विकास में पैसा लगता नहीं, बनता है: पूरन डावर

यदि खबरें ठीक हैं तो निश्चय ही अच्छे दिन आने वाले हैं। सरकार की नीतियों और सोच को नमन। गड्डों को भरना, अच्छे बसअड्डे, रेलवे स्टेशन, रोड व्यवस्था और क्या चाहिये।

पूरन डावर by
Published - Friday, 26 March, 2021
Last Modified:
Friday, 26 March, 2021
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यदि खबरें ठीक हैं तो निश्चय ही अच्छे दिन आने वाले हैं। सरकार की नीतियों और सोच को नमन। गड्डों को भरना, अच्छे बसअड्डे, रेलवे स्टेशन, रोड व्यवस्था और क्या चाहिये। रोड पर बिल्डर खर्च करें, हमारे टैक्स का पैसा न लगे, बसअड्डों पर पूरी सुविधा हो, पैसा भी सरकार का न लगे, यही तो विकसित देशों में होता है।  विकास में पैसा लगता नहीं, बनता है।

अधिक विकास-अधिक समृद्ध, भारत जितना निजीकरण होगा उतनी ही अच्छी सुविधा। रेलवे स्टेशन यदि निजी हाथों में हों तो मेट्रो स्टेशन से कम नहीं। रेस्टोरेंट भी, शॉपिंग भी, एयर कंडिशन का मजा भी... जो दिखता है वो बिकता है। देश की अर्थव्यवस्था भी तेजी से भागती है। स्टेशन पर समय से पहले पहुंच गए तो कॉफी भी पी रहे हैं, शॉपिंग भी कर रहे हैं।

बस स्टैंड जब निजी उपक्रम बनाएंगे, तो किसी मॉल से कम नही होंगे। साफ सुथरे होंगे। व्यवस्थित होंगे। बसें सरकारी भी होंगी, प्राइवेट भी। शर्म आती है आगरा का आईएसबीटी देखकर। लगता है किसी गांव में है अंतरराष्ट्रीय शहर में नहीं।

अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए सर्वाधिक महत्व है घाटे की घरों को बंद करना। उसके दो उपाय हैं, या बंद या निजीकरण। निजीकरण से एक नहीं, दो नहीं, तीन लाभ होते हैं। पहला सरकार का घाटा बंद, दूसरा बंद करने से सुविधा-सेवा समाप्त और लागत का डूब जाना। निजीकरण से लागत जो लग चुका है उसका कुछ हिस्सा मिल जाता। निजी उपक्रमों की गुणवत्ता कई गुनी होती है। निजी संस्थान जो कमाते हैं, उस पर टैक्स भी मिलता है। निजी उपक्रम अच्छी सेवा देकर, पैसा बनाते हैं। यदि उल्लंघन करते हैं तो सरकार है, अदालतें है सरकारी उपक्रम के विरुद्द आप कुछ नहीं कर पाते। सीमित सोच के व्यक्ति सिर्फ व्यक्तिगत आरोप लगा सकते हैं, बेच दिया-बेच दिया कर सकते हैं।  

सरकार का कार्य मूलभूत सेवाएं उपलब्ध कराना है। सुरक्षा देना है, कानून व्यवस्था बनाना, जो अब तक हो रहा था वह कतई गलत नही था। निजी उपक्रम तब तक नहीं आते जब तक लाभदायक न हों। सरकार को सेवा देनी ही है, लेकिन जब घाटे का बोझ बढ़ जाता है और समय के साथ निजी उपक्रम के लिये व्यवहार्य भी हो जाता है। ‘बेच दिया-बेच दिया’ से हास्यास्पद सोच कोई हो नहीं सकती।

बैंक निजी होतीं, तो माल्या को भगा दिया या चौकसी को भगा दिया, बड़े आदमी के कर्जे नफा कर दिया। बैंकिंग एक व्यवसाय है ब्याज कमाते हैं, तो जोखिम भी होगा। हर व्यवसाय में जोखिम होता है, जोखिम न हो तो सभी व्यवसाय कर लें। बैंक जब करोड़ों ब्याज कमाती हैं, तो कुछ एनपीए भी होंगे। हर व्यवसाय में लेनदारियां मरती हैं। सरकारी बैंक होते हैं, तो राजनीतिक हस्तक्षेप की संभावना होती है। एनपीए भी बढ़ते हैं। सरकार पर माफ करने के आरोप लगते रहते हैं। राजनीति हस्तक्षेप से गलत सेटलमेंट होते भी हैं। आरोप लगता है जनता के टैक्स का पैसा लेकर भाग गये और सरकार ने कुछ नहीं किया। लिहाजा एकमात्र उपाय है- निजीकरण। जब राष्ट्रीयकरण हुआ था, तो उस समय देश की आवश्यकता थी। आज उससे निकलने की आवश्यकता है। आज बैंकिंग परिपक्व हो चुकी है। सरकार को केवल छोटे-छोटे ऋण और किसानों के लिए सहकारी बैंक की ही व्यवस्था करनी चाहिए।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल ने बताया, कांग्रेस चिंतन शिविर से पार्टी को कैसे मिली प्राणवायु

कांग्रेस का चौथा चिंतन शिविर अरसे बाद कुछ स्पष्ट और ठोस संकल्पों के साथ संपन्न हुआ। इस शिविर में लंबे समय से दल में अनेक मसलों पर छाया कुहासा दूर होता दिखाई दे रहा है।

Last Modified:
Tuesday, 17 May, 2022
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कांग्रेस का चौथा चिंतन शिविर अरसे बाद कुछ स्पष्ट और ठोस संकल्पों के साथ संपन्न हुआ। इस शिविर में लंबे समय से दल में अनेक मसलों पर छाया कुहासा दूर होता दिखाई दे रहा है। तीन साल पहले 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद यह बुजुर्ग पार्टी निराशा और हताशा की स्थितियों का सामना कर रही थी। पांच प्रदेशों के विधानसभा चुनावों में मिली पराजय ने अवसाद को और घना कर दिया था। उसके बाद पार्टी छोड़कर जाने वाले कार्यकर्ताओं और नेताओं की तादाद में बढ़ोत्तरी हुई थी।

नेतृत्व पर सवाल उठाए जाने लगे थे और कहा जाने लगा था कि अब कांग्रेस का भगवान ही मालिक है लेकिन इधर हाल ही में समूह-23 के सदस्यों ने जिस अंदाज में पार्टी के पुनर्गठन और गंभीर मसलों पर स्पष्टता की खुलकर मांग की और उसके बाद प्रशांत किशोर प्रसंग के दौरान पार्टी सुर्खियों में आई, उसने आलाकमान को त्वरित कार्रवाई के लिए विवश कर दिया था। वास्तव में कांग्रेस की ओर देशभर के मतदाता भी टकटकी लगाए देख रहे थे। उनकी चिंता लोकतंत्र की सेहत को लेकर थी, जिसमें पक्ष तो बेहद मजबूत था लेकिन प्रतिपक्ष का आकार चुनाव दर चुनाव अत्यंत महीन और दुर्बल हो रहा था। 

उदयपुर चिंतन शिविर से पार्टी को निश्चित रूप से प्राणवायु मिली है। इसे शिविर की सबसे बड़ी उपलब्धि माना जा सकता है। पार्टी के इस चौथे चिंतन शिविर में शिमला में 2003 में हुए दूसरे चिंतन शिविर की छाप नजर आई। एक बार फिर पार्टी ने आर्थिक और सामाजिक मुद्दों के प्रति संवेदनशीलता प्रकट की। पूर्व वित्त मंत्री चिदंबरम ने कहा कि आर्थिक उदारीकरण का लाभ कांग्रेस पार्टी की सरकार के दौरान 1991 से 1996 के मध्य देश को मिल चुका है। लेकिन मौजूदा परिदृश्य उदारीकरण की अवधारणा में परिवर्तन मांग रहा है। इसकी समीक्षा करने की आवश्यकता है। जब नरसिंह राव और डॉ. मनमोहन सिंह की जोड़ी ने तीन दशक पहले इन परिवर्तनों की शुरुआत की थी तो उससे पहले भारत की वित्तीय हालत जर्जर हो चुकी थी। 

प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के कार्यकाल में सोने का रिजर्व भंडार गिरवी रखना पड़ा था और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिन्दुस्तान की वित्तीय साख गिरी थी। भारत ने जब परदेसी कंपनियों के लिए दरवाजे खोले और पूंजी निवेश को न्यौता दिया तो उसके सकारात्मक परिणाम मिले थे। देखते ही देखते भारतीय अर्थव्यवस्था कुलांचे भरने लगी थी लेकिन आज के भारत की प्राथमिकताएं अलग हैं। विदेशी पूंजी निवेश को निमंत्रण हमेशा कारगर नहीं होता और न ही औद्योगिक घरानों के हाथों में मुल्क को सौंपकर निश्चिंत हुआ जा सकता है। 

वर्तमान परिस्थितियों में भारत के लिए नेहरू युग के समाजवाद और सहकारिता पर जोर देना जरूरी है। तभी सामाजिक सशक्तिकरण का लक्ष्य पूरा हो सकता है। इसके अलावा बेरोजगारी की समस्या दूर करने और खुशहाली का कोई मंत्र नहीं हो सकता। कांग्रेस के लिए एक और चुनौती नए खून को अवसर देने की है। प्रथम पंक्ति के नेता सिकुड़ते जा रहे हैं। एक तरफ पार्टी उनकी कमी महसूस कर रही है तो दूसरी ओर नौजवान पीढ़ी को संगठन में समुचित प्रतिनिधित्व नहीं मिलने से उनमें कुंठा बढ़ती जा रही है। राजनीतिक जीवन में पचास-पचपन की आयु के बाद कुछ कर दिखाने के मौके भी सीमित हो जाते हैं। 

बीते दिनों इस आयु वर्ग के पार्टी कार्यकर्ताओं तथा नेताओं की निराशा का कारण भी यही था। अपनी पार्टी छोड़कर जाने का यह भी एक बड़ा कारण रहा है। सिंधिया हों या जतिन प्रसाद, आरपीएन सिंह हों या कोई अन्य- सभी अपनी सर्वाधिक ऊर्जा के साथ पार्टी को कुछ न कुछ देना चाहते थे। वे पार्टी के हित में, संगठन को पुनर्जीवित करने के लिए अपने आपको झोंकने के लिए तैयार थे, मगर आलाकमान उन्हें संगठन के काम में भी नहीं लगा रहा था। अध्यक्ष सोनिया गांधी ने साफ कर दिया है कि पार्टी अब देने की स्थिति में नहीं रही है, बल्कि पार्टी के लिए अपने आपको समर्पित करने का समय आ गया है। 

एक वर्ग राहुल गांधी को एक बार फिर पार्टी की कमान सौंपने के पक्ष में है। चूंकि राष्ट्रीय स्तर पर चुनाव प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी है, आने वाले दिनों में इसका भी निर्णय हो जाएगा। यदि गांधी परिवार अपने को नेतृत्व की दौड़ से अलग करता है तो फिर सिवाय अशोक गहलोत के कोई अन्य राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए नहीं दिखाई देता। माना जा सकता है कि संगठन चुनाव के बाद जो कांग्रेस इस देश के सामने प्रस्तुत होगी, उसमें नए और पुराने खून का पर्याप्त मिश्रण होगा। चिंतन शिविर में पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के हवाले से बेहद महत्वपूर्ण बात कही गई है। 

उन्होंने जोर दिया है कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं को आम अवाम के साथ जीवंत रिश्ता बनाने की जरूरत है। बताने की आवश्यकता नहीं कि आज की कांग्रेस का प्रदेश, जिला, तहसील और पंचायत स्तर पर संवाद टूटा हुआ है। जब तक यह दोबारा स्थापित नहीं होता, तब तक पार्टी के लिए आगामी चुनाव में आक्रामक अंदाज में भाजपा का मुकाबला करना कठिन होगा। मैं याद कर सकता हूं कि इंदिरा गांधी के नहीं रहने पर भी ऐसी ही परिस्थितियां बनी थीं। तब कांग्रेस के शताब्दी वर्ष में दिल्ली तथा मुंबई में बड़े अधिवेशन हुए थे। 

उनमें तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने पंडित जवाहरलाल नेहरू के 1936 में लखनऊ में दिए गए एक भाषण का जिक्र किया था। उस भाषण में नेहरूजी ने कहा था कि कांग्रेस ने जनता से संपर्क खो दिया है। कांग्रेस कमजोर होकर सिकुड़ती जा रही है इसलिए इसकी शक्ति पहले से घट गई है। राजीव गांधी के इस भाषण का असर हुआ था और युवा कांग्रेस, महिला कांग्रेस, छात्र कांग्रेस तथा संगठन का धमनियों और शिराओं में प्रभाव दिखने लगा था। क्या उदयपुर के चिंतन शिविर का असर भी आने वाले दिनों में दिखाई देगा?

(साभार: लोकमत)

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'अब दो गुटों में बंटेगी विश्व राजनीति, फूंक-फूंककर रखने होंगे भारत को कदम'

‘नाटो’ नामक सैन्य संगठन में अब यूरोप के दो नए देश भी जुड़नेवाले हैं। ये हैं- फिनलैंड और स्वीडन।

Last Modified:
Saturday, 14 May, 2022
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डॉ. वेदप्रताप वैदिक, वरिष्ठ पत्रकार ।।

नाटो का विस्तार और भारत

‘नाटो’ नामक सैन्य संगठन में अब यूरोप के दो नए देश भी जुड़नेवाले हैं। ये हैं- फिनलैंड और स्वीडन। इस तरह 1949 में अमेरिका की पहल पर बने 15 देशों के इस संगठन के अब 32 सदस्य हो जाएंगे। यूरोप के लगभग सभी महत्वपूर्ण देश इस सैन्य संगठन में एक के बाद एक शामिल होते गए, क्योंकि शीतयुद्ध के जमाने में उन्हें सोवियत संघ से अपनी सुरक्षा चाहिए थी और सोवियत संघ के खत्म होने के बाद उन्हें स्वयं को संपन्न करना था।

फिनलैंड, स्वीडन और स्विटजरलैंड जान-बूझकर सैनिक गुटबंदियों से अलग रहे लेकिन यूक्रेन पर हुए रूसी हमले ने इन देशों में भी बड़ा डर पैदा कर दिया है। फिनलैंड तो इसलिए भी डर गया है कि वह रूस की उत्तरी सीमा पर अवस्थित है। रूस के साथ उसकी सीमा 1340 किमी की है, जो नाटो देशों से दुगुनी है। फिनलैंड पर हमला करना रूस के लिए यूक्रेन से भी ज्यादा आसान है। यूक्रेन की तरह फिनलैंड भी रूसी साम्राज्य का हिस्सा रहा है। सेंट पीटर्सबर्ग से मास्को जितनी दूर है, उससे भी कम दूरी (400 किमी) पर फिनलैंड है। द्वितीय महायुद्ध के बाद फिनलैंड तटस्थ हो गया लेकिन स्वीडन तो पिछले 200 साल से किसी भी सैन्य गठबंधन में शामिल नहीं हुआ। अब ये दोनों देश नाटो में शामिल होना चाहते हैं, यह रूस के लिए बड़ा धक्का है।

उधर दक्षिण कोरिया भी चौगुटे (क्वाड) में शामिल होना चाह रहा है। ये घटनाएं संकेत दे रही हैं- नई वैश्विक गुटबाजी के! रूस और चीन मिलकर अमेरिका को टक्कर देना चाहते हैं और अमेरिका उनके विरूद्ध सारी दुनिया को अपनी छतरी के नीचे लाना चाहता है। यदि फिनलैंड और स्वीडन नाटो की सदस्यता के लिए अर्जी डालेंगे तो भी उन्हें सदस्यता मिलने में साल भर लग सकता है, क्योंकि सभी 30 देशों की सर्वानुमति जरूरी है।

नाटो के महासचिव ने इन दोनों देशों का स्वागत किया है लेकिन मास्को ने काफी सख्त प्रतिक्रिया दी है। रूसी प्रवक्ता ने कहा है कि नाटो का यह विस्तार रूसी सुरक्षा के लिए सीधा खतरा है। रूस चुप नहीं बैठेगा। वह जवाबी कार्रवाई करेगा। वह फौजी, तकनीकी और आर्थिक कदम भी उठाएगा। रूस ने धमकी दी है कि वह फिनलैंड को गैस की सप्लाय बंद कर देगा। वह बाल्टिक समुद्र के तट पर परमाणु प्रक्षेपास्त्र तैनात करने की भी तैयारी करेगा। इन सब धमकियों को सुनने के बावजूद इन देशों की जनता का रुझान नाटो की तरफ बढ़ रहा है। इनकी 70-80 प्रतिशत जनता नाटो की सदस्यता के पक्ष में है, क्योंकि नाटो चार्टर की धारा 5 कहती है कि नाटो के किसी एक सदस्य पर किए गए हमले को सभी तीसों सदस्यों पर हमला माना जाएगा।

यदि यूक्रेन नाटो का सदस्य होता तो रूस की हिम्मत ही नहीं होती कि वह उस पर हमला करे। यूक्रेन की फजीहत इसीलिए हो रही है कि वह नाटो का सदस्य नहीं है। ऐसा लगता है कि अब विश्व राजनीति फिर से दो गुटों में बंटने वाली है। यह खेल ज़रा लंबा चलेगा। भारत को अपने कदम फूंक-फूंककर रखने होंगे। भारतीय विदेश नीति को अपना ध्यान दक्षिण और मध्य एशिया के पड़ोसी देशों पर केंद्रित करना होगा। इन देशों को गुटीय राजनीति में फिसलने से बचाना भारत का लक्ष्य होना चाहिए।

(लेखक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं)

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'चुनौतियों से लड़ना और पाठकों के मन को समझना बखूबी जानते हैं अभिषेक मेहरोत्रा'

डिजिटल दुनिया में जहां अनगिनत कॉम्पिटिटर हैं, वहां नंबर वन का मुकाम हासिल करना आसान नहीं होता, लेकिन अभिषेक ने यह कर दिखाया।

नीरज नैयर by
Published - Saturday, 14 May, 2022
Last Modified:
Saturday, 14 May, 2022
Abhishek Mehrotra

अभिषेक मेहरोत्रा ने ‘जी न्यूज’ के साथ अपनी पारी समाप्ति की घोषणा कर दी है। करीब सवा दो साल तक उन्होंने यहां सेवाएं दीं और करीब इतना ही समय मैं भी Zee से जुड़ा रहा, इसलिए मैं बेहतर ढंग से जानता हूं कि उन्होंने नंबरों की दौड़ में जी डिजिटल को पीछे से उठाकर सबसे आगे लाने के लिए क्या कुछ किया। डिजिटल दुनिया में जहां अनगिनत कॉम्पिटिटर हैं, वहां नंबर वन का मुकाम हासिल करना आसान नहीं होता, लेकिन अभिषेक ने यह कर दिखाया।

इस ‘मुकाम’ तक पहुंचने के लिए उन्होंने अपनी पर्सनल लाइफ को कुछ समय के लिए किनारे रख दिया। अलसुबह से एक्टिव हो जाना और देर रात तक ख़बरों में उलझे रहना, उनका रूटीन बन गया था। उन्होंने अपनी छुट्टियों को कुर्बान करने में भी कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाई, उल्टा कई दफा मुझे उन्हें बोलना पड़ा कि ‘भाई अब आराम भी कर लो’।

जहां तक मैं अभिषेक को जानता हूं, उन्हें चुनौतियां पसंद हैं और चुनौतियों से लड़ना भी उन्हें बखूबी आता है। वो पाठक के मन को समझते हैं और उसी ‘समझ’ के प्रयोग से खबरें तैयार करवाते हैं। इसलिए अभिषेक के नेतृत्व में हर बड़े मौके पर ‘जी डिजिटल’ दूसरों से आगे खड़ा रहा। फिर चाहे वो चुनाव हों या रूस-यूक्रेन युद्ध, बतौर एडिटर अभिषेक की पूरी कोशिश रही कि हर एक जरूरी बात पाठकों तक पहुंचे, और ऐसा बाकायदा हुआ भी।

किसी भी वेंचर की सफलता उसके लीडर और उस लीडर के अपनी टीम के साथ संबंध पर निर्भर करती है। ‘राजा’ कितना भी बलशाली, बुद्धिमान क्यों न हो, यदि वो अपनी सेना के साथ रिश्ता कायम करने में नाकाम रहता है, तो सफलता उसके लिए दूर की कौड़ी साबित होती है। अभिषेक ने एक ऐसे लीडर के तौर पर ‘जी‘ में खुद को स्थापित किया, जिनसे टीम के सदस्य बिना किसी खौफ के कोई भी बात कर सकते थे। उन्होंने हर शख्स के साथ पर्सनल बॉन्डिंग बनाई, उन्हें श्रेष्ठ  से सर्वश्रेष्ठ करने के लिए प्रेरित किया।

अभिषेक के साथ बातचीत कभी एक-तरफा नहीं रही। उन्होंने टीम के सदस्यों की बातों को सुना, समझा और जरूरत अनुसार उन पर अमल भी किया। यही एक अच्छे लीडर की क्वालिटी होती है और इसी वजह से ‘जी डिजिटल‘ की टीम समय के बंधन को तोड़कर काम कर पाई और बेहतरीन परिणाम दे पाई।

ये सही है कि कोई भी संस्थान किसी के जाने से नहीं रुकता, लेकिन उसकी कमी का अहसास हमेशा बना रहता है। निश्चित तौर पर ‘जी न्यूज‘ को भी अभिषेक मेहरोत्रा की कमी खलेगी। अभिषेक को उनकी नई पारी के लिए अनंत शुभकामनाएं।

(पत्रकार नीरज नैय्यर की फेसबुक वॉल से साभार)

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जुड़वां भाइयों में भी नहीं मिलता ऐसा संयोग, जैसा मेरा शिव अनुराग के साथ था: राजेश बादल

शिव अनुराग याने रामू को गए एक बरस हो गया। यकीन तो अभी भी नहीं होता। लगता है कि अभी कहीं किसी यात्रा पर गए हो। अभी अभी लौटकर आओगे। मुस्कुराओगे।

Last Modified:
Thursday, 12 May, 2022
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राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

शिव अनुराग याने रामू को गए एक बरस हो गया। यकीन तो अभी भी नहीं होता। लगता है कि अभी कहीं किसी यात्रा पर गए हो। अभी अभी लौटकर आओगे। मुस्कुराओगे। फिर अचानक गंभीर हो जाओगे। कहीं खो जाओगे। फिर पल भर में लौट कर सामान्य हो जाओगे। अपनी तकलीफ और तनाव को भूलकर सामान्य हो जाना तुम्हारी दशकों पुरानी आदत थी। यही तुम्हारी अदा थी। आज सोच रहा हूं तो यादों की फिल्म चल रही है। 

हम लोगों का जन्म छतरपुर में हुआ। जब होश संभाला तो हम दोनों जिले के एक आदिवासी गांव अनगौर में थे। हम दोनों के पिता वहां एक ही स्कूल में थे। एक ही दिन सीधे पांचवीं कक्षा में पढ़ाई के लिए प्रवेश लिया था। हम दोनों की प्रवेश परीक्षा भी साथ साथ हुई थी एक ही फट्टी पर अगल बगल बैठते थे। फिर आठवीं कक्षा तक साथ पढ़े। स्कूल पैदल जाते थे तीन चार किलोमीटर रोज बस्ता टांगे। एक ही क्लास में। क्या संयोग था कि हम लोग वर्षों तक प्रथम श्रेणी में पहले तीन स्थान शेयर करते रहे। दूसरा स्थान उत्तम याने उपेन्द्रनाथ शेयर करते थे। उत्तम शिव अनुराग के ताऊजी के बेटे थे। इस तरह हमारी तिकड़ी थी। मेरी छोटी तीन बहनें थीं और रामू की भी छोटी तीन बहनें थीं।सातवीं कक्षा में हम लोगों को एक साथ ही साइकिल मिली। मेरी एटलस थी। सेकंड हैंड। रामू की हीरो थी। उनका घर का नाम रामू था। हम लोग उन्हें रामू ही कहते थे। शिव अनुराग शायद ही कभी कहा हो, याद नहीं आता।

उसके बाद हमारे पिताओं का तबादला चंद्रनगर हो गया। दसवीं ग्यारहवीं चंद्रनगर में पढ़े। एक ही मकान के दो हिस्सों में रहते थे। फिर एक ही महाराजा कॉलेज छतरपुर से बीएससी किया। क्या संयोग था कि हम दोनों फर्स्ट ईयर में फेल हो गए। उत्तम पास हो गए। एक तो इस कारण और दूसरा पत्रकारिता के कारण हमारी- याने रामू, उत्तम और मेरी तिकड़ी टूट गई। उत्तम पत्रकारिता में नहीं आए। लेकिन तिकड़ी फिर भी बनी रही। उसमें विभूति शर्मा जुड़ गए थे। फिर हमने आगे पीछे एमए इतिहास में किया। बीएससी की सालाना परीक्षा के पहले पर्चे के दिन जब रामू परीक्षा के लिए निकल रहे थे और जूते पहन रहे थे, तो उसमें छिपे बिच्छू ने काट लिया और रामू परीक्षा नहीं दे पाए। इस तरह एक साल का अंतर हो गया। इसी अंतर के कारण मैंनें उन्हें इतिहास एमए फाइनल में पढ़ाया। फिर हमने आगे पीछे पत्रकारिता शुरू कर दी। वे ‘दैनिक जागरण’ रीवा में 1978 में जुड़े और मैं एक डेढ़ साल पहले 1977 में ‘दैनिक जागरण’ झांसी का संवाददाता हो गया था। फिर ‘शुभभारत’ के संपादक श्याम किशोर अग्रवाल के संपर्क में आए। इसके बाद ‘राष्ट्रभ्रमण’ के संपादक सुरेंद्र अग्रवाल और ‘क्रांतिकृष्ण’ के संपादक अजय दोसाज के साथी बने। तीनों अखबारों में नियमित बैठकें जमती थीं लेकिन महफिल तो श्याम जी के ‘शुभ भारत’ में ही जमती थी। फिर हम सब ने मिलकर प्रशासन से लड़ाई लड़ी और उत्पीड़न का विरोध किया। हमारी नियति जहां हमें ले जाना चाहती थी, उसमें छतरपुर कांड ने बड़ा योगदान किया। अपने सिद्धांतों, सरोकारों और उसूलों की खातिर लड़ना इसी दौर में हमने सीखा। यह हमें जिंदगी भर काम आया। हम दोनों ने एक ही आकाशवाणी केंद्र छतरपुर में साथ-साथ अनेक कार्यक्रम बनाए। फिर मैं इंदौर ‘नईदुनिया’ गया, तो छह माह बाद प्रधान संपादक राजेंद्र माथुर जी से अनुरोध कर रामू और विभूति को भी बुला लिया। करीब पांच साल एक ही अखबार में रहे। इंदौर में पहले श्रीस्पोर्ट्स क्लब के राजबाड़ा स्थित हॉल में फिर सुदामानगर में एक ही घर में रहे। और तो और आगे पीछे एक ही कंपनी का स्कूटर खरीदा। विजय सुपर। दोनों के स्कूटरों का रंग हरा था। सब कुछ अनायास ही हुआ। कुछ भी हमने पहले बात करके तय नहीं किया था। पत्रकारिता करते हुए तो पहले ही श्रीधर जी के संपर्क में आ गए थे। उनके निर्देश पर मध्यप्रदेश में ‘पत्रकारिता का इतिहास’ पुस्तक के लिए एक साथ संयुक्त आलेख लिखा। वह हमारे जीवन की पहली पुस्तक थी। सन 1981 का माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता पुरस्कार मुझे मिला और फिर दो तीन बरस बाद रामू को यह सम्मान मिला। सत्यनारायण तिवारी लाइफ टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड मुझे मिला। उसके कुछ समय बाद रामू को। रामू को राजेंद्र माथुर फेलोशिप मिली, उसकी चयन समिति का मैं सदस्य था। हम दोनों ने ‘ब्लिट्ज’, ‘रविवार’, ‘धर्मयुग’, ‘नवभारत टाइम्स’ और ‘जनसत्ता’ में लगातार लिखा।

उसके बाद मैं ‘नवभारत टाइम्स’ में चला गया। वे ‘जनसत्ता’ में। याने दोनों राष्ट्रीय अखबारों में। लौटे तो एक ही शहर भोपाल में। फिर जिस दैनिक ‘नईदुनिया’ में मैनें समाचार संपादक के रूप में काम किया, उसी कुर्सी पर रामू मेरे इस्तीफे के बाद बैठते थे। इसके बाद वे ‘संडे मेल’ में थे और मैं ‘संडे ऑब्जर्वर’ के साथ अनुबंध पर काम कर रहा था। इसके बाद दूरदर्शन के लिए मैंने ‘दस्तक’ धारावाहिक का निर्माण किया। जब मैंनें यह अनुबंध छोड़ा तो रामू ने भी वही दस्तक बनाना शुरू किया। कुछ समय स्वतंत्र पत्रकारिता की। मैं भी स्वतंत्र पत्रकार था। इन्हीं दिनों मैंने क्वालिस गाड़ी खरीदी। इसके कुछ दिन बाद रामू ने भी क्वालिस खरीदी। हम दोनों पांच और छह नंबर पर रहते थे और दोनों के मकानों का जोड़ आठ बनता था। एक और निजी बात। रामू की ससुराल जबलपुर में और मेरी आधी ससुराल जबलपुर में। वैसे मेरे ससुर जी जबलपुर के पड़ोसी जिले नरसिंहपुर के रहने वाले थे। रामू की पत्नी तीन बहनें हैं और मेरी पत्नी भी तीन बहनें हैं। रामू की पत्नी शिक्षिका हैं और मेरी पत्नी भी शिक्षिका हैं। उनकी बड़ी बेटी है और मेरी भी बड़ी बेटी है। 

क्या ऐसा संयोग किन्ही दो व्यक्तियों के जीवन में आता है? जुड़वां भाइयों में भी नही देखने को मिलता। भाई रामू। तुम बड़े धोखेबाज निकले। कोरोना की दूसरी लहर में दोस्तों को एक के बाद एक जाते हुए देखकर मन विचलित होने लगा था। सोचा था कोरोना काल में महाकाल के पास जाने वाले साथियों पर अब नहीं लिखूंगा। हर बार लगता है कि अपना एक हिस्सा चला गया। लेकिन रामू ने लिखवा ही लिया। अपनी जीवन यात्रा में हम लोग आगे पीछे ही रहे, मगर आखिरी सफर पर वे चुपचाप आगे निकल गए। हां एक ही कमी रह गई। हम खुलकर लड़ नहीं पाए। ऐसा नहीं था कि हमारे मतभेद नहीं थे, पर हम दोनों ही उन अवसरों को टालते रहे। रिश्ता लंबा चलाने का शायद यह भी एक मंत्र था, जो हम दोनों जानते थे। हमारा कुछ लड़ना बाकी था ।

अब नज़ा का आलम है मुझ पर, तुम अपनी मोहब्बत वापस लो।

जब कश्ती डूबने लगती है, तो बोझ उतारा करते हैं।

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हिंदी भाषा की 'गंगोत्री' सूखने से आखिर किसका नुकसान मिस्टर मीडिया!

सारी दुनिया अपनी बोलियों और कमजोर पड़ रही भाषाओं को बचाने का संकल्प लेती है। भारत में हम उनको मारने की साजिश करते हैं।

राजेश बादल by
Published - Wednesday, 11 May, 2022
Last Modified:
Wednesday, 11 May, 2022
Hindi

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

फैसला अजीब है। समझ से परे है। इससे आकाशवाणी के तमाम केंद्रों को झटका लगा है। करोड़ों देशवासी दुःखी हैं। जिस भाषा-बोलियों में विविधता के कारण हम भारतीय संस्कृति पर गर्व करते आए हैं, आजादी के अमृत महोत्सव वाले साल में उन बोलियों पर जहर छिड़का जा रहा है। इसे छिड़कने का काम प्रसार भारती ने किया है। फैसला यह है कि तमाम केंद्रों पर बोलियों के अधिकांश कार्यक्रमों का प्रसारण बंद कर दिया जाए और राष्ट्रीय स्तर से प्रसारित कार्यक्रमों को ही प्रादेशिक और क्षेत्रीय केंद्र दिखाएं। कुछ बेहद पुराने और प्रतिष्ठित आकाशवाणी केंद्रों पर भी ताला लटकाने का निर्णय लेने की खबरें हैं। इन बेतुके निर्णयों को कौन पसंद करेगा?

पहले ही अनेक भारतीय भाषाओं और बोलियों पर तलवारें लटकी हुई थीं। कई तो उनका निशाना भी बन चुकी हैं। कुछ समय पुराने आंकड़े बताते हैं कि देश की चालीस से अधिक भाषाएं या बोलियां विलुप्त होने के कगार पर हैं। इन्हें बोलने वाले बमुश्किल कुछ हजार बचे हैं। भारत में एक लाख से ज्यादा लोगों के बीच 22 अनुसूचित और एक सौ गैर अनुसूचित भाषाएं या बोलियां प्रचलित हैं। देखने में यह जानकारी बहुत चिंता नहीं जगाती, क्योंकि दुनिया के किसी अन्य देश में इतनी समृद्ध भाषा परंपरा नहीं है।

कहा जाता है कि भारतीय समाज में जितनी भाषा-बोली की विविधता है, उतनी कहीं नहीं। इसीलिए गर्वबोध बनाए रखने के लिए अपनी भाषाओं और बोलियों की रक्षा भी हमारी जिम्मेदारी है। इसी मकसद से आकाशवाणी को अपनी बोलियों और भाषाओं का अधिक से अधिक विस्तार का काम सौंपा गया था। यह काम अभी भी अधूरा है। शायद ही किसी को याद हो कि भारतीय उप महाद्वीप ने ही सबसे पहले बोलियों और भाषाओं पर कतरा सूंघा था। हिंदुस्तान के बंटवारे के बाद। पाकिस्तान ने बांग्लादेश पर मातृभाषा बंगला की जगह उर्दू थोपी। उन्नीस सौ बावन में।(उन दिनों बांग्लादेश नहीं बना था)। आम अवाम ने इसका भारी विरोध किया। छात्र सड़कों पर उतर आए। पुलिस ने गोलियां बरसाईं। कई छात्र मारे गए।

अपनी बोली के लिए शहीद होने का यह अनूठा आंदोलन था। अगले साल से बंगला बोलने वालों ने वह दिन मातृभाषा दिवस के रूप में मनाना शुरू कर दिया। पैंतालीस साल बाद यूनेस्को ने इसे समर्थन दिया। उन दिनों विकसित देशों के समाज भी अपनी मातृभाषा पर आधुनिक सांस्कृतिक और भाषाई हमले से आहत थे। बांग्ला देश का उदाहरण उन्होंने प्रेरणा देने वाला माना। इस लिहाज से नवंबर महीना बड़ा खास है। 17 नवंबर 1999 से अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा-बोली दिवस मनाया जाने लगा। बाद में इसे संयुक्त राष्ट्र का भी समर्थन मिल गया। दो हजार आठ में संयुक्त राष्ट्र ने बाकायदा इसे इक्कीस फरवरी को समूचे विश्व में मनाने का ऐलान कर दिया। तबसे चौदह साल हो गए। सारी दुनिया अपनी बोलियों और कमजोर पड़ रही भाषाओं को बचाने का संकल्प लेती है। भारत में हम उनको मारने की साजिश करते हैं। 

हिंदुस्तान के लगभग बारह-तेरह करोड़ आदिवासियों के बीच अनगिनत बोलियां प्रचलित हैं मगर उनको आज तक किसी सरकारी माध्यम से समुचित संरक्षण नहीं मिला। अनेक आदिवासी बोलियां विलुप्त हो चुकी हैं। संसार की सबसे पुरानी गोंडवी बोलने वाले डेढ़ करोड़ लोग हैं, पर आज तक गोंडवी अध्ययन और उस पर शोध करने की जरूरत किसी ने नहीं समझी है। क्या यह तथ्य किसी को समझाने की जरूरत है कि हिंदी की गंगोत्री अगर संसार भर में तेज रफ्तार से बह रही है तो उसे वेगवान बनाने का काम निमाड़ी, मालवी, बुंदेली, अवधी, बृज, बघेली, छत्तीसगढ़ी, कोरकू, भोजपुरी, मैथिली, पंजाबी, हाड़ौती, हरयाणवी, गुजराती, काठियावाड़ी, कच्छी, भीली, राठवा, ढुंढाड़ी कोंकणी, उर्दू, फारसी तथा ऐसी ही अनेक उप गंगाओं के मिलन से ही संभव हुआ है।

दशकों से यह बोलियां कानों में मिसरी घोलती रही हैं। केंद्रीय गृहमंत्री अगर हिंदी को समृद्ध बनाने की बात करते हैं तो प्रसार भारती का यह ताजा फैसला उसका मखौल उड़ाता है। परदे के पीछे इस फैसले का कारण फिजूलखर्ची रोकना बताया जाता है। क्या किसी को यह कारण संतुष्ट कर सकता है? शायद नहीं। फिर भारतीय समाज क्यों चुप्पी साधे हुए है। राज्यों के संस्कृति मंत्री शोभा की वस्तु बनकर रह गए हैं।  

बेशक सरकारी माध्यम होने के नाते आकाशवाणी पर सरकार का हक है। लेकिन संसार में सौ करोड़ लोग हिंदी भाषा बोलते, समझते या लिखते हैं। ऐसी भाषा का उदगम सुखाने और उसकी हत्या का षड्यंत्र किसे अच्छा लगेगा और न ही किसी सरकारी संस्था को इसका अधिकार दिया जा सकता है। कुछ अंग्रेजीदां नौकरशाहों की गुलाम मानसिकता के सहारे इस देश की संस्कृति को बचाने का काम नहीं किया जा सकता। आकाशवाणी के कार्यक्रम इन बोलियों या भाषाओं के जरिये करोड़ों लोगों तक पहुंचते हैं। जन-जन की भावना के साथ खिलवाड़ जायज नहीं है मिस्टर सरकारी मीडिया!  

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

अब स्वतंत्र पत्रकारिता की रक्षा कौन करेगा मिस्टर मीडिया?

अनजाने में होने वाले इस ‘अपराध’ की कीमत पत्रकार बिरादरी या देश चुकाता है मिस्टर मीडिया!

विचार की स्वतंत्रता के खिलाफ सियासी षड्यंत्र लोकतंत्र में बर्दाश्त नहीं मिस्टर मीडिया!

हिंदी पत्रकारिता के लिए यकीनन यह अंधकार काल है मिस्टर मीडिया!

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डिजिटल पर बहुत ज्यादा बढ़ी है सीनियर जर्नलिस्ट की डिमांड: विनीता यादव

‘डिजिटल का तेजी से बढ़ता प्रभुत्व और भविष्य की पत्रकारिता’ विषय पर बोलते हुए ‘न्यूज नशा’ की एडिटर विनीता यादव ने कहा, ‘डिजिटल को समझना पहले ज्यादा जरूरी है

विकास सक्सेना by
Published - Saturday, 07 May, 2022
Last Modified:
Saturday, 07 May, 2022
VineetaYadav5478

एक्सचेंज4मीडिया (exchange4media) समूह की हिंदी वेबसाइट 'समाचार4मीडिया' (samachar4media.com) द्वारा तैयार की गई समाचार4मीडिया पत्रकारिता 40 अंडर 40’ (40 Under 40)' की लिस्ट से 28 अप्रैल 2022 की शाम को पर्दा उठ गया। दिल्ली में स्थित ‘इंडिया इंटरनेशनल सेंटर’ (IIC) के मल्टीपरपज हॉल में 28 अप्रैल 2022 को आयोजित एक कार्यक्रम में इस लिस्ट में शामिल हुए प्रतिभाशाली पत्रकारों के नामों की घोषणा की गई और उन्हें सम्मानित भी किया गया। 

इस दौरान ‘डिजिटल का तेजी से बढ़ता प्रभुत्व और भविष्य की पत्रकारिता’ विषय पर बोलते हुए ‘न्यूज नशा’ की एडिटर विनीता यादव ने कहा, ‘डिजिटल को समझना पहले ज्यादा जरूरी है कि किस तरह से डिजिटल आपको पहले अपनाता है और फिर आप डिजिटल को। ग्राउंड पर टीवी के लिए काम करना (जोकि मैंने खुद 18 साल काम किया) और फिर डिजिटल में आकर काम करना दोनों में बहुत फर्क है। ग्राउंड में जाकर टीवी के लिए काम करने से टीवी का इम्पैक्ट ज्यादा होता है और यहीं से डिजिटल का कॉम्पटीशन बढ़ जाता है, क्योंकि आपके पास रिसोर्सेज उतने ज्यादा नहीं होते हैं। मुझसे कई सरकार के अधिकारी और मंत्री हैं, जो बार-बार ये पूछते हैं कि खर्चा कहां से आ रहा है, आप चला कैसे रहे हैं इसको। इसलिए कहना चाहूंगी कि आपके पास रिसोर्सेज बहुत कम होते हैं और इसी के बीच में रहकर टीवी से बेहतर काम करना है। टीवी पर कोई खबर चलती है, तो वो चलकर आगे बढ़ जाती है, लेकिन जब डिजिटल पर वीडियो वायरल होता है, तो बड़ी तसल्ली मिलती है कि हम वायरल हो गए हैं। लिहाजा फर्क पड़ता है, जिसका असर आपको हाथों-हाथ मिलता है।’

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा, 'जब मैं 'न्यूज नेशन' में थी, तो मेरे केबिन के सामने डिजिटल की एक पूरी टीम बैठती थी, जिसमें कई लोग शामिल थे। मैंने एक बार जाकर देखा कि ये लोग करते क्या हैं, लिहाजा जब मैंने देखना शुरू किया और फिर दो-तीन एपिसोड्स बनाए, उसके बाद से ही मेरी रुचि इस ओर आई और सोचा कि बहुत कुछ डिजिटल में किया जा सकता है, क्योंकि जब मैं डिजिटल के लिए खुद पैकेजिंग कर रही थी अपने खुद के एक प्रोग्राम के लिए, तो मुझे खुद कि टाइम बाउंडेशन वहां बिल्कुल नहीं है। यहां पर आप खुलकर बोल सकते हैं। आज के समय में जो वरिष्ठ पत्रकार हैं, उनकी सोच, उनके विचार डिजिटल के द्वारा लोगों तक इस तरह से पहुंच गए हैं, जोकि शायद टीवी चैनल पर एक फॉर्मेट में फिट नहीं होते हैं, लेकिन डिजिटल  में बहुत फिट होते हैं। डिजिटल पर कई बार लोग अपनी डिमांड लिखते हैं कि फलां-फलां वक्ता को क्यों नहीं बुलाया, इसका मतलब है कि हम वो चीज अपने वरिष्ठ पत्रकारों द्वारा अच्छे से एनलाइस करके लोगों तक पहुंचा रहे हैं, जो लोग जानना चाहते हैं। सीनियर जर्नलिस्ट की डिमांड बहुत ज्यादा हो गयी है खासतौर से डिजिटल पर और लोग एक-एक घंटा उन्हें सुनना पसंद करते हैं। एक और बात की जहां पर चुनाव है वहां पर लोगों की नजर डिजिटल पर पूरी तरह से गढ़ जाती है कि अब क्या होने जा रहा है।'  

वीडियो के जरिए देखें उनका वक्तव्य:

        

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भविष्य की पत्रकारिता के लिए बहुत जरूरी है शशि शेखर जी का ये मंत्र: अजय शुक्ल

‘डिजिटल का तेजी से बढ़ता प्रभुत्व और भविष्य की पत्रकारिता’ विषय पर बोलते हुए ‘दी प्रिंसिपल’ के एडिटर-इन-चीफ अजय शुक्ल ने कहा कि मैंने अपने गुरू शशि शेखर जी से एक चीज सीखी है।

विकास सक्सेना by
Published - Saturday, 07 May, 2022
Last Modified:
Saturday, 07 May, 2022
AjayShukla4545

एक्सचेंज4मीडिया (exchange4media) समूह की हिंदी वेबसाइट 'समाचार4मीडिया' (samachar4media.com) द्वारा तैयार की गई समाचार4मीडिया पत्रकारिता 40 अंडर 40’ (40 Under 40)' की लिस्ट से 28 अप्रैल 2022 की शाम को पर्दा उठ गया। दिल्ली में स्थित ‘इंडिया इंटरनेशनल सेंटर’ (IIC) के मल्टीपरपज हॉल में 28 अप्रैल 2022 को आयोजित एक कार्यक्रम में इस लिस्ट में शामिल हुए प्रतिभाशाली पत्रकारों के नामों की घोषणा की गई और उन्हें सम्मानित भी किया गया। 

इस दौरान ‘डिजिटल का तेजी से बढ़ता प्रभुत्व और भविष्य की पत्रकारिता’ विषय पर बोलते हुए ‘दी प्रिंसिपल’ के एडिटर-इन-चीफ अजय शुक्ल ने कहा कि मैंने अपने गुरू शशि शेखर जी से एक चीज सीखी है। जब मैं हिन्दुस्तान में स्थानीय संपादक था, तो उस दौर में मैंने गाइडलाइन लेने के लिए उन्हें कॉल कर उनसे एक घटना का जिक्र किया और बताया कि हमारे प्रतिद्वंदी अखबार घटना को इस तरह से कवर रहे हैं, लिहाजा हमें किस तरह से करना चाहिए। इस पर  उन्होंने मुझसे कहा कि जो है, जैसा है, जहां है, उसे उसी तरह से एक सलीके से एथिक्स और वैल्यूज को ध्यान में रखते हुए प्रस्तुत करें, आप सबसे आगे होंगे। कुछ दिन तो लगा कि शायद वो बेहतर नहीं रहा, लेकिन अंतत: उसका रिजल्ट इतना बेहतर गया कि उस जगह को छोड़े आज मुझे कई साल हो गए हैं और जो मंत्र उस दिन शशि जी ने दिया था, वह आज भी मुझे सम्मान दिलाता है। यही चीज डिजिटल हो या फिर इलेक्ट्रॉनिक, उसमें भी फिट बैठता है।

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए अजय शुक्ल ने कहा, ‘मैं जब आईटीवी ग्रुप का एडिटर-इन-चीफ था, तो उस दौर में ऐसा कई बार हुआ कि हमारी अपने मैनेजिंग डायरेक्टर कार्तिकेय शर्मा से एक राय नहीं बन पाती थी, क्योंकि मैं अपनी चीजों को लेकर होता था और वे अपनी चीजों को लेकर होते थे, लेकिन मैं उनको भी यही चीज बताता था जो शशि जी ने मुझे मंत्र दिया था। उसके बाद कई बार नतीजे हमें अच्छे मिले। इसलिए मैं मानता हूं कि वो चीज शाश्वत सत्य है और ये भूतकाल में भी थी, वर्तमान में भी है और भविष्य में भी रहेगी। यदि आप इन चीजों को लेकर चलेंगे और उसे सलीके से प्रस्तुत करेंगे, एथिक्स और वैल्यूज को रखेंगे, तो मुझे लगता है कि थोड़ी देर लगे लेकिन बाद में आपको बहुत सारी चीजें इतने अच्छे ढंग से मिलेंगी, जो आपको बहुत ज्यादा पैसा मिलने के बाद भी नहीं मिलती है।’

उन्होंने आगे कहा, ‘एक चीज और, मैंने देखी है कि बहुत से लोगों के पास बहुत ज्यादा पैसा है, लेकिन आज वो इस बात के लिए परेशान होते हैं कि उन्हें पहचान नहीं मिली, सम्मान नहीं मिला। तो कहना चाहूंगा कि आपको सम्मान तब मिलता है जब आप वैल्यूज को रखते हैं। मैं अपनी मेहनत के दम पर और अपने गुरुओं के आशीर्वाद से यहां तक पहुंचा हूं। अपनी बात को समाप्त करते हुए मैं सिर्फ इतना कहना चाहूंगा कि शशि जी ने जो ये मंत्र दिया था, यही भविष्य की पत्रकारिता के लिए भी बहुत जरूरी है, क्योंकि यही वजह है कि आज डिजिटल मीडिया इतनी तेजी से जा रहा है।   

वीडियो के जरिए देखें उनका वक्तव्य:

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enba: अवॉर्ड्स पर उंगली उठाने वालों की वरिष्ठ पत्रकार अभिषेक मेहरोत्रा ने यूं लगाई ‘क्लास’

हो सकता है कि कुछ कमियां रह गई हों, पर जिन साथियों की मेहनत को जूरी ने सराहा है, उनका यूं उपहास न उड़ाइए।

Last Modified:
Tuesday, 10 May, 2022
enba awards

‘इनबा अवॉर्ड्स’ (enba Awards) पर कई दिनों से टिप्पणी करने से बच रहा था, क्योंकि एक जमाने में उस संस्थान का हिस्सा रहा हूं। अवॉर्ड्स की कैटेगरी और संख्या पर चर्चा होने पर किसी से गुरेज भी नहीं है, क्योंकि चर्चाएं ही खूबसूरत लोकतंत्र का अहसास कराती हैं। आलोचना हमेशा विश्लेषण करने में सहायक होती है, सुधार की गुंजाइश हमेशा बनी रहनी भी चाहिए।

पर सोशल मीडिया पर कई ऐसे तुर्रमखां भी अवार्ड पर टीका-टिप्पणी कर रहे हैं, जो नॉमिनेशन को लेकर लगातार प्रयासरत थे, कई ने तो अप्लाई भी किया पर जब अवार्ड न पा सके तो सावन के अंधे की तरह अब हर जगह हरा ही हरा देख रहे हैं। कई तो लास्ट डेट निकलने के बाद भी जुगतबाजी में जुटे रहे पर अब सोशल मीडिया पर सौ चूहे खाकर हज की तैयारी कर रहे हैं।

चूंकि व्यक्तिगत संबंधों का महत्व समझता हूं, दो लोगों के बीच तमाम मुद्दों पर कई आयाम से बातें भी होती हैं तो इसके पीछे होता है उनके बीच का भरोसा। इसलिए नाम नहीं लिख रहा हूं, पर कई तुर्रमखांओं के स्क्रीन शॉट मोबाइल में सेव हैं जो बस ये जानना चाह रहे थे कि उन्हें अवार्ड मिला है या नहीं....चूंकि मैं जूरी का हिस्सा नहीं था तो ये मुझे पता भी नहीं था, पर कई साथी फिर भी बेवजह संबंधों का हवाला देकर कोई जुगत लगाने की कोशिश में रहे। कोई जूरी मेंबर्स के फोन नंबर तलाश रहा था, तो कोई चीफ गेस्ट का नाम पता करना चाह रहा था, ऐसे में जब कुछ निराश हुए, तो कुंठाए निकलना स्वाभाविक ही है। कई तो सिर्फ एंट्री पास की जुगाड़ के लिए कॉल कर रहे थे ताकि संपादकों साथ सेल्फी ले सकें या नई नौकरी की संभावना तलाश सकें। ऐसे में अब कई खुद सामने न आकर, अब अपने मीडिया में अनफिट हो चुके मित्रों के जरिये छद्म पोस्ट लिखवाने में जुटे हुए हैं।

रही बात इंडस्ट्री के सम्मान की तो एक लो मिडिल क्लास से आए व्यक्ति के तौर पर समझ सकता हूं कि किसी के भी जीवन में जब वो पत्रकारिता की कठिन डगर पर चलता है तो किसी एक अवॉर्ड की उसके लिए क्या महत्ता होती है, देश में बड़ी संख्या में पत्रकार मीडिया संस्थानों के साथ जुड़ काम कर रहे हैं, ऐसे में अगर कुछ अपने काम की वजह से अवॉर्ड पाते हैं, तो फिर उनसे ईर्ष्या क्यों?

हो सकता हो कि नहीं पाने वाले भी कामयाब हों, कोई भी प्रोसेस परफेक्ट नहीं हो सकता, लोकतंत्र के सबसे बड़े उत्सव के परिणामों पर भी ईवीएम की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठते रहते हैं। ऐसे में हो सकता है कि कुछ कमियां रह गई हों, पर जिन साथियों की मेहनत को जूरी ने सराहा है, उनका यूं उपहास न उड़ाइए। वैसे भी ये पेशा दिन-ब-दिन प्रतिस्पर्धी हो रहा है, ऐेसे में एक शाम एक छत के नीचे इंडस्ट्री को लाना किसी हरकुलियन टास्क से कम नहीं। उम्मीद है कि जब आयोजनकर्ता पोस्ट इवेंट रिव्यू मीटिंग करें तो आलोचनाओं पर भी ध्यान जरूर दें, क्योंकि हर आलोचना कुंठा होती भी नहीं।

(zeenews.com के संपादक अभिषेक मेहरोत्रा की फेसबुक वॉल से साभार)

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भविष्य की पत्रकारिता बहुत ही सुखद है, ऐसा डिजिटल ने संभव बनाया: जयदीप कर्णिक

‘डिजिटल का तेजी से बढ़ता प्रभुत्व और भविष्य की पत्रकारिता’ विषय पर बोलते हुए अमर उजाला के डिजिटल एडिटर जयदीप कर्णिक ने कहा कि मैं इस विषय को थोड़ा ठीक करना चाहूंगा

विकास सक्सेना by
Published - Thursday, 05 May, 2022
Last Modified:
Thursday, 05 May, 2022
Jaideep458787

एक्सचेंज4मीडिया (exchange4media) समूह की हिंदी वेबसाइट 'समाचार4मीडिया' (samachar4media.com) द्वारा तैयार की गई समाचार4मीडिया पत्रकारिता 40 अंडर 40’ (40 Under 40)' की लिस्ट से 28 अप्रैल 2022 की शाम को पर्दा उठ गया। दिल्ली में स्थित ‘इंडिया इंटरनेशनल सेंटर’ (IIC) के मल्टीपरपज हॉल में 28 अप्रैल 2022 को आयोजित एक कार्यक्रम में इस लिस्ट में शामिल हुए प्रतिभाशाली पत्रकारों के नामों की घोषणा की गई और उन्हें सम्मानित भी किया गया। 

इस दौरान ‘डिजिटल का तेजी से बढ़ता प्रभुत्व और भविष्य की पत्रकारिता’ विषय पर बोलते हुए अमर उजाला के डिजिटल एडिटर जयदीप कर्णिक ने कहा कि मैं इस विषय को थोड़ा ठीक करना चाहूंगा, क्योंकि ये डिजिटल का तेजी से बढ़ता हुआ प्रभुत्व नहीं है। दरअसल विषय यह होना चाहिए कि पत्रकारिता का डिजिटल के माध्यम से तेजी से बढ़ता प्रभुत्व और भविष्य की पत्रकारिता। भविष्य की पत्रकारिता बहुत ही सुखद है, क्योंकि वह पत्रकार जिसकी बाइलाइन उसके संस्करण में छपकर रह जाती थी, वह पत्रकार अब पूरे हिन्दुस्तान में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में पढ़ा जाता है और ऐसा डिजिटल ने संभव बनाया है।  

उन्होंने कहा कि कोई पत्रकारिता हमको एक-दूसरे समानांतर खड़ी नहीं करनी चाहिए। हर माध्यम का अपना एक अलग महत्व है। टेलीविजन के सामने दंगल देखने के लिए दर्शक बाइअपॉइनमेंट बैठा है, तो वो उसका अपना महत्व है, लेकिन डिजिटल पर उसके यूजर का, उसके टाइम और उसके अपॉइनमेंट का महत्व है। बीबीसी में जब सलमा जैदी संपादक थीं, तब हम सोचते थे कि डिजिटल में लोग क्यों नहीं आते हैं। स्कूल ऑफ जर्नलिज्म में जाइए तो वो कहते थे कि अखबार में जाना है या टीवी में एंकर बनना है और नाम कमाना है। आज हम बात कर रहे हैं कि डिजिटल का प्रभुत्व बढ़ रहा है। महत्व पत्रकारिता का है, फिर माध्यम कोई भी हो।

चर्चा के दौरान उन्होंने कहा कि हमारे पत्रकारिता के जो मूल में है, वह है जनसंचार, मास कम्युनिकेशन, सूचना को, खबरों को, विचारों को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाना। हमने ढोल-नगाढों से लोगों तक पहुंचाया, तार-पत्रों से पहुंचाया, रोटी बटती थी स्वतंत्रता संग्राम में उससे पहुंचाया, ट्रेडल पर छपने वाले अखबार से पहुंचाया, रेडियो से पहुंचाया, टेलीविजन से पहुंचाया और अब डिजिटल से पहुंचा रहे हैं। माध्यम से ज्यादा महत्व पत्रकारिता और विचार का है। यह शास्वत है और हमेशा बना रहेगा। माध्यम बदल जाएंगे, जैसे कि 400-500 साल पहले जब कबीर हुए थे, तब ट्विटर नहीं था, गालिब हुए तब फेसबुक नहीं था। अब फेसबुक पर गालिब साझा होते हैं, ट्विटर पर कबीर रीट्वीट किए जाते हैं। इसलिए आपके विचार में दम होगा तो आपकी पत्रकारिता हर माध्यम पर बहुत तेजी से आगे बढ़ेगी। भविष्य की पत्रकारिता उस पत्रकार की है, जो माध्यम के साथ-साथ अपनी पत्रकारिता में निखार लाए। इसलिए मल्टीमीडिया का जर्नलिस्ट बनें।

वीडियो के जरिए देखें उनका वक्तव्य:

  

        

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राहुल महाजन ने बताया, कुछ महीनों बाद इस तरह बदलेगा दूरदर्शन का स्वरूप

'समाचार4मीडिया पत्रकारिता 40अंडर40’ कार्यक्रम के दौरान दूरदर्शन के कंटेंट ऑपरेशन हेड राहुल महाजन ‘दूरदर्शन कल, आज और कल’ विषय पर अपनी बात रखी।

विकास सक्सेना by
Published - Thursday, 05 May, 2022
Last Modified:
Thursday, 05 May, 2022
RahulMahajan4545

एक्सचेंज4मीडिया (exchange4media) समूह की हिंदी वेबसाइट 'समाचार4मीडिया' (samachar4media.com) द्वारा तैयार की गई समाचार4मीडिया पत्रकारिता 40 अंडर 40’ (40 Under 40)' की लिस्ट से 28 अप्रैल 2022 की शाम को पर्दा उठ गया। दिल्ली में स्थित ‘इंडिया इंटरनेशनल सेंटर’ (IIC) के मल्टीपरपज हॉल में 28 अप्रैल 2022 को आयोजित एक कार्यक्रम में इस लिस्ट में शामिल हुए प्रतिभाशाली पत्रकारों के नामों की घोषणा की गई और उन्हें सम्मानित भी किया गया। उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि की भूमिका निभाई। इस दौरान जूरी में शामिल दूरदर्शन के कंटेंट ऑपरेशन हेड राहुल महाजन ‘दूरदर्शन कल, आज और कल’ विषय पर अपनी बात रखी।

उन्होंने कहा, ‘पिछले डेढ़ साल से दूरदर्शन में जो कुछ भी हो रहा है उसके लिए मैं पूरी तरह से जिम्मेदार हूं। यहां मेरा जो काम है, वह ये है कि दूरदर्शन कैसे उस जगह लौटाया जाए, जहां वो पहले था। ‘था’ इसलिए, क्योंकि दूरदर्शन ने अपने ‘गोल्डन डेज’ देखें हैं। जब उसके सीरियल्स और उसका कॉन्टेंट बहुत ही बेहतरीन होता था। इसमें कई लोग ये भी कहते हैं कि उन दिनों दूरदर्शन का कोई कॉम्पटेटिव नहीं था, कोई कॉम्पटीशन नहीं था, शायद इसलिए भी ऐसा हुआ हो। लेकिन जो मुझे जिम्मेदारी मिली है उसके लिए यहां एक बात जरूर कहूंगा कि अब से कुछ महीनों बाद शायद हम दूरदर्शन को एक नई जगह पहुंचा पाएंगे, क्योंकि इस इंडस्ट्री के जितने भी बड़े प्रॉडक्शन हाउसेज हैं, वे दूरदर्शन के साथ मिलकर काम करना शुरू कर रहे हैं। लिहाजा अब दूरदर्शन पर भी आपको वैसे ही प्रोग्राम्स देखने को मिलेंगे, जो या तो ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर है या फिर बड़े चैनल्स पर हैं।

दूरदर्शन में काफी समय से ये मंत्रणा चल रही है कि किस तरह से हम एक बार फिर से बड़ी प्रॉडक्शन करें और उसकी एक झलक हम इस समय देख रहे हैं जहां पर दूरदर्शन एक बड़ा प्रॉडक्शन कर रहा है, जिसे ‘खेलो इंडिया’ कहते हैं। मैं ये दावे से कह सकता हूं कि भारत में इस समय स्पोर्ट्स से संबंधित जो भी बड़े चैनल्स या प्रॉडक्शन हाउसेज हैं, उन्होंने इतना बड़ा प्रॉडक्शन आज तक नहीं किया है।

दूरदर्शन एक बहुत बड़ी संस्था है। इसे ऐसे कहूं कि इसके 30 से ज्यादा लगभग 36 चैनल्स हैं, लगभग 46 स्टूडियोज हैं, तो यह अपने आप में ही एक बड़ा चैलेंज है कि इतने बड़े इंस्टीट्यूशन को जहां 25 हजार लोग काम करते हैं, उसको फिर से एक बार ठीक किया जाए। मैं एक बार फिर कहूंगा कि प्रसार की जो व्यवस्था है उसने बहुत कुछ किया है, खासतौर पर दूरदर्शन पर यह भी आरोप लगता था कि वहां पक्षपात होता है, उस सभी चीजों को हटाने की कोशिश की गई है।

दूरदर्शन में डिजिटल चीजों का जो इस्तेमाल किया जा रहा है, या यूं कहे कि जिस तरह से दूरदर्शन अपने डिजिटल प्लेटफॉर्म को आगे बढ़ा रहा है या फिर डिजिटल टेक्नोलॉजी का इंटर्नल यूज दूरदर्शन या प्रसार भारती में हो रहा है वह भी एक देखने लायक चीज है। मैं पास से देख पा रहा हूं इसलिए उसको इस तरह से एप्रिशिएट कर रहा पा रहा हूं, लेकिन बहुत सारे लोग उसको नहीं देख पा रहे हैं कि उसको कैसे किया गया है।’    

   

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