बहुत याद आएंगे वरिष्ठ पत्रकार राधेश्याम शर्मा...

आज की पत्रकारिता में वैचारिक आस्थाएं जिस तरह कट्टरता में बदली हैं और अखाड़ों में पहलवानों की तरह खम ठोंके जा रहे हों वहां राधेश्याम जी जैसे पत्रकार की मौजूदगी एक दीपस्तंभ की तरह थी

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 02 January, 2020
Last Modified:
Thursday, 02 January, 2020
radheshyam

प्रो. संजय द्विवेदी ।।

इस साल का दिसंबर महीना जाते-जाते एक ऐसा आघात दे गया है जिसे हमारे जैसे तमाम लोग अरसे तक भूल नहीं पाएंगे। यह 28 दिसंबर, 2019 का दिन था, शनिवार का दिन, इसी दिन शाम को हमारे प्रिय पत्रकार-संपादक और अभिभावक राधेश्याम शर्मा ने पंचकूला में आखिरी सांसें लीं। साल के आखिरी दिन 31 दिसंबर को भोपाल के माधवराव सप्रे संग्रहालय में नगर के बुद्धिजीवी पत्रकार और संपादक जुटे, उन्हें अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि देने। इस शोकसभा की खासियत यह थी कि यहां सभी धाराओं के बुद्धिजीवियों ने राधेश्याम शर्मा को जिस रूप में याद किया वह दुर्लभ है।

इस महती सभा में रघु ठाकुर से लेकर विजयदत्त श्रीधर, कैलाशचंद्र पंत, महेश श्रीवास्तव, लज्जाशंकर हरदेनिया, राजेंद्र शर्मा, राकेश दीक्षित, दविंदर कौर उप्पल, गिरीश उपाध्याय, विजयमनोहर तिवारी और लाजपत आहूजा तक की मौजूदगी बताती है कि राधेश्याम जी का संपर्कों का संसार कितना व्यापक था। एक पत्रकार जिसकी अपनी वैचारिक आस्थाएं बहुत प्रकट हों, जिसने अपने विचाराधारात्मक आग्रहों को कभी छिपाया नहीं, किंतु उसकी राजनीति के सभी धाराओं के नायकों से ‘भरोसे वाली दोस्ती हो’ यह संभव कहां है?

आज की पत्रकारिता में वैचारिक आस्थाएं जिस तरह कट्टरता में बदली हैं और अखाड़ों में पहलवानों की तरह खम ठोंके जा रहे हों वहां राधेश्याम जी जैसे पत्रकार की मौजूदगी एक दीपस्तंभ की तरह थी। जहां विचारों के साथ मनुष्यता और संवेदना जगह पाती थी। उन्होंने अपनी वैचारिक और व्यावसायिक प्रतिबद्धता को हमेशा अलग रखा।

अपने विद्यार्थी जीवन में काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी में पढ़ते हुए ही वे पत्रकारिता से जुड़ गए थे। 1956 में उन्होंने पूरी तरह अपने आपको पत्रकारीय कर्म में समर्पित कर दिया। तब से लेकर आजतक मध्यप्रदेश से लेकर पंजाब, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली की पत्रकारिता में उन्होंने अपने उजले पदचिन्ह छोड़े। एक नगर प्रतिनिधि से काम प्रारंभ कर वे विशेष संवाददाता और फिर दैनिक ट्रिब्यून, चंडीगढ़ जैसे महत्त्वपूर्ण अखबार के संपादक बने। इतने बड़े अखबार के संपादक पद पर रहते हुए ही उन्होंने उसे छोड़कर मीडिया शिक्षा के लिए खुद को समर्पित कर दिया और 1990 में भोपाल में स्थापित हुए माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के पहले महानिदेशक (अब पदनाम कुलपति है) बने। इसके बाद वे हरियाणा साहित्य अकादमी के निदेशक भी बने। अपनी पूरी जीवन यात्रा में उन्होंने कभी मूल्यों से समझौता नहीं किया।

सक्रिय पत्रकार, योग्य संपादकः

भोपाल के तमाम लोग उनकी पत्रकारिता के गवाह हैं, जिन्होंने एक रिर्पोटर के रूप में उनकी सक्रियता भरे दिन देखे हैं। राजनेताओं से उनकी निकटता जगजाहिर थी। दैनिक युगधर्म के संवाददाता के रूप में वे भोपाल में पदस्थ थे। उनका अखबार जबलपुर से निकलता था, कुछ प्रतियां ही भोपाल आती थीं। किंतु उनका संपर्क और व्यवहार ऐसा था कि लोग उनपर भरोसा करते थे। कांग्रेस, भाजपा, सोशलिस्ट,कम्युनिस्ट सब उनके दोस्त थे। दोस्ती भी ऐसी कि ‘राज की बातें’ उन्हें बताते, जिसकी गवाही सुबह उनका अखबार देता था। राजनीतिक गलियारों में उन दिनों भोपाल के वीटी जोशी, लज्जाशंकर हरदेनिया, सत्यनारायण श्रीवास्तव, दाऊलाल साखी, तरूण कुमार भादुड़ी जैसे पत्रकारों की तूती बोलती थी। किंतु राधेश्याम जी इन सबमें अपनी संपर्कशीलता, सरल स्वभाव और पारिवारिक रिश्तों के चलते एक अलग स्थान रखते थे। आज भी भोपाल के लोग उन्हें याद कर भावुक हो उठते हैं।

बाद के दिनों में वे ‘युगधर्म’ के संपादक होकर जबलपुर चले गए और उसके बाद वे चंडीगढ़ चले गए। इन सारे प्रवासों के बीच भी भोपाल उनका एक घर बना रहा। वे आते तो सबकी हाल लेते, सबसे मिलते और परिवारों में जाते। अपने साथियों और अधीनस्थों के परिजनों, बच्चों की स्थिति, प्रगति,पढ़ाई और विवाह सब पर उनकी नजर रहती थी। अपने लंबे पत्रकारीय जीवन में उन्होंने अनेक सर्वोच्च नेताओं, प्रधानमंत्रियों, राष्ट्रपतियों और समकालीन विविध क्षेत्रों के लोगों से लंबे इंटरव्यू किए। मुलाकातें कीं। किंतु उन्हें दादा माखनलाल चतुर्वेदी के साथ उनकी भेंटवार्ता सबसे प्रेरक लगती थी। वे उसे बार-बार याद करते थे। इस भेंट में माखनलाल जी ने उनसे कहा था – “पत्रकार की कलम न अटकनी चाहिए, न भटकनी चाहिए, न रुकनी चाहिए, न झुकनी चाहिए।” राधेश्याम जी ने इसे अपना जीवन मंत्र बना लिया। अपने संवादों में वे अक्सर इस बात को रेखांकित करते थे। यह संयोग ही था कि वे बाद में दादा के नाम पर बने विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति भी बने। उनके मीडिया चिंतन पर पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल ने ‘मीडियाः क्रांति या भ्रांति’ शीर्षक से पुस्तक का प्रकाशन भी 2015 में किया, जिसमें मीडिया को लेकर उनके विमर्शों से हम परिचित हो सकते हैं। सही मायनों में संपादकों की विलुप्त हो रही पीढ़ी में वे एक ऐसे नायक हैं, जिन-सा होना बहुत कठिन है। अपने पद के वैभव और प्रभाव के परे वे बेहद संवेदनशील इंसान थे, जिसने सबका भला चाहा और किया।

पत्रकारिता विश्वविद्यालय की बगिया के मालीः

उनके हिस्से एक ऐतिहासिक उपलब्धि है- भोपाल में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की स्थापना और उसका पहला महानिदेशक नियुक्त होना। एक-एक व्यक्ति को जोड़कर उन्होंने इस विश्वविद्यालय को खड़ा किया और उसकी प्रगति की हर सूचना पर हर्षित होते थे। वे जब भी मिलते तब कहते मैं तो इस ‘बगिया का माली’ रहा। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे हर छोटे से छोटे व्यक्ति को यह अहसास कराते कि वह कितना महत्त्वपूर्ण है। उनकी इसी विशेषता को रेखांकित करते हुए वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र शर्मा ने लिखा-“वे केवल राजनेताओं के ही नहीं, अपितु भोपाल के श्रेष्ठ पत्रकारों को एक माला में पिरोने वाले व्यक्ति भी थे।पारिवारिकता उनका वैशिष्ठ्य थी।”  पत्रकारिता विश्वविद्यालय के पुराने छात्र जो आज मीडिया में शिखर पदों पर हैं, उन्हें एक पिता के रूप में याद करते हैं। उनका अभिभावकत्व इतना प्रखर था कि वे इसके अलावा किसी और संज्ञा से नवाजे भी नहीं जा सकते थे। आज जबकि यह विश्वविद्यालय देश में मीडिया शिक्षा का सबसे बड़ा और स्थापित केंद्र बन चुका है, राधेश्याम जी की स्मृति बहुत स्वाभाविक और मार्मिक हो उठती है। उनके महानिदेशक रहते हुए ही मैंने भी स्नातक के छात्र रूप में विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया था। मैं लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातक करके आया था और कुलपति के पद की गरिमा को जानता था। किंतु राधेश्याम जी ने एक स्नातक के छात्र से न सिर्फ परिचय प्राप्त किया बल्कि अपने घर पर बुलाकर चाय-नाश्ता कराया और बेहद वात्सल्यमयी अपनी धर्मपत्नी से मिलाया। उनके उस दुलार को  सोचकर आज हैरत होती है कि पत्रकारिता के शिखरों पर रहे शर्मा सर इतनी आत्मीयता कहां से लाते हैं? वे बहुत बड़े थे, जीवन से, मन से और कृति से भी। इसका अहसास उनकी स्नेहछाया में बैठकर होता था।

बाद के दिनों में वे चंड़ीगढ़ चले गए और मैं अखबारों में काम करते हुए रायपुर, बिलासपुर, मुंबई की परिक्रमा कर भोपाल वापस आ गया। इन दिनों में कोई ऐसा समय नहीं था, जब उन्होंने हमें याद न किया हो। मैं बिलासपुर गया तो बोले मेरे भाई वहां डाक्टर हैं, उनसे मिलो। रायपुर में भी उनके दोस्तों की एक पूरी दुनिया थी। वे बोलते मिलते-जुलते क्यों नहीं ? हमेशा कहते थे “रोज अपने तीन पूर्व परिचितों से मिलो और एक नया संपर्क रोज बनाओ।” पत्रकारिता में आ रहे लोगों के लिए एक पाठ है यह। हम अमल नहीं कर पाए पर मानते हैं कि कर पाते तो दुनिया ज्यादा बड़ी और बेहतर होती। मेरी शादी से लेकर जीवन के हर प्रसंग उन्होंने चिठ्ठियां भेजीं, फोन किए। आज भी जब तक वे बहुत अस्वस्थ नहीं हो गए, फोन करते हालचाल पूछते। हालचाल मेरा, विश्वविद्यालय का, परिवार का, अपने दोस्तों का। कई बार यह लगता है कि वे इतनी आत्मीयता क्यों देते थे, ऐसा क्या था जो उन्हें हम जैसों से जोड़ता था। वे क्यों हमारी यह खुशफहमियां बनाए रखना चाहते थे कि हम बहुत खास हैं।

देश में ऐसे न जाने कितने लोग ऐसे थे जो मानते थे कि वे शर्मा जी के बहुत करीबी हैं। एक महापरिवार उन्होंने खुद बनाया था जिसके वे मुखिया थे। वे प्यार से बड़ी से बड़ी और कड़ी से कड़ी बात कहते जो हमेशा हमारे भले के लिए होती। ‘मीडिया विमर्श’ पत्रिका का प्रकाशन जब 13 साल पहले रायपुर से प्रारंभ किया तब उन्होंने इसके स्तंभ ‘मेरा समय’ के लिए अपनी पत्रकारीय यात्रा की पूरी कहानी लिखी। पत्रिका के बारे में बराबर पूछताछ करते और अच्छे सुझाव भी देते। उनके लिए हर व्यक्ति बहुत खास था या वे उसे इसका अहसास कराकर छोड़ते। बहुत गहरी आत्मीयता, वात्सल्य और संवेदना से उन्होंने जो दुनिया रची थी, हमें संतोष है कि हम भी उसके नागरिक थे और उनके साथ उंगलियां पकड़कर उस रास्ते पर थोड़ा चल सके, जिस पर वे पूरी जिंदगी चलते रहे। उस विचार पर भी, उस व्यवहार पर भी जो उन्होंने जिया और हमें जीने के लिए प्रेरित किया। उनका जाना एक सच्चाई है किंतु वे बने रहेंगे हमारी यादों में यह उससे बड़ी सच्चाई है, क्योंकि उन्हें भूलना खुद को भूलना होगा, अपनी जड़ों को भूलना होगा, आत्मीयता और औदार्य को भूलना होगा। रिश्तों की गरमाहट को भूलना होगा।

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में प्रोफेसर हैं।)

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सरकार की गोद में बैठना या हरदम तलवार तानना संतुलित पत्रकारिता नहीं मिस्टर मीडिया!

भारत में संपादकों की सबसे बड़ी संस्था एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ऐतिहासिक मोड़ पर है। पहली बार इसने अपने अध्यक्ष और महासचिव को  बाकायदा मतदान के जरिए चुना

राजेश बादल by
Published - Monday, 19 October, 2020
Last Modified:
Monday, 19 October, 2020
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

भारत में संपादकों की सबसे बड़ी संस्था एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ऐतिहासिक मोड़ पर है। पहली बार इसने अपने अध्यक्ष और महासचिव को  बाकायदा मतदान के जरिए चुना। खास बात यह है कि चुनाव की समूची प्रक्रिया ऑन लाइन संपन्न हुई। यह भी पहली बार है, जब एक महिला संपादक सीमा मुस्तफा इसकी अध्यक्ष निर्वाचित हुई हैं और महासचिव के रूप में संजय कपूर होंगे। अब नए पदाधिकारी दो-चार दिन में अपना कार्यभार संभाल लेंगे। उनसे मुल्क की पत्रकारिता को ताकत मिलनी चाहिए। इस कारण इस बार इस स्तंभ में गिल्ड की चर्चा का संदर्भ सिर्फ चुनावी नहीं, बल्कि इस शिखर संस्था से मौजूदा पत्रकारिता की विराट अपेक्षाएं हैं।  

इस तथ्य से कोई इनकार नहीं कर सकता कि मुल्क में इन दिनों प्रिंट और टीवी पत्रकारिता की साख पर गंभीर संकट है। खबरिया चैनल के परदे और समाचार पत्रों के पन्ने जिस तरह की खबरें उगल रहे हैं, उनसे उनकी स्थिति उपहासपूर्ण और कुछ कुछ विदूषक जैसी हो गई है। तमाम तरह के दबावों ने पत्रकारिता का चेहरा टेढ़ा मेढ़ा कर दिया है। निष्पक्ष, निर्भीक और बेधड़क अखबारनवीसी कहीं हाशिए पर  चली गई है और हुक्मरान इसका फायदा उठाते नजर आते हैं। इसमें उनकी क्या गलती है? कोई भी सरकार अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं करती। जब उसे लगता है कि मीडिया को बांटकर वह अपने पक्ष में भी संपादकों की एक जमात खड़ी कर सकती है तो वह नहीं चूकती। ऐसे में निष्पक्ष पत्रकारिता पर उल्टा असर पड़ता है। पत्रकारों पर हमले बढ़ जाते हैं, तीखी आलोचना करने वालों को बेरोजगार होना पड़ता है और पेशागत सरोकार सत्तारूढ़ दल की मुट्ठी में कैद हो जाते हैं। इन दिनों कमोबेश यही स्थिति है। पिछले चवालीस साल की पत्रकारिता अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि इतने खराब हालात कभी नही बने। 

एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के लिए हाल के बर्षों में यह एक बड़ी चुनौती रही है। अंदरूनी तौर पर निश्चित ही गिल्ड के पदाधिकारी इस दुविधा से गुजरे होंगे। पिछले महीने जब सदस्यों की ऑन लाइन आम सभा हुई तो अनेक सदस्यों ने इस पवित्र पेशे पर छाई काली घटाओं को रेखांकित किया था। उन्होंने उलाहना दिया था कि गिल्ड अपनी भूमिका का निर्वहन ठीक से नहीं कर रही है। इसी के बाद नए चुनाव जल्द कराने का फैसला हुआ। अभी तक इस संस्था में कभी मतदान की स्थिति नहीं बनी, मगर इस बार तीन सदस्यों की एक समिति बनाई गई। इसमें  कमर वहीद नकवी, राजदीप सरदेसाई और सच्चिदानंद मूर्ति शामिल थे। समिति ने ऑन लाइन मतदान की एक गोपनीय प्रणाली ईजाद की और यह कामयाब रही।

अब गिल्ड को समग्र हिन्दुस्तान के संपादकों की प्रतिनिधि संस्था में तब्दील करना नए अध्यक्ष और महासचिव की जिम्मेदारी है। भाषाई, क्षेत्रीय और प्रादेशिक स्तर पर अनुभवी और निष्पक्ष संपादकों को इसमें जगह देनी होगी तथा पत्रकारों-संपादकों का एक मुखर स्वर बनाना होगा। तभी इसकी सार्थकता है। याद करना होगा कि भारत के इतिहास में बिहार प्रेस बिल और उसके बाद मानहानि विधेयक का समूची पत्रकार बिरादरी ने विरोध किया था। तब सरकार को झुकना पड़ा था। इसके लिए सरकार से निरपेक्ष रिश्ता रखना होगा। अच्छे कदम के लिए तारीफ करें और खराब रवैए की निंदा करें यही अच्छी पत्रकारिता  की निशानी है। सरकार की गोद में बैठना या उसके सामने हरदम तलवार ताने रहना संतुलित पत्रकारिता नहीं है मिस्टर मीडिया!        

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

मिस्टर मीडिया: TRP के खेल में उलझ गया बाजार!

मिस्टर मीडिया: क्या पत्रकारिता भी संसदीय पत्रकारिता के मापदंडों की अवहेलना पर उतर आई है?

पत्रकारिता के इस शर्मनाक दौर में हमारी चुप्पी को वक्त कभी माफ नहीं करेगा मिस्टर मीडिया!

क्या समाज जब खुलकर हमारे खिलाफ मोर्चा खोलेगा, तभी हम जागेंगे मिस्टर मीडिया!

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लोकमंगल की पत्रकारिता और वर्तमान चुनौतियां

पत्रकारिता का मूल स्वर विरोध का है और यही विरोध लोकमंगल के दायित्वों की पूर्ति की आश्वस्ती है। हिक्की ने अखबार का प्रकाशन इसलिए आरंभ किया था कि वह समाज को असली चेहरा दिखा सके।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 15 October, 2020
Last Modified:
Thursday, 15 October, 2020
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मनोज कुमार, वरिष्ठ पत्रकार ।।

अपने जन्म से लेकर अब तक की पत्रकारिता लोकमंगल की पत्रकारिता रही है। लोकमंगल की पत्रकारिता की चर्चा जब करते हैं तो यह बात शीशे की तरह साफ होती है कि हम समाज के हितों के लिए लिखने और बोलने की बात करते हैं। लोकमंगल के वृहत्तर दायित्व के कारण ही पत्रकारिता को समाज का चौथा स्तम्भ कहा गया है। वर्तमान समय में सबसे ज्यादा आलोचना के केन्द्र में पत्रकारिता है और समाज सवाल कर रहा है कि पत्रकारिता अपने लोकमंगल के निहित दायित्वों से दूर कैसे हो रहा है? वह कैसे किसी के पक्ष में बोल रहा है या किसी के खिलाफ मोर्चाबंदी कर रहा है? यह सवाल भी पत्रकारिता के समक्ष यक्ष प्रश्र की तरह खड़ा है कि पत्रकारिता पर समाज का भरोसा टूट रहा है। निश्चित रूप से यह सवाल बेबुनियाद नहीं हो सकते हैं। कोई बड़ा बदलाव पत्रकारिता के निश्चित उद्देश्यों से भटकने के कारण उपजा होगा लेकिन पत्रकारिता अपने लोकमंगल के दायित्व से भटकी है अथवा समाज की अपेक्षा पत्रकारिता से बढ़ी है, इस पर विवेचन करने की आवश्यकता है।

पत्रकारिता के समक्ष उपजे सवालों को टाला नहीं जा सकता है लेकिन जो आरोप दागे जा रहे हैं, उन्हें यथास्थिति भी नहीं माना जा सकता है। पत्रकारिता ने स्वाधीनता संग्राम में ओज भरने का कार्य किया। यह वही पत्रकारिता है जिसने स्वाधीनता प्राप्ति के पश्चात नए भारत के निर्माण में अपनी सशक्त भूमिका निर्वहन किया है। स्मरण रहे कि यही पत्रकारिता है जिसने पूरी ताकत के साथ आपातकाल का प्रतिकार किया। यह वही पत्रकारिता है जिसने उन हिस्सों से पर्दा उठाने का काम किया है जिसके पीछे जाने कितने राज दफन हो चुके थे। हालांकि इन सब बातों को देखें और समझें तो लगता नहीं कि पत्रकारिता अपने लोकमंगल के दायित्व से परे हो गया है।

पत्रकारिता का मूल स्वर विरोध का है और यही विरोध लोकमंगल के दायित्वों की पूर्ति की आश्वस्ती है। हिक्की ने अखबार का प्रकाशन इसलिए आरंभ किया था कि वह समाज को असली चेहरा दिखा सके। स्वाधीनता संग्राम में अखबारों ने समाज में जन-जागरण का महती जवाबदारी का निर्वहन किया। लोगों में देश-प्रेम जगाया और अंग्रेज शासकों के खिलाफ उनके मन में क्रांति का भाव उत्पन्न किया। परिणामस्वरूप अंग्रेजों को भारत छोडऩे के लिए मजबूर होना पड़ा। स्वाधीनता के बाद नए भारत के निर्माण की जवाबदारी पत्रकारिता की थी। पंचवर्षीय योजना के माध्यम से विकास कार्यों का श्रीगणेश हुआ और इसके साथ ही घपले-घोटाले भी शुरू हो गए थे जिस पर से पर्दा उठाने का काम पत्रकारिता ने किया। यह लोकमंगल की ही पत्रकारिता ही थी। यह वह दौर था जब अखबारों में छपने वाली खबरों से पूरा तंत्र हिल जाया करता था। गांधी समाचार-पत्र को सबसे बड़ी ताकत मानते थे। इस ताकत से शासकों में भय था और इस बात का प्रमाण खुले तौर पर 1975 में आपातकाल के दरम्यान मिला जब पत्रकारिता पर बंदिशें लगा दी गई। उस दौर के शासकों को इस बात का इल्म था कि जो पत्रकारिता अंग्रेजों को देश-निकाला दे सकती है, वही पत्रकारिता उनकी कुर्सी भी डुला सकती है। आपातकाल में पत्रकारिता पर जो जोर-जुल्म हुए वह इतिहास के पन्नों में दर्ज है तो यह बात भी गर्व के साथ पत्रकारिता के इतिहास में दर्ज है कि पत्रकारिता झुकने के बजाय प्रतिकार करती हुई गर्व से खड़ी रही। भाजपा के वरिष्ठ राजनेता लालकृष्ण आडवाणी का यह बयान हमेशा उल्लेख में आता है जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘पत्रकारिता को झुकने के लिए कहा गया था, वह रेंगने लगी।’ यह बात सच हो सकती है लेकिन सौफीसदी सच नहीं क्योंकि बहुतेरे अखबार खिलाफ में खड़े थे अपनी बुनियादी उसूलों के साथ।

यह वह दौर था जब अधिकतम आठ पन्नों के अखबार हुआ करते थे। बहुत सारे अखबार तो चार पन्नों के ही थे। तब आधुनिक मशीनों की आमद नहीं हुई थी। पुरानी पद्धति से अखबारों का प्रकाशन होता था। यह वही दौर था जब संपादक की सत्ता सर्वोपरि थी। प्रबंधन पीछे हाथ बांधे खड़ा होता था। अखबार के पन्नों में पहले खबरों को जगह मिलती थी, विज्ञापन दूसरे क्रम पर था। साल 75 के बाद पत्रकारिता का चेहरा बदलता गया। शायद यह वही कालखंड था जब लोकमंगल की पत्रकारिता पर ग्रहण लगने लगा। अब नई तकनीक की प्रिंटिंग मशीनों का आगमन होने लगा था। अखबारों के पन्नों में भी एकाएक बढ़ोत्तरी होती गई। श्वेत-श्याम अखबार रंगीन होने लगे। पेज-थ्री का चलन उस दौर में नहीं था लेकिन छाया दिखने लगी थी। महंगी मशीनें और अखबार के पन्नों में वृद्धि से लागत में बढ़ोत्तरी होने लगी। पांच पैसे में बिकने वाला अखबार अब रुपय्या में बिकने लगा। हालांकि लागत और विक्रय मूल्य में अंतर काफी था और इस अंतर को पाटने के लिए विज्ञापनों का स्पेस लगातार बढऩे लगा। कंटेंट के स्थान पर विज्ञापनों को प्रमुखता मिलने लगी और संपादक की सत्ता भी तिरोहित होने लगी और प्रबंधन मुख्य भूमिका में आने लगा था। 

90 के दशक आते-आते लोकमंगल की पत्रकारिता की सूरत बदल चुकी थी। इधर टेलीविजन चैनल पसरने लगे थे। पाठक अब ग्राहक में और ग्राहक दर्शक में बदल रहे थे। साथ में पत्रकारिता मीडिया में हस्तांतरित हो चुका था। एक समय ऐसा आया कि लगने लगा कि मुद्रित माध्यम बीते जमाने की बात हो जाएगी और टेलीविजन पूरे समाज पर कब्जा कर लेगा। शुरुआत कुछ ऐसी ही थी लेकिन जल्द ही संकट के बादल छंट गए और संचार के दोनों माध्यमों ने अपना-अपना स्थान बना लिया। लेकिन पाठकों से दर्शकों में तब्दील हुए लोगों की लालसा-आकांक्षा बढऩे लगी। श्वेत-श्याम अखबारों की छपाई उन्हें उबाने लगी और अखबारों में भी वे टेलीविजन के अक्स देखने लगे। प्रबंधन ने इस अवसर का लाभ उठाया और अखबारों को टेलीविजन की शक्ल में बदलने में जुट गए। एकाएक अखबारों के खर्चों में मनमानी वृद्धि होने लगी और नुकसान का प्रतिशत बढ़ गया। ऐसे में विज्ञापन एकमात्र सहारा था और विज्ञापनों ने उस आधार को भी निरस्त कर दिया जिसमें तय था कि खबरें साठ प्रतिशत होंगी और विज्ञापन चालीस प्रतिशत। अब हालत यह हो गई कि जो स्थान बचा, वह खबरों के लिए। प्रतिशत की कोई भूमिका शेष नहीं रही। ऐसे में पत्रकारिता के समक्ष लोकमंगल की जवाबदारी पर सवाल उठने लगे। 

अखबारों के पन्नों से गांव की खबरें हाशिये पर चली गई और सामाजिक सरोकार की खबरों का स्थान भी अपेक्षित रूप में न्यूनतम हो गया। राजनीति खबरों ने स्थान अधिक ले लिया। इसी दौर में पेड-न्यूज नाम की बीमारी ने पत्रकारिता को घेर लिया। हालांकि किसी समय पीत-पत्रकारिता का रोग था जो अब बकायदा खबरों को बेचने के लिए कुख्यात होने लगा। पीत-पत्रकारिता में पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर किसी के पक्ष या विपक्ष में खबरें या लेख लिखे जाते थे लेकिन पेड-न्यूज में तो अखबारों के स्पेस बेचे जाने की शिकायतें मिलने लगी। इन सबके बावजूद अखबार लोकमंगल की खबरों से स्वयं को दूर नहीं कर पाए क्योंकि पाठकों के लिए इन खबरों का होना जरूरी था। घपले-घोटाले से पर्दा उठाने के साथ ही जन-समस्याओं को शासन-प्रशासन के समक्ष रखना भी लोकमंगल की पत्रकारिता का दायित्व था, सो पूरी जिम्मेदारी के साथ किया गया। 

एक सच यह भी है कि पाठकों को ग्राहक में बदलने का उपक्रम अखबारों से ही शुरू हुआ। स्मरण करना होगा कि अखबारों के साहित्यिक पृष्ठों पर सवाल के जवाब मांगे जाते थे और सही जवाब देने वालों के नाम और तस्वीर प्रकाशित करने का प्रलोभन दिया जाता था। शुरुआत यहां से होती है और बाद में अखबार बाल्टी और मग तक उपहार के रूप में देने लगते हैं। इसके लिए अखबार के ग्राहकों से महीना-दो-महीना इस बात की कसरत करायी जाती है कि वे अखबार के पन्ने पर छपे कूपन को सम्हाल कर रखें और नियत तिथि पर जमा करायें। ऐसा करके अखबार प्रबंधन अपनी प्रसार संख्या तो बढ़ा ही रहा था, लोगों में लालच का भाव पैदा हो रहा था जो उनके भीतर का विरोध खत्म कर रहा था। हैरानी तो इस बात की है कि जो लोग पत्रकारिता अथवा मीडिया पर सियापा करते हैं, वही लोग एक पचास रुपए की बाल्टी के लिए घर में कूपन चिपकाते बैठे रहते हैं। हालांकि सब शामिल नहीं हैं लेकिन बहुतेरे इसमें शामिल हैं। जब आप स्वयं पाठक से ग्राहक बन जाने के लिए तैयार हों तो प्रबंधन क्यों खुश नहीं होगा? टेलीविजन मीडिया के पास बेचने के लिए बाल्टी और मग नहीं है तो वह बेबुनियाद की बहस करा कर मनोरंजन के बहाने अपनी टीआरपी बढ़ाता है। सवाल यह है कि जो चीज आपको पसंद नहीं, उसे देख, सुन और पढ़ क्यों रहे हैं? क्यों उस पर टिप्पणी कर दूसरों को देने के लिए प्रेरित कर रहे हैं? सच तो यह है कि टेलीविजन की बहस चलती है आधे घंटे और उसकी चर्चा होती है 24 घंटे। ट्रोल करके हम आलोचना नहीं कर रहे हैं, बल्कि अपरोक्ष रूप से उन्हें लोकप्रिय बना रहे हैं।  

कोरोना के इस भयावह दौर में अखबार पूरी शिद्दत के साथ संकट की तस्वीर को सामने रख रहे थे तो जो कुछ अच्छा हो रहा है, उसकी तस्वीर से समाज का हौसला अफजाई कर रहे थे। यहां पर ठीक उलट टेलीविजन के पर्दे पर टीआरपी का खेल चल रहा था। हिन्दी सिनेमा के एक नायक की कथित आत्महत्या पर टेलीविजन चैनलों का ध्यान था और इसके बाद सिने-जगत में नशे के कारोबार को लेकर टेलीविजन बहस-मुबाहिस में जुट गया। कोरोना से समाज को किस संकट से गुजरना पड़ रहा है? सरकारें कितनी बेपरवाह हो रही हैं? प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठा है, जैसे गंभीर और लोकमंगल के विषय नदारद थे। यह पहला मौका नहीं था जब टेलीविजन की पत्रकारिता लोकमंगल के विषय से स्वयं को दूर कर रही थी बल्कि उसका यह रवैया हमेशा से रहा है। कुछेक अवसरों को छोड़ दें तो अखबारों के मुकाबले टेलीविजन की पत्रकारिता में लोकमंगल कोई विषय नहीं है। 

24 घंटे के खबरिया चैनलों को देखते दर्शकों को लगा कि समूची पत्रकारिता से लोकमंगल नदारद है। इसलिए पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर संदेह किया जाने लगा लेकिन यह अधूरा सच है। लोकमंगल के विषय का केन्द्र में रखे बिना पत्रकारिता हो नहीं सकती है। यही कारण है जिन विषयों से समाज का सीधा रिश्ता होता है, वह खबरें पाठकों तक पहुंचायी जाती हैं। प्राकृतिक आपदाएं हों, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, सडक़, सुरक्षा जैसे मुद्दों पर कवरेज लगातार मिलता है और लोकमंगल के लिए यह आवश्यक भी है। एक तरफ 24 घंटे के न्यूज चैनलों की चुनौती है कि वह लगातार ताजा खबरें कहां से लाए? तो दूसरी तरफ 24 घंटे में एक बार छपकर आने वाले अखबार पाठकों को निराशा में नहीं धकेलते हैं और ना ही टेलीविजन चैनलों की तरह शोर मचाते हैं। अखबारों और टेलीविजन दोनों के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है तकनालाजी के खर्चों की भरपाई करने की। टेलीविजन चैनलों की टीआरपी गिरने का अर्थ है राजस्व में कमी आना और राजस्व में कमी होने से टेलीविजन का संचालन मुश्किल सा काम है। कुछ ऐसी ही हालत अखबारों की है। कोरोना के इस भयावह संकट के दरम्यान अखबारों ने अपने पैर समेट लिए हैं और अखबारों के पन्नों में कटौती कर कुछ राहत पाने की कोशिश की है। फिर भी कहा जा सकता है कि जिस दर पर पाठकों को अखबार मिलता है और जिस लागत पर अखबार प्रिंट होता है, उन दोनों में बड़ा अंतर है और इस अंतर को पाटने का एकमात्र जरिया विज्ञापन है। 

लोकमंगल की पत्रकारिता को तीन कालखंड में विभाजित करके देखना होगा। स्वाधीनता के पहले की पत्रकारिता, स्वतंत्रता के बाद की पत्रकारिता और आपातकाल के बाद की पत्रकारिता। स्वाधीनता के पहले लोकमंगल अर्थात स्वराज्य प्राप्ति के लक्ष्य के साथ पत्रकारिता हो रही थी। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद नए भारत के निर्माण की पत्रकारिता थी और आपातकाल के बाद पत्रकारिता मिशन से प्रोफेशन और बीते तीन दशकों में प्रोफेशन से व्यवसाय में बदल गई है। लोकमंगल की पत्रकारिता को धक्का पत्रकारिता शिक्षण के कारण भी हुआ है, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है। दूसरे पाठ्यक्रमों की तरह पत्रकारिता की डिग्री कोर्स आरंभ किया गया और देशभर के सैकड़ों पत्रकारिता संस्थानों से हर वर्ष बहुसंख्या में युवा पत्रकारिता में आए। इनमें से चुनिंदा पत्रकारों ने लोकमंगल की पत्रकारिता के मर्म को समझा और कामयाब हो गए जबकि अधिकांश इसमें नाकामयाब रहे।

दरअसल, पत्रकारिता शिक्षा दूसरे पाठ्यक्रमों की तरह नहीं है। इसमें जमीनी अनुभव की जरूरत होती है जो पत्रकारिता को लोकमंगल की ओर ले जाती है। अधिसंख्य पत्रकारिता संस्थानों में पत्रकार नहीं पढ़ाते हैं बल्कि गैर-पत्रकार पढ़ाते हैं जो उन्हें किताबी ज्ञान तो दे देते हैं लेकिन स्वयं के पास व्यवहारिक ज्ञान नहीं होने के कारण गंभीर पत्रकार का निर्माण नहीं कर पाते हैं। अच्छे नम्बरों से पत्रकारिता की परीक्षा पास कर लेने का अर्थ अच्छा पत्रकार बन जाना नहीं है बल्कि कामयाब पत्रकार के लिए घिस-घिस कर चंदन होना पड़ता है। एक और बड़ी कमी यह है कि पत्रकारिता की शिक्षा ले रहे विद्यार्थियों को सपने दिखाये जाते हैं और जब वे जमीन पर काम करने आते हैं तो उन्हें सच्चाई का सामना करना पड़ता है जिससे उनके भीतर का साहस टूटने लगता है। आज भी पत्रकारों के पास अच्छी सैलरी नहीं है बल्कि कहा जाए कि एक परिवार का गुजर-बसर भी बमुश्किल होता है तो गलत नहीं होगा। इसके बाद नौकरी की गारंटी नहीं होती है क्योंकि प्रबंधन अपनी मर्जी से कभी भी बाहर का रास्ता दिखा देता है। कोरोना के इस भयानक संकट के दौर में पत्रकार सबसे ज्यादा परेशानी में हैं, यह बात हम सब जानते हैं। 

कुछ चुनौतियां हैं जो लोकमंगल की पत्रकारिता को बाधित करती हैं, तो दूसरी तरफ पत्रकारिता के निहित उद्देश्य इस बात के लिए आश्वस्त करते हैं कि लोकमंगल की पत्रकारिता हमेशा कायम रहेगी। गांधी जी पत्रकारिता की जिस शुद्धता की बात करते थे, आज वह शायद संभव ना हो लेकिन पत्रकारिता में मिलावट हो, यह भी संभव नहीं। भारत सहित पूरी दुनिया के आंकड़ों का विशेषण करें तो पाएंगे कि सबसे खतरनाक कार्य पत्रकारिता का है। हर वर्ष बड़ी संख्या में पत्रकारीय दायित्व पूर्ण करते हुए पत्रकार मारे जाते हैं। लेकिन यह समाज को आश्वस्त करने की बात है कि पत्रकारिता पर मंडराते खतरा देखने के बाद भी डरने या पीछे हटने के स्थान पर प्रति वर्ष जज्बे से भरे युवा पत्रकारिता को करियर बनाने के लिए आते हैं और आ रहे हैं। 

लोकमंगल की पत्रकारिता पर संकट पत्रकारिता से या पत्रकारों से नहीं है बल्कि यह संकट प्रबंधन से है। प्रबंधन अपने निहित आर्थिक स्वार्थ के लिए किसी भी तरह का करार कर लेता है और लोकमंगल से जुड़ी कई बातें दबकर रह जाती है। किसी समय शशि कपूर अभिनीत फिल्म ‘न्यू देहली टाइम्स’ इस बात का गवाह है। पत्रकारिता में आने वाले प्रत्येक विद्यार्थी को एक बार यह फिल्म जरूर दिखायी जानी चाहिए। यह वह सच है जो लोकमंगल की पत्रकारिता के रास्ते में तब भी बाधा थी और आज तो इसका स्पेस लगातार बढ़ रहा है। हालांकि यह भी सच है कि जब-जब पत्रकारिता के समक्ष संकट बढ़ा है, तब-तब पत्रकारिता और तल्ख हुई है। वर्तमान समय का संकट यह है कि हर कोई पत्रकारिता से उम्मीद रखता है कि वह उसके पक्ष में बोले और ऐसा नहीं करने पर पत्रकारिता को अनेक उपमा दी जाती है। इस बात को मान लेना अनुचित नहीं होगा कि किसी दौर में सहिष्णुता अधिक थी तो किसी दौर में यह सहिष्णुता कम हुई है लेकिन सत्ता के लिए पत्रकारिता हमेशा से संकट रही है और बनी रहेगी क्योंकि समाज के चौथे स्तम्भ होने के कारण यह उसका मूल कर्तव्य है। सबसे बड़ी बात यह है कि पत्रकारिता पर समाज एक तरफ अविश्वास करता है और अखबार और टेलीविजन की खबरें समाज के लिए नजीर बनती हैं। अब समय आ गया है कि प्रेस काउंसिल जैसी संस्था का अधिकार क्षेत्र बढ़ना चाहिए और बेलाग होती मीडिया पर नियंत्रण हो। यह एक पहल है जिसकी जरूरत वर्तमान समय को है। हालांकि दौर कितना भी बुरा आए और कैसी भी परिस्थिति हो, पत्रकारिता अपने लोकमंगल की जवाबदारी से विमुख नहीं हो सकती है। क्योंकि लोकमंगल की पत्रकारिता की नींव में गांधी, तिलक और विद्यार्थीजी की सोच और दृष्टि समाहित है। 

(लेखक शोध पत्रिका ‘समागम’ के संपादक हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)

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डॉ. वैदिक बोले, सराहनीय हैं केंद्र की ये दो पहल, राज्य सरकार को भी देना चाहिए ध्यान

भारत सरकार ने इधर दो उल्लेखनीय पहल की हैं। ये दोनों पहल सराहनीय हैं लेकिन देश के करोड़ों मजदूर के बारे में भी कुछ पहल शीघ्र होनी चाहिए।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 15 October, 2020
Last Modified:
Thursday, 15 October, 2020
Modi

डॉ. वेद प्रताप वैदिक, वरिष्ठ पत्रकार ।।

भारत सरकार ने इधर दो उल्लेखनीय पहल की हैं। एक तो किसानों को संपत्ति कार्ड देने की घोषणा और दूसरा केंद्रीय सरकार के कर्मचारियों के हाथ में नोटों की गड्डी देना ताकि वे जमकर खर्च करें, त्यौहार मनाएं और बाजारों में खरीदी का दौरदौरा आ जाए।

देश के करोड़ों किसानों के पास अपने झोपड़े, मकान और खेती की जमीन भी है। उनकी कीमत चाहे बहुत कम हो, लेकिन उनके लिए तो वही सब कुछ है। उनका वह सब कुछ है लेकिन उनके पास ऐसा कुछ नहीं है, जो यह सिद्ध कर सके कि वे उसके मालिक हैं। सरकार यह काम पहली बार कर रही है कि कानूनी तौर पर उनकी संपत्ति पर उनका स्वामित्व स्थापित होगा। शुरू-शुरू में एक लाख किसानों को ये कार्ड मिलेंगे। ये किसान छह राज्यों के 750 गांवों में होंगे। धीरे-धीरे देश के सभी किसानों को यह सुविधा उपलब्ध हो जाएगी। लेकिन इस किसान-लाभकारी योजना के मार्ग में कई बाधाएं हैं। सबसे पहले तो यही कि जब जमीनें नपेंगी तो पड़ौसियों से बड़ी तकरारें होंगी। फिर स्वामित्व को लेकर भाई-बहनों में झड़प हो सकती है। लेकिन यह भी सत्य है कि भारतीय खेती को हम बहुत उपजाऊ और आधुनिक बनाना है, बैंकों से कर्ज लेना है और कंपनियों से अनुबंध करना है तो स्वामित्व पर कानूनी मुहर जरूरी है। यह व्यवस्था भारतीय किसानों के लिए काफी लाभदायक सिद्ध हो सकती है।

आजकल कोरोना महामारी की वजह से बाजार ठंडे पड़ गए हैं। बाजार तो हैं लेकिन खरीददार नहीं है। सरकार ने बाजारों में चमक लाने के लिए एक आकर्षक योजना की चूसनी लटकाई है। इसका आनंद सिर्फ सरकारी कर्मचारी ही ले पाएंगे। सभी कर्मचारियों को 10-10 हजार रुपए अग्रिम मिलेंगे। यह कर्ज ब्याजमुक्त होगा। इसे दस किस्तों में लौटाना होगा। इसके अलावा कर्मचारियों को तीन साल में एक बार देश में यात्रा करने का जो भत्ता मिलता है, वह उन्हें बिना यात्रा किए ही मिलेगा लेकिन उन्हें उसका तीन गुना पैसा खरीदी पर लगाना होगा। उसकी रसीद भी देनी होगी। वे ऐसा माल खरीद सकेंगे, जिस पर 12 प्रतिशत या उससे ज्यादा जीएसटी देनी पड़ती है। इसका अर्थ क्या हुआ? यही न कि सरकार जितना पैसा देगी, उससे तीन गुना ज्यादा बाजार में आ जाएगा। उम्मीद है कि एक लाख करोड़ से ज्यादा रुपया बाजार में चला आएगा। यदि राज्य-सरकारें भी ऐसी पहल करें तो देश के बाजार चमक उठेंगे। केंद्र सरकार राज्यों की सरकारों को भी 12 हजार करोड़ रु. का कर्ज दे रही है और 25 हजार करोड़ रु. बुनियादी ढांचे पर खर्च करेगी।

ये दोनों पहल सराहनीय हैं लेकिन देश के करोड़ों मजदूर के बारे में भी कुछ पहल शीघ्र होनी चाहिए।

(साभार: http://www.drvaidik.in/ )

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TV चैनल्स के 'युद्ध' का भंडाफोड़ रंग दिखाने के साथ कुछ सुधर भी सकता है: आलोक मेहता

टीवी चैनल्स के बीच टीआरपी की ‘जंग’ के साथ अब उसके भंडाफोड़ की नौबत आ गई है |

आलोक मेहता by
Published - Monday, 12 October, 2020
Last Modified:
Monday, 12 October, 2020
Alok Mehta

आलोक मेहता, वरिष्ठ पत्रकार।।  

टीवी चैनल्स के बीच टीआरपी की ‘जंग’ के साथ अब उसके भंडाफोड़ की नौबत आ गई है। इस मामले में भले ही मुंबई पुलिस पर कुछ पत्रकारों पर बदले की कार्रवाई और महाराष्ट्र के सत्तारूढ़ नेताओं का समर्थन करने के आरोप लग रहे हों, लेकिन पूरे विवाद का दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह है कि संपादकीय से जुड़े कुछ  वरिष्ठ साथी अपनी विश्वसनीयता खो रहे हैं। अब सवाल यह उठता है कि इस पूरे मामले में किसे दोष दिया जाए? 

इंडस्ट्री के कुछ बड़े खिलाड़ी इस मामले में परस्पर दोषारोपण कर रहे हैं और उन पर डाटा से छेड़छाड़ के आरोप लगा रहे हैं। वास्तव में न्यूज चैनल्स के टीआरपी का बिजनेस पिछले दो दशक से अनेक विवादों का विषय रहा है। वर्ष 2006-2007 के दौरान हिंदी मैगजीन ‘आउटलुक’ (Outlook) के संपादक के रूप में मैंने विस्तार से इस पर एक रिपोर्ट छापी थी और रेटिंग एजेंसी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने मुझसे मिलकर अपना विरोध जताया और स्पष्टीकरण छापने के लिए कहा, लेकिन हम अपनी तथ्य होने से हमने रुख नहीं बदला और कोई स्पष्टीकरण प्रकाशित नहीं किया। इसलिए, हाल में हुए खुलासे से मीडिया के लोग आश्चर्यचकित नहीं हैं, लेकिन हम इससे बुरा महसूस करते हैं और दुखी है। हम चाहते हैं कि इसका कोई दीर्घकालिक समाधान सामने आए।  

देश में निजी टेलिविजन चैनल्स के विस्तार के साथ ही मीडिया बिजनेस में टीवी रेटिंग्स काफी विवादास्पद मुद्दा रहा है और अभी तक रेटिंग कंटेंट की प्राथमिकताओं को निर्धारित करना जारी रखे हुए है। टीआरपी जिस तरह से इंडस्ट्री का एक मापदंड बन गया है, वह अपरिहार्य और पेचीदा बन चुका है। ब्रॉडकास्टर्स ने अक्सर टीआरपी की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं, लेकिन हाल के महीनों में यह एक ‘गंदे खेल’ (dirty game) में परिवर्तित हो गया है। पश्चिमी समाज का फॉर्मूला, विदेश एजेंसियों का कुछ नियंत्रण और मीडिया इंडस्ट्री में गलाकाट प्रतियोगिता के कारण इस तरह की समस्याएं बढ़ रही हैं।  

लेकिन इसके लिए सिर्फ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को ही क्यों दोष दिया जाए? क्या हम प्रिंट मीडिया में प्रसार संख्या में भरी गड़बड़ियों से  परिचित नहीं हैं और क्या हमने इसका अनुभव नहीं किया है? दशकों से छोटी, मध्यम और बड़ी मीडिया कंपनियां दूसरे अखबारों और मैगजींस के सर्कुलेशन के आंकड़ों को चुनौती देती रही हैं। 

इसका दुर्भाग्यपूर्ण पहलू ये है कि सरकार और निजी बिजनेस ग्रुप भी इस ‘नंबर गेम’ (सर्कुलेशन/रीडरशिप/व्युअर्स) को प्राथमिकता देते हैं। निश्चित रूप से यह भी एक बड़ा मानदंड है, लेकिन इससे गुणवत्ता पर असर पड़ता है और कुछ मीडिया मालिक व मार्केटिंग से जुड़े लोग ज्यादा से ज्यादा एडवर्टाइजिंग पाने के लिए जोड़-तोड़ का ‘खेल’ शुरू कर देते हैं। लाखों की प्रसार संख्या दिखाने का हथकंडा अपनाते हैं | 

करीब दस साल पहले एक सेमिनार के दौरान मैंने एक न्यूज चैनल के वरिष्ठ संपादक को कुछ प्रिंट मीडिया में सर्कुलेशन के इस फर्जीवाड़े और आंखों में धूल झोंककर विज्ञापन से मोटी कमाई की समस्या पर स्टिंग करने का सुझाव दिया था। मैं और मेरे कई साथियों को इस बात की जानकारी थी कि किस तरह से तमाम पब्लिकेशंस द्वारा अखबार/मैगजींस की कॉपियों को गोदाम में डाल दिया गया और बाद में कचरे के रूप में छोड़ दिया गया। लेकिन इस मुद्दे पर अधिक हंगामा नहीं हुआ। स्टिंग भी नहीं हुआ। कुछ सुधरे, कुछ और बिगड़े | 

न्यूज चैनल्स में भी यही समस्या तब शुरू हो गई, जब हमने उन सभी लोगों के लिए दरवाजे खोल दिए जो किसी भी तरह पूंजी निवेश और कमाई कर सकते थे। तमाम नए प्लेयर्स हमेशा मुनाफा कमाने की जल्दी में रहते हैं। तमाम पॉलिटिकल पार्टीज, बिजनेस हाउसेज और अन्य लॉबी भी एक अथवा दूसरे चैनल का सपोर्ट करते हैं और ‘दुश्मनी’ (enemy) को नष्ट करने में मदद करते हैं।  

यदि हम इतिहास की बात करें तो एक किताब पर्याप्त नहीं होगी। जब हम चुनौतियों और संकट का सामना कर रहे हैं तो हमें सकारात्मक रूप से सोचने और विश्वसनीयता, अस्तित्व, विस्तार और रेवेन्यू के समाधान खोजने की कोशिश करने की जरूरत है। हमें ‘स्वदेशी’ बनने की कोशिश करने की जरूरत है। 

भारतीय मीडिया को पश्चिमी देशों के समाज और भारत के सामाजिक और पारिवारिक जीवन में अंतर के बारे में बेहतर जानकारी है। पश्चिमी देशों में लोगों की औसत आमदनी की क्षमता और जीवन शैली विभिन्न क्षेत्रों में ज्यादा अलग नहीं होती है, लेकिन भारत की बात करें तो यहां आपको अमीरों के बंगलों के पास गरीबों की बस्तियां भी भी मिलती हैं और आय वर्ग भी भिन्न है | इसके अलावा एक ही परिवार की तीन पीढ़यों में जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग पसंद हो सकती है।  

वैसे भी, न्यूज चैनल्स पर हालिया टीआरपी विवाद की वजह से सरकार को नए नियम, रेगुलेशंस अथवा कानून के साथ हस्तक्षेप करने का मौका मिल जाता है। मीडिया काउंसिल की मांग लंबे समय से लंबित है और अधिकांश राजनीतिक दल मीडिया पर कुछ नियंत्रण/निगरानी रखने के इच्छुक रहते हैं | राज्यों में तो बराबर दबाव बनते रहते हैं | 

दूसरा पहलू ज्यादा गंभीर है। यदि न्यूज बिजनेस/चैनल्स अपनी विश्वसनीयता खो देते हैं और आपस में लड़ने लगते हैं और पुलिस या रेवेन्यू विभाग निवेशकों अथवा एडवर्टाइजर्स से पूछताछ शुरू कर देते हैं तो उन्हें बचाने कौन आएगा? यह आत्मविश्लेषण का समय है। आत्म अनुशासन का मतलब आचार संहिता यानी ‘लक्ष्मण रेखा’ से है। हमें टीआरपी के लिए नए सिस्टम की जरूरत है। यह न सिर्फ भारतीय मीडिया की प्रतिष्ठा को सुधारने और उसे बढ़ाने में मददगार साबित होगा, बल्कि भारतीय लोकतंत्र और इसके भविष्य को मजबूत बनाएगा।  

(यह लेखक के निजी विचार हैं)  

(लेखक एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष और भारतीय प्रेस परिषद् के पूर्व सदस्य हैं | , नवभारत टाइम्स,  हिंदुस्तान , नई दुनिया , दैनिक भास्कर ,आउटलुक हिंदी सहित पत्र पत्रिकाओं में संपादक रहे हैं |  पद्मश्री और गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार से भी सम्मानित हैं |) 

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मिस्टर मीडिया: TRP के खेल में उलझ गया बाजार!

एक के बाद एक खुलासे हो रहे हैं। टीआरपी की होड़ में परदे के पीछे भी कुछ-कुछ होता है, दर्शकों को यह पता चल रहा है।

राजेश बादल by
Published - Saturday, 10 October, 2020
Last Modified:
Saturday, 10 October, 2020
TRP

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

एक के बाद एक खुलासे हो रहे हैं। टीआरपी (TRP) की होड़ में परदे के पीछे भी कुछ-कुछ होता है, दर्शकों को यह पता चल रहा है। पर जो भी हो रहा है, वह ठीक नहीं है। अपने प्रॉडक्ट की क्वालिटी के आधार पर कोई खिलाड़ी विजेता बने तो बात समझ में आती है, लेकिन विजेता बनने के लिए कोई खेल के नियम ही बदल दे तो यह समझ से परे है। जब टॉप के खबरिया चैनलों पर आरोप लगने लगें तो अंदाज लगाया जा सकता है कि छोटे-छोटे चैनलों की बिसात ही क्या है।

समाचार चैनल ही नहीं, मनोरंजन चैनलों का भी टीआरपी के लिए गोरखधंधा शर्मनाक है। यह उजागर है कि विज्ञापनों के लिए ही इस रेटिंग की चिंता की जाती है। बाजार में इस गलाकाट स्पर्धा के कारण सारे नैतिक मूल्य धरे रह जाते हैं और उनकी जगह नकली मापदंड आ जाते हैं। यह स्थिति बाजार के लिए घातक है और उपभोक्ता के लिए भी। विडंबना यह है कि पैसे के लिए ये अनैतिक हथकंडे गांव का कोई अनपढ़ दुकानदार अपनाए तो बात समझ में आती है, पर बौद्घिक व्यापार इसका शिकार हो जाए,यह दुर्भाग्यपूर्ण है।

मुझे याद है, जब भारत का चैनल उद्योग पनप रहा था तो केबल संचालकों को चैनल के मार्केटिंग कार्यकर्ता अपने डिब्बे दिया करते थे। साथ में बेहतर स्थान देने की एवज में महंगे उपहार भी उन्हें भेंट किए जाते थे। कोई ऑपरेटर तो ऐसा भी होता था जो उपहार न लेकर हर साल कैश की मांग करता था। चैनल उन्हें नकद भी देता था। इसके अलावा समय-समय पर उन्हें पांच सितारा होटलों में दावत दी जाती थी। उन रात्रिभोजों में महंगी और उम्दा शराब परोसी जाती थी। यह करीब बीस बरस पहले की बात है। तब भी यह अनुचित था और आज भी इसे ठीक नहीं माना जाता। आशय यह है कि मुनाफे के लिए बेईमानी के बीज तो इस चैनल उद्योग की स्थापना के साथ ही पड़ गए थे। मगर हालत यहां तक जा पहुंचेगी, किसी ने नहीं सोचा था।

जब तक टीआरपी के परदे के पीछे की माया सामने नहीं आई थी, तब तक बहुत चिंता नहीं थी। मगर पैसों के लेन-देन का ख़ुलासा होने के बाद समाज के बुद्धिजीवी विचलित हैं। वे अपने आपको ठगा सा महसूस कर रहे हैं। सोच के किसी बिंदु पर वे अगर भ्रमित महसूस करते थे तो टीआरपी के पैमाने पर सबसे लोकप्रिय चैनल को देखते थे और उसकी बात मान लेते थे। वे सोचते थे कि चैनल जो दिखा रहा है, वह समाज की प्रतिनिधि राय हो सकती है, क्योंकि अधिकतर लोग इसी चैनल को देखते हैं। पर अब उन्हें लग रहा है कि वे ऐसे अनेक बौद्धिक विमर्शों में अनजाने में ही अपनी राय बना बैठे हैं, जो सच नहीं हो सकती।

यानी चैनल ने राजनीतिक अथवा सामाजिक या अन्य आधारों पर अपनी बात बड़ी सफाई से उनके दिमागों में दाखिल कर दी है। उस तथाकथित सच जानकारी के आधार पर वे अपने-अपने संपर्क संसार में उस विकृत सच का विस्तार कर चुके हैं। अपने साथ हुई इस वैचारिक धोखाधड़ी का मामला वे किस थाने या अदालत में लेकर जाएं। अब वे सावधान हैं। वे छोटे परदे के मायाजाल में नहीं फंसेंगे, यह उन्होंने तय कर लिया है और यह खतरे की घंटी है मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

मिस्टर मीडिया: क्या पत्रकारिता भी संसदीय पत्रकारिता के मापदंडों की अवहेलना पर उतर आई है?

पत्रकारिता के इस शर्मनाक दौर में हमारी चुप्पी को वक्त कभी माफ नहीं करेगा मिस्टर मीडिया!

क्या समाज जब खुलकर हमारे खिलाफ मोर्चा खोलेगा, तभी हम जागेंगे मिस्टर मीडिया!

इसी तर्ज पर हिन्दुस्तान में झोलाछाप मीडिया भी विकराल आकार लेता जा रहा है मिस्टर मीडिया!

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जानिए, रेटिंग एजेंसी कैसे समझती है किसने, क्या और कितनी देर देखा टीवी चैनल

TRP शब्द से अब टीवी न्यूज देखने वाला कुछ कुछ परिचित हो गया है। इसका मतलब टेलीविजन रेटिंग पॉइंट होता है। भारत में अमेरिकी कंपनी TAM Media Research ने TRP शब्द को जन्म दिया

Last Modified:
Friday, 09 October, 2020
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भव्य श्रीवास्तव, वरिष्ठ पत्रकार ।।

TRP शब्द से अब टीवी न्यूज देखने वाला कुछ कुछ परिचित हो गया है। इसका मतलब टेलीविजन रेटिंग पॉइंट होता है। भारत में अमेरिकी कंपनी TAM Media Research ने TRP शब्द को जन्म दिया, जो सप्ताह में एक बार टीवी चैनलों पर देखे जाने वाले कंटेंट का हिसाब देती थी। TAM कंपनी दो अंतरराष्ट्रीय कंपनियों- नील्सन और कैंटर मीडिया के साथ आने से बनी थी। भारत में ये बीस साल से सक्रिय हैं और टीवी चैनलों और एडवर्टाइजिंग कंपनियों के बीच जानकारी देने का काम करती आई है। इसका महत्व इसलिए है क्योंकि इनके द्वारा दी गई सूचना से टीवी पर किसी कार्यक्रम में प्रचार के रेट तय होते है और स्पॉन्सर मिलते है। साथ चैनल नंबर एक और दो होने का महत्व पेश करते है।

अमेरिका में टीवी रेंटिंग देने में नील्सन कपंनी सबसे बड़ी है। वो टीवी पर देखे जाने वालों की संख्या Statistical Sampling से निकालती है। इसके लिए अमेरिका के एक लाख घरों में दो तरह के यंत्र लगाकर वे टीवी रेंटिंग निकालते है। पहला ब्लैकबॉक्स जैसे एक यंत्र और दूसरा पीपुल मीटर। ब्लैकबॉक्स यंत्र से टीवी चैनल की जानकारी रेटिंग एजेंसी को जाती है और पीपुल मीटर से कौन उसे देख रहा है इसकी। अमेरिका में 11 करोड़ से ज्यादा टीवी सेट है जिसे 30 करोड़ से ज्यादा लोग देखते हैं।

अब बात भारत की। टैम ने भारत में 1998 से काम शुरू किया। तब एक फीसदी लोग न्यूज देखते थे जो टैम के अनुसार 2018 में दस फीसदी पर आ गया था। यानि इस समय देश के सभी टीवी दर्शकों में से दस फीसदी निजी चैनलों पर खबर देखने लगे थे। देश में पहले मनोरंजन चैनलों ने खेल शुरू किया, स्टार, जी और सन टीवी पहले खिलाड़ी रहे। वैसे देश का पहला निजी लाइव बुलेटिन 30 सितंबर 1995 को शाम 730 बजे एशियानेट टीवी पर प्रसारित हुआ। ये फिलीपींस के एक स्टूडियो से प्रसारित किया गया और केरल में बीम हुआ।

न्यूज चैनलों का क्रम आपमें से बहुत से लोगों को पता ही है। न्यूजट्रैक, आजतक, एनडीटीवी, स्टार न्यूज फिर बहुत सारे... लेकिन चैनलों में होड़ तब शुरू हुई जब टैम पिक्चर में आया। इसने साप्ताहिक रेटिंग देकर और साथ में हर स्लॉट में कार्यक्रम को देखने वालों की संख्या बताकर एक युद्ध छेड़ दिया। इससे टीवी प्रोग्रामिंग में एकरूपता, खबरों में सनसनीखेज प्रस्तुति जैसे पक्ष आ गए। टैम द्वारा शुरू की गई इस सेवा का प्रभाव ऐसा है कि आज भी BARC के संग TAM मीटर मैनेजमेंट में काम करता है और देश के 34,000 मीटरों से आने वाले डेटा को भी प्रोसेस करता है।

भारत में वैसे इन 34,000 घरों में एक काला बॉक्स लगा है जिसके जरिए रेटिेग एजेंसी ये समझ पाती है कि कौन क्या और कितनी देर देख रहा है। वैसे ये जानना रोचक होगा कि कैसे आपके द्वारा देखे जाने वाली कंटेंट के केवल ऑडियो से ही रेटिंग एजेंसी ये जानती है कि आप क्या देख रहे है। ऐेसा पूरी दुनिया में होता है। बार्क ने टैम से एक कदम आगे बढ़ाते हुए ऑडियो में एक कोड लगाया है जिससे वो चैनल की जानकारी पाता है। ये कोड हर कुछ समय बाद आता है, पर ये दर्शकों को नहीं सुनाई देता है। 2012 में कई न्यूज कंपनियों ने टैम की रेटिंग पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए उसकी सेवा कई हफ्तों के लिए बंद कर दी थी। इसके बाद ही ब्रॉ़डकास्टिंग उद्योग, प्रचार कंपनियों के साथ आने से BARC बनी थी।

भारत में एक बड़ा खेल MSO, केबल वालों का रहा है। पहले इनके जरिए शहरों में चैनलों को दिखाकर या नहीं दिखाकर उसकी लोकप्रियता तय की जाती थी। बाद में सराकर ने केबल से टीवी दिखाने वालों को MSO के अंदर लाकर इसे भी सैट टॉप बॉक्स से नियंत्रित किया है। आज देश में 1100 से अधिक MSO हैं, जिनमें से 15 बड़ों के पास 78 फीसदी केबल मार्केट है। बड़े MSO जैसे सिटी केवल, हैथवे, डेन, जीटीपीएल आदि। 2019 के हिसाब से सबसे बड़ा MSO था सिटी केबल जिसके 15 राज्यों में 1 करोड़ से ज्यादा सब्सक्राइबर्स थे। देश में अभी 1471 रजिस्टर्ड MSO हैं जिनमें से 1143 एक्टिव हैं।

आज टीआरपी को लेकर जंग इसलिए जारी है क्योंकि इससे ही आपका रसूख और पैसे कमाने की क्षमता तय होती है। आने वाले समय में हम विश्वसनीयता के लिए पारदर्शिता की मांग को उठता देख सकते है। मन-मानस को विचारों से बदलने की शक्ति रखने वाला टीवी अब डिजिटल दौर में उसकी तरीके से व्यवहार करना चाहता है। वो दर्शक को ज्यादा देर तक अपना बनाए रखने की जंग में है।

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उस दिन 'मामाजी' से मिलकर ऐसा लगा जैसे बहुत कुछ सीखने-समझने को मिल गया: आलोक मेहता

मालवा क्षेत्र के उज्जैन, इंदौर और सिंधिया रियासत के ग्वालियर में उस समय पत्रकारिता के मामा आदरणीय माणिकचंद वाजपेयी और बाबा राहुल बारपुतेजी को पहले पढ़ने, फिर देखने-मिलने का सौभाग्य मिला

आलोक मेहता by
Published - Wednesday, 07 October, 2020
Last Modified:
Wednesday, 07 October, 2020
Alok Mehta

आलोक मेहता, वरिष्ठ पत्रकार।।

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, गणेश शंकर विद्यार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी को देखने का सौभाग्य तो मुझे नहीं मिला, लेकिन मालवा क्षेत्र के उज्जैन, इंदौर और सिंधिया रियासत के ग्वालियर में उस समय पत्रकारिता के मामा आदरणीय माणिकचंद वाजपेयी और बाबा राहुल बारपुतेजी को पहले पढ़ने, फिर देखने-मिलने का सौभाग्य मिला। उज्जैन में शुरू में ‘नई दुनिया’ अखबार आता था, फिर ‘स्वदेश’ आने लगा। धारदार लेखन उत्साह जगाता। शहर में हिंदी आंदोलन के दौरान छात्रों के साथ माइक लेकर बोलने, नारे लगाकर घूमने पर खबरें छपीं। फिर स्कूल कालेज में वाद विवाद-नाटक प्रतियोगिता में विजयी होने पर अन्य अखबारों के बजाय ‘स्वदेश’ में विस्तार से खबर और फोटो छपने पर ‘स्वदेश’ और अच्छा लगता।

पहले अपनी खबर छपवाने ‘स्वदेश’ के दफ्तर दो-चार बार जाना हुआ, फिर संयोग व सौभाग्य से विक्रम विश्वविद्यालय का छात्र रहते हुए ‘हिन्दुस्थान समाचार’ का अंशकालिक संवाददाता बनने का अवसर मिल गया। तब संस्था के प्रधान संपादक-महाप्रबंधक आदरणीय  बालेश्वर अग्रवालजी और भोपाल में मध्य प्रदेश के प्रमुख ओमप्रकाश कुन्द्राजी का उज्जैन आना हुआ। उन्होंने मामाजी से इंदौर बात की तथा मुझसे कहा कि ‘स्वदेश’ के उज्जैन कार्यालय में शाम को जाकर खबर लिख लिया करो और फिर डाक से या जरूरी हो तो तारघर से तार द्वारा खबर भेज सकते हो।

यह बात 1968 की है। मैंने वहां जाना शुरू कर दिया। दो-तीन महीने के बाद एक दिन ‘स्वदेश’ कार्यालय पहुंचा, तो देखा कि स्थानीय कार्यालय प्रमुख की कुर्सी पर धोती कुर्ते में मूंछों वाले एक रोबदार सज्जन बैठे थे। दूसरी तरफ स्थानीय कार्यालय के संवाददाता प्रकाश बोहरा अत्यधिक विनम्र भाव से कुछ जानकारियां दे रहे थे।  मुझे अटपटा देखकर उन्होंने बताया कि यह आलोक है, हिन्दुस्थान समाचार से और मुझसे कहा कि यह हैं मामाजी, अपने संपादक। मेरे लिए यह सुखद अनुभव था। प्रणाम के साथ चरण स्पर्श किया। फिर उन्होंने मेरे और परिवार के बारे में तथा अखबारों, शहर व समाज पर बात की। देर शाम ही उन्हें वापस इंदौर जाना था। उन्हें बस स्टैंड तक पहुंचाकर लगा जैसे बहुत कुछ सीखने-समझने को मिल गया। आवाज में कड़ापन लेकिन स्नेह सरल स्वभाव व ज्ञान का भंडार। राजनीति, समाज और संस्कृति पर विचारों के साथ वही जीवन शैली।

इसके बाद ग्वालियर में भारतीय जनसंघ के एक सम्मेलन के लिए बालेश्वरजी ने मुझे उज्जैन से भिजवा दिया। वहां तो अटलजी, कुशाभाऊ ठाकरे के साथ मामाजी की निकटता देखने को मिली। वहीँ समझ में आया कि अटलजी और मामा वाजपेयी जी बहुत अच्छे मित्र हैं। भोपाल से आए एक साथी ने तो यह भी बताया कि मामाजी ही अटलजी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में लाए थे। उन दिनों पार्टी के कार्यक्रम धर्मशाला में हुआ करते थे। होटल की तो सोच ही नहीं सकते थे। सभी नेता और बाहर से आए गिने-चुने पत्रकार एक बड़े हाल में जमीन पर बिछे गादी तकिये कम्बल लेकर सोते थे। तब जनसंघ के काम, कार्यक्रमों के बारे में मामाजी से भी कुछ बातें समझने को मिलीं।  

दो वर्ष बाद कम उम्र में ही ‘नई दुनिया’ के इंदौर मुख्यालय में उप संपादक की नौकरी मिल गई, लेकिन ‘हिन्दुस्थान समाचार’ से भी संपर्क-संबंध बने रहे। इसी कारण बीच-बीच में समय होने पर ‘स्वदेश’ कार्यालय में मामाजी से मिलने जाना हुआ। वहां भी लगता नहीं था कि वह बड़े संपादक की तरह दूसरे अखबार से आये युवक से औपचारिकता दिखाएं। वही स्नेह भाव, घर, परिवार, लिखने-पढ़ने की चर्चा। दूसरी तरफ ‘नई दुनिया’ में संपादक बाबा राहुल बारपुते और राजेंद्र माथुरजी भी ‘स्वदेश’ के कई विचारों से अलग विचार रखते हुए मामाजी के स्वभाव, लेखन की धार की सराहना करते थे। उस क्षेत्र के वरिष्ठ वैद्य और समाजसेवी पंडित रामनारायण शास्त्रीजी तो मामाजी के लेखन के बहुत बड़े प्रशंसक थे। असल में मामाजी ने कानून में स्नातक की शिक्षा के बाद कुछ वर्ष शिक्षक के रूप में भी काम किया था, इसलिए सत्य, निष्ठा, ईमानदारी, संयम, अनुशासन और न्याय उनके लेखन का प्रमुख आधार होता था। मुझे याद है उनका स्तम्भ 'समय की दिशा' मेरे दादाजी और बुजुर्गों, महिलाओं तथा युवकों के बीच भी खूब पसंद किया जाता था।

बाद में 1971 में ‘हिन्दुस्थान समाचार’ में संवाददाता बनकर आना हो गया, तब ‘स्वदेश’ डाक से दिल्ली दफ्तर में आता था। कुछ समय बाद अपनी खबरों के काम के साथ लिखने की छूट बालेश्वरजी ने दी हुई थी,  इसलिए दिल्ली से ‘नई दुनिया‘ और ‘स्वदेश‘ के लिए लेख भेजने पर मामाजी का आशीर्वाद जरूर मिलता। उसी दौर में ‘पांचजन्य‘ में श्री देवेंद्र स्वरूप जी और श्री भानु प्रताप शुक्लजी के संपादक काल में भी कुछ लेख लिखे, छपे। एजेंसी में काम करने और ऐसे उदार सह्रदय संपादकों से संपर्क होने से बहुत सीखने को मिला।  मामाजी ने संघ, जनसंघ और स्वदेश के विचार और कांग्रेस के प्रति गहरे आक्रोश के बावजूद व्यक्तिगत रूप से मध्य प्रदेश के तत्कालीन प्रमुख नेता प्रकाशचंद्र सेठी के प्रति कभी निंदाजनक व्यवहार नहीं दिखाया। सेठीजी या युवा नेता महेश जोशी इंदौर में मामाजी को संपादक के रूप में पूरा सम्मान देते थे।

सबसे दिलचस्प बात यह थी कि 1962 के लोक सभा चुनाव में जनसंघ ने ग्वालियर में मामाजी यानी माणिकचंद वाजपेयी को कांग्रेस की उम्मीदवार राजमाता विजय राजे सिंधिया के खिलाफ चुनाव में खड़ा किया था। अटलजी ने मामाजी के लिए प्रचार किया था। स्वाभाविक था कि विजय तो श्रीमती सिंधिया की हुई,  लेकिन जब राजमाता जनसंघ में शामिल हो गईं तो मामाजी और अटलजी से कभी नाराज नहीं हुईं।  वजह यह थी कि वह चुनावी लड़ाई थी और मामाजी ने विचारों का विरोध किया था, निजी हमले नहीं किए थे। आपातकाल में जेल में भी रहे, लेकिन उसके बाद जनता पार्टी की सरकारें केंद्र और मध्य प्रदेश में रहने पर भी मामाजी के लेखन में व्यक्तिगत कटुता देखने को नहीं मिली। यह पत्रकारिता का आदर्श है। मामाजी की पुस्तकों-संघ की पहली अग्नि परीक्षा, आपात काल की संघर्ष यात्रा, कश्मीर का कड़वा सच और पोप का कसता शिकंजा में उनके लेखन की वैचारिक शक्ति, गहराई व धार देखी जा सकती है। मामाजी के जन्म शताब्दी वर्ष पर उनके त्यागपूर्ण प्रेरक जीवन और लेखन को नमन करते हुए यही कामना है कि वह आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरणा देते रहेंगे।

(लेखक हिन्दुस्थान समाचार, नई दुनिया, दैनिक भास्कर,हिंदुस्तान, नवभारत टाइम्स, आउटलुक हिंदी सहित पत्र पत्रिकाओं में संवाददाता और संपादक तथा एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष रहे हैं| पद्मश्री और गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार से भी इनहें सम्मानित किया जा चुका है।)

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माफ कीजिए आप सरदार भगत सिंह को रत्ती भर भी नहीं जानते: राजेश बादल

भगत सिंह जिसने असेंबली में बम फेंका था और हंसते हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया था। अगर आप भी यही जानते हैं तो माफ़ कीजिए आप सरदार भगत सिंह को रत्ती भर नहीं जानते।

राजेश बादल by
Published - Monday, 28 September, 2020
Last Modified:
Monday, 28 September, 2020
bhagat singh

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

सरदार भगत सिंह का नाम ज़ेहन में आते ही एक ऐसे जोशीले नौजवान का चेहरा उभरता है, जो अकेले दम पर हिन्दुस्तान की धरती को गोरी हुकूमत से मुक्त कराने का हौसला और जज़्बा रखता था। वही भगत सिंह जिसने असेंबली में बम फेंका था और हंसते हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया था। अगर आप भी यही जानते हैं तो माफ़ कीजिए आप सरदार भगत सिंह को रत्ती भर नहीं जानते। आज मैं आपको भगत सिंह का वह रूप दिखाना चाहता हूं जो आपके लिए एकदम नया है। यह रूप एक ऐसे पत्रकार और लेखक का है, जो अपने विचारों के तेज़ से देश की देह में हरारत पैदा कर देता था। हम और आप को वहां तक पहुंचने के लिए कई उमरें चाहिए, जहां भगत सिंह सिर्फ़ तेईस-चौबीस साल की आयु में जा पहुंचा था।

दरअसल इंसान को संस्कार सिर्फ माता पिता या परिवार से ही नहीं मिलते। समाज भी अपने ढंग से संस्कारों के बीज बोता है। पिछली सदी के शुरुआती साल कुछ ऐसे ही थे। उस दौर में संस्कारों और विचारों की जो फसल समाज और देश में उगी,  उसका असर आज भी  कहीं कहीं दिखाई देता है। उन दिनों गोरी हुक़ूमत ने ज़ुल्मों की सारी सीमाएं तोड़ दीं थीं। देशभक्तों को कीड़े मकौड़ों की तरह मारा जा रहा था। किसी को भी फांसी चढ़ा देना सरकार का शग़ल बन गया था। ऐसे में जब आठ साल के बालक भगत सिंह ने किशोर क्रांतिकारी करतार सिंह सराभा को वतन के लिए हंसते हंसते फांसी के तख़्ते चढ़ते देखा तो हमेशा के लिए करतार देवता की तरह उसके बालमन के मंदिर में प्रतिष्ठित हो गए। चौबीस घंटे करतार सिंह की तस्वीर भगत सिंह के साथ रहती थी। सराभा की फांसी के रोज़ क्रांतिकारियों ने जो गीत गाया था,  वो भगत सिंह अक्सर गुनगुनाया करता।  इस गीत की कुछ पंक्तियां थीं- 

फ़ख्र है भारत को ऐ करतार तू जाता है आज / जगत औ पिंगले को भी साथ ले जाता है आज / हम तुम्हारे मिशन को पूरा करेंगे संगियो / क़सम हर हिंदी तुम्हारे ख़ून की खाता है आज  

कुछ बरस ही बीते थे कि जलियां वाला बाग़ का बर्बर नरसंहार हुआ। सारा देश बदले की आग में जलने लगा। भगत सिंह का ख़ून खौल उठा। अवचेतन में कुछ संकल्प और इरादे समा गए। अठारह सौ सत्तावन के ग़दर से लेकर कूका विद्रोह तक जो भी साहित्य मिला, अपने अंदर पी लिया। एक एक क्रांतिकारी की कहानी किशोर भगत सिंह की ज़ुबान पर थी। होती भी क्यों न? परिवार की कई पीढ़ियां अंग्रेज़ी राज से लड़तीं आ रहीं थीं। दादा अर्जुन सिंह,  पिता किशन सिंह,  चाचा अजीत सिंह और चाचा स्वर्ण सिंह को देश के लिए मर मिटते भगत सिंह ने देखा था। चाचा स्वर्ण सिंह सिर्फ तेईस साल की उमर  में जेल की यातनाओं का विरोध करते हुए शहीद हो चुके थे। दूसरे चाचा अजीत सिंह को देश निकाला दिया गया था। दादा और पिता आए दिन आंदोलनों की अगुआई करते जेल जाया  करते थे। पिता गांधी और कांग्रेस के अनुयायी थे तो चाचा गरम दल की विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते थे। घर में घंटों बहसें होतीं थीं। भगत सिंह के ज़ेहन में विचारों की फसल पकती रही। इसीलिए 1921 में जब महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन छेड़ा तो भगत सिंह भी दसवीं की पढ़ाई छोड़ आंदोलन में कूद पड़े थे। जब आंदोलन वापस लिया गया तो सारे नौजवानों से पढ़ाई दोबारा शुरू करने के लिए कहा गया। तब इन नौजवानों के लिए लाला लाजपत राय ने नेशनल कॉलेज खोले। उनमें देशभक्त युवकों ने एडमिशन लिया था। ज़रा सोचिए! भगत सिंह पंद्रह-सोलह साल के थे और नेशनल कॉलेज लाहौर में पढ़ रहे थे। आज़ादी कैसे मिले- इस पर अपने शिक्षकों और सहपाठियों से चर्चा  किया करते थे। जितनी अच्छी हिन्दी और उर्दू,  उससे बेहतर अंग्रेज़ी और पंजाबी। इसी कच्ची आयु में भगत सिंह ने पंजाब में उठे भाषा विवाद पर झकझोरने वाला लेख लिखा। लेख पर हिन्दी साहित्य सम्मेलन ने पचास  रूपए का इनाम दिया। भगत सिंह की शहादत के बाद 28 फ़रवरी,  1933 को हिंदी संदेश में यह लेख प्रकाशित हुआ था। लेख की भाषा और विचारों का प्रवाह अदभुत है। एक हिस्सा यहां प्रस्तुत है -

"इस समय पंजाब में उर्दू का ज़ोर है। अदालतों की भाषा भी यही है। यह सब ठीक है परन्तु हमारे सामने इस समय मुख्य प्रश्न भारत को  एक राष्ट्र बनाना है। एक राष्ट्र बनाने के लिए एक भाषा होना आवश्यक है,  परन्तु यह एकदम नहीं हो सकता। उसके लिए क़दम क़दम चलना पड़ता है। यदि हम अभी भारत  की एक भाषा नहीं बना सकते तो कम से कम लिपि तो एक बना देना चाहिए। उर्दू लिपि सर्वांग -संपूर्ण नहीं है। फिर सबसे बड़ी बात तो यह है कि उसका आधार फारसी पर है। उर्दू कवियों की उड़ान चाहे वो हिन्दी (भारतीय) ही  क्यों न हो- ईरान के साक़ी और अरब के खजूरों तक जा पहुंचती है। क़ाज़ी नज़र -उल-इस्लाम की कविता में तो धूरजटी,  विश्वामित्र और दुर्वासा की चर्चा बार बार है,  लेकिन हमारे उर्दू, हिंदी,  पंजाबी कवि उस ओर ध्यान तक न दे सके। क्या यह दुःख की बात नहीं? इसका मुख्य कारण भारतीयता और भारतीय साहित्य से उनकी अनभिज्ञता  है। उनमें भारतीयता आ ही नहीं पाती,तो फिर उनके रचे गए साहित्य से हम कहां तक भारतीय बन सकते हैं? ..तो उर्दू अपूर्ण है और जब हमारे सामने वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित सर्वांग-संपूर्ण हिंदी लिपि विद्यमान है, फिर उसे अपने अपनाने में हिचक क्यों? ...हिंदी के पक्षधर सज्जनों  से हम कहेंगे कि हिंदी भाषा ही अंत में एक दिन भारत की भाषा बनेगी, परंतु पहले से ही उसका प्रचार करने से बहुत सुविधा होगी।"

 

सोलह-सत्रह बरस के भगत सिंह की  इस भाषा पर आप  क्या टिप्पणी करेंगे? इतनी सरल और कमाल के संप्रेषण वाली भाषा भगत सिंह ने चौरानवे -पंचानवे साल पहले लिखी थी। आज भी भाषा के पंडित और पत्रकारिता के पुरोधा इतनी आसान हिंदी नहीं लिख पाते और माफ़ कीजिए हमारे अपने घरों के बच्चे क्या सोलह-सत्रह की उमर में आज इतने परिपक्व हो पाते हैं? नर्सरी- के जी - वन, के जी - टू के रास्ते पर चलकर इस उमर में वे दसवीं या ग्यारहवीं में पढ़ते हैं और उनके ज्ञान का स्तर क्या होता है - बताने की ज़रूरत नहीं। इस उमर तक भगत सिंह विवेकानंद, गुरुनानक, दयानंद सरस्वती, रवींद्रनाथ ठाकुर और स्वामी रामतीर्थ जैसे अनेक भारतीय विद्वानों का एक-एक शब्द घोंट कर पी चुके थे। यही नहीं विदेशी लेखकों,  दार्शनिकों  और व्यवस्था बदलने वाले महापुरुषों में गैरीबाल्डी और मैजिनी, कार्ल मार्क्स, क्रोपाटकिन, बाकुनिन और डेनब्रीन तक भगत सिंह की आंखों के साथ अपना सफ़र तय कर चुके थे। उमर के इसी पड़ाव पर परंपरा के मुताबिक़ परिवार ने उनका ब्याह रचाना चाहा तो पिता जी को एक चिठ्ठी लिखकर चुपचाप घर छोड़ दिया। सोलह साल के भगत सिंह ने लिखा,

पूज्य पिता जी,

नमस्ते !

मेरी ज़िंदगी भारत की आज़ादी के महान संकल्प के लिए दान कर दी गई है। इसलिए मेरी ज़िंदगी में आराम और सांसारिक सुखों का कोई आकर्षण नहीं है। आपको याद होगा कि जब मैं बहुत छोटा था, तो पूज्य बापू जी (दादा जी) ने मेरे जनेऊ संस्कार के समय ऐलान किया था कि मुझे वतन की सेवा के लिए वक़्फ़ (दान) कर दिया गया है। लिहाज़ा मैं उस समय की उनकी प्रतिज्ञा पूरी कर रहा हूं। उम्मीद है आप मुझे माफ़ कर देंगे

आपका ताबेदार

भगत सिंह 

घर छोड़कर भगत सिंह उत्तर प्रदेश के  कानपुर जा पहुंचे। महान देशभक्त पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी उन दिनों कानपुर से प्रताप का प्रकाशन करते थे। उन दिनों वे बलवंत सिंह के नाम से लिखा करते थे। उनके विचारोतेजक लेख प्रताप में छपते।  उन्हें पढ़कर लोगों के दिलो दिमाग़ में क्रांति की चिनगारी फड़कने लगती। उन्हीं दिनों कलकत्ते से साप्ताहिक ‘मतवाला’ निकलता था। ‘मतवाला’ में लिखे उनके दो लेख बेहद चर्चित हुए। एक का शीर्षक था- ‘विश्व प्रेम’। पंद्रह और बाईस नवंबर 1924  को दो किस्तों में यह लेख प्रकाशित हुआ। इस लेख के एक हिस्से में देखिए भगत सिंह के विचारों की क्रांतिकारी अभिव्यक्ति -

"जब तक काला-गोरा, सभ्य-असभ्य, शासक-शासित, अमीर-ग़रीब, छूत -अछूत आदि शब्दों का प्रयोग होता है, तब तक कहां विश्व बंधुत्व और कहां विश्व प्रेम? यह उपदेश स्वतंत्र जातियां दे सकती हैं। भारत जैसा ग़ुलाम देश तो इसका नाम भी नहीं ले सकता। फिर उसका प्रचार कैसे होगा ? तुम्हें शक्ति एकत्र करनी होगी। शक्ति एकत्रित करने के लिए अपनी एकत्रित शक्ति ख़र्च कर देनी पड़ेगी। राणा प्रताप की तरह ज़िंदगी भर दर-दर ठोकरें खानी होंगी, तब कहीं जाकर उस परीक्षा में उतीर्ण हो सकोगे ....तुम विश्व प्रेम का दम भरते हो। पहले पैरों पर खड़े होना सीखो। स्वतंत्र जातियों में अभिमान के साथ सिर ऊंचा करके खड़े होने के योग्य बनो। जब तक तुम्हारे साथ कामागाटा मारु जहाज़ जैसे दुर्व्यवहार होते रहेंगे, तब तक डैम काला मैन कहलाओगे, जब तक देश में जालियांवाला बाग़ जैसे भीषण कांड होंगे, जब तक वीरागंनाओं का अपमान होगा और तुम्हारी ओर से कोई प्रतिकार न होगा, तब तक तुम्हारा यह ढ़ोंग कुछ मानी नहीं रखता। कैसी शान्ति,   कैसा सुख और कैसा विश्व प्रेम? यदि वास्तव में चाहते हो तो पहले अपमानों का प्रतिकार करना सीखो। मां को आज़ाद कराने के लिए कट मरो। बंदी मां को आज़ाद कराने के लिए आजन्म काले पानी में ठोकरें खाने को तैयार हो जाओ। मरने को तत्पर हो जाओ।" 

मतवाला में ही भगत सिंह का दूसरा लेख सोलह मई, 1925 को बलवंत सिंह के नाम से छपा। ध्यान दिलाने की ज़रूरत नहीं कि उन दिनों अनेक क्रांतिकारी छद्म नामों से लिखा करते थे। युवक शीर्षक से लिखे गए इस लेख के एक हिस्से में भगत सिंह कहते हैं -

"अगर रक्त की भेंट चाहिए तो सिवा युवक के कौन देगा? अगर तुम बलिदान चाहते हो तो तुम्हे युवक की ओर देखना होगा। प्रत्येक जाति के भाग्य विधाता युवक ही होते हैं...सच्चा देशभक्त युवक बिना झिझक मौत का आलिंगन करता है, संगीनों के सामने छाती खोलकर डट जाता है, तोप के मुंह पर बैठकर मुस्कुराता है, बेड़ियों की झनकार पर राष्ट्रीय गान गाता है और फांसी के तख्ते पर हंसते हंसते चढ़ जाता है। अमेरिकी युवा पैट्रिक हेनरी ने कहा था, 'जेल की दीवारों के बाहर ज़िंदगी बड़ी महंगी है। पर, जेल की काल कोठरियों की ज़िंदगी और भी महंगी है क्योंकि वहां यह स्वतंत्रता संग्राम के मूल्य रूप में चुकाई जाती है। ऐ! भारतीय युवक! तू क्यों गफ़लत की नींद में पड़ा बेखबर सो रहा है। उठो! अब अधिक मत सो। सोना हो तो अनंत निद्रा की गोद में जाकर सो रहो .....धिक्कार है तेरी निर्जीवता पर। तेरे पूर्वज भी नतमस्तक हैं  इस नपुंसत्व पर। यदि अब भी तेरे किसी अंग में कुछ हया बाकी हो तो उठकर माता के दूध की लाज रख, उसके उद्धार का बीड़ा उठा, उसके आंसुओं की एक एक बूंद की सौगंध ले, उसका बेड़ा पार कर और मुक्त कंठ से बोल -

वंदे मातरम !

प्रताप में भगत सिंह की पत्रकारिता  को पर लगे। बलवंत सिंह के नाम से छपे इन लेखों ने धूम मचा दी। शुरुआत में तो स्वयं  गणेश शंकर विद्यार्थी  को पता नहीं था कि असल में बलवंत सिंह कौन है ? और एक दिन जब पता चला तो भगत सिंह को उन्होंने गले से लगा लिया। भगत सिंह अब प्रताप के संपादकीय विभाग में काम कर रहे थे। इन्हीं दिनों दिल्ली में तनाव बढ़ा। दंगे भड़क उठे। विद्यार्थी जी ने भगत सिंह को रिपोर्टिंग के लिए दिल्ली भेजा। विद्यार्थी जी दंगों की निरपेक्ष रिपोर्टिंग चाहते थे। भगत सिंह उनकी  उम्मीदों पर खरे उतरे। प्रताप में काम करते हुए उन्होंने महान क्रांतिकारी शचीन्द्र नाथ सान्याल की आत्मकथा बंदी जीवन का पंजाबी में अनुवाद किया। इस अनुवाद ने पंजाब में देश भक्ति की एक नई लहर पैदा की।इसके बाद आयरिश क्रांतिकारी डेन ब्रीन की आत्मकथा का अँगरेजी से हिंदी अनुवाद किया। प्रताप में यह अनुवाद आयरिश स्वतंत्रता संग्राम शीर्षक से प्रकाशित हुआ। इस अनुवाद ने भी देश में चल रहे आज़ादी के आंदोलन को एक वैचारिक मोड़ दिया। गणेश शंकर विद्यार्थी के लाड़ले  थे भगत सिंह। उनका लिखा एक एक शब्द विद्यार्थी जी को गर्व से भर देता। ऐसे ही किसी भावुक पल में विद्यार्थी जी ने भगत सिंह को भारत में क्रांतिकारियों के सिरमौर चंद्रशेखर आज़ाद से मिलाया। आज़ादी के दीवाने दो आतिशी क्रांतिकारियों का यह अदभुत मिलन था। भगत सिंह अब क्रांतिकारी गतिविधियों में भरपूर भाग लेने लगे। साथ में पूर्ण कालिक पत्रकारिता भी चल रही थी। जब गतिविधियां बढ़ीं तो पुलिस को भी शंका हुई। खुफिया चौकसी और कड़ी कर दी गई। विद्यार्थी जी ने पुलिस से बचने के लिए भगत सिंह को अलीगढ़ ज़िले के शादीपुर गांव के स्कूल में हेडमास्टर बनाकर भेज दिया। पता नहीं शादीपुर के लोगों को आज इस तथ्य की जानकारी है या नहीं। भगत सिंह शादीपुर में थे तभी विद्यार्थी जी को उनकी असली पारिवारिक कहानी पता चली थी। दरअसल भगत सिंह के घर छोड़ने के बाद उनकी दादी की हालत बिगड़ गई थी। दादी को लगता था कि शादी के लिए उनकी ज़िद के चलते ही भगत सिंह ने घर छोड़ा है। इसके लिए वो अपने को कुसूरवार मानती थीं। भगत सिंह को पता लगाने के लिए पिताजी ने अख़बारों में इश्तेहार दिए थे। ये इश्तेहार विद्यार्थी जी ने भी देखे थे,  लेकिन तब उन्हें पता नहीं था कि उनके यहां काम करने वाला बलवंत ही भगत सिंह है।बताते हैं कि इश्तेहार प्रताप में भी छपे थे। इनमें कहा गया था कि,  'प्रिय भगत सिंह अपने घर लौट आओ। तुम्हारी दादी बीमार हैं। अब तुम पर शादी के लिए कोई दबाव नहीं डालेगा। जब विद्यार्थी जी ने विज्ञापन देखा तो उनका माथा ठनका। विज्ञापन में भगत सिंह की फोटो भी छपी थी। चेहरा बलवंत सिंह से मिलता जुलता था। उन्हें लगा कि उनके यहां काम करने वाला ही असल में भगत सिंह था। इसी के बाद उन्होंने भगत सिंह के पिता को बुलाया। दोनों शादीपुर जा पहुंचे। विद्यार्थी जी ने भगत सिंह  को मनाया कि वो अपने घर लौट जाएँ।भगत सिंह विद्यार्थी जी का अनुरोध कैसे टालते। फौरन घर रवाना हो गए। दादी की सेवा की और कुछ समय बाद पत्रकारिता की पारी शुरू करने के लिए दिल्ली आ गए। दैनिक वीर अर्जुन में नौकरी शुरू कर दी। जल्द ही एक तेज तर्राट रिपोर्टर और विचारोतेजक लेखक के रूप में उनकी ख्याति दूर दूर तक फैल गई। 

इसके अलावा भगत सिंह पंजाबी पत्रिका ‘किरती’ के लिए भी रिपोर्टिंग और लेखन कर रहे थे। ‘किरती’ में वे विद्रोही के नाम से लिखते थे। दिल्ली से ही प्रकाशित पत्रिका ‘महारथी’ में भी वे लगातार लिख रहे थे। विद्यार्थी जी से नियमित संपर्क बना हुआ था। इस कारण प्रताप में भी वो नियमित लेखन कर रहे थे। पंद्रह मार्च 1926 को प्रताप में उनका झन्नाटेदार आलेख प्रकाशित हुआ। एक पंजाबी युवक के नाम से लिखे गए इस आलेख का शीर्षक था - भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन का परिचय और उप शीर्षक था- होली के दिन रक्त के छींटे। इस आलेख की भाषा और भाव देखिए-

"असहयोग आंदोलन पूरे यौवन पर था। पंजाब किसी से पीछे नहीं रहा। पंजाब में सिक्ख भी उठे। ख़ूब ज़ोरों के साथ। अकाली आंदोलन शुरू हुआ। बलिदानों की झड़ी लग गई।"

काकोरी केस के सेनानियों को भगत सिंह ने सलामी देते हुए एक लेख लिखा। विद्रोही के नाम से। इसमें वो लिखते हैं- "हम लोग आह भरकर समझ लेते हैं  कि हमारा फ़र्ज पूरा हो गया। हमें आग नहीं लगती। हम तड़प नहीं उठते। हम इतने मुर्दा हो गए  हैं। आज वे भूख हड़ताल कर रहे हैं । तड़प रहे  हैं। हम चुपचाप तमाशा देख रहे हैं। ईश्वर उन्हें बल और शक्ति दे कि  वे वीरता से अपने दिन पूरे करें और उन वीरों के बलिदान रंग लाएं।"

जनवरी 1928 में लिखा गया यह आलेख 'किरती' में छपा था। इन दो तीन सालों में भगत सिंह ने लिखा और खूब लिखा। अपनी  पत्रकारिता के ज़रिए वो लोगों के दिलो दिमाग पर छा गए। फ़रवरी 1928 में उन्होंने कूका विद्रोह पर दो हिस्सों में एक लेख लिखा। यह लेख उन्होंने बीएस संधु के नाम से लिखा था। इसमें भगत सिंह ने ब्यौरा दिया था कि किस तरह छियासठ कूका विद्रोहियों को तोप के मुंह से बांध कर उड़ा दिया गया था। इसके भाग- दो में उनके लेख का शीर्षक था- युग पलटने वाला अग्निकुंड। इसमें वो लिखते हैं  - "सभी आंदोलनों का इतिहास बताता है कि आज़ादी के लिए लड़ने वालों का एक अलग ही वर्ग बन जाता है,  जिनमें न दुनिया का मोह होता है और न पाखंडी साधुओं जैसा त्याग। जो सिपाही तो होते थे,  लेकिन भाड़े के लिए लड़ने वाले नहीं,  बल्कि अपने फ़र्ज़ के लिए निष्काम भाव से लड़ते मरते थे। सिख इतिहास यही कुछ था। मराठों का आंदोलन भी यही बताता है। राणा प्रताप के साथी राजपूत भी ऐसे ही योद्धा थे और बुंदेलखंड के वीर छत्रसाल और उनके साथी भी इसी मिट्टी और मन से बने थे"। 

यह थी भगत सिंह की पढ़ाई। बिना संचार साधनों के देश के हर इलाक़े का इतिहास भगत सिंह को कहां से मिलता था- कौन जानता है? मार्च से अक्टूबर 1928 तक किरती में ही उन्होंने एक धारावाहिक श्रृंखला लिखी। शीर्षक था आज़ादी की भेंट शहादतें । इसमें भगत सिंह ने बलिदानी क्रांतिकारियों की गाथाएं लिखीं थी। इनमें एक लेख मदनलाल धींगरा पर भी था। इसमें  भगत सिंह के शब्दों का कमाल देखिए- "फांसी के तख़्ते पर खड़े मदन से पूछा जाता है - कुछ कहना चाहते हो ? उत्तर मिलता है - वन्दे मातरम ! मां ! भारत मां तुम्हें नमस्कार और वह वीर फांसी पर लटक गया। उसकी लाश जेल में ही दफ़ना दी गई। हम हिन्दुस्तानियों को  दाह क्रिया तक नहीं करने दी गई। धन्य था वो वीर। धन्य है उसकी याद। मुर्दा देश के  इस अनमोल हीरे को बार बार प्रणाम। भगत सिंह की पत्रकारिता का यह स्वर्णकाल था। उनके लेख और रिपोर्ताज़ हिन्दुस्तान भर में उनकी कलम का डंका बजा रहे थे। वो जेल भी गए तो वहां से उन्होंने लेखों की झड़ी लगा दी। लाहौर के साप्ताहिक वन्दे मातरम में उनका एक लेख पंजाब का पहला उभार प्रकाशित हुआ। यह जेल में ही लिखा गया था। इसकी भाषा उर्दू थी। इसी तरह किरती में तीन लेखों की लेखमाला अराजकतावाद प्रकाशित हुई। इस लेखमाला ने  व्यवस्था के नियंताओं के सोच पर हमला बोला। उनीस सौ अट्ठाइस में तो भगत सिंह की कलम का जादू लोगों के सर चढ़ कर बोला। ज़रा उनके लेखों के शीर्षक देखिए- धर्म और हमारा स्वतंत्रता संग्राम,  साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज,  सत्याग्रह और हड़तालें,  विद्यार्थी और राजनीति,  मैं नास्तिक क्यों हूं, नए नेताओं के अलग अलग विचार और अछूत का सवाल जैसे रिपोर्ताज़ आज भी प्रासंगिक हैं।इन दिनों दलितों की समस्याएं और धर्मांतरण के मुद्दे देश में गरमाए हुए हैं,  लेकिन देखिए भगत सिंह ने 90  साल पहले इस मसले पर क्या लिखा था- "जब तुम उन्हें इस तरह पशुओं से भी गया बीता समझोगे तो वो ज़रूर ही दूसरे धर्मों में शामिल हो जाएंगे। उन धर्मों में उन्हें अधिक अधिकार मिलेंगे,  उनसे इंसानों जैसा व्यवहार किया जाएगा फिर यह कहना कि देखो जी ईसाई और मुसलमान हिन्दू क़ौम को नुकसान पहुंचा रहे हैं,  व्यर्थ होगा। कितनी सटीक टिप्पणी है ? एकदम तिलमिला देती है।"

इसी  तरह एक और टिप्पणी देखिए- "जब अछूतों ने देखा कि उनकी वजह से इनमें फसाद हो रहे हैं । हर कोई उन्हें अपनी खुराक समझ रहा है तो वे अलग और संगठित ही क्यों न हो जाएं? हम मानते हैं  कि उनके अपने जन प्रतिनिधि हों। वे अपने लिए अधिक अधिकार मांगें। उठो ! अछूत भाइयो उठो! अपना इतिहास देखो। गुरु गोबिंद सिंह की असली ताक़त तुम्ही थे। शिवाजी तुम्हारे भरोसे ही कुछ कर सके। तुम्हारी क़ुर्बानियां स्वर्ण अक्षरों में लिखीं हुईं हैं। संगठित हो जाओ। स्वयं कोशिश किए बिना कुछ भी न मिलेगा। तुम दूसरों की खुराक न बनो। सोए हुए शेरो ! उठो और बग़ावत खड़ी कर दो। 

इस तरह लिखने का साहस भगत सिंह ही कर सकते थे। गोरी हुक़ूमत  ने चांद के जिस ऐतिहासिक फांसी अंक पर पाबंदी लगाईं थी,  उसमें भी भगत सिंह  ने छद्म नामों से अनेक आलेख लिखे थे। इस अंक को भारतीय पत्रकारिता की गीता माना जाता है।और अंत में उस पर्चे का ज़िक्र,  जिसने गोरों की चूलें हिला दी थीं। आठ अप्रैल, 1929  को असेम्बली में बम के साथ जो परचा फेंका गया,  वो भगत सिंह ने ही अपने हाथों से लिखा था। यह परचा कहता है - बहरों को सुनाने के लिए बहुत ऊंची आवाज़ की आवश्यकता होती है... जनता के प्रतिनिधियों से हमारा आग्रह है कि वे इस पार्लियमेंट का पाखंड छोड़कर अपने अपने निर्वाचन क्षेत्रों में लौट जाएं और जनता को विदेशी दमन और शोषण के खिलाफ क्रांति के लिए तैयार करें... हम अपने विश्वास को दोहराना चाहते हैं  कि व्यक्तियों की हत्या करना सरल है,  लेकिन विचारों की हत्या नहीं की जा सकती। 

इंक़लाब ! ज़िंदाबाद ! 

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कुलपति नहीं, खुद को मीडिया शिक्षक के रूप में देखते हैं प्रो. केजी सुरेश: मनोज कुमार

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर केजी सुरेश मध्यप्रदेश की पत्रकारिता, खासकर मध्यप्रदेश की पत्रकारिता शिक्षा में भले ही अनचीन्हा नाम हो सकता है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Friday, 25 September, 2020
Last Modified:
Friday, 25 September, 2020
kgsuresh

मनोज कुमार, वरिष्ठ पत्रकार

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर केजी सुरेश मध्यप्रदेश की पत्रकारिता, खासकर मध्यप्रदेश की पत्रकारिता शिक्षा में भले ही अनचीन्हा नाम हो सकता है लेकिन देश और दुनिया की पत्रकारिता और पत्रकारिता शिक्षा में सुप्रतिष्ठित नाम है। प्रोफेसर केजी सुरेश खांटी किस्म के पत्रकार रहे हैं। पीटीआई जैसी प्रतिष्ठित न्यूज एजेंसी में मुख्य राजनीतिक संवाददाता रहते हुए उन्होंने पत्रकारिता में नए आयाम गढ़े। पत्रकारिता एवं संचार विशेषज्ञ के रूप में दिल्ली से दुनिया भर में अपनी छाप छोडऩे वाले प्रोफेसर केजी सुरेश अपने उम्र से अधिक अनुभव रखते हैं। 26 सितम्बर को वे अपनी उम्र के एक नए पड़ाव पर होंगे और सुखद यह है कि इस बार पत्रकारिता में मील का पत्थर कहे जाने वाले स्वतंत्रता संग्राम के पुरोधा और राष्ट्रकवि पंडित माखनलाल चतुर्वेदी के नाम से स्थापित पत्रकारिता स्कूल में अपना जन्मदिन सेलिब्रेट करेंगे। संचार और पत्रकारिता में दखल रखने वाले प्रोफेसर सुरेश दादा माखनलाल के सपनों को जमीन पर उतारने के लिए कृतसंकल्पित हैं। वे कहते हैं कि ‘एमसीयू से मैं एक शिक्षक के रूप में जुड़ा रहा हूं और आगे भी मैं एक शिक्षक की भूमिका में रहना पसंद करूंगा।’

प्रोफेसर सुरेश एमसीयू को एक नई पहचान देना चाहते हैं। लीक से हटकर काम करने में उनकी रुचि रही है और इसलिए वे नए जमाने के साथ पत्रकारिता शिक्षा को आगे ले जाना चाहते हैं। एमसीयू के नए कैंपस में कम्युनिटी रेडियो और इंटरनेट रेडियो की स्थापना करने की दिशा में कार्यवाही आरंभ कर दी है। एमसीयू के लम्बे समय से स्थगित प्रकाशनों को आरंभ करना और उन्हें स्तरीय स्वरूप देने की पहल भी की है। वे मीडिया एजुकेशन के अपने अनुभव के साथ किताबी बनाने के बजाय व्यवहारिक बनाना चाहते हैं ताकि पत्रकारिता के विद्यार्थियों को मीडिया हाऊस में सम्मानजनक स्थान मिल सके। वे शिक्षण की गुणवत्ता को भी सुधारने की दिशा में चर्चा कर रहे हैं। वे परम्परागत ढंग से बाहर निकल कर आज के जमाने के साथ पत्रकारिता शिक्षा और शिक्षक को ले जाने के लिए संकल्पित हैं।  

यहां यह उल्लेख करना जरूरी हो जाता है कि एमसीयू आने के पहले प्रोफेसर केजी सुरेश स्कूल ऑफ मास मीडिया, यूनिवर्सिटी ऑफ पेट्रोलियम एंड एनर्जी स्टडीज, देहरादून में डीन के पद पर कार्य कर रहे थे। एमसीयू को एक नई सूरत देने के लिए मध्यप्रदेश शासन ने उनके नाम का चयन किया तो यह उनके लिए अवसर था। प्रोफेसर सुरेश चाहते तो जिस जगह पर थे, वहां हैंडसम सेलरी थी और आजादी भी लेकिन चुनौतियों को हाथों में लेने वाले प्रोफेसर सुरेश ने झट से हामी भर दी। बातचीत में वे बताते हैं कि एशिया के पहले पत्रकारिता विश्वविद्यालय में अपना अनुभव बांटना और यहां से नए अनुभव लेकर पत्रकारिता की नयी पीढ़ी को नई जमीन देने का उनका इरादा है। जहां तक हैंडसम सेलरी की बात है तो एक प्रतिबद्ध पत्रकार के लिए यह सब बेमानी है। वे कहते हैं कि मुझे संतोष होगा कि मध्यप्रदेश शासन और मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने मुझ पर जो भरोसा जताया है, उस पर मैं खरा उतऊं, तब मुझे संतोष होगा। स्वयं को कुलपति कहलाने के पहले वे पत्रकार कहलाना पसंद करते हैं।

प्रोफेसर केजी सुरेश का पत्रकारिता एवं संचार का फलक काफी बड़ा है। देहारदून के पहले वे भारतीय जनसंचार संस्थान के महानिदेशक रहे हैं। अपने कार्यकाल में उन्होंने आइआइएमसी को नया स्वरूप दिया। आईआईएमसी के महानिदेशक के रूप में श्री सुरेश ने भारतीय भाषा पत्रकारिता को विस्तार दिया। अपने कार्यकाल में क्रमश: मराठी और मलयालम पत्रकारिता को अपने अमरावती, महाराष्ट्र और कोट्टायम, केरल परिसर शुरू किया गया। उन्होंने उर्दू के सर्टिफिकेट कोर्स को डिप्लोमा कोर्स में परिवर्तन कर और उपयोगी बनाया। लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ के सहयोग से आयआयएमसी ने संस्कृत पत्रकारिता में तीन महीने का प्रमाणपत्र कार्यक्रम भी शुरू किया था। नए दौर की पत्रकारिता को दृष्टि में रखकर न्यू मीडिया विभाग के अलावा भारतीय भाषा पत्रकारिता विभाग की भी स्थापना का श्रेय भी उन्हें जाता है। इसके अलावा भारत में सामुदायिक रेडियो स्टेशनों को बढ़ावा देने के लिए आयआयएमसी में सामुदायिक रेडियो केंद्र की स्थापना और पूरे भारत में मीडिया शिक्षकों के प्रशिक्षण और कौशल उन्नयन के लिए राष्ट्रीय मीडिया संकाय विकास केंद्र की स्थापना शामिल हैं। 

प्रो. सुरेश प्रतिष्ठित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली की अकादमिक परिषद के सदस्य हैं। सोसाइटी ऑफ सत्यजीत रे फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट, कोलकाता, भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद की अनुसंधान समिति, सलाहकार परिषद, दिल्ली स्कूल ऑफ जर्नलिज्म, दिल्ली विश्वविद्यालय, अकादमिक परिषद, हिमाचल प्रदेश के केंद्रीय विश्वविद्यालय और स्कूल ऑफ अबनिंद्रनाथ टैगोर स्कूल ऑफ क्रिएटिव आर्ट्स एंड कम्युनिकेशन स्टडीज, असम विश्वविद्यालय, सिलचर के साथ स्कूल ऑफ मॉर्डन मीडिया के साथ भी संबद्ध रहे। प्रोफेसर सुरेश विज्ञान और प्रौद्योगिकी संचार, विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग की राष्ट्रीय परिषद की पुरस्कार चयन समिति के सदस्य हैं। डीडी न्यूज नईदिल्ली में वरिष्ठ सलाहकार के रूप में जुड़े रहे। इसके साथ ही एशियानेट न्यूज़ नेटवर्क में संपादकीय सलाहकार एवं डालमिया भारत एंटरप्राइजेज में गु्रप मीडिया सलाहकार भी रहे। प्रोफेसर सुरेश जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में आपदा अनुसंधान के लिए विशेष केंद्र में संचार कौशल के लिए प्रभारी प्रोफेसर रहे हैं। 

प्रोफेसर सुरेश को राष्ट्रमंडल युवा कार्यक्रम एशिया द्वारा राष्ट्रमंडल युवा राजदूत नामित किया गया था। मीडिया में रिसर्च के लिए प्रेम भाटिया फैलोशिप प्राप्तकर्ता प्रोफेसर सुरेश को पीआरएसआई लीडरशिप अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है। नवंबर 2018 में बिजनेस वर्ल्ड मैगज़ीन और एक्सचेंज4मीडिया द्वारा स्थापित मीडिया शिक्षा पुरस्कार, एकता, ब्रदरहुड और सांप्रदायिक सद्भाव और लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड के लिए पहला ख्वाजा गरीब नवाज अवॉर्ड से मीडिया शिक्षा में योगदान के लिए सम्मानित किया गया। इस वर्ष केन्द्रीय हिन्दी संस्थान का प्रतिष्ठित ‘गणेश शंकर विद्यार्थी सम्मान’ से सम्मानित किया गया।

प्रोफेसर सुरेश भारत के अंतरराट्रीय फिल्म महोत्सव के लिए भारतीय पैनोरमा 2018 और 2017 के प्रतिष्ठित फीचर फिल्म जूरी और नॉन-फिक्शन जूरी के सदस्य थे। मार्च 2015 में सियोल में वर्ल्ड मीडिया कॉन्फ्रेंस में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले एकमात्र पत्रकार हैं। प्रोफेसर सुरेश अफगानिस्तान, पाकिस्तान, चीन, नेपाल, श्रीलंका, इंडोनेशिया, दक्षिण कोरिया, जापान, यूनाइटेड किंगडम, स्विट्जरलैंड, ऑस्ट्रिया, हंगरी, कतर, मॉरीशस, दक्षिण अफ्रीका सहित पूरे भारत और दुनिया की यात्रा कर मीडिया शिक्षा में भारत के दृष्टिकोण से पूरी दुनिया को अवगत कराया है।

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दीनदयाल उपाध्याय जी का एकात्म मानववाद व अंत्योदय नोबल पुरस्कार का असली हकदार है: पूरन डावर

आज ही के दिन यानी 25 सितंबर 1916 को हमें पंडित दीनदयाल उपाध्याय के रूप में एक दार्शनिक, समाजशास्त्री, अर्थशास्त्री एवं कुशल राजनीतिज्ञ मिले थे।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Friday, 25 September, 2020
Last Modified:
Friday, 25 September, 2020
Puran Dawar

पूरन डावर, चिंतक एवं विश्लेषक।।

अंत्योदय एवं एकात्म मानववाद की अवधारणा के प्रणेता जनसंघ के अध्यक्ष रहे स्वर्गीय पंडित दीनदयाल उपाध्याय, जब तक पंक्ति में खड़े अंतिम व्यक्ति तक सेवा नहीं पहुंचती, तब तक देश विकसित नहीं कहला सकता, इस सोच के साथ जिस चिंतक ने राजनीति में शुचिता की कल्पना की, देश का दुर्भाग्य कि उन्हें हमने समय से पहले खो दिया।

आज ही के दिन यानी 25 सितंबर 1916 को हमें पंडित दीनदयाल उपाध्याय के रूप में एक दार्शनिक, समाजशास्त्री, अर्थशास्त्री एवं कुशल राजनीतिज्ञ मिले थे। पंडित उपाध्याय ने एक ऐसे राष्ट्र के निर्माण की कल्पना की थी, जहां विकास अंतिम पंक्ति के व्यक्ति तक पहुंचे। वह वर्गहीन, जातिहीन और संघर्षमुक्त सामाजिक व्यवस्था के समर्थक थे। इस दिशा में नि:संदेह काफी प्रयास किए गए हैं, लेकिन फिर भी काफी कुछ किया जाना शेष है।

ये कहना गलत नहीं होगा कि मौजूदा वक्त में दुनिया जिस मोड़ पर खड़ी है, वहां पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचारों को आत्मसात करना बेहद जरूरी हो गया है। पूंजीवादी एवं समाजवादी विचारधाराएं हमें आगे होने का अहसास तो करा रही हैं, लेकिन इस अहसास में एक खोखलापन है। पंडित उपाध्याय को इस खोखलेपन का भान था, इसलिए वे कहते थे कि पूंजीवादी एवं समाजवादी विचारधाराएं केवल हमारे शरीर एवं मन की आवश्यकताओं पर विचार करती हैं और इसलिए वे भौतिकवादी उद्देश्य पर आधारित हैं, जबकि संपूर्ण मानव विकास के लिए इनके साथ ही आत्मिक विकास भी आवश्यक है।

दीनदयाल उपाध्याय जितने अच्छे राजनेता थे, उतने ही उच्च कोटि के चिंतक, विचारक और लेखक भी थे। वह केवल समस्या पर ध्यान आकर्षित नहीं करते थे, बल्कि उसका समाधान बताने में भी विश्वास रखते थे। उन्होंने दुनिया को ‘अंत्योदय’ से परिचित कराया। एक ऐसा विचार जो सबसे पहले और सबसे अधिक सहायता उस व्यक्ति को उपलब्ध कराने पर जोर देता है, जिसकी जरूरत सबसे अधिक है। सरल शब्दों में कहें तो जरूरतमंदों में से एक ऐसे व्यक्ति का चुनाव करना, जिसे मदद की दरकार सबसे ज्यादा हो और फिर उसी से शुरुआत करते हुए प्रत्येक व्यक्ति तक सहायता पहुंचाना। पंडित उपाध्याय मानते थे कि जिस झोपड़ी में पहले से ही दीया जल रहा है, वहां बल्ब लगाने से बेहतर होगा कि पहले उस घर को रोशन किया जाए, जो अंधकार में डूबा है। अंधेरे में जलाया गया एक छोटा सा दीया भी उम्मीदों के उजाले का प्रतीक बन सकता है।

पंडित दीनदयाल के चिंतन को मुख्यत: अंत्योदय के रूप में याद किया जाता है, लेकिन एकात्म मानववाद भी उनकी दूरदृष्टि को दर्शाता है। उनके द्वारा स्थापित एकात्म मानववाद की परिभाषा वर्तमान परिप्रेक्ष्य में ज्यादा सामयिक है। दीनदयाल उपाध्याय कहते थे कि जिस प्रकार मनुष्य का शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा के ठीक रहने पर वह चरम सुख और वैभव की प्राप्ति कर सकता है, ठीक उसी तरह यदि समाज के प्रत्येक तबके पर ध्यान दिया जाए तो भारत को आदर्श राष्ट्र बनने से कोई नहीं रोक सकता। एकात्म मानववाद का उद्देश्य एक ऐसा स्वदेशी सामाजिक-आर्थिक मॉडल विकसित करना था, जिसमें विकास के केंद्र में मानव हो। यानी, व्यक्ति एवं समाज की आवश्यकता को संतुलित करते हुए प्रत्येक व्यक्ति को गरिमापूर्ण जीवन प्रदान करना। यह व्यक्तिवाद का खंडन करता है और एक पूर्ण समाज के निर्माण के लिए परिवार तथा मानवता के महत्व को प्रोत्साहित करता है।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने कई दशक पहले ही आज की समस्या और उसके समाधान को रेखांकित कर दिया था। वे दूरदृष्टा थे, उन्हें पता था कि आजादी के बाद जिस तरह से पश्चिमी संस्कृति, विचारधारा को अपनाने की इच्छाएं जन्म ले रही हैं, वो आगे चलकर एक नई समस्या को जन्म देंगी। विकास की दौड़ में वह व्यक्ति सबसे पीछे छूट जाएगा, जिसके विकास के नाम पर सब कुछ किया जा रहा है। पंडित उपाध्याय के दर्शन, विचारों को पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है, जैसे मौजूदा परिस्थितियों, समस्याओं को देखकर उनका आकलन करके ही उन्होंने उन्हें लिखा है। आज यदि पंडित दीनदयाल उपाध्याय हमारे बीच होते तो अपनी उपलब्धियों के लिए उन्हें नोबल मिलना तय था।

11 फरवरी 1968 को वह हम सबको छोड़कर दुनिया से रुखसत हो गए। उनका निधन आज तक पहेली बना हुआ है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय लखनऊ से पटना जा रहे थे, इसी दौरान उनका शव मुगलसराय रेलवे यार्ड में पाया गया। उनकी मौत की गुत्थी सुलझाने के लिए सीबीआई से भी जांच कराई गई, मगर कुछ हासिल नहीं हुआ। आज मुगलसराय स्टेशन का नाम दींनदयाल नगर रखकर उनकी स्मृति को संजोया गया है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय की अंत्योदय की अवधारणा से प्रेरित होकर ही अंत्योदय अन्नपूर्णा सेवा शुरू की। उनके अवतरण दिवस पर उनकी स्मृति को पुन: नमन।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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