मिस्टर मीडिया: पत्रकार कोई ग़रीब की जोरू नहीं है नेता जी!

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अपनी पत्रकार वार्ता में एक पत्रकार के सवाल पूछने पर जो व्यवहार किया, वह परदे पर लाखों लोगों ने देखा

RAJESH BADAL by RAJESH BADAL
Published - Thursday, 25 April, 2019
Last Modified:
Thursday, 25 April, 2019
Rajesh

अपने आपको समझते क्या हैं नेता जी? सवाल पसंद न आए तो कुछ भी बोलेंगे आप? संभव है कि आप और आपके जैसे दूसरी पार्टियों में मौजूद नेताओं ने मीडिया के एक वर्ग को चांदी के सिक्कों में तौला हो, लेकिन अभी भी देश के पत्रकारों का आत्मसम्मान बचा है नेताजी! आप उसे ग़रीब की जोरू समझेंगे तो घाटे में रहेंगे। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अपनी पत्रकार वार्ता में एक पत्रकार के सवाल पूछने पर जो व्यवहार किया, वह परदे पर लाखों लोगों ने देखा। उस पत्रकार को उन्होंने क्या-क्या नहीं कहा? सार्वजनिक रूप से अपमान की हद पार कर गए। क्या समाजवादी पार्टी के भीतर लोकतंत्र के चौथे स्तंभ से निपटने का यही तरीक़ा बचा है।

जब पार्टी का मुखिया इस तरह की दादागीरी दिखाए तो पार्टी के दूसरे छुटभैये,पत्रकारों के साथ क्या व्यवहार करेंगे-आप कल्पना कर सकते हैं। एक और कद्दावर नेता आज़म ख़ां तीन दिन पहले मध्यप्रदेश में थे। समाजवादी नेता मुनव्वर सलीम के अंतिम संस्कार में शिरकत करने गए थे। पत्रकारों ने उनसे जयाप्रदा वाले बयान को लेकर तीख़े सवाल कर लिए। मूर्खतापूर्ण उत्तर दिया, ’आपके वालिद के मातम में आया था।‘ एक सप्ताह में दो समाजवादियों के बयान। दोनों ही मीडिया के ख़िलाफ़। दोनों बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों की हरकतों के बारे में इसी स्तंभ में पहले लिखा जा चुका है। अब प्रश्न है कि क्या इस देश के राजनेताओं के दिमाग़ की सड़ांध निकालने का कोई उपाय शेष है?

एक तो सार्वजनिक मंचों पर आप लोग घटिया और शर्मनाक भाषा बोलते हैं। फिर यह भी चाहते हैं कि मीडिया उसका प्रोपेगंडा करे। हिमाचल में एक नेता अपनी सभा में माइक पर खुल्लमखुल्ला माँ की गाली देता है। उत्तर प्रदेश में कोई मतदाताओं को सीधे-सीधे धमकी देता है। मध्यप्रदेश में लालच देता है। गुजरात में पत्रकारों को सड़कों पर आना पड़ा। तमिलनाडु में भी ऐसा ही हुआ। छत्तीसगढ़ में बीजेपी के दफ्तर में पत्रकारों को बुलाकर बदसलूकी होती है। कहीं मैनेजमेंट से शिकायत करके नौकरी से निकालने की धमकी दी जाती है।

क्या इस देश के मीडिया को आपने अपना ग़ुलाम समझ रखा है? चैनलों और अख़बारों के मालिकों को आप खरीद सकते हैं, क्योंकि वे उद्योगपति हैं। उन्होंने पूँजीनिवेश धर्मशाला चलाने के लिए नहीं किया है। मगर आम पत्रकार को लेकर ग़लतफ़हमी मत पालिए। इमरजेंसी के दरम्यान एक हेकड़ीबाज सूचना प्रसारण मंत्री होते थे। डायलॉग बोलते थे, ‘अखबार मालिकों को जेब में रखता हूं।’ लेकिन, कुछ समय बाद ही खोज-खोज कर गली-गली पत्रकारों से अपने व्यवहार के लिए माफी मांगा करते थे। तब तक बहुत देर हो चुकी थी। उनके चेहरे पर अतीत की करतूत-कालिख़ इतनी लग चुकी थी कि कभी साफ़ नहीं हुई। पत्रकारों को आप भी मजबूर न करिए। जिस दिन पिटारे से आपके काले कारनामों का कीचड़ निकलेगा तो मरते दम तक लगा रहेगा। यह बात गांठ बांध लीजिए मिस्टर नेताजी!

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'कंगना के जज्बे को सलाम, जिसने इन ‘माफी-पुत्रों’ को यह कहकर दिखा दी उनकी जमीन'

पत्रकार से नोकझोंक मामले में मीडिया में चर्चा का केंद्र बनी हैं अभिनेत्री कंगना रनौत

Last Modified:
Saturday, 13 July, 2019
Kangana Ranaut

ये पत्रकारिता के कौन से खुदा हैं जो कंगना रनौत को बैन करने की धमकी दे रहे हैं? मतलब एक अभिनेत्री ने कुछ पलटकर बोल क्या दिया, मानो आपके फ्रांस के एफिल टॉवर से भी ऊंचे 'ईगो' पर किसी ने अमेरिकी स्कड मिसाइल दाग दी हो? रोज रोना रोते हो कि सरकार हमें ये नहीं करने दे रही है? उस चीज़ की कवरेज से बैन कर रही है? सवाल नहीं पूछने दे रही है? हमारा वहां घुसना बैन कर दिया है? ब्ला..ब्ला..ब्ला.. और अब जब अपनी बारी आई तो खुद ही सरकार बन गए!! अपने ही हाथों से पत्रकारिता की इमरजेंसी का ये अध्यादेश साइन कर दिया?

वाकई गजब का दोहरा चरित्र है। अभी हाल ही में वित्त मंत्री ने बिना अपॉइंटमेंट वित्त मंत्रालय में घुसना ‘बैन’ कर दिया तो अखबार के फ्रंट पेज पर खबर छापकर विरोध हो रहा है! रोज हो रहा है। दिन रात हो रहा है। होना भी चाहिए। पर इस बैन का विरोध कहां है? अपने-अपने ईगो के हॉकिन्स प्रेशर कुकर में? या फिर आपसी सम्बन्धों के फर्निश्ड ड्राइंग रूम में? मतलब सरकार के अगुवा आपको इंटरव्यू न दें, आपका सरकारी विज्ञापन रोक दें, मिलने का मौका तक न दें, सब कर दें पर उनके आगे आपकी जुबान नहीं निकलेगी, क्योंकि तब रोटी से लेकर प्रोविडेंट फंड और विज्ञापन से लेकर रिटायरमेंट तक के डर, बिन मौसम वाली बारिश की तिरपाल बनकर तन जाएंगे!!

मगर एक अभिनेत्री ने पलटकर कुछ बोल क्या दिया, पत्रकारिता के स्वघोषित अल्बर्ट आइंस्टीनों की आंख में जैसे खून उतर आया हो। उसे बैन करने निकल पड़े। मने सलमान खान बेइज्जत कर दे तो हाथ जोड़ लेंगे, ऋषि कपूर हाथ छोड़ दे तो जमीन पकड़ लेंगे मगर एक अभिनेत्री ने दो-चार बातें क्या बोल दीं, खुद को अकड़ में चाचा चौधरी की कॉमिक्स का विशालकाय साबू समझ लिया।

आखिर में कंगना की हिम्मत को सलाम, जिसने न केवल माफी मांगने से मना कर दिया है, बल्कि पत्रकारिता के नाम पर अहंकार का टैबलॉयड निकालने वाले इन माफी-पुत्रों को यह कहकर उनकी जमीन दिखा दी है कि प्लीज मुझे बैन करो। अब कर लो बैन। अहंकार के हर सूखे हुए बुरादे को किसी न किसी जलती हुई माचिस से दो-चार होना होता है। इस बुरादे की माचिस यही थी। Well Done कंगना

(टीवी पत्रकार अभिषेक उपाध्याय की फेसबुक वॉल से)

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मिस्टर मीडिया: क्या हमारे मीडिया संस्थानों के मालिक-संपादक इन जरूरी तथ्यों से अनजान हैं?

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मीडिया संगठनों ने अपनी ओर से ही कई मानक तय कर लिए हैं

राजेश बादल by राजेश बादल
Published - Thursday, 11 July, 2019
Last Modified:
Thursday, 11 July, 2019
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

कमाल है। किसी की नजर नहीं जा रही। न देखने वालों की और न दिखाने वालों की। धड़ल्ले से मानक सिद्धांतों और कानून की खिल्ली उड़ाई जा रही है। अगर अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब यही है तो माफ कीजिए हिंदुस्तानी मीडिया से बड़ा नासमझ कोई नहीं है। बीते दिनों मानसूनी बारिश और आंधी-तूफान ने अनेक जानें लीं। अभी भी लोग प्राण गंवा रहे हैं। सैकड़ों मुसाफिर आए दिन दुर्घटनाओं में मरते हैं।

हमारे चैनल, अखबार और वॉट्सऐप पर चल रहीं समाचार एजेंसियां धड़ल्ले से मृतकों के चेहरे और शवों के दृश्य बेहद करीब से दिखाते हैं। उन्हें दिखाने में कोई संकोच भी नहीं होता। चित्र और विडियो दिखाने में भारतीय समाचार माध्यम संभवतया दुनिया भर में अव्वल हैं। परदेसी खबरिया चैनलों को एक बार देख लीजिए। कहीं पर भी आप ऐसी सामग्री नहीं पाएंगे, जिसे देखकर मन खराब हो जाए। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मीडिया संगठनों ने अपनी ओर से ही इस तरह के मानक तय किए हैं। कोई कानूनी बंदिश उन पर नहीं है।

चार बरस पहले नेपाल में आए भूकंप को मैं कवर करने गया था। बड़ी संख्या में मौतें हुईं थीं। ताज्जुब हुआ कि नेपाली दृश्य माध्यमों में भी लाशें नहीं दिखाई जा रही थीं। दूसरी ओर भारतीय चैनल्स ने सारी सीमाएं तोड़ दी थीं। एक नेपाली पत्रकार ने बताया कि कई बरस पहले पत्रकारों के संगठन ने यह फैसला लिया था। उसके बाद सख्ती से उसका पालन हो रहा है। मैंने उन्हें सलाम किया। इसी तरह अमेरिका यात्रा में भी मैंने पाया कि वहां अखबार और टीवी चैनल भी इस तरह की सामग्री से परहेज़ करते हैं। यह समझ सभी जगह पत्रकारों ने विकसित की है, लेकिन भारत में हम अपनी खिल्ली खुद उड़ाते हैं। यह कैसी पत्रकारिता है?

हम तो कानून की परवाह भी नहीं करते। सुप्रीम कोर्ट का निर्देश है कि दुष्कर्म के मामलों में पीड़िता की पहचान छिपानी चाहिए। भारतीय मीडिया ऐसा नहीं करता। वॉट्सऐप पर तो इसी पखवाड़े एक ऐसा विडियो आया, जब एक महिला को निर्वस्त्र करके गलियों में घुमाया जा रहा था। उसके पीछे उन्मादी भीड़ चली आ रही थी। एक जगह वह महिला गिर गई तो भीड़ से लोग आए और लातों से पीटने लगे। बीते दिनों गुजरात के विधायक ने एक महिला नेत्री को लातों से पीटा था। चैनलों ने दिन भर उसे दिखाया। कायदे से वह भी नहीं दिखाया जाना था।

आप किसी की पहचान नहीं छिपा रहे हैं और सामाजिक अपयश कर रहे हैं। दुष्कर्म के आरोपियों तक की पहचान देने का कोई औचित्य नहीं है। पुलिस पत्रकारों को उनके नाम-पते आसानी से देती है। इन दिनों दुर्भावना से भी कई बार उत्पीड़न के आरोप लगाए जाते हैं। जब मुकदमा चलता है तो कोर्ट में मामला खुलता है। आरोपी बरी हो जाता है लेकिन हमारा मीडिया उसे पहले ही अपराधी घोषित कर समाज में बहिष्कृत जीवन जीने पर मजबूर कर देता है। यह कौन सी जिम्मेदारी वाली पत्रकारिता है?

इतना ही नहीं, कानून कहता है कि आप धर्म गुरुओं और बाबाओं के हवाले से बीमारी ठीक करने के शो अथवा कार्यक्रम नहीं दिखा सकते। किसी मर्ज को ठीक करने वाली दवा का विज्ञापन नहीं कर सकते। नाना प्रकार के तेलों और यौन दुर्बलताओं के बारे में विज्ञापन नहीं छाप सकते और न ही दिखा सकते हैं। जेलों में बंद और सजायाफ्ता पाखंडी धर्म गुरुओं के भी रिकॉर्डेड शो दिखाए जाते हैं। ये भी गैरकानूनी हैं। क्या हमारे मीडिया संस्थानों के संचालक-मालिक-संपादक इन बुनियादी तथ्यों से अनजान हैं? आप कैसे समाज की रचना में भागीदार हैं मिस्टर मीडिया?

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दौर-ए-दास्तान: कैसे बड़े अखबार ने किया था ‘आपातकाल’ का समर्थन

इसी अखबार ने शब्दों की शुद्धता और उनके सही उपयोग का ज्ञान भी पहली बार पाठकों के सामने रखा

संतोष भारतीय by संतोष भारतीय
Published - Wednesday, 10 July, 2019
Last Modified:
Wednesday, 10 July, 2019
Journalist Santosh

संतोष भारतीय, वरिष्ठ पत्रकार।।

‘दिनमान’ हिंदी पत्रकारिता के इतिहास का पहला अध्याय है, जिसने एक पूरी पीढ़ी को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय विषयों के साथ विज्ञान, समाजशास्त्र, साहित्य तथा संस्कृति से परिचित कराया। ‘दिनमान’ ने शब्दों की शुद्धता और उनके सही उपयोग का ज्ञान भी पहली बार पाठकों के सामने रखा। हम सब सोवियत रूस की राजधानी ‘मास्को’ का उच्चारण करते थे, आज भी करते हैं, लेकिन दिनमान ने ‘मस्कवा’ लिखा।

‘दिनमान’ के पहले संपादक सुप्रसिद्ध साहित्यकार सच्चिदानंद हीरानंद वात्सायन ‘अज्ञेय’ थे। उनका इतना ज्यादा प्रभाव हिंदी पर था कि कई लोगों ने अपना नाम वात्सायन कर लिया था, जिनमें हिंदी के एक बहुत मेधावी छात्र थे जो बाद में ‘नवभारत टाइम्स’ के ‘सांध्य टाइम्स’ के संपादक भी बने। अज्ञेय जी ने ‘दिनमान’ को देश की पहली ऐसी गंभीर और सार्थक पत्रिका बना दिया, जिसने इंदिरा गांधी के समय की राजनीति का तथा घटनाओं के हर पहलू का परिचय हिंदी के पाठकों को कराया। चंद्रशेखर के धारदार व्यक्तित्व से हिंदी जगत को तथा उनके व्यक्तित्व के विद्रोही तत्व का परिचय हिंदी पाठकों के पास ‘दिनमान’ के द्वारा ही पहुंचा। राज्यसभा में प्रसिद्ध और उस समय देश के सबसे बड़े उद्योगपति के खिलाफ चंद्रशेखर का चलाया हुआ अभियान हिंदी के पाठकों के पास सबसे पहले ‘दिनमान’ द्वारा ही पहुंचा।

अब तक जानकारी और उसके तेवर अंग्रेजी अखबारों के द्वारा ही पहुंचते थे, लेकिन ‘दिनमान’ ने विशुद्ध हिंदी का एक ऐसा तथ्यात्मक रस देश के सामने रखा, जिसने समस्त उत्तर भारत के सामने ज्ञान का नया दरवाजा खोल दिया। ‘दिनमान’ में उन दिनों रघुवीर सहाय, श्रीकांत वर्मा, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, महेश्वर दयालु गंगवार, जवाहर लाल कॉल, त्रिलोक दीप, नरेश कौशिक जैसे उप संपादक थे।  आज नरेश कौशिक ‘बीबीसी लंदन’ से जुड़े हैं और उन्होंने ‘बीबीसी’ की पत्रकारिता पर एक अमिट छाप छोड़ी है।

अज्ञेय जी जब ‘नवभारत टाइम्स’ के संपादक बने, तब ‘दिनमान’ के संपादक रघुवीर सहाय बने।। रघुवीर सहाय हिंदी के बहुत बेहतरीन  कवि थे। उन्हीं दिनों गुजरात से शुरू हुआ छात्रों का आंदोलन बिहार पहुंचा और छात्रों ने अपने आंदोलन का नेतृत्व जयप्रकाश नारायण को सौंप दिया। ‘दिनमान’ ने छात्रों के इस आंदोलन की भरपूर रिपोर्टिंग की और उसे देश के सामने सही परिप्रेक्ष्य मैं रखा। इसमें ओम प्रकाश दीपक का बहुत योगदान था। दरअसल, दिनमान के सभी संपादकीय सहयोगी डॉक्टर राम मनोहर लोहिया से बहुत प्रभावित थे और वे उन्हें देश के लिए सबसे प्रासंगिक मानते थे।

समाजवादी विचारधारा के मानने वालों के लिए ‘दिनमान’ हर सप्ताह नई जानकारी और नए तर्क लेकर आता था। उन दिनों हिंदी जगत ‘दिनमान’ के द्वारा दी जानकारी और उसके द्वारा उठाए गए सवालों के इर्द-गिर्द बहस में हर सप्ताह उलझा रहता था। अंग्रेजी पत्रकारिता के सामने हिंदी की यह पहली चुनौती थी, जिसके पहले अगुआ अज्ञेय जी थे। किशन पटनायक लोकसभा के सदस्य चुनकर आए थे और उन्हें सारे देश में समाजवादी विचारधारा के सबसे नौजवान भाष्यकार के रूप में ‘दिनमान’ ने ही प्रस्तुत किया था। श्रीकांत वर्मा उस दौरान प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के काफी नजदीक थे और उन्होंने कांग्रेस को इंडिकेट सिंडिकेट के झगड़े में प्रसिद्ध नारा ‘जात पर ना पात पर, इंदिरा जी की बात पर,मोहर लगेगी हाथ पर’ दिया था।

आपातकाल में अधिकांश अखबारों की तरह ‘दिनमान’ भी आपातकाल का समर्थक हो गया था। मैं आपातकाल में सुप्रसिद्ध कवि भवानी प्रसाद मिश्र से मिलने दिल्ली पहुंचा।। उन्होंने मुझे कहा कि क्या तुम टाइम्स हाउस से जब रघुवीर सहाय सीढ़ियों से उतरने लगें तो उन्हें धक्का नहीं दे सकते? आगे बोले रघुवीर सहाय को आपातकाल का समर्थन करने की सजा मिलनी चाहिए। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ‘दिनमान’ की आपातकाल समर्थक नीति से बेहद दुखी रहते थे। रघुवीर सहाय आपातकाल समाप्त होने के बाद हुए 77 के आम चुनाव मैं इतने ज्यादा आत्म प्रभावित थे कि उन्होंने लिख दिया था कि इंदिरा जी प्रचंड बहुमत से चुनाव जीत गईं, जबकि इंदिरा जी अपनी पार्टी समेत खुद भी चुनाव हार गई थी।

उन दिनों अंग्रेजी के प्रसिद्ध साप्ताहिक ‘न्यूज़ वीक’ का सिक्का चलता था।। ‘दिनमान’ ने हिंदी में उससे ज्यादा सारगर्भित जानकारी देकर हिंदी को बहुत समृद्ध किया। ‘दिनमान’ ने हिंदी के पक्ष में देश में जबरदस्त माहौल बनाया था। ‘दिनमान’ में हिंदी को नए लेखक और पत्रकार दिए। बिहार आंदोलन की फील्ड रिपोर्ट जुगनू शारदेय से कराकर एक नई परंपरा से परिचित कराया।

सन 77 में आपातकाल के बाद ‘रविवार’ नाम का एक और हिंदी साप्ताहिक कोलकाता से प्रकाशित हुआ, जिसके संपादक सुरेंद्र प्रताप (एसपी) सिंह थे। सुरेंद्र प्रताप सिंह मुंबई से निकलने वाले प्रसिद्ध साप्ताहिक ‘धर्मयुग’ मैं उप संपादक थे। वे एमजे अकबर की सलाह पर कोलकाता आए और ‘रविवार’ का संपादन संभाला। ‘दिनमान’ में और ‘रविवार’ में विषय को लेकर एक नई स्पर्धा शुरू हुई। ‘दिनमान’ उन दिनों रोटरी पर छपता था, जबकि रविवार ‘ऑफसेट’ पर छपता था। पाठकों के पास ‘दिनमान’ अगले हफ्ते पहुंच जाता था, जबकि रविवार ऑफसेट की वजह से तीसरे हफ्ते पहुंचता था। विषय से जुड़ी जानकारी ‘दिनमान’ के द्वारा हिंदी के पाठकों के पास पहले पहुंचती थी, लेकिन पाठकों को ‘रविवार’ का इंतजार रहता था क्योंकि ‘रविवार’ ने अपनी रिपोर्ट को अलग तरह से पाठकों के सामने लाना शुरू किया था। इसमें घटना, घटना के पीछे एक कारण, उनका राजनीतिक सामाजिक और आर्थिक कोण तथा घटना के पीछे के ताकतवर व्यक्ति या संस्था का खुलासा होता था। ‘दिनमान’ और ‘रविवार’ ने हिंदी में पत्रकारिता के उन आयामों को छुआ, जिन्हें अंग्रेजी पत्रकारिता शायद आज तक नहीं छू पाई। यह मेरी गलतफहमी हो सकती है, लेकिन जब तक इसे कोई साबित नहीं करता तब तक मैं यह गलतफहमी बनाए रखना चाहता हूं।

अफसोस की बात है कि किसी भी हिंदी के प्रकाशन संस्थान ने ‘दिनमान’ के सभी अंकों और ‘रविवार’ के सभी अंक पुस्तक के रूप में नहीं छापे। अगर यह छपते तो हिंदी के यह बेस्टसेलर होते। एक ऐसा दस्तावेज होता जो आज पत्रकारिता क्या है, इस बहस में रास्ता दिखाने का काम करता। यह भी साबित करता कि हिंदी का संपादक कैसा होना चाहिए और हिंदी के पत्रकारों में क्या गुण होने चाहिए। वे संपादक और पत्रकार चाहे प्रिंट से जुड़े हो या फिर टेलिविजन से। पत्रकार बनाने के संस्थान भी दिनमान और रविवार के उस योगदान से परिचित नहीं है, यह और अफसोस की बात है। मुझे तो डर है कि आज पत्रकारिता का सिरमौर बनने की चाहत लिए नए पत्रकार ‘दिनमान’ और ‘रविवार’ का नाम भी जानते हैं या नहीं। यह वैसा ही है जैसे कोई आज के विद्यार्थियों से पूछे कि भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, अशफाक उल्ला खान, राम प्रसाद बिस्मिल कौन थे, तब उत्तर में वह सिर्फ आपका चेहरा आश्चर्य से देखता रहे और सोचे कि ‘दिनमान’ और ‘रविवार’ मोहनजोदड़ो या हड़प्पा की खुदाई से निकले कोई ग्रंथ हैं क्या।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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जल संरक्षण की दिशा में काबिले तारीफ है मोदी की ये पहल: डॉ. सिराज कुरैशी, वरिष्ठ पत्रकार

वरिष्ठ पत्रकार डॉ. सिराज कुरैशी ने कहा, जल को कल के लिये बचाना होगा

डॉ. सिराज कुरैशी by डॉ. सिराज कुरैशी
Published - Tuesday, 09 July, 2019
Last Modified:
Tuesday, 09 July, 2019
Save Water

डॉ. सिराज कुरैशी, वरिष्ठ पत्रकार।।

माननीय नरेन्द्र मोदी ने दूसरी बार प्रधानमंत्री पद की कुर्सी संभालते ही सबसे पहले ‘जल’ (पानी) को ‘कल’ के लिये बचाने की हिदायत देते हुये ‘जल शक्ति मंत्रालय’ का ही गठन करके मंत्री विशेष के ऊपर जिम्मेदारी भी डाल दी। 6 जुलाई को जब मोदी अपने चुनाव क्षेत्र वाराणसी पहुंचे औऱ वहां पूर्व प्रधानमंत्री स्व. लाल बहादुर शास्त्री की मूर्ति का अनावरण करने के बाद जो भाषण दिया, उसमें सबसे ज्यादा फोकस ‘जल’ पर था और रहना भी चाहिये था, क्योंकि जब टीवी पर कई प्रदेशों की जनता को ‘पानी’ के लिये परेशान दिखाया जाता है तथा पानी का टैंकर आने पर जब जनता उसका पानी लेने के लिये (बल्कि लूटने के लिये) एक-दूसरे के साथ मारा-मारी करती दिखाई देती है. तब पानी की अहमियत मालूम पड़ती है।

शायद मोदी देश की जनता की इस तकलीफ और परेशानी से पूरी तरह वाकिफ हो गये हैं, इसलिये उन्होंने वर्ष 2024 तक पाइप के जरिये घर-घर स्वच्छ जल पहुंचाने का लक्ष्य भी तय कर दिया है। मोदी जी के इस कदम से यह लगने लगा है कि उनकी मंशा उसी तरह की है, जिस तरह पिछली बार की ‘उज्ज्वलता योजना’ थी, जिससे देश के हर गली-मोहल्ले के घर में गैस सिलेंडर-सौभाग्य योजना के तहत विद्युत कनेक्शन और स्वच्छ भारत अभियान के तहत ‘शौचालय’ उपलब्ध करने की रही थी, जो अब पूरी होती दिखाई दे रही है।

यह शत-प्रतिशत सच है कि जल संरक्षण के लिए सरकार का साथ देने के लिए सामाजिक संगठनों और देश से प्रेम करने वालों को आगे आना ही होगा, जिससे जल संरक्षण अभियान में आम जनता में जागृति उत्पन्न हो। यह सच्चाई भी किसी से नहीं छुपी है कि आबादी के लिहाज से भारत में विश्व की 18 प्रतिशत आबादी निवास करती है, जबकि देश में पीने लायक पानी केवल 4 प्रतिशत ही उपलब्ध है।

इस कमी को ‘प्लानिंग कमीशन’ पहले ही उजागर कर चुका है। अगर विशेष ध्यान नहीं दिया गया तो दो तीन सालों में देश के लगभग 20-22 शहरों में भूजल पूरी तरह खत्म हो जायेगा, जबकि आने वाले 10-12 सालों मे पानी की मांग दुगनी होने की संभावना दिखाई दे रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वास्तव में बधाई के पात्र हैं जो पानी और पानी संरक्षण जैसे विषय पर गम्भीरता से सोचते हुए कदम उठा रहे हैं, जबकि यह जिम्मेदारी राज्य सरकारों की ही बनती है।

मोदी सरकार को इस विषय पर दिक्कत वहां आ सकती है, जिन राज्यों में भाजपा की सरकार नहीं है, वह इस विषय पर कोई भी कारण बताते हुए रुकावट खड़ी कर सकते हैं। हां, जिन प्रदेशों में भाजपा की सरकार है, वहां की जनता को जल्द और अच्छी सहूलियत इसलिये मिल सकती है कि मोदी के हुक्म के सामने भाजपा की सरकार का कोई मुख्यमंत्री हिम्मत नहीं कर सकता बोलने की। यह सच है कि इस गंभीर विषय पर अगर सियासत होने लगेगी तो रुकावट आना संभव है।

यह लेख लिखते समय डा. मनमोहन सिंह सरकार के समय की वह बात याद आ रही है, जब उसी समय से ‘समेकित वाटर शेड डवलपमेंट प्रोग्राम’ को पीएम कृषि सिंचाई योजना का ही हिस्सा बना दिया था। खैर, यह सच्चाई भी देश की जनता के सामने है कि वर्ष 2009 से 2014 के बीच स्वीकृत कोई भी परियोजना दिये हुए समय पर पूरी ही नहीं हो पाई थी, जबकि उस समय की केन्द्र सरकार ने जनता को तत्काल लाभ पहुंचाने का वादा किया था।

एक बुजुर्गवार का यह कहना उचित लगा कि बारिश का ज्यादातर पानी बह जाता है। अगर उस पानी को नियंत्रित कर लें तो काफी राहत मिल सकती है। इससे 50 प्रतिशत शहरी आबादी तथा 75 प्रतिशत ग्रामीण आबादी (खासकर कृषि क्षेत्र के लिए) की जल की आवश्यकता इस भूजल से ही पूरी हो जायेगी। हां, ऐसी फसल पर भी विशेष ध्यान देना होगा, जिसमें पानी की खपत कम होती हो।

यह पूरी तरह सच है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की निगाह 130 करोड़ की जनता की हर परेशानी दूर करने में लगी दिखाई देती है। (शायद मोदी विरोधियों को नहीं) क्योंकि वह जमीन से जुड़ते हुये प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे हैं। वह यह भी देख रहे हैं कि देश के कई राज्य ऐसे हैं, जहां एक बाल्टी पानी के लिये 20-30 रुपए तक वसूले जा रहे हैं। यही वजह है कि 2019 में पीएम की कुर्सी संभालते ही पानी की समस्या पर खास ध्यान दे रहे हैं, क्योंकि वह जानते हैं कि ‘जल ही जिन्दगी है’, यह ऐसा मुद्दा रहा है जिसकी हमेशा उपेक्षा होती रही है। शायद यही सोच कर उन्होंने ‘जल शक्ति मंत्रालय’ ही बना डाला, जिसकी जनता ने सराहना ही नहीं की, बल्कि पीएम को बधाई भी दी।

प्रधानमंत्री मोदी ने जब 6 जुलाई को वाराणसी में ‘जल संरक्षण’ पर विस्तार से बताया तो लगा कि जल शक्ति मंत्रालय की कार्य पद्धति की मॉनीटरिंग भी मोदी स्वयं ही कर रहे हैं, क्योंकि यह आम जनता से जुड़ा मुद्दा है। मोदी ने इस विषय को पूरी तरह इस मंत्रालय के मंत्री पर ही नहीं छोड़ा है, ऐसा प्रतीत हो रहा है इसके लिये एक बार पुनः पीएम मोदी को बधाई प्रेषित करता हूं।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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ऐसे तो अधर में लटक जाएगा मोदी का ‘न्यू इंडिया’ का सपना: डॉ. सिराज कुरैशी, वरिष्ठ पत्रकार

यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि मोदी का लोहा पूरा विश्व आज मान रहा है

डॉ. सिराज कुरैशी by डॉ. सिराज कुरैशी
Published - Friday, 05 July, 2019
Last Modified:
Friday, 05 July, 2019
Siraj

डॉ. सिराज कुरैशी, वरिष्ठ पत्रकार।।

जी-20 मीटिंग में विश्वभर के देशों के मुखियाओं ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जिस तरह हाथों-हाथ लिया और चारों ओर से जिस तरह ‘मोदी-मोदी’ की आवाज सुनाई दी, उससे भारत की 130 करोड़ जनता का सीना चौड़ा हो गया। इसलिये यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि मोदी का लोहा पूरा विश्व आज मान रहा है।

लेकिन जब मोदी अपने देश की राजधानी दिल्ली में अपने दफ्तर में बैठकर या किसी मंच से इंडिया को ‘न्यू इंडिया’ में तब्दील करने की बात करते हैं तो मोदी विरोधी लोग ‘न्यू इंडिया’ शब्द को ही विवाद के घेरे में ले आते हैं और तरह-तरह के अनुमान लगाने लगते हैं। कांग्रेस पार्टी अपनी पराजय के बाद ‘न्यू इंडिया’ शब्द को मुख्य मुद्दा बनाकर ‘लानत’ भेजती दिखाई देते हुए मोदी के पिछले पांच सालों पर निशाना लगा रही है।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद ने तो संसद में स्पष्ट शब्दों में प्रधानमंत्री की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘हमें ‘न्यू इंडिया’ नहीं चाहिये, हमारा ‘ओल्ड भारत’ ही वापस कर दीजियेगा, जहां प्यार और भाईचारा दिखाई देता था। जब दलित एवं मुस्लिम को चोट पहुंचती थी तो हिंदू को पीड़ा होती थी और जब हिंदू भाई की आंखों में कुछ पड़ जाता था तब मुस्लिम और दलित वर्ग की आंखों से आंसू निकल आते थे।‘

एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि ‘झारखंड मॉब लिंचिंग और हिंसा की फैक्टरी बन गया है, परन्तु इन नेता जी की यह बात गले से नहीं उतर रही। यह तो अफसोसजनक घटना थी, जब अंसारी को मौत के घाट उतारा गया था, परन्तु इस घटना को लेकर पूरे प्रदेश पर उंगली उठाना अनुचित है।

खैर-झारखंड की घटना को लेकर सुलहकुल की नगरी (आगरा) को दंगे की आग में झोंकने से जिला प्रशासन एवं कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं की सूझबूझ से एक जुलाई को बचा लिया गया, लेकिन अब ऐसे प्रयास होना बहुत जरूरी है कि झारखंड जैसा प्रकरण देश के किसी भी कोने में न होने पाये। प्रेम की नगरी आगरा के कुछ सामाजिक लोगों ने जो भारतीय प्रेम और भाईचारे की मिसाल पेश की है, ऐसा उदाहरण देश के अन्य जिलों में भी होना चाहिये।

किसी हद तक यह भी सही है कि पुराने भारत की संस्कृति और भाईचारे का लोहा पूरा विश्व मानता था। धीरे-धीरे वक्त करवटें बदलता रहा। जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हुये, तभी से उनका प्रयास पुराने भारत के स्थान पर ‘न्यू इंडिया’ बनाने में लगता दिखाई दिया। वर्तमान में ‘न्यू इंडिया’ का सपना भी साकार होता दीखने लगा, लेकिन जब देश के कुछ हिस्सों से ‘मॉब लिंचिंग’ की घटनाएं होने लगीं, तब मोदी ने दुःख जताते हुये अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को कड़ी हिदायत देते हुए मुख्यमंत्रियों को कानूनी कार्यवाही करने के आदेश भी दिये, परन्तु मोदी विरोधी लोगों को लगा कि पीएम के आदेश तो हवा-हवाई हैं, वह शायद मलियाना और भागलपुर कांड भूल गये।

इस सच्चाई को कोई नहीं छुपा सकता कि खुराफाती तत्व हर सरकार के समय खुराफात करते ही रहे हैं। अगर देश में होने वाले साम्प्रदायिक दंगों के आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्ष 1984 सबसे बड़ा कलंक दिखाई देगा। आरटीआई के तहत पूछे गये एक सवाल के जवाब में केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने जानकारी दी कि वर्ष 1984 से लेकर 2012 तक सिर्फ एक साल ऐसा गुजरा, जिसमें 500 से कम दंगे हुये।

इसके अतिरिक्त देखें तो 28 सालों में देश में दंगों की संख्या 26817 रही, जिनमें 12902 लोगों की जानें गईं। यह भी सही है कि 28 सालों में से 18 साल देश में कांग्रेस पार्टी का ही राज रहा था। आज भाजपा का नया भारत (न्यू इंडिया) बनाने का सपना कांग्रेस को नापसंद है। कांग्रेस देश की 130 करोड़ जनता को क्या संदेश देना चाहती है, वह अभी तक उजागर नहीं हुआ है?

देश की 130 करोड़ जनता ‘ओल्ड इंडिया’ चाहती है या ‘न्यू इंडिया’, यह इनके वोटों पर निर्भर है। अब रही अल्पसंख्यक वर्ग की बात, लेकिन अल्पसंख्यक वर्ग केवल मुसलमानों को ही नहीं माना जा सकता। इसमें और वर्ग एवं धर्म के मानने वाले भी आते हैं, लेकिन केंद्र और राज्यों का पूरा फोकस मुसलमानों पर ही रहता है, क्योंकि अल्पसंख्यकों में बड़ा वर्ग मुसलमानों का ही है।

वर्तमान में मोदी जिस पार्टी के सदस्य हैं, वह पार्टी आज सत्ता में है, लेकिन पार्टी के कार्यकर्ताओं की सोच और कदम नरेंद्र मोदी की सोच और कदम से भिन्न दिखाई देते हैं। पीएम मोदी ने पूरे विश्व में भारत का झंडा बुलंद किया हुआ है। विश्व के समस्त देशों के चीफ आज हमारे प्रधानमंत्री मोदी का लोहा मान रहे हैं। हाल ही में जी-20 सम्मेलन का उदाहरण सामने है।

आज भाजपा के कार्यकर्ताओं और प्रधानमंत्री मोदी की सोच और कदम में तालमेल की आवश्यकता है। भाजपा कार्यकर्ता अगर मोदी की सोच से अलग होकर कदम उठाते रहेंगे तो सरकार का ‘न्यू इंडिया’ का सपना अधर में लटक जायेगा। 2019 का चुनाव जीतने के बाद पहला भाषण नरेंद्र मोदी ने जो दिया था, उसको ध्यान में रखना भाजपाइयों के लिए बहुत जरूरी है, क्योंकि पांच साल का वक्त बहुत ज्यादा नहीं होता।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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इसलिए भी हुआ है पाकिस्तान की अर्थवस्था का कबाड़ा, बोले वरिष्ठ पत्रकार टीपी पाण्डेय

अभी तक की खबरों से लगता है कि पाकिस्तान कार्रवाई के नाम पर सिर्फ दिखावा कर रहा है

टीपी पाण्डेय by टीपी पाण्डेय
Published - Thursday, 04 July, 2019
Last Modified:
Thursday, 04 July, 2019
TP Pandey

टीपी पाण्डेय, वरिष्ठ पत्रकार।।

पाकिस्तान में आजकल इंतकाम की सियासत परवान चढ़ रही है। प्रधानमंत्री इमरान खान नियाजी अपने राजनीतिक विरोधियों को निबटाने का कोई मौका नहीं चूक रहे। हालांकि ये अलग बात है कि उन्होंने आर्थिक भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए कुछ सराहनीय कदम भी उठाए हैं। पूर्व राष्ट्रपति आसिफ जरदारी पहले से ही भ्रष्टाचार के मामले में जेल में हैं। जरदारी साहब की तरह उनकी बहन फरयाल तालपुर भी जेल में कैद हैं।

इसी तरह मुल्क के पूर्व प्रधानमंत्री मियां नवाज शरीफ भी लाहौर की कोट लखपत जेल में बंद हैं। नवाज शरीफ के भतीजे हमजा शहबाज भी जेल में हैं। खबर है कि ये लिस्ट अभी लंबी है। गिरफ्तार होने वालों की लिस्ट में आसिफ जरदारी के पुत्र बिलावल भुट्टो और सिंध के मुख्यमंत्री मुराद अली शाह भी शामिल हैं। अभी दो रोज पहले नवाज शरीफ के वफादार सिपाही और उनकी पार्टी पीएमएलएन के बड़े नेता राणा सनाउल्लाह को भी कार में 15 किलो हेरोइन रखने के इल्जाम में गिरफ्तार किया गया।

ये गिरफ्तारी तब हुई, जब राणा सनाउल्लाह फैसलाबाद से इस्लामाबाद के लिए सड़क मार्ग द्वारा जा रहे थे। रास्ते में चेक पोस्ट पर एंटी नारकोटिक्स फोर्स ने उनकी गाड़ी को रुकवाकर चेक किया तो पता लगा कि कार की डिग्गी में भारी मात्रा में हेरोइन की खेप है। इस गिरफ्तारी को लेकर पाकिस्तान में जबर्दस्त हलचल है। पीएमएलएन सहित देश में मीडिया के एक तबके ने राणा सनाउल्लाह की गिरफ्तारी पर सवाल उठाए हैं। ‘जियो टीवी’ के संपादक और वरिष्ठ पत्रकार हामिद मीर ने भी राणा सनाउल्लाह की गिरफ्तारी को हैरतअंगेज करार दिया है।

बकौल हामिद मीर, पाकिस्तान में पहले भी ऐसा होता रहा है। अगर सियासी इंतकाम लेना हो तो ऐसे केस बना दिए जाते हैं। राणा सनाउल्लाह की छवि पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज) के दबंग नेताओं की रही है। उन पर कई लोगों की हत्या के आरोप हैं। उनके विरोधी तो यहां तक कहते हैं कि राणा साहब के मुल्क में पल रहे जेहादी संगठनों से भी रिश्ते हैं। अब ये बातें कहां तक सच हैं, यह तो जांच का विषय है मगर ये भी सच है कि राणा सनाउल्लाह लंबे वक्त से इमरान की आंखों का कांटा बने हुए थे, क्योंकि वो इमरान पर राजनीतिक हमले के साथ-साथ निजी हमले भी कर रहे थे।

पिछले दिनों ‘जियो टीवी’ को दिए गए एक साक्षात्कार में उन्होंने इमरान की निजी जिंदगी पर सख्त टिप्पणी की थी। इसके बाद ये माना जाने लगा था कि अब राणा की गिरफ्तारी तय है। आखिरकार हुआ भी ऐसा ही। पीएमएलएन के नेता इसे बदले की भावना से की गई कार्रवाई करार दे रहे हैं। पाकिस्तान में राजनीतिक एवं आर्थिक संकट के कई कारण हैं। देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह आईसीयू में है। पाकिस्तान इस संकट से उबरने के लिए छटपटा रहा है।

पिछले 11 जून को जब देश का सालाना बजट पेश किया गया तो इस बजट के बाद से पाकिस्तान के नौकरीपेशा लोगों, छोटे कारोबारियों और बड़े बिजनेसमैनों पर भारी भरकम टैक्स लाद दिया गया। पाकिस्तान की अर्थवस्था का कबाड़ा इसलिए भी हुआ, क्योंकि 20 करोड़ के देश में केवल 7 लाख लोग अपना इनकम टैक्स रिटर्न दाखिल करते हैं। टैक्स चोरी और मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में पाकिस्तान के सियासतदां तो नंबर वन हैं, इनमें जरदारी और नवाज शरीफ भी शामिल हैं। इन पर सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग और भ्रष्टाचार के संगीन मामले हैं।

सुना तो यहां तक गया है कि नवाज शरीफ के फॉर्म हाउस जाती उमरा के कमरों में सोने की टाइल्स और गुसलखाने में सोने की टोंटिया लगी हैं, जो संयुक्त अरब अमीरात से विशेष रूप से मंगवाई गई थीं। ऐसे में इमरान खान लगातार ये पूछ रहे हैं कि इतनी बेशुमार दौलत आई कहां से? वे कहते हैं कि नवाज शरीफ ने देश को बुरी तरह लूटा है। जनता को भीख का कटोरा थमाकर नवाज शरीफ अरबों की जायदाद के मालिक बने हुए हैं। आरोप तो यहां तक हैं कि लंदन में नवाज शरीफ की करीब 300 जायदाद हैं। आखिर ये पैसा आया कहां से?

इसी तरह ‘मिस्टर 10 परसेंट’ के नाम से मशहूर आसिफ जरदारी की लंदन, अमेरिका और सेंट्रल एशिया के कई देशों में अकूत और बेनामी संपत्तियां हैं। भ्रष्टाचार की जांच कर रही संस्था NAB  यानी नेशनल अकाउंटेबिलिटी ब्यूरो की जांच में ये तक पाया गया कि जरदारी के कई फर्जी बैंक खाते हैं। एक खाता तो उनका किसी कुल्फी-फालूदा विक्रेता के नाम पर है। जाहिर है कि सियासतदानों के आर्थिक भ्रष्टाचार और अरबों की टैक्स चोरी की कीमत पाकिस्तान को चुकानी पड़ रही है। उसे आईएमएफ, चीन, सऊदी अरब से कर्ज लेना पड़ रहा है।

पिछले दिनों कतर ने भी पाकिस्तान को 3 अरब डॉलर का कर्ज दिया है। असल में पाकिस्तान में एक प्रकार से टैक्स चोरी का रिवाज सा बन गया था। प्रधानमंत्री इमरान की कोशिश है कि देश को गुरबत से बाहर निकाला जाए और लोग टैक्स देने पर मजबूर हों। इसलिए सरकार ने ‘फेडरल बोर्ड ऑफ रेवेन्यू’ (FBR) को खुली छूट दी है। शायद ये भी एक वजह है कि देश में इमरान के खिलाफ माहौल तैयार किया जा रहा है। समूचा विपक्ष इमरान के खिलाफ लामबंद है। व्यापारियों को भड़काया जा रहा है और वे इस्लामाबाद की सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं। इमरान के बारे में ये बात ज़रूर कही जाती है कि वे एक खालिस राजनेता नहीं हैं। वे क्रिकेट के चैंपियन तो हैं, लेकिन राजनीति के माहिर खिलाड़ी नहीं हैं। उनके इर्दगिर्द भी चापलूसों की जमात है, लेकिन एक बात तो इमरान के पक्ष में जाती है। वो ये है कि उन पर आर्थिक भ्रष्टाचार का कोई मामला नहीं है। अब क्योंकि वे खुद भी ईमानदार हैं, इसलिए भी सख्त फैसले कर रहे हैं और शायद ये भी एक वजह है कि जिससे उनके विरोधियों का हाजमा खराब हो गया है।

इस बीच पाकिस्तान में एक बड़ी तब्दीली देखने को ये मिली कि देश की राष्ट्रीय विकास परिषद का सदस्य आर्मी चीफ कमर जावेद बाजवा को भी बना दिया गया जिन्होंने पिछले दिनों एक विश्वविद्यालय के सेमिनार में तकरीर करते हुए स्वीकार किया कि देश बुरी तरह आर्थिक संकट से गुज़र रहा है। इस स्थिति से निबटने के लिए उन्होंने देशवासियों से सहयोग की अपील की है। आर्मी चीफ के इस बयान से इमरान खान को काफी राहत मिली है। वह इसलिए कि पाकिस्तान की अवाम राजनेताओं से कहीं ज़्यादा वहां की फौज पर भरोसा करती हैं। इसके बावजूद इमरान के सामने चुनौतियों का पहाड़ है।

इमरान के लिए नवाज शरीफ और जरदारी खानदान के अलावा जमात-ए-इस्लामी के अध्यक्ष मौलाना फजलुर रहमान सिरदर्द बने हुए हैं। वे लगातार उनकी राह में कांटे बिछा रहे हैं। पिछले दिनों उनकी ही पहल पर ऑल पार्टी कॉन्फ्रेंस आयोजित हुई, जिसमें नवाज़ शरीफ की बेटी मरियम नवाज सफदर और बिलावल भुट्टो जरदारी भी शामिल थे, मगर ये कॉन्फ्रेंस फ्लॉप शो साबित हुई। मौलाना फजलुर रहमान एक तरह से भारतीय राजनीति के रामविलास पासवान की तरह हैं। उनकी तारीफ ये है कि अब तक पाकिस्तान में जितनी भी डेमोक्रेटिक सरकारें रहीं, उनमें उनको कोई न कोई मलाईदार मंत्रालय मिल जाया करता था। नवाज शरीफ से लेकर बेनजीर भुट्टो तक, सबने उन्हें मंत्री पद देकर उपकृत किया।

वे एक जमाने में परवेज मुशर्रफ के भी बहुत करीबी रहे, मगर इमरान खान ही एक नेता हैं, जिन्होंने मौलाना फजलुर रहमान को कभी घास नहीं डाली और उन्हें पास नहीं फटकने दिया, इसलिए मौलाना की हालत उस मछली की तरह है जो पानी न मिलने से छटपटा रही है। मौलाना फजलुर रहमान की पार्टी के देश में सैकड़ों मदरसे हैं और आरोप है कि उनका संगठन आतंकी तंजीमों को भी मदद करता रहा है एक प्रकार से कहा जाए तो इमरान खान उनसे दूर रहकर अपने देश का भला ही कर रहे हैं।

अगले माह अगस्त में पेरिस में ‘Financial Action Task Force’ (FATF) की बैठक है, जिसमें पाकिस्तान को काली सूची में डाला जा सकता है। अभी तक पाकिस्तान ग्रे लिस्ट में है। एफएटीएफ में 34 देश हैं, जिसमें भारत भी है। लिहाजा, सदस्य देश पाकिस्तान से पूछेंगे कि उन्होंने आतंकवादी संगठनों के खिलाफ अब तक कोई सख्त कार्रवाई की है या नहीं। वहां पाकिस्तान से ठोस सबूत मांगे जाएंगे। ऐसे में अगर पाकिस्तान एफएटीएफ को संतुष्ट न कर सका तो तो उसे ब्लैक लिस्टेड होने से कोई नहीं बचा सकता। अभी तक जो खबरें मिल रही हैं, उससे तो ऐसा ही लगता है कि पाकिस्तान कार्रवाई के नाम पर सिर्फ दिखावा कर रहा है।

आने वाले महीने पाकिस्तान की राजनीति का असली इम्तिहान है। वजह साफ है कि देश की जनता में इमरान की लोकप्रियता लगातार गिर रही है। एक सर्वे के मुताबिक, चुनाव जीतने के बाद इमरान की लोकप्रियता 80 फीसदी थी, जो घटकर 50 फीसदी रह गई है। ऐसे में इमरान, उनकी सरकार और वहां की फौज को सोचना होगा कि अगर वे अभी भी न संभले तो फिर बहुत देर हो चुकी जाएगी। 

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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जब एसपी की शैली को पीत पत्रकारिता की श्रेणी में लाने की कोशिश की गई

पटना में डाक बंगला चौराहे के एक होटल में प्रसिद्ध साहित्यकार और ‘दिनमान’ के संपादक रहे अज्ञेय जी और ‘रविवार’ के संपादक सुरेंद्र प्रताप सिंह के बीच लंबी संवादनुमा बहस हुई

संतोष भारतीय by संतोष भारतीय
Published - Thursday, 04 July, 2019
Last Modified:
Thursday, 04 July, 2019
santosh

संतोष भारतीय, वरिष्ठ पत्रकार।।

पत्रकारिता के इतिहास में 1977 को एक ऐसे वर्ष के रूप में जाना जाएगा, जहां से रास्ता बदलता है। सच्चिदानंद हीरानंद वात्सायन अज्ञेय, प्रफुल्लचंद्र ओझा मुक्त, धर्मवीर भारती, मनोहर श्याम जोशी, विद्यानिवास मिश्र, रघुवीर सहाय, कन्हैयालाल नंदन जैसे बड़े साहित्यकार हिंदी पत्रिकाओं के या दैनिक अखबारों के संपादक हुआ करते थे। कोई नहीं सोच सकता था कि जिसकी उम्र 25 साल के आसपास है और जो साहित्यकार भी नहीं है, वह भी हिंदी की किसी पत्रिका का या दैनिक अखबार का संपादक हो सकता है।

पहली बार साहित्यकार और पत्रकार के बीच एक रेखा खिंची और ‘रविवार’ के पहले संपादक एमजे अकबर बने, जिन्होंने कुछ ही महीनों में यह जिम्मेदारी सुरेंद्र प्रताप सिंह (एसपी) को दे दी। व्यावहारिक रूप से सुरेंद्र प्रताप सिंह ही ‘रविवार’ के पहले संपादक थे। ‘आनंद बाजार पत्रिका’ ने हिंदी के इतिहास में जब हिंदी पत्रिका निकालने का निश्चय किया, तब अंग्रेजी साप्ताहिक ‘संडे’ को निकालने का भी निर्णय लिया, जिसके लिए उन्होंने एमजे अकबर को नियुक्त किया। अकबर की सलाह पर ही एसपी सिंह ‘धर्मयुग’ छोड़कर ‘रविवार’ के संपादक बने।

तब हिंदी जगत के सभी पुराने संपादकों को यह फैसला पसंद नहीं आया। उनका मानना था कि अच्छा साहित्यकार ही अच्छा पत्रकार हो सकता है। सुरेंद्र प्रताप सिंह ने हिंदी पत्रकारिता में एक नया अध्याय शुरू किया और उन्होंने 20 से 25 साल की उम्र के लोगों को सक्रिय पत्रकार बनाने की परंपरा शुरू की। उन्होंने उदयन शर्मा को विशेष संवाददाता बनाकर फील्ड रिपोर्ट कितनी महत्वपूर्ण होती है हिंदी पत्रकारिता में, यह साबित कर दिया। यही वो विभाजन का साल है, जहां से साहित्य और पत्रकारिता अलग हुई। इसने साबित कर दिया कि सुरेंद्र प्रताप सिंह का फैसला एक क्रांतिकारी फैसला था, जिसने हिंदी पत्रकारिता में 20 वर्ष के नौजवानों के लिए बहुत कुछ कर दिखाने के मौके उपलब्ध कराने के दरवाजे खोल दिए।

इसके बाद तो पत्रकारिता में विशेषकर हिंदी पत्रकारिता में अद्भुत उदाहरण बने। पहली बार हिंदी के नौजवान पत्रकारों की वजह से सत्ता दबाव में आई, मंत्रियों ने अपने को सुधारा, कुछ के त्यागपत्र हुए, मुख्यमंत्री भी दबाव में आए और इन नौजवान पत्रकारों की रिपोर्ट पर मुख्यमंत्रियों तक के त्यागपत्र हुए। पटना में डाक बंगला चौराहे के एक होटल में प्रसिद्ध साहित्यकार और ‘दिनमान’ के संपादक रहे अज्ञेय जी और ‘रविवार’ के नए बने नौजवान संपादक सुरेंद्र प्रताप सिंह के बीच इसी विषय पर एक लंबी संवादनुमा बहस हुई। अज्ञेय जी ने सुरेंद्र प्रताप सिंह की पत्रकार शैली की जमकर आलोचना की और उसे पीत पत्रकारिता की श्रेणी मैं लाने की कोशिश की, जिसका सुरेंद्र प्रताप सिंह ने भरपूर विरोध किया। अज्ञेय जी के जीवन काल में ही पत्रकारिता को लेकर सुरेंद्र प्रताप सिंह का दृष्टिकोण सही साबित हो गया। हिंदी पत्रकारिता ने सफलतापूर्वक पत्रकारिता की ऐसी धार विकसित की, जिसने सत्ता पर जनता की अनदेखी करने से पैदा डर का आविष्कार कर दिया।

1977 से ही पत्रकारिता की एक दूसरी धारा भी विकसित हुई, जो अंग्रेजी पत्रकारिता की विशेषता बनी हुई थी, वह थी पीआर जर्नलिज्म। हिंदी के कुछ बड़े संपादक और पत्रकारों का एक वर्ग इस धारा का चेहरा बन गए। उनकी पहचान थी कि वो कितने बड़े राजनेताओं के मित्र हैं और उनके हक मैं पत्रकारिता करते हैं। हिंदी के इन पत्रकारों का जोर शोर से समर्थन अंग्रेजी के वरिष्ठ पत्रकार और संपादक करते थे।

दरअसल, हिंदी के युवा पत्रकारों के धारदार तेवर से अंग्रेजी पत्रकारिता परेशान थी और इसे समाप्त करना चाहती थी। यहीं पर एमजे अकबर ने ऐतिहासिक रोल निभाया। उन्होंने प्रसिद्ध अंग्रेजी सप्ताहिक ‘संडे’ को हिंदी पत्रकारिता के तेवर से जोड़ दिया। उन्होंने पहली बार हिंदी के पत्रकारों की फील्ड रिपोर्ट को अनुवादित कर ‘संडे’ में छापा। उन्होंने हिंदी के पत्रकारों से ‘संडे’ के लिए रिपोर्टिंग कराई और पूरी अंग्रेजी पत्रकारिता पर एक ऐसा दबाव बना दिया कि उसने अंग्रेजी पत्रकारिता में भी एक नई धारा पैदा कर दी। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की पत्रकारिता ऐतिहासिक तो थी ही, पर उसमें नए फ्लेवर जुड़ गए। ‘इलस्ट्रेटेड वीकली’ में खुशवंत सिंह के बाद बने संपादक प्रीतीश नंदी ने अंग्रेजी पत्रकारिता का चेहरा बदलने की सफल कोशिश की।

इसके बाद तो हिंदी पत्रकारिता ने देश में और राज्यों में सफलता के कई कीर्तिमान स्थापित किए। अगर हम विषय आधारित विश्लेषण करें तो हिंदी पत्रकारिता ने हर जगह अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और जन सरोकारों के सवाल पर अपनी संवेदना के आधार पर देश का ध्यान खींचा। सुरेंद्र प्रताप सिंह की विकसित की हुई शैली ने हिंदी पत्रकारों को पहली बार स्टार स्टेटस दिलवाया। उन दिनों कुछ ऐसे पत्रकार थे, जो किसी राज्य में रिपोर्ट के लिए जाते थे तो राज्य सरकारें परेशान हो जाती थीं और कोशिश करती थीं कि जितनी जल्दी हो सके यह पत्रकार उनके राज्य से बाहर चले जाएं।

पत्रकारिता का यह चेहरा कैसे बना, इसकी जानकारी आज के नए पत्रकारों को नहीं है। यह भी नहीं पता कि इस चेहरे को बनाने में कितनी मेहनत और कितना प्रयास हुआ है। आज एक और चेहरा हमारे सामने खड़ा है, जो पत्रकारिता में आते ही बिना मेहनत किए ग्लैमरस स्टेटस चाहता है। इसे न विषय की पहचान है और न सामाजिक अंतर्विरोध की। इसे संभवतः यह भी नहीं पता कि किसी भी रिपोर्ट के सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक पहलू भी होते हैं, जिनके बिना वह रिपोर्ट अधूरी है। ऐसा नहीं है कि 100 फीसदी ऐसा होता हो, पर 80 प्रतिशत ऐसा होता है। यही सत्य है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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पदमपति पदम ने रायडू के कदम को कुछ इस तरह बताया ‘बाजारवाद’ पर प्रहार

33 वर्षीय हैदराबादी अंबाती रायडू इन दिनों बड़ौदा की ओर से घरेलू क्रिकेट खेल रहे थे

Last Modified:
Thursday, 04 July, 2019
Padampati

अंबाती रायडू का संन्यास बीसीसीआई, चयन समिति और भारतीय टीम के कप्तान-कोच के मुंह पर जोरदार तमाचा है। इंग्लैण्ड में चल रहे 2019 विश्व कप के लिए भारतीय टीम में न चुने जाने से आहत अंबाती रायडू ने अपना बल्ला खूंटी पर लटकाने की घोषणा करते हुए देश की क्रिकेट में हावी 'बाजारवाद' पर भी करारा प्रहार किया है। बाजारवाद शब्द का यहां इसलिए प्रयोग करना जरूरी है कि अर्से से बीसीसीआई में अजब गजब खेल लगातार होते रहे हैं। इसी कड़ी में रायडू की उपेक्षा एक उदाहरण है।

33 वर्षीय हैदराबादी रायडू जो इन दिनों बड़ौदा की ओर से घरेलू क्रिकेट खेल रहे थे, अब से डेढ़ दशक पहले देश की सबसे होनहार प्रतिभा थे। हैदराबाद क्रिकेट संघ से मनमुटाव और जीटीवी की 20-20 क्रिकेट लीग से जुड़ जाने के चलते रायडू को काफी समय तक बोर्ड का कोपभाजन बनकर वनवास भोगना पड़ा था। बाद में इस बल्लेबाज ने भारतीय टीम में जबरदस्त वापसी की, लेकिन बोर्ड में कुछ बाजारू तत्व उनके पीछे तब भी पड़े हुए थे। फॉर्म के बावजूद एकबार उनको फिटनेस (योयो टेस्ट) के आधार पर टीम में शामिल नहीं किया गया था। यह जुझारू फिर लौटा और अपने दमदार खेल से उसने आलोचकों को एक बार फिर खामोश कर दिया।

जिसको भारतीय क्रिकेट की जरा सी भी समझ थी, वह यह मानकर चल रहा था कि विश्व कप में रायडू का चयन पक्का है, मगर जब 15 सदस्यीय टीम की घोषणा हुई, तब आजमाये हुए अश्व रायडू के स्थान पर एक औसत दर्जे के तथाकथित हरफनमौला विजय शंकर को इस चार वर्षीय 'क्रिकेट महाकुम्भ' के लिए चुन लिया गया।

ऋषभ पंत, अजिंक्‍य रहाणे और नवदीप आदि के साथ रायडू को स्टैंडबायी में रखा गया। शिखर धवन के चोटिल होने के बाद खैर, पंत को बुला लिया गया, लेकिन जब विजय शंकर को चोट के नाम पर स्वदेश भेजा गया, तब उसके स्थान पर रायडू या रहाणे, जो पहले से ही काउन्टी खेल रहे हैं, को नहीं बल्कि उस मयंक अग्रवाल को टीम मे शामिल किया गया, जिसने देश के लिए दो टेस्ट मैच जरूर खेले, मगर सीमित ओवरों का एक भी मैच अभी तक नहीं खेला है। मयंक का चयन यह जताता है कि चयन समिति की कोई औकात नहीं। आप लाखों रुपए महीना लीजिए और चुप रहिए।

जाहिर है कि यह फैसला भारतीय टीम के कप्तान विराट कोहली और कोच रवि शास्त्री की मर्जी से बोर्ड ने लिया। मैं नहीं जानता कि मयंक को मौका मिलेगा या नहीं, क्योंकि टीम को, यदि फाइनल मे पहुंची तो कुल तीन मैच खेलने हैं। क्या चयन समिति मयंक को रोहित के बतौर साथी उतारेगी और बांग्लादेश के खिलाफ रोहित के साथ 180 रन की रिकॉर्ड साझेदारी निभाने वाले के. एल राहुल को चौथे क्रम पर भेजेगी? इसका जवाब तो आने वाला समय ही देगा, परन्तु मयंक को बुलाकर एक धाकड़ बल्लेबाज रायडू को असमय खेल छोड़ने पर विवश जरूर कर दिया गया, यह बेझिझक स्वीकार करना ही होगा।

(वरिष्ठ पत्रकार पदमपति पदम की फेसबुक वॉल से)

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मिस्टर मीडिया: एक स्ट्रिंगर से लेकर चैनल हेड तक को यह समझ होनी चाहिए

पत्रकारिता विश्वविद्यालयों में भी इन पाठ्यक्रमों का गहराई से समावेश नहीं है

राजेश बादल by राजेश बादल
Published - Wednesday, 03 July, 2019
Last Modified:
Wednesday, 03 July, 2019
Rajesh

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

उस दिन राज्य सभा में कश्मीर पर चर्चा हो रही थी। गृहमंत्री इस राज्य की तीन दशक पुरानी समस्या पर चर्चा का उत्तर दे रहे थे। मैंने बारी-बारी से करीब-करीब सारे चैनल देखे। कुछ देर टुकड़ों में उन्होंने कुछ कथन दिखाए। कोई प्रायोजित कार्यक्रम पर चला गया, कोई क्रिकेट वर्ल्ड कप का रिकॉर्डेड प्रोग्राम दिखाने लगा और किसी में मुंबई की बरसात से जुड़ी खबरें प्रसारित हो रही थीं।

इन समाचारों से मेरा विरोध नहीं है। तर्क यह है कि जब अंतर्राष्ट्रीय आकार ले चुकी देश की सबसे गंभीर समस्या पर संसद में बहस हो रही हो, तो क्या पत्रकार उससे अपने आप को अलग कर सकते हैं? ध्यान रखिए कि संसद की कार्यवाही भारतीय लोकतंत्र की सबसे संवेदनशील प्रक्रिया होती है। उसकी तुलना क्रिकेट, बरसात, राशिफल शो या उत्पादों की बिक्री दिखाने से नहीं की जा सकती। संसद की प्रक्रिया एक बीट नहीं है। उसे बीट बना दिया है।

संसदीय लोकतंत्र हमारी जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा है। यह सांस की तरह हर भारतीय के भीतर धड़कना चाहिए। यदि पत्रकार यह जिम्मेदारी नहीं समझते तो विनम्रता से कहना चाहता हूं कि वे पत्रकार नहीं हैं। चाहे खेल पत्रकार हों या बिजनेस के, क्राइम के हों या फिर पॉलिटिकल, सभी को संसद के बारे में अच्छी जानकारी होनी चाहिए। एक स्ट्रिंगर से लेकर चैनल हेड तक को यह समझ होनी चाहिए।

हम भारतीय संसद को लोकतंत्र का सर्वोच्च मंदिर कहते हैं तो फिर इस मंदिर के प्रति इतनी उदासीनता या उपेक्षा का भाव हमारे पत्रकारिता-कर्तव्य को निभाने के दौरान क्यों रहता है? कितने पत्रकार हैं, जो सदनों के प्रश्नोत्तर को गंभीरता से पढ़ते हैं और उन्हें अपनी रिपोर्टिंग या संपादकीय लेखों का अंग बनाते हैं। एक प्रश्न का उत्तर जुटाने के लिए लाखों रुपए हमारे टैक्स से खर्च होते हैं और हम इस पैसे को गटर में बह जाने देते हैं।

इसी तरह स्थाई समितियों, लोकलेखा समितियों, संयुक्त संसदीय समितियों, प्रवर समितियों और अन्य समितियों के कामकाज पर मीडिया कितना ध्यान देता है? क्या उनकी रिपोर्टें कभी अखबार के पन्नों या स्क्रीन पर परोसी जाती हैं? शायद दस फीसदी भी नहीं। करोड़ों रुपए इस तरह व्यय हो जाने देते हैं और उसकी जानकारी आम आदमी के लिए देने की ललक भी हमारे अंदर पैदा नहीं होती। यह कैसा पत्रकारिता धर्म है?

अफसोस की बात है कि भारत के बड़े-बड़े मीडिया शिक्षण संस्थानों में असेंबली और पार्लियामेंट्री पाठ्यक्रम नदारद हैं। यहां तक कि पत्रकारिता विश्वविद्यालयों में भी इन पाठ्यक्रमों का गहराई से समावेश नहीं है। मीडिया स्कूल अधकचरे पत्रकार क्यों पैदा कर रहे हैं? उनसे कोई जवाब तलब भी नहीं होता। आज सवा सौ करोड़ की आबादी वाले देश में सवा सौ अच्छे संसदीय पत्रकार नहीं हैं।

इन दिनों संसद का बजट सत्र चल रहा है। हर पत्रकार रोज अपनी मार्कशीट में अंक भरता है। देख लीजिए कि संसद की कार्यवाही को हम कितने प्रतिशत स्थान दे रहे हैं। हम राजनेताओं को जिम्मेदार बनने की नसीहत तो देते हैं, लेकिन हम खुद कितने परिपक्व और जिम्मेदार हैं, कभी अपने अंदर भी झांक लीजिए मिस्टर मीडिया!

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

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जायरा वसीम पर अनुरंजन झा की खरी-खरी, बॉलिवुड से की ये अपील

अभिनेत्री के हिसाब से उनका अभिनय करना इस्लाम और अल्लाह को मंजूर नहीं

Last Modified:
Monday, 01 July, 2019
Anuranjan Jha

अनुरंजन झा, वरिष्ठ पत्रकार।।

2006-7 की बात है। इंवेस्टिगेटिव टीम कोबरा पोस्ट को लीड कर रहा था और फतवों पर स्टोरी की थी। कई अच्छे रिपोर्टरों की टीम इस खबर पर हमारे साथ थी। तकरीबन 2 दर्जन फतवे देश के अलग-अलग मुफ्तियों से खरीदे गए थे। अजीबोगरीब फतवे, दिलचस्प फतवे, उसमें एक मुफ्ती ने इस बाबत भी फतवा दिया था कि टीवी और फिल्मों में मुसलमानों के लिए काम करना हराम है।

इस बात को और ठोस तरीके से प्रमाणित करने के लिए उसने यह भी कहा था कि चूंकि ऐसा करना इस्लाम में हराम है,इसीलिए युसूफ खान ने दिलीप कुमार बनकर काम करना शुरू किया। बड़े गर्व से उस मुफ्ती ने वो फतवा महज 5 हजार में हमारी टीम को बेचा था। उस फतवे के लिहाज से आमिर, शाहरूख समेत सभी मुस्लिम कलाकारों को ऐसा काम नहीं करना चाहिए। अभिनेत्रियों के बारे में उनकी राय जो थी, वो तो माशाअल्लाह...। सबको वो जन्नत की वही हूर समझते थे, जो उनके जिहादियों के काम आती हैँ। ये सब बातें उस मुफ्ती ने कही थीं और उस वक्त करार के मुताबिक ये खबर तब के स्टार न्यूज (अब एबीपी न्यूज) पर चलाई गई थी। जाहिर है, हंगामा हुआ। पूरी टीम को महीनों धमकी वाले संदेश आते रहे। संदेश में यहां तक कहा गया कि तुम्हें दोजख नसीब होगा...इत्यादि-इत्यादि।

यह बातें हम आज इसलिए लिख रहे हैं कि कुछ इसी तरह की हरकत फिर एक बार हुई है और ऐसी ही बातों का हवाला देकर अभिनेत्री जायरा वसीम ने अभिनय छोड़ने की बात कही है। उनके हिसाब से उनका अभिनय करना इस्लाम और अल्लाह को मंजूर नहीं। उनके ईमान में दखल है। तो इसका मतलब हिंदुस्तान के उन सभी मुसलमान कलाकार जिनको हमने अपनी आंखों पर बिठाया है, क्या वो अपने ईमान के साथ धोखा करते हैं, पड़ोसी इस्लामी मुल्कों में जहां हमसे बेहतर नहीं तो कमतर भी नहीं कलाकार मौजूद हैं, क्या वो सब बेईमानी करते हैं। इस देश में आज भी लाखों मुसलमान नौजवान (लड़के-लड़कियां) मुंबई का रुख करते हैं, दिन-रात वहां सितारा बनने के लिए जद्दोजहद करते हैं, क्या उनका अपना कोई ईमान नहीं है।

दरअसल,ऐसा कहना इस्लाम और अल्लाह के साथ बेईमानी है। आपको दंगल गर्ल के तौर पर जायरा वसीम याद तो होंगी ही, साथ ही आपको यह भी याद होगा कि किस तरह जायरा ने हवाई यात्रा में एक सोते हुए व्यक्ति पर छेड़छाड़ का आरोप मढ़ दिया था। अभिनेत्री होने का फायदा उठाने के लिए खुद को एक बेसहारा लड़की के तौर पर पेश किया था और मीडिया की सुर्खियां बटोरी थीं। जायरा के ही साथ सफर करने वाले पैसेंजर ने सारी कहानी पुलिस के सामने बयान की और फिर उस शख्स को जमानत मिली। इतना ही नहीं, महबूबा से मुलाकात के बाद पाकिस्तान के पक्ष में अपने बयान को लेकर भी वो सुर्खियों में आ चुकी हैं।

जायरा को ईमान का यह पाठ पढ़ाते हुए अभिनय को कटघरे में खड़ा करने से पहले अपने गॉडफादर आमिर खान से कम से कम पूछना चाहिए था और उनको भी यह सलाह देनी चाहिए थी। अगर आमिर-शाहरूख का ईमान जायरा की तरह जाग जाए तो हम कितनी उम्दा कलाकारी देखने से महरूम रह जाएं, इसकी तो बस कल्पना ही की जा सकती है। यहां बात सिर्फ मुसलमानों के फिल्मी दुनिया पर काम करने नहीं, बल्कि उस दुनिया के तौर तरीकों पर सवाल है, जिसके सहारे लाखों परिवार पलते हैं, करोड़ों लोगों को दो जून की रोटी नसीब होती है। जायरा का यह बयान जितना हास्यापद है, उतना ही आपत्तिजनक है। आपको काम नहीं करना था तो बस नहीं करना था, कोई घर से खींच कर तो आपको काम करने के लिए लाता नहीं। यह ढोल पीटना किसलिए?

दरअसल, पिछले पांच सालों में कुछ खास नहीं कर पाने के कारण शायद जायरा अवसाद में हों। जायरा को यह मालूम होना चाहिए कि ‘दंगल’ फिल्म की सफलता आमिर खान औऱ उऩकी टीम की सफलता है और उसकी सीढ़ी पर चढ़ जो स्वाद इन्होंने चखा, वो इनका अपना नहीं था। अगर अभियन में ताकत होती तो दूसरी फिल्म तमाम कोशिशों के बाद भी लोगों में दिलों में जगह क्यों नहीं बना पाई, जबकि उसमें भी तो आमिर खान थे।

कुल मिलाकर देखें तो साफ लगता है कि दंगल की इस अभिनेत्री का अभिनय में करियर कुछ खास नहीं चल रहा है और उसे हिंदुस्तान ने जो दिया है, उसकी दरअसल वो उतनी हकदार नहीं थी। धर्म और इस्लाम के नाम पर भ्रम में डूबी हुई एक अति सामान्य मुस्लिम लड़की है, जो निहायत ही डरपोक और स्वार्थी है। अपने स्वार्थ से डर भरे बयान में इस लड़की ने धर्म का जो तड़का डाला है, वो निहायत ही घिनौना है। इस बयान के बाद तो हम मुंबई इंडस्ट्री से आग्रह करेंगे कि इसको कभी काम मत देना। इसलिए काम मत देना कि क्योंकि जिसने उसे अभी तक सब कुछ दिया, उसका अहसान जिस तरीके से चुकाया है, वह निहायत ही शर्मिंदा करने वाला है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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