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‘मुझे उस दिन लगा कि किताबों के जाने के साथ ही अतुल की आत्मा भी चली गई है’

जानलेवा बीमारी कैंसर से हुआ है वरिष्ठ पत्रकार अतुल लागू का निधन

राजेश बादल 6 years ago

ओह…बहुत तकलीफदेह। सारा दिन हिम्मत न जुटा सका। कभी तुम्हें इस तरह याद करना पड़ेगा, सोचा न था। महीना भर भी नहीं हुआ, जब तुमने अपनी कान्हा किसली की स्मृतियां साझा की थीं। क्या मालूम था कि कान्हा से जिस पीठ दर्द को लेकर लौटे हो, वह तुम्हें हमेशा के लिए हमसे छीन ले जाएगा। हमने समझा कि लगातार कार में बैठे-बैठे मांसपेशियों में खिंचाव हो गया होगा, इसीलिए तुम्हें सलाह दी थी कि डिस्प्रिन लेकर सो जाओ। क्या पता था कि तुम उससे ऐसी मनहूस नींद में चले जाओगे। परसों ही भाभी ने फ़ोन पर सब बताया। दिल धक्क से रह गया। पंद्रह दिन पहले कैंसर का पता चला, वह भी अंतिम चरण का। भाभी ने फोन तुम्हारे कान के पास ले जाकर कहा, दिल्ली से राजेश। जब तुम चाहकर भी न बोल पाए तो लगा, सब कुछ खत्म हो गया। मैंने 31 जुलाई का टिकट कराया था। कम से कम जी भरकर तुम्हें और तुम मुझे देख लो। पर तब तक भी तुमने इंतजार नहीं किया दोस्त! ऐसे भी कोई जाता है क्या?

कहां से याद करूं। सन् अस्सी में एक देहाती पत्रकार इंदौर जैसे महानगर में आता है। कोई दोस्त नहीं, कोई परिचित नहीं, अकेला सड़कों पर पैदल भटकता रहता था। अपने शहर से जगदीश तिवारी जी से इंदौर के जेल रोड पर लाल रेडियो के ठिए का संदर्भ लेकर आया था। उसी ठिकाने पर तुमसे पहली मुलाकात हुई। हमारी दोस्ती के सिलसिले की शुरुआत। तुम इंदौर ही नहीं, समूचे मालवा में पुस्तक आंदोलन के गुरु थे। तुम्हारा प्रगति पुस्तक केंद्र शहर के तमाम पढ़ने-लिखने वालों, रंगकर्मियों, पत्रकारों और साहित्यकारों का ठिकाना। शिखर संपादक राजेंद्र माथुर से लेकर एकदम नए लड़के राजेश बादल तक। तुम्हारी आंखों में सबके लिए एक समान भाव। हर नई किताब पर घंटों चर्चा। हर राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मुद्दे पर सारे सारे दिन बहसें।

पुस्तक पढ़ने का सलीका तुमने इंदौर को दिया। मुझे याद है-एक पुस्तक प्रदर्शनी लगी थी। तुम काउंटर पर बैठे थे। किताबें खरीदकर ले जाने वाले लोग भुगतान करते। तुम सबको रसीद देते। जिसके पास पैसे कम होते या नहीं भी होते तो तुम मुस्कुरा कर कहते, 'कोई बात नहीं। इस बार मेरी तरफ़ से ले जाओ। अगली बार देखेंगे। ऐसा भी कहीं होता है?  मैंने तो नहीं देखा। एक दिन क्या दुर्लभ संयोग हुआ था। तुम ऐसे ही पुस्तक मेले में काउंटर पर बैठे थे। तुम्हें वाशरूम जाना था। कोई साथी नहीं था। तुम्हारी बेचैनी हिन्दुस्तान के इस सदी के दिग्गज संपादक राजेंद्र माथुर ने ताड़ ली। उन्होंने तुमसे कहा, जाओ। होकर आओ। मैं तुम्हारा काउंटर संभालता हूं। तुम चले गए। जब तक लौटे, राजेंद्र माथुर तुम्हारा काउंटर संभालते रहे। ऐसा बड़प्पन कहीं देखा है? तुम्हारे जैसे दोस्त का ही असर था।

इंदौर में हमारी मुलाकातें मेरे अखबार के दफ्तर में होतीं। तुम स्पोर्ट्स पर भी लिखते थे। रंगकर्म पर भी लिखते थे और क्या लिखते थे भाई। अदभुत। याद है, हमने शाहिद मिर्जा, अवधेश व्यास, साधना जोशी, आदिल कुरैशी और अन्य दोस्तों के साथ मिलकर रंगशाला बनाई थी। कई नाटक खेले थे। दुलारीबाई, थेंक्यू मिस्टर ग्लाड, एक था गधा, आषाढ़ का एक दिन, घासीराम कोतवाल वगैरह-वगैरह। तुम्हारे कितने रूप थे अतुल। चौंतीस बरस पहले मैंने इंदौर छोड़ा, लेकिन हमारे रिश्तों में वही गरमाहट बनी रही। कभी प्रेस क्लब के कार्यक्रमों में तो कभी निजी यात्राओं के दरम्यान एक शाम तुम्हारे और सुबोध के लिए सुरक्षित रहती थी। आमतौर पर तुम वक्त पर घर लौट जाया करते थे। मगर जिस दिन मैं होता था तो आधी रात तक भी तुम बेफिक्री से मेरे साथ रहते थे। मैं पूछता भी, 'भाभी इंतजार तो नहीं कर रही होंगी? तुम मुस्कुराकर कहते, ‘उसे मालूम है कि तू आया है। अब कौन है, जो हक से मुझे तू कहेगा?’

पिछले साल आठ अप्रैल को मेरे हाथ की दो उंगलियाँ कट गई थीं। कटे हाथ को लेकर मैं इंदौर चला आया था। प्रवीण खारीवाल, आरके जैन और तुमने जो देखभाल की, कैसे भूलूंगा अतुल?  मुझसे तो कपड़े भी नहीं पहने जा रहे थे। तुमने सहायता की थी। नौ अप्रैल को राजेंद्र माथुर की पुण्यतिथि का कार्यक्रम संपन्न हुआ तो ड्रेसिंग के कारण मैं न प्लेट पकड़ सकता था और न चम्मच ले सकता था। दोस्त! तुमने चम्मच से खिलाया था। उसी दिन मैंने कहा था, अतुल, ऑटोबायोग्राफी लिख यार! बड़ा ड्रामा है तेरी ज़िंदगी में। अतुल मुस्कुराकर रह गया। बीते दिनों उसने प्रगति प्रकाशन की किताबें सब बांट दीं। इंदौर के पुस्तक आंदोलन का एक बड़ा ठिकाना बंद हो चुका था। मैंने पूछा, 'अतुल! ऐसा क्यों किया यार। तुम एक फीकी हंसी हंसे थे। सच कहूं। उस दिन मैं तुम्हारा चेहरा देखकर डर गया था। अंदर ही अंदर किसी अज्ञात आशंका से मैं सिहर गया था। मुझे उस दिन लगा कि किताबों के जाने के साथ ही अतुल की आत्मा भी चली गई है। उस रात लिपटकर जब तुम्हारा रोना देखा तो मैं रात भर सो न सका था। हां, तुम शायद कुछ हल्के हो गए थे। बच्चों और भाभी की चिंता तुम्हारा हाल के दिनों में जैसे स्थाई भाव बन गया था। कभी-कभी तो घबराहट होने लगती थी।

अतुल! तुम चले तो गए, लेकिन क्या समझते हो तुम खुद को हमसे छीन लोगे? कभी नहीं। मेरे साथ वह अतुल लागू हमेशा रहेगा, जो रात देर सड़कों पर दुपहिया वाहनों से आवारागर्दी करता था, सराफे में गराड़ू खाता था। रात दो बजे राजबाड़ा पर ऊसल पोहे के मजे लेता था। शाहिद मिर्जा की लेटलतीफ़ी पर बच्चों सा झगड़ता था। दिल आ जाए तो किताबों के ढेर उपहार में दे देता था। उस अतुल को कैसे छीनोगे मेरे दोस्त! जाओ। फिर भी जहां रहो, खुश रहना मेरे दोस्त। हम तो जैसे भी होगा-जी लेंगे। अलविदा अतुल।

(वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की फेसबुक वॉल से)

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