वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम डे: अभिव्यक्ति का सवाल और एक दिन मीडिया का

प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर वरिष्ठ पत्रकार मनोज कुमार ने कई सवाल उठाए हैं

Last Modified:
Friday, 03 May, 2019
Manoj-kumar

मनोज कुमार
वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया विश्लेषक।।


एक बार फिर पूरी दुनिया कहेगी, बोल कि तेरे लब आजाद हैं, लेकिन हकीकत इसके विपरीत है। औपचारिकता के लिए दुनिया ने 3 मई की तारीख तय कर मुनादी कर दी है कि यह दिन विश्व प्रेस की स्वतंत्रता का दिन होगा। यह बात सच है कि जब यह कोशिश हुई थी, तब प्रेस और पत्रकारिता के लब आजाद थे, लेकिन आज की तारीख में दुनिया का कोई देश दावे के साथ नहीं कह सकता कि प्रेस के लब आज भी आजाद हैं। तिस पर तुर्रा यह कि मीडिया की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लगा दो। ठोक दो कि मीडिया अब दिल से नहीं, दलों से चल रही है। यह कहना आसान है, लेकिन यह सच पूरा नहीं है। इसके आगे और पीछे की भी कहानी है, जो डराती नहीं, धमकाती है और कहती है कि तेरे लब आजाद नहीं हैं।

सनद रहे कि तीन मई का दिन दुनियाभर में प्रेस की आजादी के दिवस के रूप में मनाया जाता है। प्रेस की स्वतंत्रता के बुनियादी सिद्धांतों, मूल्यों और प्रेस की स्वतंत्रता पर हो रहे हमले का बचाव करने और अपने पेशे को जिम्मेदारी और ईमानदारी से निभाते हुए जान गंवाने वाले पत्रकारों को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए हर साल यह दिन मनाया जाता है। भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मौत के लिए साल 1975 के आपातकाल को बार-बार याद किया जाता है, लेकिन यह भूल जाते हैं कि 2019 आते-आते हम जाने कितनी बार अघोषित आपातकाल को झेल चुके हैं। जो लोग मीडिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हैं, वो लोग यह भूल जाते हैं कि लगातार भयावह होती स्थितियों में भी पत्रकारों ने कदम नहीं खींचे। जान दी, लेकिन सच को समाज के सामने लेकर आए। हरियाणा के उस जाबांज पत्रकार को सलाम करना चाहिए, जिसकी कलम ने दोषियों को सलाखों के पीछे धकेल दिया। यह अकेला उदाहरण नहीं है।

भारत में प्रेस को समाज का चौथा स्तंभ कहा गया है, लेकिन यह चौथा स्तंभ लगातार जर्जर होता जा रहा है। भारतीय राजनीति के कद्दावर नेता लालकृष्ण आडवाणी ने आपातकाल के बाद प्रेस के लिए फरमाया था कि ‘सरकार ने कहा घुटनों पर चलो और वह रेंगने लगे।’ क्या आडवाणी जी 2019 में प्रेस की हिमायत में कुछ कहना चाहेंगे? हमें इस बात पर गर्व है कि साम्प्रदायिक दंगे ने हमारे प्रणेता गणेशशंकर विद्यार्थी की जान ले ली। विद्यार्थीजी की मृत्यु पर महात्मा गांधी ने कहा था, ‘काश! मुझे भी ऐसी मौत मिल सकती।‘ विद्यार्थी जी एक मिसाल हैं भारतीय पत्रकारिता के, लेकिन तब से लेकर अब तक पत्रकारिता की विश्वसनीयता के लिए जान देने वाले साहसी लोगों की सूची लंबी है।

रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स की नई रिपोर्ट विश्व प्रेस की आजादी की पोल खोलती है। बीते साल दुनिया भर में 80 पत्रकारों की हत्या या उनके पेशे की वजह से मौत हुई है। पूरी दुनिया में भारत पत्रकारों के लिए पांचवां सबसे बुरा देश साबित हुआ है। वहीं, अफगानिस्तान पत्रकारों के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक देश है। लोकतांत्रिक और बहुजातीय देश होने के बावजूद भारत प्रेस फ्रीडम की सूची में शामिल 180 देशों में 136वें नंबर पर है। भारत में 1992 से लेकर अब तक 19 जांबाज पत्रकारों की जुबान भ्रष्टाचार और अन्याय के विरुद्ध लड़ते वक्त हमेशा के लिए बंद कर दी गईं। बिहार में 25 मार्च को दो पत्रकारों की एसयूवी से कुचलकर हत्या कर दी गई। इसमें गांव के मुखिया पर हत्या का आरोप लगा था।  उसी दिन मध्य प्रदेश में रेत माफिया पर स्टोरी कर रहे एक पत्रकार की ट्रक से कुचलकर मौत हो गई। इसमें भी शक की सुई रेत माफिया पर गई।

इस रिपोर्ट से साफ हुआ है कि पूरी दुनिया में पत्रकारों की हत्या की घटनाएं बढ़ी हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि इन 80 पत्रकारों में से 63 पेशेवर पत्रकार थे। इसके अलावा इस साल 348 पत्रकारों को हिरासत में लिया गया था और 60 पत्रकारों का अपहरण हुआ, वहीं तीन लापता हैं। मारे गए 80 पत्रकारों में से 49 की हत्या इसलिए हुई, क्योंकि उनकी रिपोर्टिंग की वजह से ऊंची आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक ताकत रखने वाले या अपराधी संगठनों को नुकसान पहुंच रहा था। ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की रिपोर्ट के मुताबिक, मारे गए पत्रकारों की संख्या सबसे ज्यादा अफगानिस्तान में रही है। 2018 में अफगानिस्तान में इस साल 15 पत्रकार मारे गए हैं। सीरिया में 11, मैक्सिको में नौ, यमन में आठ, भारत और अमेरिका में छह-छह पत्रकार मारे गए हैं।

हालांकि, इराक इस लिस्ट से बाहर है। इराक में गुजरे साल एक भी पत्रकार नहीं मारा गया है। ऐसा 2003 के युद्ध के बाद से पहली बार हुआ है। इस रिपोर्ट में ये भी साफ किया गया है कि  इनमें कई ऐसे देश हैं, जिनमें युद्ध नहीं हो रहा। पत्रकारों को युद्ध से खतरा नहीं है। ये उस देश के खराब हालातों की वजह से हो रहा है। बीते साल 348 पत्रकारों को हिरासत में लिया गया। इनमें से 60 चीन में, 38 मिश्र में, 33 तुर्की में और 28-28 सऊदी अरब और ईरान में हिरासत में लिए गए। चीन दुनिया में पत्रकारों और ब्लॉगरों के लिए सबसे बड़ी जेल है। किसी भी न्यूज कवरेज के पसंद न आने पर शासन संबंधित पक्ष के विरुद्ध कड़े कदम उठाता है। विदेशी पत्रकारों पर भी भारी दबाव है और कई बार उन्हें इंटरव्यू देने वाले चीनी लोगों को भी जेल में बंद कर दिया जाता है। सीरिया में अब तक ऐसे कई पत्रकारों को मौत की सजा दी जा चुकी है, जो असद शासन के खिलाफ हुई बगावत के समय सक्रिय थे। रिपोर्ट्स विदाउट बॉर्डर्स ने सीरिया को कई सालों से प्रेस की आजादी का शत्रु घोषित किया हुआ है। वहां असद शासन के खिलाफ संघर्ष करने वाले अल-नुसरा फ्रंट और आईएस ने बदले की कार्रवाई में सीरिया के सरकारी मीडिया संस्थान के रिपोर्टरों पर हमले किए और कई को सार्वजनिक रूप से मौत के घाट उतारा।

ऊपर जो हालात बयां किए गए हैं, वे ऐसी एजेंसी की रिपोर्ट है, जिसकी विश्वसनीयता दुनियाभर में कायम है। यह सच है कि प्रेस की चुनौतियां लगातार बढ़ती ही जा रही है। प्रेस को आंतरिक और बाहरी दोनों मोर्चों पर संघर्ष करना पड़ रहा है। इनमें आंतरिक संघर्ष अधिक गंभीर है। प्रेस सरकार और जनता के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में अपनी महती भूमिका का निर्वहन करता है, किन्तु यह सच कहीं टूटता नजर आ रहा है। इसमें सबसे अहम भूमिका बाजार की मानी जाती है। प्रेस को बाजार के दबाव में बताया जा रहा है, लेकिन बाजार से लडऩे की ताकत भी प्रेस देता है, इस बात का कहीं जिक्र नहीं मिलता है. आधुनिकीकरण व सूचना प्रौद्योगिकी के विस्तार के फलस्वरूप मीडिया की आचार नीति और चुनौतियों के स्वरूप में परिवर्तन आया है। डिजिटल युग में सोशल मीडिया पर कई चैनलों का प्रसार हुआ है। विस्तार के कारण कुछ समस्या भी आई है, लेकिन पत्रकारिता ही एकमात्र कार्य है जो अपने ध्येय से भटका नहीं है। जितना सच यह है कि अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला बोला जा रहा है, उससे बड़ा सच यह है कि यह हमला डर में बोला जा रहा है।

एक पत्रकार होने के नाते मुझे यह अच्छा लगता है कि जब समाज कहता है कि पत्रकारिता अविश्वसनीय हो गई है, क्योंकि समाज किसी और प्रोफेशन के बारे में इतनी गंभीरता से नहीं सोचता है। विश्वास उसका ही टूटता है, जिस पर विश्वास होता है और हम मानकर चलते हैं कि समाज का विश्वास हम पर बना है। समाज की आलोचना हमारी ताकत है। पत्रकारिता में आज भी महात्मा गांधी और प्रेमचंद जिंदा हैं। पत्रकारिता की ओज पंडित माखनलाल चतुर्वेदी से है, गणेशशंकर विद्यार्थी से है और पराडक़र साहब से है। पत्रकारिता के ये वो खलीफा हैं, जिन्होंने बताया था कि प्रेस की जवाबदारी समाज के प्रति क्या है? एक सच यह भी है कि पत्रकारिता की औपचारिक शिक्षा ने भी पत्रकारिता को नुकसान पहुंचाया है। इस विधा में आने वाली नयी पीढ़ी रोजगार के भाव से आती है, सरोकार के भाव से नहीं। पत्रकारिता के लिए कोई टेक्नोलॉजी काम नहीं करती है और जो टेक्नोलॉजी काम करती है, उसे कहते हैं दिल से महसूस करना। एक आम आदमी की पीड़ा को महसूस करना, लेकिन पेज-थ्री की पत्रकारिता ने सुख की चादर में सच के ताप को ढकने की कोशिश की है।

कस्बाई पत्रकारिता में आज भी पत्रकारिता का ओज कायम है। महानगर आते-आते पत्रकारिता दम तोड़ने लगती है। एक सच यह भी है कि बाजार का हमला केवल हम पर ही नहीं है और प्रेस पर लगाम लगाने की कोशिश केवल हमारे शासक-प्रशासक ही नहीं करते हैं, बल्कि पूरी दुनिया का चरित्र ऐसा हो गया है। हम इस बात से खुश हो सकते हैं कि दुनिया में हमारे लिए एक दिन महफूज है, लेकिन क्या दिवस मना लेने से हमारी आजादी कायम रह पाएगी? सवाल छोटा सा है, लेकिन जवाब तलाशने के लिए शायद सदियां लग जाएं। जवाब तो हमें भी चाहिए, क्योंकि समाज हर सवाल का जवाब प्रेस से मांगता है तो एक सवाल समाज का प्रेस है कि आप हमारी स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए कब साथ देंगे?

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'मुझे आज भी याद है अरुण जी का वो प्यार भरा उलाहना'

मैं अरुण जी को जानता तो था पर उस दौरान कई साल से उनसे भेंट नहीं हुई थी

Last Modified:
Monday, 26 August, 2019
Arun Jaitley

मैंने सुनहरी बाग रोड की तरफ अपनी कार मोड़ी ही थी कि अचानक मेरे मोबाइल की घंटी बजी और दूसरी ओर से आवाज आई कि माननीय सूचना और प्रसारण मंत्री श्री अरुण जेटली बात करेंगे। कुछ हैरान-कुछ आल्हादित, मैं थोड़ा सकपकाया। इसके बाद सुनहरी मस्जिद रोड के बगल में ही अपनी कार लगाई। जब आप बेरोजगार पत्रकार हों और अचानक केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री का फोन आपके मोबाइल पर आ जाये तो आदमी यूं भी हड़बड़ा जाता ही है। कुछ देर में ही दूसरी ओर से अरुण जी की संयत सी आवाज, आई ‘कैसे हो उमेश?’

1999 के चुनाव के तुरंत बाद मेरी नौकरी चली गयी थी। चैनल के मालिक ने अनाप शनाप आरोप लगाकर मुझे नौकरी से हटाया था। घर में अगले महीने के राशन तक के पैसे नहीं थे। संयोग हुआ कि अरुण जेटली सूचना और प्रसारण मंत्री बन गए। मैं अरुण जी को जानता तो था पर कई साल से उनसे भेंट भी नहीं हुई थी। उन्होंने फोन पर हालचाल पूछा और कहा- चैनल के मालिक मुझे गुलदस्ता भेंट करने आये थे तो मैंने उनसे एक ही बात पूछी थी, ‘उमेश के काम से आपको कोई तकलीफ थी क्या?’

यहां ये याद रखने की बात है कि इस बारे में अरुण जी से मेरी कोई बात नहीं हुई थी। मैं तो उनसे मिला तक नहीं था। नेताओं से मिलने में हमेशा मेरा स्वभावगत संकोच रहा है। कॉलेज के दिनों से उनसे मेरी पहचान थी तो थी पर मेरी नौकरी जाने के बारे में उनसे कोई बात नहीं हुई थी। अरुण जी पत्रकारों की खोज खबर रखते थे और किसी और से उन्हें पता चला था कि मेरी नौकरी चली गयी है।

अरुण जी ने फोन पर ही मुझसे नौकरी कैसे गयी,इसकी जानकारी ली और फिर मिलने को कहकर फोन रख दिया। खैर, उसी शाम को चैनल मालिक का फोन आया, मुझे बुलाया और पहले से भी बड़े ओहदे और तनख्वाह पर नौकरी का प्रस्ताव दिया। मैंने इनकार कर दिया कि मैं उनके साथ काम करना ही नहीं चाहता। दरअसल मैं उनके व्यवहार से बेहद क्षुब्ध हो चुका था। कुछ महीने और बीत गए। घर की परेशानियां बढ़ चुकीं थीं। काम धंधा था नहीं। छोटे-मोटे ट्रांसलेशन के काम से पूरे घर का खर्च कैसे चलता?

अचानक एक दिन फिर अरुण जी का फोन आया। ‘अरे भाई कैसे हो तुम? क्या कर रहे हो?’ उस दिन अरुण जी ने मुझे कुछ प्यार भरा उलाहना भी दिया था-‘बड़े अजीब हो तुम? इधर आये भी नहीं?’

ऐसा लगा जैसे कोई कृष्ण सुदामा से कह रहा हो, ‘तुम आये इतै, न कितै दिन खोये।‘ मैंने कहा, ‘जी, मैं आपके पास आता हूं।’ अरुण जी ने फिर कहा, ‘ठीक है, आ जाना पर अभी तुम दूरदर्शन चले जाओ। वहां जाकर कार्यक्रम बनाने का प्रस्ताव दो और काम करो।’

मेरे संकोची स्वभाव को अच्छी तरह जानने वाले अरुण जी ने मुझसे जोर देकर कहा-‘और हां, मुझे बताना जरूर कि क्या हुआ?’ जेठ के तपते रेगिस्तान में प्यासे कंठ में जीवनदायी अमृत बूंदों की तरह था अरुण जी का ये फोन। मैं तुरंत दूरदर्शन गया और वहां मेरी एक करेंट अफेयर्स सीरीज-'दरससल' कुछ ही दिनों में मंजूर हुई। मैं अपने पैरों पर फिर खड़ा हो सका।

मेरे उस घोर निराशा, विपन्नता और अभाव के कालखंड में बस दो लोगों ने बिन कहे-बिन पूछे मदद का हाथ बढ़ाया। एक थे अरुण जेटली और दूसरे थे उनके परम मित्र रजत शर्मा। मेरे पूरे जीवन काल में किसी राजनेता द्वारा मदद का बस अरुण जी ही एकमात्र उदाहरण हैं। मदद भी कैसी? बिन कहे, बिन मांगे, बिन किसी अपेक्षा और बिन किसी अहसान के।

अरुण जी यों भी मेरे लिए राजनेता कम और बड़े भाई की तरह ज्यादा थे। उसके बाद उनसे मुलाकातें होती रहीं। गपशप ही हुई, जब भी मैंने उनसे उस अहसान का जिक्र करना चाहा तो उन्होंने उसे बातों में उड़ा भर दिया। उनसे कई मुलाकातें हैं, जो स्मृतिपटल पर हमेशा अंकित रहेंगी।

डूसू अध्यक्ष से लेकर देश के वित्तमंत्री का ओहदा उन्होंने बखूबी निभाया। उनके स्वभाव और व्यवहार को लेकर लोग कई बातें भी करते रहे हैं। पर जिस तरह से उन्होंने मेरी मदद की, वह बताता है कि अरुण जेटली किस मिट्टी के बने थे। छोटों का जरूरत के समय ध्यान रखने वाले, हमदर्द और खैरख्वाह।

ये उनके जाने का समय नहीं था। उन्हें अभी इस देश और समाज के लिए बहुत करना था। आप बहुत याद आएंगे अरुण जी !!

(वरिष्ठ पत्रकार उमेश उपाध्याय की फेसबुक वॉल से)

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अरुण जेटली का सक्सेस फंडा था- Well Heard is Half Solved  

सन् 2020 के चुनाव में भाजपा अगर फिर से दिल्ली जीत जाती है तो अरुण जी के लिए यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी

Last Modified:
Sunday, 25 August, 2019
Arun Jaitley

के.एम.शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार

सन् 1996 - 97 की बात है जब दिल्ली भाजपा में गुटबाजी चरम पर थी और साहिब सिंह वर्मा और मदन लाल खुराना के बीच का झगड़ा पार्टी नहीं सुलझा पा रही थी । मागेराम गर्ग पार्टी अध्यक्ष थे, प्रो. वी.के मल्होत्रा भी प्रदेश में जारी सिर फुटव्वल से परेशान थे फिर बारी अरुण जेटली की आई, उन्होंने दोनो नेताओं से बात की और झगड़ा शीत युद्ध में तब्दील हो गया। मुझे याद है कि तब जेटली जी इस समझौते का ब्यौरा देते हुए पंजाब केसरी के तत्कालीन ब्यूरो प्रमुख उमेश लखनपाल को कहा था कि आप किसी की समस्या अच्छी तरह सिर्फ सुन लेते हैं तो आधी समस्या समाप्त हो जाती है।

लेकिन भाजपा उसके बाद कभी दिल्ली नहीं जीत पाई, पार्टी ने डा. हर्ष वर्धन पर दांव लगाया, वो ‘मैन आफ द मैच’ जरूर बने’ उनके नेतृत्व में 2014 के विधानसभा चुनाव में  पार्टी 32 सीट जीत कर भी आई लेकिन सरकार नहीं बना पाई और डा. हर्ष वर्धन केंद्र में स्वास्थय मंत्री बन गए।

कहते हैं दिल्ली की राजनीति में जेटली जी का काफी दखल था, उनके कहने के बाद ही नेतृत्व ने 2014 में दिल्ली में सरकार नहीं बनाने का फैसला किया था, 2015 के चुनाव में किरण बेदी को मुख्यमंत्री का चेहरा भी जेटली जी के कहने पर ही बनाया गया था लेकिन पार्टी 32 से 03 पर सिमट कर रह गई। 

हार की समीक्षा बैठक हुई जेटली जी परिणाम से खुश नहीं थे, गुटबाजी फिर भी चरम पर थी, वैसे पार्टी में गुटबाजी अब भी चरम पर है,  एक दिन जेटली जी से उनके सरकारी निवास पर मिला और उनसे मैने पूछा सर दिल्ली की समस्या का क्या हुआ उन्होंने हंसते हुए कहा कि मैंने सभी लोगों की बाते सुन ली है और समस्या का काफी हद तक समाधान भी हो गया है, जेटली जी ने कहा कि एक कहावत है कि Well Heard is Half Solved.... बाकी निर्णय समय आने पर पार्टी करेगी ।

मैने यह बात इसलिए कही क्योंकि जेटली जी अब इस दुनिया में नहीं हैं, वो चाहते थे कि जिस दिल्ली ने उन्हें इतना दिया वहां उनकी पार्टी की सरकार बने, सन् 1998 के बाद से अब तक दिल्ली में भाजपा की सरकार नहीं बनी ।

दिल्ली विधान सभा का चुनाव फिर से सिर पर हैं दिल्ली के दो धुरंधर सुषमा और जेटली दोनों इस दुनिया में नहीं हैं पहले पंक्ति के अग्रणी नेताओं में से एक डा. हर्ष वर्धन ही एक ऐसे नेता बचे हैं जिन्होंने सुषमा, जेटली, साहिब सिंह और खुराना के साथ काम किया है। 

अब बारी दिल्ली के नेताओं की हैं कि वो आपसी मतभेद और महात्वाकाक्षा को भूलाकर कार्यकताओं की बात सुने, पूरी नहीं तो आधी ही सही ( Well Heard is Half Solved ) और दिल्ली में भाजपा को जितवाने के लिए अभी से काम करे । 

सन् 2020 के चुनाव में भाजपा अगर फिर से दिल्ली जीत जाती है तो अरुण जी के लिए यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी ।

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जी बिजनेस के ME अनिल सिंघवी ने इन 'पंक्तियों' से किया जेटली को याद 

नोटबंदी जैसा कठोर फैसला हो या फिर सरकारी बैंको के एनपीए को खत्म करने, जन-धन और वन रैंक, वन पेंशन जैसी योजनाएं लागू करने का काम जेटली जी जैसे फौलादी इरादों वाले वित्त मंत्री की बदौलत ही संभव हो पाया।

Last Modified:
Sunday, 25 August, 2019
Anil singhvi

अनिल सिंघवी, मैनेजिंग एडिटर, जी बिजनेस

इस मोड़ पर घबराकर न थम जाइए आप
जो बात नई है उसे अपनाइए आप
डरते हैं नई राह पर क्यों चलने से आप
हम आगे-आगे चलते हैं आइए आप…

2017 के बजट भाषण में तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली की शायरी मुझे बखूबी याद है। हालांकि उनके हर बजट भाषण में शेरो-शायरी होती थीं लेकिन ये पंक्तियां मुझे बेहद पसंद है। जब इंसान कुछ अच्छा करने की ठान लेता है तो उसे आने वाली बाधाओं से नहीं घबराना चाहिए।

जेटली जी आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन संकट की घड़ी में भी उनका मुस्कुराता चेहरा, आत्म-विश्वास से भरी उनकी निगाहें, संसद में बहस के दौरान उनकी तार्किक विवेचना और विरोधियों को भी दोस्त बनाने की उनकी कला बखूबी याद रहेगी।

ऐसा सुना है कि जेटली जी भी बचपन में चार्टर्ड अकाउंटेंट बनना चाहते थे लेकिन बन गए अधिवक्ता। वकील के रूप में शुरू हुआ सफ़र- एक कुशल वक्ता और फिर बीजेपी के तेज़-तर्रार प्रवक्ता के साथ ही सौम्य छवि वाले राजनेता तक पहुंच गया। जेटली जी एक ऐसे राजनेता थे, जो विरोधी पार्टियों में भी अपनी अच्छी पकड़ रखते थे। संसद में विपक्षियों पर धारदार हमले करने वाले जेटली निजी जीवन में हमेशा मित्र रहे। 

जेटली जी जननेता भले ही न बन पाए हों लेकिन एक कुशल राजनेता था। ऐसे समय में जब बीजेपी कट्टरवादी विचारधारा के लिए जानी जाती थी तब वो अपनी वाकपटुता के जरिए पार्टी की नीतियों का उदारवादी रुख पेश करते थे। संसद की बहस को प्रभावी और तर्कसंगत बनाने में उनका कोई मुकाबला नहीं था। वो गजब के रणनीतिकार थे, साथ ही कानून और संविधान के अच्छे जानकार भी।

2014 में जब बीजेपी की सरकार बनी तो प्रधानमंत्री मोदी ने सबसे ज्यादा भरोसा अरुण जेटली पर जताया और उन्हें वित्त के साथ-साथ रक्षा मंत्रालय का भी कार्यभार सौंपा। दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र में जब भी आर्थिक सुधार की बात होगी तो जीएसटी लागू कराना उस लिस्ट में सबसे ऊपर होगा। 1 जुलाई 2017 को लागू हुए इस कानून की बारीकियों को राजनीतिक पार्टियों के साथ ही इंडस्ट्री और व्यापारियों तक पहुंचाने और समझाने का काम कितना चुनौतीपूर्ण रहा होगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। 

कालेधन पर प्रहार के लिए नोटबंदी जैसा कठोर फैसला हो या फिर सरकारी बैंको के एनपीए को खत्म करने, जन-धन और वन रैंक, वन पेंशन जैसी योजनाएं लागू करने का काम जेटली जी जैसे फौलादी इरादों वाले वित्त मंत्री की बदौलत ही संभव हो पाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी योजनाएं हों या आर्थिक सुधार के बड़े फैसले जेटली जी ने उन्हें बखूबी अंजाम दिया।

अपने खराब स्वास्थ्य की वजह से 2019 के चुनाव और उसके बाद भी भले ही जेटली जी शारीरिक रूप से राजनीति से दूर रहे लेकिन अपने ब्लॉग और अखबारों में लेख के जरिए वो बीजेपी और मोदी सरकार की नीतियों के पक्ष में लिखते और बोलते रहे।

जेटली जी के रूप में देश ने एक तेज-तर्रार राजनेता, बीजेपी ने एक कुशल रणनीतिकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संकट की घड़ी में साथ आने वाला एक सच्चा सलाहकार खो दिया है।

अरुण जेटली का जाना, भारतीय राजनीति के एक चमकते सूर्य (अरुण) का अस्त होना है... मेरा नमन... ऊँ शांति...
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।
तस्मादपरिहार्यर्थे न त्वम् शोचितुमर्हसि।।

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भावुक क्षणों में अरुण जेटली की असल भूमिका भूल गए 

अरुण जेटली को यह हुनर हासिल था कि वे राजनीति में पदार्पण से लेकर आख़िरी सक्रिय साँस तक अपनी असहमति को व्यक्त करते रहे। जब मैं इसे उनके हुनर की तरह याद करता हूँ तो

Last Modified:
Sunday, 25 August, 2019
Arun jaitley

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।। 

अरुण जेटली चले गए। शनिवार को दिन भर समाचार माध्यमों और राजनीतिक जगत में उनके व्यक्तित्व के अनेक पहलू और कृतित्व के अनेक अनछुए अध्याय सामने आए। मगर भारतीय राजनीति में नेताओं के योगदान को जल्दी ही भूल जाने की आदत के चलते जेटली का भी वास्तविक मूल्यांकन शायद अभी भी नहीं हो रहा है। आम तौर पर जब  सार्वजनिक क्षेत्र के किसी  शिखर पुरुष के होते उसके होने का असल महत्त्व हम नहीं समझते और न समझने की कोशिश करते हैं। जब वह इस लोक से चला जाता है ,तो पता चलता है कि उसके होने का अर्थ क्या था। अरुण जेटली के मामले में कुछ ऐसा ही हुआ है। कई बार परदे के पीछे से इस शख़्स ने क्या रचा है , किसी को नहीं दिखाई दिया। 

मौजूदा दौर में बीजेपी की सियासत यह स्पष्ट संकेत दे रही है कि उसमें असहमति के सुरों को बहुत अधिक स्थान नहीं है। पार्टी के भीतर भी और बाहर भी। अरुण जेटली को यह हुनर हासिल था कि वे राजनीति में पदार्पण से लेकर आख़िरी सक्रिय साँस तक अपनी असहमति को व्यक्त करते रहे। जब मैं इसे उनके हुनर की तरह याद करता हूँ तो यह भी कहता हूँ कि असहमति को कब ,कैसे,कहाँ,किस अवसर पर और किस तरह प्रकट करना है - यह बेजोड़ कला अरुण जेटली को आती थी। आज की राजनीति में अधिकतर राजनेता अपनी असहमति का विकृत संस्करण पेश करते हैं इसलिए वे कभी युवा तुर्क़ तो कभी बाग़ी तो कभी असंतुष्ट क़रार दिए जाते हैं। इसका उनको सियासी नुकसान भी उठाना पड़ता है। झटका खाया व्यक्ति सोचता है कि मैंने तो पार्टी के हित की बात कही थी ,लेकिन मुझे ही दंड भुगतना पड़ा। जेटली के साथ कभी ऐसा नहीं हुआ।

लौटते हैं जेटली की कुछ ऐसी ही असहमतियों पर। मुझे याद है कारगिल से घुसपैठियों को वापस भेज दिया गया था और पाकिस्तान को फिर चोट खानी पड़ी थी। अटल बिहारी वाजपेयी की अनगिनत दलों की साझा सरकार थी। दो हज़ार चार के चुनाव क़रीब थे। भारतीय जनता पार्टी का एक वर्ग और सहयोगी दलों के लोग चुनाव में इसे कारगिल विजय बता कर जीत के ख़्वाब बुन रहे थे।सेना का पूरा सियासी इस्तेमाल शुरू हो गया था। संसद के एक बैठक में तो सेना को भी भरोसे में नहीं लिया गया।  आला फौजी अफसरों से कहा गया कि वे संसद भवन में आकर सांसदों को कारगिल प्रसंग पर विस्तार से बताएँ। सेना को अच्छा लगा कि निर्वाचित जन प्रतिनिधि राष्ट्रीय सुरक्षा पर उसके साथ संवाद चाहते हैं।जब शीर्षस्थ अधिकारी संसद पहुँचे तो उन्हें धक्का लगा। सिर्फ़ एनडीए सांसद बुलाए गए थे।वे अपनी अपनी पार्टियों के झंडे लिए थे और राजनीतिक नारे लगा रहे थे।प्रतिपक्ष के  सांसद नहीं थे। सेनाध्यक्ष जनरल वीपी मलिक ने तो बाक़ायदा सेना के इस राजनीतिक दुरूपयोग का प्रधानमंत्री के समक्ष विरोध किया था।कम लोग यह जानते हैं कि जब संसद में केवल सत्तापक्ष को बुलाने का फ़ैसला लिया गया तो अरुण जेटली पहले व्यक्ति थे ,जिन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी से अपनी असहमति दर्ज़ कराई थी और कहा था कि प्रतिपक्ष को चुनाव से पहले एक मुद्दा मिल जाएगा। उस समय प्रमोद महाजन और उनके समर्थकों के आगे जेटली की नहीं चली। विपक्ष ने इस पर आसमान सर पर उठा लिया। इसके बाद पंजाब - हरियाणा में हद हो गई।फ़ौज के अफसरों के चित्र एनडीए दलों की रैलियों के बैनरों में नज़र आने लगे। जनरल वीपी मलिक ने एक बार फिर वाजपेयी जी के सामने अपना विरोध दर्ज़ कराया। एक सुबह अरुण जेटली ने भी सीधे अटलजी से बात की। अटल जी ने कहा ," गंभीर ग़लती हुई है  " लेकिन  स्थानीय नेताओं ने चुनावी माहौल में सेना का सियासी इस्तेमाल जारी रखा। तब तक काफ़ी देर हो चुकी थी। चुनाव के बाद एनडीए लुढ़क गया। जेटली का क़द पार्टी में ऊंचा हो गया। 

गुजरात में सांप्रदायिक चुनाव चरम पर था। अटल बिहारी वाजपेयी मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को हटाने का फ़ैसला ले चुके थे।वे आडवाणी जी की भी नहीं सुन रहे थे। अरुण जेटली और नरेंद्र मोदी की नब्बे के दशक से ही गाढ़ी छनती थी। एक रात अरुण जेटली ने अपने अकाट्य तर्कों से वाजपेयी को चुप कर दिया। नरेंद्र मोदी पद पर सुरक्षित रहे। अगर उस समय अरुण जेटली ने भूमिका न निभाई होती तो 2014 के चुनाव के बाद क्या स्थिति होती। नरेंद्र मोदी संभवतया आज के रूप में न होते। भविष्य के गर्भ में छिपे संकेत पढ़ने में जेटली माहिर थे। 

एक और उदाहरण। नई सदी आ रही थी। सारे संसार के साथ साथ हिन्दुस्तान भी अपने सपनों के साथ इस सदी में दस्तक दे रहा था। पत्रकारिता में क्रांति का एक नया क़दम इस देश ने अरुण जेटली के कारण ही बढ़ाया था। गंभीरता से इस पर विचार हो रहा था कि भारत में निजी क्षेत्र के चैनलों को डी टी एच याने डायरेक्ट टु होम की अनुमति देनी चाहिए अथवा नहीं। एक बार फिर प्रमोद महाजन और उनके समर्थकों ने अटलजी की राय नकारात्मक बना दी थी। वे 1996 का हवाला देते थे ,जब रूपर्ट मर्डोक की कंपनी पर भी बंदिश थी। सुषमा स्वराज की वक़ालत भी काम नहीं आ रही थी। एक बार फिर अरुण जेटली ने मोर्चा संभाला और सुषमा जी के साथ गए।पक्ष में ऐसे ऐसे उदाहरण दिए कि प्रधानमंत्री को सहमत होना पड़ा। आज डीटीएच मार्किट में भारत संसार भर में अव्वल है।  इसके पीछे केवल अरुण जेटली का हाथ था।

दो पीढ़ियों को जोड़ने वाली एक कड़ी के तौर पर काम करना जेटली का दूसरा हुनर था।इन दिनों कमोबेश हर राजनीतिक दल में पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी के बीच एक द्वंद्व है। इसका पार्टी की सेहत पर बुरा असर होता है। कांग्रेस तो सर्वाधिक शिकार है। अरुण जेटली के रहते शिवराज सिंह चौहान,वसुंधरा राजे सिंधिया ,डॉक्टर रमन सिंह ,उमा भारती और देवेंद्र फडणवीस जैसे द्वितीय पंक्ति के नेताओं को कभी शिखर नेतृत्व के साथ संवाद में परेशानी नहीं होती थी। केवल संवाद ही नहीं , पार्टी के भीतर उनके स्वर को मुखरित करने का काम भी जेटली ने बख़ूबी किया। पिछले छह साल में केंद्रीय नेतृत्व के सामने और प्रादेशिक नेतृत्व का असंतोष भी अरुण जेटली ने जैसा रखा ,वैसा तो ये नेता भी अपना पक्ष नहीं रख सकते थे।अगर तीन मुख्यमंत्रियों की गद्दी उनके चुनाव हारने तक सलामत रही तो इसके पीछे सिर्फ़ अरुण जेटली ही थे। बताने की आवश्यकता नहीं कि बीजेपी को इसका बड़ा फायदा मिला।पत्रकारिता के पंडितों को इस तरह की शख़्सियतों का मूल्यांकन पूरी निरपेक्षता के साथ और बिना भावुक हुए करने की ज़रूरत है। 

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दो नावों पर सवारी करने में माहिर थे अरुण जेटली

वह अक्सर मुझसे कहते थे कि जो लोग हर छोटी-छोटी बात पर मानवाधिकारों की दुहाई देते हुए सुप्रीम कोर्ट जाते हैं, वे अंततः देश को कमजोर कर रहे हैं

Last Modified:
Sunday, 25 August, 2019
Arun jaitley

भूपेंद्र चौबे, वरिष्ठ टीवी पत्रकार

‘दिल्ली का एक ऐसा सूत्र’ जिसे लगभग हर व्यक्ति के बारे में कुछ न कुछ पता होता था। कॉरपोरेट टाइकून से लेकर पत्रकार, क्रिकेटर, कलाकार और कानूनविद तक जेटली का मिलना जुलना सभी से था। उनका दायरा इतना विस्तृत था कि आपके लिए यह पता लगाना मुश्किल हो जाता था कि आप उसमें कहाँ शामिल होते हैं।

लेकिन जैसा कि आज मैं स्टूडियो में बैठा हूं, उनकी पार्टी के साथियों और ऐसे लोगों से बात कर रहा हूं, जिनकी जिंदगी में जेटली की एक अलग ही भूमिका थी, मैं यह कह सकता हूं कि जेटली एक ऐसे राजनेता थे, जिसके पास दूसरों को विशेष महसूस कराने की अद्वितीय क्षमता थी।

आप संपादकों से लेकर जूनियर पत्रकारों तक के ट्विटर या फ़ेसबुक पोस्ट को देखकर यह अंदाज़ा लगा सकते हैं कि हर किसी के पास जेटली के बारे में कुछ न कुछ है। मेरे पास मेरा भी है, लेकिन उस पर बाद में बात करेंगे। क्या हमें जेटली को एक ऐसे उदार चेहरे के रूप में देखना चाहिए जिन्होंने रणनीति को "कठिन राष्ट्रवाद" के रूप में बदल दिया, और 2014 स के बाद राजनीतिक ज़रूरत बन गया? 

एक ऐसा व्यक्ति जो बेबाक था, फिर चाहे सत्तापक्ष में हो या विपक्ष में। भाजपा के संक्रमण काल में यह सच स्वीकारने का साहस केवल उन्हीं में था कि पार्टी अलगाव की स्थिति में इसलिए पहुंची है, क्योंकि वह दूसरे दलों को अपने साथ जोड़ने में उतनी सफल नहीं हुई, जितनी कि होना चाहिए था। जेटली हमेशा दो नावों पर सवारी करते थे, और हमेशा उसमें कामयाब भी रहे। किसी भी मुद्दे पर वह हर दृष्टिकोण से विचार करते और फिर उसके अनुरूप आगे बढ़ते। सबरीमाला विवाद पर भी उन्होंने ऐसा ही किया था। वह मानते थे कि संविधानविदों की नज़र में सुप्रीम कोर्ट पहले आता है और भगवान बाद में, लेकिन आस्था में विश्वास रखने वालों की सोच इसके विपरीत होगी। आमतौर पर कहा जाता है कि दो नावों की सवारी नहीं करनी चाहिए, लेकिन जेटली ने कभी इन ‘आम’ बातों पर गौर नहीं किया। बल्कि उन्होंने यह सिद्ध किया कि दो नावों की सवारी, निरंतर विकसित होने और अपने आप को पुन: उत्पन्न करने के लिए एक अद्वितीय राजनीतिक गुण है।  

वह अक्सर मुझसे कहते थे कि जो लोग हर छोटी-छोटी बात पर मानवाधिकारों की दुहाई देते हुए सुप्रीम कोर्ट जाते हैं, वे अंततः देश को कमजोर कर रहे हैं। लेकिन यह तब था जब वह सत्ता में थे। जबकि विपक्ष में रहने के दौरान उन्होंने 2012 -13 में जंतर-मंतर जाने से पहले एक बार भी नहीं सोचा, ये वो दौर था जब अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी धर्मयुद्ध अपने चरम पर था। अरविंद केजरीवाल बाद में उनके प्रतिद्वंद्वी बन गए, लेकिन जेटली को उस वक़्त सत्ताविरोधी आवाजों से सुर मिलाने में कुछ गलत नहीं लगा।

मुझे लगता है कि राजनीतिक बातों से इतर, भोजन के प्रति जेटली के प्रेम को रेखांकित किए बिना उन्हें दी जाने वाली हर श्रद्धांजलि अधूरी होगी। जैसा कि अभिषेक मनु सिंघवी ने मुझसे ‘सीएनएन न्यूज 18’ पर बात करते हुए कहा, ‘अरुण जेटली के जीवन में खाने-पीने से जुड़े कई रोचक किस्से थे।’ ‘एम्बेसी रेस्टोरेंट’ उनका पसंदीदा रेस्टोरेंट था। जहां वह अक्सर मटन रारा या दाल का लुत्फ़ उठाते। छोले भटूरे उन्हें बेहद पसंद थे, इतना ही नहीं वह आपको ये भी बता सकते थे कि दिल्ली में सबसे अच्छा कीमा कहां मिलता है।

जेटली के साथ बात करने का अपना अलग ही रोमांच होता था, फिर चाहे विषय कोई भी हो। मैं अक्सर मजाकिया अंदाज़ में उनसे कहा करता था कि यदि वह राजनीतिज्ञ नहीं होते तो एक उत्कृष्ट संपादक बनते। मीडिया के साथ उनके समीकरणों को लेकर आलोचक उन्हें निशाना भी बनाते रहते थे। उन्हें ‘मीडिया ब्यूरो चीफ’ कहा जाता था, लेकिन जेटली इससे बिल्कुल भी विचलित नहीं होते, बल्कि उन्हें अपने इस नए नाम पर गर्व होता था।

एक ही समय में विविध क्षेत्रों से जुड़ने की अपनी क्षमता के चलते अरुण जेटली ने एक ऐसा स्थान हासिल कर लिया था, जिस तक पहुंचना किसी भी समकालीन राजनीतिज्ञ के लिए मुश्किल है। उन्होंने अपने जीवन में भले ही कोई लोकसभा चुनाव नहीं जीता, लेकिन यह सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई कि उनके पार्टी के उम्मीदवार बार-बार चुनकर आते रहें। उनके निधन से भाजपा ने अपने सबसे अच्छे रणनीतिकार और भारतीय राजनीति के चाणक्य को खो दिया है।
 

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अरुण जेटली को राजदीप सरदेसाई ने यूं किया याद, उनकी दिसंबर की पार्टी होती थी खास

उनका सेंस ऑफ ह्यूमर गजब था। एक बार उनके पास बैठ जाओ तो बहुत सी इनसाइट स्टोरीज का पता चलता। मैं अक्सर उनसे कहता था कि सर आप अगर इन कहानियों को लेकर एक किताब लिख दो तो वे तो पक्का बेस्टसेलर होगी ही

Last Modified:
Sunday, 25 August, 2019
Rajdeep with Arun Jaitley

राजदीप सरदेसाई, वरिष्ठ पत्रकार

मुझे लगता है कि दिल्ली में बहुत कम पत्रकार ऐसे होंगे जो पॉलिटिक्स कवर करते हो और उनका वास्ता अरुण जेटली से न रहा हो। जेटली की खासियत थी कि उनके पत्रकारों के साथ बहुत अच्छे संबंध रहते थे। वे कई घंटों तक ससद भवन में पत्रकारों के साथ बतियाते रहते थे। जटली की विशेषता थी कि चाहे व सत्ता में रहे या विपक्ष में, पत्रकारों के साथ उनका संपर्क हमेशा बना रहता था। जहां आज कई नेता सत्ता में आने के बाद वीवीआईपी कल्चर का हिस्सा बन जाते हैं, ऐसे में जेटली इस कल्चर से कोसो दूर थे, वे पत्रकारों के साथ घंटा-डेढ़ घंटा खूब बतियाया करते थे। उनके पास कहानी-किस्सों का खजाना था, जिसे वे पत्रकारों के साथ खुलकर शेयर करते थे।

भारतीय राजनीति के हर दौर का वे अहम हिस्सा रहे। इमरजेंसी में जेल गए, तो बोफोर्स में राजीव गाधी के खिलाफ रहे, वीपीसिंह, अटल बिहारी बाजपेयी और नरेंद्र मोदी के दौर में राजनीति के अहम किरदार रहे।

उनका सेंस ऑफ ह्यूमर गजब था। एक बार उनके पास बैठ जाओ तो बहुत सी इनसाइट स्टोरीज का पता चलता। मैं अक्सर उनसे कहता था कि सर आप अगर इन कहानियों को लेकर एक किताब लिख दो तो वे तो पक्का बेस्टसेलर होगी ही। पर दुर्भाग्य कि अब उनके साथ ये सब कहानी-किस्से भी अतीत में समा गए।

अगर जेटली वकील नहीं होते, तो मेरा मानना है कि वे बहुत अच्छे पत्रकार बनते। खबरों के मामले में वे बहुत जानकार थे। वे स्टूडियो डिबेट में माहिर थे। मुझे याद है कि जब मेरे शो ‘बिग फाइट’ में अरुण जेटली, कपिल सिब्बल और सीताराम येचुरी आते थे, तो क्या जबर्दस्त शो होता था वो। सब एक से बढ़कर एक तर्क रखते थे। कई बार तो एंकर को शो में कुछ करना ही नहीं होता, ये गेस्ट ही शो को आगे बढ़ा देते थे। स्टूडियो डिबेट में जहां वे एक दूसरे के विरोधी नजर आते, तो डिबेट खत्म होने के बाद आपस में खूब गपियाते। जेटली की बड़ी खासियत ये भी थी कि अंग्रेजी हो या हिंदी, दोनों भाषाओं पर उनकी बढ़िया कमान थी, इसलिए हर टीवी चैनल उन्हें अपने शो में लाना चाहता था। वे जब मंत्री भी बने तो भी उन्होंने कभी स्टूडियो डिबेट से किनारा नहीं किया। वे आज के मंत्रियों के तरह ओबी वैन या वन टू वन इंटरव्यू की मांग नहीं करते थे। उन्होंने कभी एटिट्यूड शो नहीं किया।

जेटली खुले व्यक्तित्व के इसान थे। बहुत बड़े दिल वाले व्यक्ति थे। सामान्य लोगों से भी खूब बात करते थे। हमारे वॉकिंग क्लब में वे ही वीवीआईपी थे यानी कहने का मतलब ये है कि वे हम सब साधारण लोगों के साथ सुबह टहलते थे और कहानी-किस्से शेयर करते थे। बातों के शौकीन जेटली से मैं अक्सर कहता भी था कि आप वॉक कम, टॉक ज्यादा करते हैं। शनिवार को वॉकिंग के बाद हम सब मिलकर खाना भी खाते थे। सर्दी में भी सुबह 7 बजे पार्क में पेड़ के नीचे बैठकर वो कई रोचक बातें बताते थे।

हर साल दिसंबर के आखिरी हफ्ते या जनवरी के पहले हफ्ते वे एक पार्टी देते थे। इस पार्टी की खासियत थी कि इसमें उनके सभी पुराने दोस्त आमंत्रित होते थे। 25-30 सालों से वे जिसे जानते थे, उसे भूलते नहीं थे। अमृतसरी कुलछा से लेकर भेजाफ्राई समेत कई नोर्थ इंडियन डिसेज इस पार्टी के मेन्यू में होती। वे खाने के बड़े शौकीन थे।

वे बड़े दिलवाले थे। हर राजनैतिक दल में उनके दोस्त थे। जीएसटी ऐसा विधेयक था, जिसे सरकार आम  सहमति मे पास करवाना चाहती थी और ऐसे में अरुण जेटली ने एक बड़ी भूमिका निभाई थी। उनके बड़प्पन की एक बात और याद आ रही है। जब 2014 में मेरी बुक लॉन्च का कार्यक्रम था, तो लोग कह रहे थे कि बीजेपी ने मेरा बहिष्कार किया है, इसलिए अरुण जेटली उस कार्यक्रम में नहीं आएंगे। पर न सिर्फ अरुण जेटली उस कार्यक्रम का हिस्सा बने, बल्कि उन्होंने चिदंबरम के साथ मंच भी शेयर किया। ये उनका बड़प्पन था कि वे निजी रिश्तों को बहुत अहमियत देते थे।

पढ़ने की रुचि उन्हे बहुत थी। खूब किताबें पढ़ते थे। न्यूजपेपर के आर्टिकल्स भी अक्सर पढ़ते थे। न्यूज चैनल्स पर भी नजर रहती थी उनकी। कई बार फोन करके पत्रकारों को बताते थे कि आपका फलां शो बढ़िया रहा या फलां शो ठीक नहीं था। मैं तो उनमे एक अच्छा एडिटर भी देखता था, वे खबरें पर बारीकी से नजर रखते थे।

एक और चीज जो अरुण बहुत पसंद करते थे, वो था क्रिकेट। जब वो वित्तमंत्री थे और अगर कोई क्रिकेट मैच चल रहा हो तो उनके एक टीवी पर बिजनेस चैनल और दूसरे पर स्पोर्ट्स चैनल हमेशा चलता मिलता था। मुझे याद है कि जब सहवाग दिल्ली की टीम का हिस्सा बने थे, तो जेटली ने मुझसे कहा था कि ये लड़का एक दिन नेशनल टीम में खेलेगा।

एक बड़ी बात ये भी है कि जब कोई मुसीबत में होता और उनके पास जाता, तो वे हमेशा मदद करते। मुझे पता है कि कई पत्रकार-संपादकों के कहने पर उन्होंने कई मुसीबत के मारे लोगों की सहायता की है। वे अपने स्टाफ का भी बहुत ध्यान रखते थे। स्टाफ के लोगों के परिवार की भी पूरी मदद करते थे। अरुण जेटली खाना खिलाने और मदद करने के लिए हमेशा त्तत्पर रहते थे।  

अगर एक लाइन में कहूं तो अरुण जेटली मास लीडर भले ही न बने हो, लेकिन वो ऐसे पॉलिटिकल ऑलराउंडर थे जिन्होंने सबका साथ, सबका विश्वास अपने जीवन में हमेशा आगे रखा। पार्टी से लेकर परिवार तक, पत्रकारों से लेकर वकीलों तक, सब उनकी दुनिया में शामिल थे। 

बड़ा दिल, बड़ी शख्सियत, जो दोस्ती निभाना जानते थे।
(अभिषेक मेहरोत्रा से बातचीत पर आधारित)

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वरिष्ठ पत्रकार शिशिर सिन्हा की कलम से- जेटली सर की बातें

सच मानिए तो जेटली सर के जीते जी उनके साथ औपचारिकता निभाना दरअसल सबसे कठिन काम था। और हो भी क्यों नहीं, क्योंकि वो आपचारिकता में यकीन ही नहीं करते थे और उनसे भावनाएं जुड़ गयीं

Last Modified:
Sunday, 25 August, 2019
Arun jaitley

कोई भी हमेशा नहीं रहेगा। कल कोई गया, आज कोई और कल कोई और जाएगा। हम पत्रकारों के लिए अपनी पेशेवर जिंदगी में आम जिंदगी के इस फलसफे का मतलब बस इतना ही है कि जैसे ही किसी नामचीन के जाने की सुगबुगाहट हुई, हम श्रद्धांजलि कॉपी तैयार कर लेते हैं और आधिकारिक घोषणा हुई नहीं कि उसे अपने माध्यम पर सार्वजनिक कर देते हैं। मैने अपने 25 साल की पत्रकारिता में ना जाने कितनी बार ऐसा किया होगा, लेकिन अबकी बार पहला मौका था जब पहले से ऐसी कॉपी लिखने के लिए कोई इच्छा ही नहीं थी। मजबूरी में कुछ लिखा भी तो वो बस अपनी आधिकारिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए एक औपचारिकता भर निभा दी। 

सच मानिए तो जेटली सर के जीते जी उनके साथ औपचारिकता निभाना दरअसल सबसे कठिन काम था। और हो भी क्यों नहीं, क्योंकि पहली बात तो ये कि वो आपचारिकता में यकीन ही नहीं करते थे और दूसरी बात ये कि उनसे भावनाएं जुड़ गयीं। हमारे लिए जेटली सर बस एक केंद्रीय मंत्री या भाजपा के वरिष्ठ नेता ही नहीं थे, कुछ हटकर थे। क्या थे, पता नहीं, बस बहुत कुछ थे।

हमारी वैसे पहली मुलाकात तो वाजपेयी जी की सरकार के दौरान हुई थी, लेकिन उस समय वाणिज्य या विधि मंत्रालय से हमारा ज्यादा ताल्लुक नहीं था, इसीलिए आधिकारिक आयोजनों के दौरान कुछ बातें हो जाती। 2004 से 2014 के दरम्यान जब वो विपक्ष में रहे तो आर्थिक मुद्दों पर कभी विपक्ष की प्रतिक्रिया लेनी होती थी तो हम उनसे मिलते थे। बस तब इतना ही नाता था। लेकिन 2014 के आम चुनाव के नतीजे आने के बाद और सरकार के गठन के साथ ही जेटली सर कुछ हटकर हो गए।

नयी सरकार के गठन के बाद पेशेवर जिंदगी में हालात बेहद चुनौतीपूर्ण हो गए। बस आम रिपोर्टिंग कर पा रहे थे, अखबार के लिए विशेष साक्षात्कार वगैरह नहीं हो पा रहा था। इस बीच आकाशवाणी के लिए वित्त मंत्री के तौर पर जेटली सर का साक्षात्कार करने का मौका मिला। सब कुछ ठीक से हो गया। अब बारी थी अपने अखबारी संस्थान के लिए खास साक्षात्कार की बात करने की। बात की, लेकिन नाकाम रहा। कुछ समय बाद अखबार छोड़ एक टीवी न्यूज चैनल में आर्थिक संपादक के तौर पर नियुक्त हुआ। अब भी कहानी पुरानी थी। जेटली सर बात करते, लेकिन बात जब एक्सक्लूसिव इंटरव्यू वगैरह की आती, तो बात ही बदल जाती।

इस बीच, चाहे संसद का केंद्रीय कक्ष हो, संसद परिसर में उनका दफ्तर या नॉर्थ ब्लॉक में उनका दफ्तर, हर जगह उनसे मिल तो लेता था, कभी अकेले तो कभी कुछ खास मित्रों के साथ और कभी सभी के साथ। खबर मिलती, ढेर सारी गप-शप होती, लेकिन उसके आगे कुछ नहीं। जब भी मिलता तो वो कहते, “और सिन्हा....क्या चल रहा है..”। कभी मेरा पहला नाम नहीं लिया, लेकिन कभी इसकी जरुरत ही महसूस नहीं हुई। 

एक दिन अचानक, हम और राहुल श्रीवास्तव सर (इडिया टुडे वाले) उनके नॉर्थ ब्लॉक के दफ्तर में बैठे थे। फिर हमने बात साक्षात्कार की छेड़ दी। वो चुप रहे। फिर राहुल सर ने कहा,”आखिर आपको शिशिर को इंटरव्यू देने में परेशानी क्या है?” कुछ समय के लिए जेटली सर चुप रहे, फिर अचानक बोले,   'दे दूंगा'। कैसे मन बदला, पता नहीं। जानने की जरुरत भी नहीं। वित्त मंत्रालय के एक रिपोर्टर के लिए विशेष मौकों पर वित्त मंत्री का साक्षात्कार सबसे अहम होता है और मेरे लिए बस इतना ही जरुरी था। वैसे पहले साक्षात्कार का अनुभव बेहद ही रोमांचक था। उत्तराखंड में विधान सभा चुनाव के ऐन पहले आम बजट पेश होने के अगले ही दिन भाटिया साब (एस पी भाटिया जी, जेटली सर के निजी स्टाफ) ने शाम को कहा, “साब देहरादून में इंटरव्यू देंगे, आप वहां जा सकते हैं?” हां कहने में एक मिनट की देरी नहीं लगायी। देर रात, अपने कैमरा सहयोगियों और सीएनबीसी आवाज वाले लक्ष्मण के साथ हम देहरादून रवाना हो गए।

सुबह-सुबह हम देहरादून में थे। नौ बजे जेटली सर का आगमन होटल पैसेफिक में हुआ। दो कमरे वाले स्यूट में उनके ठहरने का इंतजाम था। हमने जानना चाहा कि हम कहां पर इंटरव्यू के लिए सेटअप लगा सकते हैं, उन्होंने कहा स्यूट के बाहर वाले कमरे में। अब टीवी का सेट अप जब लगता है तो कैमरे के लिए कमरे की ऐसी-तैसी हो जाती है, वहां भी ऐसा ही हुआ। जेटली सर, इस बीच, प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए होटल से बाहर निकले। जब लौट कर आए बेहद गुस्से में थे और कमरे की हालत देख तो उनका गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुंचा।

हमारा, लक्ष्मण और हमारे सहयोगियों को काटो तो खून नहीं। तुरंत हमने तय किया, सब कुछ कमरे में छोड़ बाहर निकल लिए। साक्षात्कार की बात तो भूल ही गए। फिर बाहर आए गोपाल भंडारी (जेटली सर के साथ साये की तरह रहने वाले)। “बस पांच मिनट,” गोपाल ने बस इतना ही कहा। अंदर गए और फिर पता नहीं क्या हुआ। जेटली सर ने हमें बुलावा भेजा और सबसे पहले पूछा,”खाना खाया?” हमने झूठ कहा, हां, तब जाकर उन्होंने हम तीन चैनल – सीएनबीसी आवाज, जी बिजनेस और एबीपी न्यूज को बारी-बारी से साक्षात्कार दिया। उसके बाद तो हर साक्षात्कार के पहले इतना जरुर याद करते थे कि देहरादून में क्या हुआ था।

हमारी पेशेवर जिंदगी में एक बड़ा मुकाम तब आया जब पहली जुलाई 2017 (सनदी लेखाकार दिवस यानी सीए डे) के दिन प्रधानमंत्री के आगमन के ऐन पहले हजारों की भीड़ के सामने इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम में मुझे और दीपशिखा (इकोऩॉमिक्स टाइम्स) को जेटली सर के जीवंत साक्षात्कार का मौका मिला। याद है मुझे, साझात्कार के ऐन पहले हमने उनसे जानना चाहा कि सवालों का क्या क्रम रखा जाए, उनका जवाब था, 'तुमलोग जैसा चाहो।'

इस साल हिंदू बिजनेस लाइन के सालाना कार्यक्रम में उनके घर से होटल लाने कि जिम्मेदारी मुझे सौंपी गयी। अपने ड्राइंग रुम से पोर्टिको में आए और सीधे कहा, 'मेरे साथ मेरी गाड़ी में बैठो।' इस कार्यक्रम में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह विशिष्ठ अतिथि थे। चुनावी माहौल में एक मंच पर इन दो शख्सियत का आना, एक बहुत ही बड़ी खबर थी। लेकिन जेटली सर ने इस शर्त पर न्यौता स्वीकारा कि वो डॉ सिंह की नीतियों को लेकर उनके सामने कोई आलोचना नहीं करेंगे। आसान नहीं था एक राजनीतिज्ञ के लिए किसी मंच को राजनीतिक बनाने से चुकना और वो भी चुनाव के बीच, लेकिन जेटली सर ने व्यक्तिगत संबंध और सम्मान को राजनीतिक मतभेदों से ऊपर रखा। रास्ते में उन्होंने इस बात को दोहराया।

काफी लंबी लिखाई हो गयी है। क्षमा चाहते हैं। क्या करें, जब व्यक्त्तित्व हटकर हो जाता है तो उसे शब्दों की सीमा में बांधा नहीं जा सकता। और हां, ये श्रद्धांजलिवाली कॉपी नहीं है, बस कुछ बातें हैं, वो बातें जो उन्होंने मेरे साथ की।

धन्यवाद जेटली सर, समय और साथ देने के लिए।

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इकनॉमी पांच ट्रिलियन पहुंचानी है तो ऐसे शुरुआती 'कष्ट' सहने होंगे'

किसी भी देश की अर्थव्यवस्था की रीड की हड्डी उद्योग होते हैं। अब उद्योग खड़ा करना लगभग असम्भव हो गया है

Last Modified:
Saturday, 24 August, 2019
Real Estate

पूरन डावर, प्रखर चिंतक एवं विश्लेषक ।।

मुझे लगता है कि आज भारत की मंदी का सबसे बड़ा कारण रियल एस्टेट है। पिछले एक दशक में लोगों न केवल बचत, बल्कि ब्याज पर लेकर भी पैसा रियल एस्टेट में लगाया। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर बैठता गया। सबसे बड़ा रोजगार रियल एस्टेट ब्रोकर का बन गया। सबसे अधिक रोजगार रियल एस्टेट में रहे। अव्वल तो किसी को फैक्टरी लगाने के लिये जमीन आसमान के भाव पर मिलती थी, जिसे वह खरीद नहीं पाता था। खुदा न खास्ता किसी ने खरीद भी ली, तो जब तक बनाने का समय आता तो दोगुने दाम पर बिक जाती थी। लेकिन यदि उद्योग खुल गया तो उस निवेश और ब्याज दर पर टिकना सम्भव नहीं। हुंडी के कारोबार ने भी जोर पकड़ा। बिल्डरों के पास हुंडी का पैसा, मोटी ब्याज, अगले दस साल की बढ़त पहले ही जुड़ी होती थी। हर आदमी अपनी बढ़ी हुयी कीमतों को लगाकर खुश रहता था, खुलकर खर्च करता था।

पिछले दो दशक ऐसे भी रहे हैं, जहां हर चीज जायज थी। लगता ही नहीं था कि भ्रष्टाचार भी कुछ होता है। घोटालों के कारण काली अर्थव्यवस्था का भी बोलबाला था। बाजार में पैसे की कमी नहीं थी। लगता था कि स्विस बैंक का पैसा मॉरीशस एवं अन्य मार्गों से भारत वापस आ रहा था। कुल मिलाकर अर्थव्यवस्था में तरलता में कोई कमी नहीं थी।

आखिर कब तक ऐसा चलता। एक दिन तो यह भांडा फूटना ही था। रियल एस्टेट का ग़ुब्बारा फूट गया। किसी भी देश की अर्थव्यवस्था की रीड की हड्डी उद्योग होते हैं। अब उद्योग खड़ा करना लगभग असम्भव हो गया, तरलता समाप्त हो गई। पैसा रियल एस्टेट में डूब गया। हुंडी वालों ने हाथ खड़े कर दिए। सरकार के सुधारात्मक कदमों ने हर तरफ से हाथ बांध दिए। पहले बाजार की एंट्री पर काम कर लेते थे, कैश जमा कर लेते थे। परिवार या मित्रों से ऋण ले लेते थे या दिखा देते थे, आज ये सारी जुगाड़ें समाप्त हो गईं।

बैंकिंग व्यवस्था ने सबक़ नहीं लिया। नोटबंदी का समय हो या एनपीए (Non Performing Asset) पर एक्शन का,  अच्छा होता कि सही सोच के साथ काम होता। ऐसे ऋण जो राजनैतिक आधार या भ्रष्ट आचरणों पर दिए जाते थे, उन पर लगाम लगती। आज वास्तविक और प्रामाणिक उद्यमियों के ऋण पर रोक लगा दी गयी। रही सही तरलता भी समाप्त कर दी गयी, विधिक रास्ता भी सिकुड़ गया।

सरकार की मंशा पर कोई संदेह नहीं कर सकता। सरकार आज सिस्टम से आम आदमी के मुकाबले ज्यादा जूझ रही है। मैं समझता हूं कि शायद ही कोई सरकार अर्थव्यवस्था पर इतनी संजीदा रही हो, जितनी मोदी सरकार। हर दिन के हिसाब से आंकड़े, हर रोज नए प्रयास। नए सुधार। नयी रियायतें। नए मोर्चे नयी योजनाएं। नये उत्साहवर्धक नारे। कभी चार कदम आगे और कभी दो कदम पीछे।

सरकार पर आरोप लगाने से पहले हमें सोचना होगा। अपनी कार्यप्रणाली पर आत्ममंथन करना होगा। सरकार वह हर प्रयास कर रही है, जिससे आर्थिक अनुशासन बना रह सके। इसके लिए रेरा जैसे कदम भी उठाए गए हैं। ऐसी सारी रुकावटें प्रारम्भ में परेशान कर सकती हैं, लेकिन एक बार इनसे निकल गए तो अर्थव्यवस्था को पांच ट्रिलियन पहुंचने से कोई नहीं रोक सकता और इन उपायों के बिना पहुंचा नहीं जा सकता।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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'आज पत्रकारिता से जुड़े इन सवालों का सामूहिक रूप से उत्तर तलाशने की जरूरत है'

पत्रकार अगर समस्या के ऊपर लिख देता था तो प्रशासन उस पर कार्रवाई करता था और अगर कार्रवाई नहीं करता था तो सरकार कार्रवाई करने के लिए दबाव डालती थी

Last Modified:
Saturday, 24 August, 2019
Santosh Bhartiya

संतोष भारतीय, वरिष्ठ पत्रकार।।

हमारा समाज विकासशील है, परिवर्तनशील है, लेकिन अब तक हम यह मानते थे की दिशाएं परिवर्तनशील नहीं हैं। सूरज हमेशा पूरब से निकलता है और सफेद को सफेद ही कहते हैं और काले को काला। इसी तरह लोकतंत्र, तानाशाही, अमीरी, गरीबी और पत्रकारिता की परिभाषाएं लगभग स्पष्ट हैं, भले ही भाषा कोई भी हो या देश कोई भी हो, लेकिन लगता है अब यह परिभाषाएं भी परिवर्तनशील हो गई हैं। पत्रकारिता कैसी करें, किस विषय पर करें, यह व्यक्तिगत या संस्थान का निर्णय हो सकता है, लेकिन पत्रकारिता क्या है, यह विवाद का विषय कम ही रहा है, लेकिन आज लगता है यह मान्यता भी बदल रही है या बदल गई है।

पत्रकारिता के बारे में यह मान्यता थी, विशेषकर आम लोगों में कि जब कहीं सुनवाई न हो, तब पीड़ित व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह अगर पत्रकार के पास पहुंच जाए और पत्रकार उनकी समस्या सुनकर इसका संज्ञान ले ले तो विश्वास था कि उनकी समस्याएं समाधान की तरफ बढ़ जाएंगी। यह विश्वास गलत भी नहीं था और यह हमारे देश में होता भी था। पत्रकार अगर समस्या के ऊपर लिख देता था तो प्रशासन उस पर कार्रवाई करता था और अगर कार्रवाई नहीं करता था तो सरकार कार्रवाई करने के लिए दबाव डालती थी। इस स्थिति के गवाह बहुत सारे पत्रकार अभी हमारे बीच में हैं।

उन दिनों चाहे जिला प्रशासन हो या प्रदेश का शासन, पत्रकारों को अनदेखा नहीं कर पाता था। हर एक को जनता के बीच अपनी छवि खराब होने की आशंका डराती रहती थी। झूठ बोलने या भटकाने वाली कार्रवाई करने वाला व्यक्ति चौकन्ना रहता था कि कहीं उसकी कार्रवाई की खबर पत्रकारों को न मिल जाए। पत्रकार भी दबाव सहते थे, धमकी का सामना करते थे, लेकिन कुछ लोग सही लिखने की हिम्मत रखते थे। कौन पीड़ित है या कौन दबाया हुआ है, उनकी पहली कोशिश इसे तलाशने की रहती थी। उस समय भी कौन अधिकारियों के साथ या मंत्रियों के साथ ज्यादा दिखाई देता है या उनके साथ ज्यादा उठता-बैठता है या कौन सिर्फ प्रशासन या सरकार का पक्ष लेकर लिखता है, पीड़ित व्यक्ति या समूह के खिलाफ अभियान चलाता है, लोगों की नजर में आसानी से आ जाता था। उसकी क्रेडिबिलिटी पर सवाल उठ जाता था।

अब हालात बदल गए हैं। नई परिभाषाएं लिखी जाने लगी है। ऐसे पत्रकारों की संख्या बढ़ने लगी है जो जनता की तरफ से नहीं, बल्कि सत्ता की तरफ से रिपोर्ट करना, सवाल करना, तथ्यों का निर्माण करना ही पत्रकारिता मानते हैं। बात इससे आगे बढ़ गई हैं। न्यूज चैनल्स के अधिकांश एंकर तो सत्ता के ऐसे वकील बन गए हैं जो सत्ता के पक्ष में तर्क तो निर्मित करते ही हैं, बल्कि ऐसे तेवर अपनाते हैं जिससे वे पार्टी के प्रवक्ता के तर्कों को और ज्यादा धार दे सकें। इनकी नजर में जो पार्टी की लाइन है, वही परम सत्य है और जो भी उसका विरोध करता है, वह इनके लिए निशाना बन जाता है।

अद्भुत ज्ञान से भरे यह महान पत्रकार, पत्रकारिता का ऐसा चेहरा बन रहे हैं जो पत्रकार बनने वाले नए पत्रकारों का आदर्श बनते जा रहे हैं। इनके लिए अंग्रेजों के जमाने में वायसराय के पक्ष की पत्रकारिता करने वाले दुर्गा दास जी आदर्श हैं, लेकिन गणेश शंकर विद्यार्थी उनके लिए घृणा के पात्र हैं। इन महान ज्ञानी , आदर्शों की नई परिभाषा करने वाले पत्रकारों को आजादी के बाद प्रभाव डालने वाले और सही रिपोर्ट करने वाले पत्रकारों के नाम भी नहीं मालूम होंगे। यह शायद प्रभाष जोशी और अजीत भट्टाचार्जी जैसे पत्रकारों को गलत मानते होंगे, जिन्होंने आपातकाल लागू होने के बाद संपादकीय स्थान को खाली छोड़ दिया था। यह केवल दिल्ली में नहीं हुआ था, बल्कि देश में कई जगह हुआ था।

कुलदीप नैयर जैसे जेल में जाने वाले पत्रकारों की एक लंबी सूची है, जिसमें बनारस के श्यामाप्रसाद प्रदीप जैसे नाम शामिल हैं। शायद इन्होंने सत्ता का विरोध कर गलत काम किया, कम से कम आज टीवी की पत्रकारिता करने वाले लोग यही मानते होंगे। इन्हें भी आपातकाल का या उस समय की सत्ता का समर्थन करना चाहिए था और सत्ता के समर्थन में तर्क गढ़ने चाहिए थे, कम से कम आज की पत्रकारिता का ट्रेंड तो यही बताता है।

यह बात कही जा रही है कि राजीव गांधी और वीपी सिंह के समय ऐसी पत्रकारिता प्रारंभ हुई, जिसमें पत्रकारों ने एक पक्ष का खासकर वीपी सिंह का साथ देना शुरू किया। जो लोग यह तर्क देते हैं, उनके ज्ञान की प्रशंसा करनी चाहिए। हमें तो यह मालूम है कि जब वीपी सिंह और राजीव गांधी के मतभेद शुरू हुए, तब देश का 90% मीडिया राजीव गांधी का समर्थन कर रहा था। वीपी सिंह को रिपोर्ट करने में लोगों की रुचि नहीं थी, लेकिन जैसे-जैसे पत्रकारों के सामने यह साफ होने लगा कि रक्षा सौदों में कुछ गड़बड़ी हुई है, वीपी सिंह को ज्यादा स्थान मिलने लगा। न राजीव गांधी की तरफ से पत्रकारों पर दबाव था कि उनके पक्ष में लिखा जाए और न ही जब वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने, तब उनकी ओर से कहीं दबाव डाला गया कि उनके पक्ष में लिखा जाए।

लेकिन आज ऐसा माहौल बन गया है, जिसे न्यूज चैनल्स ने बना दिया है कि कोई भी पत्रकार विपक्ष को रिपोर्ट करना अपनी नौकरी के लिए खतरा मानने लगा है। सवाल विपक्ष को रिपोर्ट करने का नहीं है। सवाल विषय के दोनों पहलू पाठकों के सामने या दर्शकों के सामने लाने का है तथा लिखने वाला या एंकर किसी का वकील नहीं है, यह भी महत्वपूर्ण है। अंग्रेजी हो या हिंदी, पत्रकारों का बड़ा वर्ग अपने को इस स्थिति में बहुत असहज महसूस कर रहा है। अगर मैं विनोद दुआ, अशोक वानखेड़े, अभय दुबे, उर्मिलेश, सीमा मुस्तफा की बात करूं, या फिर पुण्य प्रसून बाजपेयी, अभिसार या परंजय गुहा ठाकुर्ता की बात करूं तो क्या यह संदर्भ से अलग होगा?

मैं सिर्फ दिल्ली की बात करूं तो अन्याय होगा। लखनऊ में ज्ञानेंद्र शर्मा, रामदत्त त्रिपाठी, दीपक गिडवानी सहित बहुत से पत्रकार देश की स्थिति और मीडिया की स्थिति को लेकर चिंतित हैं। यह चिंता भोपाल, पटना, जयपुर, कोलकाता, नागपुर, पुणे और मुंबई सहित दक्षिण में भी है। राजेश बादल तथा विनोद अग्निहोत्री जैसे पत्रकार बनारस में भी बहुत हैं। मैं कह सकता हूं कि काशी पत्रकार संघ भी पत्रकारिता की स्थिति को लेकर बहुत चिंतित है।

कश्मीर में अरनब गोस्वामी, सुधीर चौधरी, अंजना ओम कश्यप और रोहित सरदाना जैसे महान पत्रकारों को वहां जाकर रिपोर्ट करनी चाहिए। कुछ पत्रकार गए थे, जिन्होंने खाली सड़कें दिखाकर कहा कि कश्मीर में सब सामान्य है। इसके ऊपर अशोक वानखेडे का कमेंट मजेदार है कि स्कूल खुले हैं लेकिन छात्र नहीं हैं, मस्जिद खुली हैं, लेकिन नमाज ही नहीं हैं।  भारत में हम वहां के फुटेज नहीं देख सकते, उन्हें देखने के लिए अल जजीरा या बीबीसी जैसे विदेशी चैनलों को देखना पड़ता है। कश्मीर के पत्रकारों की रिपोर्ट या उनसे बात करना दूभर हो गया है। सिद्धांत हो गया है कि जो सरकार कहे, वह देश प्रेम है, कम से कम न्यूज चैनल देश को यही बता रहे हैं।

इस सारी स्थिति पर बात करना या बहस करना भी क्या आज पत्रकारिता के सिद्धांतों के विपरीत हो गया है? यह सवाल बहुतों के दिमाग में उठ रहा है। इस तरह के सवालों का सामूहिक रूप से उत्तर तलाशने की आवश्यकता है। देखना है कि जो दूसरों के सवालों का उत्तर तलाशने का जिम्मा अपने कंधे पर लिए हुए हैं, वे अपने सवालों का उत्तर तलाश पाते हैं या नहीं?

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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मिस्टर मीडिया: मत भूलिए कि अदालती कार्रवाई के लिए पर्याप्त है इस तरह की कवरेज

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल ने उठाया बड़ा सवाल, हम वह व्यवहार किसी के साथ क्यों कर रहे हैं, जो हमें अपने लिए स्वीकार नहीं

Last Modified:
Friday, 23 August, 2019
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

इंसान को जानवरों से इसलिए अलग कहा जा सकता है, क्योंकि उसके पास खुद को अभिव्यक्त करने की कला है। भाषा है, बोली है, कलम है। इनके अलावा और भी अनेक प्रतीक हैं। इस अभिव्यक्ति का मूल आधार विवेक और विचार हैं, लेकिन हाल के दिनों में जिन बड़ी घटनाओं की कवरेज देखने को मिली है, वह हमारे विचार, विवेक और अभिव्यक्ति की क्षमता पर सवाल खड़े करती है।

बात और स्पष्ट करता हूं। पूर्व मंत्री और कांग्रेस के दिग्गज नेता पी चिदंबरम को 21 अगस्त को गिरफ्तार किया गया। उसके पहले और बाद में टीवी व सोशल मीडिया पर कवरेज और उसकी भाषा देख लीजिए। क्या इसमें मीडिया के इन अवतारों ने बुनियादी शिष्टाचार और पत्रकारिता के सिद्धांतों को तार-तार नहीं कर दिया?

भूल जाइए कि गिरफ्तार व्यक्ति कांग्रेस, बीजेपी या किसी अन्य राजनीतिक दल का नेता है। भूल जाइए कि वह देश का गृहमंत्री या वित्त मंत्री रहा है। भूल जाइए कि उस पर गंभीर आरोप हैं। सिर्फ यह याद रखिए कि उस व्यक्ति को भी भारतीय संविधान के तहत मौलिक अधिकार प्राप्त हैं और उस पर आरोप साबित नहीं हुए हैं। जिस व्यक्ति पर अपराध सिद्ध नहीं हुए हैं, उसे मीडिया में अपराधी कहना या अपराधियों के लिए इस्तेमाल करने वाली भाषा का प्रयोग करना भी अपराध है। यहां तक कि मुजरिम सिद्ध हो चुके किसी व्यक्ति के खिलाफ़ भी इस तरह कवरेज नहीं कर सकते। साफ तौर पर मानहानि का सिद्ध अपराध मीडिया कर रहा है। यह अधिकार हमें किसने दिया है?

कल्पना कीजिए कि उस व्यक्ति के स्थान पर आप खुद हैं अथवा आपका बेटा,पत्नी, पिता,माता या भाई-बहन हैं तो अपने या उनके खिलाफ इस तरह का प्रचार, उसकी भाषा और उसका अंदाज कितना पसंद करेंगे। शायद रत्ती भर भी न करें। तो हम वह व्यवहार किसी के साथ क्यों कर रहे हैं, जो हमें अपने लिए स्वीकार नहीं। मत भूलिए कि बीते दिनों की कवरेज हम मीडियाकर्मियों के खिलाफ अदालती कार्रवाई के लिए पर्याप्त है।

कवरेज का यह तरीका पत्रकारिता खासकर टेलिविजन के मानक सिद्धांतों का उल्लघंन है। इस बेशर्म कवरेज से इस पेशे में आने वाली नस्लों को हम क्या सबक देना चाहते हैं? यह कि उनकी पुरानी पीढ़ी कितनी गैर जिम्मेदार और अपने सरोकारों से कितनी भटकी हुई थी। इस तरह की रिपोर्टिंग के लिए तो कोई दबाव नहीं होता। उत्साह या आवेग में आकर हम अपने काम का चरित्र ही बदल दें, यह ठीक नहीं है। पत्रकारिता की स्वतंत्रता और स्वच्छंदता में फर्क करना सीखिए मिस्टर मीडिया!

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

मिस्टर मीडिया: यह कार्यशैली दिखाती है पत्रकारों का अधकचरापन

मिस्टर मीडिया: अनुच्छेद 370: मीडिया कवरेज से दिल बाग-बाग नहीं हुआ

मिस्टर मीडिया: एक बार फिर इसी सत्याग्रह की जरूरत है

संपादक की दुविधा हम समझते हैं, पर कोई समाधान निकालिए मिस्टर मीडिया!

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