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वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल ने बताया, बांग्लादेश चुनाव भारत के लिए कितने खास

इन दिनों उसने पाकिस्तान की पीठ पर हाथ रखा है ,जहां फौज लोकतंत्र को दशकों से कुचल रही है। लेकिन,अमेरिका को यह नजर नहीं आ रहा है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 2 years ago

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और स्तंभकार ।।

अवामी लीग एक बार फिर बांग्लादेश में सरकार बना रही है। भारत ने वहां जम्हूरियत पसंद सरकार बनने पर खुशी जताई है। भारतीय निर्वाचन आयोग ने भी अपनी प्रेक्षकीय भूमिका में बांग्लादेश के चुनाव आयोग की शैली और उसके काम काज पर संतोष प्रकट किया है। अलबत्ता अमेरिका ने आरोप लगाया है कि वहां निष्पक्ष निर्वाचन नहीं हुए और सत्तारूढ़ पार्टी ने विपक्ष की आवाज कुचलने का काम किया है। यह सच है कि विपक्ष ने चुनाव का बहिष्कार किया था और बड़ी संख्या में प्रतिपक्षी नेता जेलों में हैं। लेकिन किसी भी लोकतंत्र में निर्वाचन का कोई विकल्प नहीं हो सकता। इसलिए विपक्ष के चुनाव बहिष्कार की कोई बहुत सार्थकता नहीं है। यह भी सवाल खड़ा होता है कि क्या किसी भी मामले में सौ फीसदी निष्पक्षता संभव है? मैं कह सकता हूं कि धुरी बदलते मौजूदा विश्व में ऐसी निष्पक्षता अब संभव नहीं है।

चाहे वह कोई भी राष्ट्र हो, सत्ता, सरकार और अंतरराष्ट्रीय हालात का अतिरिक्त दबाव तो होता ही है। ऐसे में अमेरिका का यह आरोप बेमानी है। विदेश नीति में बदलाव के चलते उसे बांग्लादेश के चुनाव में दोष निकालने ही थे। इन दिनों उसने पाकिस्तान की पीठ पर हाथ रखा है, जहां फौज लोकतंत्र को दशकों से कुचल रही है। लेकिन,अमेरिका को यह नजर नहीं आ रहा है। वह प्रसन्न है कि पाकिस्तान ने पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान नियाजी को जेल में डाल रखा है क्योंकि इमरान खान खुल्लमखुल्ला कहा करते थे कि उनकी सरकार गिराने के पीछे अमेरिका का हाथ है। इसलिए पाकिस्तान से प्रसन्नता और बांग्लादेश से नाराजगी उसे दिखानी ही है।

बांग्लादेश यह कैसे भूल सकता है कि उसकी आजादी के आंदोलन में हिन्दुस्तान बेखौफ साथ खड़ा हुआ था और अमेरिका ने खुलकर पाकिस्तान का साथ दिया था। विदेश नीति की ऐसी त्रुटियां या विसंगतियां किसी भी देश को आगे जाकर भारी पड़ती हैं। अफसोस! अमेरिका इससे सबक सीखने के लिए तैयार नहीं है। उसने भारत और पाकिस्तान के मामले में अधिकतर पाकिस्तान पर दांव लगाया है, जो प्रायः ग़लत साबित हुआ है। असल में भारत के साथ समान लोकतांत्रिक देश की तरह वह व्यवहार नहीं करना चाहता। अपने को दुनिया का चौधरी मानते हुए वह सारे राष्ट्रों को अमेरिका का सहायक समझता है। यही उसकी भूल है। वह अपने को चक्रवर्ती सम्राट की भूमिका में देखता है और तमाम देशों को वह युद्ध में पराजित राजा समझता है, जिनके लिए अमेरिका के सामने सिर झुकाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

यह जमींदाराना लोकतंत्र का नमूना है। मान सकते हैं कि कुछ समय पहले उसका रुतबा था। लेकिन हालिया घटनाक्रमों में उसकी भूमिका ने अनेक सवाल भी खड़े किए हैं। दरअसल भारत और बांग्लादेश के बीच सिर्फ यही रिश्ता नहीं है कि कभी दोनों मुल्क एक थे। देखा जाए तो पाकिस्तान भी भारत की कोख से ही निकला हुआ है। मगर, उसने तो कोख का सम्मान नहीं किया। हजार साल की साझा संस्कृति का भी उसने ख्याल नही रखा। इस नजरिए से भारत और बांग्लादेश की गर्भनाल एक है। जिस राष्ट्र का नाम ही बंगला भाषा पर हो और जहां की राष्ट्रभाषा बांग्ला हो, जिसका राष्ट्रगान गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा हो और जिसके राष्ट्रपिता को भारत में भी उतना ही मान मिलता हो, जितना उनके अपने देश में तो उसकी गर्भनाल भारत से अलग कैसे हो सकती है।

इसके उलट पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना को तो भारत में ही खलनायक माना जाता है और भारत की तो छोड़िए, अब तो पाकिस्तान भी जिन्ना को याद नहीं करना चाहता। जिन्ना अपने जीते जी ही पाकिस्तान में पराएपन का शिकार बन गए थे। शेख़ हसीना मुल्क़ के संस्थापक और पहले राष्ट्रपति रहे शेख मुजीबुर्रहमान की बेटी हैं। वे पांचवीं बार मुल्क की बागडोर संभालेंगीं। जब बागी सैनिकों ने उनके पिता समेत पूरे परिवार को मार डाला तो शेख हसीना बांग्ला देश में नहीं थीं। वे लन्दन में थीं। वहां से वे भारत आईं क्योंकि उनको अपने ही देश में जान का खतरा था। भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उनको लंबे समय तक सुरक्षा और संरक्षण दिया। उसी की बदौलत उन्होंने बांग्लादेश में अवामी लीग को जीवित किया। आज भी बांग्लादेश के लोग शेख मुजीबुर्रहमान और भारत की भूमिका को याद रखते हैं।

स्वयं शेख हसीना हिन्दुस्तान को अपना दूसरा घर मानती हैं। इसलिए बांग्लादेश में उनका चुनाव जीतना यकीनन भारत के साथ स्थिर और भरोसेमंद संबंधों की गारंटी मानी जा सकती है। इसके अलावा भारत का स्थायी समर्थन बांग्लादेश को सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी राहत देता है। चुनाव के बाद बांग्लादेश की तस्वीर कैसी होगी। हिन्दुस्तान के पड़ोसियों पर चीन और अमेरिका जिस तरह अपना प्रभाव बढ़ा रहे हैं, वह भारतीय उप महाद्वीप की सुरक्षा और शांति के लिए गंभीर चेतावनी है। चीन ने बांग्लादेश को घेरने और ललचाने की अनेक कोशिशें की हैं, पर वे कामयाब नहीं रही हैं। हालांकि उसका व्यापार संतुलन भारत की तुलना में बेहतर है। शेख हसीना को अपने पांचवें कार्यकाल में देश के सामने विकराल आर्थिक चुनौतियों से निपटना होगा। भारत से उसका सड़क, रेल और कारोबारी संपर्क दिनों दिन बेहतर हो रहा है।

दाल, चावल, सब्जियों से लेकर बिजली उत्पादन में भारतीय सहयोग से उसकी अनेक समस्याएं हल भी हुई हैं। उम्मीद कर सकते हैं कि दोनों राष्ट्रों के बीच व्यापार संतुलन में सुधार होगा और शेख हसीना टिकाऊ सरकार दे सकेंगीं। हां विपक्ष के बारे में उन्हें निश्चित रूप से अपने रवैये को बदलने की जरूरत है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

साभार - लोकमत समाचार


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