dawar

पूरन डावर, चिंतक एवं विश्लेषक।।

उत्तर प्रदेश सरकार का यह बजट कुल मिलाकर गरीबों, किसानों और इंफ्रॉस्ट्रक्चर को समर्पित है। धार्मिक एवं अध्यात्मिकता को पर्यटन का केंद्र मानकर वाराणसी, अयोध्या और गोरखपुर को संवारने के लिए बजट में पर्याप्त धनराशि का प्रावधान किया गया है। निश्चित रूप से इनका विकास वैटिकन सिटी और मक्का मदीना से कमतर नहीं होना चाहिए। सरकार बधाई की पात्र है। विकास को गति देने के लिए बजट अच्छा है। स्टार्टअप के लिए 100 करोड़ का प्रावधान है, जो काफी तो नहीं, लेकिन कोविड-19 के कारण सरकार की आय भी सीमित है।

अर्थव्यस्था की रीढ़ उद्योगों के लिए कोई विशेष बजट आवंटित नहीं है। वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रॉडक्ट (ODOP) योजना के लिए पूरे प्रदेश के 75 जिलों के लिए 250 करोड़ नाकाफी हैं। इस अद्भुत योजना को साकार करने में कठिनाई आ सकती है। सार्वजनिक निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल पर विकास की बड़ी संभावनाएं हैं। सरकार को पर्यटन के विकास के लिए विकल्प तलाशने होंगे। इंफ्रॉस्ट्रक्चर पर गरीब घर पर बजट आवंटन से विकास को गति मिलेगी।

जेवर व अयोध्या एयरपोर्ट निश्चित रूप से विकास को गति देंगे, लेकिन आगरा जैसे विश्वप्रसिद्ध पर्यटन को नकारना महंगा पड़ सकता है। आवश्यकता थी बजट में ब्रज एवं आगरा के पर्यटन पर एक बड़ी लकीर की। यमुना पर वाटर पार्क, यमुना के उस पार वल्लभ भाई पटेल की तथा शिवाजी या गुरु गोबिंद सिंह जी की प्रतिमा, थीम पार्क की भूमि पर कृष्णा थीम पार्क की। सरकार के पास संसाधन सीमित हो सकते हैं, लेकिन व्यवस्थाएं पीपीपी पर हो सकती हैं। अभी भी समय रहते समग्र भौगोलिक विकास पर ध्यान देना आवश्यक है। कुल मिलाकर गरीब किसान के लिए राहत भरा बजट है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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ऐसे तो हम जैसों को तलवार-बंदूक के बल पर लिखने-बोलने को कहा जा सकता है: आलोक मेहता

अमिताभ बच्चन और अक्षय कुमार को लेकर कांग्रेस नेता नाना भाऊ फाल्गुन राव पटोले के ऐलान पर वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता ने रखी अपनी बात

आलोक मेहता by
Published - Monday, 22 February, 2021
Last Modified:
Monday, 22 February, 2021
alokmehta45454

आलोक मेहता, वरिष्ठ पत्रकार।।  

सचमुच क्या मुंबई जाने से पहले दस बार सोचना होगा? क्या अपनी जान बचाने का इंतजाम करके प्रवेश करना होगा? लेकिन आजकल बाल ठाकरे या उनसे बिछुड़े सत्ताधारी भाई उद्धव ठाकरे और उनके हथियारबंद साथी तो उत्तर भारतीयों को सार्वजनिक रूप से धमकियां नहीं दे रहे हैं। फिर क्यों डरना? जी नहीं, डरना होगा। उनसे अधिक शक्तिशाली कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष नाना भाऊ फाल्गुन राव पटोले ने खुलेआम ऐलान कर दिया है कि फिल्मी दुनिया के विश्वविख्यात बादशाह कहे जाने वाले अमिताभ बच्चन और हाल के दशकों में सफल अभिनेता अक्षय कुमार यदि उनके आदेशानुसार नहीं लिखे-पढ़े और बोलेंगे तो महाराष्ट्र में न उनकी फिल्म चलने दी जाएगी और न ही उनकी किसी फिल्म की शूटिंग होने दी जाएगी।

अब मेरे जैसे लाखों लोगों के लिए यह धमकी क्या चिंताजनक नहीं होगी? यदि इतने बड़े लोकप्रिय अभिनेताओं की ऐसी फजीहत हो सकती है तो हम जैसों को तो दादा पटोले, उनकी कांग्रेस पार्टी और साथी शिवसेना के सैनिक तलवार या बंदूक के निशाने पर बोलने-लिखने को कह सकते हैं। खासकर जब वह पहले दल-बदल और फिर पद बदलने के बाद प्रदेश पार्टी अध्यक्ष से मुख्यमंत्री बनने की तैयारी में लगे हैं।

गनीमत है कांग्रेस ने उनकी अद्भुत क्षमताओं को ध्यान में रखकर पार्टी सौंप दी है, वरना विधान सभा अध्यक्ष के पास अवमानना के विशेषाधिकार के नाते आदेश की अवहेलना पर अमिताभ तो क्या, भारत रत्न आदरणीय लता मंगेशकरजी को सदन में हाजिर करवाकर दो-चार दिन जेल भेजने का आदेश जारी कर देते। वैसे मेरे जैसे अज्ञानी लोगों को उनके इस बयान से उनकी पृष्ठ्भूमि का ज्ञान भी प्राप्त हुआ। अपने लंबे पत्रकारिता जीवन में मुझे तमाम बड़ी राजनीतिक हस्तियों से मिलने, बात करने, उनकी राजनीति के बारे में कभी मीठा-कभी कड़वा लिखने-बोलने के अवसर मिले हैं। लेकिन श्रीमान पटोले जब भारतीय जनता पार्टी के सम्मानित सांसद थे, तब भी उनका नाम सुनने या उनसे मिलने का अवसर नहीं मिला।

हां, दल बदलुओं की बारात में शामिल होने पर नाम सुनने को मिला। नानाभाऊ पटोले ने अमिताभ बच्चन को मनमोहन सिंह के सत्ता काल में पेट्रोल-डीजल के मूल्य बढ़ने पर ट्वीट करने की याद दिलाई है। लेकिन मिस्टर पटोले को शायद याद नहीं या देर से अपने साथी शिवसेना के सामना में (जुलाई 2012) आदरणीय बाल ठाकरे का संपादकीय ध्यान में लाया जाए, जिसमें बाला साहेब ने मनमोहन सिंह, कांग्रेस पार्टी, सरकार और सोनिया गांधी पर कितने गंभीरतम आरोप लगाए थे। अब क्या वह शिवसेना से उसी शैली में कांग्रेस पर वार करने को कहना चाहेंगे। वैसे कह भी सकते हैं। भाजपा से कांग्रेस में आए थे, अब बड़ा पद पाने को देर-सबेर शिवसेना में शामिल हो जाएं, लेकिन तब एक समस्या होगी-अमिताभ के संबंध बाला साहेब से बहुत अच्छे थे।  यों राजीव गांधी के बाल सखा होने के कारण कांग्रेस से भी उनके संबंध रहे थे और जब पटोले 23 साल के नादान युवक थे, तब अमिताभ उसी पार्टी से लोकभा का चुनाव भी जीते थे। इसलिए उनकी राजनीतिक सोच समझ के लिए पटोले पाठ या राहुल क्लास की आवश्यकता नहीं होगी।

लोकतंत्र में पटोले मंडली को भी आलोचना का अधिकार है। अमिताभ-अक्षय कुमार या किसी भी प्रभावशाली व्यक्ति की गलती या अपराध पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है। इसी तरह उनके किसी वक्तव्य या टिपण्णी पर पटोले महाशय मानहानि का मुकदमा दर्ज कर सकते हैं, लेकिन न बोलने और उनके आदेश पर काम न करने पर पटोले कैसे जबरदस्ती कर सकते हैं। नेता गण और सामान्य पाठक बंधु भी कृपया सोचिये-संभव है कि कुछ महीने बाद यही दादा पटोले की मंडली टाटा, अंबानी, गोदरेज, मित्तल जैसे उद्यमियों को आदेशानुसार बोलने, चंदा देने की धमकी देने लगे। हां, उनके सहयोगी दल के पचासों पट्ठे मुंबई में हफ्ता वसूली के लिए बदनाम रहे हैं।

आश्चर्य और दुखद बात यह है कि पटोले की जहरीली धमकी पर कांग्रेस के शीर्ष नेताओं और अनुभवी वरिष्ठ नेता शरद पवार ने तत्काल सार्वजनिक रूप से फटकार नहीं लगाई। आप कह सकते हैं कि इस तरह की धमकी की परवाह न की जाए। लेकिन यह तो सोचें कि जब पार्टी अध्यक्ष ऐसा करेगा तो जिला, ग्रामीण स्तर के नेता कार्यकर्ता समाज के अन्य लोगों को इसी तरह बोलने, काम करने के लिए धमकाने लगेंगे। उनको कौन बचाएगा? पार्टी या किसी भी संगठन का नाम लेकर विभिन्न राज्यों में होने वाली किसी भी गतिविधि का कड़ाई और कानूनी ढंग से प्रतिकार होना चाहिए। अन्यथा नक्सली अदालत की तरह समाज में कोई भी गिरोह गैरकानूनी आदेश और सजा देने लगेगा। अभी सड़कों, रेल मार्गों पर जबरन कब्जा करके व्यवस्था और सामान्य जनों को निरंतर संकट में डाला जा रहा है। देर सबेर किसी दफ्तर या घरों पर कब्जा जमाने की हिमाकत होने लगेगी। सत्ता और विपक्ष की लड़ाई अराजकता की ओर ले जाना सबके लिए घातक होगा।

(यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक पद्मश्री सम्मानित और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष हैं)

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आने वाले समय में रेडियो रियल गेम चेंजर साबित होगाः  प्रो. के.जी. सुरेश

लोक प्रसारक के रूप में रेडियो की भूमिका सबसे अहम है और आने वाले समय में यह रियल गेमचेंजर साबित हो सकता है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 18 February, 2021
Last Modified:
Thursday, 18 February, 2021
Radio5454

लोक प्रसारक के रूप में रेडियो की भूमिका सबसे अहम है और आने वाले समय में यह रियल गेमचेंजर साबित हो सकता है। रेडियो की लोकप्रियता बढ़ाने में प्रधानमंत्री जी के ‘मन की बात’ कार्यक्रम का भी बहुत बड़ा योगदान है। एफएम चैनलों ने भी रेडियो की प्रासंगिकता को बनाए रखने और लोगों के दिलों स्थापित करने में महती भूमिका निभाई है। यह बात बुधवार को माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. के.जी. सुरेश ने पीआईबी भोपाल सभागार में विश्व रेडियो दिवस के संदर्भ में, ‘मन का रेडियो’ विषय पर आयोजित सेमिनार में कही।

आयुक्त एवं सचिव जनसंपर्क सुदाम खाड़े ने कहा कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में रेडियो हमें खुद को सुनने का मौका देता है। यह खुद से कनेक्ट करने का बेहतर माध्यम है। उन्होंने लोकसभा चुनाव के दौरान भोपाल में फेक न्यूज पर लगाम लगाने में रेडियो द्वारा निभाई गई भूमिका को भी याद किया।

पीआईबी, भोपाल के अपर महानिदेशक प्रशांत पाठराबे ने कहा कि रेडियो का देश के दूराज इलाकों में रहने वाले लोगों के साथ एक मजबूत रिश्ता है। यह बेहद ही आसान तरीके और जनता की भाषा में लोगों तक बातों को पहुंचाता है। उन्होंने कहा कि कोरोना काल में राजस्व के मामले में रेडियो को नुकसान तो हुआ पर कोरोना के बाद रेडियो ने काफी बेहतर तरीके से वापसी की है और इसका राजस्व 5 गुना बढ़ा है।

शोध पत्रिका ‘समागम’ के संपादक मनोज कुमार ने कहा कि रेडियो प्रामाणिक एवं विश्वसनीय माध्यम है। बदलते समय में दूर दराज में रहने वाले समुदाय के लिये सामुदायिक रेडियो सबसे प्रभावशाली माध्यम के रूप में उभरा है। वरिष्ठ पत्रकार मनोज कुमार ने सामुदायिक रेडियो के क्षेत्र में किए गए अपने कार्यों को याद किया और कहा कि कम्युनिटी रेडियो भविष्य का रेडियो है। उन्होंने कम्युनिटी रेडियो खोलने की पूरी प्रकिया के बारे में भी बताया और इस बारे में सरकारी गाइडलाइन की भी जानकारी दी। उन्होंने कहा कम्युनिटी रेडियो शिक्षा की रोशनी फैलाने में अहम योगदान देता है।

आकाशवाणी, भोपाल के कार्यक्रम प्रमुख विश्वास केलकर ने लोक प्रसारक के रूप में रेडियो की भूमिका पर प्रकाश डाला। आकाशवाणी समाचार भोपाल के पूर्व संवाददाता और आरओबी, भोपाल के सहायक निदेशक शारिक नूर ने खबरों की दुनिया में रेडियो की विश्वसनीयता के बारे में बात की।

‘माय एफएम’ के कार्यक्रम प्रमुख विकास अवस्थी ने कहा कि रेडियो आपका दोस्त बनकर आपके साथ चलता है और आपकी सकारात्मकता को बढ़ाने में सक्रिय भूमिका निभाता है।

वहीं, ‘बिग एफएम’ की रेडियो जॉकी अनादि ने कहा कि रेडियो साधारण और बहुत ही आसान माध्यम है। रेडियो की सबसे अच्छी बात यह है कि यह हमें कानों से देखना सिखाता है। हम काम करते हुए भी रेडियो से जुड़ सकते हैं।

इस अवसर पर शोध पत्रिका समागम का सामुदायिक रेडियो पर केंद्रित विशेषांक का लोकार्पण अतिथियों ने किया।

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यह एक ऐसी फांस है, जो लंबे समय तक मुल्क को चुभती रहेगी: राजेश बादल

डोनाल्ड ट्रंप का इस बेहद गंभीर आरोप से बरी होना अमेरिकी लोकतंत्र की एक ऐसी फांस है, जो लंबे समय तक पूरे मुल्क को चुभती रहेगी।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 17 February, 2021
Last Modified:
Wednesday, 17 February, 2021
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राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

महाभियोग के बाद अमेरिकी लोकतंत्र की साख

पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर महाभियोग से साफ बच निकले। इसलिए नहीं कि कैपिटल हिल की हिंसा में उनका कोई हाथ नहीं था बल्कि इसलिए कि सीनेट में हुए मतदान में उनके खिलाफ दो तिहाई मत नहीं पड़े। यह अलग बात है कि उनकी अपनी ही रिपब्लिकन पार्टी के कई सांसद खुलकर पूर्व राष्ट्रपति के विरोध में और महाभियोग के समर्थन में सामने आए और उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप को सार्वजनिक रूप से हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहराया। डोनाल्ड ट्रंप की पार्टी के चंद और सांसद यदि उनके विरोध में वोट डालते तो विश्व इतिहास में लोकतंत्र का एक नया अध्याय लिखा जाता। ऐसा हो सकता था, क्योंकि प्रस्ताव के विरोध में मतदान करने वाले रिपब्लिकन पार्टी के अनेक सदस्य इसके समर्थन में थे। लेकिन अगर वे ऐसा करते तो उनकी अपनी पार्टी के माथे राजनीतिक कलंक का स्थाई टीका लग जाता। आने वाले चुनाव में पार्टी की अपनी साख दांव पर लग जाती। इसलिए दल की खातिर उन्हें उस झूठ का समर्थन करना पड़ा, जिसे अमेरिका का एक-एक मतदाता जानता था।

कह सकते हैं कि डोनाल्ड ट्रंप का इस बेहद गंभीर आरोप से बरी होना अमेरिकी लोकतंत्र की एक ऐसी फांस है, जो लंबे समय तक पूरे मुल्क को चुभती रहेगी। अब इस विशाल देश को अपने दो सौ बरस पुराने संविधान के अनेक प्रावधानों पर पुनर्विचार करना होगा। अगर महाभियोग को बहुमत का समर्थन था तो स्पष्ट था कि ट्रंप लोकतंत्र के एक बड़े उपकरण के पैमाने पर खरे साबित नहीं हुए हैं। प्रसंग के तौर पर भारतीय लोकतंत्र की एक घटना का सन्दर्भ आवश्यक है, जब केवल एक मत से प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार गिर गई थी। 

दरअसल किसी भी जागरूक जम्हूरियत का तकाजा यही है कि वह जिन राजनेताओं को हुकूमत करने का अवसर दे, उन पर कड़ी निगरानी भी रखे ताकि देश की देह में तानाशाही का घुन नहीं लगे। यह एक आदर्श स्थिति मानी जा सकती है। विडंबना है कि इन दिनों समूचे विश्व पर अधिनायक वादी घुड़सवार चढ़ाई करते दिखाई दे रहे हैं। इसलिए भले ही ट्रंप की करतूत पर उनके ही दल के सांसदों ने खिलाफ होते हुए भी बचा लिया हो, पर वे जाने-अनजाने लोकतंत्र और अपने राष्ट्र को गंभीर क्षति पहुंचा चुके हैं। इसका अफसोस उन्हें हमेशा रहना चाहिए। यह इतिहास के पन्नों में लिखा जाएगा कि लोकतंत्र पर संकट की घड़ी में वे दल के साथ खड़े हुए, देश के साथ नहीं। आने वाले दिनों में अमेरिका को इसका खामियाजा भुगतना ही होगा। डोनाल्ड ट्रंप तो इससे क्या सबक लेंगे। अलबत्ता उनकी पार्टी यदि इस अवसर पर नैतिक साहस दिखाती और महाभियोग को समर्थन देती तो विश्व इतिहास में यह प्रसंग स्वर्ण अक्षरों में लिखा जा सकता था।

लेकिन इसी आधार पर अमेरिकी लोकतंत्र की परिपक्वता को खारिज नहीं किया जा सकता। असहमति के अधिकार का वहां सम्मान होता है और किसी तरह की व्हिप जारी करके व्यक्तिगत मान्यताओं को क्षति पहुंचाने का काम नहीं किया जाता। अंतरात्मा की आवाज का आदर भी इस व्यवस्था का अनिवार्य अंग है। डोनाल्ड ट्रंप से असहमत उनके दल के सदस्य खिलाफ वोट करने के बाद पिछले दरवाजे से चुपचाप नहीं निकल गए। उन्होंने बाकायदा सार्वजनिक तौर पर ट्रंप के बच निकलने पर दुःख प्रकट किया। वरिष्ठ सीनेटर मिच मैककोनेल ने इस प्रक्रिया पर अपनी टिप्पणी में कहा, ‘मेरा अडिग मानना है कि ट्रंप ने अपना संवैधानिक दायित्व निभाने के बजाए संसद में हथियारों के साथ हिंसा के लिए अपने समर्थकों को उकसाया था। वे इसके अपराधी हैं। लेकिन हमारे हाथ बंधे हुए थे। हमारे पास इतनी ताकत नहीं थी कि राष्ट्रपति के पद पर बैठकर ट्रंप की करतूतों के लिए अयोग्य ठहरा सकते।’

तनिक सोचिए। क्या भारत में यह संभव है? भारतीय लोकतंत्र के हितैषियों के बीच यकीनन यह चर्चा का विषय होना चाहिए कि किसी दागदार नेता का दल के समर्थन से बेदाग बरी होना कितना जायज है। यही नहीं, व्हिप की आड़ में उसके खिलाफ मतदान करने वालों पर कार्रवाई की तलवार भी चल सकती है। किसी भी सूरत में यह उचित नहीं माना जा सकता। एक तरह से लोकतंत्र की डाल को अपने हाथों तोड़ने जैसा है और सियासी पार्टी को अधिनायक की तरह व्यवहार करने का अवसर देता है। क्या भारतीय मतदाता और नियंता अमेरिका की इस घटना से कोई सबक लेंगे?

दूसरी ओर इसे स्वीकार करने में भी हिचक नहीं होनी चाहिए कि जनतांत्रिक प्रणाली में जिसके साथ बहुमत है, उसे दण्डित नहीं किया जाए। यदि अमेरिकी डेमोक्रेटिक पार्टी के सदस्य डोनाल्ड ट्रंप के खिलाफ दो तिहाई बहुमत नहीं जुटा सके तो सन्देश है कि पूर्व राष्ट्रपति के व्यवहार को राजनेताओं का एक वर्ग सही तथा उचित मानता है। उचित और अनुचित के बीच की सीमा रेखा कई बार धुंधली हो जाती है। इस स्थिति में कभी निर्दोष भी दंड का भागी बन सकता है और दोषी भी आरोप से मुक्त हो सकता है। ऐसे में न्याय का यह सिद्धांत संतुलित माना जा सकता है कि सौ दोषी भले ही छूट जाएं मगर एक निर्दोष को प्रताड़ना नहीं मिलनी चाहिए। यही लोकतान्त्रिक मर्यादा है। इस मर्यादा की आड़ लेकर डोनाल्ड ट्रंप जैसे शातिर कारोबारी बच न सकें, यह व्यवस्था भी अमेरिका के सभी जम्हूरियत पसंद लोगों को बनानी होगी।

(साभार: लोकमत समाचार)

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विश्व रेडियो दिवस: कम्युनिटी रेडियो को लेकर आज भी भ्रमजाल में है समाज

मध्यप्रदेश के आदिवासी अंचलों में कम्युनिटी रेडियो की गूंज सुनाई दे रही है। राज्य के सुदूर आदिवासी अंचलों के आठ जिलों में कम्युनिटी रेडियो की स्थापना की गई है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Friday, 12 February, 2021
Last Modified:
Friday, 12 February, 2021
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मनोज कुमार, वरिष्ठ पत्रकार ।।

मध्यप्रदेश के आदिवासी अंचलों में कम्युनिटी रेडियो की गूंज सुनाई दे रही है। राज्य के सुदूर आदिवासी अंचलों के आठ जिलों में कम्युनिटी रेडियो की स्थापना की गई है। इन रेडियो स्टेशनों के माध्यम से ग्रामीण एवं आदिवासी समुदाय में सूचना, शिक्षा एवं मनोरंजन के बुनियादी जरूरतों को पूरा किया जा रहा है।

कम्युनिटी रेडियो में निहित उद्देश्यों अनुरूप ‘रेडियो वन्या’ समुदाय के द्वारा समुदाय के लिए, समुदाय से कार्यक्रम निर्माण कराने एवं प्रसारण करने की जवाबदारी भी समुदाय को सौंप रखा है। इसके अलावा मध्यप्रदेश शासन का संस्कृति विभाग का ‘रेडियो आजाद हिन्द’ आजादी के तराने सुना रहा है। राजधानी भोपाल में स्थित रेडियो आजाद हिन्द देश के स्वाधीनता संग्राम से जुड़े प्रसंगों को सुनाता है। हालांकि मध्यप्रदेश का पहला कम्युनिटी रेडियो चंदेरी में स्थापित हुआ था। वर्तमान में कम्युनिटी रेडियो एवं कैम्पस रेडियो की संख्या अन्य राज्यों की तुलना में संतोषजनक है। इसके अलावा विदिशा, सीहोर, उज्जैन के साथ ही राज्य के प्रमुख जिलों में सामुदायिक रेडियो का संचालन किया जा रहा है।

कम्युनिटी रेडियो के माध्यम से शासन की कल्याणकारी योजनाओं के साथ साथ उनके दैनंदिनी जीवन में काम आने वाली सूचना का लाभ भी समुदाय को मिल रहा है। इसके साथ ही इन रेडियो स्टेशनों पर समुदाय की जीवनशैली, संस्कृति, परम्परा, साहित्य एवं विभिन्न संस्कारों का दस्तावेजीकरण किया जा रहा है। स्थानीय बोली में कार्यक्रम के प्रसारण होने के कारण समुदाय को समझने और सुनने में आसानी होती है। 

रेडियो साक्षी रहा है पराधीन भारत से स्वाधीन भारत की यात्रा का। रेडियो गवाह बना हुआ है वर्तमान और युवा भारत का। रेडियो की यात्रा समाज में सूचना, शिक्षा और मनोरंजन को आगे बढ़ाती है। भारतीय समाज की धडक़न है रेडियो। रेडियो संचार का ऐसा प्रभावी माध्यम है जिसे साथ रखने में ना तो टेक्रालॉजी आड़े आती है और ना ही शिक्षित होने की शर्त। जैसे किसी समय हर घर की मेज पर टेलीफोन हुआ करता था, वैसे ही हर भारतीय के घर में रेडियो सेट मिल जाता था। रेडियो के साथ ट्रांजिस्टर भी हुआ करता था। कोई ग्रामीण, कोई मजदूर कांधे में डाले गीत गुनगुनाता आगे बढ़ जाता था। समय बदला, टेक्रालॉजी बदली और रेडियो-ट्रांजिस्ट्रर के विकल्प के तौर पर मोबाइल आ गए। अब हर हाथ में रेडियो था। वैसे ही जैसे टेलीफोन सेट की जगह मोबाइल फोन ने ले ली। संचार के दूसरे माध्यम भी विकसित और परामार्जित हुए। टेलीविजन के आगमन के बाद कहा जाने लगा कि अखबार का समय अब खत्म होने वाला है और सोशल मीडिया के विस्तार के बाद टेलीविजन को लेकर भी यही बात कही जाने लगी। लेकिन रेडियो का ना तो कोई विकल्प आया और ना उसके असामायिक हो जाने की कोई चर्चा हुई। 

संचार के विभिन्न माध्यम पर जब विश्वसनीयता को लेकर सवाल खड़े हुए तो रेडियो निरपेक्ष भाव से सबको सुन रहा था, गुन रहा था। उसकी प्रामाणिकता उसकी पहचान थी। ऐसा भी नहीं है कि रेडियो के दिन बीते नहीं लेकिन हर बार वह चेहरा बदलकर आ जाता था। आकाशवाणी पूर्णत: शासकीय  नियंत्रण का प्रसारण सेवा है तो मनोरंजन का खजाना लेकर एफएम रेडियो आ धमका। एफएम शहरी लोगों के बीच में अपनी पैठ बना चुका है तो ग्रामीण समुदाय के लिए कम्युनिटी रेडियो का आगमन हुआ। भारत जैसे विशाल जनसंख्या और भौगोलिक ताना-बाना वाले इस महादेश के लिए कम्युनिटी रेडियो एक आवश्यकता है। सूचना का विस्फोट हो रहा है लेकिन गांव और आदिवासी अंचलों में रहने वाले अधिसंख्य लोगों सूचनाविहिन थे। ऐसे में कम्युनिटी रेडियो ने उन्हें जोड़ा। ना केवल जोड़ा बल्कि उनकी जीवनशैली, साहित्य-संस्कृति, परम्परा का दस्तावेजीकरण करने में सहायता की। कम्युनिटी रेडियो के भारत में आगमन के समय शैक्षिक परिसरों तक सीमित था लेकिन भारत सरकार ने इसे व्यापक बनाया और गांव तथा ग्रामीणों की आवाज बनने में सहायता की। हालांकि अभी कम्युनिटी रेडियो विस्तार के दौर में है लेकिन जल्द ही वह हर गांव, हर ग्रामीण की आवाज बन चुका होगा।

कम्युनिटी रेडियो को लेकर समाज आज भी भ्रमजाल में है। इसका एक बड़ा कारण है कि इससे संबंधित साहित्य एवं जानकारी का अभाव होना। हालांकि सामुदायिक रेडियो के विस्तार के लिए भारत सरकार अनेक स्तरों पर प्रयास कर रही है कि लोगों को अधिकाधिक जानकारी मिल सके ताकि वे कम्युनिटी रेडियो की स्थापना एवं संचालन सहजता से कर सकें। कम्युनिटी रेडियो एक ऐसा जीवंत माध्यम है। 

कम्युनिटी रेडियो की स्थापना की दिशा में मध्यप्रदेश सरकार की पहल अनोखा है। संभवत: देश का एकमात्र राज्य है जहां सुदूर आदिवासी अंचलों में आठ रेडियो संचालित हैं। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान की संकल्पना को साकार करते हुए 9 सामुदायिक रेडियो की स्थापना की गई। इनमें से 8 कम्युनिटी रेडियो रेडियो आदिमजाति कल्याण विभाग मध्यप्रदेश शासन की नवाचारी संस्था ‘वन्या’ द्वारा संचालित किया जाता है। एक अन्य  कम्युनिटी रेडियो रेडियो स्वाधीनता संग्राम पर केन्द्रित प्रथम कम्युनिटी रेडियो रेडियो ‘रेडियो आजाद हिन्द’ भी मध्यप्रदेश शासन द्वारा संचालित किया जाता है। राज्य के सुदूर आदिवासी अंचलों में सूचना, शिक्षा और मनोरंजन पहुंचाने की दृष्टि और सोच के साथ स्थानीय बोली में सामुदायिक रेडियो का प्रसारण आरंभ किया गया। वर्तमान में राज्य के आदिवासी बहुल जिला झाबुआ, चंद्रशेखर आजाद नगर, जिला अलीराजपुर, खालवा जिला खंडवा, चिचोली जिला बैतूल, पातालकोट जिला छिंदवाड़ा, सेसइपुरा जिला श्योपुर, चाड़ा जिला डिंडोरी एवं नालछा जिला धार में संचालित है। सामुदायिक रेडियो के संचालन के लिए निहित उद्देश्यों को पूर्ण करते हुए स्थानीय युवाओं को रेडियो संचालन की जिम्मेदारी दी गई है। इन केन्द्रों से स्थानीय बोलियों में सूचनाओं का आदान-प्रदान, सांस्कृतिक एवं साहित्यिक गतिविधियों का दस्तावेजीकरण किया जाता है। 

सामुदायिक रेडियो सुदूर ग्रामीण एवं आदिवासी अंचलों में सूचना, शिक्षा एवं मनोरंजन की बुनियादी जरूरतों को पूर्ण करने का माध्यम है। राज्य के बड़े शहरों में स्थित विभिन्न शैक्षिक परिसरों में भी कैम्पस रेडियो संचालित है। एफएम रेडियो में आरजे शिक्षित एवं प्रशिक्षित होते हैं और वे शहरी समुदाय से आते हैं जबकि सामुदायिक रेडियो के आरजे ठेठ समुदाय के बीच से आते हैं। इनके पास प्रशिक्षण तो होता है लेकिन व्यवहारिक होता है। शैक्षिक योग्यता बहुत कम होती है लेकिन ये लोग अपने समुदाय को, समुदाय की जरूरतों को और उनकी भाषा-बोली को बेहतर ढंग से समझते हैं और उसका प्रतिनिधित्व ठीक से कर पाते हैं। यही कारण है कि भारत जैसे विशाल देश में समुदाय का यह रेडियो सूचना और शिक्षा के मान से बेहद जरूरी बन गया है। मध्यप्रदेश में जिस तरह राज्य की कल्याणकारी योजनओं को सुदूर अंचल तक पहुंचाने के लिए सामुदायिक रेडियो की स्थापना की गई है, वह अन्य राज्यों के लिए एक उदाहरण की तरह है। आने वाले समय में समुदाय का यह रेडियो जन-जन की आवाज बनेगा। सामुदायिक रेडियो फैशन का नहीं बल्कि पैशन बन चुका है। 

(ये लेखक के निजी विचार हैं और वे शोध पत्रिका ‘समागम’ के संपादक हैं) 

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'माधवराव सप्रे के बारे में बहुत ही कम लोग जानते हैं ये बात'

अपने जमाने के मूर्धन्य पत्रकार माधवराव सप्रे की कर्मस्थली छत्तीसगढ़ के पेंड्रा में उनकी स्मृति में आयोजित सप्रे संवाद में मुख्य वक्ता के तौर पर हिस्सा लेने का अवसर मिला।

राजेश बादल by
Published - Thursday, 11 February, 2021
Last Modified:
Thursday, 11 February, 2021
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

अपने जमाने के मूर्धन्य पत्रकार माधवराव सप्रे की कर्मस्थली छत्तीसगढ़ के पेंड्रा में उनकी स्मृति में आयोजित सप्रे संवाद में मुख्य वक्ता के तौर पर हिस्सा लेने का अवसर मिला। हममें से कितने लोग यह जानते हैं कि महात्मा गांधी के दक्षिण अफ्रीका से 1915 में आने के कई साल पहले सप्रे जी स्वराज और स्वदेशी को स्वीकार और विदेशी का बहिष्कार आंदोलन छेड़ चुके थे। गांधी जी जिन लोगों से प्रेरित थे, उनमें से एक सप्रे जी भी थे।

दादा माखनलाल चतुर्वेदी, सेठ गोविंददास और द्वारिका प्रसाद मिश्र जैसे महानुभावों को उन्होंने संस्कारित करने का काम किया। उनके हिंदी केसरी पत्र से गोरी हुकूमत इतना खौफ खाती थी कि धोखे से पत्र के छह हजार पाठकों के पते लिए गए और उन पर दबाव डाला गया कि हिंदी केसरी खरीदना बंद करें। बाकायदा एक आदेश निकला कि हिंद केसरी पढ़ने वाले लोगों के रिश्तेदारों को नौकरी से निकाल दिया जाएगा, उनकी पेंशन बंद कर दी जाएगी और उन्हें जेल की हवा खानी पड़ेगी।

उनकी हिंदी ग्रंथमाला तो गजब की थी। जून 1908 में उन्होंने एक लेख छापा-अंगरेजी राज से हिंदुस्तान का सत्यानाश। एक अन्य लेख प्रकाशित हुआ, जिसका शीर्षक था-स्वदेशी आंदोलन और बायकॉट। इसमें लिखा था कि ईस्ट इंडिया कंपनी से भारत को कितना नुकसान हुआ। इस अंक को जब्त कर लिया गया। याद रखिए कि तब तक महात्मा गांधी भारत नहीं आए थे।

वे एक ऐसे अनोखे संपादक थे, जिन्होंने भारत में आर्थिक पत्रकारिता की नींव डाली। उन्होंने अर्थशास्त्र की प्रामाणिक शब्दावली हम लोगों को सौंपी। आर्थिक विषयों पर उनके बीस से अधिक आलेख ऐसे हैं, जो आज एक सौ पंद्रह बरस बाद भी उपयोगी हैं।

सप्रे जी के सरोकार और आज पत्रकारिता की चुनौतियों पर यह एक सार्थक संवाद रहा। रायपुर से जाने-माने पत्रकार भाई गिरीश पंकज और सुधीर शर्मा को भी गहराई से सुनने का अवसर प्राप्त हुआ। बिलासपुर के पुराने मित्र राजेश दुआ और साथी पत्रकार राजेश अग्रवाल इस यात्रा के सबब बने। पेंड्रा के जिला शिक्षा अधिकारी मनोज राय से भी शानदार मुलाकात हुई।

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मिस्टर मीडिया: आजादी के बाद पहली बार बनी है पत्रकारिता के लिए ऐसी स्थिति

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और स्वछंदता का अंतर अब भारत का सुप्रीम कोर्ट समझा रहा है।

राजेश बादल by
Published - Friday, 29 January, 2021
Last Modified:
Friday, 29 January, 2021
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और स्वछंदता का अंतर अब भारत का सुप्रीम कोर्ट समझा रहा है। आजादी के बाद पहली बार ऐसी स्थिति बनी है, जब पत्रकारिता पर नियंत्रण के लिए मुल्क का सर्वोच्च न्यायालय इतना संवेदनशील दिखाई दे रहा है। कुछ दिनों से लगभग रोजाना ही किसी न किसी प्रसंग में वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दुरुपयोग पर तीखी टिप्पणियां कर रहा है। गुरुवार को उसने 26 जनवरी की घटना के संदर्भ में सरकार से पूछा कि अगर वह इंटरनेट पर पाबंदी लगा सकती थी तो टीवी चैनलों के भड़काऊ प्रसारण को क्यों नहीं रोका गया? विचार प्रकट करने का अधिकार समाज में नफरत फैलाने की छूट नहीं देता।

इससे पहले बुधवार को उसने टीवी पत्रकारिता में कंटेंट के गिरते स्तर पर केंद्र सरकार से जवाब तलब किया। इस पर चार हफ्ते में हुकूमत को उत्तर देना है। कोर्ट ने पूछा है कि अगर सरकार कोई कार्रवाई नहीं कर पा रही है तो मीडिया के लिए अलग से स्वतंत्र ट्रिब्यूनल क्यों नहीं बना देती। न्याय की इस शिखर संस्था ने इन दिनों एक याचिका पर सुनवाई के दौरान यह बात कही। इसमें कहा गया कि टेलिविजन चैनलों पर पेड न्यूज, हेट न्यूज, प्रचार समाचार और मीडिया ट्रायल का जो रूप देखने को मिल रहा है, वह खतरनाक है। इस पर नियम कानून होते हुए भी सरकार की तरफ से कोई कदम नहीं उठाया जा रहा है। इससे टीवी पत्रकारिता निरंकुश हो रही है।

इसी तरह सर्वोच्च न्यायालय ने एक वेब सीरीज में भारतीय धार्मिक आस्था और प्रतीकों पर अभद्र टिप्पणियों पर भी गुस्सा दिखाया है। दो दिन पहले ही उसने यहां तक कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब यह नहीं है कि कोई कुछ भी बोलने के लिए आजाद है। कुछ इसी तरह की भावना इंदौर हाई कोर्ट ने भी प्रकट की है। उसने कहा कि संविधान ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सभी को दी है, लेकिन समाज में सद्भाव बिगाड़ने की इजाजत किसी को नहीं दी जा सकती।

इन टिप्पणियों का क्या अर्थ निकलता है? यही कि पत्रकारिता में भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का लाभ असीमित नहीं हो सकता। इसे स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं कि तमाम भारतीय खबरिया टीवी चैनल हालिया दिनों में ग़ैर जिम्मेदार हुए हैं। उनकी संपादकीय सामग्री इकतरफा और दर्शकों की प्रतिनिधि राय के खिलाफ है। वे अपनी विचारधारा की भौंडी नुमाइश करते नजर आते हैं। इससे हिन्दुस्तान के बहुरंगी ढांचे को चोट पहुंचती है। बताने की जरूरत नहीं कि ऐसे प्रसारण सरकार और न्यायपालिका को पाबंदी लगाने पर बाध्य कर रहे हैं।

पत्रकारिता अगर सरकारी धुनों पर नाचती रहे तो किसी भी हुकूमत को क्या एतराज हो सकता है। मगर न्यायपालिका की ओर से विभिन्न स्तरों पर यदि राय, व्यवस्था, निर्देश, आदेश, सुझाव और टिप्पणी की जाती है तो वह एक दस्तावेज बन जाती है और आने वाले दिनों में उस दस्तावेज का हवाला अनेक मामलों में दिया जा सकता है। उन मामलों में भी, जहां इन निर्देशों का उल्लेख आवश्यक नहीं होता। यह एक बेहद गंभीर प्रवृति की ओर इशारा है। राष्ट्रीय प्रेस दिवस पर आज चैनलों के प्रबंधकों-संपादकों को संकल्प लेना होगा कि वे इस पर तत्काल सतर्कता से कार्रवाई करें मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

इन प्रपंचों ने भी पत्रकारों की साख को बहुत धक्का पहुंचाया है मिस्टर मीडिया!

मिस्टर मीडिया: कुछ इस तरह की चाहिए एक मीडिया काउंसिल!

यह कैसी पत्रकारिता का नमूना हम प्रस्तुत कर रहे हैं मिस्टर मीडिया!

किसान आंदोलन को पत्रकारिता से प्रमाणपत्र नहीं चाहिए मिस्टर मीडिया! 

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