‘सराहनीय है डिजिटल अम्ब्रेला के नीचे शासन और सरकार का कदम’

क्या आप इस बात पर यकीन कर सकते हैं कि पेपरलेस वर्क कर कोई विभाग कुछ महीनों में चार करोड़ से अधिक की राशि बचा सकता है?

Last Modified:
Friday, 30 July, 2021
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मनोज कुमार, वरिष्ठ पत्रकार ।।

क्या आप इस बात पर यकीन कर सकते हैं कि पेपरलेस वर्क कर कोई विभाग कुछ महीनों में चार करोड़ से अधिक की राशि बचा सकता है? सुनने में कुछ अतिशयोक्ति लग सकती है लेकिन यह सौ फीसदी सच है कि ऐसा हुआ है। यह उपलब्धि जनसम्पर्क संचालनालय ने अपने हिस्से में ली है। हालांकि यहां स्मरण करना होगा कि खंडवा सहित कुछ जिला जनसम्पर्क कार्यालयों को पेपरलेस बना दिया गया था। तब इस पेपरलेस वर्क कल्चर से कितनी बचत हुई, इसका लेखा-जोखा सामने नहीं आया था। कोरोना के कहर के बाद जनसम्पर्क संचालनालय ने सुध ली और पेपरलेस वर्क कल्चर को अमलीजामा पहनाकर खर्च में कटौती की तरफ अपना कदम बढ़ा दिया है। निश्चित रूप से इसे आप नवाचार कह सकते हैं। ऐसा भी नहीं है कि अन्य विभागों ने इस दिशा में कोई उपलब्धि हासिल नहीं की हो लेकिन उनकी ओर से ऐसे आंकड़े सार्वजनिक नहीं होने से आम आदमी को पता नहीं चल रहा है।

मध्यप्रदेश अपने नवाचार के लिए हमेशा चर्चा में रहा है लेकिन इस वक्त हम जिस नवाचार की बात कर रहे हैं, वह सुनियोजित नहीं है लेकिन अब वह दिनचर्या में शामिल हो गया है। नवाचार की यह कहानी शुरू होती है करीब दो वर्ष पहले कोरोना के धमकने के साथ। आरंभिक दिनों में सबकुछ वैसा ही चलता रहा और लगा कि बस थोड़े दिन की बात है लेकिन ऐसा था नहीं। कोरोना की दूसरी लहर ने जो कोहराम मचाया तो सब तरफ हडक़म्प मच गया। कोरोना के शिकार लोगों को इलाज, उनकी देखरेख और व्यवस्था बनाये रखने के लिए मुस्तैद अधिकारियों और कर्मचारियों को मोर्चे पर डटना मजबूरी थी। जिंदगी उनकी भी थी, डर उनके पास था। और इस डर ने एक संभावना को जन्म दिया। टेक्रालॉजी का यह नया दौर है और इस महामारी के पहले हम इस कोशिश में लगे थे कि पूरा तंत्र डिजिटल हो जाए लेकिन सौ फीसदी करने में तब वैसी रुचि लोगों की नहीं थी। आज भी सौ फीसदी डिजीटलीकरण नहीं हो पाया है, लेकिन डर से उपजी संभावना में जो जहां है, वहीं रुक गया और हाथों में कोई मोबाइल लिये तो कोई आइपैड तो कोई घर पर रहकर लैपटॉप से अपने दायित्व को पूरा कर रहा था। इस तरह से जो काम बीस वर्ष में नहीं हो पाया था, वह दो वर्ष में हो गया। इस डिजिटल अम्ब्रेला के नीचे पूरा शासन और सरकार आ गई है। बदलते जमाने के साथ हम अब चलने के लिए अब पूरी तरह से तैयार हैं बल्कि चलने लगे हैं।

इस डिजिटल सिस्टम ने पूरे तंत्र का चेहरा बदल दिया है। पेपरलेस जिस प्रक्रिया की बात हम करीब एक दशक से कर रहे थे लेकिन व्यवहार में संभव नहीं हो पा रहा था, जो अब संभव है।

डिजिटलकरण के पश्चात एक और बड़ी पहल यह हुई है कि हर माह अलग अलग विभागों की बैठक में झाबुआ से लेकर मंडला जिले के अधिकारी कभी राजधानी मुख्यालय भोपाल आते थे तो कभी संभागीय मुख्यालय में उन्हें शामिल होना पड़ता था। शासकीय दस्तूर के मुताबिक बैठक का परिणाम भले शून्य हो लेकिन भौतिक उपस्थिति लाजिमी थी। इस आवन-जावन में सब मिलाकर लाखों रुपए के डीजल-पेट्रोल, भत्ता और अन्य खर्चे होते थे। साथ में अधिकारी के जिला मुख्यालय में नहीं रहने से कई अनिवार्य कार्य रुक जाते थे, या टल जाते थे। यही प्रक्रिया जिला मुख्यालय में भी होती थी और जिले के भीतर आने वाले अधिकारी-कर्मचारी शामिल होते थे। लेकिन अब प्रशासन का चेहरा-मोहरा बदलने लगा है। कोई कहीं नहीं आ जा रहा है, सब अपने ठिकाने पर मुस्तैद हैं। ऑनलाइन मीटिंग हो रही है। चर्चा और फैसले हो रहे हैं। खर्चों पर जैसे कोई ब्रेकर लग गया है। एक किस्म से इसे आप अनुपात्दक व्यय भी कह सकते हैं, जो नियंत्रण में आ गया है। स्वागत-सत्कार में भी होने वाले खर्च लगभग समाप्त हो गए हैं। राजधानी के मंत्रालय से लेकर जिला और तहसील मुख्यालय में ही सब काम निपट जा रहा है। यह अपने आप में नवाचार है क्योंकि इससे होने वाली बचत का समुचित उपयोग किया जा सकेगा।

सरकार ने कोरोना महामारी के दरम्यान शासकीय कार्यालयों को पहले जुलाई तक पांच दिनी सप्ताह घोषित किया था, जिसे बढ़ाकर अब अक्टूबर 2021 तक कर दिया गया है। यह फैसला भी स्वागतयोग्य है। हालांकि कोरोना के पहले सरकार ने पांच दिवसीय कार्यालयीन सप्ताह के लिए सुझाव मांगे थे लेकिन अरुचि के चलते मामला ठंडे बस्ते में चला गया था लेकिन कोरोना ने एक पुरानी और सकरात्मक योजना को आरंभ कर दिया है। पहली नजर में यह पांच दिनी वर्किंग का कांसेप्ट थोड़ा ठीक नहीं लगता है लेकिन यह शासन और अधिकारी कर्मचारियों के लिए हितदायक है। तंत्र के स्तर पर देखें तो लगातार दो दिन कार्यालय बंद रहने से स्थापना व्यय में कमी आती है। संसाधनों की बचत होती है या कहें कि खर्च नियंत्रण में होता है। इन दो दिनों में अधिकारी-कर्मचारी अपने निजी कार्य पूर्ण कर सकते हैं और मानसिक रूप से रिलैक्स होते हैं। वैसे भी माह के दूसरे और तीसरे शनिवार को अवकाश होता ही है। तब केवल दो दिन की इसमें वृद्धि किया जाना अनुचित नहीं होता है। इन दो दिनों के कार्यदिवस में होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए कार्यालय का समय सुबह जल्दी और देर शाम तक कर पूर्ण किया जा सकता है। कई राज्यों में पहले से पांच कार्य दिवस प्रचलन में है।

इस तरह से हम मान सकते हैं कि कोरोना ने ना केवल आम आदमी की जिंदगी में परिवर्तन लाया बल्कि शासकीय तंत्र में भी बेहतर बदलाव की दिशा में प्रेरित किया है। यह तो निश्चित है कि आज नहीं तो कल, हमें डिजिटल दुनिया में सौ फीसदी प्रवेश करना है तो आज से क्यों नहीं। कुछ लोगों का कहना है कि यह असुविधाजनक है। मान लिया तो जो खरीददारी आप इंटरनेट के माध्यम से करते हैं, रेल-बस का किराया अनेक तरह के ऐप के माध्यम से करते हैं, तब क्या आपके लिए यह असुविधाजनक नहीं है। एक बार कोशिश करके देख लीजिए राह आसान हो जाएगी। सबसे बड़ी बात यह है कि समूचे तंत्र में पारदर्शिता आ जाएगी क्योंकि वर्क रिर्पोट करने से लेकर बिल जमा करने और भुगतान पाने की  सारी व्यवस्था ऑनलाइन है तो रिश्वतखोरी का कॉलम भी हाशिये पर चला जाएगा। इसलिए मध्य प्रदेश जिस तरह से डिजिटल अम्ब्रेला के नीचे आ गया है, वह सराहनीय है। अब जरूरत है कि अम्ब्रेला को ओपन कर सभी से कहा जाए आओ, थोड़ा थोड़ा डिजिटल हो जाएं।

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'अजीब भयावह दौर है, दशकों के साथी ईशमधु तलवार भी अपनी अनंत यात्रा पर चले गए'

अजीब सा भयावह दौर है। अब हमारी पीढ़ी का नंबर लग गया। हम लोग इतने बूढ़े हो गए या फिर नियति हमारे प्रति ज्यादा ही क्रूर हो गई।

राजेश बादल by
Published - Friday, 17 September, 2021
Last Modified:
Friday, 17 September, 2021
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राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

अजीब सा भयावह दौर है। अब हमारी पीढ़ी का नंबर लग गया। हम लोग इतने बूढ़े हो गए या फिर नियति हमारे प्रति ज्यादा ही क्रूर हो गई। करीब तीन दशकों के साथी और दोस्त भाई ईशमधु तलवार भी अपनी अनंत यात्रा पर रात को चले गए। दो दिन पहले ही बात हुई थी। नई किताब के बारे में देर तक बतियाते रहे। मैंने हंसते हुए कहा था, आपकी 'रिनाला खुर्द' ने बहुत रुलाया था। इस किताब में खिलखिलाने का अवसर देना। इस बात पर ठहाका लगाकर हंस दिए थे। क्या जानता था कि हंसते-हंसते वे फिर एक बार रुलाने का इंतजाम कर चुके हैं।

कैसे हमारे संपर्क के इकतीस बरस बीते, पता ही नहीं चला। हम सब उत्साह से भरे 1985 के अगस्त महीने में राजेंद्र माथुर के निर्देश पर ‘नवभारत टाइम्स’ का जयपुर संस्करण शुरू करने के लिए एकत्रित हुए थे। मैं वरिष्ठ उपसंपादक था और वे हमारे मुख्य संवाददाता। आम तौर पर हर अखबार में डेस्क और रिपोर्टिंग टीम में तलवारें तनी रहती थीं, लेकिन तलवार जी के साथ कभी ऐसा नहीं हुआ। हमारे सारे उपसंपादक तलवार जी की कॉपी संपादित करने के लिए लालायित रहते थे। क्या मोतियों जैसे शब्द खबरों के बीच चुनते थे और क्या ही शानदार हैंडराइटिंग थी। संपादन के लिए अपना लाल स्याही का निब वाला पेन चलाते तो लगता कि तलवार जी की कॉपी गंदी कर दी। यहां तक कि शीर्षक तक लिखने की इच्छा नहीं होती थी। कभी कुछ गड़बड़ भी हो जाए तो संवाद मुस्कुराते हुए ही होता था। कभी गुस्सा, तनाव या चीखना चिल्लाना होता ही नहीं था। कभी-कभी उनके किसी रिपोर्टर की कॉपी ऐसी होती कि उसे दोबारा लिखने की जरूरत होती तो डेस्क के लोग बचने की कोशिश करते। फिर आखिर तलवारजी पर ही बात पहुंचती। चाहे रात के कितने ही बज जाएं, वे अपनी टेबल से तभी उठते, जब वे दोबारा लिख कर हमें दे देते। जब घर जाते तो टेबल एकदम साफ रहती थी। एक एक विज्ञप्ति पर उनकी नजर रहती और उसमें से खबर निकालने की अद्भुत कला उन्हें आती थी। जयपुर छोड़ने के बाद चाहे भोपाल रहा, दिल्ली रहा या कुछ समय के लिए अमेरिका रहा, उनसे संपर्क वैसा ही गर्मजोशी भरा था।

दो तीन बरस पहले मित्र हरीश पाठक का आंचलिक पत्रकारिता पर एक विस्तृत शोध प्रबंध आया था। इस यज्ञ में तलवार जी और मैंने भी अपनी आहुतियां डाली थीं। चूंकि यह ग्रन्थ राजेंद्र माथुर फेलोशिप के तहत लिखा गया था, इसलिए हम सब जयपुर में एक कार्यक्रम करना चाहते थे। तलवार जी ने इसकी जिम्मेदारी ली और तय किया कि उनके जन्मदिन 7 अगस्त पर कार्यक्रम करेंगे और इसमें राजेंद्र माथुर पर केंद्रित मेरी फिल्म भी दिखाएंगे। कार्यक्रम हुआ और बेहद गरिमामय रहा। रात हमने दावत के दरम्यान संगीतकार दान सिंह के सुरों से सजा गीत- वो तेरे प्यार का गम... सुना। कुछ हम लोगों ने भी सुनाया। लेकिन उस शाम तलवार जी महफिल की शान थे। संगीतकार दान सिंह तो गुमनामी में खो ही गए थे, लेकिन तलवार जी ने उन्हें पुनःप्रतिष्ठा दिलाई। उनका ‘रिनाला खुर्द’ उपन्यास जिसने भी पढ़ा, उसके आंसू निश्चित ही बहे। चाई जी हमेशा तलवार जी के दिल में धड़कती रहीं।

जयपुर के साहित्य उत्सव को उन्होंने इतना ऊंचा शिखर प्रदान किया कि अन्य सारे उत्सव बौने हो गए। तलवार जी के नाम पर कोई आने से न नहीं कर सकता था। पिछले बरस कोरोना के कारण यह उत्सव ऑनलाइन हुआ लेकिन इसने अपनी अलग छाप छोड़ी। तलवार जी! आपके जाने से हम लोग विकलांगों की श्रेणी में आ गए हैं। क्यू में तो लगे थे, मगर नंबर इतनी तेजी के साथ आगे आ रहा है- इसका अहसास नहीं था। राजकुमार केसवानी, कमल दीक्षित, शिव पटेरिया, जीवन साहू, महेंद्र गगन और भी अनेक मित्र बीते दिनों साथ छोड़ गए। वाकई कुछ खालीपन सा आता जा रहा है-

अब नजा का आलम है मुझ पर, तुम अपनी मोहब्बत वापस लो

जब कश्ती डूबने लगती है, तो बोझ उतारा करते हैं   

जाते जाते एक बार गले मिल लेते तो तसल्ली हो जाती। आपने तो चुपचाप अपने अध्ययन कक्ष में बैठे बैठे विदाई ले ली। सब कुछ आपने ठीक किया, पर यह ठीक नहीं किया। अलविदा  दोस्त!

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सुप्रीम कोर्ट की चिंता संवैधानिक है मिस्टर मीडिया!

पेगासस मामले पर सर्वोच्च न्यायालय की उलझन समझ में आने वाली है। हुक़ूमते हिन्द ने अपना उत्तर देने से इनकार कर दिया है। सॉलिसिटर जनरल का एक तर्क किसी के पल्ले नहीं पड़ा।

राजेश बादल by
Published - Wednesday, 15 September, 2021
Last Modified:
Wednesday, 15 September, 2021
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राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

पेगासस मामले पर सर्वोच्च न्यायालय की उलझन समझ में आने वाली है। हुक़ूमते हिन्द ने अपना उत्तर देने से इनकार कर दिया है। सॉलिसिटर जनरल का एक तर्क किसी के पल्ले नहीं पड़ा। उन्होंने कहा कि हमारे पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है। आम नागरिकों की खुफ़ियागिरी पर जनता में चर्चा नहीं होनी चाहिए। अब सॉलिसिटर जनरल साहब को कोई कैसे समझाए कि यह समूचा  देश उत्तर चाहता है।

राष्ट्रीय सुरक्षा के बारे में तो भारतीय मतदाता भी नहीं जानना चाहते। जब एक बार किसी दल को बहुमत से सरकार बनाने का मौक़ा दिया है तो मुल्क़ की हिफाज़त करना भी उसी निर्वाचित सरकार की ज़िम्मेदारी है। एक नागरिक नहीं चाहता कि उनकी हुक़ूमत बताए कि आतंकवादियों से वह कैसे निबट रही है अथवा चीन और पाकिस्तान के षड्यंत्रों का मुक़ाबला कैसे कर रही है? वह तो सिर्फ़ दो तीन जानकारियां चाहता है कि परदेसी जासूसी सॉफ्टवेयर ख़रीदा गया है या नहीं। अगर ख़रीदा गया है तो किस मंत्रालय ने, कितने पैसे में और किन शर्तों पर खरीदा है। यह जानना उसका संविधान प्रदत्त अधिकार है। संसद में इसीलिए पाई पाई का हिसाब रखा जाता है। इसके अलावा संविधान में आम आदमी को अनुच्छेद-21 के तहत दिए गए निजता के अधिकार का उल्लंघन तो नहीं किया गया है? 

अगर इस अदृश्य जासूसी तकनीक से एक पत्रकार, एक राजनेता, एक न्यायाधीश, विपक्षी नेता और सामाजिक कार्यकर्त्ता के घर परिवार, कारोबार और रिश्तेदार की बातें सरकार तक पहुंच रही हैं तो ऐसा क्यों होना चाहिए? यदि इन श्रेणियों में से किसी एक नागरिक की भी खुफ़ियागिरी हुई है तो सरकार को बताना चाहिए कि वह राष्ट्रद्रोही है और उसके सबूत देश की आला अदालत के सामने रख देना चाहिए। खुले तौर पर नहीं रखना चाहते तो बंद लिफ़ाफ़े में अदालत को सौंप दीजिए। फिर माननीय न्यायालय को तय करने दीजिए कि वाकई उस लिफ़ाफ़े में बंद जानकारी को उजागर करना हिन्दुस्तान के हित में नहीं है तो फिर यह देश कभी भी हुकूमत से कोई जवाब तलब नहीं करेगा। अगर अदालत पाती है कि उसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है तो उसे सामने लाना राष्ट्रहित में बेहद ज़रूरी है।

भारतीय मतदाता ने अपनी गाढ़ी कमाई का पैसा टैक्स के रूप में इसलिए सरकारी ख़ज़ाने में जमा नहीं किया है कि उसका दुरूपयोग उसी के विरोध में हो। आख़िर किस देश में ऐसा हो सकता है। कम से कम लोकतंत्र और क़ायदे-क़ानून से चलने वाले किसी राष्ट्र में तो ऐसा नहीं हो सकता।

एक बार कल्पना करिए कि उस अंतर्ध्यान ख़ुफ़िया तकनीक से सरकार अपने किसी एक सर्वर में ये जानकारियां एकत्रित कर ले और वहां से यह लीक हो जाए तो फिर क्या सरकार के हाथों के तोते नहीं उड़ जाएंगे। इसके अलावा इस बात की क्या गारंटी है कि इस सर्वर में मौजूद सूचनाओं की कोई गुप्त कॉपी किसी अन्य देश में नहीं हो रही होगी। पहले भी संसार में ऐसे कई ख़ुलासे हो चुके हैं। अगर उस सूचना भण्डार से कोई जानकारी लीक हो गई तो फिर केंद्र सरकार के हाथ में कुछ नहीं रहेगा। वह अपने ही मतदाताओं के सामने कठघरे में खड़ी हो जाएगी। यही नहीं, इज़रायल समेत संसार के क़रीब एक दर्ज़न देश इसकी औपचारिक जांच कर रहे हैं। यदि उस वैधानिक जांच के दरम्यान किसी चरण में उस देश के अलावा भारत की सूचनाएं भी छप गईं तो कौन मुंह दिखाने के लायक रहेगा? भारत सरकार को यह बात समझ लेनी चाहिए।

दरअसल सुप्रीम कोर्ट की राय में भारत सरकार के लिए एक बेहद बारीक़ छिपा हुआ सन्देश है। अदालत अपनी परिधि में इससे अधिक कुछ नहीं कह सकती। यदि कुपित होकर शिखर न्यायालय ने कोई निर्णय दिया तो फिर कुछ नहीं बचेगा। अभी भी वक़्त है। हुक़ूमत को समय रहते समझ लेना चाहिए। अन्यथा इतिहास बड़े से बड़े शासक को माफ़ नहीं करता मिस्टर मीडिया !

हैं कहां हिटलर, हलाकू, ज़ार या चंगेज़ ख़ां ,मिट गए सब, क़ौम की औक़ात को मत छेड़िए

ऐसे नाज़ुक वक़्त में हालात को मत छेड़िए, अपनी कुर्सी के लिए जज़्बात को मत छेड़िए    

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

इस हकीकत को समझिए, फर्जी खबरों से मुकाबला करना आसान हो जाएगा मिस्टर मीडिया!

मुश्किल दौर में है अफगानी मीडिया, भारतीय पत्रकारों को आगे आना होगा मिस्टर मीडिया! 

टकराव की स्थिति में पत्रकारिता और सरकार दोनों को नुकसान होगा मिस्टर मीडिया!

मिस्टर मीडिया: पत्रकारिता को कुचलने के नतीजे भी घातक होते हैं!

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'हम नए जमाने में हैं, जहां शिक्षा का ही मूल्य, दीक्षा का नहीं'

आज हमारे पड़ोसी शर्माजी इस बात से प्रसन्न थे कि उनका बेटा शिक्षित हो गया। शिक्षित अर्थात उसने बीई की डिग्री हासिल कर ली।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Sunday, 05 September, 2021
Last Modified:
Sunday, 05 September, 2021
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मनोज कुमार, वरिष्ठ पत्रकार ।।

आज हमारे पड़ोसी शर्माजी इस बात से प्रसन्न थे कि उनका बेटा शिक्षित हो गया। शिक्षित अर्थात उसने बीई की डिग्री हासिल कर ली। बेटे के स्नातक हो जाने की खुशी उनके चेहरे पर टपक रही थी। यह अस्वाभाविक भी नहीं है। एक डिग्री हासिल करने के लिए कई किस्म के जतन करने पड़ते हैं। अपनी जरूरतों और खुशी को आले में रखकर बच्चों की शिक्षा पर खर्च किया जाता है और बच्चा जब सफलतापूर्वक डिग्री हासिल कर ले तो गर्व से सीना तन जाता है। उनके जाने के बाद एक पुराना सवाल भी मेरे सामने आ खड़ा हुआ कि क्या डिग्री हासिल कर लेना ही शिक्षा है? क्या डिग्री के बूते एक ठीकठाक नौकरी हासिल कर लेना ही शिक्षा है? मन के किसी कोने से आवाज आयी ये हो सकता है लेकिन यह पूरा नहीं है। फिर मैं ये सोचने लगा कि बोलचाल में हम शिक्षा-दीक्षा की बात करते हैं तो ये शिक्षा-दीक्षा क्या है? शिक्षा के साथ दीक्षा शब्द महज औपचारिकता के लिए जुड़ा हुआ है या इसका कोई अर्थ और भी है। अब यह सवाल शर्माजी के बेटे की डिग्री से मेरे लिए बड़ा हो गया। मैं शिक्षा-दीक्षा के गूढ़ अर्थ को समझने के लिए पहले स्वयं को तैयार करने लगा।

एक पत्रकार होने के नाते ‘क्यों’ पहले मन में आता है। इस ‘क्यों’ को आधार बनाकर जब शिक्षा-दीक्षा का अर्थ तलाशने लगा तो पहला शिक्षा-दीक्षा का संबंध विच्छेद किया। शिक्षा अर्थात अक्षर ज्ञान। वह सबकुछ जो लिखा हो उसे हम पढ़ सकें। एक शिक्षित मनुष्य के संदर्भ में हम यही समझते हैं। शिक्षा को एक तंत्र चलाता है इसलिए शिक्षा नि:शुल्क नहीं होती है। विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय तक की शिक्षा हासिल करने के लिए हमें उसका मूल्य चुकाना होता है। इस मूल्य को तंत्र ने शब्द दिया शिक्षण शुल्क। यानि आप शिक्षित हो रहे हैं, डिग्री हासिल कर रहे हैं और समाज में आपकी पहचान इस डिग्री के बाद अलहदा हो जाएगी। आप डॉक्टर, इंजीनियर, पत्रकार और शिक्षा जैसे अनेक पदों से सुशोभित होते हैं। चूंकि आपकी शिक्षा मूल्य चुकाने के एवज में हुई है तो आपकी प्राथमिकता भी होगी कि आप चुकाये गए मूल्य की वापसी चाहें तो आप अपनी डिग्री के अनुरूप नौकरी की तलाश करेंगे। एक अच्छी नौकरी की प्राप्ति आपकी डिग्री को ना केवल सार्थक करेगी बल्कि वह दूसरों को प्रेरणा देगी कि आप भी शिक्षित हों। यहां एक बात मेरे समझ में यह आयी कि शिक्षित होने का अर्थ रोजगार पाना मात्र है।

अब दूसरा शब्द दीक्षा है। दीक्षा शब्द आपको उस काल का स्मरण कराता है जब डिग्री का कोई चलन नहीं था। शिक्षित होने की कोई शर्त या बाध्यता नहीं थी। दीक्षा के उपरांत नौकरी की कोई शर्त नहीं थी। दीक्षित करने वाले गुरु कहलाते थे। दीक्षा भी नि:शुल्क नहीं होती थी लेकिन दीक्षा का कोई बंधा हुआ शुल्क नहीं हुआ करता था। यह गुरु पर निर्भर करता था कि दीक्षित शिष्य से वह क्या मांगे अथवा नहीं मांगे या भविष्य में दीक्षित शिष्य के अपने कार्यों में निपुण होने के बाद वह पूरे जीवन में कभी भी, कुछ भी मांग सकता था। यह दीक्षा राशि से नहीं, भाव से बंधा हुआ था। दीक्षा का अर्थ विद्यार्थी को संस्कारित करना था।

विद्यालय-विश्वविद्यालय के स्थान पर गुरुकुल हुआ करते थे और यहां राजा और रंक दोनों की संतान समान रूप से दीक्षित किये जाते थे। दीक्षा के उपरांत रोजगार तलाश करने के स्थान पर विद्यार्थियों को स्वरोजगार के संस्कार दिये जाते थे। जंगल से लकड़ी काटकर लाना, भोजन स्वयं पकाना, स्वच्छता रखना और ऐसे अनेक कार्य करना होता था। यह शिक्षा नहीं, संस्कार देना होता था। दीक्षा अवधि पूर्ण होने के पश्चात उनकी योग्यता के रूप में वे अपने पारम्परिक कार्य में कुशलतापूर्वक जुट जाते थे। अर्थात दीक्षा का अर्थ विद्यार्थियों में संस्कार के बीज बोना, उन्हें संवेदनशील और जागरूक बनाना, संवाद की कला सीखाना और अपने गुणों के साथ विनम्रता सीखाना।

इस तरह हम शिक्षा और दीक्षा के भेद को जान लेते हैं। यह कहा जा सकता है कि हम नए जमाने में हैं और यहां शिक्षा का ही मूल्य है। निश्चित रूप से यह सच हो सकता है लेकिन एक सच यह है कि हम शिक्षित हो रहे हैं, डिग्रीधारी बन रहे हैं लेकिन संस्कार और संवेदनशीलता विलोपित हो रही है। हम शिक्षित हैं लेकिन जागरूक नहीं। हम डॉक्टर हैं, इंजीनियर हैं लेकिन समाज के प्रति जिम्मेदार नहीं। शिक्षक हैं लेकिन शिक्षा के प्रति हमारा अनुराग नहीं, पत्रकार हैं लेकिन निर्भिक नहीं। जिस भी कार्य का आप मूल्य चुकायेंगे, वह एक उत्पाद हो जाएगा। शिक्षा आज एक उत्पाद है जो दूसरे उत्पाद से आपको जोड़ता है कि आप नौकरी प्राप्त कर लें। दीक्षा विलोपित हो चुकी है। शिक्षा और दीक्षा का जो अंर्तसंबंध था, वह भी हाशिये पर है। शायद यही कारण है कि समाज में नैतिक मूल्यों का हस हो रहा है क्योंकि हम सब एक उत्पाद बन गए हैं। शिक्षा और दीक्षा के परस्पर संबंध के संदर्भ में यह बात भी आपको हैरान करेगी कि राजनीति विज्ञान का विषय है लेकिन वह भी शिक्षा का एक प्रकल्प है लेकिन राजनेता बनने के लिए शायद अब तक कोई स्कूल नहीं बन पाया है। राजनेता बनने के लिए शिक्षित नहीं, दीक्षित होना पड़ता है। यह एक अलग विषय है कि राजनेता कितना नैतिक या अनैतिक है लेकिन उसकी दीक्षा पक्की होती है और एक अल्पशिक्षित या अपढ़ भी देश संभालने की क्षमता रखता है क्योंकि वह दीक्षित है। विरासत में उसे राजनीति का ककहरा पढ़ाया गया है। वह हजारों-लाखों की भीड़ को सम्मोहित करने की क्षमता रखता है और यह ककहरा किसी क्लास रूम में नहीं पढ़ाया जा सकता है। शिक्षक दिवस तो मनाते हैं हम लेकिन जिस दिन दीक्षा दिवस मनाएंगे, उस दिन इसकी सार्थकता सिद्ध हो पाएगी।

(लेखक शोध पत्रिका ‘समागम’ के संपादक हैं)

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'कोरोना काल में शिक्षकों की डिजिटल चुनौतियां'

भारत में ऑनलाइन शिक्षा की नई और चुनौतीभरी दुनिया में आवश्यकता, आविष्कार की या कहें कि नवाचार की जननी बन गई है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Sunday, 05 September, 2021
Last Modified:
Sunday, 05 September, 2021
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प्रो. संजय द्विवेदी, महानिदेशक, भारतीय जन संचार संस्थान ।।

साल 2020 में ये मार्च का महीना था। कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया को एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया था, जहां सबकी गति मानो थम सी गई थी। भागते-दौड़ते शहर रुक से गए थे। शिक्षा का क्षेत्र अपने सामने गंभीर संकट को देख रहा था। बच्चे हैरान थे, तो अभिभावक परेशान। लेकिन उस दौर में उत्तर प्रदेश के गोरखपुर शहर में स्थित दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय के 260 शिक्षकों ने जो काम कर दिखाया, वो आज पूरे देश के शिक्षकों के लिए एक मिसाल है। इन शिक्षकों ने दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय के पोर्टल पर लगभग 2,192 ऑडियो-वीडियो लेक्चर अपलोड किए। इनमें से प्रत्येक वीडियो को लगभग एक लाख से ज्यादा छात्रों ने देखा। इन शिक्षकों में से अधिकतर ने अपने अध्यापन काल में कभी भी इस तरह की तकनीक का प्रयोग नहीं किया था। डिजिटल शिक्षा की तरफ बढ़ते भारत के कदमों की ये पहली आहट थी।

भारत में ऑनलाइन शिक्षा की नई और चुनौतीभरी दुनिया में आवश्यकता, आविष्कार की या कहें कि नवाचार की जननी बन गई है। भारत में शिक्षा विशेषज्ञ लंबे अरसे से ब्लैकबोर्ड और चॉक की जगह स्क्रीन और कीबोर्ड को देने की सिफारिश करते रहे हैं, पर इस दिशा में हम कभी भी ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाए। लेकिन शायद हमें इस मामले में कोरोना को धन्यवाद देना चाहिए, क्योंकि कोविड ने भारत में डिजिटल शिक्षा को एक नया आयाम दिया है। आज जब सोशल डिस्टेंसिंग नया नियम बन गई है, कक्षाओं में शारीरिक निकटता ने जानलेवा खतरा पैदा कर दिया है, स्कूल और शिक्षक सभी ऑनलाइन पढ़ाई के इस दौर में शामिल होने की तैयारी कर रहे हैं, तो शिक्षा के शब्दकोष में डेस्क, कुर्सी और पेंसिल की जगह तेजी से कंप्यूटर और कनेक्टिविटी लेते जा रहे हैं।

ऑनलाइन शिक्षा का मतलब केवल डिलिविरी मॉडल बदलना नहीं है। टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके शिक्षक, अवधारणाओं को असरदार ढंग से समझाते हुए पढ़ाई को ज्यादा दिलचस्प बना सकते हैं। टेक्नोलॉजी और डेटा उन्हें फौरन फीडबैक देता है। वे विश्लेषण कर सकते हैं कि छात्र क्या चाहते हैं, उनके सीखने के पैटर्न क्या हैं और इस के आधार पर वे छात्रों की जरुरत के हिसाब से तैयारी कर सकते हैं। ‘अमेरिकन इंस्टिट्यूट फॉर रिसर्च’ की एक रिपोर्ट के अनुसार आमने-सामने पढ़ाई में छात्र जहां 8 से 10 फीसदी बातें याद रख पाते हैं, वहीं ई-लर्निंग ने याद रखने की दर बढ़ाकर 25 से 60 फीसद तक कर दी है। टेक्नोलॉजी छात्रों को सीखने के लिए प्रेरित करती है और शर्मिंदगी या संगी-साथियों के दबाव से मुक्त फीडबैक देती है। असल कक्षाओं की तरह छात्रों को यहां नोट्स नहीं लेने पड़ते और वे शिक्षक की बातों पर ज्यादा ध्यान दे पाते हैं।

ऑनलाइन शिक्षा की शुरुआत, उच्च शिक्षा का सकल नामांकन अनुपात बढ़ाने में भी भारत की मदद कर सकती है। सकल नामांकन अनुपात का अर्थ है कि कितने प्रतिशत विद्यार्थी कॉलेज और विश्वविद्यालय में एडमिशन लेते हैं। 18 से 23 वर्ष के छात्रों की अगर बात करें, तो इस स्तर पर भारत का नामांकन अनुपात लगभग 26 फीसदी है, जबकि अमेरिका में ये आंकड़ा 85 फीसदी से भी ज्यादा है। एक अनुमान के मुताबिक अगर हमें 35 फीसदी के नामांकन अनुपात तक भी पहुंचना है, तो अगले पांच सालों में हमें कॉलेज में 2.5 करोड़ छात्र बढ़ाने होंगे। और इसके लिए हर चौथे दिन एक नया विश्वविद्यालय और हर दूसरे दिन एक नया कॉलेज खोलना होगा। जो लगभग असंभव सा प्रतीत होता है, लेकिन ऑनलाइन क्लासेस से ये सब संभव है।

 हालांकि भारत में ऑनलाइन शिक्षा की अभी भी कुछ दिक्कते हैं। वैश्विक शिक्षा नेटवर्क ‘क्यूएस’ की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में इंटरनेट का बुनियादी ढांचा अभी ऑनलाइन लर्निंग को सक्षम बनाने के लिए तैयार नहीं है। ‘इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2020 के अंत तक भारत में इंटरनेट के लगभग 45 करोड़ मंथली एक्टिव यूजर्स थे और इंटरनेट उपयोगकर्ताओं के मामले में चीन के बाद भारत दूसरे स्थान पर था। शिक्षा पर वर्ष 2018 के ‘नेशनल सैंपल सर्वे’ की रिपोर्ट के अनुसार, 5 से 24 साल की उम्र के सदस्यों वाले सभी घरों में से केवल 8 प्रतिशत के पास ही कंप्यूटर और इंटरनेट कनेक्शन है। ‘नीति आयोग’ की वर्ष 2018 की रिपोर्ट भी ये कहती है कि भारत के 55,000 गांवों में मोबाइल नेटवर्क कवरेज नहीं है। हैदराबाद विश्वविद्यालय के शिक्षकों द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण में छात्रों के बीच डिजिटल पहुंच की विविधता पर भी प्रकाश डाला गया है। इस सर्वेक्षण में शामिल लगभग 2500 छात्रों में से 90 प्रतिशत छात्रों का कहना था कि उनके पास मोबाइल फोन तो है, लेकिन केवल 37 प्रतिशत ने ही कहा कि वे ऑनलाइन क्लासेज से जुड़ सकते हैं। शेष छात्रों का कहना था कि कनेक्टिविटी, डेटा कनेक्शन की लागत या बिजली की समस्याओं के कारण वे ऑनलाइन क्लासेज से नहीं जुड़ पा रहे थे। इसके अलावा ऑनलाइन परीक्षाएं भी बड़ा मुद्दा है। ‘कैंपस मीडिया प्लेटफॉर्म’ द्वारा 35 से अधिक कॉलेजों के 12,214 छात्रों के बीच किए गए एक ऑनलाइन सर्वेक्षण में पाया गया कि 85 प्रतिशत छात्र ऑनलाइन परीक्षाओं से खुश नहीं थे, 75 प्रतिशत के पास उन कक्षाओं में भाग लेने या परीक्षाओं के लिए बैठने के लिए लैपटॉप नहीं था, जबकि 79 प्रतिशत के पास हाईस्पीड वाला ब्रॉडबैंड नहीं था। लगभग 65 प्रतिशत ने कहा कि उनके पास अच्छा मोबाइल इंटरनेट कनेक्शन उपलब्ध नहीं है, जबकि लगभग 70 प्रतिशत ने दावा किया कि उनके घर ऑनलाइन परीक्षा देने के लिए अनुकूल नहीं थे। यानी इस डिजिटल खाई को पाटने के लिए अभी हमें और मेहनत करने की जरुरत है।

सरकार इस दिशा में कई प्रयास भी कर रही है। ‘नेशनल ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क’, जिसे अब ‘भारत नेटवर्क’ कहा जाता है, का उद्देश्य 40,000 करोड़ रुपए से अधिक की लागत के साथ देश की सभी 2,50,000 पंचायतों को आपस में जोड़ना है। भारत नेट के माध्यम से सरकार की, प्रत्येक ग्राम पंचायत में न्यूनतम 100 एमबीपीएस बैंडविड्थ प्रदान करने की योजना है, ताकि ऑनलाइन सेवाओं को ग्रामीण भारत के सभी लोगों तक पहुंचाया जा सके। इस नेटवर्क को स्थापित करने का कार्य पूरा हो जाने के बाद यह संरचना न केवल एक राष्ट्रीय संपत्ति बन जाएगी, बल्कि नवाचार और प्रौद्योगिकी विकास की दिशा में एक गेम चेंजर भी साबित होगी। इसके अलावा ‘नेशनल नॉलेज नेटवर्क’ अखिल भारतीय मल्टी-गीगाबिट नेटवर्क है, जो भारत में कम्युनिकेशन इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास और अनुसंधान को बढ़ावा देता है तथा अगली पीढ़ी के एप्लीकेशन्स और सेवाओं के निर्माण में सहायता देता है। नेशनल नॉलेज नेटवर्क का उद्देश्य ज्ञान बांटने और सहयोगात्मक अनुसंधान की सुविधा के लिये एक हाई स्पीड डाटा कम्युनिकेशन नेटवर्क के साथ उच्च शिक्षा और शोध के सभी संस्थानों को आपस में जोड़ना है।

नई शिक्षा नीति में भी ये कहा गया है कि डिजिटल खाई को पाटे बिना ऑनलाइन शिक्षा का लाभ उठा पाना संभव नहीं है। ऐसे में ये जरूरी है कि ऑनलाइन और डिजिटल शिक्षा के लिए तकनीक का उपयोग करते समय समानता के सरोकारों को नजरअंदाज ना किया जाए। शिक्षा नीति में तकनीक के समावेशी उपयोग यानि सबको साथ लेकर चलने की बात कही गई है, ताकि कोई भी इससे वंचित ना रहे। इसके अलावा शिक्षकों के प्रशिक्षण की बात भी नई शिक्षा नीति में कही गई है, क्योंकि ये जरूरी नहीं कि जो शिक्षक पारंपरिक क्लासरूम शिक्षण में अच्छा है, वो ऑनलाइन क्लास में भी उतना ही बेहतर कर सके। कोविड महामारी ने साफ कर दिया है कि ऑनलाइन कक्षाओं के लिए के लिए ‘टू-वे वीडियो’ और ‘टू-वे ऑडियो’ वाले इंटरफेस की सख्त जरूरत है।

कोरोना के पहले यह माना जाता था कि ऑनलाइन शिक्षा प्रणाली का हर स्तर पर सीमित तथा सहयोगात्मक उपयोग ही होगा, क्योंकि डिजिटल कक्षा और भौतिक कक्षा कभी भी समकक्ष नहीं हो सकते हैं। खेल कंप्यूटर पर भी खेले जाते हैं, मगर स्क्रीन कभी भी खेल के मैदान का विकल्प नहीं बन सकती है। खेल के मैदान पर जो संबंध बनते हैं और जो मानवीय मूल्य सीखे और अन्तर्निहित किये जाते हैं, वह मैदान की विशिष्टता है, उसका विकल्प अन्यत्र नहीं है। इसी तरह अध्यापक और विद्यार्थी का आमने-सामने का संपर्क जिस मानवीय संबंध को निर्मित करता है, वह आभासी व्यवस्था में संभव नहीं होगा। लेकिन डिजिटल शिक्षा ने सब कुछ बदल दिया है। डिजिटल साक्षरता के जरिए बच्चे अपने आसपास की दुनिया से बातचीत करने के लिए टेक्नोलॉजी का जिम्मेदारी से इस्तेमाल करना सीख सकते हैं। बच्चे की जिंदगी में अहम बदलाव लाने में डिजिटल शिक्षा से कई फायदे होते हैं, जैसे मोटर स्किल्स, निर्णय क्षमता, विजुअल लर्निंग, सांस्कृतिक जागरुकता, बेहतर शैक्षिक गुणवत्ता और नई चीजों की खोज। ये सब शिक्षा को इंटरेक्टिव बनाते हैं। सीखना बुनियादी तौर से एक सामाजिक गतिविधि है। इसीलिए बच्चों को ऑनलाइन नेटवर्क से जुड़ने से रोकने के बजाय, हमें उन्हें सुरक्षा के साथ सीखने के लिए प्रोत्सहित करना चाहिए। क्योंकि डिजिटल शिक्षा अब हमारे जीवन का एक अंग बन चुकी है।

शिक्षा में सूचना एवं संचार का प्रयोग, तकनीक के विकास एवं क्रांति का युग है। हर दिन नई-नई तकनीकों तथा माध्यमों का विकास किया जा रहा है। डिजिटल शिक्षा सभी वर्गों के लिये आज शिक्षा का एक आनंददायक साधन है। विशेष रूप से बच्चों के सीखने के लिये यह बहुत प्रभावी माध्यम साबित हो रहा है, क्योंकि ऑडियो-वीडियो तकनीक बच्चे के मस्तिष्क में संज्ञानात्मक तत्त्वों में वृद्धि करती है और इससे बच्चों में जागरुकता, विषय के प्रति रोचकता, उत्साह और मनोरंजन की भावना बनी रहती है। इस कारण बच्चे सामान्य की अपेक्षा अधिक तेज़ी से सीखते हैं। डिजिटल लर्निंग में शामिल इंफोटेंमेंट संयोजन, इसे हमारे जीवन एवं परिवेश के लिये और अधिक व्यावहारिक एवं स्वीकार्य बनाता है।

अंग्रेजी में एक कहावत है Technology knocks at the door of students यानी तकनीक अब छात्रों के घर पहुंच रही है। आधुनिक कम्प्यूटर आधारित तकनीक ने न केवल शैक्षिक प्रसार के स्वरूप को परिमार्जित किया है, बल्कि तकनीक के समावेशन की प्रक्रिया को जन्म देकर, शिक्षा के क्षेत्र को एक प्रामाणिक व सर्वसुलभ आयाम प्रदान किया है। तकनीक के विकास से शिक्षा के क्षेत्र में हम जिस क्रांति की कल्पना करते थे, आज कंप्यूटर आधारित तकनीक ने इस कल्पना को साकार करके शैक्षिक क्षेत्र में नये युग का सूत्रपात किया है। हमारे लिए यही मौका है कि हम शिक्षा को अनुभव-आधारित और अनुसंधान-उन्मुख बनाएं, बजाए इसके कि छात्रों को परीक्षा के लिए रट्टा लगाना सिखाएं। भारत के पूर्व राष्ट्रपति स्वर्गीय प्रणब मुखर्जी ने कहा था कि छात्रों को चरित्र निर्माण की शिक्षा भी दी जानी चाहिए। इसलिए यह ध्यान रखना आवश्यक है कि शिक्षा सिर्फ पढ़ाई-लिखाई और डिग्री भर न रह जाए, बल्कि मानवीय मूल्यों और संस्कारों से युक्त शिक्षा हमारे विद्यार्थियों को बेहतर इंसान भी बनाए।

भविष्य की शिक्षा में तकनीक का हस्तक्षेप बढ़ेगा और अनेक अनजाने तथा अनदेखे विषय अध्ययन के क्षेत्र में आएंगे। बावजूद इसके हमें परंपरागत एवं तकनीक आधारित शिक्षा पद्धति के बीच संतुलन बनाकर अपनी शिक्षा व्यवस्था को लगातार परिष्कृत करना होगा। वर्तमान सदी इतिहास की सबसे अनिश्चित तथा चुनौतीपूर्ण परिवर्तनों की सदी है। इसलिए भविष्य की अनजानी चुनौतियों को ध्यान में रखकर हमें स्वयं को तैयार करना होगा। आने वाले समय में केवल एक विषय के ज्ञान से हमारा भला नहीं हो सकता है, इसलिए हमें हर विषय की जानकारी को शिक्षा का अभिन्न अंग बनाना होगा। सरकार का पूरा प्रयास है कि वह इस दिशा में भविष्यवादी दृष्टि के अनुरूप सुधार तथा बदलाव करती रहेगी। ऐसा करके ही हम शिक्षा के भविष्य को सुरक्षित कर सकते हैं और भविष्य की शिक्षा को समय के अनुरूप बना सकते हैं।

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'चंदन' से जुड़ी इन बातों को याद कर भावुक हुए इंडिया टीवी के चेयरमैन रजत शर्मा

मेरे जहन में चंदन मित्रा को लेकर जो पहली याद है वह कॉलेज के एक टॉपर के तौर पर है, जो हमेशा अपनी किताबों के साथ नजर आते थे।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 04 September, 2021
Last Modified:
Saturday, 04 September, 2021
Chandan545454

वरिष्ठ पत्रकार और पूर्व राज्यसभा सदस्य चंदन मित्रा का बुधवार (1 सितंबर 2021) की देर रात दिल्ली में निधन हो गया था। करीब 65 वर्षीय चंदन मित्रा कुछ समय से बीमार चल रहे थे। चंदन मित्रा ‘द पायनियर’ (The Pioneer) के संपादक भी थे, लेकिन इस साल जून में उन्होंने इस अखबार के प्रिंटर और पब्लिशर के पद से इस्तीफा दे दिया था। चंदन मित्रा दो बार राज्यसभा सदस्य रहे थे। पहली बार वह अगस्त 2003 से अगस्त 2009 तक राज्यसभा सदस्य रहे, फिर भारतीय जनता पार्टी ने 2010 में उन्हें मध्यप्रदेश से राज्यसभा सदस्य बनाया था। इसके बाद वर्ष 2018 में चंदन मित्रा ने ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस पार्टी (TMC) जॉइन कर ली थी।

चंदन मित्रा के निधन पर इंडिया टीवी के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ रजत शर्मा ने दुख जताया और उनसे जुड़ी कुछ यादें ताजा कीं, जिसे आप यहां पढ़ सकते हैं-

मेरे जहन में चंदन मित्रा को लेकर जो पहली याद है वह कॉलेज के एक टॉपर के तौर पर है, जो हमेशा अपनी किताबों के साथ नजर आते थे। कॉलेज के दिनों में, वह हर विषय का बहुत गहराई से अध्ययन करते थे और उनका ज्ञान अकसर मुझे हैरत में डाल देता था। उन्हें तमाम विषयों पर बात करते हुए सुनना हमेशा अच्छा लगता था।

चंदन की पढ़ाई का तरीका अनोखा था। वह ज्यादातर दिल्ली विश्वविद्यालय में ऊपर कॉफी हाउस के एक कोने में किताबों का ढेर, एक कप ब्लैक कॉफी और कंपनी की सिगरेट के साथ बैठते थे। मैं सोचता था कि इतने शोर-शराबे वाली जगह पर कोई कैसे पढ़ सकता है, लेकिन चंदन मित्रा करते थे।

उनकी हमेशा से राजनीति में रुचि थी। मैं भी छात्र राजनीति में इसलिए आया क्योंकि अरुण जेटली से मेरी दोस्ती थी, जो उस समय दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (DUSU) के अध्यक्ष थे। चंदन सेंट स्टीफंस कॉलेज के छात्र थे, जो दिल्ली विश्वविद्यालय से एफिलेटेड नहीं था। लेकिन फिर भी हम मिलते और राजनीति पर चर्चा करते थे। उन दिनों जयप्रकाश नारायण छात्र आंदोलनों का नेतृत्व कर रहे थे और पूरे देश में कांग्रेस विरोधी लहर थी। चंदन सरकार की तानाशाही की आलोचना करने में बहुत मुखर थे। चंदन के साथ, हम अकसर उनके स्कूल के दोस्त स्वप्रसाद गुप्ता से भी मिलते थे। दोनों ही इतिहास के अच्छे जानकार थे और मेरे लिए तो दोनों ही ज्ञान के भंडार थे। समय के साथ, हमारी दोस्ती और मजबूत होती गयी, लेकिन हमारी दोस्ती कैसे शुरू हुई इसके पीछे एक बेहद दिलचस्प कहानी है।

सेंट स्टीफंस में चंदन का एक दोस्त मिरांडा हाउस कॉलेज की एक लड़की से प्यार करता था। लड़की राजस्थानी राजपूत और लड़का बंगाली ब्राह्मण था। लड़की का भाई, जो हिंदू कॉलेज का छात्र था। वह इस रिश्ते के खिलाफ था। उसने उस बंगाली लड़के को अपनी बहन को न देखने की धमकी दी थी। लेकिन जब वह लड़का नहीं माना, तो उसका भाई अपने राजपूत दोस्तों के साथ एक दिन उसके हॉस्टल में घुस आए और कमरे में खूब तोड़फोड़ की और लड़की से दूर रहने की धमकी दी। इससे चंदन को बहुत गुस्सा आया और उन्होंने यह बात मुझे बतायी, तो मैंने कहा कि चिंता मत करो हम भी देख लेंगे। उसी शाम, मैं भी कई लड़कों के साथ हिंदू कॉलेज गया और उन लड़कों को हिदायत दी और उस लड़की के भाई को फिर कभी धमकी न देने की बात कही। यही वह घटना थी, जिससे वास्तव में हमारी दोस्ती की शुरुआत हुई थी।

एक और दिलचस्प बात थी, जो हम दोनों की दोस्ती की वजह बनी, वह थी हिंदी फिल्मी गानें सुनने को लेकर हमारा शौक। चंदन हिंदी फिल्मी गानों का भंडार थे! हम एक साथ काफी समय बिताते थे और इससे हमारी दोस्ती और मजबूत होती गयी। मैं अकसर उसे 'तुम चंदन, मैं पानी' कहकर चिढ़ाता था।

लेकिन फिर समय बदल गया और 1977 में आपातकाल घोषित कर दिया गया। मुझे और अरुण जेटली को जेल भेज दिया गया। इस वजह से हम बाहरी दुनिया से कट गए। जब हम बाहर निकले तो डर का माहौल था और हम ज्यादा एक्टिव नहीं थे। तब चुनावों की घोषणा हुई और चंदन बहुत उत्साहित थे। उन्होंने जनता पार्टी के लिए बहुत मेहनत की। उनका जुनून काबिले तारीफ था। वह घर-घर जाकर लोगों से जनता पार्टी को वोट देने की अपील करते थे।

इसके बाद चंदन एक पत्रकार बन गए और अखबारों में काम करने लगे। लेकिन फिर भी हम अकसर मिलते थे और देश से जुड़े मुद्दों पर बात करते थे। वह, हमेशा की तरह, इन सभी विषयों की बहुत गहरी समझ रखते थे। अरुण जेटली तब हम दोनों के एक कॉमन फ्रैंड थे और तब तक वह एक प्रसिद्ध अधिवक्ता बन गए थे और राजनीति में भी सक्रिय रूप से शामिल हो थे। धीरे-धीरे चंदन का भी झुकाव पत्रकारिता से ज्यादा राजनीति की ओर होने लगा था। जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बीजेपी सत्ता में आयी, तो अरुण जेटली ने उन्हें राज्यसभा भेजा। वह 10 साल तक उच्च सदन के सदस्य रहे, इस दौरान उन्होंने ‘द पॉयनियर’ को खरीदा और पत्रकारिता में वह एक सम्मानित नाम बन गए।

इस बीच, मैंने भी टेलीविजन पत्रकारिता में प्रवेश किया। हम दोनों तब अपने-अपने काम में बहुत व्यस्त हो गए थे और पहले की तरह नहीं मिल सकते थे। लेकिन मैं स्वप्रसाद से अकसर उनका हालचाल पूछता रहता था। जब भाजपा ने उन्हें राज्यसभा में तीसरे कार्यकाल के लिए नामित नहीं किया, तो इससे चंदन बहुत परेशान थे। इसलिए वह तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए थे।

दो साल पहले, मुझे पता चला कि उनकी तबीयत ठीक नहीं थी। मैं उनसे मिलना चाहता था, लेकिन नहीं कर सका क्योंकि कोविड महामारी ने बाहर जाना प्रतिबंधित कर दिया था। मुझे हमेशा इस बात का अफसोस रहेगा कि जब वह अस्वस्थ थे, तो एक बार भी उन्हें नहीं देख पाया। लेकिन दोस्तों की बातचीत में वह हमेशा याद रहेंगे। पत्रकारिता की दुनिया उन्हें उनके योगदान के लिए हमेशा याद करेगी। भारतीय राजनीति में उन्होंने जो शून्य छोड़ा है, वह हमेशा महसूस किया जाएगा।

 

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'कम्युनिटी रेडियो पर विज्ञापन का अनुपात बढ़ाने की प्रक्रिया शुरू, होगा आर्थिक लाभ'

भारत में 335 कम्युनिटी रेडियो स्टेशन हैं, जिनकी पहुंच देश की लगभग 10 करोड़ आबादी तक है। संकट के समय लोगों को सशक्त बनाने में कम्युनिटी रेडियो की महत्वपूर्ण भूमिका है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Friday, 03 September, 2021
Last Modified:
Friday, 03 September, 2021
sanjay325

'भारत में 335 कम्युनिटी रेडियो स्टेशन हैं, जिनकी पहुंच देश की लगभग 10 करोड़ आबादी तक है। संकट के समय लोगों को सशक्त बनाने में कम्युनिटी रेडियो की महत्वपूर्ण भूमिका है। समुदाय एवं उसमें रहने वाले लोगों को जोड़कर ही 'सबका साथ सबका विकास' संभव हो सकता है।' यह विचार भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी ने सूचना-प्रसारण मंत्रालय व वन वर्ल्ड फाउंडेशन इंडिया द्वारा आयोजित 'कम्युनिटी रेडियो जागरुकता कार्यशाला' के समापन समारोह में व्यक्त किए।

कार्यक्रम में सूचना-प्रसारण मंत्रालय के कम्युनिटी रेडियो सेल के अपर निदेशक गौरीशंकर केसरवानी, वन वर्ल्ड फाउंडेशन इंडिया के प्रबंध निदेशक राजीव टिक्कू और आभा नेगी भी उपस्थित थी।

प्रो. द्विवेदी ने कहा कि हमें ये समझना होगा कि आखिर हमें किसका साथ चाहिए और इससे किसका विकास होगा। उन्होंने कहा कि हमें समुदाय, प्रशासन और सरकार का साथ चाहिये और इससे समाज के उन लोगों का विकास होगा, जिन तक शासन और प्रशासन की पहुंच नहीं है।

प्रो. द्विवेदी के मुताबिक कम्युनिटी रेडियो सिर्फ समस्याओं की और ध्यान नहीं दिलाता, बल्कि उनका समाधान करने का प्रयास भी करता है। कोरोना महामारी के दौर में उत्तराखंड में 6 स्टेशनों ने मिलकर 'एक उम्मीद नेटवर्क' बनाया, जिसके द्वारा कोरोना से बचाव के उपाय लोगों को बताये गए। महामारी के इस दौर में प्रशासन को भी ये एहसास हुआ कि लोगों तक जानकारी पहुंचाने में कम्युनिटी रेडियो की महत्वपूर्ण भूमिका है।

प्रो. द्विवेदी ने कहा कि सामुदायिक रेडियो स्टेशन लोगों से उनकी भाषा में संचार करते हैं, जिससे न सिर्फ भाषा के बचाव में योगदान होता है, बल्कि अगली पीढ़ी तक उसका विस्तार भी होता है। कम्युनिटी रेडियो लोकगीतों के माध्यम से न सिर्फ संस्कृति का प्रचार प्रसार करते हैं, बल्कि सरकारी योजनाओं की जानकारी भी लोगों तक पहुंचाते हैं।

आईआईएमसी के महानिदेशक के अनुसार मौजूदा दौर में कम्युनिटी रेडियो पर विज्ञापन का अनुपात 7 मिनट प्रति घंटा है, जिसे बढ़ाकर 12 मिनट प्रति घंटा किये जाने की तैयारी शुरू हो चुकी है। इस बढ़े हुए समय से कम्युनिटी रेडियो को आर्थिक लाभ होगा और अपने लिए वित्तीय संसाधन जुटाने में मदद मिलेगी। इसके अलावा भारत सरकार ने देश में कम्युनिटी रेडियो समर्थन अभियान चला रखा है, जिसके लिए 25 करोड़ रुपए की राशि आवंटित की गई है। इस अभियान के तहत कम्युनिटी रेडियो स्टेशन की स्थापना का लगभग 75 फीसदी हिस्सा केंद्र सरकार देती है।

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वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल ने बताया, क्यों फिसलती जा रही है अमेरिका के हाथ से बाजी

वही हुआ, जिसकी आशंका थी। अमेरिका के लिए अफगानिस्तान गले की हड्डी बनता दिखाई दे रहा है। उसने तालिबान से समझौता तो किया

Last Modified:
Tuesday, 31 August, 2021
Rajeshbadal5454

वही हुआ, जिसकी आशंका थी। अमेरिका के लिए अफगानिस्तान गले की हड्डी बनता दिखाई दे रहा है। उसने तालिबान से समझौता तो किया, लेकिन सेना की वापसी के बाद उस मुल्क के लिए कोई साफ तस्वीर या योजना उसके पास नहीं थी। इसका सीधा सपाट कारण यही नजर आता है कि जो बाइडन के लिए फौजियों की घर वापसी से बड़ा कोई मसला नहीं था। बीस वर्ष वहां कठपुतली सरकार चलाने के बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान सरकार को ही कोसना शुरू कर दिया कि जब वे अपने लिए नहीं लड़ सकते तो फिर अमेरिका कब तक उनके लिए लड़ेगा। 

विश्व मंच पर चौधरी की भूमिका निभा रहे ताकतवर देश का यह रवैया न केवल गैर-जिम्मेदाराना है बल्कि मानवता के मसले पर भी अत्यंत चोट पहुंचाता है। इस प्रश्न का अमेरिकी सरकार के पास कोई उत्तर नहीं है कि उसने दो दशक में अफगानी निर्वाचित सरकार को सशक्त क्यों नहीं होने दिया। इसके पीछे उसके कौन से हित छिपे थे? अफगानिस्तान के करोड़ों बेकसूर नागरिकों के इन सवालों का प्रेत अमेरिका पर हमेशा मंडराता रहेगा।

असल में कठोर आलोचक रूस, चीन और ईरान जैसे राष्ट्रों के लिए भी अमेरिका का यह रुख पहेली ही है। जानकार हैरान हैं कि अमेरिका ने अपने तरकश के कूटनीतिक तीरों का इस्तेमाल क्यों नहीं किया। उसने तालिबानियों से यह समझौता तो नहीं ही किया था कि वे बाद में अपनी धरती पर गिल्ली-डंडा खेलेंगे और अशरफगनी की सरकार शांति से राज करती रहेगी। 

वे चाहते तो अपनी सेना के रहते तालिबान और वहां की सरकार के संग मिलीजुली सरकार बनवाते और साल भर पैनी नजर रखते। दूसरा विकल्प यह था कि वे अपनी कमान में संयुक्त प्रशासन परिषद बनाते। परिषद लगातार काम करती तो बीस साल के भूखे तालिबानी सत्ता के स्वाद से परिचित होते और फिर शायद चुनाव आयोग जैसी किसी संस्था में उनका भरोसा जगता (हालांकि यह बहुत मुश्किल था) पर यह सच है कि उस सूरत में अमेरिकी सेना अफगानिस्तान से करीब साल भर और पिंड नहीं छुड़ा सकती थी। 
राजनीतिक ईमानदारी तो यही कहती है कि बीस वर्ष राज करने के बाद अमेरिका को अफगानिस्तान में समझदारी भरा एक साल और काटना चाहिए था। एक लोकतांत्रिक देश की अनुशासित सेना वहां एक वर्ष और बिता सकती थी।

अमेरिका के ऐसा नहीं करने के दो कारण समझ में आते हैं। कुछ वर्षो से अमेरिकी अर्थव्यवस्था गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। अपने हथियार उद्योग के जरिये वह वित्तीय हालत में प्राणवायु फूंक सकता है। इस मकसद में अफगानिस्तान सहायक है। 

यदि वहां गृहयुद्ध छिड़ता है तो एक तरफ तालिबान लड़ाकों को हथियार बेच सकता है तो दूसरी ओर अफगानी फौज को तालिबान से लड़ने के लिए हथियार गोला बारूद दे सकता है। इस तरह अफगानिस्तान में अशांति अमेरिका को रास आती है। 

दूर की कौड़ी यह है कि बोतल में बंद तालिबानी जिन्न बाहर निकालने से रूस, पाकिस्तान, ईरान, चीन और भारत की पेशानी पर बल पड़ते हैं। रूस तालिबान से आशंकित है तो चीन अपने यहां शिनजियांग में अशांति का खतरा देख रहा है। 

पाकिस्तान के पेशावर पर तो तालिबानी अपना हक जताते ही रहे हैं। मजहब के नाम पर वह पाकिस्तान को नचा सकता है। भारत कश्मीर में तालिबान के दखल की आशंका देख रहा है। याद दिलाना जरूरी है कि जो बाइडेन और कमला हैरिस अपने पदों पर चुने जाने से पहले ही भारत की कश्मीर नीति के कट्टर आलोचक रहे हैं। 

यानी अर्थ यह भी है कि अमेरिका ने एक तालिबानी तीर से कई निशाने साध लिए हैं। पर क्या उसकी यह मंशा पूरी होगी? शायद नहीं, क्योंकि एशिया में अगर समीकरण उलट गए तो अमेरिका के लिए संकट बढ़ जाएगा।

हकीकत यह है कि अमेरिका की स्थिति सांप-छछूंदर जैसी है। जिन देशों को वह सैनिक सहायता दे रहा है, वे भयभीत हैं और सोचते हैं कि अमेरिका कभी भी मंझधार में छोड़कर भाग सकता है। इसलिए वे अमेरिका से छिटक सकते हैं। 

अमेरिका के प्रति आशंकित तो जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश भी हैं। वे नजरअंदाज नहीं कर रहे हैं कि आने वाले दिनों में यदि अमेरिका ने चीन से हाथ मिला लिया तो वे अपनी विदेश नीति का क्या करेंगे। अमेरिका अब अफगानिस्तान में दोबारा नहीं जा सकता और उससे दूरी बनाने में चौधराहट पर आंच आती है। 

जानकार कह रहे हैं कि अमेरिकी नागरिक ट्रम्प के बाद एक और राष्ट्रपति को नाकाम होते देखेंगे। अजीब बात है कि जॉर्ज बुश, बराक ओबामा, ट्रम्प और जो बाइडेन चारों राष्ट्रपतियों ने अफगानिस्तान के मामले में सारे विश्व को अंधेरे में रखा है। वे बार-बार दोहराते रहे हैं कि तालिबान निर्मूल हो चुका है। 

अफगानिस्तान सरकार और लोकतंत्र को वहां कोई खतरा नहीं है। हकीकत यह है कि तालिबान ने तो 2009 में ही देश के दक्षिणी भाग पर कब्जा कर लिया था। उसने अमेरिकी सेनाओं का ग्रामीण इलाकों में जाना वर्षों से रोक रखा था। अमेरिका ने 1000 अरब डॉलर वहां बहाए, 5000 से अधिक सैनिक गंवाए और लौट के बुद्धू घर को आए। 

लौटते-लौटते तालिबानियों को 8 लाख हथियार, 60 से अधिक मालवाहक विमान, 108 लड़ाकू हेलिकॉप्टर, 23 लड़ाकू विमान और 18 खुफिया टोही विमान, 168 यात्नी विमान, 76000 फौजी गाड़ियां और 200000 संचार उपकरण उपहार में देकर आए। अफगानी सेनाओं का आसान समर्पण और तालिबानियों को विराट मदद क्या दोहरे अमेरिकी चरित्र का सबूत नहीं है?

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इस हकीकत को समझिए, फर्जी खबरों से मुकाबला करना आसान हो जाएगा मिस्टर मीडिया!

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की चिंता जायज है। सोशल मीडिया के तमाम मंचों पर जानकारियों से छेड़छाड़ की बाढ़ है।

Last Modified:
Monday, 30 August, 2021
rajeshbadal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की चिंता जायज है। सोशल मीडिया के तमाम मंचों पर जानकारियों से छेड़छाड़ की बाढ़ है। फर्जी खबरें भी नहीं रुक रही हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन तक ने इसे कोविड के दरम्यान इनफोडेमिक कहा है। ऐसे में निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता वक्त की आवश्यकता है। जस्टिस चंद्रचूड़ ने दो दिन पहले नागरिकों के सत्ता से सच बोलने के अधिकार पर अपने व्याख्यान में इस बात पर जोर दिया है कि राष्ट्र को ऐसी पत्रकारिता चाहिए, जो एकदम स्वतंत्र और निष्पक्ष जानकारियां दे सके। मौजूदा दौर में निश्चित ही इस राय का स्वागत किया जाना चाहिए।

दरअसल भ्रामक और फर्जी समाचारों का निजी इस्तेमाल कम और सियासी दुरुपयोग अधिक होता है। पत्रकारिता के अनेक आधुनिक रूप चुनाव के दौरान और बाद में लोक धारणा बनाने में एक कारगर हथियार की तरह काम आते हैं। राजनीतिक दल आपसी होड़ के चलते एक दूसरे के शिखरपुरुषों के बारे में निंदनीय और गलत सूचनाएं फैलाते हैं। पुरखों की चरित्र हत्या करते हैं। यह अब छिपी हुई बात नहीं है। ऐसा करके वे एक अपराध भी करते हैं। वे उन शिखर पुरुषों के जमाने के ऐतिहासिक और प्रामाणिक तथ्यों- आंकड़ों को भी झूठा साबित करते हैं। सोशल मीडिया के इन अवतारों का उपयोग करने वाला आम आदमी इतिहास में कोई शोध उपाधि प्राप्त नहीं होता। समाज के आम वर्गों को तो छोड़ दीजिए, पढ़े लिखे डॉक्टरों, वकीलों, शिक्षकों, बैंकरों, इंजीनियरों और प्रशासनिक तथा पुलिस अफसरों की पढ़ाई अपने अपने संकायों में होती है इसलिए भारतीय इतिहास की दस्तावेजी जानकारी उन्हें नहीं होती। जब यह फेक या फर्जी समाचार उन तक पहुंचता है तो बहुधा वे भरोसा भी कर लेते हैं। उनके कामकाज और व्यवहार में भी गलत सूचनाओं के आधार पर बदलाव आता है।झूठ का यह विस्तार यकीनन जुर्म है और माननीय न्यायालय सुओ मोटो इस पर कार्रवाई करेगा तो आम जनता को राहत मिलेगी। यह बात सर्वोच्च अदालत भी जानती है कि भारत का एक आदमी निजी तौर पर झूठ और पाखण्ड से लड़ने में उदासीन है। सोसाइटी में आया यह परिवर्तन सामाजिक ढांचे की सेहत के लिए शुभ संकेत नहीं है। ऐसे में न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ का सच के साथ जुड़ने पर जोर देना सामयिक जरूरत भी है।

महात्मा गांधी अपने को पूर्णकालिक पत्रकार मानते थे। वे हिन्दुस्तान के सबसे बड़े संप्रेषण पुरूष थे। करीब आधी सदी तक उन्होंने जिम्मेदारी भरी और सरोकारों वाली पत्रकारिता की। वे हमेशा समाचारों के जरिए सच से संवाद पर बल देते रहे। उनके सत्याग्रह की सबसे बड़ी ताकत यही थी। सच सिर चढ़कर बोलता है और झूठ के पांव नहीं होते। इसलिए गांधी की सच वाली पत्रकारिता ही आज की आवश्यकता है। झूठ और फर्जी खबरें अपने आप गायब हो जाएंगीं। इस हकीकत को समझ लिया तो आने वाली चुनौतियों और नकली समाचारों से मुकाबला करना आसान हो जाएगा मिस्टर मीडिया!

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विचारों की स्वतंत्रता का अर्थ कतई मुंहजोरी नहीं हो सकता: पूरन डावर

भारत में पिछली कुछ जेनरेशन एक विचित्र स्थिति में हैं। संस्कृति की दृष्टि से हो या भाषा की दृष्टि से, न अंग्रेजी के मास्टर बन सके और न हिंदी समझ सके।

पूरन डावर by
Published - Friday, 27 August, 2021
Last Modified:
Friday, 27 August, 2021
Puran Dawar

पूरन डावर, चिंतक एवं विश्लेषक।।

भारत में पिछली कुछ जेनरेशन एक विचित्र स्थिति में हैं। संस्कृति की दृष्टि से हो या भाषा की दृष्टि से, न अंग्रेजी के मास्टर बन सके और न हिंदी समझ सके। न भारतीय संस्कृति अपना सके और न पाश्चात्य व्यवस्था को।

हिंदू संस्कृति में माता-पिता को भगवान का दर्जा दिया गया है। भगवान उन्हें जो कुछ देता है, माता-पिता के माध्यम से देता है। माता-पिता रात-दिन मेहनत कर, हर उधेड़बुन कर, यश-अपयश प्राप्त कर जो कुछ एकत्र करते हैं, सब कुछ संतान के पालन में और बचाया या जोड़ा,  संतान के लिए छोड़ या सौंप देते हैं। विडम्बना यह है कि आज की संतान उसे अपना अधिकार मानकर अपने आपको माता-पिता का पालक समझने लगती है, इस बात को भूलकर कि सब उन्हीं का तो दिया है। पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित होकर या स्वतंत्र विचारों को रखने के अधिकार का कुतर्क, माता-पिता से उसी के अनुसार व्यवहार और संबंधों को निभाने का प्रयास ये जेनरेशन कर रही है।

यानी प्राप्ति के लिए हिंदू संस्कृति और अधिकारों के लिए पाश्चात्य या तथाकथित वैचारिक स्वतंत्रता के कुतर्क। विचारों की स्वतंत्रता का अर्थ कतई मुंहजोरी नहीं हो सकता। मेरा स्पष्ट मत है कि जिसने हिंदू धर्म और संस्कृति में जन्म लिया है, उसे उसी संस्कृति का चुनाव और संस्कृति के अनुसार व्यवहार करना  चाहिए। इसमें लाभ अधिक हैं, लेकिन तथाकथित स्वतंत्र विचारों से थोड़ा समझौता और थोड़े से अनुशासन का पालन करना पड़ सकता है।

यदि आप माता-पिता की संपत्ति पर हक जताते हैं तो उनके पूरे सम्मान का ध्यान भी रखना होगा और कम से कम खाना और गुर्राना दोनों तो नहीं हो सकते। भारत में कमोबेश यही व्यवस्था भ्रष्टाचार में भी है। लेकिन संतान को पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए कि यदि उन्हें पाश्चात्य सभ्यता पसंद है तो उसे अंगीकार करें, जिसमें बच्चे की अच्छी परवरिश केवल बाल्यावस्था तक है या अधिकतम किशोरावस्था। हाईस्कूल में आते ही उसे अपनी स्कूल फीस भी स्वयं कमानी होती है और यदि माता-पिता से उधार लेता है तो जॉब शुरू करने पर वापस चुकाना होता है। पिता की फैक्टरी में यदि काम करता है तो अन्य कर्मचारियों की तरह अनुशासन अपनाना होता है एवं उसी योग्यतानुसार बराबर सैलरी मिलती है। दोनों व्यवस्थाएं अपनी जगह ठीक हैं।

इस व्यवस्था में हर जन्म लेने वाले को संघर्ष एवं स्वयं को स्थापित करने का मौका मिलता है और अपने जीवन को पूरी स्वतंत्रता से जीने का मौका। माता-पिता की उतनी सेवा और सम्मान, जितना बाल्यावस्था की सेवा को चुकाया जा सके।

माता-पिता की मृत्यु के बाद विरासत में भी सीमित मिलता है। बाकी बचा देश के कानून के अनुसार सरकार को जाता है।। लेकिन आज की जेनरेशन दोनों व्यवस्थाओं में अपने हित को चुनकर दोनों नावों पर पैर रख कर चलना चाहती है। यही पारिवारिक समस्याओं का मुख्य कारण है। हक भारतीय व्यवस्था और व्यवहार पाश्चात्य व्यवस्था: माता-पिता और बच्चों दोनों को ही युवावस्था आते ही बैठकर स्पष्ट विचार-विमर्श करना चाहिए और युवाओं को स्वेच्छानुसार सोच-समझकर पद्यति का चयन करना चाहिए।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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Zee में बड़ी भूमिका निभाने को लेकर प्रदीप गुहा ने दिए थे ये टिप्स: आशीष सहगल

जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज में ऐड रेवेन्यू टीम के चीफ ग्रोथ ऑफिसर आशीष सहगल ने भी गुहा के निधन पर शोक जताया और उन्हें याद करते हुए अपने विचार साझा किए

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 26 August, 2021
Last Modified:
Thursday, 26 August, 2021
PradeepGuha45448

‘9एक्स मीडिया’(9X Media) के मैनेजिंग डायरेक्टर और ‘इंडियन न्यूजपेपर सोसायटी’ (INS) के पूर्व प्रेजिडेंट प्रदीप गुहा के निधन पर उन्हें श्रद्धांजलि देने वालों का तांता लगा हुआ है। जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज में ऐड रेवेन्यू टीम के चीफ ग्रोथ ऑफिसर आशीष सहगल ने भी गुहा के निधन पर शोक जताया और उन्हें याद करते हुए अपने विचार साझा किए-

प्रदीप गुहा के साथ मेरी हर मुलाकात हल्की-फुल्की रही है। मुझे याद है कि मैं उनसे जी (Zee) में अपने इंटरव्यू के दौरान पहली बार मिला था। वैसे वह एक मिलनसार लीडर थे। मेरे दोस्तों, तब उन्होंने मुझसे सिर्फ मेरे जीवन के अनुभव के बारे में पूछा था और वह भी सिर्फ उस खेल के बारे में जो मेरा प्रिय था। उन्होंने एक बार भी मेरे पिछले कार्यों के अनुभव या व्यावसायिक दृष्टिकोण के बारे में नहीं पूछा, बल्कि मुझे लगता है कि उन्होंने सिर्फ यह समझने का प्रयास किया कि आस-पास के लोगों के साथ मेरी बॉन्डिंग कैसी है और क्या मेरा व्यक्तित्व कंपनी के साथ तालमेल बिठा पाएगा। यानी यूं कहूं कि वह कहीं न कहीं यह जानना चाहते थे कि मैं किस तरह का टीम प्लेयर हूं।

हालांकि यह सबकुछ मेरे लिए हैरान करने वाला था, लेकिन बाद में मुझे उनका दृष्टिकोण समझ आया। यह प्रदीप गुहा ही थे, जिन्होंने जी (Zee) को सभी टीमों को एक किया और जी को एक आकार दिया, जो वह आज है। वास्तव में कंपनी उनके द्वारा बनाए नियमों पर आज भी काम कर रही है। और हां, उन्होंने हमारी बातचीत के 2 घंटे के भीतर ही मुझे नियुक्ति पत्र सौंप दिया था। वह चीजों को इतना ज्यादा नहीं सोचते थे, लिहाजा उन्होंने मेरे चयन का निर्णय भी बहुत ही जल्दी कर लिया था।

मैं यहां बहुत ही खुशी के साथ कहना चाहूंगा कि उनकी वजह से ही हम सभी जी (Zee) के साथ जुड़े। उन्होंने बहुत सारी प्रतिभाओं को पहचाना, जो शायद समय की जरूरत थी। उन्होंने अंततः जी में एक बेहतरीन टीम का निर्माण किया था।

कार्य संबंधों के अतिरिक्त भी उनसे मैंने बहुत कुछ सीखा है, फिर चाहे वह जीवन की सीख ही क्यों न हो। उन्होंने हमें कभी भी संख्याओं या विज्ञापन बिक्री की बारीकियों के बारे में बहुत ज्यादा नहीं बताया, लेकिन उन्होंने बहुत कुछ निर्मित किया है। वह बहुत ही सम्माननीय थे। मुझे याद है कि उन्हें पहले साल के कारोबार के लिए रियो में सम्मानित किया गया था। यह वही प्रदीप गुहा थे, जो जी में रिवॉर्ड कल्चर लेकर आए। इन सभी चीजों ने हमें बहुत ही प्रेरित किया है।

सेल्स में लाए उनके स्टाइल को मैं यहां बताना कैसा भूल सकता हूं। उन्होंने हमारी सभी आशंकाओं को दूर किया, खासकर तब जब हम प्रजेंटेशन के लिए जाते थे। उन्होंने हमें हमेश ही मोटिवेट किया, फिर चाहे वह काम के लिहाज से हो, या फिर खुद को आगे बढ़ाना हो।

जब उन्होंने जी छोड़ दिया उसके बाद भी मैं विभिन्न माध्यमों के जरिए उनसे संपर्क में रहा। जब मैं यहां नेटवर्क में हेड बना, तो मेरे लिए उनका सिर्फ यही सुझाव था कि विनम्र बने रहना और सभी के लिए सरल स्वभाव रखना। ठीक वैसे ही जैसे वह खुद थे। उनकी कमी को शायद ही अब कोई पूरा कर पाए।

वह उतने ही जरूरी हैं, जितने की अन्य लोग। शाब्दिक अर्थ में कहूं तो वह एक महान कहानीकार थे, क्योंकि वह हमेशा ही ऐसे मजेदार किस्से सुनाते थे, ताकि सभी को एक साथ ला सकें। यही वजह है कि आज इतने सारे लोग उनका अनुसरण करते हैं या उनके वफादार हैं।

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