चीरहरण का चुनावी मुद्दा विपक्ष के दिग्गज नेताओं के लिए काला टीका: आलोक मेहता

शरद पवार को बेटी सुप्रिया, लालू यादव को अपनी बेटियों मीसा और अपर्णा, सोनिया को राहुल के साथ बेटी प्रियंका, के सी`आर को बेटी कविता के लिए सत्ता के ताज पहनाने के प्रयास का शक्ति परीक्षण है।

आलोक मेहता by
Published - Monday, 20 May, 2024
Last Modified:
Monday, 20 May, 2024
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आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और स्तंभकार।

चीरहरण भरे दरबार में नहीं दिल्ली राज्य के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के शीश महल की खास बैठक में होने का आरोप प्रतिपक्ष के इंडी गठबंधन के महारथियों के लिए सिरदर्द बन गया है। मुंबई  में महाअगाडी की अंतिम सभा में केजरीवाल के अनर्गल प्रलाप के बाद मराठा क्षत्रप और वर्तमान राजनीति के शीर्ष प्रतिपक्षी नेता शरद पवार के माइक पर पहुँचने के साथ लोगों के उठकर जाने से जनता के आक्रोश को समझा जा सकता है। सचमुच यह भारत ही नहीं शायद विश्व के किसी लोकतान्त्रिक देश की पहली रिकॉर्ड घटना है, जब एक मुख्यमंत्री के अपने भव्य बंगले के प्रमुख कमरे में उसी की पार्टी की महिला सांसद की बर्बरता से पिटाई और कपड़े फाड़ने की पुलिस रिपोर्ट दर्ज हुई और गंभीर मामला अदालत जाएगा।

लोकसभा चुनाव के अंतिम तीन दौर शरद पवार ही नहीं इस गठबंधन के अन्य बड़े साझेदार लालू प्रसाद यादव, सोनिया राहुल गाँधी, ममता बनर्जी, हेमंत शिबू सोरेन, के कविता चंद्रशेखर राव, उद्धव ठाकरे , फारुक अब्दुल्ला की प्रतिष्ठा और भविष्य के लिए निर्णायक है। शरद पवार को बेटी सुप्रिया, लालू यादव को अपनी बेटियों मीसा और अपर्णा, सोनिया को राहुल के साथ बेटी प्रियंका, अखिलेश यादव को पत्न्नी डिम्पल, केसीआर को बेटी कविता के लिए सत्ता के ताज पहनाने के प्रयास का शक्ति परीक्षण है और अन्य नेताओं को भी अपने` बेटे बेटियों, पत्नी, भतीजे भतीजी के साथ करोड़ो महिलाओं को सामजिक सुरक्षा का विश्वास दिलाने की चुनौती है। दूसरी तरफ प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा को करोड़ों महिलाओं के समर्थन का विश्वास है।

सबसे दिलचस्प पहलु यह है कि शरद पवार, सोनिया गाँधी, लालू प्रसाद यादव , केसीआर, के विजयन , शिबू सोरेन पांच वर्ष बाद होने वाले लोक सभा चुनाव के मंचों पर कोई बड़ी भूमिका में दिखाई नहीं देंगे। उनकी राजनीतिक विरासत की दशा दिशा पर पता नहीं कितनी ख़ुशी कितना दर्द दिखेगा। यह परिवार भारतीय राजनीति की`आधी शताब्दी के प्रमुख किरदार रहे हैं। जनता के बीच बराबर यह सवाल भी उठ रहा है कि इन पुराने दिग्गज राजनेताओं को दस वर्ष पहले उभरे सबसे अविश्वसनीय , महत्वाकांक्षी , विवादास्पद अरविंद केजरीवाल और उनकी छोटी सी पार्टी का सहारा लेने की क्या मजबूरी है? शरद पवार को महाराष्ट्र के मराठा और मुस्लिम मतदाताओं का, लालू और अखिलेश यादव को यादव मुस्लिम वोट बैंक, सोनिया गाँधी को भी दलित पिछड़े मुस्लिम वोट, के सी आर को तेलगु और मुस्लिम मतदाताओं से अपने टूटे फूटे महल बचाने की उम्मीद है और इन सभी वर्गों में महिलाओं की आन बान परिवार की इज्जत से बड़ी कोई चीज नहीं है।

छत्रपति शिवाजी, तिलक, गांधी, अम्बेडकर के नाम और आदर्शों का बखान करते हुए शराब घोटाले, जल बोर्ड घोटाले तथा महिला सांसद की निर्मम पिटाई के गंभीर आरोपों से फंसी पार्टी के नेता को अपने चुनावी रथ पर बैठाकर घूमने से क्या चुनाव में जन समर्थन मिल सकता है? कानूनी दांव पेंच और अनर्गल प्रचार पर करोड़ो रूपये खर्च करने पर यदि चुनावी सफलता या सत्ता मिल सकती तो पवार , गाँधी परिवार , लालू मुलायम , मायावती , ओमप्रकाश चौटाला ,  सुखबीर बादल , चंद्रबाबू नायडू या फारुक अब्दुल्ला की पार्टियों की दुर्दशा जैसी स्थिति नहीं होती। राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल ने अपनी छवि चमकाने के लिए विज्ञापन और इवेंट मैनेजमेंट कंपनियों पर बहुत खर्च किया लेकिन अमेरिका की तरह भारत में वोट कभी नहीं मिल सकते हैं।

इतने बड़े इमेज प्रबंधन के बावजूद राहुल गांधी ने पिछले पांच वर्षों में अमेठी रायबरेली जाना दूर किसी ' परम प्रिय ' पत्रकार के सामने बैठकर ऑन रिकॉर्ड इंटरव्यू तक नहीं दिया। अपनी जीवन शैली पर फ़ूड ट्रेवल यू ट्यूब चैनल कर्ली ट्रेवल्स की काम्या जानी को जरुर अपनी भारत यात्रा के दौरान एक इंटरव्यू दिया।  वर्षों पहले टाइम्स नाउ न्यूज़ चैनल के तत्कालीन संपादक अर्नब गोस्वामी के सामने बैठकर इंटरव्यू में जाने क्यों अपने को विफल समझ आज तक वह किसी एक के सामने बैठकर इंटरव्यू देने की हिम्मत नहीं जुटा सके। हाँ, कभी पंचायत, नगर निगम, विधान सभा, लोक सभा का चुनाव लड़े बिना केवल पार्टी के विधायकों के समर्थन के जुगाड़ से चार बार राज्य सभा में विराजे रणनीतिकार जयराम रमेश के साथ बैठकर नियंत्रित प्रेस कॉन्फ्रेंस बहुत सी की , ताकि किसी को एक दो से अधिक असहज सवाल कोई पत्रकार नहीं कर सके।

अपनी मांद में बैठकर शेर दहाड़ते रहने पर तो न जंगल के जानवर भागते हैं और न ही शिकार डरा सहमा गुफा में आकर शिकार के लिए समर्पण करता है।  इसलिए केवल गांधी परिवार के पुराने त्याग बलिदान के नाम पर भावनाओं से खेलकर अधिक समय तक जनता के दिल दिमाग पर राज करना कहाँ तक उचित है?|केवल परिवार और भावना से विजय होती हो तो महात्मा गाँधी के पोते राजमोहन गांधी ( देवदास गांधी के विद्वान ईमानदार पुत्र राजमोहन गांधी 1989 के चुनाव  में राजीव गांधी से करीब 2 लाख 71 हजार वोट से नहीं पराजित होते। तब चर्चा यह थी कि असली गांधी ( मतलब महात्माजी के पोते ) और अपना गांधी ( भाई संजय गाँधी द्वारा इंदिरा राज में बनाई राजनीतिक जमीन अमेठी रायबरेली में सक्रीय रहे राजीव ) के बीच चुनाव है।

यही नहीं सुप्रसिद्ध लेखक चिंतक होने के बावजूद दिल्ली में केजरीवाल के भ्रम जाल में फंसकर आम आदमी पार्टी का उम्मीदवार बनकर लोकसभा का चुनाव लड़ने पर बुरी तरह पराजित हुए। आजादी दिलाने वाले महात्मा गांधी के काबिल पोते गलत पार्टी के कारण दोनों बार कांग्रेस पार्टी के कारण हारे। तब आम आदमी पार्टी ने इस बार की तरह कांग्रेस से समझौता नहीं किया था। कांग्रेस से दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के पुत्र संदीप दीक्षित और भाजपा से महेश गिरी उम्मीदवार थे और गिरी जीत गए। गांधीजी के बाद भारत में ईमानदारी के आदर्श नेता के रुप में लालबहादुर शास्त्रीजी का नाम लिया जाता है।

उन्हें नेहरु के बहुत करीबी शीर्ष नेता और बाद में प्रधान मंत्री रहकर 1965 में पाकिस्तान की` पराजय तथा जय जवान जय किसान के नारे से लोकप्रिय जन नेता माने जाने के बावजूद उनके जीवन काल में परिवार के किसी सदस्य को सत्ता की राजनीति में स्थान नहीं मिला। यहाँ तक कि उनके बेटों को सरकारी कार या सुविधा लेने पर भी उन्होंने कड़ी रोक लगाई थी। शास्त्रीजी के निधन के बाद अवश्य उनके बेटे और परिवार के सदस्य राजनीति में आए। विधायक, मंत्री , सांसद रहे। लेकिन कभी शीर्ष पदों मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री के दावेदार तक नहीं बन सके। उनके तीन  बेटों हरिकृष्ण , सुनील और अनिल शास्त्री से मेरा अच्छा परिचय रहा , मिलना हुआ , उनकी गतिविधियों पर बहुत कुछ लिखा भी।

हां, यह कहा जा सकता है कि कांग्रेस ने शास्त्री परिवार को अधिक महत्व नहीं मिलने दिया। इसीलिए बेटे, पोते विभिन्न दलों जनता दल, भारतीय जनता पार्टी , आम आदमी पार्टी, राष्ट्रीय लोकदल पार्टियों में सक्रिय होकर कुछ सामाजिक राजनीतिक गतिविधियां करते रहे हैं। मतलब राजशाही की तरह लोकतंत्र में विरासत से सत्ता का सिंहासन नहीं मिल सकता है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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सोशल मीडिया ने बदल दी है जनसंचार की दुनिया : प्रो.संजय द्विवेदी

पारंपरिक मीडिया की बंधी-बंधाई और एकरस शैली से अलग हटकर जब भारतीय नागरिक इस पर विचरण करने लगे तो लगा कि रचनात्मकता और सृजनात्मकता का यहां विस्फोट हो रहा है।

Samachar4media Bureau by
Published - Saturday, 08 August, 2026
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Saturday, 08 August, 2026
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प्रो.संजय द्विवेदी, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष।

भारतीय समाज में किसी नए प्रयोग को लेकर इतनी स्वीकार्यता कभी नहीं थी, जितनी कम समय में सोशल मीडिया ने अर्जित की है। जब इसे सोशल मीडिया कहा गया तो कई विद्वानों ने पूछा “अरे भाई क्या बाकी मीडिया अनसोशल है? अगर वे भी सामाजिक हैं,तो यह सामाजिक मीडिया कैसे?” किंतु समय ने साबित किया कि यह वास्तव में सोशल मीडिया है। अब उससे आगे डीफफेक ने सारा कुछ बदलकर रख दिया है।

जनरेटिव एआई और डीपफेक टूल्स की मदद से अब किसी भी व्यक्ति का फर्जी वीडियो या ऑडियो बनाना बेहद आसान और सस्ता हो गया है। कुछ ही सेकंड के ऑडियो या वीडियो सैंपल से तैयार यह तकनीक आम आदमी से लेकर दिग्गजों तक की पहचान के लिए बड़ा खतरा बन चुकी है।

सृजनात्मकता का विस्फोट-

पारंपरिक मीडिया की बंधी-बंधाई और एकरस शैली से अलग हटकर जब भारतीय नागरिक इस पर विचरण करने लगे तो लगा कि रचनात्मकता और सृजनात्मकता का यहां विस्फोट हो रहा है। दृश्य, विचार, कमेंट् और निजी सृजनात्मकता के अनुभव जब यहां तैरने शुरू हुए तो लोकतंत्र के पहरूओं और सरकारों का भी इसका अहसास हुआ। आज वे सब भी अपनी सामाजिकता के विस्तार के लिए सोशल मीडिया पर आ चुके हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं भी कहा कि “सोशल मीडिया नहीं होता तो हिंदुस्तान की क्रियेटिविटी का पता ही नहीं चलता।”

सोशल मीडिया अपने स्वभाव में ही बेहद लोकतांत्रिक है। जाति, धर्म, भाषा, लिंग और रंग की सीमाएं तोड़कर इसने न सिर्फ पारंपरिक मीडिया को चुनौती दी है वरन् यह सही मायने में आम आदमी का माध्यम बन गया है। इसने संवाद को निंरतर, समय से पार और लगातार बना दिया है। इसने न सिर्फ आपकी निजता को स्थापित किया है वरन एकांत को भी भर दिया है।

निजता अब सामूहिक संवाद में बदल रही-

सूचनाएं आज मुक्त हैं और वे इंटरनेट के पंखों पर उड़ रही हैं। सूचना 21 वीं सदी की सबसे बड़ी ताकत बनी तो सोशल मीडिया, सभी उपलब्ध मीडिया माध्यमों में सबसे लोकप्रिय माध्यम बन गया। सूचनाएं अब ताकतवर देशों, बड़ी कंपनियों और धनपतियों द्वारा चलाए जा रहे प्रचार माध्यमों की मोहताज नहीं रहीं। वे कभी भी वायरल हो सकती हैं और कहीं से भी वैश्विक हो सकती हैं। स्नोडेन और जूलियन असांजे को याद कीजिए। सूचनाओं ने अपना अलग गणतंत्र रच लिया है। निजता अब सामूहिक संवाद में बदल रही है। वार्तालाप अब वैश्विक हो रहे हैं।

इस आभासी दुनिया में आपका होना ही आपको पहचान दिला रहा है। “ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय” कहने वाले देश में अब एक वाक्य का विचार क्रांति बन रहा है। यही विचार की ताकत है कि वह किताबों और विद्वानों के इंतजार में नहीं है।

सोशल साइट्स का समाजशास्त्र अलग है। यहां ट्वीट फैशन भी है और सामाजिक काम भी। फेसबुक और ट्विटर नए गणराज्य हैं। निजी जिंदगी से लेकर जनांदोलन और चुनावों तक अपनी गंभीर मौजूदगी को दर्ज करवा रहा ये माध्यम, सबको आवाज और सबकी वाणी देने के संकल्प से लबरेज है। कंप्यूटर से आगे अब स्मार्ट होते मोबाइल इसे गति दे रहे हैं। यहां मोती भी हैं और कीचड़ भी-

अपने तमाम नकारात्मक प्रभावों के बावजूद इसके उपयोग के प्रति बढ़ती ललक बताती है कि सोशल मीडिया का यह असर अभी और बढ़ने वाला है। यह मान लेने में हिचक नहीं करनी चाहिए कि यहां मोती भी हैं और कीचड़ भी। झूठ, बेईमानी, अपराध और बेवफाई के किस्से हैं तो दूसरी तरफ निभ रही दोस्तियों की लंबी कहानियां हैं। हो चुकी और चल रही शादियों की लंबी श्रृंखला है। कभी किसी भी माध्यम के प्रति इतना स्वागत भाव नहीं था।

फिल्में आई तो अच्छे घरों के लोग न इसमें काम करते थे, ना ही वे फिल्में देखने जाते थे। मां-पिता से छिपकर युवा सिनेमा देखने जाते थे। टीवी आया तो उसे भी इडियट बाक्स कहा गया। टीवी को लगातार देखते हुए भी हिंदुस्तान उसके प्रति आलोचना के भाव से भरा रहा और आज भी है। किंतु सोशल मीडिया के प्रति आरंभ से ही स्वागत भाव है। इसके प्रति समाज में अस्वीकृति नहीं दिखती क्योंकि यह कहीं न कहीं संबंधों का विस्तार कर रहा है। संवाद की गुंजाइश बना रहा है। रहिए कनेक्ट के नारे को साकार कर रहा है। इसके सही और सार्थक इस्तेमाल से छवियां गढ़ी जा रही हैं, चुनाव लड़े और जीते जा रहे हैं।

इसके साथ ही हमें यह भी समझना होगा किसी भी माध्यम का गलत इस्तेमाल हमें संकट में ही डालता है। यह समय इंफारमेशन वारफेयर का भी है और साइको वारफेयर का भी। इस दौर में सूचनाएं मुक्त हैं और प्रभावित कर रही हैं। यहां संपादक अनुपस्थित है और रिर्पोटर भी प्रामाणिक नहीं हैं। इसलिए सूचनाओं की वास्तविकता भी जांची जानी चाहिए। कई बार जो संकट खड़े हो रहे हैं, वह वास्तविकता से दूर होते हैं। सोशल मीडिया की पहुंच और प्रभाव को देखते हुए यहां दी जा रही सूचनाओं के सावधान इस्तेमाल की जरूरत भी महसूस की जाती है।

इसे अफवाहें, तनाव और वैमनस्य फैलाने का माध्यम बनाने वालों से सावधान रहने की जरूरत है। चुनावों या संवेदनशील राजनीतिक मौकों पर राजनेताओं के फर्जी भाषणों या बयानों वाले डीपफेक वीडियो का प्रसार मतदाताओं को भ्रमित कर सकता है। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था में निष्पक्षता और जनमत को गलत दिशा में मोड़ने का एक खतरनाक हथियार बनता जा रहा है।

वॉयस क्लोनिंग (आवाज की नकल) और वीडियो डीपफेक का उपयोग करके अब कॉरपोरेट घरानों, बैंकों और आम नागरिकों को चूना लगाने के मामले तेजी से बढ़े हैं। ठग फेक आइडेंटिटी के जरिए बड़ी आर्थिक धोखाधड़ी को अंजाम दे रहे हैं। हालांकि डीपफेक और भ्रामक कृत्रिम सामग्री (SGI) पर लगाम कसने के लिए अब कानूनों को सख्त किया गया है। इसके तहत एआई-जनित फोटो, वीडियो या ऑडियो पर स्पष्ट 'डिजिटल स्टैम्प' या लेबल लगाना अनिवार्य किया गया है ताकि उपयोगकर्ता पहली नजर में पहचान सकें।

शक्ति का हो सार्थक इस्तेमाल-

सोशल मीडिया में समरस और मानवीय समाज की रचना की शक्ति छिपी है। किंतु उसकी यह संभावना उसके इस्तेमाल करने वालों में छिपी हुयी है। इसका सही इस्तेमाल ही हमें इसके वास्तविक लाभ दिला सकता है। सामाजिक सवालों पर जागरूकता और जनचेतना के जागरण में भी यह माध्यम सहायक सिद्ध हो सकता है। आम चुनावों में राजनीतिक दलों ने इस माध्यम की ताकत को इस्तेमाल किया और समझा है। आज युवा शक्ति के इस माध्यम में बड़ी उपस्थित के चलते इसे सामाजिक बदलाव और परिवर्तन का वाहक भी माना जा रहा है।

सकात्मकता से भरे-पूरे युवा और सामाजिक सोच से लैस लोग इस माध्यम से उपजी शक्ति को भारत के निर्माण में लगा सकते हैं। ऐसे समय में जब सोशल मीडिया की शक्ति का प्रगटीकरण साफ है, हमें इसके सावधान, सतर्क और समाज के लिए उपयोगी प्रयोगों की तरफ बढ़ने की जरूरत है। यदि ऐसा संभव हो सका तो सोशल मीडिया की शक्ति हमारे लोकतंत्र के लिए वरदान साबित हो सकती है।

डीपफेक का सबसे बुरा शिकार अक्सर महिलाएं और प्रसिद्ध हस्तियां हो रही हैं, जिनकी तस्वीरें या वीडियो का गलत इस्तेमाल करके उनकी मानहानि या ऑनलाइन उत्पीड़न किया जाता है। यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा पर सीधा हमला है।

एंगेजमेंट की भूख से बढ़ता खतरा-

सोशल मीडिया के एल्गोरिदम 'एंगेजमेंट' (व्यूज और लाइक्स) के भूखे होते हैं। झूठी और सनसनीखेज खबरें सच की तुलना में तेजी से फैलती हैं, जिससे सोशल मीडिया पर फेक न्यूज का कारोबार फल-फूल रहा है। यह केवल सरकारों या टेक कंपनियों की लड़ाई नहीं है। मुख्यधारा के मीडिया और जागरूक नागरिकों को आगे आकर फेक नैरेटिव्स का खंडन करना होगा और तकनीक के सकारात्मक इस्तेमाल को बढ़ावा देते हुए एक सुरक्षित डिजिटल स्पेस का निर्माण करना होगा।

पारंपरिक कहावत "आंखों देखी पर विश्वास करो" अब डिजिटल युग में दम तोड़ रही है। जब वीडियो और तस्वीरों पर से लोगों का भरोसा उठ जाता है, तो समाज में हर प्रामाणिक और सच्ची घटना पर भी शक का माहौल पैदा होने लगता है। सोशल मीडिया ने अपनी लोकप्रियता के साथ भरोसे का संकट भी खड़ा किया है, इसमें दो राय नहीं है।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )

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AI की रफ्तार बनाम पत्रकारिता का भरोसा, 'मीडिया संवाद' में विशेषज्ञों ने रखी अपनी बेबाक राय

'मीडिया संवाद' कार्यक्रम में 'एआई के दौर का न्यूज़रूम: रफ्तार, भरोसा और पत्रकारिता का भविष्य' विषय पर एक महत्वपूर्ण परिचर्चा आयोजित की गई।

Vikas Saxena by
Published - Friday, 07 August, 2026
Last Modified:
Friday, 07 August, 2026
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समाचार4मीडिया के 40 अंडर 40 सम्मान समारोह के तहत 28 जुलाई को आयोजित 'मीडिया संवाद' कार्यक्रम में 'एआई के दौर का न्यूज़रूम: रफ्तार, भरोसा और पत्रकारिता का भविष्य' विषय पर एक महत्वपूर्ण परिचर्चा आयोजित की गई। इस चर्चा का संचालन समाचार4मीडिया के संपादक पंकज शर्मा ने किया। पैनल में जी डिजिटल (आईडीपीएल) के ग्रुप एडिटर अनुज खरे, जया कौशिक रिपोर्ट्स की संस्थापक जया कौशिक और दैनिक जागरण के दिल्ली प्रमुख स्वदेश कुमार शामिल हुए।

चर्चा की शुरुआत करते हुए पंकज शर्मा ने कहा कि आज एआई तेजी से न्यूज़रूम का हिस्सा बनता जा रहा है। स्क्रिप्ट लिखने से लेकर वीडियो एडिटिंग तक कई काम अब एआई की मदद से हो रहे हैं। लेकिन इसके साथ पत्रकारिता की विश्वसनीयता, रफ्तार और भविष्य जैसे कई बड़े सवाल भी खड़े हो रहे हैं। इसी विषय पर उन्होंने सभी वक्ताओं से उनके अनुभव और राय साझा करने को कहा।

सबसे पहले बोलते हुए अनुज खरे ने कहा कि पिछले एक साल में एआई ने न्यूज़रूम की कार्यप्रणाली पूरी तरह बदल दी है। पहले जिन कामों में घंटों लगते थे, वे अब कुछ मिनटों में पूरे हो जाते हैं। बड़ी रिपोर्टों का सार निकालना, लीगल दस्तावेज़ समझना और डेटा जुटाना बेहद आसान हो गया है। लेकिन इसके साथ सबसे बड़ी चुनौती विश्वसनीयता की है। उन्होंने कहा कि एआई कई बार गलत जानकारी या 'हैलुसिनेशन' भी देता है और अगर पत्रकार के पास विषय की मूल समझ नहीं होगी तो वह गलत जानकारी को ही सही मानकर प्रकाशित कर सकता है। यही कारण है कि आज स्पीड बढ़ी है, लेकिन भरोसा कम हुआ है। उन्होंने कहा कि पहले खबर कई स्तरों पर जांच के बाद प्रकाशित होती थी, जबकि अब कुछ मिनटों में खबर प्रकाशित हो जाती है और बाद में उसे हटाना पड़ता है, जिससे मीडिया की साख प्रभावित होती है।

जया कौशिक ने कहा कि एआई ने टीवी न्यूज़रूम में भी गहरी पैठ बना ली है। अब कई जगह रनडाउन, स्क्रिप्ट और एंकर लिंक तक एल्गोरिद्म के आधार पर तैयार होने लगे हैं। उनके मुताबिक एआई का सबसे बड़ा नकारात्मक पक्ष यह है कि वह पत्रकार की कल्पनाशीलता और सोचने की क्षमता को धीरे-धीरे कम कर सकता है। पहले पत्रकार कई स्रोतों से जानकारी जुटाकर अपनी समझ विकसित करता था, जबकि अब लोग सीधे एआई के जवाबों पर निर्भर हो रहे हैं। हालांकि उन्होंने माना कि एआई बैकग्राउंड डेटा, रिसर्च और तकनीकी कार्यों में काफी मददगार साबित हो रहा है।

जया कौशिक ने जोर देकर कहा कि एआई कभी भी ग्राउंड रिपोर्टिंग की जगह नहीं ले सकता। उन्होंने दिल्ली बाढ़ की अपनी रिपोर्टिंग का उदाहरण देते हुए बताया कि एआई पानी का स्तर तो बता सकता है, लेकिन बाढ़ से प्रभावित लोगों का दर्द, श्मशान घाटों की स्थिति और लोगों की भावनाओं को महसूस नहीं कर सकता। उनके मुताबिक पत्रकार की सबसे बड़ी ताकत उसकी संवेदनशीलता और जमीन पर जाकर सच देखने की क्षमता है।

दैनिक जागरण के दिल्ली प्रमुख स्वदेश कुमार ने कहा कि प्रिंट मीडिया में एआई फिलहाल एक सहायक की भूमिका निभा रहा है। उन्होंने कहा कि डेटा जुटाने और जानकारी खोजने में जरूर समय बचता है, लेकिन खबर की प्राथमिकता तय करना, उसका नजरिया बनाना और उसे किस स्थान पर प्रकाशित करना है, यह काम आज भी इंसान ही कर सकता है। उन्होंने भरोसा जताया कि अखबार अपनी विश्वसनीयता के कारण आगे भी मजबूती से बने रहेंगे।

ब्रेकिंग न्यूज़ में एआई की भूमिका पर जया कौशिक ने कहा कि जल्दबाजी सबसे बड़ा खतरा है। उन्होंने हाल के एक एआई एडिटेड वीडियो का उदाहरण देते हुए कहा कि पत्रकार की जिम्मेदारी पहले से अधिक बढ़ गई है। किसी भी वीडियो या दावे को प्रसारित करने से पहले मंत्रालय की वेबसाइट, आधिकारिक सोशल मीडिया और अपने विश्वसनीय स्रोतों से उसका सत्यापन करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि विश्वसनीय मीडिया संस्थान आज भी स्पीड से ज्यादा सत्यापन को प्राथमिकता देते हैं।

अनुज खरे ने कहा कि एआई हेडलाइन लिख सकता है, वीडियो बना सकता है और ट्रेंडिंग विषय बता सकता है, लेकिन वह कभी न्यूज़ जजमेंट विकसित नहीं कर सकता। कौन सी खबर सबसे महत्वपूर्ण है, किस एंगल से पेश करनी है और किसे प्रमुखता देनी है, इसका फैसला हमेशा संपादक ही करेगा। उन्होंने कहा कि एआई केवल सुझाव दे सकता है, अंतिम निर्णय इंसान का ही रहेगा क्योंकि उसके पीछे अनुभव, समझ और भावनात्मक दृष्टि होती है।

इस दौरान जया कौशिक ने यह भी चिंता जताई कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में अनुभवी संपादकों की भूमिका धीरे-धीरे कम होती जा रही है। कई संस्थान युवा पत्रकारों को प्राथमिकता दे रहे हैं, जबकि वरिष्ठ संपादकों के अनुभव का पूरा लाभ नहीं उठाया जा रहा। उनके अनुसार पत्रकारिता में अनुभव और संपादकीय समझ की अहमियत हमेशा बनी रहनी चाहिए।

स्वतंत्र पत्रकार के रूप में अपने अनुभव साझा करते हुए जया कौशिक ने कहा कि वह एआई का उपयोग करती हैं, लेकिन उसे केवल सहायक के रूप में रखती हैं। उनके अनुसार एआई ड्राइविंग सीट पर नहीं, बल्कि बैक सीट पर होना चाहिए। अंतिम फैसला पत्रकार का होना चाहिए, क्योंकि पत्रकार की विश्वसनीयता ही उसकी सबसे बड़ी पूंजी होती है।

पत्रकार की पहचान पर स्वदेश कुमार ने कहा कि भविष्य में वही पत्रकार सफल होगा जो मौलिक और एक्सक्लूसिव रिपोर्टिंग करेगा। एआई इंटरनेट पर मौजूद सामग्री ही जुटा सकता है, लेकिन किसी घटना का वास्तविक परिप्रेक्ष्य, भीड़ का आकलन, माहौल और जमीन की सच्चाई केवल रिपोर्टर ही सामने ला सकता है।

इस बात का समर्थन करते हुए अनुज खरे ने कहा कि आज डिजिटल दुनिया में अधिकांश सामग्री एक जैसी है। ऐसे में गूगल भी अब केवल मौलिक, ग्राउंड रिपोर्टिंग और इंटरव्यू आधारित कंटेंट को प्राथमिकता दे रहा है। उन्होंने बताया कि हाल के गूगल कोर अपडेट के बाद बड़ी संख्या में वेबसाइटों की पहुंच कम हो गई क्योंकि उनके पास अलग और मौलिक सामग्री नहीं थी। आने वाले समय में वही मीडिया संस्थान टिक पाएंगे जो ओरिजिनल कंटेंट पर निवेश करेंगे।

जब पंकज शर्मा ने पूछा कि अगर न्यूज़रूम में एआई का इस्तेमाल बंद हो जाए तो सबसे ज्यादा असर किस पर पड़ेगा, तो अनुज खरे ने कहा कि जिन लोगों ने पूरी तरह एआई पर निर्भरता बना ली है, उन्हें सबसे अधिक दिक्कत होगी। वहीं जया कौशिक ने कहा कि इससे कई लोगों की नौकरियां बच सकती हैं, खासकर ग्राफिक डिजाइन जैसे क्षेत्रों में। उन्होंने यह भी कहा कि स्पीड थोड़ी कम होगी, लेकिन पत्रकारिता की विश्वसनीयता बढ़ेगी और रिपोर्टर आधारित पत्रकारिता को फिर से महत्व मिलेगा।

स्वदेश कुमार ने कहा कि उनके संस्थान में एआई के उपयोग को बढ़ावा दिया गया है, लेकिन प्रिंट टीम ने उसकी कई कमियां सामने आने के कारण अभी तक उसे पूरी तरह नहीं अपनाया है। उनके अनुसार एआई हटने से केवल डेटा जुटाने में थोड़ा अधिक समय लगेगा, बाकी पत्रकारिता पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ेगा।

एक अन्य सवाल के जवाब में स्वदेश कुमार ने बताया कि अब कई मीडिया संस्थान अपने-अपने एआई टूल विकसित कर रहे हैं, जिससे सभी संस्थानों का काम पूरी तरह एक जैसा नहीं होगा। वहीं अनुज खरे ने कहा कि एआई का अंधाधुंध उपयोग कई बार कंटेंट को हास्यास्पद बना देता है। इसलिए यह स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए कि कौन-सा कंटेंट एआई से तैयार किया गया है। उनके अनुसार पारदर्शिता और निष्पक्षता पत्रकारिता की बुनियादी शर्त है।

डीपफेक और फेक न्यूज़ की चुनौती पर अनुज खरे ने कहा कि आज कई तकनीकी टूल उपलब्ध हैं जो फर्जी फोटो, वीडियो और ऑडियो की पहचान कर सकते हैं। कई मीडिया संस्थान अपने फैक्ट-चेकिंग सिस्टम भी विकसित कर रहे हैं। लेकिन सबसे बड़ी चुनौती जल्दबाजी है। कई बार सत्यापन पूरा होने से पहले ही कंटेंट प्रकाशित हो जाता है। उन्होंने कहा कि यदि विश्वसनीयता बचानी है तो मीडिया संस्थानों को स्पीड से ज्यादा सत्यापन को महत्व देना होगा।

युवा पत्रकारों में सबसे महत्वपूर्ण गुण पर स्वदेश कुमार ने कहा कि अब केवल अच्छा लिखना पर्याप्त नहीं है। पत्रकार को 360 डिग्री स्किल्स के साथ काम करना होगा। उसे प्रिंट, डिजिटल और वीडियो- तीनों माध्यमों में दक्ष होना चाहिए। उन्होंने बताया कि हाल ही में एक इंटर्न ने जंतर-मंतर से इतनी प्रभावी रिपोर्टिंग की कि वह अनुभवी पत्रकारों से भी बेहतर लगी।

चर्चा के अंत में जया कौशिक ने कहा कि आने वाले 10 वर्षों में एआई चाहे जितना विकसित हो जाए, लेकिन पत्रकार की संवेदनशीलता और उसकी विश्वसनीयता को मशीन कभी नहीं बदल सकती। समापन करते हुए पंकज शर्मा ने कहा कि आज लगभग हर न्यूज़रूम एआई का इस्तेमाल कर रहा है, लेकिन कुछ ऐसे क्षेत्र हमेशा रहेंगे जहां इंसानी दखल अनिवार्य रहेगा। उन्होंने सभी वक्ताओं का कार्यक्रम में शामिल होकर अपने विचार साझा करने के लिए आभार व्यक्त किया।

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एक करोड़ इंटर्न कहां हैं? पढ़िए इस सप्ताह का 'हिसाब किताब'

सरकार ने समय-समय पर संसद में जो जानकारी दी है उसके अनुसार पहले राउंड में करीब 8 हज़ार युवाओं को इंटर्नशिप मिली, दूसरे राउंड में करीब 7 हज़ार, युवाओं को इंटर्नशिप के लिए घर के पास ही मौक़े चाहिए थे।

Samachar4media Bureau by
Published - Monday, 03 August, 2026
Last Modified:
Monday, 03 August, 2026
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मिलिंद खांडेकर, वरिष्ठ पत्रकार।

5 साल में 1 करोड़ युवाओं को इंटर्नशिप देने का वादा किया गया था, लेकिन दो साल में केवल 26 हज़ार युवाओं को ही इसका लाभ मिल सका है। यह घोषणा वित्त मंत्री ने जुलाई 2024 के बजट में की थी, जब 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को अपने दम पर बहुमत नहीं मिला था और युवा असंतोष को एक बड़ा मुद्दा माना जा रहा था। प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना के तहत 500 बड़ी कंपनियों में 12 महीने की इंटर्नशिप और हर महीने ₹5,000 का स्टाइपेंड देने का प्रावधान किया गया था, ताकि युवाओं को करियर की शुरुआत में ही काम का अनुभव मिल सके।

सरकार के संसद में दिए गए आंकड़ों के अनुसार पहले चरण में करीब 8 हज़ार, दूसरे चरण में करीब 7 हज़ार और तीसरे चरण में लगभग 11 हज़ार युवाओं को इंटर्नशिप मिली। युवाओं की मांग थी कि उन्हें अपने घर के आसपास ही इंटर्नशिप के अवसर मिलें, जिसे योजना की सबसे बड़ी चुनौती माना गया। इसके बाद सरकार ने योजना का दायरा छोटी कंपनियों तक बढ़ाया और स्टाइपेंड बढ़ाकर ₹9,000 कर दिया। इसके बावजूद दो साल में केवल 26 हज़ार युवाओं तक ही योजना पहुंच सकी, जबकि लक्ष्य 30 लाख का था।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगले तीन साल में सरकार 99 लाख से अधिक युवाओं को इंटर्नशिप कैसे उपलब्ध कराएगी। जब यह योजना शुरू हुई थी, तभी इस लक्ष्य की व्यवहारिकता पर सवाल उठे थे। देश की 500 बड़ी कंपनियों में पहले करीब 70 लाख कर्मचारी थे, जो अब बढ़कर लगभग 84 लाख हो गए हैं। ऐसे में हर साल 15 से 20 लाख इंटर्न रखने की क्षमता इन कंपनियों में है या नहीं, यह बड़ा प्रश्न बना हुआ है। यह स्थिति दिखाती है कि सरकारी योजनाएं कागज़ों पर तो बन जाती हैं, लेकिन उन्हें ज़मीन पर लागू करना कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण होता है। बेरोज़गारी का मुद्दा आज भी जस का तस बना हुआ है।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )

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आंदोलन, प्रदर्शन, हिंसा के लिए भीड़तंत्र या सिर्फ पुलिस दोषी: आलोक मेहता

इससे स्पष्ट होता है कि पुलिस का जोखिम केवल गोली या पत्थर तक सीमित नहीं है, बल्कि महामारी, संक्रमण, लंबी ड्यूटी और मानसिक तनाव भी उनकी सेवा का हिस्सा हैं।

Samachar4media Bureau by
Published - Monday, 03 August, 2026
Last Modified:
Monday, 03 August, 2026
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आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।

दिल्ली में छात्र आंदोलन के अंतिम चरण में उग्र भीड़ और पुलिस के टकराव ने एक गंभीर विवाद पैदा कर दिया। छात्रों और उनके समर्थकों के अलावा असामाजिक तत्वों तथा अपराधियों पर पुलिस कार्रवाई को लेकर राहुल गांधी और उनके गठबंधन के नेताओं ने बर्बर लाठीचार्ज, गोलीबारी और हजारों लोगों के घायल होने जैसे अनर्गल आरोप संसद से लेकर सड़क तक लगाए। शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग के बाद अब देश के गृह मंत्री अमित शाह को भी पुलिस की कथित ज्यादती का दोषी ठहराकर उनका इस्तीफा मांगा जा रहा है।

असली निशाना तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही हैं। प्रतिपक्ष यह क्यों भूल जाता है कि यदि अगली बार पुलिस हिंसक भीड़ को संसद या विधानसभा में घुसने से रोकने के बजाय लाठी, आंसू गैस और बंदूक नीचे रख दे, तो क्या स्थिति होगी? यदि पुलिस किसी राज्य में अपनी सुरक्षा और सुविधाओं की मांग को लेकर सड़कों पर उतर जाए, तो नेताओं और जनता का क्या होगा?

राहुल गांधी को उनके पालतू सलाहकार या अमेरिकी अंकल शायद न जानते हों, लेकिन पुराने कांग्रेसी 1973 में कांग्रेस शासन के दौरान प्रादेशिक सशस्त्र कांस्टेबुलरी (पीएसी) के आंदोलन की जानकारी अवश्य रखते होंगे। तब कांग्रेस के मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से सेना बुलाने की गुहार लगानी पड़ी थी। सेना की कार्रवाई में करीब 35 पुलिसकर्मी मारे गए और सैकड़ों घायल हुए। अंततः मुख्यमंत्री को इस्तीफा देना पड़ा और राष्ट्रपति शासन लगाकर स्थिति पर नियंत्रण किया गया।

दिल्ली का रामलीला मैदान और जंतर-मंतर लंबे समय से लोकतांत्रिक विरोध और असहमति की आवाज उठाने के प्रमुख स्थल रहे हैं। अन्ना आंदोलन से लेकर किसानों, पहलवानों, छात्रों और विभिन्न सामाजिक संगठनों के आंदोलनों तक यहां प्रदर्शन होते रहे हैं।

इसलिए इन्हें लोकतांत्रिक विरोध के अधिकार का महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है। लेकिन हाल ही में अमेरिका से उतरी कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा छात्रों की परीक्षाओं में गड़बड़ियां रोकने की मांग को लेकर 20 जुलाई 2026 को आयोजित "संसद चलो" प्रदर्शन के दौरान जंतर-मंतर और नई दिल्ली क्षेत्र में पुलिस तथा प्रदर्शनकारियों के बीच गंभीर टकराव हुआ। दिल्ली पुलिस के अनुसार इस हिंसा में 118 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए, जिनमें वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल थे। बाद की रिपोर्टों में घायल पुलिसकर्मियों की संख्या 129 तक बताई गई। लगभग 70 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया और करीब 60 प्रदर्शनकारियों के घायल होने की भी रिपोर्ट सामने आई।

इसके बाद 31 जुलाई को घायल दिल्ली पुलिसकर्मियों के परिवारों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आरोप लगाया कि जंतर-मंतर प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मियों को जानबूझकर निशाना बनाया गया। परिवारों के अनुसार अग्रिम पंक्ति में तैनात जवानों को भीड़ ने घेरा, उन पर पत्थर फेंके और शारीरिक हमला किया। कुछ पुलिसकर्मियों की गंभीर चोटों का भी उल्लेख किया गया।

दूसरी ओर, प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर अत्यधिक बल प्रयोग, लाठीचार्ज और अन्य कार्रवाई के आरोप लगाए। राहुल गांधी और उनके सहयोगियों के सक्रिय होने के बाद विदेशों में बैठे मानवाधिकार संगठनों ने भी भारतीय लोकतंत्र को कठघरे में खड़ा करते हुए इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाया। इन संस्थाओं ने 20 जुलाई की कार्रवाई में अत्यधिक बल प्रयोग और प्रदर्शनकारियों के अधिकारों के उल्लंघन की आशंका जताई। इसलिए लोकतंत्र में मूल प्रश्न यह नहीं है कि पुलिस सही थी या प्रदर्शनकारी। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि राजधानी के सबसे संवेदनशील प्रदर्शन क्षेत्र में भी पुलिसकर्मी सीधे भीड़ के हमले का शिकार हो जाते हैं, तो कानून-व्यवस्था कैसे कायम रहेगी।

यदि पुलिसकर्मियों को हजारों लोगों की भीड़ नियंत्रित करनी है, तो उनके पास पर्याप्त अधिकार, संसाधन, आवश्यकता पड़ने पर रैपिड फोर्स का सहयोग तथा सरकार ही नहीं, प्रतिपक्ष और समाज का भी विश्वास एवं समर्थन होना चाहिए। उन्हें यह भरोसा भी होना चाहिए कि ड्यूटी के दौरान गंभीर चोट लगने या मृत्यु होने पर उनके परिवार को तत्काल आर्थिक सहायता, बीमा और चिकित्सा सुविधा मिलेगी।

इसे संयोग ही कहा जाएगा कि हाल की घटना पर देशभर में बहस के बीच 2020 के सांप्रदायिक दंगों के दौरान आम आदमी पार्टी के पार्षद की अगुवाई में दिल्ली पुलिस की सहायता कर रहे केंद्रीय खुफिया ब्यूरो (आईबी) के युवा अधिकारी अंकित शर्मा की हत्या मामले में अदालत का फैसला आया। अदालत ने बताया कि नेता ताहिर हुसैन और चार अन्य आरोपियों ने अत्यंत क्रूरता के साथ अंकित शर्मा की हत्या कर उनका शव नाले में फेंक दिया।

घटना के समय अंकित शर्मा निहत्थे थे। सामान्यतः खुफिया विभाग के अधिकारी बिना हथियार के भीड़ और संवेदनशील क्षेत्रों में स्थिति का आकलन करने तथा अपराधियों की गतिविधियों पर नजर रखने का कार्य करते हैं। अदालत ने उनके शरीर पर 51 चोटों और सात घातक घावों का उल्लेख करते हुए इसे अत्यंत क्रूर हत्या बताया और दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई।

अभियोजन पक्ष ने मृत्युदंड की मांग की थी। यह फैसला केवल 2020 के दिल्ली दंगों का मामला नहीं है, बल्कि यह भी प्रश्न उठाता है कि जब भीड़ कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाले पुलिसकर्मियों, सुरक्षा कर्मियों और खुफिया अधिकारियों को ही निशाना बनाने लगे, तब लोकतांत्रिक व्यवस्था उनकी सुरक्षा कैसे सुनिश्चित करेगी।

वर्तमान में कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के नेताओं को 1973 के आंदोलन को भी याद करना चाहिए, जो छात्रों की समस्याओं, पुलिस के सम्मान, कार्य परिस्थितियों, आवास, अवकाश, संगठन बनाने के अधिकार और वरिष्ठ अधिकारियों के व्यवहार से जुड़ी शिकायतों से जुड़ा था। उस समय मैं दिल्ली में हिन्दुस्थान समाचार समाचार एजेंसी का संवाददाता था और संसद तथा राजनीति को कवर करता था।

संसद में इस मुद्दे की गूंज स्वयं देखी और सुनी है। आज बढ़ती आबादी, बढ़ती अपेक्षाओं और देश-विदेश की भारत विरोधी ताकतों के इरादों के साथ-साथ डिजिटल और इंटरनेट माध्यमों से सही-गलत सूचनाओं तथा अफवाहों के तेजी से फैलने की स्थिति को भी समझना होगा।

मार्च 1973 में अधीनस्थ पुलिसकर्मियों के बीच संगठनात्मक गतिविधियां तेज हुईं। अप्रैल में अनुशासन संबंधी विरोध के संकेत मिले और मई आते-आते असंतोष खुली चुनौती में बदल गया। लखनऊ विश्वविद्यालय इस विस्फोट का केंद्र बना। विश्वविद्यालय में परीक्षाओं के दौरान पीएसी की तैनाती को लेकर छात्रों में भी असंतोष था। मई 1973 में पीएसी के कुछ असंतुष्ट जवानों और छात्रों के आंदोलन का संपर्क हुआ।

देखते-देखते "पीएसी-छात्र एकता" के नारे लगने लगे। स्थिति तब गंभीर हो गई, जब पीएसी के कुछ जवान छात्रों के साथ विरोध प्रदर्शन में शामिल हो गए और विश्वविद्यालय परिसर में हिंसा तथा आगजनी होने लगी। विश्वविद्यालय की कई इमारतों, परीक्षा शाखा, रजिस्ट्रार कार्यालय और अन्य परिसरों को नुकसान पहुंचा। हालात इतने बिगड़ गए कि भारतीय सेना को विश्वविद्यालय परिसर में बुलाना पड़ा। सेना ने परिसर को घेरकर छात्रावासों को नियंत्रित किया और प्रवेश पर निगरानी शुरू की।

पुलिस का असंतोष और विद्रोह अंततः दबा दिया गया। कई जवानों पर मुकदमे चले, अनेक मारे गए, सैकड़ों गिरफ्तार और बर्खास्त किए गए। लेकिन सरकार पर इतना राजनीतिक दबाव पड़ा कि मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी को पद छोड़ना पड़ा और उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू करना पड़ा। 1973 की यह घटना केवल पुलिस इतिहास नहीं थी, बल्कि पुलिस असंतोष, छात्र आंदोलन, प्रशासनिक विफलता, हथियारबंद विद्रोह, सेना के हस्तक्षेप और सत्ता परिवर्तन का संयुक्त उदाहरण थी।

पिछले लगभग 20 वर्षों में पुलिस और सुरक्षा बलों को प्रदर्शन, दंगों, सांप्रदायिक हिंसा और भीड़ की हिंसा के दौरान कई बार निशाना बनाया गया है। 16 दिसंबर 2012 के निर्भया कांड के बाद दिल्ली में हुए विशाल प्रदर्शन के दौरान कांस्टेबल सुभाष तोमर गंभीर रूप से घायल हुए और बाद में उनकी मृत्यु हो गई। दिसंबर 2018 में बुलंदशहर में इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह की हत्या कर दी गई।

इसी महीने गाजीपुर में प्रधानमंत्री की सभा से लौट रहे पुलिसकर्मियों पर भीड़ ने पथराव किया, जिसमें कांस्टेबल सुरेश वत्स की मृत्यु हो गई। इन घटनाओं ने यह प्रश्न खड़ा किया कि क्या भीड़ नियंत्रण के दौरान पुलिस को पर्याप्त सुरक्षात्मक उपकरण और संस्थागत संरक्षण प्राप्त है।

नवंबर 2019 में तीस हजारी अदालत परिसर में पुलिस और वकीलों के बीच हिंसक टकराव के बाद लगभग 2,000 पुलिसकर्मी और उनके परिवारजन पुलिस मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन के लिए पहुंचे। यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि पुलिसकर्मी स्वयं अपनी सुरक्षा और संस्थागत संरक्षण की मांग लेकर सड़क पर उतरे थे। यह सामान्य ट्रेड यूनियन आंदोलन नहीं, बल्कि पुलिस बल के भीतर बढ़ती असुरक्षा की अभिव्यक्ति थी।

2020 में कोरोना महामारी के दौरान लॉकडाउन लागू कराने की जिम्मेदारी पुलिस पर थी। इस दौरान कई राज्यों में पुलिसकर्मियों पर हमले हुए। महाराष्ट्र में दायर एक जनहित याचिका में दावा किया गया कि लॉकडाउन लागू कराने के दौरान 97 पुलिसकर्मियों पर हमले हुए। इससे स्पष्ट होता है कि पुलिस का जोखिम केवल गोली या पत्थर तक सीमित नहीं है, बल्कि महामारी, संक्रमण, लंबी ड्यूटी और मानसिक तनाव भी उनकी सेवा का हिस्सा हैं।

26 जनवरी 2021 के किसान ट्रैक्टर मार्च के दौरान दिल्ली में 394 पुलिसकर्मी घायल हुए। कई स्थानों पर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक टकराव हुआ तथा लाल किले में बैरिकेड तोड़कर प्रदर्शनकारियों के प्रवेश की घटनाएं सामने आईं। किसान आंदोलन के दौरान सिंघु बॉर्डर पर भी पुलिसकर्मियों पर हमले हुए। इन घटनाओं ने पुलिस के सामने यह कठिन चुनौती रखी कि एक ओर शांतिपूर्ण प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकार की रक्षा की जाए और दूसरी ओर हिंसा, पथराव तथा पुलिस पर हमलों की स्थिति में कानून-व्यवस्था भी बनाए रखी जाए।

इसलिए संपूर्ण राजनीतिक व्यवस्था और भारतीय समाज को लोकतांत्रिक अधिकारों के नाम पर होने वाले अनियंत्रित आंदोलनों और उपद्रवों को समय रहते नियंत्रित करने के उपायों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )

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इंटरनेट पर बढ़ रहा है AI-जनित कूड़ा-कचरा: पढ़िए इस सप्ताह का 'हिसाब किताब'

AI टूल्स के बढ़ते उपयोग ने Amazon, सोशल मीडिया और ईमेल तक AI-जनित कंटेंट की बाढ़ ला दी है। विशेषज्ञों के अनुसार AI सहायक हो सकता है, लेकिन मौलिक सोच और लेखन की जगह नहीं ले सकता।

Samachar4media Bureau by
Published - Monday, 20 July, 2026
Last Modified:
Monday, 20 July, 2026
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मिलिंद खांडेकर, वरिष्ठ पत्रकार।

New York Times की टेक्नोलॉजी रिपोर्टर कश्मीर हिल की बायोग्राफ़ी साल भर से Amazon पर बिक रही थी। उन्हें इसका पता भी नहीं था। 90 पेज की यह किताब उनके बारे में इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारी के आधार पर लिखी गई थी। जब किसी परिचित ने उन्हें इस बारे में बताया तो खोजबीन शुरू हुई। यह किताब आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (AI) से लिखी गई थी। उन्होंने लेखक से संपर्क किया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। अब यह किताब ही ग़ायब हो गई है।

यह AI Slop का एक उदाहरण है। हिंदी में इसे AI-जनित कूड़ा-कचरा कह सकते हैं। ChatGPT 2022 में आने के बाद से कुछ भी लिखना आसान हो गया है। न सोचने की ज़रूरत है, न ही रिसर्च की। भाषा आना भी ज़रूरी नहीं है। सिर्फ़ एक Prompt दे दीजिए, AI सब कुछ कर सकता है। इसका नतीजा यह हुआ है कि Amazon पर हर महीने करीब 3 लाख E-books प्रकाशित हो रही हैं। ChatGPT आने से पहले यह आँकड़ा एक लाख के आसपास था।

AI Slop सिर्फ़ किताबों में नहीं दिख रहा है, बल्कि सोशल मीडिया पर आपकी टाइमलाइन पर भी। सोशल मीडिया पर पोस्ट AI लिख रहा है। आपको आने वाले ज़्यादातर ईमेल भी AI ही लिख रहा है। WhatsApp पर AI से बने ग्राफिक्स की बाढ़ आ गई है। AI से लिखा हुआ कंटेंट पकड़ने वाली कंपनी Pangram Lab ने 10 लाख पोस्ट जाँचीं। LinkedIn पर 10 में से 4 लंबे पोस्ट AI ने लिखे थे, जबकि X पर एक-चौथाई। आपकी टाइमलाइन पर AI से लिखे पोस्ट आसानी से पकड़ में आ जाएंगे। भाषा एक जैसी, शैली एक जैसी, शब्दों की लफ़्फ़ाज़ी। ऐसे पोस्ट पढ़ने का मन भी नहीं करता।

मैं AI के इस्तेमाल और उसे सीखने का लगातार समर्थन करता रहा हूँ। सिर्फ़ इतना याद रखिए कि AI से लिखते समय अपना दिमाग़ गिरवी मत रखिए। आइडिया आपका होना चाहिए, भाषा और शैली आपकी होनी चाहिए। AI आपका Assistant हो सकता है। वह आपके लिए रिसर्च कर सकता है। आपकी कॉपी चेक कर सकता है। सारा काम ही उसे सौंप देंगे, तो फिर आप क्या करेंगे? कोई बड़ी बात नहीं होगी कि आने वाले दिनों में आपके लिखे शब्दों की क़ीमत मशीन से ज़्यादा हो जाए।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )

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मंदिरों की बढ़ती संपत्ति के साथ बढ़े विवाद: आलोक मेहता

अयोध्या राम मंदिर में दान-चढ़ावे की कथित चोरी के बाद मंदिर प्रबंधन पर बहस तेज हो गई है। इतिहास बताता है कि देश के कई बड़े मंदिरों में दान, संपत्ति को लेकर लंबे समय से विवाद होते रहे हैं।

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Published - Monday, 20 July, 2026
Last Modified:
Monday, 20 July, 2026
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आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।

अयोध्या के श्रीराम मंदिर में दान-चढ़ावे की चोरी पर भारी राजनीतिक बवाल खड़ा हो गया है। निश्चित रूप से इस तरह का गंभीर अपराध पहले नहीं हुआ, क्योंकि इस बार सरकार के सहयोग और विश्व हिन्दू परिषद तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े लोग मंदिर की पूरी व्यवस्था चला रहे थे। कुछ आरोपी कर्मचारियों पर कानूनी कार्रवाई शुरू हुई है, लेकिन राजनीतिक और सामाजिक संगठनों के नेता भ्रष्टाचार तथा अपराध की तरह व्यवस्थापकों को भी दंडित करने की आवाज उठा रहे हैं। संसद और सर्वोच्च न्यायालय में यह बहस का मुद्दा बना रहेगा।

अयोध्या के बाद बद्रीनाथ और वैष्णो देवी मंदिरों में भी चोरी के आरोप सार्वजनिक हुए हैं। असल में मंदिरों, मठों, आश्रमों अथवा मस्जिद, दरगाह, गुरुद्वारे और गिरिजाघरों जैसे विभिन्न धार्मिक स्थलों पर पहले भी कई बार विवाद सामने आते रहे हैं और अनेक मुकदमे आज तक अदालतों में चल रहे हैं। जहाँ वार्षिक आय करोड़ों रुपये होती है, वहाँ विवाद अक्सर इन मुद्दों पर होते हैं। चढ़ावे का नियंत्रण, दुकानों का आवंटन, पार्किंग और अन्य सेवा अनुबंध, मंदिर भूमि से आय, ट्रस्ट के निर्णय तथा दान की पारदर्शिता। खासकर दान-चढ़ावे के धन, सोने-चाँदी की संपत्ति और अधिकार को लेकर पहले से कार्यरत लोग ही एक-दूसरे पर आरोप लगाते या भंडाफोड़ करते हैं। अयोध्या मंदिर में भी पुराने कर्मचारी अथवा संगठन के लोगों ने बड़ी चोरी के राज खोलने शुरू किए हैं।

देश के प्रमुख मंदिरों के विवादों का रिकॉर्ड दिलचस्प है। ओडिशा के पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर में सेवायत (पुजारी परिवारों) और मंदिर प्रशासन के बीच अधिकारों को लेकर लंबे समय से विवाद रहे हैं। रथयात्रा, पूजा-पद्धति, चढ़ावे और सेवा-अधिकार पर कई मामले उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचे। वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर के सरकारी प्रबंधन, पुजारियों की भूमिका और पूजा के अधिकार को लेकर समय-समय पर विवाद हुए।

कॉरिडोर परियोजना के दौरान भी कई याचिकाएँ दायर हुईं। वृंदावन के बाँके बिहारी मंदिर में गोस्वामी परिवारों के अधिकार, दर्शन व्यवस्था और मंदिर प्रशासन को लेकर अनेक मुकदमे चले। सर्वोच्च न्यायालय तक कई प्रशासनिक मुद्दे पहुँचे। उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती कराने के अधिकार, पुजारियों की नियुक्ति और प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर विवाद हुए हैं। मंदिरों में विवाद इन मुद्दों पर होते हैं—वंशानुगत पुजारी बनने का अधिकार, कौन पूजा कराएगा और किस समय, चढ़ावे और दक्षिणा का बँटवारा, मंदिर की दुकानों, ठेकों और अन्य आय का प्रबंधन, सरकारी ट्रस्ट बनाम पारंपरिक पुजारी परिवार तथा सेवायतों की नियुक्ति और हटाना।

आम तौर पर पूजा का अधिकार ठेके पर नहीं दिया जाता। लेकिन कई मंदिरों में प्रसाद की दुकानें, पार्किंग, जूता-घर, कैंटीन, सफाई, सुरक्षा तथा अन्य व्यावसायिक सेवाओं का संचालन टेंडर या ठेके के माध्यम से होता है। मजेदार स्थिति यह है कि इन ठेकों को लेकर भी विवाद और मुकदमे होते हैं। इसी तरह साधुओं के कुछ आश्रमों के अधिकार को लेकर खूनी संघर्ष और मुकदमे तक हुए हैं।

पिछले वर्षों के दौरान देश के अनेक मंदिरों और मठों में महंतों की हत्या, उत्तराधिकार को लेकर गोलीबारी, साधुओं के गुटों में संघर्ष, मंदिर संपत्ति पर कब्ज़े के आरोप तथा दान और भूमि विवादों से जुड़ी आपराधिक घटनाएँ होती रही हैं। इनमें सबसे अधिक मामले उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तराखंड के बड़े मठों, नाथ संप्रदाय के प्रमुख मठों, रामानुज, वैष्णव और अखाड़ों से जुड़े मठों तथा मंदिरों अथवा दक्षिण भारत के पद्मनाभस्वामी मंदिर, सबरीमला मंदिर और तिरुमाला मंदिर से जुड़े रहे हैं। अधिकांश घटनाएँ स्थानीय स्तर की रही हैं, जबकि कुछ मामलों में सीबीआई या एसआईटी जाँच भी हुई।

यदि प्राचीन इतिहास को देखें तो भारतीय उपमहाद्वीप में ईश्वर की उपासना मंदिरों से बहुत पहले से होती थी। सिंधु-सरस्वती सभ्यता (लगभग 2600 से 1900 ईसा पूर्व) में संगठित मंदिरों के स्पष्ट प्रमाण नहीं मिले हैं, हालांकि पूजा और धार्मिक प्रतीकों के साक्ष्य अवश्य मिले हैं। वैदिक काल (1500–600 ईसा पूर्व) में पूजा का मुख्य केंद्र यज्ञ था। उस समय स्थायी मंदिरों की परंपरा नहीं थी। देवताओं की आराधना यज्ञ वेदियों पर होती थी। लगभग तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से दूसरी शताब्दी ईस्वी के बीच मूर्ति-पूजा और देवालयों का विकास प्रारंभ हुआ।

गुप्त काल (चौथी से छठी शताब्दी ईस्वी) को भारत में पत्थर के स्थायी हिन्दू मंदिरों का स्वर्णकाल माना जाता है। इसी समय देवगढ़, भितरगाँव, उदयगिरि आदि के मंदिर बने। इसके बाद दक्षिण भारत में पल्लव, चोल, चालुक्य, राष्ट्रकूट और होयसाल शासकों ने विशाल मंदिरों का निर्माण कराया। मंदिर केवल पूजा-स्थल नहीं थे। वे समाज के बहुआयामी केंद्र थे। मुख्य रूप से ईश्वर की उपासना, शिक्षा (गुरुकुल एवं वेद पाठ), कला, संगीत और नृत्य का संरक्षण, सामाजिक सभाएँ, दान एवं अन्नक्षेत्र, यात्रियों के विश्राम स्थल तथा स्थानीय अर्थव्यवस्था के केंद्र माने जाते थे।

कई बड़े मंदिरों के पास गाँव, कृषि भूमि, गौशालाएँ और शिल्पकारों का संरक्षण भी होता था। दक्षिण भारत के अनेक मंदिर अपने समय के सबसे बड़े आर्थिक संस्थानों में गिने जाते थे। राजा मंदिर बनवाता था, भूमि दान देता था और सुरक्षा देता था। दूसरी ओर, धार्मिक अनुष्ठान पुरोहितों या मठों के अधीन होते थे। इससे दो प्रकार के अधिकार विकसित हुए—धार्मिक अधिकार: पूजा कौन कराएगा, परंपरा क्या होगी, महंत या पुजारी कौन होगा; तथा प्रशासनिक एवं आर्थिक अधिकार: दान, भूमि, आय और प्रबंधन किसके नियंत्रण में होगा। जब मंदिरों की संपत्ति बढ़ी, तब इन अधिकारों को लेकर विवाद भी बढ़ने लगे।

प्राचीन भारत में भी विवाद होते थे। ऐतिहासिक अभिलेखों और शिलालेखों से पता चलता है कि विभिन्न मठों और संप्रदायों के बीच पूजा-अधिकार को लेकर मतभेद होते थे। राजाओं को कभी-कभी मंदिर प्रशासन में हस्तक्षेप करना पड़ता था। मंदिरों की दान-भूमि और आय के प्रबंधन पर शाही आदेश जारी किए जाते थे। कई शिलालेखों में मंदिर अधिकारियों को हटाने या नए प्रबंधक नियुक्त करने का उल्लेख मिलता है।

हालाँकि आधुनिक अर्थों में अदालतें नहीं थीं, इसलिए अधिकांश विवाद राजा, स्थानीय सभा (सभा/महासभा), ग्राम परिषद या धार्मिक परिषद द्वारा सुलझाए जाते थे। मध्यकाल में बड़े मठों और मंदिरों के पास विशाल संपत्ति हो गई। इससे महंत पद के उत्तराधिकार पर विवाद बढ़े। अलग-अलग धार्मिक संप्रदायों में नियंत्रण की प्रतिस्पर्धा हुई। कुछ स्थानों पर हिंसक संघर्ष भी हुए।

स्थानीय शासकों और धार्मिक संस्थाओं के बीच शक्ति-संतुलन का प्रश्न उत्पन्न हुआ। ब्रिटिश शासन के दौरान सरकार ने देखा कि अनेक मंदिरों और धार्मिक संस्थाओं के पास बड़ी संपत्ति है। 19वीं शताब्दी में विभिन्न प्रांतों में धार्मिक बंदोबस्त और ट्रस्ट संबंधी कानून बनाए गए। धीरे-धीरे सरकार ने प्रत्यक्ष नियंत्रण कम किया और धार्मिक न्यासों तथा ट्रस्टों की व्यवस्था विकसित हुई।

स्वतंत्रता के बाद विभिन्न राज्यों ने मंदिर प्रबंधन के लिए कानून बनाए। इसके बाद विवादों का स्वरूप बदल गया-पारंपरिक पुजारी बनाम सरकारी ट्रस्ट, वंशानुगत अधिकार बनाम आधुनिक प्रशासन, मंदिर की आय और संपत्ति का प्रबंधन तथा श्रद्धालुओं के अधिकार बनाम धार्मिक परंपरा। इसी प्रकार गुरुद्वारों में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी और स्थानीय प्रबंधन, मस्जिदों में वक्फ बोर्ड और मुतवल्ली, चर्चों में डायोसीज़ और ट्रस्ट तथा कई मठों में महंत के उत्तराधिकार को लेकर भी विवाद हुए।

इतिहासकारों का सामान्य मत है कि मंदिर मूलतः आध्यात्मिक और सामाजिक संस्थाएँ थे, लेकिन जैसे-जैसे उनके पास भूमि, दान, आर्थिक संसाधन और सामाजिक प्रभाव बढ़ा, वैसे-वैसे प्रबंधन, उत्तराधिकार और स्वामित्व के विवाद भी बढ़े। यह प्रवृत्ति केवल हिन्दू मंदिरों तक सीमित नहीं रही; भारत और विश्व के लगभग सभी बड़े धार्मिक संस्थानों में किसी-न-किसी रूप में ऐसे विवाद देखने को मिलते हैं।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )

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अनुभव, दूरदृष्टि और भरोसा: क्यों YAAP के लिए सही लीडर हैं राज नायक

राज नायक की नियुक्ति पर उठे सवालों का डॉ. अनुराग बत्रा ने दिया जवाब, बताया क्यों हैं YAAP के लिए सही विकल्प

Samachar4media Bureau by
Published - Thursday, 16 July, 2026
Last Modified:
Thursday, 16 July, 2026
RajNayak5412

डॉ. अनुराग बत्रा, चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ, एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप ।।

पिछले सप्ताह हम सभी ने बहुत कम उम्र में अतुल हेगड़े को खो दिया। अतुल और उनकी कंपनी YAAP अपने सबसे अच्छे दौर में पहुंचते हुए दिखाई दे रहे थे। कंपनी शेयर बाजार में सूचीबद्ध हो चुकी थी, कारोबार लगातार बढ़ रहा था और हर तरफ सफलता की नई कहानियां लिखी जा रही थीं।

लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। पिछले मंगलवार, 7 जुलाई को अतुल हेगड़े अचानक इस दुनिया को अलविदा कह गए। उनके जाने से उनका परिवार, पत्नी, माता-पिता, बिजनेस पार्टनर और उनसे जुड़े सभी लोग गहरे दुख में डूब गए।

YAAP के पास अनुभवी शेयरहोल्डर्स, इन्वेस्टर्स और सीनियर लीडर्स की एक मजबूत टीम है।

अतुल हेगड़े के साझेदार सुधीर मेनन और सुबोध मेनन हैं। दोनों कंपनी के को-प्रमोटर और इन्वेस्टर हैं। बड़े औद्योगिक रसायन (इंडस्ट्रियल केमिकल्स) कारोबार को खड़ा करने का उनका लंबा अनुभव YAAP के लिए बड़ी ताकत माना जाता है।

इसके अलावा YAAP में कई सीनियर और ऊर्जावान लीडर भी हैं, जिन्होंने कंपनी को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है और आज भी कंपनी के अलग-अलग कारोबार की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।

मन्नन कपूर, जो YAAP के फाउंडिंग पार्टनर हैं, कंपनी की उद्यमशील सोच और विकास के प्रमुख चेहरों में से एक रहे हैं। नए कारोबार लाना, ग्राहकों को बेहतर सेवाएं देना, टीमों का नेतृत्व करना और बिजनेस को आगे बढ़ाना उनकी खास पहचान है। उनकी युवा सोच और ऊर्जा इस डिजिटल इकोसिस्टम में बड़ा फायदा मानी जाती है। उन्होंने सरकारी क्षेत्र के कई बड़े प्रोजेक्ट भी कंपनी को दिलाए हैं और YAAP के सबसे बड़े दफ्तरों का संचालन भी संभालते हैं।

YAAP के सीनियर पार्टनर के रूप में मन्नन कपूर कंपनी की ग्रोथ को आगे बढ़ाने, इंटीग्रेटेड मार्केटिंग पहल का नेतृत्व करने और ग्राहकों के लिए तकनीक आधारित नए समाधान तैयार करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। डिजिटल बदलाव को लेकर उनका विशेष रुझान है और वे ब्रैंड्स के साथ मिलकर प्रभावशाली मार्केटिंग अभियान तैयार करते हैं।

YAAP के पास अन्य अनुभवी और उद्यमी लीडर भी हैं, जिनमें अंजन रॉय, अनूप कुमार और निशांत राडिया शामिल हैं। इन सभी की अपनी स्पष्ट जिम्मेदारियां हैं और कंपनी की तरक्की में इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

अंजन रॉय भी YAAP के सीनियर पार्टनर हैं। अगस्त 2016 से वे कंपनी के साथ जुड़े हुए हैं। गुरुग्राम स्थित अंजन रॉय कंपनी की रणनीतिक दिशा तय करने और कारोबार को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे ब्रैंड्स के साथ मिलकर ब्रैंड रणनीति, मार्केटिंग सलाह, कंटेंट निर्माण और बिजनेस डेवलपमेंट पर काम करते हैं, ताकि कंपनियां तेजी से डिजिटल होती दुनिया में अपनी प्रासंगिकता बनाए रख सकें।

रोहन भंसाली GOZOOP ग्रुप के को-फाउंडर हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत जेपी मॉर्गन में इन्वेस्टमेंट बैंकिंग से की थी। डिजिटल क्षेत्र की संभावनाओं को जल्दी पहचानते हुए उन्होंने 2008 में Raastudios नाम की वेब एप्लिकेशन डेवलपमेंट कंपनी शुरू की। 2010 में GOZOOP द्वारा Raastudios का अधिग्रहण किए जाने के बाद उन्होंने कंपनी को दुबई, सिंगापुर और न्यूयॉर्क जैसे अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई। साथ ही Red Digital और iThink Infotech जैसी कंपनियों के अधिग्रहण का नेतृत्व भी किया। उनके नेतृत्व में GOZOOP ने Dell, Asian Paints, Mashreq Bank, Viacom, Pidilite और Mahindra Lifespaces जैसे बड़े ब्रैंड्स के साथ काम करते हुए वैश्विक मार्केटिंग पार्टनर के रूप में अपनी पहचान बनाई।

निशांत राडिया YAAP में प्लेटफॉर्म्स के हेड हैं। वे कंपनी के सभी प्लेटफॉर्म, प्रोडक्ट्स और टेक्नोलॉजी से जुड़े काम का नेतृत्व करते हैं। वे Vidooly के फाउंडर भी हैं, जो वीडियो एनालिटिक्स और इन्फ्लुएंसर इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म है। प्रोडक्ट इनोवेशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), डेटा इंटेलिजेंस और क्रिएटर इकोनॉमी में उनका लंबा अनुभव है। YAAP में वे इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग, कंटेंट इंटेलिजेंस, ब्रैंड परफॉर्मेंस एनालिटिक्स और क्रिएटर इकोसिस्टम के लिए तकनीकी प्लेटफॉर्म तैयार करने का काम देखते हैं। साथ ही नोएडा में शुरू किए गए कंपनी के नए टेक हब का नेतृत्व भी कर रहे हैं, जहां प्रोडक्ट इंजीनियरिंग, AI, डेटा साइंस और प्लेटफॉर्म डेवलपमेंट पर काम हो रहा है।

अनूप कुमार YAAP के सीनियर पार्टनर और कंपनी की कोर लीडरशिप टीम के सदस्य हैं। वर्ष 2017 में कंपनी से जुड़ने के बाद उन्होंने YAAP को एक फुर्तीले कंटेंट स्टार्टअप से आगे बढ़ाकर भारत का पहला स्वतंत्र डिजिटल एजेंसी नेटवर्क बनाने में अहम भूमिका निभाई, जिसे NSE Emerge पर सूचीबद्ध किया गया। उन्होंने कंपनी की मीडिया, टेक्नोलॉजी और बिजनेस ग्रोथ रणनीतियों को आगे बढ़ाने के साथ-साथ पूरे नेटवर्क की क्षमताओं को एकजुट कर डेटा आधारित और बड़े स्तर पर काम करने वाली मार्केटिंग सेवाएं विकसित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

पिछले कुछ वर्षों में अनूप कुमार ने YAAP के विस्तार में भी बड़ी भूमिका निभाई। उन्होंने Oplifi, Crayons Communications और GOZOOP Group जैसी कंपनियों के अधिग्रहण को सफलतापूर्वक कंपनी के साथ जोड़ने में मदद की, जिससे भारत के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी YAAP की मौजूदगी मजबूत हुई। रचनात्मकता, तकनीक और डेटा को एक साथ जोड़ने की उनकी सोच ने YAAP को उन ब्रैंड्स का भरोसेमंद तकनीक आधारित इंटीग्रेटेड मार्केटिंग पार्टनर बनाया, जो अपने कारोबार के स्पष्ट और मापने योग्य नतीजे चाहते हैं।

सुधीर मेनन YAAP Digital के प्रमोटर और कंपनी के बोर्ड में नॉन-एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर हैं। वे कंपनी की रणनीतिक दिशा तय करने, बेहतर कॉरपोरेट गवर्नेंस और लंबे समय की कारोबारी योजना बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हालांकि वे कंपनी के रोजमर्रा के संचालन में सीधे तौर पर शामिल नहीं रहते।

सुबोध मेनन भी YAAP Digital के प्रमोटर और नॉन-एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर हैं। बोर्ड के सदस्य के रूप में वे कंपनी की गवर्नेंस, कारोबारी रणनीति और महत्वपूर्ण फैसलों में अपनी उद्योग विशेषज्ञता के जरिए योगदान देते हैं और कंपनी की दीर्घकालिक विकास यात्रा को दिशा देने में मदद करते हैं।

इस वर्ष की शुरुआत में YAAP ने GOZOOP का भी अधिग्रहण किया। GOZOOP के फाउंडर अहमद आफताब नकवी ने अपनी एजेंसी इसलिए बेची क्योंकि वे अधिग्रहण और निवेश पर अधिक ध्यान देना चाहते थे। साथ ही वे अतुल हेगड़े के साथ काम करते हुए उनसे सीखना भी चाहते थे। वे नई कंपनियों के अधिग्रहण और निवेश के अवसर तलाशने में सक्रिय रूप से जुड़े हुए थे और YAAP के लिए निवेश योग्य कंपनियों की पहचान भी कर रहे थे।

GOZOOP के को-फाउंडर रोहन भंसाली भी इस पूरी टीम का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

अतुल हेगड़े के निधन के बाद आयोजित प्रार्थना सभा में उनकी पत्नी शोनिमा मौजूद थीं, जिनसे उनकी मुलाकात एक विज्ञापन एजेंसी में काम करने के दौरान हुई थी। इस अवसर पर शोणिमा के पिता भी उपस्थित थे। विज्ञापन और मीडिया उद्योग में काम करने का अनुभव रखने वाली शोणिमा को अतुल की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए स्वाभाविक उत्तराधिकारी माना जाता है।

मैं स्वयं प्रार्थना सभा में शामिल नहीं हो सका, लेकिन मेरे मन में अतुल की यादें लगातार बनी रहीं। मुझे बताया गया कि उस सभा में शोणिमा के पिता ने घोषणा की कि अब शोणिमा, अतुल हेगड़े की भूमिका निभाते हुए YAAP का नेतृत्व संभालेंगी।

कंपनी की प्रमुख शेयरहोल्डर्स में शामिल शोणिमा ने एक सोच-समझकर फैसला लिया। उन्होंने कंपनी के संचालन की जिम्मेदारी सुधीर मेनन, सुबोध मेनन और मौजूदा नेतृत्व टीम को सौंपने का निर्णय किया, जो YAAP के सबसे बड़े शेयरहोल्डर्स में भी शामिल हैं। अतुल की कार्यकारी भूमिका को दोहराने की बजाय उन्होंने एक बड़े शेयरधारक, बोर्ड सदस्य और रणनीतिक लीडर के रूप में कंपनी के दीर्घकालिक विकास, बेहतर गवर्नेंस और रणनीतिक निर्णयों पर ध्यान देने का रास्ता चुना।

हालांकि इसके केवल तीन दिन बाद YAAP ने घोषणा की कि कंपनी के सलाहकार और अतुल हेगड़े के करीबी मित्र रहे राज नायक को कंपनी का चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर (CMD) नियुक्त किया गया है। इस नियुक्ति की घोषणा वाले प्रेस रिलीज़ में सुधीर मेनन का बयान भी शामिल था, जिसमें उन्होंने राज नायक को CMD बनाए जाने की जानकारी दी।

राज नायक ने अपनी सहज, संवेदनशील और विनम्र शैली में कहा कि कोई भी अतुल हेगड़े की जगह नहीं ले सकता। उन्होंने कहा कि वे केवल कंपनी की मौजूदा नेतृत्व टीम का सहयोग करने और उसे मजबूत बनाने के उद्देश्य से यह जिम्मेदारी स्वीकार कर रहे हैं।

अनूप कुमार YAAP के सीनियर पार्टनर और कंपनी की कोर लीडरशिप टीम के सदस्य हैं। वर्ष 2017 में कंपनी से जुड़ने के बाद उन्होंने YAAP को एक फुर्तीले कंटेंट स्टार्टअप से आगे बढ़ाकर भारत का पहला स्वतंत्र डिजिटल एजेंसी नेटवर्क बनाने में अहम भूमिका निभाई, जिसे NSE Emerge पर सूचीबद्ध किया गया। उन्होंने कंपनी की मीडिया, टेक्नोलॉजी और बिजनेस ग्रोथ रणनीतियों को आगे बढ़ाने के साथ-साथ पूरे नेटवर्क की क्षमताओं को एकजुट कर डेटा आधारित और बड़े स्तर पर काम करने वाली मार्केटिंग सेवाएं विकसित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

पिछले कुछ वर्षों में अनूप कुमार ने YAAP के विस्तार में भी बड़ी भूमिका निभाई। उन्होंने Oplifi, Crayons Communications और GOZOOP Group जैसी कंपनियों के अधिग्रहण को सफलतापूर्वक कंपनी के साथ जोड़ने में मदद की, जिससे भारत के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी YAAP की मौजूदगी मजबूत हुई। रचनात्मकता, तकनीक और डेटा को एक साथ जोड़ने की उनकी सोच ने YAAP को उन ब्रैंड्स का भरोसेमंद तकनीक आधारित इंटीग्रेटेड मार्केटिंग पार्टनर बनाया, जो अपने कारोबार के स्पष्ट और मापने योग्य नतीजे चाहते हैं।

सुधीर मेनन YAAP Digital के प्रमोटर और कंपनी के बोर्ड में नॉन-एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर हैं। वे कंपनी की रणनीतिक दिशा तय करने, बेहतर कॉरपोरेट गवर्नेंस और लंबे समय की कारोबारी योजना बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हालांकि वे कंपनी के रोजमर्रा के संचालन में सीधे तौर पर शामिल नहीं रहते।

सुबोध मेनन भी YAAP Digital के प्रमोटर और नॉन-एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर हैं। बोर्ड के सदस्य के रूप में वे कंपनी की गवर्नेंस, कारोबारी रणनीति और महत्वपूर्ण फैसलों में अपनी उद्योग विशेषज्ञता के जरिए योगदान देते हैं और कंपनी की दीर्घकालिक विकास यात्रा को दिशा देने में मदद करते हैं।

इस वर्ष की शुरुआत में YAAP ने GOZOOP का भी अधिग्रहण किया। GOZOOP के फाउंडर अहमद आफताब नकवी ने अपनी एजेंसी इसलिए बेची क्योंकि वे अधिग्रहण और निवेश पर अधिक ध्यान देना चाहते थे। साथ ही वे अतुल हेगड़े के साथ काम करते हुए उनसे सीखना भी चाहते थे। वे नई कंपनियों के अधिग्रहण और निवेश के अवसर तलाशने में सक्रिय रूप से जुड़े हुए थे और YAAP के लिए निवेश योग्य कंपनियों की पहचान भी कर रहे थे।

GOZOOP के को-फाउंडर रोहन भंसाली भी इस पूरी टीम का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

अतुल हेगड़े के निधन के बाद आयोजित प्रार्थना सभा में उनकी पत्नी शोनिमा मौजूद थीं, जिनसे उनकी मुलाकात एक विज्ञापन एजेंसी में काम करने के दौरान हुई थी। इस अवसर पर शोणिमा के पिता भी उपस्थित थे। विज्ञापन और मीडिया उद्योग में काम करने का अनुभव रखने वाली शोणिमा को अतुल की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए स्वाभाविक उत्तराधिकारी माना जाता है।

मैं स्वयं प्रार्थना सभा में शामिल नहीं हो सका, लेकिन मेरे मन में अतुल की यादें लगातार बनी रहीं। मुझे बताया गया कि उस सभा में शोणिमा के पिता ने घोषणा की कि अब शोणिमा, अतुल हेगड़े की भूमिका निभाते हुए YAAP का नेतृत्व संभालेंगी।

कंपनी की प्रमुख शेयरहोल्डर्स में शामिल शोणिमा ने एक सोच-समझकर फैसला लिया। उन्होंने कंपनी के संचालन की जिम्मेदारी सुधीर मेनन, सुबोध मेनन और मौजूदा नेतृत्व टीम को सौंपने का निर्णय किया, जो YAAP के सबसे बड़े शेयरहोल्डर्स में भी शामिल हैं। अतुल की कार्यकारी भूमिका को दोहराने की बजाय उन्होंने एक बड़े शेयरधारक, बोर्ड सदस्य और रणनीतिक लीडर के रूप में कंपनी के दीर्घकालिक विकास, बेहतर गवर्नेंस और रणनीतिक निर्णयों पर ध्यान देने का रास्ता चुना।

हालांकि इसके केवल तीन दिन बाद YAAP ने घोषणा की कि कंपनी के सलाहकार और अतुल हेगड़े के करीबी मित्र रहे राज नायक को कंपनी का चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर (CMD) नियुक्त किया गया है। इस नियुक्ति की घोषणा वाले प्रेस रिलीज़ में सुधीर मेनन का बयान भी शामिल था, जिसमें उन्होंने राज नायक को CMD बनाए जाने की जानकारी दी।

राज नायक ने अपनी सहज, संवेदनशील और विनम्र शैली में कहा कि कोई भी अतुल हेगड़े की जगह नहीं ले सकता। उन्होंने कहा कि वे केवल कंपनी की मौजूदा नेतृत्व टीम का सहयोग करने और उसे मजबूत बनाने के उद्देश्य से यह जिम्मेदारी स्वीकार कर रहे हैं।

जैसे ही हमने राज नायक की नियुक्ति की खबर प्रकाशित की, उद्योग जगत के कई वरिष्ठ लोगों के फोन आने लगे। कुछ लोगों ने सवाल किया कि क्या यह फैसला बहुत जल्दी नहीं लिया गया? आखिर इतनी जल्दबाजी की क्या जरूरत थी?

उस समय मैंने इस विषय पर सुधीर मेनन, राज नायक, मन्नन कपूर, शोणिमा या YAAP के किसी अन्य शेयरधारक और लीडर से कोई बातचीत नहीं की थी। फिर भी मैंने अपनी समझ के आधार पर लोगों को समझाने की कोशिश की कि राज नायक की नियुक्ति कंपनी के लिए सबसे सही फैसला है। इससे न केवल कंपनी को मजबूती मिलेगी बल्कि उद्योग और बाजार में भी सकारात्मक संदेश जाएगा।

कुछ लोगों का यह भी कहना था कि अब नेतृत्व किसी युवा व्यक्ति को मिलना चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या राज नायक इस जिम्मेदारी के लिए अधिक उम्र के नहीं हैं? उनका मानना था कि चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर की जिम्मेदारी मन्नन कपूर जैसे मौजूदा युवा लीडर्स को दी जानी चाहिए थी। ऐसे कई सवाल मुझसे पूछे गए, लेकिन उस समय मेरे पास इनका कोई स्पष्ट जवाब नहीं था क्योंकि मैंने इन पहलुओं पर उस दृष्टि से विचार नहीं किया था।

इन्हीं सवालों का जवाब देने के लिए मैं यह लेख लिख रहा हूं। मेरा मानना है कि राज नायक को YAAP का नेतृत्व सौंपना बिल्कुल सही फैसला है। सुधीर मेनन, शोणिमा, कंपनी के अन्य लीडर्स और सभी शेयरहोल्डर्स ने मिलकर कंपनी के हित में सबसे अच्छा निर्णय लिया है।

YAAP एक सूचीबद्ध कंपनी है और मेरा मानना है कि उसकी सबसे बड़ी सफलता अभी आना बाकी है। पिछले तिमाही में कंपनी का प्रदर्शन काफी मजबूत रहा था और उसके शेयरों की कीमत में भी बढ़ोतरी हुई थी। अतुल हेगड़े कंपनी को लेकर बेहद महत्वाकांक्षी योजनाएं बना रहे थे। उनसे हुई बातचीत के आधार पर मुझे उन योजनाओं की कुछ जानकारी भी थी।

ऐसे समय में YAAP के लिए सबसे जरूरी था कि वह अपने शेयरहोल्डर्स और बाजार को यह भरोसा दिलाए कि कंपनी की विकास यात्रा बिना किसी रुकावट के आगे बढ़ती रहेगी। राज नायक इस निरंतरता का सबसे मजबूत चेहरा हैं क्योंकि वे पिछले तीन वर्षों से अधिक समय से कंपनी के सलाहकार रहे हैं। वे अतुल हेगड़े और उनकी योजनाओं को बेहद करीब से जानते थे।

राज नायक कंपनी के युवा नेतृत्व के लिए भी पूरी तरह स्वीकार्य हैं। कंपनी के भीतर और पूरे उद्योग में उनका सम्मान है। वे चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर जरूर बने हैं, लेकिन कंपनी का रोजमर्रा का संचालन आज भी मौजूदा साझेदारों और नेतृत्व टीम के हाथों में है। इनमें मन्नन कपूर सबसे प्रमुख और सक्षम लीडर हैं, जिन्हें अतुल हेगड़े के बाद कंपनी का वास्तविक नंबर दो माना जाता रहा है।

राज नायक के इंडस्ट्री में मजबूत संबंध हैं और वे कंपनी के लिए नए कारोबार भी ला सकते हैं। उनका अनुभव कंपनी के सभी लीडर्स का मार्गदर्शन करने में बेहद उपयोगी साबित होगा।

राज नायक का कंपनी से जुड़ाव केवल पद या आर्थिक लाभ तक सीमित नहीं है। वे यह जिम्मेदारी अपने मित्र अतुल हेगड़े की याद और उनके सपनों को आगे बढ़ाने के लिए निभा रहे हैं।

समय आने पर मन्नन कपूर या कंपनी के अन्य युवा लीडर्स में से कोई भी यह जिम्मेदारी संभाल सकता है। वास्तव में कंपनी में ऐसे कम से कम तीन लीडर मौजूद हैं, जो भविष्य में नेतृत्व की भूमिका निभाने की क्षमता रखते हैं।

आज भारत में लोगों की औसत आयु लगातार बढ़ रही है। अब फाउंडर और चीफ एग्जिक्यूटिव ऑफिसर (CEO) भी 70 से 75 वर्ष की उम्र तक सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं।

राज नायक अभी साठ वर्ष की शुरुआती उम्र में हैं और इस पूरे डिजिटल इकोसिस्टम की गहरी समझ और अनुभव रखते हैं।

यह उन युवा फाउंडर्स के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश है, जो अपनी कंपनियों को शेयर बाजार में सूचीबद्ध कर चुके हैं और अक्सर मुझसे अनुभवी सलाहकारों या बिजनेस लीडर्स की सिफारिश करने के लिए कहते हैं। जब भी मैंने 54–55 वर्ष की उम्र वाले अनुभवी लोगों के नाम सुझाए, तो कई फाउंडर्स ने उन्हें केवल सलाहकार की भूमिका तक सीमित मान लिया, जबकि मेरी राय इससे अलग है। मेरा मानना है कि युवा फाउंडर्स के पास ऊर्जा, नई सोच और कंपनी को शुरू करने, बढ़ाने और सूचीबद्ध कराने की क्षमता होती है, लेकिन उन्हें ऐसी अनुभवी नेतृत्व टीम की भी जरूरत होती है जो मजबूत टीम तैयार करे, नए लीडर्स को विकसित करे और अपने अनुभव, परिपक्वता, समझ तथा संवेदनशीलता से कंपनी को सही दिशा दे सके।

राज नायक का YAAP का नेतृत्व संभालना इसी सोच का सबसे अच्छा उदाहरण है। उनकी नियुक्ति के बाद YAAP के शेयरों में तेजी आई और कंपनी का स्टॉक अपर सर्किट तक पहुंच गया। इससे साफ है कि बाजार ने राज नायक के नेतृत्व, अनुभव और क्षमता पर भरोसा जताया है। राज नायक में उद्यमशील सोच है और यही गुण अतुल हेगड़े के विजन को आगे बढ़ाने में मदद करेगा।

मुझे पूरा विश्वास है कि राज नायक भविष्य में मन्नन कपूर जैसे युवा लीडर्स का मार्गदर्शन करेंगे, उन्हें प्रशिक्षित करेंगे और कंपनी के अगले नेतृत्व को तैयार करेंगे।

इसके साथ ही वे अपने व्यापक उद्योग संबंधों का उपयोग करके YAAP के लिए नए अवसर और अधिक मूल्य भी पैदा करेंगे।

अगर YAAP लगातार अच्छा प्रदर्शन करता है तो इसका फायदा केवल कंपनी को ही नहीं, बल्कि उन सभी डिजिटल एजेंसियों को भी मिलेगा जो शेयर बाजार में सूचीबद्ध हैं या भविष्य में सूचीबद्ध होना चाहती हैं। YAAP की सफलता हम सभी की सफलता है और पूरे डिजिटल मार्केटिंग उद्योग की सफलता भी।

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IRS के बिना प्रिंट विज्ञापन की नई रणनीति : गणपति विश्वनाथन

पांच वर्षों से नई IRS रिपोर्ट नहीं आई है, लेकिन प्रिंट विज्ञापन उद्योग ने नए तरीके अपना लिए हैं। मीडिया एजेंसियां अब सर्कुलेशन, बाजार विश्लेषण के आधार पर मीडिया प्लान तैयार कर रही हैं।

Samachar4media Bureau by
Published - Wednesday, 15 July, 2026
Last Modified:
Wednesday, 15 July, 2026
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गणपति विश्वनाथन, कम्युनिकेशन कंसल्टेंट और लेखक।

भारतीय प्रिंट मीडिया उद्योग में इंडियन रीडरशिप सर्वे (IRS) लंबे समय तक विज्ञापन और मीडिया प्लानिंग का सबसे भरोसेमंद आधार रहा। विज्ञापनदाता इसी के आधार पर तय करते थे कि किस अखबार में निवेश करना है, मीडिया एजेंसियां अपनी योजनाएं बनाती थीं और समाचार पत्र अपने पाठक वर्ग की पहुंच साबित करते थे। लेकिन पिछले लगभग पांच वर्षों से नई IRS रिपोर्ट जारी नहीं हुई है। कार्यप्रणाली, फंडिंग और प्रशासनिक मुद्दों पर मतभेदों के कारण इसका संचालन लगातार टलता रहा है। इसके बावजूद प्रिंट विज्ञापन बाजार पूरी तरह नहीं रुका और उद्योग ने नई परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढाल लिया।

IRS के अभाव में अब मीडिया एजेंसियां किसी एक मानक पर निर्भर नहीं हैं। वे पुराने IRS आंकड़ों, ऑडिटेड सर्कुलेशन डेटा, प्रकाशकों के स्वयं के शोध, बाजार की जानकारी, पिछले विज्ञापन अभियानों के अनुभव और अपने विश्लेषण का मिश्रण तैयार करके मीडिया प्लान बनाती हैं। कई कंपनियां अपने सेल्स नेटवर्क और बाजार से मिलने वाले फीडबैक को भी निर्णय का आधार बनाती हैं। यानी अब मीडिया प्लानिंग किसी एक रिपोर्ट के बजाय कई स्रोतों की जानकारी पर आधारित हो गई है।

इसी दौरान बड़े समाचार पत्र समूहों ने अपनी फर्स्ट-पार्टी डेटा क्षमता को मजबूत किया है। सब्सक्रिप्शन डेटाबेस, वेबसाइट ट्रैफिक, मोबाइल ऐप, डिजिटल रीडरशिप और सीआरएम सिस्टम के जरिए वे अपने पाठकों के व्यवहार को पहले से बेहतर समझ पा रहे हैं। हालांकि विज्ञापनदाता इस डेटा को पूरी तरह स्वीकार करने से पहले किसी स्वतंत्र सत्यापन की अपेक्षा भी रखते हैं, क्योंकि यह जानकारी स्वयं प्रकाशकों द्वारा तैयार की जाती है।

सर्कुलेशन और रीडरशिप दोनों अलग-अलग बातें हैं। ऑडिटेड सर्कुलेशन यह बताता है कि कितनी प्रतियां छपी और वितरित हुईं, लेकिन इससे यह पता नहीं चलता कि वास्तव में उन्हें कितने लोगों ने पढ़ा और वे किस वर्ग के पाठक थे। यही कारण है कि प्रीमियम, युवा या विशेष उपभोक्ता वर्ग को लक्षित करने वाले ब्रांडों के लिए केवल सर्कुलेशन पर्याप्त नहीं माना जाता।

IRS के अभाव का सबसे अधिक असर छोटे और क्षेत्रीय प्रकाशकों पर पड़ा है। बड़े मीडिया समूह अपनी मजबूत ब्रांड पहचान, विज्ञापनदाताओं से पुराने संबंध और बेहतर डेटा एनालिटिक्स के कारण बाजार में टिके हुए हैं। इसके विपरीत छोटे प्रकाशकों के लिए राष्ट्रीय विज्ञापनदाताओं के सामने अपने पाठक वर्ग की विश्वसनीयता साबित करना कठिन हो गया है। इससे बड़े और छोटे प्रकाशकों के बीच प्रतिस्पर्धा का अंतर और बढ़ने की आशंका है।

डिजिटल विज्ञापन के बढ़ते प्रभाव ने भी मीडिया प्लानिंग का तरीका बदल दिया है। अब विज्ञापनदाता केवल रीडरशिप नहीं, बल्कि अभियान के वास्तविक परिणाम, उपभोक्ता सहभागिता, क्रॉस-प्लेटफॉर्म पहुंच और निवेश पर मिलने वाले लाभ को भी महत्व देते हैं। इसलिए एजेंसियां अब ऐतिहासिक IRS डेटा, सर्कुलेशन, प्रकाशकों के आंकड़ों और अपने अनुभव को मिलाकर निर्णय ले रही हैं।

उद्योग आज भी एक स्वतंत्र और विश्वसनीय रीडरशिप सर्वे की आवश्यकता महसूस करता है, लेकिन भविष्य का IRS केवल पुराने मॉडल की वापसी नहीं होना चाहिए। नई व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जो प्रिंट के साथ डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी उपभोक्ताओं की मीडिया खपत, सहभागिता और व्यवहार को माप सके। आज का विज्ञापन बाजार केवल पाठक संख्या नहीं, बल्कि वास्तविक व्यावसायिक प्रभाव और भरोसेमंद डेटा चाहता है। इसलिए IRS की वापसी तभी सार्थक होगी, जब वह बदलते मीडिया परिदृश्य और आधुनिक विज्ञापन जरूरतों के अनुरूप खुद को विकसित कर सके।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )

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क्या FIFA बना सकता है ZEE को भारत का अगला बड़ा स्पोर्ट्स ब्रैंड?

फीफा वर्ल्ड कप 2026 अपने अंतिम दौर में पहुंच चुका है। ऐसे में मीडिया इंडस्ट्री में एक बार फिर टीवी रेटिंग, डिजिटल रीच, सब्सक्रिप्शन ग्रोथ और विज्ञापन से होने वाली कमाई को लेकर चर्चा तेज होना तय है।

Samachar4media Bureau by
Published - Tuesday, 14 July, 2026
Last Modified:
Tuesday, 14 July, 2026
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मोहित मेहरा, फाउंडर, MCode वेंचर्स ।।

फीफा वर्ल्ड कप 2026 अपने अंतिम दौर में पहुंच चुका है। ऐसे में मीडिया इंडस्ट्री में एक बार फिर टीवी रेटिंग, डिजिटल रीच, सब्सक्रिप्शन ग्रोथ और विज्ञापन से होने वाली कमाई को लेकर चर्चा तेज होना तय है।

बेशक, ये सभी किसी भी बड़े स्पोर्ट्स इवेंट की सफलता के अहम पैमाने हैं। लेकिन इन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या कोई वैश्विक खेल आयोजन किसी ब्रॉडकास्टर के लिए एक मजबूत और लंबे समय तक चलने वाला ब्रैंड भी बना सकता है? 

इतिहास बताता है कि इसका जवाब 'हां' है। 

पिछले 25 वर्षों में भारत में जिस भी ब्रॉडकास्टर ने फीफा वर्ल्ड कप के प्रसारण अधिकार हासिल किए, उसने इस टूर्नामेंट का इस्तेमाल अपने स्पोर्ट्स ब्रैंड को स्थापित करने, मजबूत करने या नई पहचान देने के लिए किया।

2002 में Ten Sports ने खुद को एक मजबूत चुनौती देने वाले स्पोर्ट्स चैनल के रूप में स्थापित किया। 2006 और 2010 के वर्ल्ड कप के जरिए ESPN Star Sports ने अपनी बादशाहत और मजबूत की। 2014 और 2018 में Sony Pictures Networks ने Sony SIX को अंतरराष्ट्रीय खेलों के प्रमुख चैनल के रूप में स्थापित किया। वहीं 2022 में Viacom18 ने फीफा वर्ल्ड कप का इस्तेमाल Sports18 को तेजी से आगे बढ़ाने और JioCinema के जरिए डिजिटल स्पोर्ट्स देखने के तरीके को बदलने के लिए किया।

दिलचस्प बात यह है कि सभी ब्रॉडकास्टर्स के पास एक ही टूर्नामेंट था, लेकिन हर किसी की रणनीति अलग थी। इन सभी की सफलता की असली वजह सिर्फ फुटबॉल नहीं थी। असल वजह थी मजबूत ब्रैंड बनाने की रणनीति।

अब जब अगले फीफा वर्ल्ड कप चक्र के अधिकार Zee के पास हैं, तो उसके सामने सिर्फ शानदार कवरेज देने की चुनौती नहीं है। उसके सामने भारत का अगला बड़ा स्पोर्ट्स ब्रॉडकास्टिंग ब्रैंड तैयार करने का मौका भी है।

सिर्फ अधिकार नहीं, सही रणनीति भी जरूरी

मीडिया अधिकार किसी भी टूर्नामेंट पर लोगों का ध्यान जरूर खींचते हैं। लेकिन किसी ब्रैंड की असली पहचान मजबूत रणनीति से बनती है।

2002 फीफा वर्ल्ड कप के दौरान सबसे बड़ी सीख यह मिली थी कि सिर्फ टीवी प्रमोशन के भरोसे दर्शकों का जुड़ाव नहीं बनाया जा सकता। उस समय मार्केटिंग बजट सीमित था और अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल को लेकर लोगों में जागरूकता भी कम थी।

ऐसे में Ten Sports ने अलग सोच अपनाई। उन्होंने खुद से सवाल किया कि अगर मार्केटिंग बजट बढ़ाया नहीं जा सकता तो क्या साझेदारियों के जरिए उसका असर बढ़ाया जा सकता है?

इसी सोच के तहत पब, क्लब, रेस्तरां और शॉपिंग मॉल को सिर्फ विज्ञापन की जगह नहीं, बल्कि रणनीतिक साझेदार बनाया गया। ऐसा मॉडल तैयार किया गया जिसमें सभी की व्यावसायिक हिस्सेदारी जुड़ी हो और सभी टूर्नामेंट की सफलता में भागीदार बनें।

भारत में शायद पहली बार आउटडोर मैच देखने के अनुभव को स्पोर्ट्स मार्केटिंग का हिस्सा बनाया गया। फुटबॉल अब सिर्फ घर पर बैठकर देखने का खेल नहीं रहा। यह लोगों के साथ मिलकर अनुभव करने वाला आयोजन बन गया।

फीफा वर्ल्ड कप फाइनल को सिनेमाघरों तक ले जाया गया। बड़े वीडियो वॉल लगाकर शॉपिंग मॉल को फैन जोन बनाया गया। पब और क्लब मैच देखने के प्रमुख स्थान बन गए। आज जिस 'फैन पार्क' की चर्चा होती है, उस समय उसी तरह के प्रयोग शुरू हो चुके थे। 

इसका सबसे बड़ा फायदा व्यावसायिक रूप से मिला। मीडिया खरीदने की बजाय साझेदारियां बनाकर मार्केटिंग बजट का असर कई गुना बढ़ गया। होटल और रेस्तरां में भीड़ बढ़ी, रिटेल पार्टनर्स को ग्राहक मिले और दर्शकों को यादगार अनुभव मिला। यानी सभी को फायदा हुआ।

सबसे सफल मार्केटिंग वही होती है, जिसमें खर्च अकेले न उठाना पड़े।

स्क्रीन से बाहर भी बनता है ब्रॉडकास्ट ब्रैंड

Ten Sports की सोच सिर्फ मैच दिखाने तक सीमित नहीं थी। उसका उद्देश्य था कि दर्शक अपने साथ ब्रैंड की कोई याद भी लेकर जाएं। इसी सोच के तहत ब्रैंडेड टी-शर्ट, घड़ियां, फुटबॉल और अन्य मर्चेंडाइज तैयार किए गए। इन उत्पादों ने दर्शकों को ब्रैंड का एंबेसडर बना दिया।

आज लगभग हर बड़े स्पोर्ट्स इवेंट में मर्चेंडाइज आम बात है। लेकिन उस दौर में यह सोच बिल्कुल नई थी। 

संदेश साफ था कि ब्रॉडकास्ट ब्रैंड सिर्फ टीवी स्क्रीन तक सीमित नहीं होना चाहिए। उसे वहां भी मौजूद होना चाहिए, जहां उसके दर्शक हों। लोग विज्ञापन भूल सकते हैं। लेकिन अच्छे अनुभव और उनसे जुड़ा ब्रैंड लंबे समय तक याद रहता है।

Zee के पास नया इतिहास लिखने का मौका

भारत में फीफा वर्ल्ड कप के हर प्रसारणकर्ता ने अपनी अलग रणनीति छोड़ी है। अब Zee के पास अगला अध्याय लिखने का अवसर है। लेकिन यह रणनीति सिर्फ विज्ञापन और सब्सक्रिप्शन तक सीमित नहीं रह सकती। स्पोर्ट्स ब्रॉडकास्टिंग का अगला दौर अनुभव आधारित कमाई पर आधारित होगा।

कल्पना कीजिए कि वर्ल्ड कप के दौरान होटल और हॉस्पिटैलिटी कंपनियां सिर्फ प्रायोजक नहीं बल्कि वितरण साझेदार बनें। शॉपिंग मॉल फैन डेस्टिनेशन बनें। ब्रैंड्स इमर्सिव व्यूइंग एक्सपीरियंस तैयार करें। मर्चेंडाइज सीधे कारोबार का हिस्सा बने। फैन फेस्टिवल हर साल आयोजित होने वाली संपत्ति बन जाएं। रिटेल कंपनियां, कंटेंट क्रिएटर्स, गेमिंग प्लेटफॉर्म, ट्रैवल कंपनियां और टेक्नोलॉजी पार्टनर्स मिलकर एक ऐसा इकोसिस्टम तैयार करें जो मैच प्रसारण से कहीं ज्यादा मूल्य पैदा करे।

अब सवाल यह नहीं होना चाहिए कि प्रसारण से कमाई कैसे बढ़ाई जाए। सवाल यह होना चाहिए कि फैन एक्सपीरियंस से कमाई कैसे बढ़ाई जाए। यही सोच भारत में स्पोर्ट्स ब्रॉडकास्टिंग की अर्थव्यवस्था बदल सकती है।

2030 तक पूरी तरह बदल जाएगी स्पोर्ट्स ब्रॉडकास्टिंग

इस दशक के अंत तक स्पोर्ट्स ब्रॉडकास्टिंग आज से बिल्कुल अलग दिखाई देगी। सिर्फ सबसे ज्यादा प्रसारण अधिकार रखने वाला ब्रॉडकास्टर सफल नहीं होगा। सफल वही होगा जो सबसे मजबूत फैन इकोसिस्टम तैयार करेगा।

मैच का प्रसारण सिर्फ एक हिस्सा होगा। पूरा अनुभव उससे कहीं बड़ा होगा।

कल्पना कीजिए कि कोई दर्शक किसी कंटेंट क्रिएटर के वीडियो से मैच के बारे में जाने, दोस्तों के साथ प्रीमियम व्यूइंग इवेंट बुक करे, वहीं से आधिकारिक मर्चेंडाइज खरीदे, मैच के दौरान प्रिडिक्टिव गेमिंग खेले, स्पॉन्सर्स से लॉयल्टी रिवॉर्ड पाए और भविष्य के स्पोर्ट्स इवेंट्स के लिए व्यक्तिगत ऑफर भी हासिल करे।

यह भविष्य बहुत दूर नहीं है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस दर्शकों के अनुभव को व्यक्तिगत बनाएगा। कॉमर्स सीधे प्रसारण का हिस्सा बन जाएगा। स्पॉन्सरशिप की सफलता सिर्फ इम्प्रेशन से नहीं बल्कि बिक्री और ग्राहकों के लंबे संबंधों से मापी जाएगी।

डेटा की मदद से ब्रॉडकास्टर्स, ब्रैंड्स और दर्शकों के बीच रिश्ते और मजबूत होंगे। भविष्य में सिर्फ दर्शकों की संख्या नहीं, बल्कि मजबूत कम्युनिटी ज्यादा अहम होगी। सबसे सफल स्पोर्ट्स ब्रैंड अपने दर्शकों को सिर्फ व्युअर नहीं बल्कि सदस्य मानेंगे। इससे ब्रॉडकास्टर्स के लिए कमाई के नए रास्ते खुलेंगे।

विज्ञापन के साथ-साथ कॉमर्स, लाइसेंसिंग, हॉस्पिटैलिटी, प्रीमियम मेंबरशिप, गेमिंग, फैन कम्युनिटी, एक्सपीरिएंशियल इवेंट्स और डेटा आधारित स्पॉन्सरशिप भी राजस्व का बड़ा स्रोत बनेंगे।

अब सबसे बड़ा सवाल यह नहीं रहेगा कि रेटिंग कैसे बढ़ाई जाए। असल सवाल होगा कि हर फैन की लाइफटाइम वैल्यू कैसे बढ़ाई जाए। जो ब्रॉडकास्टर इसका जवाब ढूंढ़ लेगा, वही अगले दशक की स्पोर्ट्स मीडिया इंडस्ट्री की दिशा तय करेगा।

सिर्फ फुटबॉल नहीं, हर खेल पर लागू होती है यह सोच

यह सोच सिर्फ फीफा वर्ल्ड कप तक सीमित नहीं है। चाहे आईपीएल हो, इंडियन सुपर लीग, प्रो कबड्डी लीग, अल्टीमेट टेबल टेनिस, बैडमिंटन, मोटरस्पोर्ट्स या कोई नया फ्रेंचाइजी टूर्नामेंट- सभी के सामने चुनौती एक जैसी है।

अब सिर्फ मीडिया अधिकार और स्पॉन्सरशिप से सफलता तय नहीं होगी। भविष्य उनका होगा जो ऐसा इकोसिस्टम बनाएंगे जिसमें ब्रॉडकास्टर्स, ब्रैंड्स, वेन्यू, रिटेल कंपनियां, टेक्नोलॉजी पार्टनर्स, कंटेंट क्रिएटर्स और फैंस सभी मिलकर मूल्य तैयार करें।

अगले दशक में भारतीय खेलों की दिशा यह तय नहीं करेगी कि अधिकार किसके पास हैं, बल्कि यह तय करेगा कि कौन अपने दर्शकों के लिए सबसे बेहतर और यादगार अनुभव तैयार करता है। इसके लिए उपभोक्ताओं की समझ, व्यावसायिक सोच और बेहतरीन क्रियान्वयन- तीनों की जरूरत होगी।

MCode Ventures का भी मानना है कि स्पोर्ट्स मार्केटिंग का भविष्य इसी दिशा में है। कंपनी अधिकार धारकों, ब्रॉडकास्टर्स, लीग्स और ब्रैंड्स के साथ मिलकर ऐसे अवसर तलाशने पर काम करती है जो सिर्फ प्रसारण तक सीमित न हों, बल्कि उपभोक्ता व्यवहार, मीडिया इनोवेशन, साझेदारियों और व्यावसायिक रणनीति को जोड़कर लंबे समय तक टिकाऊ मूल्य तैयार करें।

क्योंकि खेलों की दुनिया में सबसे बड़ा अवसर सिर्फ प्रसारण अधिकार हासिल करना नहीं है, बल्कि उनके आसपास एक मजबूत इकोसिस्टम तैयार करना है। शायद यही वह सबसे बड़ी सीख है, जो पिछले 25 वर्षों में फीफा वर्ल्ड कप ने भारत के मीडिया और स्पोर्ट्स इंडस्ट्री को दी है।

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E 20 पेट्रोल सस्ता क्यों नहीं? पढ़िए इस सप्ताह का 'हिसाब किताब'

सरकार कहती है कि क्रूड ऑयल का दाम प्रति बैरल $70 से नीचे रहेगा तो Ethanol पेट्रोल से महंगा होगा लेकिन $120-130 की रेंज में रहेगा तो Ethanol सस्ता पड़ता है।

Samachar4media Bureau by
Published - Monday, 13 July, 2026
Last Modified:
Monday, 13 July, 2026
milindkhandekar

मिलिंद खांडेकर, वरिष्ठ पत्रकार।

पिछले हफ़्ते मैंने E20 का हिसाब-किताब किया था, तो बहुत सारे लोगों ने सवाल किया कि 20% एथेनॉल (Ethanol) मिला पेट्रोल (E20) सस्ता क्यों नहीं मिल रहा है? आख़िर इसमें 20% पेट्रोल कम है। पिछले हफ़्ते भर में सरकार ने दो बार इस सवाल का जवाब दिया है। जवाब का सार यह है कि E20 पेट्रोल आज की कीमतों पर सामान्य पेट्रोल से महंगा पड़ रहा है।

एथेनॉल को मक्का, गन्ने और खराब चावल से बनाया जाता है। इसका दाम ₹58 से लेकर ₹72 प्रति लीटर है। सरकार ने कहा कि 2021 में एथेनॉल को लेकर नीति आयोग ने रिपोर्ट बनाई थी। उस समय पेट्रोल की तुलना में एथेनॉल सस्ता था, लेकिन अब इसके दाम बढ़ चुके हैं। ये दाम भी सरकार ने ही बढ़ाए हैं, ताकि एथेनॉल का उत्पादन बढ़ाया जा सके और किसानों की आय में वृद्धि हो।

सरकार का कहना है कि यदि क्रूड ऑयल का दाम प्रति बैरल 70 डॉलर से नीचे रहेगा, तो एथेनॉल पेट्रोल से महंगा पड़ेगा। लेकिन यदि इसकी कीमत 120-130 डॉलर प्रति बैरल की रेंज में रहती है, तो एथेनॉल सस्ता साबित होता है, जैसा अमेरिका-ईरान युद्ध के दौरान देखने को मिला।

दुनिया में संकट की स्थिति होने पर एथेनॉल फायदे का सौदा बन जाता है, लेकिन संकट हमेशा नहीं रहता। 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण क्रूड ऑयल महंगा हुआ था और अब ईरान के कारण कीमतों में उतार-चढ़ाव देखने को मिला। सरकार चाहे जितना गणित पेश करे, लेकिन मौजूदा कीमतों के हिसाब से एथेनॉल मिलाने से पेट्रोल महंगा ही पड़ रहा है।

एक बार के लिए मान लेते हैं कि E20 पेट्रोल देशहित में है। इससे क्रूड ऑयल की खपत कम होगी, विदेशी मुद्रा की बचत होगी, ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) मजबूत होगी, 20% कम पेट्रोल खर्च होने से प्रदूषण घटेगा और किसानों की आय भी बढ़ेगी। लेकिन सवाल यह है कि ग्राहकों को इससे क्या फायदा होगा?

सरकार ने E20 लागू करने के लिए नीति आयोग की 2021 की रिपोर्ट को आधार बनाया है। उसी रिपोर्ट में यह भी सिफारिश की गई थी कि E20 पेट्रोल पर सरकार को टैक्स में छूट देनी चाहिए, क्योंकि इसका माइलेज कम होता है। ऐसा लगता है कि सरकार इस महत्वपूर्ण सिफारिश को भूल गई है।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )

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