मोदी की शानदार उपलब्धि पर ZEE समूह के पुनीत गोयनका ने जताई ये उम्मीद

लोकसभा चुनाव 2019 में एनडीए को मिला है पूर्ण बहुमत

Last Modified:
Friday, 24 May, 2019
Media Industry

लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजे आ चुके हैं और इनमें बीजेपी ने शानदार जीत दर्ज करते हुए केंद्र की सत्ता में वापसी की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार दूसरी बार पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाएंगे। मोदी के नेतृत्व में पार्टी ने पहली बार 300 से ज्यादा सीटें जीती हैं। हालांकि एग्जिट पोल में भी मोदी के नेतृत्व में एनडीए को सबसे ज्यादा सीटें दिखाई गई थीं और परिणाम आते ही इस पर मुहर भी लग गई।

बीजेपी की इस बड़ी जीत के बाद केंद्र में बनने वाली नई सरकार को लेकर मीडिया इंडस्ट्री से जुड़े लोग क्या सोचते हैं और उनकी इस सरकार से क्या अपेक्षाएं हैं? इस बारे में हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) ने इंडस्ट्री से जुड़े कुछ विशेषज्ञों से बात की।

इस बारे में ‘जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड’ (Zee Entertainment Enterprises Ltd) के एमडी और सीईओ पुनीत गोयनका का कहना है, ‘मेरे विचार से ट्रांसपैरेंसी और टेक्नोलॉजी दो प्रमुख पहलू हैं, जो मीडिया और एंटरटेनमेंट सेक्टर को आगे ले जाएंगे। सरकार को भी इस दिशा में अपने प्रयास जारी रखने चाहिए। हमारे देश में प्रतिभाओं और रचनात्मकता की भरमार है, जिसे आगे बढ़ाने और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने की जरूरत है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जीत पर मैं उन्हें बधाई देता हूं। कॉरपोरेट जगत को परिवर्तन के इस युग में शामिल होना चाहिए और राष्ट्र को वैश्विक महाशक्ति बनाने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।’

वहीं, ‘मलयाला मनोरमा’ (Malayala Manorma) के वाइस प्रेजिडेंट (सेल्स, मार्केटिंग और एडवर्टाइजिंग) वर्गीस चांडी का कहना है,‘मोदी की जीत को लेकर किसी तरह का आश्चर्य नहीं है, पहले से ही अनुमान लगाया जा रहा था कि मोदी ही सत्ता में वापसी करेंगे। हां, बीजेपी और एनडीए के लिए इतने बहुमत से जीतना वाकई आश्चर्यजनक है। पार्टी को पूर्ण रूप से बहुमत मिलने पर यह अपने एजेंडे के अनुसार चल पाएगी और मुझे उम्मीद है कि इससे देश का विकास होगा।

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‘बाजार के दबाव में आकर डे मनाने वालों के लिये सीख है ये जवाब’

जब मां-बाप अपने बच्चों से हारते हैं तो सही मायने में विजेता होते हैं

Last Modified:
Saturday, 15 June, 2019
Manoj Kumar

मनोज कुमार, वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया विश्लेषक।।

छोटी ही रहना चाहती हूं...पापा

अखबार पढ़ते हुये अचानक नजर पड़ी कि फादर्स डे आना वाला है। फादर्स डे जैसा चलन नए जमाने का है। सही मायनों में यह दिन पिता का दिन नहीं, बल्कि बाजार का दिन है। भारतीय संस्कृति में पिता का दिन अर्थात वह दिन जब उनकी मृत्यु के पश्चात उनकी शांति के लिए तर्पण करते हैं। श्राद्ध पक्ष में यह क्रिया दिवंगत हो चुके परिवार के हर व्यक्तियों के लिए होती है, लेकिन नए जमाने में पिता के इस खास दिन को बिसरा दिया गया है। पिता हो, माता हो, दादा-दादी हो या जीवनसाथी, बाजार ने सबके लिए दिन नियत कर दिया है। यह दिन बाजार के लिए उत्सव का है, लेकिन भारतीय संस्कृति और परम्परा के तर्पण का दिन है। हालांकि इस खराब हालात के बाद भी मेरा भरोसा टूटा नहीं है। छीजा नहीं है।

बदलते समय और स्कूल से कॉलेज जाती बिटिया के मन की बात जान लेना आसान नहीं होता है। कदाचित कुछ भय और कुछ भरोसे के साथ उससे सवाल करने का मन किया। मन में जिज्ञासा थी और लगा कि अपनी बिटिया से पूछूं कि वो इस फादर्स डे पर मेरे लिए अर्थात अपने फादर के लिए क्या करने वाली है। मैंने सहज भाव से पूछ ही लिया कि बेटा, फादर्स डे आने वाला है। तुम अपने फादर अर्थात मेरे लिये क्या करने वाली हो? वह मेरा सवाल सुनकर मुस्करायी और मेरे सामान्य ज्ञान को बढ़ाते हुये कहा कि हां, पापा मुझे पता है कि फादर्स डे आने वाला है। अच्छा आप बताओ कि आप मेरे लिये क्या करने वाले हो? मैंने कहा कि दिन तो मेरे लिए है, फिर मैं क्यों तुम्हारे लिये कुछ करने लगा। तुम्हें मेरे लिये करना चाहिये? इसके बाद हम बाप-बेटी के बीच जो संवाद हुआ, वह एक दार्शनिक संवाद  जरूर था, लेकिन इस तरह बाजार के दबाव में आकर डे मनाने वालों के लिये सीख भी है।

बेटी ने कहा कि पहली बात तो यह कि मैं अभी आपकी इनकम पर अपना भविष्य बना रही हूं और जो कुछ भी करूंगी, आपके जेब से निकाल कर ही करूंगी। ऐसे में आपके लिये कुछ करने का मतलब आपको खुश करने के बजाय दुखी करना होगा, क्योंकि जितने पैसों से मैं आपके लिये उपहार खरीदूंगी, उतने में आप हमारी कुछ जरूरतें पूरी कर सकेंगे। तो इसका मतलब यह है कि जब तुम कमाने लगोगी तो फादर्स डे सेलिब्रेट करोगी। अपने पापा के लिये उपहार खरीदोगी? इस बार भी बिटिया का जवाब अलग ही था। नहीं पापा, मैं चाहे जितनी बड़ी हो जाऊं, जितना कमाने लगूं लेकिन कभी इतनी बड़ी न हो पाऊं कि अपने पापा को उपहार देने की मेरी हैसियत बने। जिस पापा ने अपनी नींद खोकर मेरी परिवरिश की, जिस पापा ने अपनी जरूरतों को कम कर मेरी जरूरतों को पूरा करने में पूरा समय और श्रम लगा दिया, जिस पापा ने मेरे सपनों को अपना सपना मानकर मुझे बड़ा किया, उस पापा को भला मैं क्या दे सकती हूं। और पापा ही क्यों, मम्मी, दादाजी, दादीजी सब तो मिलकर मुझे बनाने की कोशिश कर रहे हैं, फिर भला मैं कैसे आप लोगों के लिये उपहार खरीदने की हिम्मत कर सकती हूं।

बिटिया की बातों को सुनकर मेरी आंखें भर आयीं। मुझे लगा कि मैंने जो कुछ किया, वह निरर्थक नहीं गया। बेटी के भीतर वह सबकुछ मैंने समाहित कर दिया, जो मुझे मेरे पिता से मिला था। मुझे लगा कि फादर्स डे पर इससे अच्छा कोई उपहार हो भी नहीं सकता है। जब मां-बाप अपने बच्चों से हारते हैं तो सही मायने में विजेता होते हैं। हारते हुये माता-पिता को सही मायने में खुशी मिलती है, क्योंकि बच्चों की जीत ही माता-पिता की असली जीत है। हमारे समाज में ये जो डे मनाने का रिवाज चल पड़ा है, यह भारतीय नहीं, बल्कि यूरोपियन देशों की देन है। भौतिक जरूरतों की चीजों में उनके रिश्ते बंधे होते हैं और वे हर रिश्ते को वस्तु से तौलते हैं, लेकिन भारतीय मन भावनाओं की डोर से बंधा होता है। वस्तु हमारे लिये द्वितीयक है, प्रथम भावना होती है और आज मेरी बेटी ने जता दिया कि वह जमाने के साथ दौड़ रही है, लेकिन अपनी संस्कृति और संस्कार को सहेजे हुये। अपनी भावनाओं के साथ, अपने परिजनों की भावनओं की कद्र करते हुये। वह बाजार जाकर कुछ सौ रुपयों के तोहफों से भावनाओं का व्यापार नहीं कर रही है। यह मेरे जैसे पिछड़ी सोच के बाप के लिये अनमोल उपहार है।

भारतीय समाज में भी डे मनाने की पुरातन परमपरा है। हम लोग यूरोपियन की तरह जीवित लोगों के लिये डे का आयोजन नहीं करते हैं, बल्कि उनके हमारे साथ नहीं रहने पर करते हैं। उनकी मृत्यु की तिथि पर उनके पसंद का भोजन गरीबों को खिलाया जाता है, वस्त्र इत्यादि गरीबों में वितरित किया जाता है। यह हम उनकी आत्मा की प्रसन्नता के लिये करते हैं, इसे हम पितृपक्ष कहते हैं। जीते जी हम उन्हें भरपूर सम्मान देते हैं और मरणोपरांत भी उनका स्थान हमारे घर-परिवार के बीच में होता है। दुर्भाग्य से हम यूरोपियन संस्कृति के साथ चल पड़ हैं। सक्षम पिता या माता का डे तो मनाते हैं, लेकिन वृद्ध होते माता-पिता को वृद्वाश्रम पहुंचाने में देर नहीं करते हैं। बाजार जिस तरह अनुपयोगी चीजों की सेल लगाता है या चलन से बाहर कर देता है, वही हालत यूरोपियन समाज में रिश्तों का है, भावनाओं का है। हम भी इसी रास्ते पर चल पड़े हैं। पालकों के पास धन है, साधन है, सक्षम हैं तो दिवस है और नहीं तो उनके लिये दिल तो क्या, घर पर स्थान नहीं है।

मैं अभी भी उम्मीद से हूं कि जो संस्कार मेरे परिवार ने मुझे और मेरे बच्चों को दिए हैं, उन्हें वे सहेज कर रख रहे हैं। मेरा मन उस समय पुलकित हो गया, जब इस पाश्चात्य तर्पण दिवस अर्थात फादर्स डे पर अपनी बिटिया से बात की। मेरी आंखें नम हो गयीं, लेकिन भीतर का पिता गौरवान्वित हो उठा कि बाजार में इतना दम अभी भी नहीं आया है कि वे हमारी परम्परा और संस्कार को खत्म कर दे। हालांकि बाजार का घुन हमारे रीति-रिवाज पर लग गया है, लेकिन भरोसे का एक टिमटिमाता तारा मेरे आसपास है। आपके आसपास भी होगा। तलाश कीजिए आपके बच्चों में भी वही संस्कार हैं, विश्वास है और आपके प्रति भरोसा। थोड़ी कोशिश कीजिए। फादर बनकर जरूरत पूरी करने वाली मशीन बनकर नहीं, बल्कि सात्विक रूप से बाबूजी बनकर बच्चों को समय दीजिए।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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मिस्टर मीडिया: यह भारतीय कानून का पुलिस-प्रशासन और सियासत के लिए फरमाइशी चेहरा है

रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स की रिपोर्ट में हिन्दुस्तान को प्रेस के नजरिए से लाल खतरे का निशान दिखाया गया है

by राजेश बादल
Published - Thursday, 13 June, 2019
Last Modified:
Thursday, 13 June, 2019
Rajesh Badal

सुप्रीम कोर्ट में कुतर्क। राज्य सरकार का कुतर्क-प्रशांत कनौजिया का ट्वीट अपमानजनक था। उस ट्वीट पर ग्यारह दिन जेल में। ट्वीट क्या था? एक महिला खुद को मुख्यमंत्री की मित्र बताती है। कैमरे पर संवाददाताओं से कहती है कि उसने मुख्यमंत्री को विवाह प्रस्ताव भेजा है। सार्वजनिक जीवन में राजनेताओं को कभी-कभी इस तरह की अप्रिय स्थितियों का सामना करना पड़ता है। पर इसमें इतना अपमानजनक क्या है,समझ नहीं आया।

उत्तर प्रदेश सरकार बीते चुनाव के दौरान सोशल मीडिया के सभी प्लेटफॉर्म पर की गई टिप्पणियों की जानकारी ले तो पता चलेगा कि उसके ही राज्य में कितनी भद्दी, अश्लील, अपमानजनक और स्तरहीन बातें कही गई हैं। अगर प्रदेश पुलिस को उन टिप्पणियों में कुछ अपमान नहीं दिखाई देता तो इस कथन में तो कुछ अपमानजनक था ही नहीं। एक वयस्क महिला 2019 के भारत में किसी भी बालिग व्यक्ति को विवाह का आमंत्रण भेजने के लिए क्यों स्वतंत्र नहीं है? इसमें अनुचित क्या है? मुख्यमंत्री इस प्रस्ताव को अस्वीकार करने का हक रखते हैं। यह तो उल्टा पुलिस के विरुद्ध महिला अपमान का मामला बनता है।

चिंता का आकार इस मामले से कहीं बहुत बड़ा, विकराल और भयावह है। सत्ता प्रतिष्ठान किस राजनीतिक और सार्वजनिक शुचिता तथा आचरण की बात करते हैं? मीडिया उनके निजी व्यवहार पर कोई टिप्पणी न करे, लेकिन राजनेताओं को यह आजादी कौन सा कानून देता है कि वे अपने राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ ओछी और अपमानजनक भाषा का उपयोग करने में कोई संकोच नहीं करते। मीडिया पर तुगलकी कार्रवाई करते हैं। वे सार्वजनिक तौर पर महिला की लात-घूँसे से पिटाई करते हैं। बदनामी होती है तो बहन बनाने में शर्म का अनुभव तक नहीं करते। जिस पर गुजरात पुलिस को सुओ मोटो (Suo moto) एक्शन लेना था, वह तो हुआ नहीं और उत्तर प्रदेश में महिला का अपमान हो तो समाचार प्रसारित करने पर पत्रकार सीखचों के पीछे कर दिया जाए। यह भारतीय कानून का पुलिस-प्रशासन और सियासत के लिए फरमाइशी चेहरा है।

ज्यादा दिन पुरानी बात नहीं है। दो बरस पहले छत्तीसगढ़ में 14 पत्रकारों को हिरासत में लिया गया था। वरिष्ठ पत्रकार विनोद वर्मा की गिरफ्तारी और उनके परिवार को मानसिक यातना हम कैसे भूल सकते हैं? छत्तीसगढ़ पुलिस को आज तक कोई सुबूत नहीं मिला। 2017 में भारत में दस पत्रकारों की हत्या हुई। रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स की रिपोर्ट में हिन्दुस्तान को प्रेस के नजरिए से लाल खतरे का निशान दिखाया गया है। तत्कालीन गृह मंत्री राजनाथ सिंह के निर्देश पर 20 अक्टूबर को उनके मंत्रालय ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया था। पर उसका खुद उन राज्यों में ही पालन नहीं हुआ, जहां बीजेपी सरकार थी। इससे पहले 23 मई को भी ऐसे ही निर्देश दिए गए थे। और पीछे जाएं तो एक अप्रैल 2010 को भी गृह मंत्रालय ने यही घड़ियाली अभिनय किया था।

पत्रकारों पर दमनकारी कार्रवाई के चलते पहले अनेक मुख्यमंत्री अपनी बलि चढ़ा चुके हैं। बिहार प्रेस बिल और उसके बाद 1987 का प्रेस कानून सियासी दलों को भूलना नहीं चाहिए। अगर एक बार बर्र के छत्ते में सियासी दल और नेता हाथ डालेंगे तो अंजाम क्या होगा-यह बताने की जरूरत नहीं है। हां, अपने को सावधान और अधिक जिम्मेदार बनाने की आवश्यकता है मिस्टर मीडिया!

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

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'जिस लोकतंत्र ने एक साधारण घर के युवक को CM-PM बनाया, उसके मूल को कुचलना फासीवाद है'

पत्रकारों के खिलाफ यूपी पुलिस की ओर से की गई कार्रवाई निहायत ही निंदनीय है

Last Modified:
Wednesday, 12 June, 2019
Ajay Shukla

अजय शुक्ल, वरिष्ठ पत्रकार।।

बीते कुछ दिनों के दौरान स्वतंत्र और निष्पक्ष काम करने की कोशिश करने वाले पत्रकारों पर हमले हो रहे हैं। सत्ता प्रतिष्ठान लोकतंत्र और लोक संस्थाओं को मजबूत बनाने के बजाय फासीवादी तरीका अपना रहे हैं। प्रशांत कनौजिया सहित जिन चार पत्रकारों को यूपी के मुख्यमंत्री अजय सिंह बिष्ट उर्फ योगी आदित्यनाथ से कथित संबंधों का आरोप लगाने वाली महिला के बयान को चैनल में चलाने और सोशल मीडिया पर प्रसारित करने पर डकैतों की तरह गिरफ्तार किया गया, वह निहायत निंदनीय है।

हम प्रशांत सहित इन चारों पत्रकारों को निजी तौर पर नहीं जानते, मगर उनके खिलाफ हुई पुलिसिया कार्रवाई को पूर्णतः असंवैधानिक एवं लोकतंत्र की हत्या की तरह मानते हैं। एक दिन पहले शामली जिले में एक थानेदार ने समाचार संकलन कर रहे संवाददाता को जिस तरह से मारा-पीटा और अमानवीय यातनायें दीं, वह किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं हैं। मर्यादायें सभी के लिए समान होती हैं। निश्चित रूप से उच्च पदों पर बैठे लोगों को मर्यादाओं का कड़ाई से पालन करना चाहिए। मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने प्रजा के लिए मर्यादा का हृदय से निर्वहन किया। प्रजा को अपने खिलाफ बोलने पर दंडित करने के बजाय पत्नी सीता का त्याग किया था। योगी आदित्यनाथ जैसे लोग खुद को राम का अनुयायी बताते हैं, मगर आचरण उनके विपरीत करते हैं।

असल में तो कार्यवाही उस महिला के खिलाफ होनी चाहिए थी, न कि उसकी बात प्रसारित करने वाले पत्रकारों के खिलाफ। आदित्यनाथ खुद को योगी और संत होने का दंभ भरते हैं तो उन्हें समझना चाहिए कि संत कौन है? तुलसीदास ने रामचरित मानस में स्पष्ट लिखा है, ‘संत हृदय नवनीत समाना। कहा कबिन्ह परि कहै न जाना॥ निज परिताप द्रवइ नवनीता। पर सुख द्रवहिं संत सुपुनीता॥’ इसका भावार्थ है, कवियों ने कहा है कि संतों का हृदय मक्खन के समान होता है, परंतु वो सही बात नहीं कह पाये, क्योंकि मक्खन तो खुद पर ताप लगने से पिघलता है, किंतु परम पावन संत दूसरों के दुःख से पिघलते हैं न कि अपने कष्ट से।

हमारे कहने का अभिप्राय यह है कि योगी आदित्यनाथ को अपने राज्य के लोगों के कष्टों को महसूस करके कष्ट होना चाहिए, न कि खुद के हल्के से कष्ट से। बतौर यूपी के राजसत्ता प्रमुख भी उन्हें जनता से सरोकार होना चाहिए और आलोचनाओं को आत्मसात करके सीख लेनी चाहिए। इस वर्ष विश्व प्रेस स्वतंत्रता इंडेक्स में भारत का शर्मनाक स्थान हो गया है। 180 देशों में भारत 140वें स्थान पर पहुंच गया है। हम विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र होने का दम भरते हैं, मगर हमारे सत्ता प्रतिष्ठान ने हालात लोकतंत्र का गला घोंटने जैसे कर दिये हैं। सरकार और उसके तंत्र ने संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को खत्म करने का मन बना लिया लगता है।

जिस तरह से पत्रकारों को मौजूदा सरकार में सामान्य सटायर और किसी के आरोप की खबर चलाने पर जेल में डाला जा रहा है। विद्यार्थियों की समस्याओं को लेकर प्रदर्शन करने वाली लड़की पर गैंगेस्टर लगाया जा रहा है। अन्य मनगढ़ंत मुकदमे दर्ज किये जा रहे हैं, वह पत्रकारों को डराने, भय पैदा करने वाला है। इस माहौल के जरिए शायद यह संदेश दिया जा रहा है कि अभी कुछ नहीं किया। आगे अगर हम पर कोई टीका टिप्पणी की तो गला घोंट देंगे या पत्थरों से पीट-पीटकर मार डालेंगे।

योगी आदित्यनाथ शायद लोकतंत्र का अर्थ ही नहीं समझते। निश्चित रूप से उनकी ईमानदारी और चरित्र संदेह के दायरे से बाहर है। यह भी सच है कि एक महिला ने आरोप लगाया, भले ही उसमें सच्चाई कुछ न हो। पत्रकार जज नहीं हो सकते, उनका दायित्व है कि दोनों पक्षों की बात रखें। अपनी और दूसरे की मर्यादा का भी पूरी सावधानी से ध्यान रखें। किसी की मर्यादा भंग नहीं होनी चाहिए। योगीजी सत्ता प्रतिष्ठान की यह महती जिम्मेदारी है कि वह आलोचकों, समीक्षकों, कार्टूनिस्टों और सटायरों का आनंद लें, उनसे सीखने का काम करें।

हमें दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि अब तक यूपी पुलिस और कुछ कथित कट्टरवादियों ने लोकतंत्र को खत्म करने का बीड़ा उठा रखा है। यह लोग गुंडों- बदमाशों की तरह साधारण लोगों अथवा पत्रकारों के साथ व्यवहार कर रहे हैं। जिस लोकतंत्र ने एक साधारण घर के युवक को मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री बनाया है, उसके मूल को कुचलना फासीवाद है।

दुखद स्थिति पत्रकारों को भी देखकर होती है, क्योंकि वह भी खांचों में बंट गए हैं। कोई भाजपाई, कोई कांग्रेसी और कोई लाल सलामी बन गया है। पत्रकार को सिर्फ पत्रकार रहते हुए ईमानदारी से समीक्षा करनी चाहिए, न कि किसी के निजी जीवन पर हमला करना चाहिए। योगी जी, हृदय बड़ा कीजिए, संतों की तरह। संकुचित मानसिकता मत रखिए और सत्ता के घमंड में मदमस्त मत होइये। जयहिंद।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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इस्लामी देशों के मंच पर पाकिस्तान की फिर बेइज्जती

कश्मीर के मुद्दे पर पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी के भाषण को खास तवज्जो नहीं दी गई

Last Modified:
Wednesday, 05 June, 2019
IOC

टीपी पाण्डेय, वरिष्ठ पत्रकार।।

विश्व बिरादरी के बीच अलग-थलग पड़ चुका पाकिस्तान अब भी कश्मीर का राग अलापने से बाज नहीं आ रहा। ये हालत तब है, जब इस्लामी देशों के सम्मेलन आईओसी में पाकिस्तान को इस बार भी बुरी तरह मुंह की खानी पड़ी। सऊदी अरब के मक्का में आईओसी का 14वां सम्मेलन था, जिसके दो सत्र थे। पहले सत्र में इस्लामी देशों के विदेश मंत्रियों ने आपसी संबंधों के बारे में अपना नज़रिया रखा, जिसमें पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने कश्मीर के मुद्दे पर भी प्रमुखता से चर्चा की,मगर इसमें उन्के भाषण को खास तवज्जो नहीं दी गई।

अगले सत्र में सम्मेलन को पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने संबोधित किया, जिसमें उन्होंने फिलिस्तीन में इज़रायली ज़्यादतियों के साथ-साथ कश्मीर का बेसुरा राग छेड़ दिया, मगर इसका नतीजा भी सिफर रहा। इमरान के भाषण को सुना तो गया, लेकिन इसके बाद जो प्रस्ताव पारित हुआ, उसमें कश्मीर का कोई ज़िक्र नहीं था। साफ है कि इस्लामी देशों ने कश्मीर पर इमरान की बात को कोई तवज्जो नहीं दी। इस सम्मेलन के बाद बार-बार अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर का राग अलापने वाले पाकिस्तान की घनघोर बेइज्जती हुई है।

अंतराष्ट्रीय मंच पर हुई इस बेइज्जती के चलते पाकिस्तान में इमरान की भारी आलोचना हो रही है मीडिया में इस बात की चर्चा गर्म है। पाकिस्तानी मीडिया गहरे सदमे में है कि इस्लामी सहयोग संगठन का हिस्सा होने के बावजूद पाकिस्तान की ऐसी भद्द क्यों पिट रही है। पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार और जियो टीवी के संपादक हामिद मीर ने तो ट्वीट किया, जिसका मज़मून था कि मक्का में पाकिस्तान की शिकस्त। उन्होंने तो यहां तक लिखा कि इतनी बेइज्जती को देखकर मैं चुपचाप सम्मेलन से निकल गया।

इस सम्मेलन में भारतीय पत्रकारों को भी कवरेज के लिए बुलाया गया, जिसके चलते भी पाकिस्तान काफी खफा है। लंदन में रह रहीं पाकिस्तान की महिला एक्टिविस्ट शमाँ जुनेजो ने तो इसे इमरान और पाकिस्तान की विदेश नीति की विफलता करार दिया है। असल में इस्लामी देशों के सहयोग संगठन की स्थापना 25 सितंबर 1969 में मोरक्कों में हुई थी। आपको बता दें कि इस्लामिक सहयोग संगठन का मूल मुद्देश्य फिलिस्तीन की आज़ादी और इस्लामी देशों के बीच परस्पर सहयोग करना था, लेकिन दुनिया में अमेरिका के बढ़ते प्रभाव और अपने नफे-नुकसान को साधने के चक्कर में ये संगठन अपने मूल उद्देश्य से भटक गया।

आज हालत ये है कि अगर टर्की और ईरान को छोड़ दें तो बाकी इस्लामी देश अमेरिका के पिठ्ठू बने हुए हैं और सऊदी अरब इन पिट्ठुओं में सबसे ऊपर है, मगर पाकिस्तान को असली दिक्कत भारत से इसलिए है कि पिछले 1 और 2 मार्च को जेद्दा में हुए इस्लामी सहयोग संगठन की बैठक में अरब देशों की ओर से भारत को भी शामिल होने का निमंत्रण मिला था। इस सम्मेलन की टाइमिंग ऐसी थी कि पाकिस्तान इससे बौखला गया। क्योंकि 14 फरवरी 2019 को पुलवामा में पाकिस्तानपरस्त आतंकी तंजीम जैश-ए-मोहम्मद ने आत्मघाती हमले को अंजाम दिया था। इसलिए पाकिस्तान नहीं चाहता था कि भारत को इस सम्मेलन में आमंत्रित किया जाए मगर हुआ एकदम उल्टा।

इस सम्मेलन में भारत की पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने बहुत ही सारगर्भित भाषण दिया और पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद की कड़ी निंदा की,  जिससे पाकिस्तान बुरी तरह चिढ़ गया। हालत यहां तक पहुंच गई थी कि पाकिस्तान ने सुषमा जी को आमंत्रित करने का सख्त विरोध किया और यहां तक कह दिया कि वे सम्मेलन में शामिल नहीं होगा। हालांकि, इसके बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने इसमें शिरकत की, लेकिन उन्होंने सुषमा स्वराज के भाषण का बायकॉट किया। सम्मेलन में सुषमा जी की शिरकत को पाकिस्तान ने अपना अपमान माना।

इस्लामी देशों के सम्मेलन में भारत को निमंत्रण मिलना मोदी सरकार की सशक्त विदेश नीति की कामयाबी है। इसी का असर है कि खुद को इस्लामी बिरादरी का ठेकेदार मानने वाला पाकिस्तान भारत से चिढ़ा हुआ है। इस्लामी देशों के संगठन की इस बेरुखी को पाकिस्तान अभी भूल नहीं पाया था कि एक बार फिर उसे करारी शिकस्त मिली है। पाकिस्तान में इमरान की सख्त आलोचना हो रही है, इसके बावजूद इमरान सऊदी अरब को अपना दोस्त सिर्फ इसलिए मानते हैं क्योंकि ये देश पाकिस्तान की जब-तब थोड़ी बहुत मदद करता रहा है।

याद रहे कि पिछले दिनों सऊदी अरब पहुंचते ही इमरान जब वहां के किंग से मिले तो उन्होंने उनका अपमान भी किया। असल में मक्का में ओआईसी के सम्मेलन में सऊदी अरब के किंग से मुलाक़ात के दौरान इमरान ख़ान का एक विडियो सामने आया, जिसमें वो रेड कार्पेट पर चलते हुए सऊदी अरब के बादशाह सलमान तक पहुंचते हैं और उनसे हाथ मिलाने के बाद कुछ बात करते हैं। हालांकि, जो विडियो फुटेज सामने आया है, उसमें पाकिस्तानी पीएम किंग से सीधे बात न कर ट्रांसलेटर से बात कर रहे हैं। पता चला है कि इसके बाद सऊदी किंग काफी नाराज हैं। इमरान ख़ान हाथ तो किंग सलमान से मिला रहे हैं, लेकिन बात ट्रांसलेटर से कर रहे हैं।

सोशल मीडिया पर शेयर किए गए विडियो में इमरान ख़ान किंग सलमान की तरफ़ देख भी नहीं रहे हैं। यहां तक कि इमरान ख़ान ने किंग सलमान को प्रतिक्रिया में कुछ कहने का भी वक़्त नहीं दिया और वहां से अचानक निकल गए। सोशल मीडिया पर लोगों का कहना है कि इमरान ख़ान ने किंग सलमान का सरासर अपमान किया है और उन्हें राजनयिक शिष्टाचार भी नहीं आता। कई लोग तो सलाह दे रहे हैं कि पाकिस्तान के नेताओं को राजनयिक व्यवहार सीखने की ज़रूरत है। इस घटना से ये माना जा रहा है कि अब सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच दूरियां बढ़ सकती हैं।

असल में सऊदी अरब एक कारोबारी देश है। उसने अगले डेढ़ साल तक पाकिस्तान को कच्चा तेल उधार देने का वादा किया है। पाकिस्तान को अपने मित्र देशों से मदद की जरूरत है, क्योंकि उसकी अर्थव्यवस्था का पूरी तरह जनाजा निकल चुका है। पाकिस्तान को डर है कि इस्लामी देशों से रिश्ते अगर खराब हुए तो उसे भारी नुकसान भुगतना पड़ेगा। वर्तमान में ईरान से उसके रिश्ते बहुत नाज़ुक दौर में हैं और ईरान तो पाकिस्तान का बिरादर मुल्क है। पाकिस्तान से उसकी सीमा सटी हुई है। इमरान घरेलू मोर्चे पर भी बुरी तरह घिरे हुए हैं।

पाकिस्तान की सियासी जमात मुस्लिम लीग (नून) और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी इमरान के खिलाफ मोर्चा खोले हुए है। कराची, बलूचिस्तान और उत्तरी वजीरिस्तान के कबाइली इलाकों में पाकिस्तान सरकार के खिलाफ आंदोलन हो रहे हैं। पश्तूनों पर पाकिस्तानी फौज जुल्म ढा रही है। पिछले दिनों पाकिस्तानी फौज की फायरिंग में 20 पश्तून आंदोलनकारियों की मौत हो गई और कई घायल हो गए। भारत की सख्त कूटनीति के कारण कश्मीर पर भी पाकिस्तान को लगातार पटखनी मिल रही है। जल्द ही पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में सालाना बजट पास किया जाएगा, जिसके बाद उम्मीद है कि महंगाई और बढ़ेगी और फिर वहां की अवाम सड़कों पर उतरेगी। पाकिस्तान में सिविल वॉर के हालात बन रहे हैं। ऐसे में क्या इतिहास खुद को दोहराएगा। ऐसा इसलिए, क्योंकि पाकिस्तान में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई कोई भी सरकार 5 साल पूरे नहीं नहीं कर सकी है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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मिस्टर मीडिया: ग़ैरज़िम्मेदारी के 3 उदाहरण भारतीय मीडिया के औसत चरित्र को उजार करते हैं

अच्छी पत्रकारिता करने के लिए किसी तरह की प्रतिद्वंद्विता नहीं होती

by राजेश बादल
Published - Wednesday, 05 June, 2019
Last Modified:
Wednesday, 05 June, 2019
Rajesh Badal

हद है। इससे नीचे और कहाँ तक जा सकते हैं? शायद इन दिनों यही होड़ बची है। अच्छी पत्रकारिता करने के लिए प्रतिद्वंद्विता नहीं होती। घटिया से घटिया हरक़तों के ज़रिये अपने आपको निर्वस्त्र दिखाने पर तुले हुए हैं। अपने दिमाग़ों की अश्लील सड़ाँध को सोशल मीडिया पर परोसकर अपनी बदबू फैलाने में शर्म भी महसूस नहीं करते। वैचारिक मीडिया से रिश्ता रखने वाली एक भद्र महिला ने लंदन में अपने एक मित्र से गांधी और नेहरू के समलैंगिक रिश्तों के बारे में सुना। उस सुनी सुनाई बात को मीडिया में विस्तार दे दिया। न मित्र के पास कोई सुबूत और न इन भद्र महिला के पास कोई प्रमाण। चटख़ारे लेने के लिए भारत के दो शिखर पुरुष ही बचे थे? वह भी उस स्थिति में, जब अपने पर लग रहे आरोपों के बारे में क़ैफ़ियत देने के लिए दोनों राष्ट्रनेता इस लोक में नहीं हैं।

मीडिया की ज़िम्मेदारी सभी पक्षों से बात करके किसी तथ्य को पेश करने की होती है। इस मामले में तो सब ताक में रख दिया गया। इन विद्वान महिला ने किसी ज़माने में अपने प्रगतिशील विचारों से हिन्दुस्तान में स्त्री विमर्श को नया मोड़ दिया था। अब उन्हीं के हवाले से यह बेहूदा,अभद्र,अशालीन, अश्लील और अमर्यादित टिप्पणी अत्यंत दुखद है। हज़ारों साल की संस्कृति पर गर्व करने वाले मुल्क़ में अब संस्कारों का इतना अकाल है कि पूर्वजों पर निशाना साधते लाज भी नहीं आती।

सवाल यह है कि एक डंडा-ठोक आचार संहिता हमारे ऊपर क्यों नहीं होनी चाहिए? मीडिया की आज़ादी के नाम पर अपने अश्लील कल्पना लोक की सार्वजनिक नुमाइश आप क्यों करना चाहते हैं? गांधी, नेहरू, आंबेडकर, इंदिरा, राजीव, अटल बिहारी और नरेन्द्र मोदी से लेकर स्मृति ईरानी तक हम किसी को नहीं छोड़ते। उनके कार्यों का मूल्यांकन हम नहीं करना चाहते। हमें सिर्फ़ उनके लैंगिक रिश्तों में आनंद आता है।

दो दिन पहले एक और पढ़ी-लिखी महिला पर गुजरात के एक विधायक ने पाशविक अत्याचार किया। हमने उसकी तस्वीर धड़ल्ले से दिखाई। न केवल दिखाई, बल्कि पहचान भी उजाग़र की। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का भी हमने मख़ौल उड़ाया। क्या मानहानि और मर्यादा के संबंध में बुनियादी क़ानून भी हम नहीं जानते। हो सकता है-कुछ लोग यह कुतर्क करें कि मीडिया इस तरह से न दिखाता तो विधायक अपनी करतूत की माफ़ी भी न माँगता। पर यह भ्रम है। विधायक का हृदय परिवर्तन नहीं हुआ है। उसने सिर्फ़ पार्टी की कार्रवाई से बचने के लिए ऐसा किया है। इस घटना के बाद भी उसके आचरण में बदलाव नहीं आने वाला है। लेकिन मीडिया ने उस सम्मानित महिला को अवश्य सार्वजनिक रूप से अपमानित कर दिया है। इस घटना के कवरेज का और भी शिष्ट तरीक़ा हो सकता था। टीआरपी बटोरने के लिए हम कुछ भी दिखाने के लिए स्वच्छंद नहीं हैं, न ही क़ानून तोड़ सकते हैं।

तीसरा उदाहरण भी इसी सप्ताह का है। भूटान के प्रधानमंत्री आए और भारतीय मीडिया का स्तर देख कर चुपचाप चले गए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शपथ समारोह में भूटान से शिरक़त करने आए प्रधानमंत्री ने पाया कि हिन्दुस्तान में उनके स्थान पर पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री की फोटो लगाई गई है। वे तो ख़ामोश रहे, मगर पूर्व प्रधानमंत्री अपने को रोक नहीं पाए। उन्होंने तो यहाँ तक कहा कि अगर किसी देश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्थान पर किसी और की फोटो लगा दी गई होती तो भारतीय मीडिया बखेड़ा खड़ा कर देता।

यह भी ग़ैरज़िम्मेदार पत्रकारिता का एक नमूना है। परदेसी राजनयिकों-राष्ट्राध्यक्षों के नाम और तस्वीर को लेकर हम इतने लापरवाह हो जाते हैं कि उसको क्रॉस चेक करने की ज़रूरत भी नहीं समझते। वह भी जब, भूटान जैसा पड़ोसी-एकदम भारत के एक राज्य की तरह घरेलू रिश्तों वाला मुल्क़ हो। इस त्रुटि के लिए क्या किसी को माफ़ किया जा सकता है? एक ही सप्ताह में ग़ैरज़िम्मेदारी के तीन उदाहरण भारतीय मीडिया के औसत चरित्र को उजागर करते हैं। क्या हम उस चरम स्थिति का इंतज़ार कर रहे हैं, जब दर्शक, पाठक और श्रोता ग़लतियों (मेरी नज़र में अपराध) के लिए सार्वजनिक रूप से हमारा मान मर्दन करने लगें? कुछ तो सीखिए मिस्टर मीडिया!

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पत्रकारिता का अस्तित्व बचाने को फिर से अपनाना होगा ये उद्देश्य!

उदंत मार्तंड की जीवटता से प्रेरणा लेकर बाद में हिंदी के अन्य समाचार-पत्र प्रारंभ हुए

Last Modified:
Thursday, 30 May, 2019
News

लोकेन्द्र सिंह, स्वतंत्र टिप्पणीकार।।

'हिंदुस्थानियों के हित के हेत' इस उद्देश्य के साथ 30 मई 1826 को भारत में हिंदी पत्रकारिता की नींव रखी जाती है। पत्रकारिता के अधिष्ठाता देवर्षि नारद के जयंती प्रसंग (वैशाख कृष्ण पक्ष द्वितीया) पर हिंदी के पहले समाचार-पत्र 'उदंत मार्तंड' का प्रकाशन होता है। हिंदी पत्रकारिता का सूत्रपात होने पर संपादक पंडित युगलकिशोर समाचार-पत्र के पहले ही पृष्ठ पर अपनी प्रसन्नता प्रकट करते हुए उदंत मार्तंड का उद्देश्य स्पष्ट करते हैं। आज की तरह लाभ कमाना उस समय की पत्रकारिता का उद्देश्य नहीं था।

भारत की स्वतंत्रता से पूर्व प्रकाशित ज्यादातर समाचार-पत्र आजादी के आंदोलन के माध्यम बने। अंग्रेज सरकार के विरुद्ध मुखर रहे। यही रुख उदंत मार्तंड ने अपनाया। अत्यंत कठिनाइयों के बाद भी पंडित युगलकिशोर उदंत मार्तंड का प्रकाशन करते रहे, लेकिन यह संघर्ष लंबा नहीं चला। हिंदी पत्रकारिता के इस बीज की आयु 79 अंक और लगभग डेढ़ वर्ष रही। इस बीज की जीवटता से प्रेरणा लेकर बाद में हिंदी के अन्य समाचार-पत्र प्रारंभ हुए।

आज भारत में हिंदी के समाचार-पत्र सबसे अधिक पढ़े जा रहे हैं। प्रसार संख्या की दृष्टि से शीर्ष पर हिंदी के समाचार-पत्र ही हैं। किंतु, आज हिंदी पत्रकारिता में वह बात नहीं रह गई, जो उदंत मार्तंड में थी। संघर्ष और साहस की कमी कहीं न कहीं दिखाई देती है। दरअसल, उदंत मार्तंड के घोषित उद्देश्य 'हिंदुस्थानियों के हित के हेत' का अभाव आज की हिंदी पत्रकारिता में दिखाई दे रहा है। हालाँकि, यह भाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है, लेकिन बाजार के बोझ तले दब गया है।

व्यक्तिगत तौर पर मैं मानता हूँ कि जब तक अंश मात्र भी 'देशहित' पत्रकारिता की प्राथमिकता में है, तब तक ही पत्रकारिता जीवित है। आवश्यकता है कि प्राथमिकता में यह भाव पुष्ट हो, उसकी मात्रा बढ़े। समय आ गया है कि एक बार हम अपनी पत्रकारीय यात्रा का सिंहावलोकन करें। अपनी पत्रकारिता की प्राथमिकताओं को जरा टटोलें। समय के थपेडों के साथ आई विसंगतियों को दूर करें। समाचार-पत्रों या कहें पूरी पत्रकारिता को अपना अस्तित्व बचाना है, तब उदंत मार्तंड के उद्देश्य को आज फिर से अपनाना होगा। अन्यथा सूचना के डिजिटल माध्यम बढऩे से समूची पत्रकारिता पर अप्रासंगिक होने का खतरा मंडरा ही रहा है।

असल में आज की पत्रकारिता के समक्ष अनेक प्रकार की चुनौतियां मुंहबाये खड़ी हैं। यह चुनौतियां पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों से डिगने के कारण उत्पन्न हुई हैं। पूर्वजों ने जो सिद्धांत और मूल्य स्थापित किए थे, उनको साथ लेकर पत्रकारिता मिशन से प्रोफेशन की ओर जाती, तब संभवत: कम समस्याएं आतीं। क्योंकि मूल्यों और सिद्धांतों की उपस्थिति में प्रत्येक व्यवसाय में मर्यादा और नैतिकता का ख्याल रखा जाता है। किंतु, जैसे ही हम तय सिद्धांतों से हटते हैं, मर्यादा को लांघते हैं, तब स्वाभाविक तौर पर चुनौतियां सामने आने लगती हैं। नैतिकता के प्रश्न भी खड़े होने लगते हैं।

यही आज मीडिया के साथ हो रहा है। मीडिया के समक्ष अनेक प्रश्न खड़े हैं। स्वामित्व का प्रश्न। भ्रष्टाचार का प्रश्न। मीडिया संस्थानों में काम करने वाले पत्रकारों के शोषण, स्वाभिमान और स्वतंत्रता के प्रश्न हैं। वैचारिक पक्षधरता के प्रश्न हैं। 'भारतीय भाव' को तिरोहित करने का प्रश्न। इन प्रश्नों के कारण उत्पन्न हुआ सबसे बड़ा प्रश्न-विश्वसनीयता का है।

यह सब प्रश्न उत्पन्न हुए हैं पूँजीवाद के उदर से। सामान्य-सा फलसफा है कि बड़े लाभ के लिए बड़ी पूँजी का निवेश किया जाता है। आज अखबार और न्यूज चैनल का संचालन कितना महंगा है, हम सब जानते हैं। अर्थात् मौजूदा दौर में मीडिया पूँजी का खेल हो गया है। एक समय में पत्रकारिता के व्यवसाय में पैसा 'बाय प्रोडक्ट' था। लेकिन, उदारीकरण के बाद बड़ा बदलाव मीडिया में आया है। 'बाय प्रोडक्ट' को प्रमुख मानकर अधिक से अधिक धन उत्पन्न करने के लिए धन्नासेठों ने समाचारों का ही व्यवसायीकरण कर दिया है।

यही कारण है कि मीडिया में कभी जो छुट-पुट भ्रष्टाचार था, अब उसने संस्थागत रूप ले लिया है। वर्ष 2009 में सामने आया कि समाचार के बदले अब मीडिया संस्थान ही पैसा लेने लगे हैं। स्थिति यह बनी की देश के नामी-गिरामी समाचार-पत्रों को 'नो पेड न्यूज' का ठप्पा लगाकर समाचार-पत्र प्रकाशित करने पड़े। संपादक गर्वित होकर बताते हैं कि पूरे चुनाव अभियान के दौरान उनके समाचार-पत्र के विरुद्ध पेड न्यूज की एक भी शिकायत नहीं आई। मालिकों के आर्थिक स्वार्थ समाज हितैषी पत्रकारिता पर हावी नहीं होते, तब यह स्थिति ही नहीं बनती।

केवल मालिकों की धन लालसा के कारण ही मीडिया की विश्वसनीयता और प्राथमिकता पर प्रश्न नहीं उठ रहे हैं, बल्कि पत्रकारों की भी भूमिका इसमें है। देखने में आ रहा है कि कुछ पत्रकार राजनीतिक पार्टियों के प्रवक्ता की तरह व्यवहार कर रहे हैं। ऑन स्क्रीन ही नहीं, बल्कि ऑफ स्क्रीन भी न्यूज रूम में वह आपस में राजनीतिक प्रवक्ताओं की भांति संबंधित पार्टी का पक्ष लेते हैं। कांग्रेस बीट कवर करने वाला पत्रकार कांग्रेस को और भाजपा बीट देखने वाला पत्रकार भाजपा को सही ठहराने के लिए भिड़ जाता है। वामपंथी पार्टियों के प्रवक्ता तो और भी अधिक हैं। भले ही देश के प्रत्येक कोने से कम्युनिस्ट पार्टियां खत्म हो रही हैं, लेकिन मीडिया में अभी भी कम्युनिस्ट विचारधारा के समर्थक पत्रकारों की संख्या जरा ज्यादा है।

हालात यह हैं कि मौजूदा दौर में समाचार माध्यमों की वैचारिक धाराएं स्पष्ट दिखाई दे रही हैं। देश के इतिहास में यह पहली बार है, जब आम समाज यह बात कर रहा है कि फलां चैनल/अखबार कांग्रेस का है, वामपंथियों का है और फलां चैनल/अखबार भाजपा-आरएसएस की विचारधारा का है। समाचार माध्यमों को लेकर आम समाज का इस प्रकार चर्चा करना पत्रकारिता की विश्वसनीयता के लिए ठीक नहीं है। कोई समाचार माध्यम जब किसी विचारधारा के साथ नत्थी कर दिया जाता है, तब उसके समाचारों के प्रति दर्शकों/पाठकों में एक पूर्वाग्रह रहता है। वह समाचार माध्यम कितना ही सत्य समाचार प्रकाशित/प्रसारित करे, समाज उसे संदेह की दृष्टि से देखेगा।

समाचार माध्यमों को न तो किसी विचारधारा के प्रति अंधभक्त होना चाहिए और न ही अंध विरोधी। हालांकि यह भी सर्वमान्य तर्क है कि तटस्थता सिर्फ सिद्धांत ही है। निष्पक्ष रहना संभव नहीं है। हालांकि भारत में पत्रकारिता का एक सुदीर्घ सुनहरा इतिहास रहा है, जिसके अनेक पन्नों पर दर्ज है कि पत्रकारिता पक्षधरिता नहीं है। निष्पक्ष पत्रकारिता संभव है। कलम का जनता के पक्ष में चलना ही उसकी सार्थकता है। यदि किसी के लिए निष्पक्षता संभव नहीं भी हो तो न सही। भारत में पत्रकारिता का एक इतिहास पक्षधरता का भी है। इसलिए भारतीय समाज को यह पक्षधरता भी स्वीकार्य है लेकिन, उसमें राष्ट्रीय अस्मिता को चुनौती नहीं होनी चाहिए।

किसी का पक्ष लेते समय और विपरीत विचार पर कलम तानते समय इतना जरूर ध्यान रखें कि राष्ट्र की प्रतिष्ठा पर आँच न आए। हमारी कलम से निकल बहने वाली पत्रकारिता की धारा भारतीय स्वाभिमान, सम्मान और सुरक्षा के विरुद्ध न हो। कहने का अभिप्राय इतना-सा है कि हमारी पत्रकारिता में भी 'राष्ट्र सबसे पहले' का भाव जागृत होना चाहिए। वर्तमान पत्रकारिता में इस भाव की अनुपस्थिति दिखाई दे रही है। यदि पत्रकारिता में 'राष्ट्र सबसे पहले' का भाव जाग गया तब पत्रकारिता के समक्ष आकर खड़ी हो गईं ज्यादातर चुनौतियां स्वत: ही समाप्त हो जाएंगी।

हिंदी के पहले समाचार पत्र उदंत मार्तंड का जो ध्येय वाक्य था- 'हिंदुस्थानियों के हित के हेत'। अर्थात् देशवासियों का हित-साधन। यही तो 'राष्ट्र सबसे पहले' का भाव है। समाज के सामान्य व्यक्ति के हित की चिंता करना। उसको न्याय दिलाना। उसकी बुनियादी समस्याओं को हल करने में सहयोगी होना। न्यायपूर्ण बात कहना।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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जीवित पत्रकारों को श्रद्धांजलि दे देना कितना जायज होगा?

हिंदी पत्रकारिता दिवस पर कहा-सेहतमंद हो पत्रकारिता, इसके लिए दुआ करें, श्रद्धांजलि न दें!

Last Modified:
Thursday, 30 May, 2019
Anand Singh

आनंद सिंह, वरिष्ठ पत्रकार।।

गुरुवार की सुबह फेसबुक चेक कर रहा था। कुछ लोगों ने लिखा-आज हिंदी पत्रकारिता दिवस है, पत्रकारों को श्रद्धांजलि! मन थोड़ा व्यथित हुआ। जीवित पत्रकारों को श्रद्धांजलि क्यों भाई...। कुछ प्रतिक्रियाएं पढ़ीं। एक ने लिखा-आप जो चाहें, लिख नहीं सकते। दूसरे किसी ने लिखा-अब दौर गोदी मीडिया का है। किसी ने लिखा-अब पत्रकारिता बाजारू हो गई है। इसी किस्म की प्रतिक्रियाएं पढ़ने को मिलीं। ये सब एकतरफा लगीं मुझे। इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि हिंदी मीडिया में अवमूल्यन हुआ है लेकिन जब हम समग्रता में चीजों को देखते हैं तो बात कुछ और ही नजर आती है। आपको समझना पड़ेगा कि हिंदी के शीर्ष अखबारों की पाठकों तक पहुंच बढ़ी है।

इंडियन रीडरशिप सर्वे, 2019 की पहली तिमाही की रिपोर्ट देख लें। दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हिंदुस्तान, अमर उजाला, प्रभात खबर जैसे अखबारों की पाठक संख्या बढ़ी है। कैसे? क्या पाठकों को हम गोबरगणेश समझते हैं। अखबारों की पाठक संख्या बढ़ने के कई कारण हो सकते हैं पर एक मोटा संकेत यह समझें कि फेसबुक-ट्विटर और वॉट्सऐप के जमाने में भी अगर 24 घंटे के बाद पाठक अखबार पढ़कर अपडेट हो रहे हैं तो यह पत्रकारों की बहुत बड़ी ताकत है, सफलता है। लाइव खबरों के जमाने में हम टीवी पर खबरें तो देख लेते हैं लेकिन उसकी पुष्टि के लिए हमें 24 घंटे इंतजार भी करना पड़ता है (और वह हम कर भी रहे हैं) क्योंकि हमें लगता है कि आज भी खबरों का कन्फर्मेशन अखबार पढ़ने के बाद ही हिंदी पट्टी के लोग करते हैं। तो, जिन पत्रकारों के दम पर अखबार बढ़ रहे हैं, उन्हें जीते-जी श्रद्धांजलि देना कितना उचित होगा, यह आप पर छोड़ा।

1992 में जब लोकमत समाचार, नागपुर से मैंने करियर की शुरुआत की तो 2500 रुपये वेतन मिलता था। उस दौर में हमारे प्रधान संपादक थे श्री एसएन विनोद जी। उन्हें कितनी सैलरी मिलती थी, यह तो हमें नहीं पता पर इतनी जरूर मिलती थी, जिससे उनकी कार हर दिन चमचमाती थी।  झख सफेद-क्रीम कलर की सफारी शर्ट-पैंट का क्रीज नहीं टूटता था। आज के दौर में मैं निजी तौर पर ऐसे अखबारों के संपादकों को जानता हूं, जिनकी सालाना सैलरी 50 लाख से डेढ़ करोड़ रुपए तक है। हिंदी न्यूज चैनलों की बात तो छोड़ ही दें।

2019 की पत्रकारिता में कुछ डार्क स्पाट भी हैं। दरअसल, ये पहले से भी रहे हैं। अभी इनका रंग ज्यादा सुर्ख हो गया है। लेकिन, ये एक फीसद से भी कम हैं। हर संस्थान में ऐसे लोग आपको मिल जाएंगे। लेकिन इन एक फीसद लोगों के कारनामों को लेकर 99 फीसद को गलत कह देना, श्रद्धांजलि दे देना कितना जायज होगा? मूल भाव में पत्रकारिता आज भी अपने सूचना देने के सार्वभौमिक दायित्व का निर्वहन कर रही है जिसमें ईमानदारी, शुचिता और कर्तव्यनिष्ठा का मूलभाव संलिप्त है। हां, यह दीगर है कि आप आज के दौर में अगर कर्मवीर, उदंत मार्तण्ड, आर्यावर्त, सर्चलाइट और आज वाली तासीर खोज रहे हैं, तो आपको निराशा ही हाथ लगेगी क्योंकि बीतते दौर के साथ चीजें बदल चुकी हैं और यह कहने की बात नहीं कि बदलाव सृष्टि का नियम है।

आज के अखबारों में व्यवसाय को लेकर गंभीर चिंता है। यह चिंता उस सोच को आगे बढ़ाती है, जिसमें हमें हर पत्रकार को हर माह की सात तारीख को पूरा का पूरा वेतन भी देना होता है। आप माखनलाल चतुर्वेदी के अखबार कर्मवीर में छपे उस विज्ञापन को याद करें जिसमें उन्होंने ऐसे पत्रकारों को रखने की इच्छा व्यक्त की थी जो अंग्रेज हुक्मरानों के विरुद्ध लिखे, वेतन न ले, दो रोटी खाकर जिंदा रहे। क्या आज ऐसे पत्रकार मिलेंगे? जाहिर है, नहीं। वह द्रोह काल था। आज द्रोह काल नहीं है। लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार है, जिसने मीडिया को छूट दे रखी है। थोड़ी-बहुत पसंद-नापसंद का ध्यान रखने में कोई गुरेज नहीं, क्योंकि जो आपको सरकारी विज्ञापन दे रहा है, वह अपनी एक सीमा के बाहर जाकर बुराई शायद ही सुने।

हिंदी पत्रकारिता की सेहत और सुधरे, हम यही कामना करते हैं। हिंदी पत्रकारिता को जिन महापुरुषों ने शिखर पर पहुंचाया, उन्हें आत्मिक आदरांजलि।

(वर्तमान में दैनिक जागरण, नोएडा के आउटपुट हेड (दक्षिण हरियाणा) के पद पर कार्यरत लेखक के यह निजी विचार हैं)

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आखिर कोई पत्रकारिता के इस रूप को लिखने की हिम्मत क्यों नहीं जुटा पा रहा है?

30 मई को हिंदी पत्रकारिता दिवस पर उठाए जा रहे हैं इससे जुड़े तमाम पहलू

Last Modified:
Thursday, 30 May, 2019

रितु राज।।

बेचैनियों की कालिख पर कभी कोई इस कदर बदमान हो सकता क्या

 

आज यानी 30 मई को हर जगह हिंदी पत्रकारिता दिवस की शुभकामनाएं नजर आ रही हैं। कोई पत्रकारिता के इतिहास को खंगाल रहा है तो कोई इसकी साख बचाने का सुर अलाप रहा है। कोई इसकी बदलती शैली की दुहाई दे रहा तो कोई इसे लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के तौर पर होने के बावजूद सत्ता की कठपुतली का नाम दे रहा है।

लेकिन कोई ये हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है कि 21वीं सदी की पत्रकारिता के उस विकराल रूप को लिखे, जहां आज के युवाओं के लिए यह क्षेत्र एक बेचैनी का सबब बन गया है। जो कल के भविष्य होंगे, उनका इस पत्रकारिता के महकमे को ख्याल तक नहीं है। बुद्धिजीवी, समाज के लोगों की आवाज़ बनकर चीखने-चिल्लाने वाला यह मीडिया आज अपने ही सहयोगी का गला घोंट रहा है। आज मीडिया में नौकरी नहीं हैं। कितने मीडियाकर्मियों को दिहाड़ी पर रखा जाता है और सीनियर का काम जहां अपने जूनियर की पीठ थपथपाने का होता था, वहां आज उसकी जगह टांग खींचने की हो गई है। जहां बार-बार यह एहसास कराया जाता है कि मीडिया खुद में एक कालिख है, तुम इसका हिस्सा मत बनो।

इन सबसे हटके जो एक बेहद अजीब बात है, वो यह कि मीडिया जो खास करके लड़कियों के साथ समाज में हो रही बर्बरता पर मुखर रहता है, लेकिन उनका क्या कहें जो अपने ही संस्थान की लड़कियों के साथ अन्याय करते हैं।

मीडिया में लड़कियां अगर अपने आप को समर्पित कर दें तो नौकरियों की किल्लत कभी नहीं होगी, अगर बगावत कर दें तो ताउम्र बेरोजगार रहेंगी। ये आज के मीडिया की भयानक तस्वीर है। मीडिया में इंटरव्यू से पहले भी एक इंटरव्यू देना पड़ता है, जिसमें उस लड़की के दिमाग को भांपा जाता है कि ये सबकुछ करने को राजी होगी या नहीं। अगर आज मीडिया की यह स्थिति है तो जाहिर है कि यह रातों रात नहीं बनी होगी। यह पता नहीं मीडिया में लड़कियां ने अपनी मेहनत का क्या परिचय दिया, पुरुषों ने उस मेहनत को क्या समझा, लेकिन आजकल की लड़कियों को ऐसे हालातों से गुजरना पड़ता है।

बड़े मीडिया चैनल्स की कहानी और भी निराली है। उन्होंने खुद की दुकान खोल ली हैं तो वहां वैकेंसी की गुंजाइश न के बराबर होती हैं। अगर कोई न्यूकमर रिज्यूमे भेजता है तो उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। कहा जाता है कि मीडिया में सब कुछ जुगाड़ से होता है। लानत है देश के चौथे स्तम्भ की इस विकृत मानसिकता पर और उन क्रांतिकारी पत्रकारों पर जो अपने ही घर के पाप को ढकते हैं और देश के लिए आवाज बनने का नाटक करते हैं।

जरूरत है एक बार फिर से पत्रकारिता के उस व्हाइट कॉलर को वापस लाने की जहां चैन से लोग काम कर सकें। तभी हिंदी पत्रकारिता दिवस की शुभकामनाएं शोभा देंगी। वरना इसकी तह में न जाने कितने नए बच्चों के दर्द दफनाए गए होंगे। यकीन मानो, इस दर्द ने जिस दिन संगठित होकर आवाज का रूप ले लिया, उस दिन लोग नजरें छिपाते फिरेंगे।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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अब पत्रकार नहीं, मीडियाकर्मी काम करते हैं और एक कर्मचारी से आप क्या उम्मीद रखेंगे?

हिंदी पत्रकारिता में मील के पत्थर के रूप में आज हम ‘उदंत मार्तंड’ का स्मरण करते हैं

Last Modified:
Thursday, 30 May, 2019
Manoj Kumar

मनोज कुमार

वरिष्ठ पत्रकार 

अपने इतिहास का स्मरण करना भला-भला सा लगता है। बात जब हिंदी पत्रकारिता की हो तो वह रोमांच से भर देता है। वह दिन और वह परिस्थिति कैसी होगी, जब पंडित जुगलकिशोर शुक्ल ने हिंदी अखबार आरंभ करने का दुस्साहस किया। तमाम संकटों के बाद भी आखिरी दम तक अखबार का प्रकाशन जारी रखा। अंतत: साल भर के छोटे से समय में अखबार का प्रकाशन बंद करना पड़ा। हिंदी पत्रकारिता में मील के पत्थर के रूप में आज हम ‘उदंत मार्तंड’ का स्मरण करते हैं। हिंदी के अलावा अन्य कई भाषाओं में अखबारों का प्रकाशन हुआ, लेकिन ‘उदंत मार्तंड’ ने जो मुकाम बनाया, वह आज भी हमारे लिए आदर्श है। हालांकि जेम्स आगस्टक हिक्की के बंगाल गजट को भारत का पहला प्रकाशन कहा जाता है और पीड़ित सम्पादक के रूप में उनकी पहचान है। इन सबके बावजूद ‘उदंत मार्तंड’ का कोई सानी नहीं हुआ।

30 मई, 1826 को जब हम मुडक़र देखते हैं तो लगता है कि साल 2019, दिनांक 30 मई का सफर तो हमने पूरा कर लिया लेकिन वो तेज और तेवर खो दिया है, जिसके बूते ‘उदंत मार्तंड’ आज भी हमारे लिए आदर्श है। इस सफर में प्रिंटिंग तकनीक का बहुविध विस्तार हुआ। घंटे का समय लगाकर एक पेज तैयार करने की विधि अब मिनटों में तैयार होने लगी। अखबार नयनाभिराम हो गए, लेकिन इसके साथ ही कंटेंट की कमी खलने लगी। ‘तुमको हो जो पसंद वही बात करेंगे’ की तर्ज पर लिखा जाने लगा। न विचार बचे, न समाचार। अखबार न होकर सूचनामात्र का कागज बन गया। यहीं पर मिशन खोकर प्रोफेशन और अब कमीशन का धंधा बनकर रह गया है। बात तल्ख है, लेकिन सच है। बदला लेने के बजाय बदलने की कोशिश करें तो भले ही ‘उदंत मार्तंड’ के सुनहरे दिन वापस न ला पाएं लेकिन ‘आज’ को तो नहीं भूल पाएंगे। जनसत्ता को इस क्रम में रख सकते हैं।

खैर, पराधीन भारत में अंग्रेजों की नाक में दम करने वाली हिंदी पत्रकारिता स्वाधीनता के बाद से बहुत बिगड़ी नहीं थी। नए भारत के निर्माण के समय पहरेदार की तरह हिंदी पत्रकारिता शासन और सत्ता को आगाह कर रही थी। सहिष्णुता का माहौल था। सत्ता और शासन अखबारों की खबरों को गंभीरता से लेते थे और एक-दूसरे के प्रति सम्मान का भाव था। ‘उदंत मार्तंड’ अंग्रेजों की ठुकाई कर रहा था और आम भारतीय को जगाने का कार्य भी कर रहा था। लगभग ऐसा ही चरित्र स्वाधीन भारत में कायम था। सीमित संसाधनों में अखबारों का प्रकाशन सीमित संख्या में था और पत्रकारिता में प्रवेश करने वाले लोग आम लोग नहीं हुआ करते थे। एक किस्म की दिव्य शक्ति उनमें थी। वे सामाजिक सरोकार से संबद्ध थे।

कहते हैं विस्तार के साथ विनाश भी दस्तक देती है। विनाश न सही, कुछ गड़बड़ी का संदेश तो बदलते समय की पत्रकारिता दे गई। साल 1975 अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए सबसे काला समय था। तानाशाह के रूप में तब की सत्ता और शासन ने सारे अधिकार छीन लिए। जैसे-तैसे ये दिन बीते लेकिन इस थोड़े से समय में हिंदी पत्रकारिता का चाल, चेहरा और चरित्र बदलने लगा था। जो सत्ता और शासन के पैरोकार हो गए, वे चांदी काटने लगे लेकिन जो पहरेदार की भूमिका में रहे, वे घायल होते रहे।

एक समय भाजपा के रसूखदार चेहरा रहे लालकृष्ण आडवाणी ने कहा था, ‘आपातकाल में पत्रकारिता को झुकने के लिए कहा गया तो वे रेंगने लगे।’ उनकी बात सौ फीसदी सच नहीं थी लेकिन सौ फीसदी गलत भी नहीं। इंदौर से प्रकाशित बाबूलाभचंद्र छजलानी के अखबार नईदुनिया ने विरोधस्वरूप सम्पादकीय पृष्ठ कोरा छोड़ दिया। ऐसे और भी उदाहरण मिल जाएंगे, लेकिन सच यही है कि तब से झुकते-झुकते अब रेंगने लगे हैं। हिंदी पत्रकारिता के लिए यही संक्रमणकाल था। यही वह समय है जब हिंदी पत्रकारिता के मंच पर पीत पत्रकारिता ने अपनी जगह बनायी। और शायद यही वक्त था जब समाज का पत्रकारिता से आहिस्ता आहिस्ता भरोसा उठने लगा। आज की हालत में तो पत्रकारिता के जो हाल हैं, सो हैं। अब यह कहना मुश्किल है कि कौन सा अखबार, किस सत्ता और शासन का पैरोकार बन गया है या बन जाएगा।

हिंदी पत्रकारिता ने ‘उदंत मार्तंड’ के समय जो सपने देखे थे, वो भले ही चूर-चूर ना हुए हों लेकिन टूटे जरूर हैं। जख्मी जरूर हुए हैं। हिंदी पत्रकारिता के जख्मी होने का कारण एक बड़ा कारण इस सफर में सम्पादक संस्था का विलोपित हो जाना है। सम्पादक के स्थान पर मैनेजर का पदारूढ़ हो जाना हिंदी पत्रकारिता का सबसे बड़ा संकट है। संवाद और पाठन तो जैसे बीते जमाने की बात हो गई है। हम इस बात पर गर्व कर सकते हैं कि प्रकाशनों की संख्या सैकड़ों में बढ़ी है, लेकिन कटेंट को देखें तो हम शर्मसार हो जाते हैं। अखबारों का समाज पर प्रभाव इस कदर कम हुआ है कि औसतन 360 दिनों के अखबारों में एकाध बार किसी खबर का कोई प्रभाव होता है। खबर पर प्रतिक्रिया आती है अथवा शासन-सत्ता संज्ञान में लेकर कार्यवाही करता है तो अखबार ‘खबर का इम्पेक्ट’ की मुहर लगाकर छापता है। इस तरह अखबार खुद इस बात का हामी भरता है कि बाकी के बचे दिनों में छपी खबरों का कोई प्रभाव नहीं है।

ऐसा क्यों होता है? इस बात पर भी गौर करने की जरूरत है। चूंकि सम्पादक की कुर्सी पर मैनेजर विराजमान है तो वह इस इम्पेक्ट खबर को भी बेचना चाहता है। उसके लिए खबर एक प्रोडक्ट है, जैसा कि अखबार एक प्रोडक्ट है। अब अखबारों के पाठक नहीं होते हैं। ग्राहक होते हैं। ग्राहकों को लुभाने-ललचाने के लिए बाल्टी और मग दिए जाते हैं। एक नया चलन ‘नो निगेटिव खबर’ का चलन पड़ा है। निगेटिव से ही तो खबर बनती है और जब सबकुछ अच्छा है तो काहे के लिए अखबारों का प्रकाशन। हिंदी पत्रकारिता की दुर्दशा मैनेजरों ने की है। भाषा की तमाम वर्जनाओं को उन्होंने ध्वस्त करने की कसम खा रखी है। हिंदी अथवा अंग्रेजी के स्थान पर हिंग्लिश का उपयोग-प्रयोग हो रहा है। तिस पर तुर्रा यह कि ‘जो दिखता है, वह बिकता है’। अर्थात एक बार अखबार को बाजार का प्रोडक्ट बनाता दिखता है।

हिंदी पत्रकारिता की दुर्दशा में टेलिविजन पत्रकारिता की भूमिका भी कम नहीं है। जब टेलीविजन का प्रसारण आरंभ हुआ तो लगा कि अखबारों की दुनिया सिमट जाएगी लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। उल्टे दोनों एक-दूसरे के पर्याय हो गए। बल्कि अखबार भी टेलिविजन बनने की कोशिश में लग गए। टेलिविजन की कोई भाषा नहीं होती है तो अखबारों ने अपनी भाषा की भेंट बाजार की मांग के अनुरूप चढ़ा दी। जो सनसनी टेलिविजन के पर्दे पर मचती है। हंगामा होता है, वह दिखाने की कोशिश अखबारों ने की लेकिन दोनों माध्यमों की टेक्रॉलाजी अलग अलग होने के कारण अखबारों के लिए यह संभव नहीं हो पाया। प्रस्तुतिकरण, छपाई और तस्वीरों में हिंदी पत्रकारिता टेलिविजन का स्वरूप धारण करने की कोशिश करने लगी। कल तक पठनीय अखबार, आज का दर्शनीय अखबार हो गया। अखबारों की ‘स्टाइलशीट’ कहीं धूल खा रही होगी। नयी पीढ़ी को तो यह भी पता नहीं होगा कि स्टाइलशीट क्या है और इसका महत्व क्या है?

हिंदी पत्रकारिता को स्वाहा करने में पत्रकारिता शिक्षा के संस्थानों की भूमिका भी बड़ी रही है। दादा माखनलाल चतुर्वेदी, पत्रकारिता शिक्षण संस्थाओं के पक्षधर थे। किन्तु वर्तमान में भोपाल से दिल्ली तक संचालित पत्रकारिता संस्थाएं केवल किताबी ज्ञान तक सिमट कर रह गई हैं। व्यावहारिक ज्ञान और संवाद कला तो गुमनामी में है। ज्यादतर पत्रकारिता के शिक्षकों के पास व्यावहारिक अनुभव नहीं है। नेट परीक्षा पास करो, पीएचडी करो और शिक्षक बन जाओ। निश्चित रूप से पत्रकारिता की शिक्षा भी प्रोफेशनल्स कोर्स है और इस लिहाज से यह उत्कृटता मांगती है लेकिन उत्कृष्टता के स्थान पर पत्रकारिता शिक्षा प्रयोगशाला बनकर रह गई है। इस प्रयोगशाला से पत्रकार नहीं, मीडियाकर्मी निकलते हैं और एक कर्मचारी से आप क्या उम्मीद रखेंगे?

कल्पना कीजिए कि पंडित जुगलकिशोर शुक्ल, राजा राममोहन राय, महात्मा गांधी, माखनलाल चतुर्वेदी, गणेशशंकर विद्यार्थी, तिलक, पराडक़रजी जैसे विद्वतजन मीडियाकर्मी होते तो क्या आज हम ‘उदंत मार्तंड’ का स्मरण कर रहे होते? शायद नहीं लेकिन मेरा मानना है कि समय अभी गुजरा नहीं है। पत्रकारिता के पुरोधा और पुरखों को जागना होगा और पत्रकारिता की ऐसी नई पौध को तैयार करना होगा जो राजेन्द्र माथुर, प्रभाष जोशी, मायाराम सुरजन, लाभचंद्र छजलानी के मार्ग पर चलने के लिए स्वयं को तैयार कर सकें। और कुछ नहीं होगा तो फिर अगले साल 30 मई को स्मरण करेंगे कि आज ही के दिन हिंदी का पहला साप्ताहिक पत्र ‘उदंत मार्तंड’ का प्रकाशन आरंभ हुआ था।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं शोध पत्रिका ‘समागम’ के सम्पादक हैं)

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भास्करहिंदी डॉट कॉम के संपादक धर्मेंद्र पैगवार का विश्लेषण, भोपाल से क्यों हारी कांग्रेस

अपने बयानों को लेकर काफी विवादों में रही थीं भोपाल में बीजेपी की कैंडिडेट प्रज्ञा ठाकुर

Last Modified:
Thursday, 30 May, 2019
Dharmendra Paigwar

इस बार के लोकसभा चुनाव में बहुत कुछ अप्रत्याशित रहा। सबसे पहला तो भाजपा को 300 से ज्यादा सीटें मिलना, दूसरा अमेठी से राहुल गाँधी का हारना और तीसरा साध्वी प्रज्ञा ठाकुर का संसद पहुंचना। चुनाव पूर्व जिस तरह का रुख स्थानीय भाजपा नेताओं में प्रज्ञा को लेकर था और जिस तरह से वह बयानबाजी कर रहीं थीं, उसे देखते हुए यह कहना बेहद मुश्किल था कि भाजपा भोपाल सीट बचा पायेगी।

हालांकि, भास्करहिंदी डॉट कॉम के संपादक धर्मेंद्र पैगवार शुरू से ही कहते आ रहे थे कि भाजपा बड़े मार्जिन से यह सीट जीतेगी। उन्होंने यहां तक कहा था कि जीत का अंतर दो लाख से ज्यादा वोटों से होगा। हमने पैगवार से यह जानने का प्रयास किया कि वो इस जीत को किस नजरिये से देखते हैं और एक ऐसी सीट पर जहां साढ़े चार लाख से ज्यादा मुस्लिम वोटर हैं, वहां एक कट्टर हिंदूवादी प्रत्याशी की जीत कैसी मुमकिन हुई?

धर्मेंद्र पैगवार के मुताबिक, भोपाल में साढ़े चार लाख मुसलमान आज नहीं हुए हैं, यहां नवाबों की रियासत रही है। कांग्रेस ने यहां मुस्लिम वोटों के लिए जितने भी प्रयोग किये हैं, सभी असफल रहे हैं। नवाब मंसूर अली खान पटौदी को 1991 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने प्रत्याशी बनाया था और वह भी दो लाख से ज्यादा मतों से हारे थे। नवाब पटौदी के चुनाव प्रचार में राजीव गांधी ने सभा की थी। क्रिकेटर कपिल देव और पटौदी की पत्नी शर्मिला टैगोर भी चुनाव प्रचार के लिए आई थीं। इसके बावजूद उन्हें बेहद अंजान चेहरे सुशीलचंद्र वर्मा के हाथों शिकस्त का सामना करना पड़ा। सुशील रिटायर्ड आईएएस थे और उनकी भी भाजपा में एंट्री साध्वी की तरह हुई थी, यानी वह भी पैराशूट कैंडिडेट थे।

भोपाल में हमेशा से मतों का ध्रुवीकरण होता रहा है, फिर भले ही चेहरा कोई भी हो। यहां व्यक्ति नहीं, बल्कि पार्टी जीतती है। कांग्रेस की समस्या है कि वो हमेशा से मुस्लिम-मुस्लिम करती है, जिसकी वजह से हिंदू वोट एक पक्ष में चला जाता है। दिग्विजय सिंह ने इस बार कुछ अलग करने का प्रयास किया, मगर उनकी रणनीति में कई पेंच थे। वो बाबाओं को लेकर घूमे, उन्होंने पहले ही सोच लिया कि साढ़े चार मुस्लिम वोट उनकी झोली में आने हैं और बाबाओं के सहारे हिंदू वोटरों का कुछ प्रतिशत भी उन्हें मिलेगा, यहीं वह सबसे बड़ी गलती कर बैठे।

सोशल मीडिया पर उनके पिछले बयानों को वायरल किया जाने लगा, जो उन्होंने हिंदुओं या बाटला हाउस मुठभेड़ आदि के संबंध में दिए थे। विपक्ष यह साबित करने में सफल रहा कि दिग्गी राजा महज वोटों की खातिर हिंदू नाम जप रहे हैं। इससे हिंदू वोटरों को प्रभावित करने की उनकी कोशिशों को तो झटका लगा ही, साथ ही मुस्लिम मतदाता भी कुछ हद तक उनसे दूर चले गए। इसके अलावा उन्होंने शुरुआत में कांग्रेस विधायक आरिफ अकील से यह बयान दिलवाकर कि ‘दिग्विजय सिंह हिंदूवादी नेता हैं’, बड़ी गलती कर दी।

दूसरा, दिग्विजय किस सोच के साथ पायलट बाबा के साथ घूमे, यह भी समझ से परे रहा। पायलट बाबा का भोपाल से कोई वास्ता नहीं है, इसके बजाय यदि वह किसी स्थानीय धर्मगुरु को साथ लाते, तो उन्हें इसका फायदा मिल सकता था। इसके अतिरिक्त सबसे बड़ी बात यह रही कि इस बार का लोकसभा चुनाव हिंदू-मुस्लिम पर नहीं, बल्कि मोदी पर केन्द्रित था। नरेंद्र मोदी को ही केंद्र में रखकर चुनाव लड़ा गया। यदि चुनाव प्रज्ञा सिंह बनाम दिग्विजय सिंह होता तो निश्चित ही जीत दिग्विजय की होती, क्योंकि उन्हें राजनीति का लंबा अनुभव है। लेकिन चुनाव भाजपा बनाम कांग्रेस हो गया। इसलिए मोदी फैक्टर के सहारे प्रज्ञा जीत हासिल करने में कामयाब रहीं।

हर चुनाव में मतदाता और जागरूक होता जा रहा है और इस बार भी उसने राष्ट्रीय मुद्दों को ध्यान में रखते हुए मोदी के नाम पर वोट दिए। इतना ज़रूर है कि साध्वी के शुरूआती बयानों से भाजपा को कुछ नुकसान हुआ, मगर मोदी फैक्टर ने नुकसान की खाई को चौड़ा नहीं होने दिया। गौर करने वाली बात यह है कि सरकारी अधिकारियों के वोट भी सत्तासीन कांग्रेस के बजाय भाजपा के पक्ष में रहे। कुल मिलाकर कांग्रेस और दिग्विजय सिंह अपनी रणनीति को लेकर शुरू से ही भ्रमित रहे, उन्होंने मन में वोटों का गणित तैयार किया और उसी के इर्द-गिर्द प्रयास करते रहे, जिसका फायदा साध्वी को मिला जो पहले से ही मोदी की बदौलत फायदे में थीं। अब देखने वाली बात यह होगी कि यह शिकस्त दिग्विजय के राजनीतिक करियर को कहां ले जाती है।

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