'वह एक काला दिन था, जब टीवी पर खबरों का संसार रचने वाला शख्स सदा के लिए चला गया'

कोई कहता है कि सफल होने के लिए टैलेंट चाहिए, कोई कहता है कि पैसा चाहिए, कोई कहता है कि अच्छा दिमाग चाहिए।

Last Modified:
Sunday, 27 June, 2021
Nirmalendu

निर्मलेंदु, वरिष्ठ पत्रकार ।।

कोई कहता है कि सफल होने के लिए टैलेंट चाहिए, कोई कहता है कि पैसा चाहिए, कोई कहता है कि अच्छा दिमाग चाहिए। मैं कहता हूं कि सफल होने के लिए इनमें से कुछ भी नहीं है तो चलेगा, लेकिन नैतिकता और प्रामाणिकता जरूर चाहिए। सच्चा अभिगम चाहिए, काम के प्रति लगाव चाहिए, मेहनत करने का जज्बा चाहिए, लगन चाहिए, अपनी गलती को स्वीकार करने की हिम्मत चाहिए, जीवन में कृतज्ञता और भाव-पूर्णता का संगम चाहिए, कभी न थकने वाला जुनून चाहिए और खुद एवं ईश्वर पर विश्वास चाहिए। अगर इतनी सारी चीजें किसी के पास हैं तो सफलता उनके कदम जरूर चूमेगी। जी हां, ये सभी गुण एसपी सिंह में थे और शायद इसलिए उतनी कम उम्र में वह संपादक रूपी सिंहासन पर आसीन हो सके, जहां अधिकांश लोग पचास के बाद ही पहुंच पाते हैं। 'रविवार' पत्रिका और 'आजतक' चैनल को जन्म देने, उसे बनाने, सजाने और संवारने और दृश्य खबरों के संसार में नई क्रांति लाकर खबरों के संसार में नंबर वन बन बैठे एसपी ने 'आजतक' को ही अपना पूरा जीवन दान कर दिया।

एसपी। जी हां, एसपी यानी मेरे लिए सब कुछ। एसपी सिंह, एक ऐसा नाम जो पत्रकार से ऊपर एक इंसान थे। एक सरल इंसान, स्वाभाविक, मृदुभाषी, कम बोलने वाला हंसता मुस्कुराता हुआ एक चेहरा। छोटा हो या बड़ा, सबसे एक साधारण इंसान की तरह मिलते थे। आप यदि नौकरी मांगने उनके घर जाएंगे, तो आपको नहीं लगेगा कि वह इतने बड़े इंसान हैं। आपके साथ पल्थी मारकर बैठ जाएंगे। आपको माछ भात भी खिलाएंगे, आपके घर की माली हालत के बारे में भी जानेंगे और उसके बाद आपके रेज्यूमे पर गौर करेंगे। मेरे साथ भी कुछ-कुछ ऐसा ही हुआ था। पापा के कहने पर नौकरी मांगने गये थे उनके कोलकाता स्थित श्यामनगर वाले घर में। मेरे पापा के ऑफिस सहकर्मी साउ जी ने इंट्रोड्यूस करवाया था। घर पहुंचे, वो गेट पर ही मिल गये। पहले तो लुंगी पहन कर वे आये। चूंकि दोपहर का समय था तो मुझे माछ भात खिलाया और उसके बाद उन्होंने रेज्यूमे पर चर्चा की। नौकरी मिल गयी और उनके निधन के पहले तक मै उनके साथ छोटे भाई की तरह लगा रहा, लेकिन 27 जून 1997 के दिन वह हमसे बिछड़ गये।

दरअसल, जिस दिन एसपी सिंह का देहांत हुआ, मैं दिल्ली लेट पहुंचा। कोलकाता में 'अक्षर भारत' में काम करते हुए 13 दिनों तक मैं लगातार कोलकाता और दिल्ली का चक्कर काट रहा था। हुआ यह था कि 16 जून 1997 की सुबह-सुबह पत्रकार शैलेष जी का फोन आया। उन्होंने कहा कि एसपी बीमार हैं। फिर उन्होंने कहा कि निर्मल अभी किसी को कुछ मत बताना। बस, उनके घरवालों का फ्लाइट का टिकट कटवा दो। मैंने कल्याण मजुमदार को कहकर स्पेशल कोटे में बड़े भइया से लेकर सबका टिकट कटवाया, दोपहर की फ्लाइट थी। 27 जून 1997 को भी सुबह 11.30 बजे शैलेष जी का फोन आया कि एसपी सिंह नहीं रहे। दरअसल, दूरदर्शन के 11 बजे के बुलेटिन में यह खबर आयी कि एसपी सिंह नहीं रहे। मैं तब कोलकाता में था, लेकिन मुझे दोपहर का टिकट नहीं मिला। शाम की फ्लाइट पांच बजे की थी। वह फ्लाइट लेट हो गयी। सात बजे कोलकाता से छूटी। मैं रात को साढ़े नौ बजे पहुंचा। निजामुद्दीन घाट जाने के लिए स्कूटर में बैठा। रास्ते में स्कूटर चालक ने पूछा कि वहां कहां जाना है तो मैंने कहा कि घाट जाना है। उन्होंने पूछा क्यों? मैंने कहा कि वो एक सज्जन हैं, जिनकी मौत हो गयी है। उन्होंने पूछा कि आजतक वाले। मैंने कहा हां। उन्होंने कहा कि वह सब कुछ तो शाम सात बजे ही खत्म हो चुका है। बाद में जानकारी मिली कि अटल बिहारी वाजपेयी, गुजराल, सीताराम केसरी, जयपाल रेड्डी माधव राव सिंधिया, सुषमा स्वराज सबसे पहले वहां पहुंचे। सबसे बाद में दो मिनट के लिए दिल्ली के सीएम साहब सिंह वर्मा भी वहां पहुंचे थे। आज ये सभी लोग इस दुनिया में नहीं हैं। शायद एसपी के साथ वे भी ऊपर बैठकर गुफ्तगू कर रहे होंगे। खबर सुनकर मुझे लगा कि मेरी दुनिया खत्म हो चुकी है। मैं भइया को देख नहीं पाया। यह दुख, यह पीड़ा आज भी मुझे सताती है, लेकिन थोड़ी देर बाद मुझे इस बात का अहसास हो जाता है कि वो मेरे आसपास हैं। मुझे निहार रहे हैं। मुझे सिखा रहे हैं। मुझे पढ़ा रहे हैं। मुझ पर प्यार बरसा रहे हैं। दरअसल, आज भी उन्हीं की यादों में मेरे दिन की शुरुआत होती है और ऑफिस पहुंचते ही उनकी यादों को दूसरों से बांटने में दिन बीत जाता है।

कुछ लोग दूसरी रिपोर्टों को पढ़कर एसपी सिंह के बारे में कुछ भी लिखते हैं, लेकिन मेरा तो उनके साथ अप्रैल 1977 से संबंध है। उनके बारे मे क्या लिखूं और क्या बताऊं, समझ में नहीं आता। अनगिनत बातें और अनगिनत यादें। 1977 से 1997 तक। बीस साल तक उनके साथ मैं साये की तरह लगा रहा। वे मेरे लिए क्या थे। शायद मैं इसे किसी को समझा नहीं सकता। पथ प्रदर्शक, संपादक, बड़े भाई, पिता या कुछ और। उन्होंने 'रविवार' क्यों छोड़ा, छोड़ने से पहले क्या हुआ, 'आनंद बाजार पत्रिका' के ऑनर अरूप बाबू ने उन्हें कितनी देर तक बिठाकर रखा, अभीक सरकार ने क्या कहा। 'नवभारत टाइम्स' क्यों छोड़ा, उस दिन 'नवभारत टाइम्स' के ऑनर समीर जैन के साथ क्या हुआ था। मैं घर से दौड़ा दौड़ा सुबह-सुबह क्यों उनके घर गया। उन्होंने मुझे उस दिन क्या हिदायत दी थी। जिस दिन उन्होंने 'नवभारत टाइम्स' छोड़ा था, कपिल देव की एजेंसी में क्यों अचानक गये। जॉइन करने से पहले उनकी क्या-क्या बातें हुईं । एजेंसी में जॉइन करने से पहले कपिल देव से वे कब मिले,  'राष्ट्रीय सहारा' में उन्होंने जॉइन क्यों किया और किसके कहने पर किया। चार दिन बाद उन्होंने 'राष्ट्रीय सहारा' कयों छोड़ा? जब मैं और भइया रोज उनके घर से 'राष्ट्रीय सहारा' जाते तो मुझे वे क्या-क्या सलाह देते और मुझे क्या कहते। किस तरह से वह टेलिविजन की दुनिया में गये। अरुण पुरी से क्या-क्या बातें हुईं और मैं कैसे बिछड़ गया, वे सारी बातें आज यादें बनकर रह गई हैं।

जिस दिन वह सदा के लिए हमसे बिछड़ गये, उस दिन की यादें। सच तो ये ही है कि टेलिविजन और प्रिंट की दुनिया में आज जितने भी बड़े नाम हैं, वे सब उन्हीं की देन हैं। संतोष भारतीय, कमर वहीद नकवी, शैलेष दा, जयशंकर गुप्त, अरुण रंजन, उदयन शर्मा, राजेश बादल, रामकृपाल सिंह, संजय पुगलिया, अजय चैधरी, पुण्य प्रसून वाजपेयी, आशुतोष गुप्ता, दीपक चौरसिया, अनिल ठाकुर, राजकिशोर और आजतक के सुप्रिय प्रसाद ऐसे ही बहुत सारे पत्रकार। 'न्यूज24' के ऑनर राजीव शुक्ला भी उन्हीं की देन हैं। हमें पता नहीं कि ये लोग एसपी सिंह को याद करते हैं या नहीं, लेकिन मैं उन्हें किसी न किसी बहाने लगभग रोज याद कर ही लेता हूं। कभी संपादक के रूप में, कभी एक अच्छे इंसान के रूप में, कभी उन्हें लोगों को माफ करने के कारण, कभी एक मसीहा के रूप में, तो कभी एक खबरचीलाल के रूप में, तो कभी दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए एक बड़े भाई के रूप में और कभी पिता के रूप में।

सच तो ये ही है कि मैंने अपनी पूरी जिंदगी में जितनी बातें पिता की नहीं सुनीं, उनकी सुनी हैं। उनकी बातें मेरे लिए ब्रह्म वाक्य थे। और हां, मैं एक नाम लेना तो भूल ही गया। वह नाम है नीरेंद्र नागर का, जो आज भी एसपी की चर्चा चलते ही उन्हें याद करते हैं। उन्होंने ही मेरी लिखी एसपी की किताब के संपादन का भार संभाला और खूब संभाला। मैं आज भी नीरेंद्र नागर को नहीं भूल पाया। इसके साथ ही अरुणरंजन और संतोष भारतीय को भी नहीं भूल पाऊंगा, जो कि उनके साथ साये की तरह लगे रहे। उनके एक और परम मित्र कोलकाता में थे, अक्षय उपाध्याय, वो भी एसपी भइया के पहले ही चले गये और सतन कुमार पांडे को मैं कैसे भूल सकता हूं, क्योंकि उनके साथ उनके कॉलेज के दिनों से ही संबध थे। दोनों मे बहुत ही गहरी मित्रता थी। अंतिम दिनों तक उनके साथ लगे रहे, लेकिन इन लोगों ने एसपी भइया के साथ रहने का दंभ कभी नहीं भरा और चुपचाप दोस्ती निभाते रहे। एक नाम और है, जो अब इस दुनिया में नहीं रहे। आनंद बाजार पत्रिका के बिजित बसु। एसपी भइया के परम मित्रों में से एक और राजदार। राज की बातें उन्हीं से शेयर करते थे।

दरअसल, एसपी भइया के.दो और परम मित्र थे। एमजे अकबर, अंग्रेजी पत्रकारों में एक बड़े ख्याति प्राप्त पत्रकार, उदयन शर्मा जो कि अब नहीं रहे। एसपी सिंह, उदयन शर्मा और एमजे अकबर की दोस्ती 'टाइम्स ऑफ इंडिया' मुंबई से शुरू हुई। ये तीनों विचारों के धनी और दोस्तों के दोस्त। बस यादें रह गयी हैं।

जी हां, यादें ही रह गयी हैं। वह एक काला दिन था, जब टेलिविजन पर खबरों का गजब का संसार रचने वाला एक शख्स हमारे बीच से सदा के लिए चला गया। तब दूरदर्शन ही था, जिसे पूरे देश में समान रूप से सनातन सम्मान के साथ स्वीकार किया जाता था। ये भी एक सच है कि देश के इस राष्ट्रीय टेलिविजन के मेट्रो चैनल की इज्जत एसपी सिंह की वजह से ही बढ़ी थी, क्योंकि वे उस पर रोजाना रात दस बजे खबरें लेकर आते, मुस्कुराते हुए, हंसी ठट्ठा करते हुए, खबरों पर कटाक्ष करते हुए, टीवी के परदे से इस पार झांकते, खबरों को जीते, दृश्यों को शब्द देते और शब्दों को तौलते और बीच बीच में उनका कटाक्ष कभी राजनीतिज्ञों पर, तो कभी ब्यूरोक्रेट्स पर तो कभी विपक्ष पर। सीधा वार। वह समाचार पुरुष खबरों की दुनिया में जो काम कर गया, पत्रकारों को जो इज्जत उन्होंने दी, टेलिविजन जगत में हिंदी पत्रकारिता को जो मुकाम दिया, वह आज तक कोई और नहीं कर पाया।

लेकिन हम सबको इस संसार को एक न एक दिन त्यागना ही पड़ता है। वो भी त्याग कर चले गये, लेकिन वे जरा जल्दी चले गये। हालांकि वे शाही अंदाज में गये। शायद ही ऐसा कोई पत्रकार होगा, जिसे शाही अंदाज मे जाने का मौका मिला हो। हां रफी साब भी जल्दी चले गये थे। मेरे दादा-दादी कहा करते कि जो अच्छे लोग होते हैं, उन्हें भगवान जल्दी बुला लेते हैं। रफी साब को भी जल्दी बुला लिया था। शायद इसलिए इन दोनों को बुला लिया था, क्योंकि भगवान को भी अच्छे लोगों की सोहबत में रहना अच्छा लगता है। गीता में कहा गया है कि जन्म लेने वाले के लिए मृत्यु उतनी ही निश्चित है, जितना कि मृत होने वाले के लिए जन्म लेना। इसलिए जो अपरिहार्य है, उस पर शोक नहीं करना चाहिए। लेकिन किसी की अच्छाइयों को भूल पाना कितना कठिन काम है, यह वही समझ सकता है जिसके साथ यह घटित होता है ...

27 जून 1997 को दूरदर्शन के दोपहर के बुलेटिन पर खबर आई। ये थीं खबरें अब तक। एसपी सिंह नहीं रहे। दुनिया को दुनिया भर की खबरें देने वाला एक खबरची एक झटके में खुद खबर बनकर रह गया। लेकिन दरअसल, यह खबर नहीं थी। एक वार था, एक प्रहार था, जो देश और दुनिया के लाखों दिलों पर बहुत गहरे असर कर गया। शुक्रवार का दिन था। काला शुक्रवार। इतना काला कि वह काल बनकर आया और हमारे एसपी भइया को काल के गर्भ में समा लिया। 27 जून 1997 को भारतीय मीडिया के इतिहास में सबसे दारुण और दर्दनाक दिन कहा जा सकता है। उस दिन से आज तक पूरे 23 साल हो गए। एसपी सिंह हमारे बीच में नहीं हैं, ऐसा बहुत लोग मानते हैं, लेकिन हम नहीं मानते, क्योंकि हमारा मानना है कि वे जिंदा हैं, हम में, आप में, और उन सब में, जो खबरों को खबरों की तरह नहीं, जिंदगी की तरह जीते हैं। हर इंसान की कद्र करते हैं। उन सबमें हम उन्हें देखते हैं, जिन्हें उन्होंने माफ कर दिया।

अनगिनत नाम हैं, जिन्हें उन्होंने माफ कर दिया। मेरे पास उन नामों की लिस्ट भी है, जो एसपी के पीछे उन्हें कोसते थे और एसपी भइया के सामने आते ही बिल्ली की तरह मिमियाते थे। एसपी भइया ने जिस तरह से समाज को दिया, जो प्यार और सरल स्वभाव लोगों में बांटा, जिस तरह से जर्नलिस्ट्स की एक कौम को आगे बढ़ाया, वे अद्भुत, अतुलनीय, अकाट्य और अस्वाभाविक है। वे सिखा ही रहे थे कि हमें छोड़कर चले गये। अपने जीवन के आखिरी न्यूज बुलेटिन में बाकी बहुत सारी बातों के अलावा एसपी भइया ने तनिक व्यंग्य में कहा था, मगर जिंदगी तो अपनी रफ्तार से चलती रहती है। जी हां, जिंदगी अपनी रफ्तार से चलती रहती है। दरअसल, रात के दस बजे पूरे देश को जिस खिचड़ी दाढ़ी वाले चेहरे ने खबरों के माध्यम से जागृति पैदा की थी, वह शख्स चला गया। देश के लाखों लोगों के साथ अपने लिए भी वह सन्न कर देने वाला प्रहार था।

संगीत प्रेमी थे। सूफी संगीत प्रेमी, लेकिन बांग्ला और हिंदी गीतों को भी वे सुनते थे। मैं जब रफी साब का कोई गीत गुनगुनाता तो मुझे कहते कि निर्मल तुम बहुत अच्छा गाते हो। मजाक में व्यंग्य भी करते ... क्योंकि वह भी उनकी एक शैली थी। कहते-कहां तुम 'रविवार' में पड़े हो, तुम्हारे लिए तो मुंबई ही ठीक है। बस, ये ही कहते-कहते वे हमसे बिछड़ गये। मैं आज कुछ भी नहीं हूं, लेकिन मैं जो कुछ भी हूं, उनके कारण ही हूं। उनके सिखाये हुए कदमों पर ही चलने की कोशिश कर रहा हूं। एक नेक इंसान बनने की कोशिश् कर रहा हूं। मैं नहीं जानता उनका पांच प्रतिशत भी मैं बन पाउंगा या नहीं, लेकिन आज भी मेरी कोशिश जारी है उन्हें छूने की, उनसे बात करने की निर्मल बुलाते ही दौड़कर उन तक पहुंचने की। दरअसल, उनको किसी भी चीज का लोभ नहीं था। निर्लोभी थे। धन, दौलत, राजसी ठाट बाट, अहंकार को उन्होंने कभी नहीं ओढ़ा। उन्होंने काम करने की आजादी दी और मैं आजादी का फायदा उठाकर सीखता गया, सीखता गया, और सीखता गया। आज उनके जाने के बाद मुझे वह गीत याद आ गया। ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है...

(लेखक दैनिक भास्कर में नोएडा संस्करण के संपादक हैं और ये उनके निजी विचार हैं)

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विनोद दुआ का जाना दुख का सबब भी है और सबक भी: विनोद अग्निहोत्री

उन्होंने अपने विचारों, सिद्धांतों और मूल्यों से समझौता नहीं किया और आखिर तक उनके लिए वह लड़ते रहे।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Sunday, 05 December, 2021
Last Modified:
Sunday, 05 December, 2021
Vinod Agnihotri Vinod Dua

विनोद अग्निहोत्री
सलाहकार संपादक, अमर उजाला समूह

बात उन दिनों की है, जब मैं ‘नवभारत टाइम्स‘ दिल्ली में बतौर उप संपादक काम करता था। एक दिन ‘नवभारत टाइम्स‘ के तत्कालीन कार्यकारी संपादक सुरेंद्र प्रताप सिंह से मिलने एक सज्जन आए। संयोग से मैं उस दिन एसपी सिंह के कमरे में ही बैठा था। एसपी ने मुझे उनसे मिलवाया कि ये विनोद दुआ हैं और दुआ से कहा कि ये आपके समान नाम वाले विनोद अग्निहोत्री हैं। विनोद दुआ से व्यक्तिगत रूप से मेरी वह पहली और सीधी मुलाकात थी। हालांकि, मैं उन्हें ‘दूरदर्शन‘ के तमाम कार्यक्रमों में देखता था और उनके बारे में जानता था। मुझे ‘दूरदर्शन‘ पर अपने नाम वाले को कार्यक्रम होस्ट करते देख बेहद आत्मतुष्टि मिलती थी और लगता था कि जैसे मैं ही यह कार्यक्रम कर रहा हूं। इसलिए विनोद दुआ से प्रत्यक्ष मिलकर बेहद खुशी हुई, क्योंकि उन दिनों ‘दूरदर्शन‘ पर जो चेहरे दिखते थे, वह सामान्य व्यक्ति के लिए फिल्मी सितारों की तरह ही होते थे। मेरे लिए विनोद दुआ से मिलना एक अविस्मरणीय अनुभव था, क्योंकि मुझे पत्रकारिता में आए कुछ साल ही हुए थे। इस मुलाकात में ही विनोद दुआ ने जिस बेतकल्लुफी से मुझसे बात की, उसने भी मुझे बेहद प्रभावित किया।

बाद में विनोद दुआ से मेरा मिलना-जुलना होता रहा। उनकी सहजता और अपनेपन ने मुझे बेहद प्रभावित किया। हालांकि उन दिनों राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे और देश पर कांग्रेस का एकाधिकार था और मेरी वैचारिक पृष्ठभूमि समाजवादी होने के कारण मेरा उन सभी लोगों से मतभेद रहता था जो कांग्रेस के करीब दिखाई देते थे। इसके बावजूद विनोद दुआ के साथ मेरी आत्मीयता बढ़ती चली गई। पिछले करीब दो दशकों के दौरान मुझे कई बार कुछ कार्यक्रमों में उनके साथ मंच साझा करने का भी मौका मिला। ‘इंडिया इंटरनेशलन सेंटर‘ में उनसे अक्सर मुलाकात हो जाती थी। कुछेक ऐसी दावतों में भी मैंने शिरकत की, जहां विनोद दुआ का गाना सुनने का मौका भी मिला। वह बेहतरीन गायक थे। देश विभाजन के बाद उनके माता-पिता पाकिस्तान से दिल्ली आ गए थे और दिल्ली की एक रिफ्यूजी कालोनी से उठकर विनोद दुआ पत्रकारिता के शिखर पर सितारे की तरह चमके। हिंदी और अंग्रेजी में समान अधिकार रखने वाले विनोद दुआ के भीतर मैंने भारत-पाकिस्तान दोस्ती के प्रति एक खास तरह की तड़प देखी थी। दिल्ली वाला होते हुए भी उनके भीतर एक ठेठ पंजाबीपना भी था, जिसने उन्हें बेहद हंसमुख, बेपरवाह और मस्त इंसान बना दिया था।

‘दूरदर्शन‘ पर उनके कार्यक्रम जनवाणी, परख और चुनाव विश्लेषण तो भारतीय टीवी पत्रकारिता के लिए मील का पत्थर हैं, जिनमें तत्कालीन राजनीतिक व्यवस्था और सरकारी तंत्र के खोखलेपन को उजागर किया जाता था। ‘एनडीटीवी‘ में उनका विशेष शो जायका इंडिया का भी बेहद  लोकप्रिय रहा, जिसने देश के तमाम अंचलों के खान पान और पकवानों से दर्शकों को रूबरू कराया। इसके लिए उन्होंने पूरे देश में हर छोटे-बड़े शहर के गली-मुहल्लों में घूम-घूमकर वहां के खास पकवानों और व्यंजनों पर विस्तृत रिपोर्टिंग की। विनोद दुआ के समकालीन कई पत्रकारों ने अकूत संपत्ति बनाई, लेकिन अपनी तमाम योग्यता और ब्रैंड वैल्यू के बावजूद विनोद दुआ ने अपने पेशे को कारोबार नहीं बनाया। उन्होंने जिस संस्थान में भी काम किया, अपनी शर्तों पर किया और जब लगा कि संस्थान में उनके लिए काम करना मुश्किल हो रहा है तो उन्होंने बेहद शालीनता से उसे अलविदा कह दिया।

पिछले कुछ सालों से इंटरनेट पर उनका शो बेहद लोकप्रिय हुआ। हालांकि उसके लिए उन्हें मुकदमेबाजी के कानूनी झंझटों से भी उलझना पड़ा और आखिरकार उन्हें सुप्रीम कोर्ट से राहत मिली। लेकिन उन्होंने अपने विचारों, सिद्धांतों और मूल्यों से समझौता नहीं किया और आखिर तक उनके लिए वह लड़ते रहे। विनोद दुआ उन बहादुर पत्रकारों में थे, जिनके भीतर किसी भी सरकार और बड़े से बड़े नेता से अनचाहा सवाल भी पूछने की हिम्मत थी। चाहे कांग्रेस की सरकार रही हो या गैर कांग्रेसी सरकार, हर बड़े नेता मंत्री और अधिकारी से उनके निजी रिश्ते भी थे, लेकिन इन संबंधों को उन्होंने कभी भी अपनी पत्रकारिता के आड़े नहीं आने दिया। इस सबके बावजूद पिछले कुछ वर्षों से विनोद दुआ अकेलेपन का शिकार हो गए थे। शायद मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों के इस दौर में उन्हें अपने-पराए की सही पहचान हो गई थी। तथाकथित मुख्यधारा के मीडिया ने अपने इस दिग्गज से कन्नी काट ली और उन्हें सोशल मीडिया का सहारा लेना पड़ा। कोरोना काल में जब सब अपने घरों में एक तरह से कैद होकर रह गए थे, तब विनोद दुआ जैसे फराखदिल इंसान के लिए वह समय बेहद कठिन और चुनौती भरा रहा।

विनोद दुआ का यूं चले जाना एक सामान्य घटना नहीं है। कहा जा सकता है कि पिछले करीब एक साल से उनकी सेहत ठीक नहीं थी और करीब छह महीने पहले पत्नी के निधन के शोक ने उन्हें भीतर से और भी कमजोर कर दिया था, जो धीरे-धीरे उन्हें मौत के करीब ले गया। मैं उनकी इस मृत्यु को स्वाभाविक इसलिए नहीं मानता हूं कि एक तो 67 साल की आयु आम तौर पर ऐसी नहीं होती कि यह मान लिया जाए कि चलो उनका वक्त पूरा हो गया था, दूसरे विनोद दुआ जैसे जिंदादिल और खुशदिल इंसान के लिए शायद यह दुनिया अब घुटन भरी हो चुकी थी, जिसे उन्होंने हमेशा के लिए छोड़ दिया। इसलिए विनोद दुआ का निधन पूरे पत्रकारिता जगत या आधुनिक शब्दावली में मीडिया की दुनिया के लिए एक शोक का सबब तो है ही, एक बड़ा सबक भी है।

सबक यह कि जिस कदर हम सब अपने आप में एकाकी होते जा रहे हैं वह कहीं न कहीं हम सबको भीतर ही भीतर इतना कमजोर बना रहा है कि हम अपने बाहर जो कुछ भी अच्छा-बुरा घट रहा है, न सिर्फ उससे अलग-थलग पड़ते जा रहे हैं बल्कि उससे लड़ने की हमारी ताकत भी घटती जा रही है। इसलिए अगर इस चुनौती भरे समय में हम सब अपने अपने घरौंदों से निकलकर एक बार फिर वैसे ही मिलना-जुलना, उठना-बैठना, लड़ना-झगड़ना, उलझना और फिर हाथ मिलाकर गले मिलकर अगले दिन मिलने का वादा करने का सिलसिला शुरु कर सकें तो शायद हम अपने एकाकीपन से भी लड़ पाएंगे और विनोद दुआ को यही सच्ची श्रद्धांजलि भी होगी।

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अलविदा विनोद जी! आपकी पत्रकारिता का यह देश हमेशा ऋणी रहेगा: राजेश बादल

विनोद दुआ अब नहीं हैं। इस खबर पर यकीन नहीं करना चाहता, लेकिन यह सच है कि वे अब अपनी अनंत यात्रा पर चले गए हैं।

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Published - Sunday, 05 December, 2021
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Sunday, 05 December, 2021
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राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।  

विनोद दुआ अब नहीं हैं। इस खबर पर यकीन नहीं करना चाहता, लेकिन यह सच है कि वे अब अपनी अनंत यात्रा पर चले गए हैं। बीते चार दशक से वे भारतीय टेलिविजन पत्रकारिता की मज़बूत रीढ़ थे। उमर भर दबाव आए, तमाम झंझावात आए पर वे अपने सिद्धांतों से डिगे नहीं। कोई भी सरकार रही हो, विनोद दुआ के आगे उसकी नही चली। कारण यही था कि विनोद दुआ को कोई भी लालच या प्रलोभन डिगा नहीं सकता था। आने वाली नस्लें शायद भरोसा भी न करें कि देश में कभी एक ऐसा पत्रकार  एंकर भी था, जो ताल ठोक कर कहता था, जो कहूंगा सच कहूंगा। सच के सिवा कुछ नहीं कहूंगा। उनसे मेरे रिश्ते की शुरुआत उन्नीस सौ पचासी से नब्बे के बीच हुई थी। 

मैं उन दिनों ‘नवभारत टाइम्स’ जयपुर में मुख्य उपसंपादक था। दिल्ली आना जाना लगा रहता था और शाम की किसी महफ़िल में हम साथ थे। उन्होंने और चिन्ना भाभी ने गाने गाए। कुछ मैंने भी साथ दिया। ब्रायन सिलास पियानो पर साथ दे रहे थे। सुबह चार साढ़े चार बजे तक महफ़िल चली। फिर जामा मस्जिद के पास पूड़ी सब्ज़ी खाने गए। उन्होंने निहारी खाई। हमारे रिश्ते की वह शुरुआत थी। इसके बाद तो कई साल तक उनसे बाबा बुल्लेशाह से लेकर बाबा फरीद, कबीर, तुलसी और जायसी जैसे महा-रचनाकारों की अनगिनत रचनाएं सुनी। पुराने गीत सुने और साथ में गाए भी। चिन्ना भाभी भी बहुत अच्छा गाती थीं। उनके घर का एक कमरा हम जैसों के लिए ही आरक्षित रहता था। उनकी मां भी हम लोगों को बेटे जैसा ही प्यार करती थीं। इसके बाद अख़बार के साथ साथ ‘दूरदर्शन’ से मेरा भी रिश्ता बन गया। हमारी दोस्ती परवान चढ़ी।

उन्नीस सौ बानवे में भारत की पहली समाचार पत्रिका ‘परख’ हम लोगों ने शुरू की। कर्ता धर्ता विनोद जी ही थे। ‘परख’ ने शीघ्र ही टीवी पत्रकारिता में झंडे गाड़ दिए। पत्रिका दूरदर्शन पर थी, लेकिन कोई दबाव हमारे ऊपर नहीं था। केंद्र और राज्य सरकारों की हम खुलकर आलोचना करते थे, पर कभी कोई दबाव नहीं आया। कभी कुछ ऐसा हुआ भी तो विनोद जी ने उसे कपूर की तरह उड़ा दिया। ‘परख’ की रिपोर्टिंग टीम में हम लोगों के साथ रजत शर्मा भी थे। वे पंजाब से रिपोर्टिंग करते थे। 

असल में सरकार और सत्ता प्रतिष्ठानों से सिद्धांतों पर टकराव विनोद जी के स्वभाव में था। परख से पहले ‘जनवाणी’ नामक एक कार्यक्रम प्रसारित होता था। इसमें विनोद जी एक शख्सियत का साक्षात्कार करते थे। सवाल इतने तीखे होते थे कि सामने वाले को उत्तर देना मुश्किल हो जाता था। उन दिनों राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे। अशोक गहलोत नए नए केंद्रीय मंत्री बने थे। विनोद जी के सवालों का उत्तर तक वे नहीं दे पाए। एपिसोड प्रसारित हुआ तो उनकी बड़ी किरकिरी हुई। अगले दिन कुछ वरिष्ठ मंत्री और कांग्रेस नेता राजीव गांधी के पास पहुंचे और उनसे कहा कि सरकारी दूरदर्शन पर सरकार के ही मंत्री की छवि ख़राब की जा रही है। विनोद दुआ को हटाया जाए। राजीव गांधी ने कहा कि अगर कोई मंत्री टीवी पत्रकार के प्रश्नों का उत्तर नहीं दे पाए तो इसमें विनोद दुआ की क्या गलती? अगले दिन ही अशोक गहलोत का इस्तीफा हो गया। एक साक्षात्कार में रक्षा मंत्री शरद पवार आए। विनोद दुआ के सामने नहीं देखकर वे सवालों का उत्तर इधर-उधर देख कर दे रहे थे। टीवी पत्रकारिता में यह असभ्यता मानी जाती है। जब बहुत हो गया तो विनोद दुआ ने कहा, शरद पवार जी! मेरी तरफ देख कर उत्तर दीजिए। आप इधर-उधर देखते हैं तो ऐसा लगता है जैसे राष्ट्र के नाम संदेश दे रहे हैं और मैं अपना वक़्त बर्बाद  कर रहा हूं। यह टिप्पणी दूरदर्शन पर प्रसारित भी हुई। आज किसी पत्रकार में हिम्मत है? 

जब मोती लाल वोरा उत्तर प्रदेश के राज्यपाल थे तो मैनें ‘परख’ के संवाद स्तंभ में साक्षात्कार के लिए उनसे बात की। वोरा जी ने तब तक किसी भी राष्ट्रीय टीवी कार्यक्रम के लिए कोई साक्षात्कार नहीं दिया था। लेकिन विनोद दुआ के कारण पशोपेश में थे। मैनें उन्हें भरोसा दिया कि कुछ भी गड़बड़ नहीं होगी। वे तैयार हो गए। मैं उनके साथ लखनऊ से दिल्ली आया। रिकॉर्डिंग से पहले विनोद जी से मैंने वोरा जी की यह चिंता जताई और उनसे नरमी बरतने का अनुरोध किया। विनोद जी बोले, ‘राजेश जी! वे एक राज्यपाल हैं और संवैधानिक प्रमुख हैं। उनसे कहिए, निश्चिंत रहें। कम राजनेता ऐसे हैं, जिन्हें मैं पसंद करता हूं और उनमें से एक वोरा जी भी हैं।’ जैन स्टूडियो में यह साक्षात्कार रिकॉर्ड किया गया और बेहद पसंद किया गया। 

मेरी अपनी परख की अनेक विशेष समाचार रिपोर्टों के कारण सरकारें, बड़े राजनेता तक मुश्किल में पड़ जाते थे। उन रिपोर्टों पर विनोद दुआ की पैनी टिप्पणी सोने में सुहागे का काम करती थी। इसी तरह रजत शर्मा, विनोद दुआ, विजय त्रिवेदी और मुकेश कुमार की धारदार रिपोर्टिंग परख को धारदार बनाती थी। वैसी रिपोर्टिंग तो आज की पीढ़ी के लिए असंभव ही है। मगर दूरदर्शन को यह आज़ादी मिली रही। आज के दौर को देखते हुए तो शायद ही कोई इस पर भरोसा करेगा। परख का अपना राष्ट्रीय संवाददाता तंत्र था। उन दिनों दूरदर्शन के पास भी ऐसा तंत्र नहीं था। अस्सी के दशक में प्रणव राय और विनोद दुआ की जोड़ी ने चुनावों के दौरान जो विश्लेषण किए, वे हिन्दुस्तान ही नहीं, समूचे एशिया के लिए एक धरोहर से कम नहीं हैं। उन दिनों ईवीएम नहीं होती थी और मतगणना कई दिन चलती थी। उस दरम्यान यह जोड़ी किसी भी पार्टी या सरकार या राजनेता को नही छोड़ती थी। मुद्दों पर निष्पक्ष आलोचना की नींव तो इसी जोड़ी ने छोटे परदे पर डाली। 

लोग यह मानते हैं कि छोटे परदे पर बाहरी प्रड्यूसर की ओर से ‘डीडी मेट्रो’ पर दैनिक बुलेटिन ‘आजतक’ ने प्रारंभ किया था। पर यह सच नहीं है। ‘आजतक’ से पहले विनोद दुआ ने उसी समय पर ‘न्यूज वेब’ दैनिक बुलेटिन शुरू किया था। इस बुलेटिन ने एक सप्ताह में ही झंडे गाड़ दिए थे। अफ़सोस, यह कुछ महीनों बाद किन्ही कारणों से बंद हो गया। लेकिन विनोद दुआ ने शानदार पत्रकारिता के ज़रिए नए नए कीर्तिमान स्थापित किए। ‘सहारा’, ‘ऑब्जर्वर’, ‘चक्रव्यूह’ और ‘न्यूज़ ट्रैक’ पर विनोद दुआ की पत्रकारिता हरदम याद की जाएगी। ‘एनडीटीवी’ पर उनका दैनिक शो अपनी गुणवत्ता के लिए मशहूर था। लोग उसका बेताबी से इंतज़ार करते थे। ‘द वायर’ पर उनकी तीखी टिप्पणियों पर दर्शक रीझते थे क्योंकि वे उनके दिल की बात करते थे। 

विनोद जितने अच्छे सरोकारों को समर्पित पत्रकार थे, उससे अच्छे प्रस्तोता याने एंकर थे। जितने अच्छे प्रस्तोता थे, उससे अच्छे टीवी की बारीकियों के विशेषज्ञ और उससे भी अच्छे गायक। जितने अच्छे गायक, उससे बड़े जानकार थे मुल्क के तमाम हिस्सों के देशज खाने के बारे में। उनका देशभर का ज़ायके का सफ़र उतने ही चाव से देखा जाता था, जितनी गंभीरता से उनका न्यूज विश्लेषण। सबसे बड़ी बात, वे सबसे बेहतरीन इंसान थे। उनके मानवीय गुण बेमिसाल थे। उनकी टीम में सारे सदस्य बराबर थे, चाहे वे किसी भी पद पर हों। नए नए लोगों को खोजकर उन्हें टीवी पत्रकारिता सिखाने का उनका हुनर बेजोड़ था। कितने लोग जानते हैं कि आज इंडिया टीवी के मालिक रजत शर्मा ने ‘परख’ के साथ पंजाब से रिपोर्टिंग करते हुए टीवी पत्रकारिता का ककहरा सीखा था। ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ के पूर्व संपादक दिलीप पडगांवकर और बादशाह सेन भी विनोद दुआ के टीवी स्कूल में रहे थे। मैंने स्वयं उनसे बहुत सी नई बातें सीखी। मेरे साथी विजय त्रिवेदी, डॉक्टर मुकेश कुमार, लोकप्रिय एंकर संदीप चौधरी से लेकर उनसे टीवी पत्रकारिता समझने वालों की एक लंबी सूची है।

अफ़सोस! हालिया दौर में विनोद दुआ को अपनी स्वस्थ्य पत्रकारिता और सरोकारों पर डटे रहने के लिए परेशान किया गया। हालांकि इसका उन पर कोई ख़ास असर नहीं पड़ा। वे अपने अंदाज़ में बेखौफ पत्रकारिता करते रहे। अलबत्ता उन्हें झटका ज़रूर लगा था। अक्सर इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में हमारी शाम को महफ़िल जम जाती थी और वे तब खेद प्रकट करते थे कि एक ज़माने में राजनीति दूरदर्शन जैसे सरकारी मंच से निष्पक्ष पत्रकारिता करने का अवसर प्रदान करती थी और आज दूरदर्शन किस तरह व्यवहार कर रहा है। एक नवोदित चैनल ने उनके साथ धोखा किया था। शो के लिए तय राशि नहीं दी। यह राशि लगभग पैंतालीस लाख थी। वे खिन्न थे। मुझसे फ़ोन पर बोले, मेरा पैसा तो मैं निकाल कर रहूंगा।

मेरे घर के सारे सदस्य उनके साथ वैसे ही जुड़े थे, जैसे एक पारिवारिक सदस्य होता है। मेरी मां और पत्नी से उनकी एकदम घरेलू बातचीत होती थी। जब मेरे घर दो जुड़वां बेटे आए तो उनका नाम विनोद जी ने मेघ-मल्हार रखा था। चूंकि मेरी बेटी का नाम मेघना है इसलिए अब भी लाड़ में उन्हें मेघना, मेघ मल्हार कहते थे। बच्चों की अपनी बातचीत में विनोद अंकल भी एक विषय होते थे। एक बार मैनें उन्हें लोक कवि ईसुरी की जीवन दर्शन पर आधारित एक रचना गाकर सुनाई। उनके अंतर्मन को छू गई। एक सप्ताह बाद रात साढ़े ग्यारह बजे उनका फोन आया। बोले, क्या कर रहे हैं? मैंने कहा सोने की तैयारी। बोले कुछ आवारागर्दी का मूड है। मैंने कहा, क्यों नहीं, वह तो टॉनिक है। उससे सेहत को कोई नुकसान नहीं होता। पंद्रह मिनट में ही वे मुझे लेने आ पहुंचे। बैठते ही उन्होंने कहा, उस दिन से ईसुरी की वह रचना मेरे दिमाग़ में छाई हुई है। आज वही गाते हैं। फिर हम लोग समवेत वह रचना गाते रहे। वह रचना थी-

‘अब न होबी यार किसी के, जनम-जनम खां सीके, यार करे की बड़ी बिबूचन, बिना यार के नीके...’ ईसुरी की प्रेम केंद्रित फागें भी उन्हें बेहद पसंद थीं। हम लोग सारी रात क़रीब सुबह साढ़े चार बजे तक ईसुरी गाते रहे। बीच बीच में बाबा बुल्ले शाह भी आ जाते थे तो शिव कुमार बटालवी भी। 

मेरे लिए जो क्षति है, वह तो है ही, सारी विश्व पत्रकार बिरादरी के लिए यह बड़ा आघात है। कुछ बरस पहले अमेरिका में था तो वॉशिंगटन में पाकिस्तान के ‘एआरवाई’ चैनल के प्रमुख मोहसिन भाई अक्सर कहते थे, ‘राजेश भाई बंटवारे के बाद कुछ हीरे ऐसे हैं जो पाकिस्तान में भी उतने ही लोकप्रिय हैं जितने हिन्दुस्तान में होंगे। इनमें लता मंगेशकर, जगजीत सिंह, मोहम्मद रफ़ी, खुशवंत सिंह और विनोद दुआ। आपका एक विनोद दुआ सौ-सौ पत्रकार के बराबर है। बाजू में खड़े नेपाल के पत्रकार रघु मैनाली, अफ़ग़ानिस्तान के पत्रकार इक़राम सिंघवारी और बांग्लादेश के पत्रकार (मैं नाम भूल रहा हूं) ने तुरंत इसका समर्थन किया। उनका कहना था कि विनोद जी उनके देशों में भी बड़े आदर से याद किए जाते हैं। 

अलविदा विनोद जी! आपके साथ बिताया समय अनमोल है। आपकी पत्रकारिता का यह देश हमेशा ऋणी रहेगा। 

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सिर्फ नाम के ही नहीं, बल्कि जीते-जागते ‘विनोद’ थे विनोद दुआ जी: कमर वहीद नकवी

वह 1991 का जून का महीना था, जब विनोद जी से मेरी पहली मुलाकात दिल्ली में हुई थी। तब तक वह खासे मशहूर और सेलिब्रिटी एंकर बन चुके थे। तीन दिनों तक मैं उनके साथ रहा।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Sunday, 05 December, 2021
Last Modified:
Sunday, 05 December, 2021
Qamar Waheed Naqvi

कमर वहीद नकवी, वरिष्ठ पत्रकार।।

वह 1991 का जून का महीना था, जब विनोद जी से मेरी पहली मुलाकात दिल्ली में हुई थी। तब तक वह खासे मशहूर और सेलिब्रिटी एंकर बन चुके थे। तीन दिनों तक मैं उनके साथ रहा। 'बहुत बड़ा आदमी' होने की कोई रत्ती भर भी हनक उनमें नहीं दिखी। हुआ यूं कि ‘एनडीटीवी‘ को ‘दूरदर्शन‘ पर दसवीं लोकसभा की मतगणना का तीन दिनों तक लगातार सीधा प्रसारण करना था। उन दिनों वोट बैलट पेपर पर डाले जाते थे और लोकसभा चुनाव के वोटों की गिनती पूरी होने में तीन दिन लग जाया करते थे। प्रणय रॉय और विनोद दुआ इस शो के एंकर थे। विनोद जी हिंदी की एंकरिंग का जिम्मा संभाल रहे थे और मुझे उनके लिए हिंदी में इनपुट और रिसर्च का काम करना था।

टीवी पत्रकारिता के भारी-भरकम तामझाम, लकदक स्टूडियो, स्क्रीन पर कुलाँचे भरते ग्राफिक्स की चकाचौंध से यह मेरा पहला सामना था। मैं था निपट हिंदीभाषी और मेरे चारों तरफ पूरी की पूरी टीम फर्राटेदार अंग्रेजी वाली। विनोद जी ने शायद पहली ही नजर में मेरी परेशानी भांप ली और फिर इस बात का पूरा ख्याल रखा कि मैं कोई परेशानी महसूस न करूं, यहां तक कि यह भी उनकी चिंता में शामिल होता कि मैंने ठीक से नाश्ता कर लिया या नहीं।

विनोद जी बहुत बड़े पत्रकार तो थे ही, बहुत बड़े इंसान भी थे। वह नाम के ही विनोद नहीं थे, बल्कि जीते-जागते विनोद थे। उनसे दो मिनट की भी बातचीत हो, तो आप हंसे-मुस्कराए बिना लौट ही नहीं सकते। गजब की हाजिरजवाबी और उनकी चुटकियों की गजब की धार। अपने चार दशक से ज्यादा के पत्रकारीय जीवन में उन्होंने राजनीति की हर परत उधेड़ी, हर राजनीतिक दल, हर सरकार और हर बड़े नेता को अपने तीखे सवालों के कटघरे में खड़ा किया। उनके सवाल बड़े तीखे और चुटीले होते थे, ठीक निशाने पर जाकर लगते थे, लेकिन सवाल बड़ी मिठास से पूछे जाते थे, चुटकियां लेते हुए, मुस्कराते हुए। लेकिन, कभी किसी ने विनोद दुआ की पत्रकारीय ईमानदारी पर कोई सवाल नहीं उठाया, कभी किसी ने यह लांछन नहीं लगाया कि वह किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं या इस या उस पार्टी के साथ पक्षपात करते हैं या किसी को जानबूझ कर बदनाम करते हैं। दुर्भाग्य है कि अभी हाल के एक-दो बरसों में उन पर देशद्रोह तक के फर्जी मुकदमे दर्ज किए गए।

अगर मैं कहूं कि विनोद दुआ हिंदी में टीवी पत्रकारिता के जनक थे, तो शायद अतिश्योक्ति न होगी। उनके कार्यक्रम 'जनवाणी' और उसके बाद 'परख' ने हिंदी के असंख्य पत्रकारों को टीवी रिपोर्टिंग और एंकरिंग का ककहरा सिखाया और देश के दूरदराज हिस्सों तक से टीवी पत्रकारों की बिलकुल नई पौध तैयार हुई। भारत में रंगीन टीवी तो 1982 के दिल्ली एशियाई खेलों के साथ ही शुरू हुआ था और जब 1985 में विनोद जी के कार्यक्रम 'जनवाणी' में केंद्र सरकार के मंत्रियों को सीधे जनता के सवालों का जवाब देना पड़ा, वह देखना अपने आप में अद्भुत था, वह भी एक सरकारी समाचार माध्यम पर! आज तो बहुतेरे प्राइवेट चैनलों पर ऐसे सवाल नहीं पूछे जाते! 1992 में उनके साप्ताहिक कार्यक्रम 'परख' में देश के कोने-कोने से आनेवाली टीवी रिपोर्ट्स तो बड़ी ही चर्चित रहीं।

विनोद जी टीवी पत्रकारिता के एक ऐसे प्रकाशस्तंभ थे, जिन्होंने अपने समय की पूरी की पूरी पीढ़ी के पथ को अपनी पत्रकारीय विश्वसनीयता, दायित्व-बोध, बेबाकी, और आचरण की शालीनता जैसे मूल्यों से सदा आलोकित किया। सादर नमन।

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अंग्रेजी के वरिष्ठ पत्रकारों ने कुछ यूं दी विनोद दुआ को श्रद्धांजलि

वरिष्ठ पत्रकार विनोद दुआ के निधन के बाद उन्हें श्रद्धांजलि देने वालों का तांता लगा हुआ है। अंग्रेजी के तमाम बड़े पत्रकारों ने ईश्वर से दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करने की प्रार्थना की। 

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Sunday, 05 December, 2021
Last Modified:
Sunday, 05 December, 2021
VinodDua32659

वरिष्ठ पत्रकार विनोद दुआ के निधन के बाद उन्हें श्रद्धांजलि देने वालों का तांता लगा हुआ है। अंग्रेजी के तमाम बड़े पत्रकारों ने ईश्वर से दिवंगत आत्मा को शांति व शोकाकुल परिवार को इस दुःख की घड़ी को सहन करने की शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना की है। 

‘एनडीटीवी’ (NDTV) के फाउंडर्स-प्रमोटर्स डॉ. प्रणॉय रॉय ने विनोद दुआ को श्रद्धांजलि देते हुए ट्वीट किया है, ‘विनोद दुआ को खोने का काफी गहरा दुख है। वह न सिर्फ महान लोगों में शामिल थे, बल्कि अपने समय की सबसे महान शख्सियत थे। वह सबसे बड़ी एक अद्भुत प्रतिभा थे, जिसकी मैंने हमेशा प्रशंसा की और सम्मान किया और जिनसे मैंने बहुत कुछ सीखा। हमने साथ मिलकर कई साल काम किया। अलविदा मेरे दोस्त, भगवान आपको अपने श्रीचरणों में स्थान दें।’

वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने विनोद दुआ को श्रद्धांजलि देते हुए ट्वीट किया है। इस ट्वीट में उन्होंने लिखा है, ‘विनोद दुआ जैसी स्वभाविक टीवी पर्सनेलिटी कोई नहीं है। वह ट्रेंड स्थापित करने वाले पत्रकार थे, जिन्होंने पॉलिटिक्स, फूड, म्यूजिक आदि पर समान रूप से बेहतरीन कार्यक्रम पेश किए। 80-90 के दशक में दुआ-रॉय की इलेक्शन जुगलबंदी काफी खास थी। दूरदर्शन पर आम चुनाव को लेकर उनकी लाइव कवरेज कमाल की थी। भगवान उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें।’ 

जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार और लेखक वीर सांघवी ने विनोद दुआ को श्रद्धांजलि देते हुए ट्विटर पर लिखा है, ‘देश में टेलीविजन न्यूज के अग्रणी और शायद हमारे समय के सबसे महान टीवी प्रजेंटर विनोद दुआ के निधन से काफी दुखी हूं।’ पहली बार जब मैं टीवी पर आया तो विनोद जी एंकर थे और मैंने उनकी स्वाभाविक और खास स्टाइल की प्रशंसा की, जिसे आने वाले दशकों में हममें से कोई भी मैच नहीं कर सका। उनका निधन अपूरणीय क्षति है।

न्यूज एजेंसी ‘एएनआई’ (ANI) की एडिटर स्मिता प्रकाश ने ट्वीट किया है, 'अलविदा विनोद, तुम और चिन्ना वहां अपने गानों और व्यवहार से भगवान को भी अपना बना लोगे।’

एक अन्य ट्वीट में उन्होंने कहा, ‘वैमनस्यता रोको। विनोद दुआ पर आज के घटिया ट्वीट्स उतने ही निंदनीय हैं, जितने रोहित सरदाना के निधन पर किए गए थे।’

वरिष्ठ पत्रकार और न्यूज एंकर स्मिता शर्मा ने विनोद दुआ को श्रद्धांजलि देते हुए अपने ट्वीट में लिखा है, ‘पत्रकारों की पीढ़ियों के वह प्रेरणास्रोत थे। हमें आईबीएन7 में कुछ साल तक साथी एंकर के रूप में काम करने का सौभाग्य मिला। हमें उनके साथ फूड, म्यूजिक, कला, आर्ट और उनके रोमांचक सफर के बारे में बात करना काफी अच्छा लगता था। भगवान उनकी आत्मा को शांति दे। विनोद दुआ आप अनंत में चिन्ना जी के साथ जाकर मिल गए हैं। आपको हाथ जोड़कर नमन।‘

बता दें कि करीब 67 साल के विनोद दुआ पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे थे। हालत ज्यादा गंभीर होने पर उन्हें दिल्ली के अपोलो अस्पताल में आईसीयू (ICU) में भर्ती कराया गया था, जहां पर शनिवार को उन्होंने अंतिम सांस ली। विनोद दुआ का अंतिम संस्कार रविवार दोपहर 12 बजे लोधी रोड श्मशान घाट में किया जाएगा।

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हिंदी टीवी पत्रकारिता को सम्मान दिलाने वाले विनोद दुआ को आखिरी सलाम: विजय त्रिवेदी

विनोद दुआ हिंदी टीवी पत्रकारिता का सबसे बड़ा नाम यूं ही नहीं थे। उनसे ज़्यादा कैमरा फ्रेंडली एंकर शायद ही कोई दूसरा रहा हो।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 04 December, 2021
Last Modified:
Saturday, 04 December, 2021
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विजय त्रिवेदी, वरिष्ठ पत्रकार ।।

मेरे पत्रकार और फ़िल्मकार मित्र जो एक सीनियर जर्नलिस्ट हैं, ने ट्विटर पर लिखा- ‘विनोद मरा नहीं, विनोद मरते नहीं।’ सच ही लिखा है, भले ही यह खबर सच हो कि वरिष्ठ पत्रकार विनोद दुआ ने शनिवार को साढ़े चार बजे दिल्ली के अपोलो अस्पताल में आखिरी सांस ली, लेकिन विनोद दुआ, उनकी पत्रकारिता, उनकी जांबाज़ी, उनकी हिम्मत मर नहीं सकती। अपने 35 साल के करियर में उनका यह अंदाज़ सैकड़ों पत्रकारों में छूट गया है, जो खत्म नहीं हो सकता। उसे खत्म किया नहीं जा सकता।

विनोद दुआ हिंदी टीवी पत्रकारिता का सबसे बड़ा नाम यूं ही नहीं थे। उनसे ज़्यादा कैमरा फ्रेंडली एंकर शायद ही कोई दूसरा रहा हो। आज के दौर में जब ज़्यादातर एंकर टीवी प्रॉम्पटर के बिना नहीं चल सकते हों, उसमें विनोद दुआ ने कभी प्रॉम्पटर का इस्तेमाल नहीं किया, क्योंकि किसी भी कार्यक्रम या स्टोरी के लिए उनके दिमाग में तस्वीर साफ होती थी और वो वही बोलते थे, चाहे आपको पसंद आए या नहीं।

दुआ साहब यूं तो खुद को पत्रकार नहीं कहते थे, और प्रजेंटर बोलते थे, क्योंकि उस ज़माने में दूरदर्शन पर एंकर प्रजेंटर ही होते थे, लेकिन उनकी राजनीतिक समझ और पत्रकारिता की पैनी धार ऐसी रही, जिसका तोड़ पाना आसान काम नहीं था। कैमरे के सामने उनका दुस्साहस और बेलागमपन उन्हें सबसे अलग करता है, उनका अपना खास अंदाज़ था, बेफिक्री का अंदाज़। दूरदर्शन पर चुनाव विश्लेषणों ने उनको ऐसी पहचान दी कि वो हर हिन्दुस्तानी घर में सेलेब्रिटी हो गए। प्रणव रॉय और उनकी जोड़ी खूब जमती थी। दिल्ली के हंसराज कॉलेज से अंग्रेजी में स्नातक और दिल्ली विश्वविद्यालय से लिट्रेचर में एम ए कर चुके दुआ की अंग्रेजी और हिंदी दोनों पर जबरदस्त पकड़ थी। प्रणव रॉय के अंग्रेजी प्रजेंटेशन को भी वे तुरंत बड़ी खूबसूरती से हिंदी में समझा देते थे। हिंदी टीवी पत्रकारिता को सम्मान दिलाने में उनकी भूमिका को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकेगा।

क्या अब विनोद दुआ जैसी हिम्मत कोई एंकर दिखा सकता है

कम लोगो को याद होगा कि जिस जमाने में दूरदर्शन अकेला टीवी चैनल होता था और वो भी सरकार के अधीन, उस दूरदर्शन पर उनका प्रोग्राम जनवाणी खासा लोकप्रिय था। इस कार्यक्रम में वो सरकार के नुमाइंदों और मंत्रियों को बुलाते थे और जनता के सवाल भी शामिल करते थे। कुछ लोग अब भी चाहें तो उस प्रोग्राम से दुस्साहसी होने के लिए हिम्मत जुटा सकते हैं। उस कार्यक्रम में दुआ साहब मंत्रियों से जैसे सवाल पूछते, टिपप्णी करते, जनता को मौका देते, वो तब तो मुश्किल काम था ही, अब असंभव सा लगता है। क्या आज कोई प्राइवेट न्यूज चैनल पर भी किसी मंत्री के कामकाज पर टिप्पणी करते हुए, उसे दस में से तीन अंक देने की हिम्मत दिखा सकता है, वो काम उन्होंने सरकारी चैनल दूरदर्शन पर किया। दुआ साहब ने शायद कभी इस बात की परवाह नहीं की कि सत्ता का व्यवहार उनके साथ कैसा रहेगा। 2008 में जब मनमोहन सिंह सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित करने का ऐलान किया, उनकी सूची में कुछ और नाम भी थे। उस हिसाब से विनोद दुआ के लिए वो बहुत छोटा सम्मान था।

संवाददाताओं का देश भर में जाल बिछाया

दूरदर्शन पर प्राइवेट प्रॉडक्शन के तौर पर वह पहली साप्ताहिक पत्रकारिता थी– ‘परख’, नवम्बर 1992 में शुरू हुए इस कार्यक्रम के लिए लोग पूरे सप्ताह इंतज़ार करते थे। मेरा सौभाग्य है कि उस प्रोग्राम की शुरुआत से मैं उसमें जुड़ा रहा, पहले दिन से, पहले कार्यक्रम से। उस कार्यक्रम में भी हर सेगमेंट का नाम उन्होंने बेहद खूबसूरत तरीके से चुना था। वो उस कार्यक्रम के ना केवल निर्माता निर्देशक थे, बल्कि इसके माध्यम से उन्होनें देश भर में संवाददाताओं का ऐसा जाल बिछाया, जो बाद में आने वाले न्यूज चैनलों के आधार स्तम्भ बन गए। आज भी यह जानकार अच्छा महसूस होता है कि परख की टीम के उन पत्रकारों ने पत्रकारिता के मानदंडों को नहीं छोड़ा और आगे बढ़ाने की कोशिश ही की। देर रात तक उस कार्यक्रम पर चर्चाओं में उनका सहभागी और प्यार का हकदार बना। उन चर्चाओं के बीच इतिहास, विदेश नीति और संगीत पर उनका ज्ञान अदभुत था।

पढ़ने लिखने और गाने के शौकीन दुआ

पढ़ने लिखने और गाने के शौकीन। गाने के शौक और एक कार्यक्रम से ही उनकी मुलाकात बाद में उनकी जीवनसंगिनी बनी डॉ पद्मावती से हुई। प्यार से उन्हें लोग चिन्ना दुआ के नाम से जानते हैं और वो नेवीगेटर थीं विनोद दुआ की, शायद यही वजह रही कि इस साल कोरोना की वजह से जून में चिन्ना जी के जाने के बाद दुआ साहब ना केवल टूट गए, बल्कि शायद जीने की इच्छा ही छोड़ दी और वो बीमारी की इस लड़ाई से वैसे नहीं लड़ रहे थे, जैसे उन्होंने अपने करियर में बड़े बड़े लोगो से लड़ी थीं। नौकरी करना उन्हें पसंद नहीं था, बल्कि यूं कहना चाहिए कि उनका स्वभाव नही था। कोई ना तो उन्हें बांध सकता था और ना ही उनके विचारों को रोक सकता था, किसी गहरी और बड़ी नदी की तरह उनका विस्तार तो था ही, पत्थर उनका रास्ता नहीं रोक सकते थे, सिर्फ बहते रहे अपने अंदाज़ में।

लोकप्रियता के शिखर पर रहते वक्त भी वो ओढ़ी हुई गंभीरता के साथ नहीं रहते थे, एक जिंदादिल इंसान, जोश खरोश से भरा हुआ, अपने सहयोगियों को दोस्त मानने वाला। सड़क पर भुट्टा खाने, नमक मसाले वाली मूली खरीदने और गोल गप्पे खाने वाला दुआ साहब बनना मुश्किल काम है। लोकप्रियता जब दूसरों से दरवाज़े बंद करती हो, उस वक्त भी वो सबके लिए खुले हुए, हर चर्चा के लिए। हिंदी,उर्दू और अंग्रेजी साहित्य जितना पढ़ते थे, उतना ही ज्ञान उन्हें संगीत और नाटक में था। फ़िल्मों और गीतों के साथ सूफी संगीत उनका शौक था। सुनना भी, गाना भी और उसमें उनकी जबरदस्त जोड़ी सहयोगी चिन्ना दुआ। अक्सर बुल्ले शाह और बाबा फरीद का ज़िक्र और गीत उनकी बातचीत में शामिल होते थे। खाने खिलाने के शौकीन।

‘जायका’ शो आपको खाने का जायका महसूस कराता था

विनोद दुआ का मतलब पार्टियां, हर मौके, बेमौके पार्टियां लेकिन अनौपचारिक बिना दिखावे की। किस्से, लतीफे और चुटकियां, हंसना, हंसाना, और बेलौस जीना। उनकी बेटी स्टैंड-अप मल्लिका में यह गुण शायद उनसे ही आया होगा। पत्रकारिता से दूर जब उन्होंने हिन्दुस्तान की सड़कों और गलियों और ढाबों के लोकल फूड पर एनडीटीवी पर कार्यक्रम किया ज़ायका इंडिया का, तो उसे सिर्फ़ देखना नहीं होता था, आप उसमें उस फूड का ज़ायका महसूस कर सकते थे। उनकी दूसरी बेटी बकुल क्लिनिकल साइकोलोजिस्ट हैं, शायद वो किसी दिन बेहतर तरीके से समझा पाएं। विनोद दुआ का परिवार विभाजन के वक्त पाकिस्तान के डेरा इस्माइल खान से आया था। बचपन मुश्किलों में बीता। उनकी विनम्रता, उनकी हंसी, उनकी पत्रकारिता यदि आपने महसूस नहीं की, तो पक्का मानिए आप बहुत कुछ हासिल करने से रह गए हैं।

(साभार:  tv9hindi.com)

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वरिष्ठ पत्रकार मनोरंजन भारती ने अपने गुरु विनोद दुआ जी को यूं दी भावभीनी श्रद्धांजलि‍

विनोद दुआ जी ने IIMC से पास हुए एक बच्चे को सिखाई थी कि जैसे ही कैमरा और लाइट ऑन हो तो सवाल वही पूछना जो तुम पूछना चाहते हो और सवाल चिल्लाकर नहीं...

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 04 December, 2021
Last Modified:
Saturday, 04 December, 2021
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मनोरंजन भारती, मैनेजिंग एडिटर, एनडीटीवी इंडिया

मैं कॉलेज के जमाने से 'परख' और World this week देखा करता था और एक सपना था कभी इनसे (विनोद दुआ जी से) मिलूं। फिर IIMC में चयन हो गया। साल 1994 की बात है IIMC से पास करने के बाद मौका था नौकरी ढूंढने का, पता चला कि विनोद दुआ और ‘टाइम्‍स ऑफ इंडिया’ के दिलीप पडगांवकर ने मिलकर एक कंपनी बनाई है जो दूरदर्शन के लिए प्रोग्राम बनाएंगे।

विनोद दुआ और दिलीप पडगांवकर जैसे लेगों ने एक कंपनी बनाई थी APCA जो किन्‍हीं कारणों से चली नहीं। फिर मुझे मौका मिला दुआ सर के साथ काम करने का, जबकि मेरे कई दोस्त अलग-अलग जगह चले गए। मेरे रूम मेट नीरज भी पडगांवकर की नई कंपनी APCA में चले गए, लेकिन मैंने मन बनाया हुआ था कि हिंदी पत्रकारिता में काम करना है तो विनोद दुआ के साथ ही करूंगा और मैं ‘परख’ में आ गया।

पहले कई महीने रिसर्च करता रहा, फिर पहली स्टेरी मिली वो भी टाडा पर। मैंने पूरी मेहनत करके ऐसी स्टोरी की जो दूरदर्शन को पसंद नहीं आई। चूंकि 'परख' दूरदर्शन पर आता था इसलिए कहा गया कि काट छांट करें। फिर दुआ सर ने स्टोरी दोबारा एडिट की, फिर वो टेलीकास्ट हुई।

हर शुक्रवार को 'परख' का टेप जाने के बाद पार्टी होती थी। खाने के बड़े शौकीन थे। सबसे पहले निहारी खाने का सौभाग्य उनके पास ही मिला। घर भी बुलाते थे, खुद बना के खिलाते थे। संगीत के गुरु थे, खुद गाते थे साथ में चिन्ना मैम भी,  जो तमिलियन थीं। दोनों हिंदी गाने बहुत ख़ूबसूरत अंदाज में गाते थे। मैंने देखा जब नुसरत फतेह अली खान भारत आए थे, तो केवल परख को अनुमति थी, तीन गाने शूट करने की। फिर दुआ सर ने नुसरत फतेह अली खान के साथ एक अलग कॉन्‍सर्ट किया था जिसमें 'परख' के सभी लोगों को बुलाया। दुआ सर की वजह से नुसरत साहब को सामने से सुनने का सुखद अनुभव हुआ। पंजाबी और हिंदी गानों को खूब पसंद करते थे और बड़े सुर में गाते थे।

फिर जब 'परख' बंद हुआ तो मैं उनके साथ NDTV आ गया, Good Morning India में। यादों का सिलसिला खत्म नहीं हो रहा मगर उन्होंने IIMC से पास हुए एक बच्चे को सिखाई थी कि जैसे ही कैमरा और लाइट ऑन हो तो सवाल वही पूछना जो तुम पूछना चाहते हो और सवाल चिल्ला कर नहीं बातचीत के लहजे में मुस्कुराते हुए, जैसे तुम गेस्ट से बातचीत कर रहे हो। उनकी ये बात मैं अभी भी फॉलो कर रहा हूं। यही बात NDTV में भी सिखाई गई। दुआ सर, आज आप नहीं हैं मगर आप का नाम देश के टेलीविजन इतिहास में लिखा जाएगा। जो सफर 'जनवाणी' से शुरू हुआ वो जारी रहेगा। सवाल तो पूछना ही है, आपके शिष्य होने के नाते हम ये करते रहेंगे। आपके जाने के साथ पत्रकारिता के उस युग का अंत हो गया जो कठिन सवाल पूछने से डरता नहीं था, भले ही मुकदमे हो जाएं। गोदी मीडिया के इस युग में जब चाटुकारिता पत्रकारिता हावी है, दुआ सर आप बड़ी शिद्दत से याद किए जाएंगे। एक शिष्य होने के नाते आपको भावभीनी श्रद्धांजलि‍।

(साभार: एनडीटीवी डॉट इन)

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टीवी पत्रकारिता का एक शानदार पन्ना आज अलग हो गया: रवीश कुमार

भारत की टेलीविज़न पत्रकारिता में सवाल पूछने की यात्रा की पहचान विनोद दुआ से बनती है। पूछने की पहचान के साथ उनकी पत्रकारिता जीवन भर जुड़ी रही।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 04 December, 2021
Last Modified:
Saturday, 04 December, 2021
VinodDua9545

रवीश कुमार, वरिष्ठ पत्रकार ।।

भारत की टेलीविज़न पत्रकारिता में सवाल पूछने की यात्रा की पहचान विनोद दुआ से बनती है। पूछने की पहचान के साथ उनकी पत्रकारिता जीवन भर जुड़ी रही। आज हमें बताते हुए अच्छा नहीं लग रहा कि हमने भारतीय टेलिविज़न की एक शानदार हस्ती को खो दिया। यह साल उनके लिए बहुत भारी रहा। कोरोना के कारण उन्होंने अपनी जीवनसाथी पदमावती चिन्ना दुआ को खो दिया, उस समय विनोद अस्पताल में ही भर्ती थे। उसके बाद भी उनकी सेहत पटरी पर नहीं लौट सकी और आज दिल्ली में उनका निधन हो गया। विनोद दुआ हमारे चैनल से भी जुड़े रहे हैं और यहां उन्होंने कई शानदार कार्यक्रम किए। 'ख़बरदार' और 'ज़ायका इंडिया' चंद नाम हैं। ‘गुडमार्निंग इंडिया’ की यादें हम सबके मन में आज भी ताज़ा हैं जब उस कार्यक्रम के ज़रिए हम जैसे लोग ‘एनडीटीवी’ में पत्रकारिता के बहुत से अनुशासनों को सीख रहे थे।

क्या बोलना और कैसे बोलना है, इसे लेकर विनोद दुआ के पास जो एकाधिकार था कोई उस स्तर तक नहीं पहुंच सका। भाषा उनके स्वभाव में आसानी से आती थी लेकिन इसके बाद भी वे एक एक शब्द के लिए काफी मेहनत करते थे। अपने शब्दों को काफी सम्मान देते थे और उनके उच्चारण की जगह ख़ास तरीके से तय करते थे। उनकी भाषा माध्यम के हिसाब से सटीक थी, संक्षिप्त थी और शालीन थी। उनकी भाषा में अंग्रेज़ी, पंजाबी, हिन्दी और उर्दू का बेहतरीन समावेश था। उनके पिता विभाजन के बाद पाकिस्तान के डेरा इस्माइल ख़ां से भारत आ गए थे। अपने पुरखों के शहर की पंजाबीयत और उसकी ठाठ तब खूब झलकती थी जब वे पठान सूट पहनते थे। कैमरे के सामने उनकी सहजता लाजवाब थी। टीवी का पत्रकार पत्रकारिता के पैमानों के साथ टीवी के माध्यम के प्रति उसकी समझ और उसके बर्ताव को लेकर भी जाना जाता है। माध्यम के लिहाज़ से विनोद दुआ हमेशा ही श्रेष्ठ प्रस्तोता बने रहे।

विनोद दुआ के काम को समझना है तो कैमरे के सामने उनके हाव-भाव को देखिए। ऐसा लगता था कि दर्शक और उनके बीच कोई कैमरा ही नहीं है। दोनों आमने सामने बैठे हैं। किसी बात को कह कर और वहीं छोड़ कर आगे बढ़ जाने का फ़न उन्हें बहुत आसानी से आता था। ज़ायका इंडिया सफल नहीं होता अगर वे खाना खाने, खाना बनाने और खाना खिलाने में माहिर न होते। इस कार्यक्रम में विनोद को चलते फिरते देख आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि उन्हे अपने माध्यम की कितनी गहरी समझ है। सब कुछ नपा तुला बोलना और सही जगह पर बोलना। राजनीतिक पत्रकारिता में दखल रखने वाले विनोद दुआ।

मसालों और व्यंजनों पर राजनीतिक और सांस्कृति रूप से इस तरह से बात कर जाएंगे किसी को यकीन नहीं था। अपनी पत्नी के निधन के बाद भी लिखते रहे कि वे वापस लौटेंगे। रिपोर्टिंग करेंगे।

दूरदर्शन के लिए उनका कार्यक्रम 'जनवाणी' और 'परख' आज भी यादगार माना जाता है। उस कार्यक्रम ने टीवी पत्रकारिता के लिए कई लोगों को प्रशिक्षित किया जो भविष्य में जाकर इस माध्यम का चेहरा बने। आपके इस ऐंकर को भी विनोद दुआ के साथ काम करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। इस माध्यम के बारे में उनसे काफी कुछ सीखा है और जाना है।

काम के बीच में उनका गुनगुना देना और किसी पुराने गाने को यूं याद कर लेना सबको सहज कर देता था कि सीनियर हैं मगर सहयोगी वाले सीनियर हैं। अपनी पत्नी चिन्ना के साथ उनका गाना और अच्छा गाना उनके दोस्त कभी नहीं भूल सकते हैं। हाल के दिनों तक वे तलत महमूद, बड़े गुलाम अली ख़ां, पंडित जसराज की गायकी पोस्ट करते रहे थे। डॉ. प्रणय रॉय और उनकी जोड़ी चुनावी नतीजों के दिन पूरे देश को जगा देती थी और जगाए रखती थी। दोनों ने लंबे समय तक एक दूसरे के साथ काम भी किया। दोनों ने अलग-अलग भी काम किया और एनडीटीवी में भी एक साथ लंबे अर्से तक काम किया। टीवी पत्रकारिता का एक शानदार पन्ना आज अलग हो गया है। वो अब इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन इस माध्यम में इस कदर हैं कि लगता ही नहीं कि आज नहीं हैं। हाल के दिनों में हिमाचल प्रदेश के भाजपा नेता ने उन पर राजद्रोह का मामला दायर कर दिया। उस मुकदमे का सामना भी विनोद ने उसी निर्भिकता से किया। सुप्रीम कोर्ट ने विनोद के पक्ष में फैसला दिया।

विनोद दुआ हों और कुछ बोल न रहे हों, कुछ सख्त न हो बोल रहे हों तो फिर वे विनोद दुआ नहीं हो सकते। उनकी चाल ढाल में निर्भिकता भरी रहती थी। विनोद दुआ नहीं हैं तो आज वो दिल्ली भी नहीं है जो उनके टीवी पर आने पर पूरे देश की हो जाती थी। पत्रकारिता तो अब वैसी रही नहीं लेकिन विनोद दुआ ता उम्र वैसे ही रहे जैसे थे। बहुत सारे किस्से थे और बहुत सारे किस्से उन्हें लेकर थे।

(साभार: एनडीटीवी डॉट इन)

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टीवी प्रजेंटेशन के ‘हेडमास्टर’ थे विनोद दुआ जी: सतीश के.सिंह

विनोद जी का जाना, जीवंत पत्रकारिता के लिए अपूरणीय क्षति है। भाषा, सौम्यता, अध्ययन और प्रस्तुति के लिहाज से उन्हें मैं बहुत बड़ा मानता रहा।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 04 December, 2021
Last Modified:
Saturday, 04 December, 2021
satish K Singh

सतीश के सिंह, वरिष्ठ पत्रकार।।

विनोद जी का जाना, जीवंत पत्रकारिता के लिए अपूरणीय क्षति है। भाषा, सौम्यता, अध्ययन और प्रस्तुति के लिहाज से उन्हें मैं बहुत बड़ा मानता रहा। चुटीले अंदाज में, मुहावरों के जरिये और मुस्कुराते हुए गंभीर टिप्पणी कर देना, जैसे उनके डीएनए में था और बहुत ही स्वभाविक लगता था। अगर टीवी पत्रकारों ने या खास तौर से एंकर्स ने उनसे कुछ नहीं सीखा तो कुछ नहीं सीखा। दुआ सर टीवी प्रजेंटेशन के हेडमास्टर थे।

मैंने विनोद दुआ सर को सबसे पहले 1984 में ‘डीडी‘ पर चुनाव प्रसारण में नोटिस किया था। अंग्रेजी का अनुवाद और हिंदी में सूचना कितनी सहजता और सटीक देते थे, क्या कहना। एक शब्द भी फालतू नहीं। ये खूबी और कला किसी में मैंने आज तक नहीं पाई ।

दुआ सर मेरी नजर में इतने बड़े थे कि एक ही संस्थान के लिए काम करते हुए पहली बार तो मैं उन्हें दूर से ही निहारता था, शायद बात 1996 या 1997 की है। लेकिन, दिसंबर 1999 में कुछ ऐसा हुआ कि वह भी मुझे जानने लगे, जब मैं एक रिपोर्टर के रूप में इस इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट IC 814 के हाईजैक पर रिपोर्टिंग कर रहा था और वह मैराथन एंकरिंग।

विनोद सर दूर से ही सही, लेकिन मुझे जानते-पहचानते थे। अक्सर वह खुद ही मुझे बुलाकर बात करते थे। लेकिन, बस IC 814 प्रकरण तक सीमित रहा। दरअसल, मैं उनसे इतना प्रभावित था कि दुआ सर के नजदीक जाने की हिम्मत ही नहीं हुई, जबकि उनका स्वभाव, शिष्टाचार किसी से मिलने, मिलाने का था ।

दुआ सर के साथ दूसरी बार एक दूसरे चैनल में काम करते वक्त वर्ष 2005 में संपर्क हुआ। वह शाम के वक्त आते थे, टोकते जरूर थे और  मजाक, हंसी उनके निरंतर स्वभाव का हिस्सा थी। ये सिलसिला लगभग दो साल चला ।

मैं ऐसा दावा तो नहीं कर सकता कि मैं उनका नजदीकी था, मगर ये कह सकता हूं कि उनके हुनर, ज्ञान, वाकपटुता, प्रजेंटेशन और टिप्पणियों का कायल जरूर था। विनोद जी ने जिंदगी अपनी शर्तो पर जी, नहीं तो वह भी एक मीडिया एम्पायर के महामानव होते, दरअसल, वह एक पत्रकार और प्रजेंटर ही रह गए, न बंधे और न बांधा।

एक मौका ऐसा भी आया जब मैंने उनसे एक चैनल के लिए डेली शो करना चाहा, बात भी हो गई, लेकिन वह चालू नहीं हो पाया। मुझे लगता है कि धर्मपत्नी के निधन के बाद दुआ सर टूट गए थे। इतने जीवंत आदमी ने जीने की तमन्ना ही छोड़ दी थी ।

सच कहूं तो संतोष भारतीय जी के साथ एक इंटरव्यू को देखकर मुझे ऐसा प्रतीत हुआ था। काफी कमजोर लग रहे थे। आवाज भी फंसी और रुंधी हुई, लेकिन वाणी बिल्कुल विनोद दुआ सिग्नेचर। दुआ सर चले गए, लेकिन पत्रकारों, एंकर्स, डिबेट करने और इंटरव्यू देने वालों नेताओं के लिए आईना, पाठ्यक्रम और मिसाल बनकर। दुआ साहब की तैयारी पूरी रहती थी,शायद वह दूसरे से भी यही अपेक्षा रखते थे। दुआ सर, विनम्र श्रद्धांजलि, रेस्ट इन पीस चीफ।

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वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी ने बताया, कुछ ऐसे थे हमारे मित्र विनोद दुआ

विनोद दुआ नहीं रहे। चिन्ना भाभी के पास चले गए। जीवन में साथ रहा। अस्पताल में साथ रहा। तो पीछे अकेले क्यों रहें।  

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 04 December, 2021
Last Modified:
Saturday, 04 December, 2021
VinodDua5454

ओम थानवी, वरिष्ठ पत्रकार ।।

विनोद दुआ नहीं रहे। चिन्ना भाभी के पास चले गए। जीवन में साथ रहा। अस्पताल में साथ रहा। तो पीछे अकेले क्यों रहें।  उनका परिवार डेरा इस्माइल ख़ान से आया था। मैं उन्हें पंजाबी कहता तो फ़ौरन बात काट कर कहते थे- हम सरायकी हैं, जनाब। दिल्ली शरणार्थी बस्ती से टीवी पत्रकारिता की बुलंदी छूने का सफ़र अपने आप में एक दास्तान है।

दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाई (जैसी करते थे, करते थे) के साथ रंगमंच का तजुर्बा हासिल करते हुए टीवी की दुनिया में चले आए। कीर्ति जैन ने उनकी प्रतिभा को पहचाना, यह बात उन्हें हमेशा याद रही। दूरदर्शन सरकारी था। काला-सफ़ेद था। उन्होंने उसमें पेशेवराना रंग भर दिया। उनके मुंहफट अंदाज़ ने किसी दिग्गज को नहीं बख़्शा। जनवाणी केंद्रीय मंत्रिमंडल के रिपोर्ट-कार्ड सा बन गया, जिसे प्रधानमंत्री राजीव गांधी तक देखते थे।

कम लोगों को मालूम होगा कि विनोद कभी कार्यक्रम की स्क्रिप्ट नहीं तैयार करते थे। न प्रॉम्प्टर पर पढ़ते थे। बेधड़क, सीधे। दो टूक, बिंदास। कभी-कभी कड़ुए हो जाते। पर अमूमन मस्त अन्दाज़ में रहते। परख के लिए आतंकवाद के दिनों में पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह से बात की। उन्हें कुछ गाकर सुनाने को कहा। ना-ना-ना करते गवा ही बैठे।

विनोदजी का हिंदी और अंग्रेजी पर लगभग समान अधिकार था। प्रणय रॉय के साथ चुनाव चर्चा की रंगत ही और थी। बाद में विनोदजी ने अपनी कंपनी बनाई। उससे ‘परख’, ‘अख़बारों की राय’ जैसे अनेक कार्यक्रम बनाए। पर रहे उनके गिर्द ही।

फिर वे अपने पुराने मित्र के चैनल 'एनडीटीवी इंडिया' से आ जुड़े। चैनल की वे शान बने। राजनेताओं से उलझना उनकी फ़ितरत में था। चाहे किसी भी पार्टी के हों। चैनल ने बाद में उन्हें ‘ज़ायक़ा इंडिया का’ जैसा कार्यक्रम दे दिया। उन्हें खाने-पीने का शौक़ था। कार्यक्रम के लिए देश में घूमा किए। चाव से। हम देश के लिए खाते हैं, उनका लोकप्रिय जुमला बना।

पर दिल से वे राजनीति के क़रीब थे। उन्होंने ज़ायक़ा बदल लिया। नेटवर्क-18 का एक कार्यक्रम पकड़ा। मुझे मालूम था वहां निभेगी नहीं। सहारा से सुबह के अख़बारों वाले कार्यक्रम प्रतिदिन से काफ़ी पैसा मिलता था। किसी बात पर सहाराश्री से खटपट हुई। मेरे सामने (आईआईसी के बगीचे से) लखनऊ फ़ोन किया और गाली से बात की। क़िस्सा ख़त्म।

मगर सिद्धार्थ वरदराजन के साथ ‘द वायर’ में उनकी ख़ूब निभी। ‘जन की बात’ जबर हिट हुआ। मोदी सरकार पर इतना तीखा नियमित कार्यक्रम दूसरा नहीं था। पर मी-टू में वे एक आरोप मात्र से घिर गए। वायर ने नैतिकता के तक़ाज़े पर उनसे तोड़ ली। जो असरदार सिलसिला चला था, थम गया। बाद में सिद्धार्थ इससे त्रस्त लगे और विनोद भी। इसके बाद भी विनोद सक्रिय रहे। पर पहले अदालती संघर्ष, जिसमें वे जीते और फिर कोरोना से लड़ाई उससे भी वे निकल आए। लेकिन, जैसा कि कहते हैं, होनी को कुछ और मंज़ूर था।

मेरे क़रीबी मित्र थे। कितनी शामें आईआईसी में बिताईं। बेटे मिहिर के विवाह में जयपुर आए। चिन्ना भाभी के साथ गीत भी गाए। कुरजां की खोज में हमारे गांव फलोदी जा पहुंचे।

उनकी याद में आंखें नम हैं। कुछ लिखने का इरादा नहीं था। पर मृत्यु की ख़बर जान जयपुर के कॉफ़ी हाउस में बैठे कुछ इबारत अपने आप उतर आई।

(साभार: फेसबुक वाल से)

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हिंदी को व्यावसायिक बनाती इलेक्ट्रॉनिक मीडिया

एक धारणा के मुताबिक अंग्रेजी को ही व्यवसाय की भाषा कहा जाता है। वैश्वीकरण के दौर में जहां बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपने व्यवसाय को विस्तार दिया है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Friday, 03 December, 2021
Last Modified:
Friday, 03 December, 2021
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आलोक राजा

एक धारणा के मुताबिक अंग्रेजी को ही व्यवसाय की भाषा कहा जाता है। वैश्वीकरण के दौर में जहां बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपने व्यवसाय को विस्तार दिया है, वहीं अंग्रेजी की महत्वता को और अधिक बल मिला है। परन्तु हमारे देश की अर्थव्यवस्था में एंटरटेनमेंट और मीडिया ने हिंदी को नई दिशा देकर व्यापारिक बनाने में खासी भूमिका अदा की है। हिंदी को किताबी साहित्य से बाहर निकालकर उसे बाजार की भाषा बनाने में अगर सबसे बड़ा योगदान किसी का है तो वह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का है।

यह सवाल हिंदी साहित्यकारों एवं लेखकों के बीच में काफी चर्चित रहता है कि क्यों हिंदी के पाठकों में बढ़ोत्तरी अंग्रेजी के पाठकों की तरह नहीं होती है? लेकिन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने जहां एक तरफ हिंदी भाषा को सरल, सहज एवं आम-जन की भाषा बनाकर परोसा है, वहीँ दूसरी तरफ लोगों को हिंदी पत्रकारिता की तरफ आकर्षित किया है। ऐसे में हिंदी की दुनिया को दुनिया के सामने बेहतर तरीके से प्रस्तुत करने में भी मदद मिली है। हिंदी धारावाहिक, हिंदी फिल्मों और हिंदी की किताबों को चर्चित करने के लिए भी आज इलेक्ट्रॉनिक मीडिया प्लेटफॉर्म का उपयोग किया जाता है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के मार्केटिंग इफैक्ट को हम इस तरह समझ सकते हैं कि बॉलीवुड की फिल्में भी बड़े पर्दे पर उतरने से पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से प्रमोशन करती हैं।

विदित है कि कोई भाषा केवल उसी स्थिति में विस्तार प्राप्त कर पाती है जब उसे व्यावसायिक बनाया जा सके और जब उस भाषा में रोजगार की संभावनाएं पैदा हो सकें। अगर किसी भाषा में आर्थिक गतिविधि कर पाना संभव न हो तो ऐसी भाषा सिर्फ एक संकुल तक सिमट कर ही रह जाती है और सिर्फ भावनाओं के सम्प्रेषण तक ही उसे सीमित रह जाना पड़ता है। आज जब हम संस्कृत भाषा की बात करते हैं तो भले ही संस्कृत को संस्कृति की भाषा कहा जाता हो लेकिन व्यवसायीकरण के दौर में संस्कृत आमजन की भाषा नहीं बन पायी है जिसका बहुत बड़ा कारण इसका व्यावसायिक न हो पाना है।

वहीँ अंग्रेजी, फ्रेंच और जर्मन जैसी भाषाओँ को विश्व में खासी अहमियत मिली है क्योंकि ये भाषाएं आर्थिक रूप से संपन्न देशों की भाषाएं हैं। लेकिन हिंदी को व्यवसाय की भाषा बना पाना संभव है। जिस तरह आज मीडिया में हिंदी का प्रयोग किया जाता है और उसे चमक दमक वाली भाषा के रूप में प्रस्तुत किया जाता है उससे वह बाजार की भाषा बनने में काफी हद तक सफल हुई है। हिंदी के साहित्यकार ऐसा मानते हों कि आधुनिक हिंदी को बाजार ने तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत किया है। इस तथ्य में भले ही सच्चाई हो, लेकिन हमें यह समझना पड़ेगा कि बहु-भाषीय देश भारत में किसी भी क्लिष्ट भाषा को बाजार की भाषा नहीं बनाया जा सकता है। बाजार की भाषा बनाने के लिए भाषा का सहज, सरल और आम होना बेहद जरूरी होता है और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने हिंदी को आम व सरल रूप में प्रस्तुत किया है।

इसी का ही परिणाम है की आज बड़े अंग्रेजी के चैनल भी अपने दर्शकों की संख्या बढ़ाने के लिए हिंदी में उतर रहे हैं। यहां तक कि हॉलीवुड की फिल्मों को हिंदी में डब किया जाने लगा है। हमारे देश में हिंदी को विस्तार इस कदर मिल चुका है कि राजनीति की भाषा के रूप में हिंदी अब पूरी तरह स्थापित हो चुकी है। अंतराष्ट्रीय स्तर पर भी हिंदी के पत्रकारों को रेमैन मेग्सेसे अवॉर्ड भी मिलने लगे हैं। यानि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के इस योगदान को सराहा जाना चाहिए की इसने हिंदी के व्यावसायिक रूप को गढ़ने में अपनी बड़ी भूमिका निभाई है।

(लेखक, ‘भारत समाचार’ न्यूज चैनल में सीनियर एंकर के तौर पर कार्यरत हैं और यह उनके निजी विचार हैं)

 

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