इसलिए भी हुआ है पाकिस्तान की अर्थवस्था का कबाड़ा, बोले वरिष्ठ पत्रकार टीपी पाण्डेय

अभी तक की खबरों से लगता है कि पाकिस्तान कार्रवाई के नाम पर सिर्फ दिखावा कर रहा है

टीपी पाण्डेय by
Published - Thursday, 04 July, 2019
Last Modified:
Thursday, 04 July, 2019
TP Pandey

टीपी पाण्डेय, वरिष्ठ पत्रकार।।

पाकिस्तान में आजकल इंतकाम की सियासत परवान चढ़ रही है। प्रधानमंत्री इमरान खान नियाजी अपने राजनीतिक विरोधियों को निबटाने का कोई मौका नहीं चूक रहे। हालांकि ये अलग बात है कि उन्होंने आर्थिक भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए कुछ सराहनीय कदम भी उठाए हैं। पूर्व राष्ट्रपति आसिफ जरदारी पहले से ही भ्रष्टाचार के मामले में जेल में हैं। जरदारी साहब की तरह उनकी बहन फरयाल तालपुर भी जेल में कैद हैं।

इसी तरह मुल्क के पूर्व प्रधानमंत्री मियां नवाज शरीफ भी लाहौर की कोट लखपत जेल में बंद हैं। नवाज शरीफ के भतीजे हमजा शहबाज भी जेल में हैं। खबर है कि ये लिस्ट अभी लंबी है। गिरफ्तार होने वालों की लिस्ट में आसिफ जरदारी के पुत्र बिलावल भुट्टो और सिंध के मुख्यमंत्री मुराद अली शाह भी शामिल हैं। अभी दो रोज पहले नवाज शरीफ के वफादार सिपाही और उनकी पार्टी पीएमएलएन के बड़े नेता राणा सनाउल्लाह को भी कार में 15 किलो हेरोइन रखने के इल्जाम में गिरफ्तार किया गया।

ये गिरफ्तारी तब हुई, जब राणा सनाउल्लाह फैसलाबाद से इस्लामाबाद के लिए सड़क मार्ग द्वारा जा रहे थे। रास्ते में चेक पोस्ट पर एंटी नारकोटिक्स फोर्स ने उनकी गाड़ी को रुकवाकर चेक किया तो पता लगा कि कार की डिग्गी में भारी मात्रा में हेरोइन की खेप है। इस गिरफ्तारी को लेकर पाकिस्तान में जबर्दस्त हलचल है। पीएमएलएन सहित देश में मीडिया के एक तबके ने राणा सनाउल्लाह की गिरफ्तारी पर सवाल उठाए हैं। ‘जियो टीवी’ के संपादक और वरिष्ठ पत्रकार हामिद मीर ने भी राणा सनाउल्लाह की गिरफ्तारी को हैरतअंगेज करार दिया है।

बकौल हामिद मीर, पाकिस्तान में पहले भी ऐसा होता रहा है। अगर सियासी इंतकाम लेना हो तो ऐसे केस बना दिए जाते हैं। राणा सनाउल्लाह की छवि पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज) के दबंग नेताओं की रही है। उन पर कई लोगों की हत्या के आरोप हैं। उनके विरोधी तो यहां तक कहते हैं कि राणा साहब के मुल्क में पल रहे जेहादी संगठनों से भी रिश्ते हैं। अब ये बातें कहां तक सच हैं, यह तो जांच का विषय है मगर ये भी सच है कि राणा सनाउल्लाह लंबे वक्त से इमरान की आंखों का कांटा बने हुए थे, क्योंकि वो इमरान पर राजनीतिक हमले के साथ-साथ निजी हमले भी कर रहे थे।

पिछले दिनों ‘जियो टीवी’ को दिए गए एक साक्षात्कार में उन्होंने इमरान की निजी जिंदगी पर सख्त टिप्पणी की थी। इसके बाद ये माना जाने लगा था कि अब राणा की गिरफ्तारी तय है। आखिरकार हुआ भी ऐसा ही। पीएमएलएन के नेता इसे बदले की भावना से की गई कार्रवाई करार दे रहे हैं। पाकिस्तान में राजनीतिक एवं आर्थिक संकट के कई कारण हैं। देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह आईसीयू में है। पाकिस्तान इस संकट से उबरने के लिए छटपटा रहा है।

पिछले 11 जून को जब देश का सालाना बजट पेश किया गया तो इस बजट के बाद से पाकिस्तान के नौकरीपेशा लोगों, छोटे कारोबारियों और बड़े बिजनेसमैनों पर भारी भरकम टैक्स लाद दिया गया। पाकिस्तान की अर्थवस्था का कबाड़ा इसलिए भी हुआ, क्योंकि 20 करोड़ के देश में केवल 7 लाख लोग अपना इनकम टैक्स रिटर्न दाखिल करते हैं। टैक्स चोरी और मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में पाकिस्तान के सियासतदां तो नंबर वन हैं, इनमें जरदारी और नवाज शरीफ भी शामिल हैं। इन पर सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग और भ्रष्टाचार के संगीन मामले हैं।

सुना तो यहां तक गया है कि नवाज शरीफ के फॉर्म हाउस जाती उमरा के कमरों में सोने की टाइल्स और गुसलखाने में सोने की टोंटिया लगी हैं, जो संयुक्त अरब अमीरात से विशेष रूप से मंगवाई गई थीं। ऐसे में इमरान खान लगातार ये पूछ रहे हैं कि इतनी बेशुमार दौलत आई कहां से? वे कहते हैं कि नवाज शरीफ ने देश को बुरी तरह लूटा है। जनता को भीख का कटोरा थमाकर नवाज शरीफ अरबों की जायदाद के मालिक बने हुए हैं। आरोप तो यहां तक हैं कि लंदन में नवाज शरीफ की करीब 300 जायदाद हैं। आखिर ये पैसा आया कहां से?

इसी तरह ‘मिस्टर 10 परसेंट’ के नाम से मशहूर आसिफ जरदारी की लंदन, अमेरिका और सेंट्रल एशिया के कई देशों में अकूत और बेनामी संपत्तियां हैं। भ्रष्टाचार की जांच कर रही संस्था NAB  यानी नेशनल अकाउंटेबिलिटी ब्यूरो की जांच में ये तक पाया गया कि जरदारी के कई फर्जी बैंक खाते हैं। एक खाता तो उनका किसी कुल्फी-फालूदा विक्रेता के नाम पर है। जाहिर है कि सियासतदानों के आर्थिक भ्रष्टाचार और अरबों की टैक्स चोरी की कीमत पाकिस्तान को चुकानी पड़ रही है। उसे आईएमएफ, चीन, सऊदी अरब से कर्ज लेना पड़ रहा है।

पिछले दिनों कतर ने भी पाकिस्तान को 3 अरब डॉलर का कर्ज दिया है। असल में पाकिस्तान में एक प्रकार से टैक्स चोरी का रिवाज सा बन गया था। प्रधानमंत्री इमरान की कोशिश है कि देश को गुरबत से बाहर निकाला जाए और लोग टैक्स देने पर मजबूर हों। इसलिए सरकार ने ‘फेडरल बोर्ड ऑफ रेवेन्यू’ (FBR) को खुली छूट दी है। शायद ये भी एक वजह है कि देश में इमरान के खिलाफ माहौल तैयार किया जा रहा है। समूचा विपक्ष इमरान के खिलाफ लामबंद है। व्यापारियों को भड़काया जा रहा है और वे इस्लामाबाद की सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं। इमरान के बारे में ये बात ज़रूर कही जाती है कि वे एक खालिस राजनेता नहीं हैं। वे क्रिकेट के चैंपियन तो हैं, लेकिन राजनीति के माहिर खिलाड़ी नहीं हैं। उनके इर्दगिर्द भी चापलूसों की जमात है, लेकिन एक बात तो इमरान के पक्ष में जाती है। वो ये है कि उन पर आर्थिक भ्रष्टाचार का कोई मामला नहीं है। अब क्योंकि वे खुद भी ईमानदार हैं, इसलिए भी सख्त फैसले कर रहे हैं और शायद ये भी एक वजह है कि जिससे उनके विरोधियों का हाजमा खराब हो गया है।

इस बीच पाकिस्तान में एक बड़ी तब्दीली देखने को ये मिली कि देश की राष्ट्रीय विकास परिषद का सदस्य आर्मी चीफ कमर जावेद बाजवा को भी बना दिया गया जिन्होंने पिछले दिनों एक विश्वविद्यालय के सेमिनार में तकरीर करते हुए स्वीकार किया कि देश बुरी तरह आर्थिक संकट से गुज़र रहा है। इस स्थिति से निबटने के लिए उन्होंने देशवासियों से सहयोग की अपील की है। आर्मी चीफ के इस बयान से इमरान खान को काफी राहत मिली है। वह इसलिए कि पाकिस्तान की अवाम राजनेताओं से कहीं ज़्यादा वहां की फौज पर भरोसा करती हैं। इसके बावजूद इमरान के सामने चुनौतियों का पहाड़ है।

इमरान के लिए नवाज शरीफ और जरदारी खानदान के अलावा जमात-ए-इस्लामी के अध्यक्ष मौलाना फजलुर रहमान सिरदर्द बने हुए हैं। वे लगातार उनकी राह में कांटे बिछा रहे हैं। पिछले दिनों उनकी ही पहल पर ऑल पार्टी कॉन्फ्रेंस आयोजित हुई, जिसमें नवाज़ शरीफ की बेटी मरियम नवाज सफदर और बिलावल भुट्टो जरदारी भी शामिल थे, मगर ये कॉन्फ्रेंस फ्लॉप शो साबित हुई। मौलाना फजलुर रहमान एक तरह से भारतीय राजनीति के रामविलास पासवान की तरह हैं। उनकी तारीफ ये है कि अब तक पाकिस्तान में जितनी भी डेमोक्रेटिक सरकारें रहीं, उनमें उनको कोई न कोई मलाईदार मंत्रालय मिल जाया करता था। नवाज शरीफ से लेकर बेनजीर भुट्टो तक, सबने उन्हें मंत्री पद देकर उपकृत किया।

वे एक जमाने में परवेज मुशर्रफ के भी बहुत करीबी रहे, मगर इमरान खान ही एक नेता हैं, जिन्होंने मौलाना फजलुर रहमान को कभी घास नहीं डाली और उन्हें पास नहीं फटकने दिया, इसलिए मौलाना की हालत उस मछली की तरह है जो पानी न मिलने से छटपटा रही है। मौलाना फजलुर रहमान की पार्टी के देश में सैकड़ों मदरसे हैं और आरोप है कि उनका संगठन आतंकी तंजीमों को भी मदद करता रहा है एक प्रकार से कहा जाए तो इमरान खान उनसे दूर रहकर अपने देश का भला ही कर रहे हैं।

अगले माह अगस्त में पेरिस में ‘Financial Action Task Force’ (FATF) की बैठक है, जिसमें पाकिस्तान को काली सूची में डाला जा सकता है। अभी तक पाकिस्तान ग्रे लिस्ट में है। एफएटीएफ में 34 देश हैं, जिसमें भारत भी है। लिहाजा, सदस्य देश पाकिस्तान से पूछेंगे कि उन्होंने आतंकवादी संगठनों के खिलाफ अब तक कोई सख्त कार्रवाई की है या नहीं। वहां पाकिस्तान से ठोस सबूत मांगे जाएंगे। ऐसे में अगर पाकिस्तान एफएटीएफ को संतुष्ट न कर सका तो तो उसे ब्लैक लिस्टेड होने से कोई नहीं बचा सकता। अभी तक जो खबरें मिल रही हैं, उससे तो ऐसा ही लगता है कि पाकिस्तान कार्रवाई के नाम पर सिर्फ दिखावा कर रहा है।

आने वाले महीने पाकिस्तान की राजनीति का असली इम्तिहान है। वजह साफ है कि देश की जनता में इमरान की लोकप्रियता लगातार गिर रही है। एक सर्वे के मुताबिक, चुनाव जीतने के बाद इमरान की लोकप्रियता 80 फीसदी थी, जो घटकर 50 फीसदी रह गई है। ऐसे में इमरान, उनकी सरकार और वहां की फौज को सोचना होगा कि अगर वे अभी भी न संभले तो फिर बहुत देर हो चुकी जाएगी। 

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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‘पीएम के इस अभियान से न केवल अरबों की होगी बचत, लोगों को भी मिलेगा रोजगार’

बोफोर्स तोप, राफेल लड़ाकू विमान, एस-400 मिसाइल, एचडीडब्ल्यू पनडुब्बी और परमाणु अस्त्र से शक्ति संपन्न होने पर भी क्या हम युद्ध चाहते हैं

Last Modified:
Monday, 03 August, 2020
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आलोक मेहता, वरिष्ठ पत्रकार ।।

बोफोर्स तोप, राफेल लड़ाकू विमान, एस-400 मिसाइल, एचडीडब्ल्यू पनडुब्बी और परमाणु अस्त्र से शक्ति संपन्न होने पर भी क्या हम युद्ध चाहते हैं? पूर्व राष्ट्रपति एवं दूरदर्शी डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम ने बहुत पहले समझा दिया था कि हमारी यह शक्ति बाहरी आक्रमण को रोकने और युद्ध न करने की परिचायक है। इसलिए राफेल लड़ाकू विमानों से भारत की सैन्य शक्ति नई ऊंचाइयों पर पहुंचने के साथ यह शोर मचाना ठीक नहीं होगा कि बस अब चीन को निपटा देना है, तिब्बत भी उसके हाथ से निकलने वाला है, आदि आदि।

कहने और लिखने को 'वॉर गेम' हो सकता है, लेकिन व्यवहार में यह खेल नहीं है। भारत के गौरवशाली इतिहास और संस्कृति में 'ब्रह्मास्त्र' और 'सुदर्शन चक्र' का उल्लेख ईश्वर के अवतार श्रीराम तथा श्रीकृष्ण के काल से होता रहा, पर उन्होंने भी संपूर्ण विश्व को नष्ट कर सकने वाले अस्त्रों के उपयोग को अंतिम समय तक रोके रखा।

इसमें शक नहीं कि भारत के सामने हर तरह की चुनौतियां हैं-सीमित सैन्य टकराव से लेकर परमाणु प्रक्षेपास्त्रों के कवच के साथ परंपरागत युद्ध तक की। जम्मू कश्मीर में वर्षों से पाकिस्तान के छद्म युद्ध का सामना हम करते रहे हैं। अब वह हमसे सीधे युद्ध कर सकने लायक नहीं रह गया है और केवल चीन के कंधे पर बैठे उछल-कूद कर रहा है। बड़ी चुनौती चीन है। चीन के साथ हमारी सीमा काराकोरम, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड से लेकर सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश तक करीब 4,056 किलोमीटर क्षेत्र में फैली हुई है।

दूसरी तरफ हिंद महासागर में भी चीन अब सैन्य लहरों पर आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है। पहले कश्मीर में पाकिस्तान को सबक सिखाने के बाद लद्दाख में भारतीय सेना ने चीन की घुसपैठ को कड़ाई से नाकाम कर दिया। फिर भी कई अति उत्साही और हथियारों की सौदागरी से लाभ उठाने वाले कुछ लोग यह कहने लगे कि  'अपनी तरफ से आगे बढ़कर चीन द्वारा 1962 में हथियाई जमीन वापस ले ली जाए। अब भारत पहले की तरह कमजोर नहीं, फिर परमाणु हथियार किस दिन के लिए बनाए गए?'

यह बड़बोलापन कितना व्यावहारिक कहा जा सकता है? भारत की वायुसेना के पास परमाणु शक्ति संपन्न विमान, मिसाइल्स और नौसेना के पास भी परमाणु शक्ति से लैस पनडुब्बी और जहाज हैं। फिर भी पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल जेजे सिंह ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यह क्षमता युद्ध लड़ने के लिए नहीं, बल्कि भय दिखाने या निवारण के लिए होती है। कभी दुश्मन स्वयं ऐसी नौबत ला दे, तो जवाबी कार्रवाई करने में हम असमर्थ न हों, इसलिए तैयारी रखनी होती है।

असल में चीन हमेशा यह दलील देता रहा है कि दोनों देशों के बीच औपचारिक रूप से सीमा रेखा कभी खींची ही नहीं गई। जबकि भारत यह समझाता रहा है कि भारत-चीन सीमा परंपरागत एवं रीतिबद्ध सीमा रेखा संधि तथा समझौते (ब्रिटिश भारत और तिब्बत के बीच 1914 से लागू) से तय मानी जाए। चीन इन संधियों से मुंह चुराता रहा और उसके माओवादी विस्तारवाद का इरादा कभी खत्म नहीं हुआ है। हमारी सेना को युद्ध के अधिक अनुभव हैं और कई मोर्चे पर वह चीनी सेना पर भारी पड़ेगी।

लेकिन भारतीय सैन्य शक्ति के नेतृत्वकर्ता भी यह मानते हैं कि पिछले वर्षों के दौरान चीन ने अपनी सामरिक परमाणु शक्ति के आधुनिकीकरण के साथ दूर तक मार करने वाली मिसाइलें विकसित की हैं। संख्या की दृष्टि से उसके पास अधिक परमाणु हथियार हैं और वह अंतरराष्ट्रीय नियम-कानूनों की भी अधिक परवाह नहीं करता। पाकिस्तान ने तो उसे कब्जाए कश्मीर का कुछ हिस्सा भी सौंप रखा है। भारत से लगी तिब्बत की सीमा में ही उसने परमाणु हथियारों का अड्डा भी बनाया है।

इसलिए भारत द्वारा पिछले अगस्त में कश्मीर-लद्दाख में सत्ता के विकेंद्रीकरण तथा पाक अधिकृत कश्मीर को मुक्त करवाने के संकल्प से चीन बेचैन हो गया है। बहरहाल भारत ने दृढ़ शक्ति दिखाते हुए संयम के साथ  नियंत्रण रेखा पर वार्ता जारी रखी है। विश्व समुदाय भारत की इस नीति और आतंकवाद और विस्तारवाद के विरुद्ध संघर्ष का समर्थन भी कर रहा है।

समस्या अपने घर की है। लोकतंत्र का फायदा उठाकर राजनीतिक अथवा हथियारों की दलाली से फायदा उठाने वाले तत्व, नेता, अधिकारी, संगठन सामान्य जनता के बीच भ्रम, अफवाहें फैला रहे हैं। यह पहला अवसर नहीं है। हथियार, लड़ाकू विमान, पनडुब्बी, विमान वाहक पोत खरीद के अवसरों पर अमेरिका, यूरोप, रूस, चीन जैसे देशों और हथियार बनाने वाली कंपनियों की प्रतियोगिता में लाभ का कुछ टुकड़ा पाने के इच्छुक सक्रिय हो जाते हैं। युद्धोन्माद से जल्दबाजी में खरीद का दबाव भी बनाते हैं।

हाल में लद्दाख में हुए सैन्य टकराव के दौरान भी आपात खरीद के नाम पर दबाव बनाकर सामान मंगवाने की कोशिश हुई है। संतोष की बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सुरक्षा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का नया अभियान शुरू कर दिया है। विभिन्न राज्यों में बड़े पैमाने पर सेना के लिए उपयोगी आवश्यक सामान, हथियार, विमान, हेलीकाप्टर बनाने के लिए देशी-विदेशी पूंजी लगाने की व्यवस्था भी कर दी है। इससे न केवल अरबों रुपयों की बचत होगी, लोगों को रोजगार मिलेगा और भारत की सैन्य सामग्री कई विकासशील देशों को निर्यात करने का लाभ भी होगा।

यह भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीन के हथियार बेचने के धंधे को एक हद तक कमजोर करेगा। भारत को स्वयं हथियारों के युद्ध के बजाय अपनी सामरिक रणनीति तथा आर्थिक शक्ति के बल पर दुश्मनों को पराजित करना है। श्रीकृष्ण से लेकर महात्मा गांधी तक के आदर्शों से विश्व में विजय पताका फहरानी है।

(साभार: अमर उजाला)

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वरिष्ठ पत्रकार डॉ. वैदिक बोले- किसी गुट में क्यों शामिल हो भारत

अमेरिका ने चीन के विरुद्ध अब बाकायदा शीतयुद्ध की घोषणा कर दी है। ह्यूस्टन के चीनी वाणिज्य दूतावास को बंद कर दिया है

Last Modified:
Thursday, 30 July, 2020
Dr. Ved Pratap Vaidik

डॉ. वेद प्रताप वैदिक, वरिष्ठ पत्रकार ।।

अमेरिका ने चीन के विरुद्ध अब बाकायदा शीतयुद्ध की घोषणा कर दी है। ह्यूस्टन के चीनी वाणिज्य दूतावास को बंद कर दिया है। चीन ने चेंगदू के अमेरिकी दूतावास का बंद करके ईंट का जवाब पत्थर से दिया है। अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोंपिओ चीन पर लगातार हमले कर रहे हैं। उन्होंने अपने ताजा बयान में दुनिया के सभी लोकतांत्रिक देशों से आग्रह किया है कि वे चीन के विरुद्ध एकजुट हो जाएं। भारत से उनको सबसे ज्यादा आशा है, क्योंकि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है और गालवान घाटी के हत्याकांड ने भारत को बहुत परेशान कर रखा है।

नेहरु और इंदिरा गांधी के जमाने में यह माना जाता था कि एशिया, अफ्रीका और लातीनी अमेरिका के देशों याने तीसरी दुनिया के देशों का नेता भारत है। उन दिनों भारत न तो अमेरिकी गठबंधन में शामिल हुआ और न ही सोवियत गठबंधन में। वह गठबंधन-निरपेक्ष या गुट-निरपेक्ष ही रहा।

अब भी भारत किसी गुट में क्यों शामिल हो? यों भी ट्रंप ने नाटो को इतना कमजोर कर दिया है कि अब अंतरराष्ट्रीय राजनीति में पहले की तरह कोई गुट-वुट सक्रिय नहीं हैं, लेकिन अमेरिका और चीन के बीच इतनी ठन गई है कि अब ट्रंप प्रशासन चीन के खिलाफ मोर्चाबंदी करना चाहता है। उसने ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, जापान और आग्नेय एशिया के कुछ राष्ट्रों को तो चीन के विरुद्ध भड़का ही दिया है, वह चाहता है कि भारत भी उसका झंडा उठा ले।

भारत को पटाने के लिए ट्रंप प्रशासन इस वक्त किसी भी हद तक जा सकता है। वह भारतीयों के लिए वीजा की समस्या सुलझा सकता है, भारतीय छात्रों पर लगाए गए वीजा प्रतिबंध उसने वापस कर लिये हैं, वह भारत को व्यापारिक रियायतें देने की भी मुद्रा धारण किए हुए है, अमेरिका के अधुनातन शस्त्रास्त्र भी वह भारत को देना चाह रहा है, गालवान-कांड में अमेरिका ने चीन के विरुद्ध और भारत के समर्थन में जैसा दो-टूक रवैया अपनाया है, किसी देश ने नहीं अपनाया, वह नवंबर में होनेवाले राष्ट्रपति के चुनाव में 30-40 लाख भारतीयों के थोक वोटों पर भी लार टपकाए हुए है। अमेरिका के विदेश मंत्री, रक्षामंत्री, व्यापार मंत्री और अन्य अफसर अपने भारतीस समकक्षों से लगातार संवाद कर रहे हैं। भारत भी पूरे मनोयोग से इस संवाद में जुटा हुआ है। भारत की नीति बहुत व्यावहारिक है। उसने स्पष्ट कर दिया है कि वह किसी भी गठबंधन में शामिल होने के विरुद्ध है। लेकिन चीन के सामने खम ठोकने में यदि हमें अमेरिका की मदद मिलती है तो उसे भारत सहर्ष स्वीकार क्यों न करे? भारत को चीन के सामने शीत या उष्णयुद्ध की मुद्रा अपनाने की बजाय एक सशक्त प्रतिद्वंदी के रुप में सामने आना चाहिए। उसने चीन के व्यापारिक और आर्थिक अतिक्रमण के साथ-साथ उसके जमीनी अतिक्रमण के विरुद्ध अभियान शुरु कर दिया है।

(साभार: www.drvaidik.in)

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'मेरी अर्जी पर ‘बाऊजी’ ने जो लिखा, वह आज के मंत्रियों के लिए भी आदर्श है'

‘अरे भाई इनके लिए चाट लेकर आओ।‘ पिछली बार जब मैं लखनऊ गया तो उनके पुराने घर में बाऊजी ने ये कहकर अपने और मेरे लिए चाट मंगवाई थी।

Last Modified:
Wednesday, 22 July, 2020
Lalji Tandon

‘अरे भाई इनके लिए चाट लेकर आओ।‘ पिछली बार जब मैं लखनऊ गया तो उनके पुराने घर में बाऊजी ने ये कहकर अपने और मेरे लिए चाट मंगवाई थी। राजनीतिक किस्सों के पुलिंदों के साथ लखनऊ की चाट की विशेषताओं पर भी खूब बात हुई थी। बाऊजी के साथ मेरा नजदीकी संपर्क उनके बेटे और हमारे मित्र 'गोपालजी' टंडन के कारण हुआ।

आशुतोष टंडन यानी गोपाल जी भी अपने पिताजी की तरह अजातशत्रु और हरदिल अजीज हैं। ये वाकया बाऊजी के राज्यपाल और गोपाल जी के मंत्री बनने से पहले का है। उस दिन जब लखनऊ गया था तो गोपाल जी के साथ बाऊजी से भी मिलने गया था। जितनी स्वादिष्ट वो चाट थी, उससे कहीं सहज और आत्मीय बाऊजी का व्यवहार था ।

उन्हें याद भी नहीं था कि कभी उन्होंने मेरी मदद की थी। बाऊजी को उनकी दरियादिली और प्रशासनिक पकड़ का वो किस्सा भी मैंने उस दिन सुनाया था। हुआ यों था कि कोई पच्चीस साल पहले मुझे कौशाम्बी, गाजियाबाद में एक फ्लैट अथॉरिटी द्वारा अलॉट किया गया था। कहीं से कर्जा लेकर किसी तरह पैसे दिए गए तो अफसर उसका कब्जा ही नहीं दे रहे थे। लालजी टंडन उन दिनों उत्तर प्रदेश सरकार में पीडब्ल्यूडी विभाग के मंत्री थे।

लखनऊ के अपने पत्रकार मित्र दीपक गिडवानी की मार्फत मैंने अपनी व्यथा एक अर्जी में लिखकर लालजी टंडन को भेजी थी। जो उस अर्जी पर बाऊजी ने अपनी राइटिंग में लिखा, वह आज के मंत्रियों के लिए भी आदर्श है। उन्होंने लिखा था 'फ्लैट ठीक करवाकर इन्हें तुरंत कब्जा दिया जाए और इस काम में जो देरी हो  उसका हर्जाना सम्बंधित अधिकारी की तनख्वाह से वसूला जाए'।  एक ये आदेश ही बाऊजी की प्रशासनिक क्षमता और संवेदनशीलता का वर्णन करने के लिए पर्याप्त है।

उस दिन जब उन्हें ये बात मैंने बताई थी तो उन्होंने मुस्कुराकर सिर्फ यही कहा था-'काम हो गया था कि नहीं?' और उसके बाद चाट का एक दौना मेरे लिए और मंगवाया गया था। पत्रकारिता के अपने तीस साल के जीवन में बाऊजी जैसा दरियादिल, संवेदनशील, आत्मीय, सहज और निश्छल भाव रखने वाला राजनेता मुझे तो कम से कम नहीं मिला। उनके जाने पर उनके परिवार के साथ साथ अनेक लोगों की आंख में आंसू हैं। कोरोना के कारण बाऊजी की अंतिम यात्रा में शामिल न होने के अफसोस के कारण इन आंसुंओं का बोझ और बढ़ गया है। श्रद्धांजलि बाऊजी !

(वरिष्ठ पत्रकार उमेश उपाध्याय की फेसबुक वॉल से साभार)

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'सरकारें चाहतीं तो दूरदर्शन को 'वॉइस ऑफ अमेरिका' की तरह बना दिया जाता, लेकिन...'

बहुत पुरानी कहावत है- 'दुल्हन बड़ी प्यारी, लेकिन चौके में मत आना'। इन दिनों समाज, राजनीतिक-आर्थिक मंचों और मीडिया में इसी तरह के तर्क गंभीरता से उठ रहे हैं।

Last Modified:
Tuesday, 21 July, 2020
Alok Mehta

आलोक मेहता, वरिष्ठ पत्रकार।। 

बहुत पुरानी कहावत है- 'दुल्हन बड़ी प्यारी, लेकिन चौके में मत आना'। इन दिनों समाज, राजनीतिक-आर्थिक मंचों और मीडिया में इसी तरह के तर्क गंभीरता से उठ रहे हैं। इसे स्वतंत्रता, लोकतंत्र, अभिव्यक्ति के अधिकारों और स्वायत्तता पर सरकार के हस्तक्षेप के मुद्दे की तरह उठाया जा रहा है। मतलब यह कि अधिकतम पूंजी, वार्षिक बजट और हर संभव मदद सरकार के खजाने से मिले, लेकिन खर्च, प्रशासनिक अधिकार, संस्थान की गतिविधियों पर सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं हो। जब मूलभूत प्रावधान ही स्वायत्तता का है, तो कोई शक नहीं कि उसके दैनंदिन कामकाज में सरकार को पूरी छूट देनी चाहिए।

पेंच यह है कि जब सरकार की नीतियां और किसी संस्थान की मनमानी से संपूर्ण व्यवस्था ही प्रभावित होने लगे और संसद-विधान सभा में जवाबदेही की जिम्मेदारी हो तो क्या किया जाए? सरकारी खजाना किसी पार्टी या सत्ता में बैठे नेताओं का निजी नहीं होता, क्योंकि वह हमारे-आपके जैसे सामान्य करदाताओं द्वारा दी गई राशि से भरता है। मतलब, जनता के धन को किसी के मनमाने दुरुपयोग की छूट नहीं दी जानी चाहिए।

इन दिनों प्रसार भारती और समाचार एजेंसी प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया के बीच सेवा शर्तों एवं भारी धनराशि के लेनदेन पर विवाद चर्चा में है। दोनों की स्वायत्तता और स्वतंत्रता को लेकर केंद्र सरकार को भी कठघरे में खड़ा किया जा रहा है। इसमें कोई शक नहीं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कभी आंच नहीं आनी चाहिए, लेकिन उसकी कोई लक्ष्मण रेखा है या नहीं? प्रसार भारती को भारत सरकार के खजाने से ही पूरा बजट मिलता है। शीर्ष संवैधानिक पदों पर सरकार ही नहीं, उप राष्ट्रपति और राष्ट्रपति तक की स्वीकृति ली जाती है। आकाशवाणी और दूरदर्शन के प्रसारण को लेकर संसद में सवालों के उत्तर सूचना प्रसारण मंत्री को देने पड़ते हैं। प्रसार भारती की स्थापना देश में कोई निजी टीवी चैनल नहीं होने और प्रसारण सेवा को पूरी तरह सरकारी व्यवस्था से अलग रखने के उद्देश्य से स्वायत्त संस्था के रूप में की गई थी। अब सैकड़ों विकल्प आने के बाद यदि सरकारें चाहतीं तो आकाशवाणी-दूरदर्शन को वॉइस ऑफ अमेरिका की तरह सरकारी बना दिया जाता, लेकिन उदार दृष्टिकोण अपनाकर थोड़ा पर्दा रखकर सरकार अपने ढंग से इसका उपयोग करती रही हैं।

इसी तरह प्रेस ट्रस्ट के लिए प्रसार भारती एक ग्राहक है और सर्वाधिक कमाई (लगभग आठ-नौ करोड़ रुपए सालाना) देने वाला संस्थान। भारत-चीन सीमा पर हाल में हुए सैन्य टकराव के समय एजेंसी की कुछ खबरों को लेकर भारत की किरकिरी होने से सरकार और प्रसार भारती को कष्ट होना स्वाभाविक था। संभव है पहले भी ऐसी कुछ खबरें रही हों या समाचार एजेंसी समुचित सेवा नहीं दे पा रही हो। इसलिए राष्ट्रहित के प्रतिकूल समाचार देने पर आपत्ति के साथ प्रसार भारती ने केवल चेतावनी दी कि इस तरह के रवैये पर एजेंसी की सेवाएं बंद करने पर विचार किया जा सकता है।

मात्र चेतावनी को समाचार एजेंसी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का विवादस्पद मुद्दा बना दिया गया। सरकार न भी हो, क्या कोई भी गैर सरकारी व्यावसायिक संस्थान अपने व्यापक हितों पर कुठाराघात करने वाले समाचार प्रसारित करने वाली किसी एजेंसी को करोड़ों रुपया देना उचित समझेगा। फिर यहां तो चीन के भारत विरोधी दुष्प्रचार में भागीदारी का गंभीर मामला था। तर्क दिया गया कि पत्रकारिता में दोनों पक्ष रखे जाते हैं, लेकिन देश की जनता के धन से दूसरे पक्ष के नाम पर झूठी बातें दुनिया में फैलाने की छूट कैसे दी जा सकती है?

प्रेस ट्रस्ट की स्थापना ही विदेशी समाचार एजेंसियों के अपने पूर्वाग्रहों और स्वार्थों से बचाकर भारत के हितों की रक्षा करने वाली गैर सरकारी लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से सरकार के अधिकाधिक सहयोग तथा सेवा लेने के लिए भी अधिक  धनराशि देकर की गई थी।राज्य सरकारें भी संचार सेवा लेकर मोटा भुगतान करती हैं। एजेंसी के प्रबंधन में भारत के समाचार पत्र समूहों के मालिक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी की प्रमुख भूमिका है। इसे उनके सहकारी संगठन की तरह माना जाता है। मजेदार बात यह है कि हाल के वर्षों में कई मीडिया संस्थान एजेंसी की सेवा तक लेना बंद करने लगे हैं। सेवा के बदले दिए जाने वाले भुगतान में भी भाव ताव चलता रहता है।फिर स्वतंत्र सहकारी संस्थान होते हुए सरकारी जमीन पर इमारत से अच्छी कमाई के बावजूद लीज की शर्तों पर वर्षों का बकाया मांगने को जुल्म, हस्तक्षेप कहकर अभिव्यक्ति का मुद्दा उठाना क्या उचित है?

मैंने स्वयं लगभग पांच वर्षों ( 1971 से 1975) तक हिंदी और भारतीय भाषाओं की समाचार एजेंसी में काम किया है। इसलिए यह जनता हूं कि अधिकृत समाचारों के लिए सरकारी स्रोतों पर निर्भर रहना होता है। यही नहीं उस एजेंसी का प्रबंधन कांग्रेस सरकार और पार्टी से विपरीत विचार रखने वाले लोगों और संपादकों के हाथ में था, तब भी अखबारों से अधिक केंद्र या राज्य सरकारों से मिलने वाले धन से खर्च चलता था। तब यह देखकर कुछ आश्चर्य सा होता था कि प्रेस ट्रस्ट के संवाददाता बनने के लिए स्टेनोग्राफर होना योग्यता की सबसे प्रमुख शर्त मानी जाती थी। इसलिए दक्षिण या पूर्वी भारत के लोग अधिक नियुक्त हो जाते थे। उत्तर भारतियों की संख्या कम होती थी। भारत सरकार के साउथ या नार्थ ब्लॉक के महत्वपूर्ण मंत्रालयों में बैठे या मंत्री एजेंसी के वरिष्ठ संवाददाता या संपादक को बुलाकर डिक्टेशन की तरह खबर लिखवा देते थे।

कुछ प्रादेशिक राजधानियों में तो मैंने देखा था कि शीर्ष नेता या अधिकारी एजेंसी और अखबार के प्रतिनिधियों को डेटलाइन सहित खबर लिखवा देते थे। शायद इसी सरकारी प्रभाव को काम करने के लिए कुलदीप नायर जैसे अनुभवी वरिष्ठ संपादक के नेतृत्व में यूनाइटेड न्यूज एजेंसी शुरू की गई। कई वर्षों तक इसने प्रेस ट्रस्ट का एक हद तक मुकाबला भी किया। लेकिन केंद्र या राज्य सरकारों से उसे उतना आर्थिक सहयोग अथवा प्रश्रय नहीं मिला। इसलिए हाल के वर्षों में उसकी आर्थिक दशा खराब है।

जहां तक स्वतंत्रता की बात है, चीन या रूस की ही नहीं पश्चिमी देशों की प्रमुख समाचार एजेंसियों में विश्व युद्ध के दौर से अब तक अंतरराष्ट्रीय समाचारों विचारों के लिए अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन जैसे देशों के व्यापक हितों को सर्वाधिक प्राथमिकता मिलती है। इस तथ्य के भी प्रमाण रहे है कि इन विदेशी समाचार एजेंसियों में उन देशों के चुनिंदा गुप्तचर भी संवाददाता बनाकर भेजे जाते रहे हैं। मतलब यह कि सारी स्वतंत्रता के बावजूद हर देश के अपने हित सर्वोपरि होते हैं। तो क्या भारत अपने राष्ट्रीय सुरक्षा हितों और सही मायने में संवैधानिक स्वतंत्रता को ताक पर रखकर विदेशी दुष्प्रचार के लिए अपने ही संसाधन सौंप दे? यह मुद्दा केवल प्रसार भारती, सरकार और एक एजेंसी के लिए नहीं, सरकारी खजाने पर निर्भर अन्य स्वायत्त संस्थानों पर भी लागू होता है।

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भाषा के इस ‘फेर’ में ही आगे नहीं बढ़ पा रहा देश: पूरन डावर

जब तक हम यह सोचेंगे और जब तक हमें अच्छी अंग्रेजी ही प्रभावित करेगी...धारणा होगी कि अंग्रेजी बोलने वाला ही पढ़ा-लिखा होता है, तब तक हमें अंग्रेज़ी और विदेशी वस्तुएं ही अच्छी लगेंगी।

पूरन डावर by
Published - Sunday, 19 July, 2020
Last Modified:
Sunday, 19 July, 2020
Puran Dawar

पूरन डावर, चिंतक एवं विश्लेषक।।

जब तक हम यह सोचेंगे और जब तक हमें अच्छी अंग्रेजी ही प्रभावित करेगी...धारणा होगी कि अंग्रेजी बोलने वाला ही पढ़ा-लिखा होता है, तब तक हमें अंग्रेज़ी और विदेशी वस्तुएं ही अच्छी लगेंगी। जब तक हम अंग्रेजी भाषा में विश्वास करते रहेंगे, तब तक हमारा मोह अंग्रेजी और विदेशी उत्पादों में ही होगा और हम आत्मनिर्भर नहीं हो सकते।

हम अंग्रेजी भाषा का विरोध नहीं करते न उसके ज्ञान से परहेज, लेकिन अंग्रेजी भाषा से विकसित कतई नहीं हो सकते। हम हिंदी बोलते हैं, हिंदी में सोचते हैं, हिंदी समझते हैं, लेकिन  व्यावसायिक सम्मेलन हों, सरकारी काम हों, बैंकिंग हो, सारे काम अंग्रेजी में। यह कुछ लोगों को समझ आती है, कुछ को आधी-अधूरी और कुछ को कतई नहीं। विशेषज्ञ विषय से अधिक प्रभावित करने वाले, पढ़ा-लिखा प्रतिष्ठित करने वाले शब्दों के चयन में अधिक समय लगाते हैं। जो लोग उतनी अच्छी अंग्रेजी नहीं बोल पाते, उनके पास अच्छे सुझाव, अच्छे विचार होते हुए भी संकोच कर जाते हैं और विचार आ ही नहीं पाते। यही कारण है कि देश आगे नहीं बढ़ पा रहा। देश के विकास को रोकने में अंग्रेजी भी एक बड़ा कारण है, जो विरासत में ग़ुलामी से मिली और आज भी गुलाम रखे हुए है। विदेशी वस्तुओं पर निर्भरता उनके मोह में बनी हुई है।

वैसे तो विज्ञान के ज्ञान की भारत के ग्रंथों और वेदों में कोई कमी नहीं है। यदि जरूरत है तो आज हिंदी अनुवाद कोई मुश्किल नहीं है। विकसित देश जो आज इस मुकाम पर पहुंचे हैं। जैसे-फ्रांस, जर्मनी, जापान, चीन, क्या किसी देश में अंग्रेजी भारत से अच्छी बोली जाती है? कतई नहीं। भारत का आम पढ़ा-लिखा आदमी इन देशों से कहीं अच्छी अंग्रेजी बोलता है। यदि अंग्रेजी ही पैमाना होता तो हम पीछे क्यों। कारण यही है कि अंग्रेजी हमें पीछे धकेल रही है।

भारत तभी आत्मनिर्भर हो सकता है, लोकल पर वोकल हो सकता है, जब हम आसान भाषा में खुलकर बात करें। भाषा संयमित हो, लेकिन क्लिष्ट नहीं। जब हम विदेशी भाषा को बेहतर और मार्गदर्शक मानते रहेंगे, तब तक विदेशी उत्पाद ही हावी रहेंगे।

आइए, हिंदी में आसान भाषा में संवाद और खुलकर मंथन करें, देश भागने लगेगा। अंग्रेज़ी सहित जितनी भाषाओं का ज्ञान हो अच्छी बात है, लेकिन प्रयोग जरूरत पड़ने पर ही। मातृभाषा ही देश को आगे ले जा सकती है, अंग्रेजी झाड़ने के दिन स्वतंत्रता के साथ अंग्रेजों के साथ ही जाने चाहिए थे।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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इस सच को चैनलों के संपादक-प्रबंधक भुला देंगे तो वक्त के गर्त में समा जाएंगे मिस्टर मीडिया!

अभी तक खबरिया चैनल अपने दर्शकों से दुश्मनी निकाल रहे थे। अब उन्हें एक नया विरोधी मिल गया है।

राजेश बादल by
Published - Saturday, 18 July, 2020
Last Modified:
Saturday, 18 July, 2020
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

अभी तक खबरिया चैनल अपने दर्शकों से दुश्मनी निकाल रहे थे। अब उन्हें एक नया विरोधी मिल गया है। वे बार्क से रार ठान बैठे हैं। कुछ समय पूर्व लॉन्च हुए एक चैनल की टीआरपी में जबर्दस्त उछाल के कारण नेशनल ब्रॉडकास्टिंग एसोसिएशन और नेशनल ब्रॉडकास्टिंग फेडरेशन ने यह मामला उठाया है। उन्हें लगता है कि बार्क ने कुछ गोलमाल किया है, अन्यथा एक नया नवेला चैनल इतने कम समय में साप्ताहिक प्रावीण्य सूची में दूसरे स्थान पर कैसे आ सकता है? लंबे समय तक नंबर वन की कुर्सी पर रहा चैनल तो कैलाश पर्वत की शिखर ऊंचाई पर जैसे खूंटा गाड़े बैठा है। उससे तो शिक़ायत क्या होगी, मगर दूसरे स्थान के लिए हर हफ्ते मारामारी देखने लायक है।

विडंबना है कि टीवी न्यूज चैनल इंडस्ट्री यह धारणा पाल कर बैठी है कि जब वह डीटीएच ऑपरेटर्स को उचित स्थान के लिए उनकी दरों के मुताबिक़ चढ़ावा देती है और बचे-खुचे केबल ऑपरेटर्स भी उनके चैनलों को पसंदीदा जगह मुहैया कराते हैं तो उसमें कोई नया खिलाड़ी कैसे दाख़िल हो सकता है। ये चैनल कांग्रेस पार्टी की तरह अपना घर ठीक ही नहीं करना चाहते। उनका कंटेंट कितना कमज़ोर है, भाषा अशुद्ध है, एंकर परदे को युद्ध भूमि समझते हैं, अभद्रता और अश्लीलता सारी सीमाएँ लांघ रही है तो दर्शक से बड़ा न्यायाधीश कौन हो सकता है? अंततः कंटेंट इज द किंग। इस सच को अगर चैनलों के संपादक और प्रबंधक भुला देंगे तो वक्त के गर्त में समा जाएंगे।

कम खर्च में चैनल चलाना इन दिनों अक्लमंदी मानी जाती है। कंटेंट और टैलेंट पर बिना पैसा खर्च किए चैनल वीकली वरीयता सूची में अव्वल आना चाहते हैं तो माफ कीजिए, उनका यह सपना कभी पूरा नहीं होगा। एक जमाने में समाचार आधारित आधा घंटे की विशेष रिपोर्ट बनाने के लिए पांच-दस लाख रुपये तो मैंने खुद खर्च किए हैं। आज तो ये खबरिया चैनल स्ट्रिंगर की एफटीपी पर करीब करीब मुफ्त की फीड पर आधा घंटे का शो बना देते हैं। यकीन मानिए जितना शोषण इस इंडस्ट्री में स्ट्रिंगर्स का हो रहा है, उतना देश में किसी अन्य उद्योग में नहीं होता। इसलिए स्ट्रिंगर्स अपना पेट पालने के लिए कुछ और जुगाड़ करना चाहते हैं।

इसलिए कंटेंट और योग्य पेशेवरों पर पैसा बहाइए। आपको टीआरपी मिलेगी। हर नया चैनल शिखर पर पहुंचने के लिए अपनी संपादकीय सामग्री को गुणवत्ता के मान से बेहतर बनाना चाहता है। जो भी ऐसा करेगा, वह शिखर पर जाएगा। दो-तीन महीने तक वेतन नहीं देकर या टुकड़ों-टुकड़ों में वेतन देकर अथवा वेतन में कटौती करके आप प्रतिभा नहीं ख़रीद सकते। पत्रकारों की देह दफ्तर में काम कर सकती है, दिल और दिमाग़ नहीं। वह तो परिवार का पेट पालने के लिए फिक्रमंद होता है। इसलिए बार्क लंबे समय से देश के नंबर वन कहे जाने वाले चैनल का ठीक ही उदाहरण देता है कि चैनल शुरू होते ही उसने गुजरात का भूकंप और प्रयाग में कुंभ का बेमिसाल कवरेज किया था और उन दिनों करोड़ों रुपये खर्च किए थे।

मैं याद कर सकता हूं कि पंद्रह बरस पूर्व हिन्दुस्तान का पहला टीवी ट्रेवलॉग मैंने अरुणाचल प्रदेश से रामेश्वरम तक किया था। उस समय चैनल ने कोई पौन करोड़ रुपये उस पर व्यय किए थे। यूं ही कोई सत्यनारायण की कथा कराकर चैनल नंबर वन नहीं बनता। लव्वोलुआब यह है कि जितना चीनी डालेंगे, शरबत उतना ही मीठा होगा। टीआरपी में शिखर पर आना है तो शिखर का स्तर भी बनाइए मिस्टर मीडिया!

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

टीवी संस्कृति में चैनल ऐसा अध्याय लिख रहे हैं, जिसे कोई भी नहीं पढ़ेगा मिस्टर मीडिया!  

‘जहां काम करना पत्रकार का सपना होता था, उसे राष्ट्रद्रोही कहा जा रहा है मिस्टर मीडिया’

मिस्टर मीडिया: धुरंधर संपादक परदे के पीछे के समीकरण क्यों नहीं समझते?

सियासत ने हमें आपस में लड़ने के लिए चाकू-छुरे दे ही दिए हैं मिस्टर मीडिया!

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'सेना का मनोबल गिराने में राजनेता-मीडिया मोहरे बनने लगें, तो राष्ट्र को ही क्षति पहुंचेगी'

मार्ग्रेट थैचर हों या जॉन मेजर या वर्तमान प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन या अमेरिकी राष्ट्रपति, सुरक्षा के मामलों में हमेशा गोपनीयता रखते हैं।

Last Modified:
Thursday, 09 July, 2020
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आलोक मेहता, वरिष्ठ पत्रकार ।।

ब्रिटेन की पत्रकारिता के स्वर्णिम युग में प्रतिष्ठित अखबार ‘द टेलीग्राफ’ के प्रधान संपादक मैक्स हेस्टिंग्स ने अपने पत्रकारीय जीवन पर लिखी पुस्तक ‘एडिटर- एन इनसाइड स्टोरी ऑफ न्यूजपेपर’ में 1991 के खाड़ी युद्ध में ब्रिटेन की भूमिका के सन्दर्भ में लिखा है कि ‘तनाव के दौर में एक मित्र मंत्री ने फोन करके पूछा, युद्ध में असली स्थिति क्या है? क्योंकि केवल रक्षा मामलों के मंत्रियों को ही पूरी जानकारी होती है और वे भी हमें कुछ अधिक नहीं बताते। कई बातें अखबार से भी पता चलती हैं। हर मंत्री को उसके सम्बंधित विभाग तक की जानकारी रहती है। यह तो युद्ध काल था, लेकिन सामान्य रूप से भी डाउनिंग स्ट्रीट (प्रधानमंत्री कार्यालय) उन्हें उतनी जानकारियां ही देता है, जितना उसे अपने अनुकूल लगता है। मंत्रियों को सबसे अधिक यह बात खलती है कि उन्हें स्वास्थ्य, शिक्षा, परिवहन की जिम्मेदारियों कामकाज तक सीमित रखा जाता है और युद्ध में ब्रिटेन की हार जीत की स्थितियों की जानकारी तभी मिलती है जब प्रधानमंत्री उपयुक्त समझते हैं।’

मार्ग्रेट थैचर हों या जॉन मेजर या वर्तमान प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन या अमेरिकी राष्ट्रपति, सुरक्षा के मामलों में हमेशा गोपनीयता रखते हैं। इसीलिए बीबीसी तक कई संवेदन मामलों पर बहुत संभलकर खबरें देता है। इसलिए पश्चिमी देशों में पढ़े लिखे या अन्य देशों की समझ रखने वाले नेता जब भारत में लद्दाख, कश्मीर में सैन्य कार्रवाई, पाकिस्तान, चीन, अमेरिका, रूस, फ्रांस जैसे देशों से दोस्ती दुश्मनी की हर बात को उनसे साझा करने या सारे प्रमाण दिखने की मांग करते हैं, तो दुखद आश्चर्य होता है। हम चीन, रूस या अन्य किसी देश के एक दलीय शासन से तो तुलना भी नहीं करना चाहते। हाल में लद्दाख में चीन की सेना के साथ हुए गंभीर तनाव पर रक्षामंत्री राजनाथ सिंह, सेना के वर्मन तथा पूर्व वरिष्ठतम अधिकारी, विदेश मंत्रालय भी निरंतर आवश्यक जानकारी सार्वजानिक रूप से दे रहे थे। स्वतंत्र मीडिया सेना के सहयोग से भी सही बहुत आगे जाकर सीमा से टीवी न्यूज चैनल पर बोलते दिखाते रहे। फिर भी सत्ता में रही कांग्रेस पार्टी के प्रमुख नेता राहुल गांधी की मंडली स्वयं प्रधानमंत्री से जवाब मांगती रही। उनके सहयोगी दलों के कुछ अपरिपक्व नेता, प्रवक्ता भी जनता को भ्रमित करने की कोशिश करते रहे।

यों पत्रकार के नाते हम स्वयं पारदर्शिता और मीडिया की स्वतंत्रता के कट्टर समर्थक हैं, लेकिन अपने प्रोफेशन में भी एक आचार संहिता अनुशासन के पक्षधर हैं। सरकारी गोपनीयता के ब्रिटिश काल के काले कानून के विरोधी हैं, लेकिन सुरक्षा, सैन्य तैयारी-ठिकानों, सीमा पर युद्ध की स्थिति, टकराव, आतंकवादियों से मुकाबले जैसे नाजुक मामलों पर एक अनुशासित पत्रकारिता को ही उचित मानेगें। रक्षा सौदों के घोटालों पर बहुत कुछ बोला, लिखा, दिखाया गया और जाता रहेगा। लेकिन हथियार, विमान, पनडुब्बी खरीदी और उनकी उपयोगिता पर सेनाधिकारियों पर तो विश्वास करना होगा। फिर यह भी नहीं भुलाया जा सकता है कि चीन और पाकिस्तान ही नहीं अमेरिका, यूरोप भी अपने स्वार्थों के अनुसार भारत की सत्ता व्यवस्था, सूचना तंत्र का उपयोग करने की कोशिश करते हैं। सीमा पर टकराव को अतिरंजित करने में हथियारों के सौदागर और दलाल भी सक्रीय रहते हैं। दुश्मनों के दुष्प्रचार से सेना के मनोबल को गिराने में राजनेता या मीडिया मोहरे बनने लगें तो सम्पूर्ण राष्ट्र को ही क्षति पहुंचेगी।

सबसे हास्यास्पद बात सीमा पर कितने इंच आगे बढ़े या कितने पीछे हटने की लगती है। भावनात्मक भाषण में यह मुहावरा चलता है और सेना भी भारत की सीमा के आधिकारिक नक्शे को सामने रखकर दुर्गम हिमालय की पर्वत श्रृंखला और वायु या समुद्री सीमा की हर कदम की रक्षा के लिए दिन रात रक्षा सेवा में लगी रहती है। पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका, भूटान, बांग्ला देश से लगी सीमा तो द्विपक्षीय स्तर पर लगभग तय है। चीन के साथ सीमा दोनों देशों ने अपने ढंग से तय कर रखी है और वर्षों से कोई एक नक्शा दोनों देश नहीं स्वीकारते। नक्शों को सामने रखकर सेना या विदेश विभागों के नेता अधिकारी नियमित रूप से चर्चा, बहस, विवाद की बैठकें करते रहे हैं। फिर भी सैनिकों की पहरेदारी के दौरान सीधे टकराव को न होने देने के लिए दोनों पक्षों ने अपनी सीमा नियंत्रण रेखा स्वीकारी हुई है और दोनों रेखाओं के बीच एक बफर क्षेत्र को माना हुआ है, जिसे दोनों अपना कह सकते हैं। हां सीमा नियंत्रण रेखा को लांघने की अनुमति कोई नहीं दे सकता है। इस बार भी लद्दाख में चीन द्वारा उसकी सीमा नियंत्रण रेखा से आगे बफर इलाके में घुसपैठ और कुछ ठिकाना सा बनाने की दुष्टता की। इसीलिए हमारे सैनिकों को बिना हथियार के भी बहादुरी के साथ उन्हें वापस धकेलने के लिए जान पर खेलकर काम करना पड़ा। ऐसी स्थिति में भारतीय सीमा ही नहीं लद्दाख में चीनी सेना के घुस जाने और हमारे इलाके पर कब्जा करने के आरोप-झूठी अफवाहें फैलाकर क्या सेना के वीर अधिकारीयों और जवानों का अपमान नहीं किया गया है। आपके परिवार के सदस्य घर के बाहर पहुंचे डाकू, चोर को डंडे से मारपीट करके- कुछ घायल हो जाएं और आप उनसे अस्पताल में कहें कि डाकू तो घर में घुस गए, तो सोचिये परिजन को कितनी तकलीफ होगी।

हमारे नेता, योग्य मीडियाकर्मी और एक्टिविस्ट भाई बहुत ज्ञानी भी हैं, उन्हें इतिहास की पृष्ठभूमि भी पलटते रहना चाहिए। वह भी पुराणी बात नहीं है। मात्र दो सौ साल पहले तक दुनिया में कई देशों के राज साम्राज्य होते थे, उन्हें अपने  सरहदी इलाकों का ज्ञान होता था, लेकिन सीमा रेखाओं की जानकारी नहीं होती। अंतिम छोर पर पहुंचकर हर राज्य का क्षेत्राधिकार धुंधला और अपरिभाषित हो जाता था। ब्रिटिश राज के समय मैकमेहन ने पुराणी सरहदों और रेखाओं का फर्क बताया। उन्होंने लिखा, ‘फ्रंटियर या सरहद का मतलब सीमा या बॉउंड्री से कहीं ज्यादा व्यापक है। फ्रंटियर का मतलब है सीमा पर बसा लम्बा चौड़ा इलाका या बीच के  बफर राज्य, जिन्हें कोई अन्तर्राष्ट्रीय सीमा रेखा परिभाषित नहीं करती। भारत की उत्तर पूर्व और उत्तर पश्चिमी सरहदें ऐसी ही थीं। एक तरफ भारत अफगान सरहद पर आजाद कबाइलियों का अनिश्चित इलाका और दूसरी तरफ तिब्बत तथा चीन की सरहद पर बेस समुदायों का इलाका था।’

मैकमेहन ने ही परिसीमन और सीमांकन की अवधारणाएं भारत को दी। परिसीमन तब होता है, जब संधि हो या अन्य तरीके से सीमा रेखा तय कर दी जाए और उसे शब्दों में लिखकर दर्ज कर दें। सीमांकन तब होगा, जब सीमा को बाकायदा चिन्हित करके सीमा पर खम्भे, तार आदि लगाकर माना जाए। समस्या यह है कि अंग्रेजो के समय से चीन मैकमेहन द्वारा बताई गई हमारी उसकी सीमाओं को स्वीकार नहीं करता और जब भी मौका मिलता है घुसपैठ करने लगता है और भारत के सत्तर वर्षों के शांति प्रयासों के बावजूद हेरा फेरी, सेना धकेल की चालों से बाज नहीं होता। बहरहाल इस बार भी भारत की सरकार और सेना के बेहद आक्रामक रवैये और शक्ति के सामने झुककर 15 जून तक रही अपनी सीमा नियंत्रण रेखा पर लौटने के लिए राजी हो गया। इस बार अमेरिका, यूरोप ही नहीं चीन के करीबी समझे जाने वाले आसियान देशों रूस, वियतनाम, इंडोनेशिया, म्यांमार तक ने उसके बजाय भारतीय पक्ष का साथ दिया। केवल कठपुतली पाकिस्तान ने कब्जा, कश्मीर के हिस्से से भी एक भाग चीन के हवाले कर अपना घिनौना रूप दुनिया को दिखा दिया। असल में पाकिस्तान कब्जा, कश्मीर ही नहीं बलूचिस्तान, सिंध प्रांतों में भड़के असंतोष को नहीं संभाल पा रहा है और अर्थिक दिवाला निकला हुआ है। इसलिए चीन और अमेरिका के सामने गिड़गिड़ाकर तथा भारत की सीमाओं पर आतंकवादी घुसपैठ करके सरकार और सेना के पेट भर रहा है। जरूरत इस बात की है कि राष्ट्र की सुरक्षा के मामलें में भारत का हर वर्ग, दल, संगठन पारदर्शिता और लोकतंत्र की दुहाई देकर दुश्मनों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग नहीं दें। राष्ट सशक्त रहेगा, तभी लोकतंत्र भी सुरक्षित रहेगा।

 

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टीवी संस्कृति में चैनल ऐसा अध्याय लिख रहे हैं, जिसे कोई भी नहीं पढ़ेगा मिस्टर मीडिया!  

अतिरेक किसी भी चीज का अच्छा नहीं होता। यह दौर चीख चीख कर कह रहा है कि अब बस भी करिए। वरना अवाम अब सब कुछ अपने हाथ में ले लेगी।

Last Modified:
Monday, 06 July, 2020
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

हमारे कुछ एंकर और उनके साथ चर्चाओं में शामिल चीख पुकार करने वाले अब हद पार करने लगे हैं। एक पुराने फौजी ने बीते सप्ताह सीधे प्रसारण में चर्चा के दरम्यान खुल्लम खुल्ला गाली बकी। उमर दराज यह अधिकारी यकीनन सत्तर साल से अधिक के हैं और दादा-नाना बन चुके होंगे। उनकी अपने घर की नई पीढ़ी ने इस पुरखे के मुंह से मां-बहन की गाली सुनकर कैसा महसूस किया होगा- सहज ही अंदाज लगाया जा सकता है। यह तो पक्का है कि उसने कोई गर्व का अनुभव नहीं किया होगा। अब ऐसी अभद्र, गंवार और जाहिल भाषा बोलने वाले का क्या किया जाए? कोई भी सभ्य समाज इसे स्वीकार नहीं करेगा। अफसोस! भारतीय टीवी संस्कृति में चैनल एक ऐसा अध्याय लिख रहे हैं, जिसे कोई भी नहीं पढ़ना चाहेगा।

पत्रकारिता जैसे शानदार और गरिमामय पेशे को एक मंडी में ले जाकर खड़े करने वाले लोग अब शर्म और अश्लीलता का कौन सा दृश्य उपस्थित करेंगे, कोई नहीं कह सकता। मगर इतना तो तय है कि एक परिवार साथ बैठकर चाय की चुस्कियों के बीच ये चैनल नहीं देख सकता। युवा पीढ़ी ने तो खबरिया चैनल देखने करीब-करीब बंद ही कर दिए हैं। इस गंभीर स्थिति के बाद भी सूचना-प्रसारण मंत्रालय अगर चैनल लाइसेंस देने के कायदे-कानून की किताब के पन्ने नहीं पलटे तो मान लिया जाना चाहिए कि ऐसे मंत्रालयों पर ताला लटका देना ही बेहतर है। न मंत्रालय अब काम का रहा और न प्रसार भारती। सिर्फ रेडियो और दूरदर्शन अलग अलग अस्तित्व में आएं और सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय के नियंत्रण में हों। साल भर के हजारों करोड़ रुपए बचाए जा सकेंगे।

कुछ दर्शक ऐसे भी होंगे, जो निस्संदेह चैनलों पर यह नंगा नाच पसंद करते होंगे। तभी तो टीआरपी के लिए कुछ भी करेगा वाली शैली में छोटे परदे पर यह गंदगी परोसी जा रही है। ऐसे दर्शक और पाठक तो हर काल खंड में हुआ करते हैं। चालीस पचास साल पहले ‘दिनमान’, ‘रविवार’, ‘धर्मयुग’, ‘नवनीत’, ‘कादंबिनी’ और ‘रीडर्स डाइजेस्ट’ जैसी विशुद्ध साहित्यिक और सम सामयिक पत्रिकाएं निकलती थीं और मुंबई में विक्टोरिया टर्मिनल के सामने तथा उत्तर भारत के तमाम जिलों में फुटपाथ पर मस्तराम और लल्लू मल जैसे लेखकों की नंगी कहानियां भी बिकती थीं। अब वह सब इंटरनेट पर उपलब्ध है। क्या हमारे चैनल उसी श्रेणी में जाकर खड़े हो जाना चाहते हैं?

अतिरेक किसी भी चीज का अच्छा नहीं होता। यह दौर चीख चीख कर कह रहा है कि अब बस भी करिए। वरना अवाम अब सब कुछ अपने हाथ में ले लेगी। जब सड़ी और फफूंद लगी ब्रेड के खिलाफ उपभोक्ता आंदोलन खड़ा हो सकता है, घटिया और मिलावटी माल के खिलाफ कंज्यूमर एकजुट हो सकता है तो भारतीय टीवी चैनलों को भी सड़ांध और दुर्गन्ध फैलाती मानसिक खुराक परोसने के लिए एक विराट उपभोक्ता आंदोलन का सामना करने के लिए तैयार हो जाना चाहिए। अवाम के चाबुक से बड़ा कोई प्रहार नहीं होता। यह हकीकत चैनलों को, उनके पेशेवरों को, उनके मालिकों को और उन्हें संरक्षण देने वालों को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए। अगर नहीं ध्यान दिया तो वर्तमान को अतीत बनने में सिर्फ एक पल लगता है। अपने बच्चों, परिवारों और समाज के लिए सुधर जाइए मिस्टर मीडिया!

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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‘जहां काम करना पत्रकार का सपना होता था, उसे राष्ट्रद्रोही कहा जा रहा है मिस्टर मीडिया’

जिस एजेंसी का नाम लेते ही हम मीडिया के लोग गर्व से भर जाते थे, वह अब राष्ट्रद्रोही ठहराई जा रही है। पीटीआई हिंदुस्तान ही नहीं, समूचे संसार में सबसे बड़े नेटवर्क वाली संस्थाओं में से एक है।

राजेश बादल by
Published - Tuesday, 30 June, 2020
Last Modified:
Tuesday, 30 June, 2020
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।  

जिस एजेंसी का नाम लेते ही हम मीडिया के लोग गर्व से भर जाते थे, वह अब राष्ट्रद्रोही ठहराई जा रही है। ‘प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया’, हिंदुस्तान ही नहीं, समूचे संसार में सबसे बड़े नेटवर्क वाली संस्थाओं में से एक है। एशिया में तो यह संस्था अव्वल नंबर पर है। इस संस्था में काम करना किसी जमाने में एक पत्रकार का सपना हुआ करता था। लेकिन भारत सरकार की ओर से पोषित प्रसार भारती ने चंद रोज पहले उसे चीनी राजदूत के साक्षात्कार को लेकर देशद्रोही होने का प्रमाणपत्र दे दिया है। पत्रकारिता से जुड़े संस्थान, समाचारपत्र और खबरिया टीवी चैनल इस खबर के बाद बड़े असहज हैं।

दरअसल, आजादी से बीस बरस पहले एसोसिएशन प्रेस ऑफ इंडिया का गठन हुआ था। तब यह रॉयटर की हिंदुस्तानी शाखा की तरह काम करती थी। स्वतंत्रता मिलने के बाद 1949 में देश के समाचारपत्रों ने विदेशी स्वामित्व का जुआ उतार फेंका और इसे खरीद लिया। देखते ही देखते यह संसार की चुनिंदा समाचार एजेंसियों में शुमार हो गई। भारत आज दुनिया में अपनी आवाज को पल भर के भीतर पहुंचाने में सक्षम है तो उसके पीछे पीटीआई का बहुत बड़ा हाथ है। मुझे याद है कि कारगिल जंग में हमारी समाचार कथाएं इस संस्था की बदौलत ही विश्व में सहानुभूति और समर्थन बटोर रही थीं। पाकिस्तान के पास ऐसी कोई प्रतिष्ठित संस्था नहीं है। इसका उसे हरदम खामियाजा उठाना पड़ा है।

मुझे याद है कि बांग्लादेश युद्ध के समय श्रीमती इंदिरा गांधी ने संस्था के अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का बेहद चतुराई से उपयोग किया था। दुनिया भर के देशों के सामने पाकिस्तान की हकीकत उजागर हो गई थी। उस समय के पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) में पश्चिमी पाकिस्तान की सेना के जुल्मों की कहानियां पीटीआई के मार्फत ही संसार के करोड़ों लोगों तक पहुंची थीं। देखते ही देखते विश्व जनमत भारत के पक्ष में हो गया था। इससे पूर्व मई 1971 से नवंबर तक हिंदुस्तान आए लाखों बांग्लादेशी शरणार्थियों की मार्मिक और लोमहर्षक दास्तानें पीटीआई ने संसार को सुनाईं तो लोग हक्के बक्के रह गए। राष्ट्रहित में प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया के संवाददाताओं ने जोखिम उठाकर पत्रकारिता की है।

1962 के चीन युद्ध, 1965 के पाकिस्तान युद्ध, बांग्लादेश युद्ध, एशियाड, गुट निरपेक्ष देशों के सम्मेलन, परमाणु परीक्षण, अंतरिक्ष अभियान, कारगिल युद्ध और कॉमनवेल्थ खेलों के शानदार कवरेज की बदौलत इस संस्था ने संसार में तिरंगा लहराया है। आज उसी संस्था को पत्रकारिता के मापदंडों का पालन करने पर देशद्रोही ठहराया जा रहा है। एक संस्था देश का नाम रौशन करती है, उस संस्था से अगर काम लेना नहीं आए तो क्या कहा जाए? नाच न जाने आंगन टेढ़ा इसी को कहते हैं।

भारतीय पत्रकारिता इन दिनों संक्रमण काल का सामना कर रही है। इन दिनों व्यवस्था या व्यवस्था से संबद्ध किसी प्रतीक संगठन को जब पत्रकारिता का काम रास नहीं आता तो उसे देशद्रोही या गद्दारी का प्रमाणपत्र दिया जाने लगा है। अभी तक व्यक्तियों को ही देशद्रोही ठहराया जा रहा था। अब ऐतिहासिक और विश्वस्तरीय संस्थाओं को भी राष्ट्रद्रोही बताया जाने लगा है। भय होने लगा है। क्या इस मुल्क में देशद्रोहियों के अलावा और भी कोई भारतीय नागरिक शेष है, जो देशद्रोही नहीं है। अगर ऐसा है तो फिर इस आरोप से दुखी क्यों होना चाहिए मिस्टर मीडिया!

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‘पत्रकारिता में इस मान्यता को एसपी सिंह ने पूरी तरह बदल दिया था’

आज श्री सुरेंद्र प्रताप सिंह जी की पुण्यतिथि है। सुरेंद्र प्रताप सिंह हिंदी पत्रकारिता के ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने पत्रकारिता में एक विभाजन की रेखा खींची थी।

संतोष भारतीय by
Published - Saturday, 27 June, 2020
Last Modified:
Saturday, 27 June, 2020
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संतोष भारतीय
प्रधान संपादक, चौथी दुनिया।।

आज श्री सुरेंद्र प्रताप सिंह जी की पुण्यतिथि है। सुरेंद्र प्रताप सिंह हिंदी पत्रकारिता के ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने पत्रकारिता में एक विभाजन की रेखा खींची थी। सुरेंद्र प्रताप सिंह के संपादक बनने से पहले हिंदी पत्रकारिता में वही संपादक हो सकता था, जो 50 साल से ऊपर की उम्र का हो और खासकर साहित्यकार हो। उसी को माना जाता था कि यह संपादक होने के लायक है। लेकिन, सुरेंद्र प्रताप सिंह ने इस मान्यता को बदल दिया और उन्होंने ये साबित किया कि 20-22 साल या 24 साल की उम्र के लोग ज्यादा अच्छी पत्रकारिता कर सकते हैं।

उन्होंने इस भ्रम को भी तोड़ दिया कि साहित्यकार ही पत्रकार हो सकता है। उन्होंने ये साबित कर दिया कि पत्रकारिता अलग है और साहित्य अलग है। हालांकि, इसके ऊपर काफी बहस हुई। श्री सच्चिदानंद हीरानंद वात्साययन अज्ञेय और श्री सुरेंद्र प्रताप सिंह ने पटना के एक होटल में काफी चर्चा की। इस बातचीत में अज्ञेय जी वह तर्क रख रहे थे कि सुरेंद्र प्रताप सिंह जो पत्रकारिता कर रहे हैं, वह गलत कर रहे हैं, जबकि उनके समय के लोगों ने जो पत्रकारिता की, वह सही थी। उस समय रिकॉर्डिंग नहीं थी, लेकिन दोनों के बीच में इतना अद्भुत संवाद हुआ कि जो मेरी स्मृति में अब तक लगभग पूरी तरह है। मैं कहना चाहता हूं कि सुरेंद्र प्रताप सिंह ने पत्रकारिता को नई दिशा दी, जिसमें उन्होंने नौजवान लड़के-लड़कियों को नया पत्रकार बनाया।

आज के तमाम बड़े पत्रकारों में वही नाम हैं, जिन्होंने सुरेंद्र प्रताप सिंह के साथ काम किया। ये अलग बात है कि कभी-कभी पत्रकारिता शीर्षासन कर जाती है। जिस आजतक को उन्होंने देश के टेलिविजन के मानचित्र पर एक समाचार चैनल के रूप में स्थापित किया, वो अगर आज होते तो शायद आजतक बहुत बेहतर होता। क्योंकि सुरेंद्र प्रताप सिंह शुद्ध पत्रकारिता करते थे और कभी भी किसी का पक्ष नहीं लेते थे। वे स्टोरी के साथ खड़े होते थे, लेकिन आज ज्यादातर पत्रकार पत्रकारिता कम और पब्लिक रिलेशन को स्टैबलिश करने वाली पत्रकारिता ज्यादा कर रहे हैं। मैं आज दुखी इसलिए हूं कि सुरेंद्र प्रताप सिंह की पुण्यतिथि के ऊपर वो लोग उन्हें याद नहीं कर रहे हैं, जिन्हें सुरेंद्र प्रताप सिंह ने गढ़ा था या बनाया था। शायद इसलिए याद नहीं कर रहे हैं कि लोग रास्ते से भटक गए हैं और वे पत्रकारिता के बुनियादी सिद्धांतों की जगह अपने नए सिद्धांत गढ़ रहे हैं और ये मैं पत्रकारिता के लिए बहुत दुखद मानता हूं और इसलिए आज देश में पत्रकारिता की साख समाप्त हो गई है।

मुझे वो दिन याद हैं, जब सुरेंद्र प्रताप सिंह रविवार के संपादक थे और उनके कुछ विशेष संवाददाता जब किसी राज्य में जाते थे, तो पूरी राज्य सरकार हिल जाती थी। उनके पत्रकारों की रिपोर्ट के ऊपर कई मंत्रियों के इस्तीफे हुए, मुख्यमंत्रियों के इस्तीफे हुए और पूरी सरकार सामने खड़ी हुई और उसे जवाब देना पड़ा। ऐसी कम से कम 200 स्टोरीज मुझे याद हैं, जो सुरेंद्र जी के जमाने में छपीं। लेकिन आज पत्रकार कुछ लिखता है या टेलिविजन पर कुछ दिखाता है, तो लोग एक सेकंड में समझ जाते हैं कि ये स्टोरी कहां से प्रेरित है या किसके पक्ष में है या ये पत्रकार इस रिपोर्ट में किस पार्टी को या किस व्यक्ति की महिमा मंडित करना चाहता है।

महिमा मंडन की पत्रकारिता सुरेंद्र जी ने कभी नहीं की। इसलिए सुरेंद्र जी पत्रकारिता के शिखर पुरुष हैं, शीर्ष पुरुष हैं और मैं ये मानता था कि सुरेंद्र जी आगे बढ़ने वाला कोई न कोई पत्रकार तो हिंदी में पैदा होगा, लेकिन इतने साल बीत गए सुरेंद्र जी के जाने के बाद, दुर्भाग्य की बात है कि कोई भी पत्रकार सुरेंद्र जी की खींची रेखा से आगे नहीं बढ़ पाया। बल्कि मैं तो ये कहूं कि उन्होंने जिन लोगों को शिक्षा-दीक्षा दी और जो अपने जमाने में जिनके ऊपर वो खुद भरोसा करते थे, उन पत्रकारों से आगे भी कोई दूसरा पत्रकार नहीं बन पाया।

सुरेंद्र जी रिपोर्ट को या रिपोर्टर को इतना सम्मान देते थे, उसे इतनी साख देते थे कि लोग इस लिखे हुए को पढ़ने के लिए ‘रविवार’ खरीदते थे और ये उदाहरण देते थे कि चूंकि रविवार में यह छपा है या इस पत्रकार ने इस रिपोर्ट को लिखा है, इसलिए यह सही ही होगी। ये सम्मान अब किसी को नहीं मिल रहा है। अब तो जो बड़े नाम वाले लोग हैं, जो टीवी में आकर अपनी बात कहते हैं, उनकी बात की भी कोई साख नहीं है, क्योंकि उन्होंने अपनी रिपोर्ट से और अपनी बातों से उस साख को खत्म कर दिया है।

मैं इस पर बहुत ज्यादा नहीं कहना चाहूंगा क्योंकि यह बहुत ही मार्मिक विषय है, दुखद विषय है और पत्रकारिता की ‘लाश’ को देखने का एक तरीके का नजारा दिखाता है। मैं सिर्फ इतना कहूंगा कि सुरेंद्र जी के जमाने की पत्रकारिता या सुरेंद्र जी ने जिस तरह पत्रकारिता को साख दी, जिस तरह उन्होंने पत्रकारिता को गरिमा दी, वैसी साख और गरिमा देने वाले लोगों का आज इंतजार है, वो चाहे रिपोर्टर हों या डेस्क के लोग हों या संपादक हों। मुझे नहीं पता कि कब ऐसा वक्त आएगा, लेकिन ऐसा वक्त अगर नहीं आएगा तो हम अपने देश में पत्रकारिता के ‘कब्रिस्तान’ तो देखेंगे, पत्रकारिता के स्मारक नहीं।           

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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