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इस दौर में बोलना और न बोलना ‘विक्रम बेताल’ की कहानी सा: आलोक श्रीवास्तव

आज के दौर में बोलना जितना ज़रूरी होता जा रहा है, उससे कहीं अधिक ज़रूरी यह हो गया है कि कहाँ बोलना है और कितना बोलना है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 2 years ago

आलोक श्रीवास्तव, लेखक व कवि।

सोशल मीडिया पर अक्सर आपको ऐसे लोग मिल जाएंगे जो बाजी उलटती देख फौरन कहेंगे, 'चलिए भाई जो हुआ जाने दें, कोई बात दिल में न रखें! ' दिलचस्प सत्य यह है कि इनमें से अधिकांश आपके जानने वाले होंगे। जो अपने किसी न किसी पूर्वाग्रह या ‘सिलेक्टिव’ रीजन के रहते आपसे भिड़ गए होंगे। ऐसे लोग खुद को गलत साबित होता देख तुरंत इनबॉक्स में आ जाते हैं, या कभी-कभी तो कमेंट में ही लिख देते है,'चलिए भाई जो हुआ जाने दें, कोई बात दिल में न रखें ! '

पिछले दिनों मुझे ऐसे कई महानुभाव दिखे, जो हर उस तथ्य या सत्य से जबरन भिड़ गए जिससे उनका ‘पॉलिटिकल एजेंडा’ सेट नही होता। ऐसे लोग सही कहने वालों को भी, न जाने क्या क्या बोल और सुना जाते हैं। आप, हिंदू धर्म ध्वजा वाहकों के ‘मन की बात’ न कीजिए तो वे आपको मुस्लिमों का एजेंट बता देंगे। मुस्लिमों की किसी गलती की तरफ जरा सा इशारा भर कर दीजिए तो वे आपका पूरा तहजीबी सफर दरकिनार कर, फौरन आपको संघी या फिरकापरस्त बता देंगे। यानी बस वह कहिए जो यह सुनना चाहते हैं।

वैसे यहां मुझे अपने एक प्रिय और बड़े अदीब की कही बात याद आती है जो तसल्ली देती है, वे कहते हैं, 'जब दोनों तरफ के लोग आपको गाली देने लगें तो समझ लीजिए कि आप सही रास्ते पर हैं।' लेकिन, अपने पूर्वाग्रह के साथ आपसे उलझने और आपको तमगा देने वाले इन स्वयंभू मठाधीशों को जब ‘कभी कभार’ आपकी कोई बात समझ में आ जाती है तो बजाए अपनी गलती मानने के, फौरन अपने जुमले पर आ जाते हैं 'चलिए भाई जो हुआ जाने दें, कोई बात दिल में न रखें। '

अरे भाई, जब आप किसी को जानते-समझते हुए, उसकी पूरी शख्सियत तार-तार कर रहे थे, यह बात तो तब सोचना चाहिए था कि ‘उसके दिल पर क्या बीतेगी ?’ बिना जाने-समझे आप उस पर टूट पड़े और बाजी पलटती दिखी तो अपना कथित बड़प्पन सामने लाकर सामने रख दिया 'चलिए भाई जो हुआ जाने दीजिए, कोई बात दिल में न रखिएगा', जैसे सच और सही बोलने वालों का दिल, दिल न हुआ आपकी सियासत का जनवासा हो गया? जहां आप अपनी छोटी-सोच की बड़ी-सी बारात लेकर आए, ठहरे, खाया-पीना और फैलाया फिर यह कहते हुए निकल गए कि 'देख लेना भाई, बहुत गंद फैला कर जा रहे हैं, साफ-सफाई कर लेना और हां, कोई बात दिल में न रखना !'

दरअसल, यह सारा मामला हमारे बीच पनपे असीम अविश्वास का है। हम लोग भरोसे की दरकती हुई दीवार के नीचे खड़े हैं। हम एक अधैर्य स्वभाव के शिकार हो चुके हैं, जिसमें व्यक्ति या उसकी बात को पूरी तरह समझे और जाने बिना, हमने तुरंत प्रतिक्रिया देने की अपनी एक आदत बना ली है, जो बहुत हद तक खतरनाक है। वे लोग बहुत सही और सुखी होते हैं जो किसी बात पर कुछ न कहने का तंज सह लेते हैं, परंतु अपनी प्रतिक्रिया देने में बिलकुल हड़बड़ी नहीं करते। वे पहले पूरे प्रकरण की तह तक जाते हैं। किसने क्या कहा है, किन हालात में कहा है, कहने वाले का रिकॉर्ड क्या है, वह किस मानसिकता का है, उसका बैकग्राउंड क्या है, इतना सब जानने के बाद भी, वे फिर सोचते हैं कि क्या उनका इस विषय पर कुछ भी कहना सही होगा या नहीं?

आज के दौर में बोलना जितना जरूरी होता जा रहा है, उससे कहीं अधिक जरूरी यह हो गया है कि कहां बोलना है और कितना बोलना है। दरअसल, इस दौर में बोलना और न बोलना ‘विक्रम बेताल’ की कहानी सा हो गया है। यह कहानी कहां खत्म होगी, पता नहीं! कितनों के सिर फोड़ेगी और कितने रिश्ते तोड़ेगी, कुछ नहीं कहा जा सकता।

कुछ लोगों को शायद यह बात भी अब, कोरी जज्बाती या बचकानी लगे कि ‘भैया एक दूसरे पर विश्वास करना सीखो। ' यहां हर शख्स का कोई पॉलिटिकल एजेंडा हो यह जरूरी नहीं है। कुछ लोग अब भी मुहब्बतों के एजेंडे पर काम कर रहे हैं और वे भारतीयता व मानवता के पक्षधर हैं। उन्हें दलों, खेमों या धर्मों में बांट कर मत देखो। जब हर तरफ मुहब्बतों के चराग, नफरतें बुझा रही हों, ऐसे समय में उन जुगनुओं की हिफाजत कर लो जो थोड़ी ही सही, रौशनी की अलामत हैं।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)


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