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रवीश जी, क्या पीएम के इंटरव्यू के बिना लोग आपको पत्रकार मानने से मना कर देंगे?

काफी पहले से ही मैंने टीवी न्यूज देखना छोड़ दिया है। पत्रकार हूं, फिर भी

समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago

शशि शेखर
वरिष्ठ पत्रकार।।


प्रिय रवीश कुमार,
आपकी सलाह से काफी पहले से ही मैंने टीवी न्यूज देखना छोड़ दिया है। पत्रकार हूं, फिर भी। हालांकि, खबर मिस नहीं करता। इस वजह से कल रात भी आपका प्राइम टाइम नहीं देखा। लेकिन, सोशल मीडिया पर काफी चर्चा थी कि आपने एक गैर राजनीतिक प्राइम टाइम किया है, जिसमें आम पर काफी चर्चा है तो उसे यूट्यूब पर देख लिया। मुझे कोई हैरानी नहीं हुई। उल्टे मेरी धारणा और मजबूत हुई। धारणा ये कि जहां ‘नेशन वांट्स टू नो’ वाला पत्रकार ये समझता है कि आसमान गिरेगा तो वही थामेगा, इसलिए रात को पैर ऊपर करके सोना चाहिए, वहीं आप भी इस भरोसे के शिकार हो गए हैं कि भारतीय पत्रकारिता के गिरते स्तर को आप ही अकेले हैं, जो उठा सकते हैं।

मोदी ने अक्षय कुमार को इंटरव्यू क्या दिया, आपने एनडीटीवी जैसे नेशनल चैनल के एक घंटे के महत्वपूर्ण प्राइम टाइम को अपने व्यंग्यपूर्ण कॉमेडी के लिए खर्च कर दिया। ऐसा भी कह सकते हैं कि आपने अपनी कुंठा के नाम इस एक घंटे को बर्बाद कर दिया। ऐसे भी कह सकते हैं कि आपने इस एक घंटे को अपनी अवधारणा पर आधारित पत्रकारिता के नाम गंवा दिया। अभी 17 मार्च को आपको कॉंस्टीट्यूशन क्लब में स्वर्गीय आलोक तोमर की स्मृति में व्याख्यान देते सुना। बहुत सारी अनर्थपूर्ण बातों के बीच आपने एक अर्थपूर्ण बात की। आपने कहा कि आज मीडिया में सूचना नहीं है, भाव है, तो कल के आपके प्राइम टाइम में न तो सूचना थी, न भाव। वह विशुद्ध रूप से सिर्फ और सिर्फ कुंठा/हताशा का सार्वजनिक भौंडा प्रदर्शन था। आप, बचिए इससे। यह आपको मनोरोगी बना देगा। डेफिनेटली। मेरे इलाके से आते हैं आप, सो आपकी चिंता है।

आप खुद को विक्टिम बनाने की पुरजोर और हरसंभव कोशिश करते है। आपके शो में भाजपा नेता नहीं आते, सिर्फ इसलिए नहीं कि वे आपसे डरते है और भी कई ज्ञात-अज्ञात कारण होंगे। वैचारिक भिन्नता का भी असर हो सकता है। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के भी कई नेता कई चैनलों पर नहीं जाते। ये एक नया लेकिन खतरनाक ट्रेंड है। क्यों है, इसकी वजह आप ही बेहतर बता सकते हैं। लेकिन, आप इस घटना को ऐसे व्याखित करेंगे कि दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी ने आपका बायकाट किया है तो लगता है कि रवीश कुमार खुद को विक्टिम बनाने की कोशिश कर रहा है। मैंने जो संभावना जताई है कि आप आत्मकामी बन सकते है, वो यूं ही नहीं है। आत्मकामी माने नार्सिसिस्ट। एक किस्म का मनोरोग है, जिसमें इंसान का खुद के प्रति लगाव इतना बढ़ जाता है कि उसे दूसरों की परवाह नहीं रहती। आपने खुद भी अपने एक प्राइम टाइम में कहा था कि भारत के ज्यादातर लोग मनोरोग से पीड़ित हैं, होता बस ये है कि लोगों को पता नहीं चलता, जिन्हें पता चल जाता है, वे इसे स्वीकारते नहीं। मुझे लगता है, आपको अपना रोग ही नहीं पता, इसलिए, आपको आपका रोग बताने की धृष्टता कर रहा हूं। संभल जाइए, वर्ना आत्ममुग्धता से आगे आत्मकामी नाम का मनोरोग आपका इंतजार कर रहा है।

कल के प्राइम टाइम में आपने कहा कि लोगों ने मोदी से कहा कि ‘कुमार’ (Ravish Kumar) को इंटरव्यू दे दो तो उन्होंने अक्षय कुमार को इंटरव्यू दे दिया। आपको ऐसा क्यों लगता है कि मोदी आपसे डरकर आपको इंटरव्यू नहीं दे रहे हैं? और ऐसा क्यों है कि एक पत्रकार एक पीएम के इंटरव्यू के लिए मरा जा रहा है? क्या पीएम के इंटरव्यू के बिना आपकी पत्रकारिता अपूर्ण रह जाएगी। लोग आपको पत्रकार मानने से मना कर देंगे? फिर तो रूबिका लियाकत को देश के सर्वश्रेष्ठ पत्रकारों में शुमार किया जाना चाहिए, जिन्हें पीएम मोदी ने इंटरव्यू दिया और जिन्हें अपने ट्वीट में पीएम मेंशन करते हैं। अंत में, अपनी कुंठा और अवधारणा को पत्रकारिता मानने से परहेज कीजिए। फिर से वहीं कहूंगा जो आपने कहा था कि आज मीडिया में भाव है, सूचना नहीं। तो, सूचना का भंडार आपको भेज रहा हूं। कुछ ढंग की पत्रकारिता कीजिए। एक घंटा टीवी पर सब ज्ञान पेलते हैं। आप भी पेलते हैं। बस भाषा-विचार-भाव का अंतर होता है। इस अंतर को खबर से पाटिए। Wada Faramoshi पढ़िए।

आपका शुभेच्छु
शशि शेखर

(वरिष्ठ पत्रकार शशि शेखर की फेसबुक वॉल से)


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