मीडिया की आजादी और अंकुश की सीमा पर वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता ने यूं रखी ‘मन की बात’

एक बार फिर गंभीर विवाद। प्रिंट, टीवी चैनल, सीरियल, फिल्म, सोशल मीडिया को कितनी आजादी और कितना नियंत्रण? सरकार, प्रतिपक्ष और समाज कभी खुश, कभी नाराज।

आलोक मेहता by
Published - Monday, 25 January, 2021
Last Modified:
Monday, 25 January, 2021
Alok Mehta

आलोक मेहता, वरिष्ठ पत्रकार।।

एक बार फिर गंभीर विवाद। प्रिंट, टीवी चैनल, सीरियल, फिल्म, सोशल मीडिया को कितनी आज़ादी और कितना नियंत्रण? सरकार, प्रतिपक्ष और समाज कभी खुश, कभी नाराज। नियम-कानून, आचार संहिताएं,पुलिस व  अदालत के सारे निर्देशों के बावजूद समस्याएं कम होने के बजाय बढ़ रही हैं। सूचना संसार कभी सुहाना, कभी भूकंप की तरह डगमगाता, कभी ज्वालामुखी की तरह फटता दिखाई देता है। आधुनिकतम टेक्नोलॉजी ने नियंत्रण कठिन कर दिया है। सत्ता व्यवस्था ही नहीं, अपराधी-

माफिया, आतंकवादी समूह से भी दबाव, विदेशी ताकतों का प्रलोभन और प्रभाव सम्पूर्ण देश के लिए खतरनाक बन रहा है। इन परिस्थितियों में विश्वसनीयता तथा भविष्य की चिंता स्वाभाविक है।

मुंबई उच्च न्यायालय ने पिछले दिनों मीडिया को लेकर लगभग ढाई सौ पृष्ठों का ऐतिहासिक फैसला  दिया है, जिस पर स्वयं मीडिया ने प्रमुखता से नहीं बोला, दिखाया और प्रकाशित किया। सिने कलाकार सुशांत सिंह राजपूत की मौत की घटना के संबंध में आशंकाओं एवं दो टीवी न्यूज चैनल्स की कवरेज पर दायर जनहित याचिका पर मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस जी.एस कुलकर्णी ने महत्वपूर्ण फैसला दिया है। सबसे अच्छी बात यह है कि मीडिया की कवरेज पर कई आपत्तियों को रेखांकित करने के बावजूद उन्होंने स्वतंत्रता पर प्रहार कर कोई सजा नहीं दी। उन्होंने मीडिया की स्वतंत्रता और सीमाओं की विस्तार से व्याख्या कर कुछ मार्गदर्शी नियम भी सुझाए हैं।

इसमें कोई शक नहीं कि सुशांत सिंह प्रकरण में मीडिया की व्यापक कवरेज से प्रामाणिक तथ्यों के लिए सीबीआई की जांच संभव हुई। पुलिस के कामकाज और राजनेताओं की विश्वसनीयता कम होने से परिवार और समाज ऐसे मामलों में विस्तार से जांच चाहता है। पिछले दशकों में जेसिका लाल और प्रियदर्शिनी हत्याकांड में मीडिया कवरेज से अपराधियों को दण्डित करवाने में सहायता मिली। आरुषि तलवार हत्याकांड को भी मीडिया ने बहुत जोर से उठाया, लेकिन मीडिया के एक वर्ग ने जांच एजेंसी और अदालत से पहले निष्कर्ष निकालने की जल्दबाजी भी कर दी। यही बात भ्रष्टाचार के कुछ मामलों में लगातार हो रही है। समुचित प्रमाणों के बिना सीधे किसी नेता, अधिकारी अथवा व्यक्ति और संस्था को दोषी बताना अदालत कैसे उचित मानेगी?

हाल के वर्षों में सत्ताधारियों द्वारा कुछ खास लोगों, पूंजीपतियों और कंपनियों को लाभ पहुंचाने के कई गंभीर आरोप सामने आए। संभव है कुछ सही भी हों। पर्याप्त प्रमाण अदालत तक पहुंचने पर दोषियों को दण्डित भी किया गया है। अन्यथा लालू यादव, ओमप्रकाश चौटाला जैसे नेता जेल में नहीं बैठे होते। इन्हें सजा मिलने में देरी अवश्य हुई और वे आज भी अपने अपराध स्वीकारने को तैयार नहीं हैं। यही नहीं, हम जैसे पत्रकारों ने उनके कारनामों को प्रमाण सहित उजागर किया था  तो हमें ही पूर्वाग्रही बताकर उनके समर्थकों ने हमले किये थे। नीरव मोदी देश से भाग जरूर गया, लेकिन ब्रिटेन की जेल में बंद है। इन दिनों भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर राफेल विमान खरीदी से लेकर किसानों के लिए संसद से पारित कानूनों के आधार पर केवल चार-पांच पूंजीपतियों को सारा मुनाफा, किसानों की सारी जमीन देने, हर निर्माण में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप निरंतर कुप्रचारित करने का माध्यम बनने से न केवल सामान्य जनता के बीच, वरन पूरी दुनिया में भारतीय व्यवस्था को बदनाम किया जा रहा है।

केवल प्रतिपक्ष के बयान कहकर क्या मीडिया अपनी मर्यादा और आचार संहिता के पालन से बच सकता है? यह वैसा ही है, जैसे कोई डॉक्टर किसी नेता के बयान या सलाह के आधार पर क्लिनिक में आए व्यक्ति का ऑपरेशन और इलाज करने लगे अथवा अदालतें प्रमाण के बिना सजा सुनाने लगे। हां, जिन आरोपों के प्रमाण उपलब्ध हों, उन्हें रिपोर्ट की तरह पेश कर कानूनी कार्रवाई और सजा का काम अदालत पर ही छोड़ा जाना चाहिए।

मीडिया की समस्या बढ़ने का एक कारण यह भी है कि तथ्य, खबर को आरोपात्मक टिप्पणियों के घालमेल के साथ पाठक और दर्शकों के सामने रख दिया जाता है। दूसरे गंभीर मुद्दे को अधिक प्रसार के लोभ में सनसनीखेज ढंग से उछाला जाता है। अमेरिका अथवा यूरोप में खोजी खबर के लिए महीनों तक दस्तावेजों को जुटाकर क़ानूनी राय लेकर प्रस्तुत किया जाता है। अपने देश में अधिकांश सूचनाएं किसी पक्ष या व्यक्ति विशेष के अपने निहित उद्देश्य से मिली होती हैं अथवा जांच पड़ताल के लिए समय और धन खर्च नहीं किया जाता है। यही कारण है कि सुशांत सिंह मामले में न्यायाधीशों ने मृत व्यक्ति के चरित्र हनन जैसे आरोपों के प्रसारण को अनुचित बताया। उनका यह निर्देश सही है कि ऐसे मामलों में तथ्य सार्वजनिक किए जा सकते हैं, लेकिन उन पर कुछ लोगों को बिठाकर टीवी बहस आरोपबाजी अनुचित है।  उन्होंने यह भी ध्यान दिलाया कि ब्रिटेन में केबल टीवी एक्ट का प्राधिकरण है। भारत में जब तक ऐसी नियामक संस्था नहीं हो, तब तक भारतीय प्रेस परिषद् द्वारा निर्धारित नियमों, आचार संहिता का पालन टीवी-डिजिटल मीडिया में भी किया जाए।

संभवतः माननीय अदालत को यह जानकारी नहीं होगी कि फिलहाल प्रिंट मीडिया का प्रभावशाली वर्ग ही प्रेस परिषद् के नियम-संहिता की परवाह नहीं कर रहा है, क्योंकि उसके पास दंड देने का कोई अधिकार नहीं है, जबकि प्रेस परिषद् के अध्यक्ष

सेवानिवृत्त वरिष्ठ न्यायाधीश ही होते हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार संविधान में हर नागरिक के लिए है। पत्रकार उसी अधिकार का उपयोग करते हैं। समाज में हर नागरिक के लिए मनुष्यता, नैतिकता, सच्चाई और ईमानदारी के साथ कर्तव्य के सामान्य सिद्धांत लागू होते हैं। पत्रकारों पर भी वह लागू होने चाहिए। सरकार से नियंत्रित कतई नहीं हों, लेकिन संसद, न्यायपालिका और पत्रकार बिरादरी द्वारा बनाई गई पंचायत यानी मीडिया परिषद् जैसी संस्था के मार्गदर्शी नियम, लक्ष्मण रेखा का पालन तो हो।

न्यायपालिका के सामने एक गंभीर मुद्दा भी उठाया जाता रहा है कि मानहानि कानून का दुरुपयोग भी हो रहा है, जिससे ईमानदार मीडियाकर्मी को नेता, अधिकारी या अपराधी तंग करते हैं। अदालतों में मामले वर्षों तक लंबित रहते हैं। इसलिए जरूरत इस बात की है कि समय रहते सरकार, संसद, न्यायपालिका, मीडिया नए सिरे से मीडिया के नए नियम-कानून, आचार संहिता को तैयार करे। नया मीडिया आयोग, मीडिया परिषद् बने। पुराने गोपनीयता अथवा मानहानि के कानूनों की समीक्षा हो। तभी तो सही अर्थों में भारतीय गणतंत्र को दुनिया में सर्वश्रेष्ठ साबित किया जा सकेगा। गणतंत्र दिवस की शुभकामनाओं सहित।

(यह लेखक के निजी विचार हैं) 

(लेखक एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष और भारतीय प्रेस परिषद् के पूर्व सदस्य हैं। नवभारत टाइम्स,  हिंदुस्तान, नई दुनिया, दैनिक भास्कर, आउटलुक हिंदी सहित कई पत्र-पत्रिकाओं में संपादक रहे हैं। पद्मश्री और गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार से भी सम्मानित हैं|)

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इस तरह की आजादी ही असल जम्हूरियत की निशानी है, यह बात ध्यान में रखने की है मिस्टर मीडिया!

हिन्दुस्तान के पड़ोस से आ रहीं मीडिया से जुड़ी खबरें डराने वाली हैं। खास तौर पर पाकिस्तान और चीन में निष्पक्ष पत्रकारिता करना खतरे से खाली नहीं है।

राजेश बादल by
Published - Wednesday, 23 June, 2021
Last Modified:
Wednesday, 23 June, 2021
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

हिन्दुस्तान के पड़ोस से आ रहीं मीडिया से जुड़ी खबरें डराने वाली हैं। खास तौर पर पाकिस्तान और चीन में निष्पक्ष पत्रकारिता करना खतरे से खाली नहीं है। इसलिए इस बार मिस्टर मीडिया में परदेसी पत्रकारिता के हाल और उससे देसी पत्रकारिता पर उमड़ते-घुमड़ते चिंता के बादलों के बारे में चर्चा। पहले संसार के सबसे ज्यादा आबादी वाले मुल्क चीन की चर्चा। वहां हॉन्गकॉन्ग के समाचारपत्र ‘एप्पल डेली’ पर चीनी सत्ता ने राजद्रोह का आरोप लगाया है। उसके प्रधान संपादक तथा चार अन्य आला अफसरों को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया।

अखबार की 17 करोड़ की संपत्ति भी जब्त कर ली गई। ‘एप्पल डेली‘ को निष्पक्ष और लोकतंत्र समर्थक माना जाता है। पिछले बरस हॉन्गकॉन्ग में लोकतंत्र के समर्थन में जो आंदोलन हुए थे, उसके बाद से यह पहली बड़ी कार्रवाई है। सरकारी चेतावनी है कि जो पत्रकार लोकतंत्र के समर्थन में लिखेगा, उसे राष्ट्रीय सुरक्षा कानून का उल्लंघन माना जाएगा। अच्छी बात यह है कि अखबार इसके आगे झुका नहीं। उसने विरोध में अगले दिन पांच लाख प्रतियां छापीं। दिन भर लोग कतार में लगकर इस अंक को खरीदते रहे। आमतौर पर यह समाचार पत्र 80 हजार प्रतियां प्रकाशित करता है।

अब पाकिस्तान की बात। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, बीते साल में करीब डेढ़ सौ पत्रकारों के साथ मारपीट, हत्या, अपहरण या अन्य उत्पीड़न की वारदात हुईं। हाल ही में राजधानी इस्लामाबाद में पाकिस्तान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के चेयरमैन अबसार आलम को गोली मार दी गई। इस्लामाबाद में ही एक और लोकप्रिय पत्रकार असद अली तूर के घर में हमलावर घुसे। उनके साथ हाथ-पैर बांधकर देर तक मारपीट की और फौज की तारीफ में नारे लगवाए। जाहिर है कि असद अली सेना के आलोचक थे। अबसार आलम ने भी फौज और आईएसआई की आलोचना की थी।

इससे पहले देश के बेहद सम्मानित एंकर हामिद मीर ने लोकतंत्र पर फौजी दख़ल की निंदा की तो टीवी पर उनका चर्चित शो ही बंद कर दिया गया। समाचार पत्रों में उनके लिखने पर पाबंदी लगा दी गई। हामिद ने पाकिस्तान में पत्रकारों पर सेना के अत्याचारों का विरोध किया था और चेतावनी दी थी कि भले ही पत्रकार फौज की तरह मारपीट और हत्या नहीं कर सकते, लेकिन उनके पास सैनिक तानाशाही के खिलाफ सुबूत हैं। वे कभी भी अवाम के सामने रखे जा सकते हैं। इसी के बाद उन्हें सताया जाने लगा। उत्पीड़न यहां तक बढ़ा कि हामिद मीर को माफी मांगनी पड़ी। एक उदाहरण अजय लालवानी का है। वे सिंध के जुझारू पत्रकार थे। अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के लिए लिखते थे। उनकी दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई। सिंध के सारे पत्रकार इस मामले में एकजुट हो गए, मगर नक्कारखाने में तूती की आवाज कौन सुनता है?

पास-पड़ोस में अभिव्यक्ति की आजादी पर आक्रमण हिन्दुस्तान के लिए शुभ संकेत नहीं हैं। जब-जब पत्रकारिता का निष्पक्ष सुर दबाने अथवा असहमति को कुचलने का प्रयास किया जाता है तो राष्ट्र के हित में नहीं होता। सरकार में बैठे नियंताओं के लिए यह सबक है कि स्वस्थ पत्रकारिता पर दबाव डालकर वे अपने देश का नुकसान तो करते ही हैं, निजी खामियाजा भी उन्हें भुगतना होता है। इंदिरा गांधी ने आपातकाल में प्रेस सेंसरशिप लगाईं थी। अब वे इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके फैसले का ‘प्रेत’ अभी भी देश में जिंदा है। मूक मवेशियों और इंसानों के बीच यही फर्क है कि इंसान अपने सोच को स्वर दे सकता है- ताला लगा के आप हमारी जबान को/कैदी न रख सकेंगे जेहन की उड़ान को/

सोचने-विचार करने और उन्हें प्रकट करने की आजादी ही असल जम्हूरियत की निशानी है। यह बात ध्यान में रखने की है मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

हमारी पत्रकारिता को यह कैसी सनसनी का रोग लग गया है मिस्टर मीडिया!

मिस्टर मीडिया: राजद्रोह की चाबुक अब बेमानी हो गई है!

पत्रकारिता में हो रही इस गंभीर चूक को कैसे रोका जाए मिस्टर मीडिया?

भारतीय पत्रकारिता को मुख्य न्यायाधीश को शुक्रिया तो कहना ही चाहिए मिस्टर मीडिया!

इस तरह का व्यवहार दूषित और अमानवीय मानसिकता का प्रतीक है मिस्टर मीडिया!

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न्यू मीडिया में हैं करियर की अपार संभावनाएं : प्रो. संजय द्विवेदी

वेबसाइट, मोबाइल ऐप और ओटीटी प्लेटफॉर्म में जिस तरह लोगों की रुचि बढ़ रही है, उसे देखकर ये कहा जा सकता है न्यू मीडिया ही वो क्षेत्र है, जिसमें करियर की सबसे अधिक संभावनाएं हैं

Last Modified:
Tuesday, 22 June, 2021
sanjay566

'वेबसाइट, मोबाइल ऐप और ओटीटी प्लेटफॉर्म में जिस तरह लोगों की रुचि बढ़ रही है, उसे देखकर ये कहा जा सकता है न्यू मीडिया ही वो क्षेत्र है, जिसमें करियर की सबसे अधिक संभावनाएं हैं।' यह विचार भारतीय जन संचार संस्थान के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी ने 'जयपुर करियर फेयर' में आयोजित ऑनलाइन कैरियर काउंसलिंग सेशन में व्यक्त किये। इस काउंसलिंग का आयोजन भारद्वाज फाउंडेशन एवं क्रैडेंट टीवी के संयुक्त तत्वाधान में किया गया।

कार्यक्रम में राजस्थान चेंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के मानद महासचिव डॉ. के.एल. जैन, डाटा इंफोसिस के चेयरमैन अजय डाटा, मणिपाल यूनिवर्सिटी, जयपुर के कुलपति प्रो. जी.के. प्रभु, मारवाड़ी यूनिवर्सिटी, राजकोट के कुलपति प्रो. संदीप संचेती और जेके लक्ष्मीपत यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति प्रो. आर.एल. रैना ने भी भाग लिया।

इस अवसर पर प्रो. द्विवेदी ने मीडिया संगठनों की कार्य प्रणाली से विद्यार्थियों को अवगत कराया तथा इस क्षेत्र में करियर की संभावनाओं को लेकर अपने विचार साझा किये। उन्होंने कहा कि लेखन, डिजाइनिंग और फोटोग्राफी जैसे कौशल वाले क्षेत्रों में मीडिया संगठनों में अवसर खुले हैं। पत्रकारिता के अलावा विद्यार्थी अन्य करियर विकल्प का चयन कर सकते हैं, जिसमें फिल्म या टीवी के लिए प्रोडक्शन तथा लेखन, निजी क्षेत्र में कॉरपोरेट कम्युनिकेशन और डिजिटल मार्केटिंग में काफी अवसर हैं। 

प्रो. द्विवेदी ने कहा कि कोविड-19 ने मीडिया के परिदृश्य को बदल दिया है, इसलिए विद्यार्थियों के लिए ई-कॉमर्स और डिजिटल मीडिया कंपनियों में कंटेंट क्रिएशन में रोजगार के अनेक अवसर हैं। टीवी और फिल्म संगठनों के अलावा, ओटीटी प्लेटफॉर्म भी अच्छे लेखकों की तलाश में हैं। ऐसे में लेखन कार्य में अच्छा कौशल रखने वाले विद्यार्थियों के लिए रोजगार की अपार संभावनाएं हैं।

कार्यक्रम का संचालन प्रसिद्ध मैनेजमेंट गुरु पीएम भारद्वाज ने किया। क्रैडेंट टीवी के निदेशक सुनील नरनोलिया ने सभी अतिथियों का स्वागत किया। इस काउंसलिंग में अनेक विद्यार्थियों ने सक्रिय रूप से हिस्सा लिया तथा मीडिया एवं मनोरंजन क्षेत्र में करियर के अवसरों से संबंधित जानकारी हासिल की।

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लोकतंत्र में प्रादेशिक पार्टियों को ग्रहण सा लग गया है: राजेश बादल

हिंदुस्तानी लोकतंत्र में प्रादेशिक पार्टियों को ग्रहण सा लग गया है। स्थापना के दशकों बाद भी जम्हूरियत से उनका जमीनी फासला बढ़ता जा रहा है।

Last Modified:
Tuesday, 22 June, 2021
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राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

प्रादेशिक पार्टियों में कलह और सामंती चरित्र 

हिंदुस्तानी लोकतंत्र में प्रादेशिक पार्टियों को ग्रहण सा लग गया है। स्थापना के दशकों बाद भी जम्हूरियत से उनका जमीनी फासला बढ़ता जा रहा है। बहुदलीय तंत्र किसी भी गणतांत्रिक देश की खूबसूरती का सबब होता है। पर जब दलों के अंदर राजरोग पनपने लगें तो फिर प्रजातांत्रिक शक्ल के विकृत होने का खतरा बढ़ जाता है। बिहार में लोकतांत्रिक जनतापार्टी (लोजपा) का आंतरिक घटनाक्रम कुछ ऐसी ही कहानी कहता है। चिराग रामविलास पासवान के उत्तराधिकारी हैं। जिस तरह राजतंत्र में राजकुमार ही उत्तराधिकारी होता था और कभी कभी हम पाते थे कि उत्तराधिकार के लिए जंग छिड़ जाती थी। ऐसी ही अंदरूनी लड़ाई इस नन्ही सी पार्टी में भी नजर आ रही है। राजघराने की तर्ज पर राजा के भाई ने भतीजे की पीठ में खंजर घोंप दिया।

वैसे तो यह इस प्रदेश की इकलौती कहानी नहीं है। इसी दौर में लालू यादव ने आरजेडी को जन्म दिया। वे घनघोर समाजवादी और लोकतंत्र समर्थक लोकनायक जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में प्रशिक्षित हुए थे। लेकिन उनका लोकतंत्र राजतंत्र में तब्दील हो गया, जब उन्होंने पत्नी और सियासत के ककहरे से अपरिचित राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बना दिया। उसके बाद अगली पीढ़ी भी राजपाट संभालने लगी। सत्तारूढ़ जेडीयू के मुखिया नीतीश कुमार क्या अपने आप में सामंती चरित्र का प्रतिनिधित्व नहीं करते? पड़ोसी उत्तर प्रदेश ने भी यही कहानी दोहराई। मुलायम सिंह ने समाजवादी पार्टी बनाई। कुछ बरस बाद पार्टी उनके पुत्र व भाई की कलह का शिकार बन गई। अंततः कमान पुत्र अखिलेश यादव के हाथ में आई। इन दलों में एक और स्थाई रोग चस्पा हो गया। ये दल, यादव कुल की जातियों के रौब तले दब गए। इसी तरह बहुजन समाज पार्टी का उदभव कुछ जातियों से नफ़रत के बीज से हुआ। इन दलों ने समर्थकों को लोकतांत्रिक बनाना तो दूर, उन्हें सामंती प्रजा बना दिया। क्या मायावती के बाद दल में स्वाभाविक निर्वाचित प्रतिनिधियों की दूसरी पंक्ति नजर आती है? इन दलों को अन्य जातियों के वोटों की खातिर कुछ टुकड़े उनको भी डालने पड़े। पर समग्र समाज का प्रतिनिधित्व करने में ये दल नाकाम रहे। इसीलिए ढाई-तीन दशक बाद भी बौने ही हैं। राष्ट्रीय पार्टी के रूप में विकसित नहीं हो पाए। वे शायद राष्ट्रीय होना ही नहीं चाहते। अपनी छोटी छोटी रियासतों से ही गदगद हैं।

हरियाणा में चौधरी देवीलाल ने जिसकी नींव डाली, क्या वह दल युवराजों के अपने खंडित साम्राज्य में तब्दील नहीं हो चुका है? वे जनादेश का मखौल उड़ाते दिखाई देते हैं। जिस पार्टी से चुनाव अभियान में मोर्चा लेते हैं, परिणाम आने के बाद उसी से हाथ मिलाकर गद्दी नशीन हो जाते हैं, पुराने जमाने के छोटे राजाओं की तरह। सिद्धांत-सरोकार कपूर की तरह उड़ जाते हैं। पढ़े लिखे मतदाता भी इन नए नरेशों की स्तुति करते हैं। कमोबेश यही हाल पंजाब का है। वहां अकाली दल भी सामूहिक नेतृत्व को तिलांजलि देकर एक परिवार को ही क्षत्रप बना बैठा है। क्या उस  परिवार से अलग कोई राजनेता उस पार्टी का अध्यक्ष बनने की सोच भी सकता है? महाराष्ट्र में सरकार चला रही शिवसेना भी उत्तराधिकार परंपरा निभा रही है। एक जमाने में इस दल में चचेरे भाइयों के बीच शक्ति संघर्ष देखने को मिला था। अंततः युवराज उद्धव ठाकरे के हाथ में कमान आई। शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी भी कोई अपवाद नहीं है। इस पार्टी के भीतर कितने चुनाव हुए हैं। क्या वाकई दल में सब कुछ गणतांत्रिक ढंग से चल रहा है। शरद पवार के बिना पार्टी के अस्तित्व की कौन कल्पना कर सकता है। तमिलनाडु में सत्ताधारी द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) का भी हाल ऐसा ही है। करुणानिधि ने राजा की तरह पार्टी को चलाया। राजपरिवार जैसे संघर्ष  इसके अंदर भी हुए, शक्ति केंद्र पनपे और फिर एक युवराज के हाथ में कमान आ गई। नवोदित आम आदमी पार्टी का भी यही हाल है। अरविंद केजरीवाल से बड़ी आशाएं थीं। लेकिन क्या हुआ। इस पार्टी पर भी तानाशाही के घुड़सवार चढ़ बैठे। उनकी टीम में स्वतंत्र सोच रखने वाले अधिकतर लोग उनके साथ नहीं रहे। आशुतोष, कुमार विश्वास, किरण बेदी, योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, आशीष खेतान, मेधा पाटकर, एडमिरल रामदास, कपिल मिश्रा, अंजलि दमानिया, कप्तान गोपीनाथ और प्रो. आनंद कुमार तक उनसे पल्ला झाड़ चुके हैं। अरविन्द की कार्यशैली दरअसल निरंकुश अधिनायक की है।

वैसे तो 25-30 बरस एक विराट लोकतंत्र की आयु में कोई खास मायने नहीं रखते, मगर हिंदुस्तान में इन वर्षों ने यकीनन लोकतंत्र का चेहरा विकृत किया है। नब्बे के दशक में जब राजनीतिक अस्थिरता के खेत में कुकुरमुत्तों की तरह ढेर सारी प्रादेशिक पार्टियों की फसल उगी तो उम्मीद थी कि जम्हूरियत की फसल लहलहाएगी। पर ऐसा न हुआ। इन दलों ने लोकतंत्र मजबूत करने के बजाए उसमें घुन लगा दिया। वे भूल गए कि जातियों की महामारी के कारण यह देश पहले ही बहुत भुगत चुका है। भारतीय संविधान की भावना तो ऐसी नहीं है। तो अब क्या माना जाए। इस मुल्क की मिटटी या मिजाज सिर्फ राजतन्त्र के लिए बचा है? एक अखिल भारतीय रियासत राष्ट्र की छोटी छोटी आधुनिक रियासतों का सहारा लेकर हुकूमत करे। जब कोई महीन सा राजपरिवार बड़ा हो जाए तो वह सल्तनत संभाल रहे राजघराने को हटा दे। अवाम धीरे धीरे लोकतंत्र को बौना होते तब तक देखती रहे, जब तक कि वह दम न तोड़ दे। यदि ऐसा हुआ तो निश्चित ही वह बेहद दुखद होगा। इस आलेख का मक़सद केवल प्रादेशिक पार्टियों की शैली पर ध्यान केंद्रित करना था। दोनों बड़ी पार्टियों पर आईन्दा विश्लेषण करेंगे।

(साभार: लोकमत समाचार)

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'पं. माधवराव सप्रे ने दिए पत्रकारिता को राष्ट्रीय और लोकधर्मी संस्कार'

गुलाम भारत में अनेक प्रखर स्वाधीनचेता नागरिक भी रहते थे, जिनमें एक थे पं. माधवराव सप्रे। भारतबोध उनके चिंतन और चिति का हिस्सा था।

Last Modified:
Saturday, 19 June, 2021
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-प्रो.संजय द्विवेदी

गुलाम भारत में अनेक प्रखर स्वाधीनचेता नागरिक भी रहते थे, जिनमें एक थे पं. माधवराव सप्रे। भारतबोध उनके चिंतन और चिति का हिस्सा था। वे अपनी पत्रकारिता, साहित्य लेखन,संपादन, अनुवाद कर्म और भाषणकला से एक ही चेतना भारतीय जन में भरना चाहते हैं वह है भारतबोध। सप्रे जी का सही मूल्यांकन अनेक कारणों से नहीं हो सका। किंतु हम उनकी रचना, सृजन और संघर्ष से भरी यायावर जिंदगी को देखते हैं, तो पता चलता है कि किस तरह उन्होंने अपने को तपाकर भारत को इतना कुछ दिया। उनका भी भाव शायद यही रहा होगा- चाहता हूं ‘मातृ-भू तुझको अभी कुछ और भी दूं।’

मराठीभाषी होने के बाद भी उन्हें हिंदी नवजागरण का पुरोधा कहा गया तो इसके विशिष्ट अर्थ हैं। उनके संपादन में निकले पत्र ‘छत्तीसगढ़ मित्र’, ‘हिंदी केसरी’ इसकी बानगी हैं। वे ‘कर्मवीर’ जैसे विशिष्ठ प्रकाशन के मूल में रहे। उसके प्रेरणाश्रोत रहे। पत्रकारिता को राष्ट्रीय और लोकधर्मी संस्कार देने वाले वे विरल संपादकों में एक हैं। सप्रे जी लोकमान्य तिलक से बहुत प्रभावित थे। उनका समूचा लेखन इसीलिए भारतबोध की अनुभूति से प्रेरित है। अपने एक लेख ‘सुराज्य और सुराज्य’ में वे लिखते हैं-’अंग्रेज सरकार का राज्य, व्यवस्थित और शासन की दृष्टि से सुराज्य होने पर भी, हम लोगों के लिए सुखकारी या लाभदायक नहीं है और यदि हाल की पद्धति कायम रही तो होना भी संभव नहीं है, क्योंकि यह राज्य केवल गोरे राज्याधिकारियों की सलाह पर चलता है, जिन्हें हिन्दुस्तान के हित की अपेक्षा गोरे लोगों का हित अधिक प्रिय है।’ उनके मन में अंग्रेजी शासन के प्रति गुस्सा है पर वे उसे अपेक्षित संयम से व्यक्त करते हैं। उन्हें यह सहन नहीं कि कोई विदेशी उनकी पुण्यभूमि और मातृभूमि पर आकर शासन करे। वे अंग्रेजी राज के नकारात्मक प्रभावों को अपने लेखों में व्यक्त करते हुए देश पर पड़ रहे प्रभावों को रेखांकित करते हैं। हालांकि वे पूर्व के भारतीय राजाओं और पेशवाओं के राज में हुई जनता की उपेक्षा और दमन को भी जानते हैं। वे मानते हैं कि इसी कारण विदेशियों को जनता का प्रारंभिक समर्थन भी मिला, क्योंकि भारतीय राजा जनता के साथ संवेदना से नहीं जुड़े थे। बावजूद इसके उनका भारतप्रेम उनकी लेखनी से प्रकट होता है। वे लिखते हैं-’ जेलखाने का शासन जैसा कष्ट देता है, उसी तरह अंग्रेजी राज्य-प्रबंध के कानून और कायदों से प्रजा चारों ओर से जकड़ी हुई है। अंग्रेजी व्यापारियों का भला करने के लिए,खुले व्यापार का तत्व शुरू करने से, इस देश का व्यापार डूब गया।’ नागपुर से छपने वाले अपने अखबार ‘हिंदी केसरी’ को उन्होंने आजादी के आंदोलन का मुखपत्र ही बना दिया था। इसमें देश भर में चल रहे आंदोलनों के समाचार छपते रहते थे। इससे पाठकों को राष्ट्रीय आंदोलन की आंच और धमक का पता चलता था। 24 अगस्त,1907 के अंक में इलाहाबाद, चैन्नै,राजमुंदरी,कोचीन आदि थानों के समाचार छपे हैं। एक समाचार कोचीन का है, उसकी भाषा देखिए- ‘राजा के कालेज में कुछ विद्यार्थियों ने एक बड़ी सभा की थी, उसमें वंदेमातरम् गीत गाया था और वंदेमातरम् का जयघोष किया था। यह खबर सुनकर दीवान ने प्रिंसिपल से इसकी कैफियत मांगी है।’  इस प्रकार की साहसी और भारतप्रेम से भरी पत्रकारिता के चलते हुए उन्हें जेल भी जाना पड़ा। 22, अगस्त,1908 में वे गिरफ्तार किए गए और नवंबर में उनकी रिहाई हुई।

उनका समूचा लेखन, अनुवाद कर्म भारतीय मनीषा से प्रेरित है। वे समर्थ गुरू रामदास की पुस्तक ‘दासबोध’ का अनुवाद करते हैं। हमें पता है समर्थ गुरू रामदास शिवाजी के गुरु ही नहीं एक आध्यात्मिक विभूति थे। उनके आशीष से ही छत्रपति ने मराठा राज्य की स्थापना की। शिवाजी के राज्य के शासन मूल्य बताते हैं कि गुरूकृपा से व्यक्ति का किस तरह रूपांतरण हो जाता है। सप्रे जी लोकमान्य तिलक रचित ‘गीता रहस्य’ का भी अनुवाद हिंदी में करते हैं। इस खास पुस्तक को हिंदी पाठकों को सुलभ कराते हैं। ‘महाभारत मीमांशा’ का अनुवाद भी इसी कड़ी का एक कार्य है। इसके साथ ही उन्होंने ‘शालोपयोगी भारतवर्ष’ को भी मराठी  से अनूदित किया। सप्रेजी ने 1923-24 में ‘दत्त-भार्गव संवाद’ का अनुवाद किया था जो उनकी मृत्यु के बाद छपा। उनका एक बहुत बड़ा काम है काशी नागरी प्रचारणी सभा की ‘विज्ञान कोश योजना’ के तहत अर्थशास्त्र की मानक शब्दावली बनाना। जिसके बारे में कहा जाता है कि हिंदी में अर्थशास्त्रीय चिंतन की परंपरा प्रारंभ सप्रे जी ने ही किया।

संस्थाओं को गढ़ना, लोगों को राष्ट्र के काम के लिए प्रेरित करना सप्रे जी के भारतप्रेम का अनन्य उदाहरण है। रायपुर, जबलपुर, नागपुर, पेंड्रा में रहते हुए उन्होंने न जाने कितने लोगों का निर्माण किया और उनके जीवन को नई दिशा दी।  26 वर्षों की उनकी पत्रकारिता और साहित्य सेवा ने मानक रचे। पंडित रविशंकर शुक्ल, सेठ गोविंददास, गांधीवादी चिंतक सुंदरलाल शर्मा, द्वारिका प्रसाद मिश्र, लक्ष्मीधर वाजपेयी,माखनलाल चतुर्वेदी, लल्ली प्रसाद पाण्डेय,मावली प्रसाद श्रीवास्तव सहित अनेक हिंदी सेवियों को उन्होंने प्रेरित और प्रोत्साहित किया। जबलपुर की फिजाओं में आज भी यह बात गूंजती है कि इस शहर को संस्कारधानी बनाने में सप्रे जी ने एक अनुकूल वातावरण बनाया। जिसके चलते जबलपुर साहित्य, पत्रकारिता और संस्कृति का केंद्र बन सका। 1920 में उन्होंने जबलपुर में हिंदी मंदिर की स्थापना की, जिसका इस क्षेत्र में सांस्कृतिक और साहित्यिक गतिविधियों को बढ़ाने में अनूठा योगदान है।

अपने अप्रतिम योगदान के बाद भी आजादी के तमाम नायकों की तरह माधवराव सप्रे को न तो समाज ने उस तरह याद किया , न ही साहित्य की समालोचना में उन्हें उस तरह याद किया गया जिसके वे पात्र थे। निश्चित ही भारतीय भावधारा, भारतबोध की उनकी आध्यात्मिक धारा की पत्रकारिता के नाते उन्हें उपेक्षित किया गया। भारत के धर्म, उसकी अध्यात्म की धारा से जुड़कर भारत को चीन्हने की कोशिश करने वाला हर नायक क्यों उपेक्षित है, यह बातें आज लोक विमर्श में हैं। शायद इसीलिए आज 150 वर्षों के बाद भी माधवराव सप्रे को हिंदी जगत न उस तरह से जानता है न ही याद करता है। उनकी भावभूमि और वैचारिक अधिष्ठान भारत की जड़ों से जुड़ा हुआ है। वे इस देश को उसके नौजवानों को जगाते हुए भारतीयता के उजले पन्नों से अवगत कराना नहीं भूलते। इसीलिए वे गीता के रहस्य खोजते हैं, महाभारत की मीमांसा करते हैं, समर्थ गुरू रामदास के सामर्थ्य से देशवासियों को अवगत कराते हैं। वे नौजवानों के लिए लेख मालाएं लिखते हैं। उनका यह प्रदेय बहुत खास है।

वे अनेक संस्थाओं की स्थापना करते हैं। जिनमें हिंदी सेवा की संस्थाएं हैं, सामाजिक संस्थाएं तो विद्यालय भी हैं। जबलपुर में हिंदी मंदिर, रायपुर में रामदासी मठ, जानकी देवी पाठशाला इसके उदाहरण हैं।19 जून,1871 को मध्यप्रदेश के एक जिले दमोह के पथरिया में जन्में सप्रे जी 23 अप्रैल,1926 को रायपुर में देह त्याग देते हैं। कुल 54 वर्षों की जिंदगी जीकर वे कैसे खुद को सार्थक करते हैं, सब कुछ सामने है। उनके बारे में  गंभीर शोध और अध्ययन की बहुत आवश्यकता है। उनकी 150 वीं जयंती प्रसंग ने हमें यह अवसर दिया है हम अपने इस पुरखे की याद को देश भर में फैलाएं। यह संयोग ही है देश की आजादी की 75 वीं वर्षगांठ का प्रसंग भी साथ आया है। खुशियां दुगुनी हैं। इसलिए इस महान भारतपुत्र याद कर हम मातृभूमि के प्रति भी श्रध्दा निवेदन करेंगें और आने वाली चुनौतियों के लिए तैयार भी होंगें। यह बहुत सुखद है कि भोपाल में उनकी स्मृति को बनाए रखने के लिए श्री विजयदत्त श्रीधर ने माधवराव सप्रे स्मृति समाचार पत्र संग्रहालय और शोध संस्थान की स्थापना की है। जरूरी है कि शासन स्तर पर भी उनकी स्मृति में  कुछ महत्वपूर्ण काम किए जाएं, ताकि आने वाली पीढ़ियां इन कलमवीरों से प्रेरणा पाकर भारतबोध से भरी मूल्यनिष्ठ पत्रकारिता करने के लिए प्रेरणा प्राप्त करें।

(लेखक भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली के महानिदेशक हैं)

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'डिजिटल की दुनिया में दिखा क्रांतिकारी परिवर्तन, प्रिंट से भी ज्यादा मिल रहे हैं विज्ञापन'

प्रोफेसर केजी सुरेश ने वर्तमान दौर में डिजिटल मीडिया की बढ़ती लोकप्रियता का हवाला देते हुए कहा कि आज 28 प्रतिशत विज्ञापन डिजिटल की तरफ जा रहे हैं

Last Modified:
Tuesday, 15 June, 2021
digitalmedia65655

वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग एवं आंतरिक गुणवत्ता सुनिश्चित प्रकोष्ठ की ओर से 'डिजिटल दौर में मीडिया का बहुआयामी स्वरूप' विषयक सात दिवसीय कार्यशाला की शुरुआत सोमवार को हुई। ऑनलाइन आयोजित कार्यशाला के उद्घाटन सत्र में बतौर मुख्य अतिथि बोलते हुए माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल के कुलपति प्रोफेसर केजी सुरेश ने कहा कि डिजिटल की दुनिया में क्रांतिकारी परिवर्तन देखने को मिला है। आज चार साल के बच्चे से लेकर 80 साल के बुजुर्ग ऑनलाइन कनेक्ट हो रहे हैं। कल तक जिन बच्चों को मोबाइल से दूर रखा जाता था, उन्हें आज मोबाइल से सीखने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।

प्रोफेसर केजी सुरेश ने कोरोना काल से पत्रकारों को निराश न होने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि फिक्की ने मीडिया सेक्टर में 25 प्रतिशत का उछाल आने की संभावना जताई है। प्रोफेसर केजी सुरेश ने वर्तमान दौर में डिजिटल मीडिया की बढ़ती लोकप्रियता का हवाला देते हुए कहा कि आज 28 प्रतिशत विज्ञापन डिजिटल की तरफ जा रहे हैं, जबकि प्रिंट को सिर्फ 25 प्रतिशत विज्ञापन मिल रहा है।

बतौर विशिष्ट अतिथि जनसंचार केंद्र राजस्थान विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर संजीव भानावत ने कहा कि आज छापाखानों से निकलकर पत्रकारिता मोबाइल में कैद हो चुकी है। कंटेंट का डिस्ट्रिब्यूशन तेजी से हो रहा है। डिजिटल दौर में पत्रकारिता मल्टीटास्किंग हो चुकी है। डिजिटल मीडिया में न स्पेस का संकट है न समय का। प्रोफेसर संजीव भानावत ने प्राचीन काल से लेकर वर्तमान दौर में मीडिया के विभिन्न माध्यमों पर चर्चा करते हुए महाभारत के संजय को पहला युद्ध संवाददाता बताया। उन्होंने कहा कि पहले नारद व संजय के पास जो ताकत थी, उसे आज डिजिटल माध्यम ने आम जनता को दी है। हर नई तकनीक कुछ नए खतरे को लेकर आती है, लेकिन इसमें चिंता की कोई बात नहीं है। आज प्रिंट, इलेक्ट्रानिक सभी माध्यम मोबाइल में समा गए हैं।

कुलपति प्रोफेसर निर्मला एस मौर्य ने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि समय के साथ समाज की सोच बदलती है। बदलते युग के साथ जनसंचार में भी बदलाव आता है। कभी एक पन्ने से शुरू हुई पत्रकारिता आज डिजिटल माध्यम तक पहुंची है। उन्होंने कहा कि समय की मांग के अनुरूप मीडिया का स्वरूप भी तेजी से बदल रहा है। आज इंटरनेट मीडिया के कारण अब मिनटों में पूरी दुनिया का हाल जान लेते हैं। कुलपति ने प्रिंट मीडिया की प्रासंगिकता हमेशा बरकरार रहने की भी बात कही।

अतिथियों का स्वागत आंतरिक गुणवत्ता सुनिश्चित प्रकोष्ठ के समन्वयक प्रो. मानस पांडेय एवं कार्यशाला की रूपरेखा एवं संचालन संयोजक डॉ. मनोज मिश्र ने किया। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. सुनील कुमार ने किया। सात दिवसीय कार्यशाला के आयोजन सचिव डॉ. दिग्विजय सिंह राठौर ने अतिथियों का परिचय प्रस्तुत किया। कार्यशाला में सह संयोजक डॉ. धर्मेंद्र सिंह, प्रो. राजेश शर्मा, प्रो. राघवेंद्र मिश्र, डॉ. अवध बिहारी सिंह, डॉ. चंदन सिंह, डॉ. कौशल पांडेय, डॉ. बुशरा जाफरी, डॉ. प्रभा शर्मा, डॉ. छोटेलाल, लता चौहान, डॉ. सतीश जैसल, डॉ. राधा ओझा, डॉ. दयानंद उपाध्याय, डॉ. विजय तिवारी, डॉ. शशि कला यादव, वीर बहादुर सिंह समेत देश के 21 राज्यों से प्रतिभागियों ने भाग लिया।

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'कश्मीर का मसला और हमारा इतिहास बोध'

भारत में अजीब दुविधा है। लोकतंत्र सबको अभिव्यक्ति का अधिकार देता है, लेकिन शायद नागरिक अभी उसके लिए तैयार नहीं हैं।

Last Modified:
Tuesday, 15 June, 2021
kashmir6565

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

भारत में अजीब दुविधा है। लोकतंत्र सबको अभिव्यक्ति का अधिकार देता है, लेकिन शायद नागरिक अभी उसके लिए तैयार नहीं हैं। गैर जिम्मेदारी के आलम में अक्सर वे ऐसे विचार प्रकट करते हैं, जो देश को नुकसान पहुंचाते हैं। अनजाने में जो ऐसी बात करे, उसे तो एक बार क्षमा किया जा सकता है। मगर जानबूझकर कही गई बातें किस श्रेणी में रखी जाएं? सभ्य समाज को यह समझने की जरूरत है। कश्मीर पर ताजा बहस इसी तरह की है। चंद रोज पहले कांग्रेस की प्रथम पंक्ति के एक नेता ने डिजिटल मंच पर कहा कि यदि उनका दल सत्ता में आया तो अनुच्छेद -370 फिर बहाल करने पर विचार करेगा। साफ है कि इसे सियासी रंग दिया गया है। मगर यह पार्टी की अधिकृत राय नहीं है, लेकिन क्या नेताजी को कश्मीर-प्रसंग में अपने दल की सरकार का इतिहास पता है। शायद नहीं। अन्यथा वे इस तरह नहीं कहते। क्या वे नहीं जानते थे कि अनुच्छेद-370 के समापन की शुरुआत तो जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल में ही हो गई थी। पिछले साल केंद्र सरकार ने जिस 370 को खत्म किया, वह एक तरह से खोखली थी। कई प्रावधान तो नेहरू, शास्त्री और इंदिरा गांधी के समय ही नहीं रहे थे।

इसे समझने के लिए अतीत याद करना होगा। भारतीय संविधान सभा में जम्मू कश्मीर के चार लोग थे। ये थे शेखअब्दुल्ला, मिर्ज़ा अफजल बेग़, मोहम्मद सईद मसूदी और मोतीराम बागड़ा। संविधान सभा ने उनकी सहमति से अनुच्छेद-370 स्वीकार किया तो खास बिंदु थे- राज्य अपना संविधान बनाएगा, रक्षा, विदेश व संचार भारत के जिम्मे थे, संवैधानिक बदलाव के लिए राज्य की मंजूरी जरूरी थी, यह सहमति राज्य संविधान सभा से पुष्टि चाहती थी। राज्य संविधान सभा काम पूरा करने के बाद भंग हो जानी थी। राष्ट्रपति को 370 हटा सकते थे पर संविधान सभा की अनुमति जरूरी थी। लब्बोलुआब यह कि जम्मू कश्मीर संविधान सभा सर्वोच्च थी और 370 का भविष्य उसे ही तय करना था। यह अस्थायी व्यवस्था थी। सितंबर, 51 में संविधान सभा के चुनाव हुए। सारी सीटें नेशनल कांफ्रेंस ने जीतीं। वज़ीरेआज्म शेख़अब्दुल्ला चुने गए। राज्य की यह पहली निर्वाचित सरकार थी। इसके बाद जुलाई, 52 में केंद्र-नेशनल कांफ्रेंस समझौते में दोनों पक्षों ने 370 मंजूर कर ली। अब विधानसभा ही सर्वोच्च थी। केंद्र दखल देने की स्थिति में नहीं था। राज्य का झंडा भी अलग था। भारतीय संविधान के मौलिक अधिकार सीमित ही लागू होने थे। आंतरिक गड़बड़ी की स्थिति में ही केंद्र राज्य की मंजूरी से इमरजेंसी लगा सकता था। धारा 356 व 360 लागू नहीं की जा सकती थी। संसद व कश्मीर विधानसभा ने भी इसकी पुष्टि कर दी थी। नवंबर, 52 में महाराजा की गद्दी समाप्त कर दी गई। युवराज कर्णसिंह पहले सदर ए रियासत चुने गए।

इसके बाद शेख अब्दुल्ला ने रंग बदले। वे कश्मीर की आजादी की बात करने लगे। उन्हें अमेरिका ने भड़काया था। बदले रुख से जनता और मंत्रिमंडल में व्यापक असंतोष था। सदर ए रियासत कर्णसिंह ने शेखअब्दुल्ला को केबिनेट की बैठक बुलाकर शांति कायम कराने का निर्देश दिया। शेख ने निर्देश को धता बताया और गुलमर्ग घूमने चले गए। सदर ए रियासत ने सरकार बर्खास्त कर दी और शेख गिरफ्तार कर लिए गए। नेशनल कांफ्रेंस ने बख़्शी ग़ुलाम मोहम्मद को नया नेता चुना। नई सरकार बनी। नेहरू, शेख़ के धोखे से खफा थे। जनवरी, 54 में नए नेतृत्व ने दिल्ली समझौते में आस्था जताई कस्टम, आयकर और उत्पादन कर भी केंद्र को वसूलने का हक मिला। सुप्रीम कोर्ट को मान्यता दी गई। फरवरी, 54 में एक बार फिर राज्य सरकार ने भारत विलय पर मोहर लगा दी। संविधान सभा ने माना कि भारतीय संविधान कश्मीर पर लागू होगा। मई, 54 में राष्ट्रपति ने भारतीय संविधान कश्मीर पर लागू कर दिया। नवंबर में नेशनल कांफ्रेंस ने ऐलान किया कि न कश्मीर कभी पाकिस्तान में मिलेगा और न आजादी की कोशिश करेगा। दरअसल शेख़अब्दुल्ला का रवैया उनकी पार्टी के लोगों ने पसंद नहीं किया था।

अक्टूबर, 56 में कश्मीर के संविधान का अंतिम मसविदा संविधान सभा में पेश हुआ। इसमें कश्मीर भारत का अभिन्न अंग बताया गया। संविधान 26 जनवरी, 57 से लागू हो गया। संविधान सभा भंग हो गई। नए चुनाव हुए। इनमें नेशनल कांफ्रेंस ने 60 सीटें जीतीं। बख्शी ग़ुलाम मोहम्मद ने फिर सरकार बनाई। इसके बाद 1959 में संविधान सभा ने चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट के कश्मीर में प्रभावशील होने को मंज़ूरी दी। कश्मीर में प्रवेश परमिट 1961 में खत्म हो गया। राज्य में 62 के तीसरे चुनाव के बाद गुलाम मोहम्मद सादिक 64 में प्रधानमंत्री बने। इसी साल राष्ट्रपति ने अध्यादेश के जरिए धारा 356 व 357 कश्मीर में लागू कर दी। राज्य में राष्ट्रपति शासन का रास्ता भी साफ हो गया। इस समय शास्त्रीजी प्रधानमंत्री थे। अनुच्छेद 370 छिन्न भिन्न हो चुका था। पर अभी भी काम बाक़ी था। तीस मार्च, 65 को विधान सभा ने सर्वानुमति से संविधान संशोधन किया कि सदर ए रियासत का पद राज्यपाल कहा जाएगा। राज्य में प्रधानमंत्री नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री होगा। बाद के वर्ष भी 370 के निरंतर सिकुड़ते जाने की कहानी है। मसलन राज्य से लोकसभा सांसद निर्वाचित होने लगे। हाई कोर्ट सुप्रीम कोर्ट के अधीन आ गया। अनुच्छेद 226 और 249 लागू हो गए।

यहां नेहरू जी के इकोनॉमिक टाइम्स में छपे भाषण का जिक्र जरूरी है। उन्होंने कहा था, ‘अनुच्छेद 370 संविधान का स्थाई हिस्सा नहीं है। यह जब तक है, तब तक है। इसका प्रभाव कम हो चुका है। हमें इसे धीरे धीरे कम करना जारी रखना है।’ यह निष्कर्ष निकालने में हिचक नहीं कि कांग्रेस पार्टी 370 के समापन में अपने योगदान को ही याद नहीं करना चाहती।    

(साभार: लोकमत समाचार)

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हमारी पत्रकारिता को यह कैसी सनसनी का रोग लग गया है मिस्टर मीडिया!

कमाल है। ऐसे पत्रकार तो कभी नहीं थे। हर सूचना को सच मान लेना और उसके आधार पर निष्कर्ष भी निकाल लेना कौन सा पेशेवर धर्म है?

राजेश बादल by
Published - Friday, 11 June, 2021
Last Modified:
Friday, 11 June, 2021
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

कमाल है। ऐसे पत्रकार तो कभी नहीं थे। हर सूचना को सच मान लेना और उसके आधार पर निष्कर्ष भी निकाल लेना कौन सा पेशेवर धर्म है? बीते दिनों कई उदाहरण सामने आए। एक नमूना यह कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री दिल्ली आए तो मान लिया गया कि उनका इस्तीफा होने ही जा रहा है। इस आशय की खबरें प्रसारित होने लगीं। यह भी मान लिया गया कि दिल्ली से भेजे गए नौकरशाह उप मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने ही जा रहे हैं।

डिजिटल मीडिया के कुछ मंचों से प्रधानमंत्री का चित्र गायब हो गया तो कहा गया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हाथ है। फिर खबर फैली कि अलग पूर्वांचल प्रदेश बनाया जा रहा है। उसमें गोरखपुर भी आएगा। मुख्यमंत्री को उस छोटे से राज्य के बस्ते में ही बंद कर दिया जाएगा। अतीत का उदाहरण दिया गया कि नारायण दत्त तिवारी के साथ भी ऐसा हुआ था। वे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे थे। फिर एक समय ऐसा आया, जब उन्हें प्रधानमंत्री का चेहरा समझा जाने लगा। लेकिन वे नए नवेले उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बन गए। उत्थान और पतन की यह गाथा योगी के साथ भी चस्पा कर दी गई।

पत्रकारिता में सियासत के परदे के पीछे की कहानी समझने और उसका विश्लेषण करने का हुनर क्यों नदारद हो गया? इन दिनों प्रत्येक सूचना या अफवाह के आधार पर नया काल्पनिक सच गढ़ने की शैली क्यों विकसित हो गई। हमारे राजनीतिक विश्लेषक इतने बौने हो गए कि वे सियासी सूचना की तह तक जाने का प्रयास तक नहीं करते। पत्रकारिता में दशकों से एक मंत्र प्रचलित है कि जो कहा जाता है, वह किया नहीं जाता और जो किया जाता है, वह होठों से नहीं फूटता। बेशक यह बुर्जुआ लोकतंत्र की निंदनीय परंपरा है, मगर आज के आधुनिक हिन्दुस्तान ने इसे अभी तक छोड़ा नहीं है।

फिर हमारे खबरनवीस या जानकार इस मंत्र का जाप क्यों नहीं करते। वे ऐसा करें तो टीवी चैनलों में प्रसारित होने वाली आधी ब्रेकिंग न्यूज बंद हो जाएं, जो आगे जाकर गलत साबित होती हैं। कम से कम तीस फीसदी ऐसी बहसें बंद हो जाएं, जो काल्पनिक सच पर हुआ करती हैं। मसलन, अगर योगी हट गए तो उनके उत्तराधिकारी कौन होंगे। इसी तरह मध्य प्रदेश में सिंधिया ग्वालियर से भोपाल जाएं तो यह छप जाए कि शिवराज का इस्तीफा होने ही जा रहा है।

हमारी पत्रकारिता को यह कैसी सनसनी का रोग लग गया है, जो खून में हरारत नहीं चाहता, एक शर्तिया उबाल चाहता है। अफीम के नशे की तरह। नए पत्रकारों की पौध तैयार करने वाले तमाम विश्वविद्यालयों पर यह करारा तमाचा भी है, जो उन्हें पॉलिटिकल रिपोर्टिंग और राइटिंग पढ़ाते हैं। अखबारों और टीवी चैनलों के मालिकों- संपादकों के लिए भी यह एक गंभीर चुनौती है। अधकचरी जानकारियों को सच बता देना और फिर उस सच का विश्लेषण करना उन्हें मूषक बनाता है। पत्रकारिता को यह मूषक फिर विदूषक बना देता है मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

मिस्टर मीडिया: राजद्रोह की चाबुक अब बेमानी हो गई है!

पत्रकारिता में हो रही इस गंभीर चूक को कैसे रोका जाए मिस्टर मीडिया?

भारतीय पत्रकारिता को मुख्य न्यायाधीश को शुक्रिया तो कहना ही चाहिए मिस्टर मीडिया!

इस तरह का व्यवहार दूषित और अमानवीय मानसिकता का प्रतीक है मिस्टर मीडिया!

कृपया अपनी जिम्मेदारी तलाश कीजिए मिस्टर मीडिया!

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सांप-छछूंदर के जैसी हो गई है ट्विटर की स्थिति: राजेश बादल

केंद्र सरकार और सूचना-सामग्री विस्तार करने वाली परदेसी कंपनियों के बीच तनातनी अब निर्णायक मोड़ पर है। इस चरण में भारतीय बुद्धिजीवी समाज का दखल अब जरूरी दिखाई देने लगा है।

Last Modified:
Tuesday, 08 June, 2021
socialmedia6

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

डिजिटल माध्यमों से टकराव कितना घातक 

केंद्र सरकार और सूचना-सामग्री विस्तार करने वाली परदेसी कंपनियों के बीच तनातनी अब निर्णायक मोड़ पर है। इस चरण में भारतीय बुद्धिजीवी समाज का दखल अब जरूरी दिखाई देने लगा है। कंपनियों के साथ विवाद का सीधा सीधा समाधान अदालत के जरिए नहीं हो तो अच्छा। दोनों पक्षकारों को ही किसी व्यावहारिक निष्कर्ष पर पहुंचना चाहिए। केंद्र सरकार चाहे तो इस पचड़े से बाहर निकलने के लिए किसी तीसरे तटस्थ पक्ष को मध्यस्थ बना सकती है। इसका कारण यह है कि दूरगामी नजरिए से बीजेपी के लिए इसके सियासी परिणाम मुश्किल भरे हो सकते हैं।

ऊपर से देखा जाए तो इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय की ट्विटर को चेतावनी में कुछ अनुचित नहीं लगता। भारतीय क्षेत्र में सक्रिय सूचना विस्तार करने वाले किसी भी अवतार को भारत के नए आईटी नियमों का पालन करना चाहिए। इससे पहले ट्विटर को तीन महीने की मोहलत दी गई थी कि वह नए नियमों को लागू करे। इनमें एक नोडल संपर्क व्यक्ति की नियुक्ति करना भी शामिल है, जो उपभोक्ताओं की शिकायतों का निराकरण करने में सक्षम हो। यह मामला न्यायालय में लंबित है। मुकदमों के बोझ तले दबे न्यायालय से निर्णय आने में वक्त तो लगेगा ही। यकीनन केंद्र सरकार चाहती होगी कि फैसले से पहले ही मामले का पटाक्षेप हो जाए तो बेहतर।

दरअसल सरकार की शीघ्रता का एक कारण सियासी भी हो सकता है। इसका एक उदाहरण तो हाल ही में आया, जब भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता संबित पात्रा और बी एल संतोष ने ट्विटर पर दो दस्तावेज परोसे। इन पर कांग्रेस पार्टी ने एतराज किया। ट्विटर की अपनी अंदरूनी पड़ताल में पाया गया कि एक दस्तावेज में कांग्रेस के लेटरपैड के साथ छेड़छाड़ की गई है। तब उसने मैन्युपुलेटेड की मोहर लगा दी। तथ्यों की पड़ताल करने वाली प्रामाणिक संस्था ऑल्ट न्यूज ने भी अपनी जांच में इस इरादतन शरारत को सच पाया। जाहिर है कि बीजेपी को यह रास नहीं आना था। उसे कैसे मंजूर हो सकता था कि सारी दुनिया जाने कि उसके प्रवक्ता ने दस्तावेज में शरारत करके ट्विटर के मंच का दुरुपयोग किया है। बता दूं कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भले ही मैन्युपुलेटेड सामग्री प्रचलन में हो, भारतीय दंड संहिता में इसे फर्जीवाड़ा अथवा जालसाजी माना जा सकता है। इसकी वैधानिक व्याख्या का नतीजा गैर जमानती वारंट या गिरफ्तारी भी हो सकती है।

अब ट्विटर की स्थिति सांप-छछूंदर जैसी हो गई है। वह मैन्युपुलेटड टैग हटाती है तो इस अपराध की मुजरिम बनती है कि वह जानबूझकर नकली दस्तावेज के जरिए भारत के करोड़ों उपभोक्ताओं को वैचारिक ठगी का निशाना बना रही है। इसके अलावा संसार में फैले भारतीय मूल के करोड़ों लोग अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत ट्विटर के विरुद्ध वैधानिक कार्रवाई कर सकते हैं कि वह नकली दस्तावेज बिना मैन्युपुलेटेड का टैग लगाए दे रही है। लोग उस पर आंख मूंदकर भरोसा कर सकते हैं। दूसरी ओर ट्विटर यदि टैग नहीं हटाती तो भी भारत में फर्जी और भ्रामक प्रचार की मुजरिम बनती है। कांग्रेस पार्टी या कोई अन्य उसके विरुद्ध आपराधिक मामला दर्ज करा सकता है। इसके अलावा भारत सरकार का कोप भाजन भी उसे बनना पड़ेगा।

इस समूचे घटनाक्रम का राजनीतिक पहलू यह है कि आठ विधानसभाओं के चुनाव सर पर हैं। हमने देखा है कि चुनावों के दरम्यान सोशल-डिजिटल माध्यमों का भरपूर उपयोग-दुरुपयोग होता है। हाल ही के बंगाल विधानसभा चुनाव इसकी उम्दा बानगी हैं। इन मंचों से झूठी सूचनाएं भी फैलाई जाती हैं। राजनीतिक विरोधियों का चरित्र हनन किया जाता है। सभी दल इसमें शामिल होते हैं। अनुभव कहता है कि इसमें भारतीय जनता पार्टी बाजी मार ले जाती है। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और शिवसेना समेत अनेक दल इसमें पिछड़ जाते हैं। ऐसे में ट्विटर, वॉट्सऐप या अन्य डिजिटल अवतारों से यदि बीजेपी की जंग जारी रही तो आने वाले चुनाव उसके लिए नई मुसीबत खड़ी कर सकते हैं। निश्चित रूप से पार्टी यह जोखिम उठाना पसंद नहीं करेगी? अतीत में उसने कभी अपने जिस श्रेष्ठतम तीर का इस्तेमाल सियासी विरोधियों को निपटाने में किया था, वह अब उलट कर आ लगा है और उसके गले की हड्डी बन गया है। शायद इसीलिए आईटी के नए नियमों पर न तो संसद में बहस हुई और न कानूनी जामा पहनाया गया। नए नियमों के तहत भारत में एक संपर्क अधिकारी की नियुक्ति से सरकार की उस तक सीधी पहुंच हो जाएगी। वह उस अधिकारी को येन केन प्रकारेण प्रभावित भी कर सकेगी।

वैसे इक्कीसवीं सदी में आए दिन विकसित हो रहे नए नए डिजिटल मंचों का सौ फीसदी साक्षरता वाले पश्चिम और यूरोप के कई देश सार्थक, सकारात्मक और रचनात्मक उपयोग कर रहे हैं। भारत ही इतना बड़ा राष्ट्र है, जहां के राजनेता डिजिटल संप्रेषण और अभिव्यक्ति की पेशेवर संस्कृति नहीं सीख पाए हैं। वे सियासी विरोधियों को पटखनी देने के लिए किसी भी भाषा में ट्वीट कर सकते हैं। इन नए नए मंचों पर कम शब्दों पर अपने को व्यक्त करना होता है, जो भारतीय नेताओं को नहीं आता। ज्यादातर राजनेता पढ़ते लिखते नहीं हैं। वे भाषा के मामले में एक जंगलीपन या गंवारू अभिव्यक्ति करते हैं। आखिर दुनिया का विराट और प्राचीनतम लोकतंत्र इन असभ्यताओं को क्यों स्वीकार करे? अपने को एक भद्र और शालीन तरीके से अभिव्यक्त करने का ढंग इन राजनेताओं को कब आएगा?

(साभार: लोकमत समाचार)

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‘जिन गैर हिंदी भाषियों ने इतने प्रेम से हिंदी सीखी, उन्हें हिंदी का दुश्मन बना रहे हैं’

आप अहिंदीभाषियों पर हिंदी थोपने का अनैतिक काम कर रहे हैं। जिन अहिंदीभाषियों ने इतने प्रेम से हिंदी सीखी है, उन्हें आप हिंदी का दुश्मन बना रहे हैं।

Last Modified:
Monday, 07 June, 2021
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डॉ. वेद प्रताप वैदिक, वरिष्ठ पत्रकार ।।

दिल्ली सरकार के गोविंदवल्लभ पंत अस्पताल और शोध-संस्थान में केरल की नर्सों को लिखित आदेश दिया गया है कि वे अस्पताल में मलयालम में बातचीत न करें। वे या तो हिंदी बोलें या अंग्रेजी बोलें, क्योंकि दिल्ली के मरीज मलयालम नहीं समझते। नर्सों को यह भी कहा गया है कि इस आदेश का उल्लंघन करनेवालों को इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।

जिस अफसर ने यह आदेश जारी किया है, क्या वह यह मानकर चल रहा है कि केरल की नर्सें दिल्ली के मरीजों से मलयालम में बात करती हैं? यह संभव ही नहीं है। किसी नर्स का दिमाग क्या इतना खराब हो सकता है कि वह मरीज से उस भाषा में बात करेगी, जो उसका एक वाक्य भी नहीं समझ सकता? ऐसा क्यों करेगी? हमें गर्व होना चाहिए कि केरल के लोग काफी अच्छी हिंदी बोलते हैं। शर्म तो हम हिंदीभाषियों को आनी चाहिए कि हम मलयालम तो क्या, दक्षिण या पूरब की एक भी भाषा न बोलते हैं और न ही समझते हैं। पंत अस्पताल में लगभग 350 मलयाली नर्सें हैं। वे मरीजों से हिंदी में ही बात करती हैं। अगर वे अंग्रेजी में ही बात करने लगें तो भी बड़ा अनर्थ हो सकता है, क्योंकि ज्यादातर साधारण मरीज अंग्रेजी भी नहीं समझते। उन नर्सों का ‘दोष’ बस यही है कि वे आपस में मलयालम में बात करती हैं।

इस आपसी बातचीत पर भी यदि अस्पताल का कोई अधिकारी प्रतिबंध लगाता है तो यह तो कानूनी अपराध है। यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कानून का स्पष्ट उल्लंघन है। केरल की नर्सें यदि आपस में मलयालम में बात करती हैं तो इसमें किसी डॉक्टर या मरीज को कोई आपत्ति क्यों हो सकती है? यदि पंजाब की नर्सें पंजाबी में और बंगाल की नर्सें बंगाली में आपसी बात करती हैं और आप उन्हें रोकते हैं, उन्हें हिंदी या अंग्रेजी में बात करने के लिए मजबूर करते हैं तो आप एक नए राष्ट्रीय संकट को जन्म दे रहे हैं।

आप अहिंदीभाषियों पर हिंदी थोपने का अनैतिक काम कर रहे हैं। जिन अहिंदीभाषियों ने इतने प्रेम से हिंदी सीखी है, उन्हें आप हिंदी का दुश्मन बना रहे हैं। इसका एक फलितार्थ यह भी है कि किसी भी अहिंदीभाषी प्रांत में हिंदी के प्रयोग को हतोत्साहित किया जाएगा। यह लेख लिखते समय मेरी बात दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से हुई और पंत अस्पताल में डॉक्टरों से भी। सभी इस आदेश को किसी अफसर की व्यक्तिगत सनक बता रहे थे। इसका दिल्ली सरकार से कोई संबंध नहीं है। मुख्यमंत्री केजरीवाल को बधाई कि इस आदेश को रद्द कर दिया गया है।

(लेखक, भारतीय भाषा सम्मेलन के अध्यक्ष हैं)

(साभार: नया इंडिया)

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अभिव्यक्ति पर राजद्रोह का अंकुश अनुचित, पर स्वीकारनी होगी लक्ष्मण रेखा: आलोक मेहता

सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय से देशभर के पत्रकारों को बड़ी राहत महसूस हुई है, लेकिन राज्य सरकारों, उनकी पुलिस को भी अपनी सीमाओं को समझकर मनमानी की प्रवृत्ति को बदलना होगा।

आलोक मेहता by
Published - Monday, 07 June, 2021
Last Modified:
Monday, 07 June, 2021
Alok Mehta

आलोक मेहता, वरिष्ठ पत्रकार।।

सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा की और राजद्रोह का कठोरतम कानून  सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों पर लागू करने के राज्य सरकारों के प्रयासों को नितांत अनुचित ठहरा दिया। न्याय के मंदिर से यही अपेक्षा थी। सर्वोच्च अदालत ने यह अवश्य स्पष्ट कर दिया कि हिंसा के जरिये अराजकता पैदा करने वाली उत्तेजक देशद्रोह जैसी प्रचार सामग्री पर इस कानून का प्रयोग संभव है। इस निर्णय से देशभर के पत्रकारों को बड़ी राहत महसूस हुई है, लेकिन राज्य सरकारों, उनकी पुलिस को भी अपनी सीमाओं को समझकर मनमानी की प्रवृत्ति को बदलना होगा।

यह फैसला देश के एक नामी पत्रकार विनोद दुआ के एक टीवी कार्यक्रम में की गई टिप्पणी पर हिमाचल प्रदेश में राजद्रोह का मुकदमा दर्ज होने के विरुद्ध दायर याचिका पर आया है। लेकिन कुछ अन्य राज्यों में भी ऐसे मुकदमे दर्ज हुए हैं। संभवतः कुछ गंभीर हिंसा के प्रमाणित मामलों को छोड़कर अन्य प्रकरणों में निचली अदालतों से ही पत्रकार दोषमुक्त घोषित हो जाएंगे।  यह विवाद एक बार फिर इस तथ्य को रेखांकित करता है कि राजद्रोह,  सरकारी गोपनीयता के नाम पर ब्रिटिश राज के काले कानूनों में आवश्यक संशोधन संसद द्वारा सर्वानुमति से शीघ्र होने चाहिए।

इसके साथ ही यह मुद्दा भी गंभीर है कि प्रिंट, टीवी चैनल, सीरियल, फिल्म,  सोशल मीडिया को कितनी आजादी और उन पर कितना नियंत्रण हो? सरकार, प्रतिपक्ष और समाज कभी खुश, कभी नाराज। नियम-कानून, आचार संहिताएं,पुलिस व  अदालत  के सारे निर्देशों के बावजूद समस्याएं कम होने के बजाय बढ़ रही हैं। सूचना संसार कभी सुहाना, कभी भूकंप की तरह डगमगाता हुआ तो  कभी ज्वालामुखी की तरह फटता दिखाई देता है। आधुनिकतम टेक्नोलॉजी ने नियंत्रण कठिन कर दिया है। सत्ता व्यवस्था ही नहीं, अपराधी-माफिया, आतंकवादी समूह से भी दबाव, विदेशी ताकतों का प्रलोभन और प्रभाव संपूर्ण देश के लिए खतरनाक बन रहा है।  इन परिस्थितियों में विश्वसनीयता तथा भविष्य की चिंता स्वाभाविक है। यह भी सही है कि कश्मीर के आतंकवादी समूह और छत्तीसगढ़,  झारखंड,  उड़ीसा के आदिवासी क्षेत्रों में हिंसा, अत्याचार और आतंक फैलाने वाले नक्सली संगठनों या उनके सरगनाओं को मानव अधिकार के नाम पर प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से सहायता करने वालों पर कड़ी कार्रवाई होनी ही चाहिए, फिर भले ही पत्रकारिता या चिकित्सा अथवा स्वयंसेवीसेवी संस्था का चोगा पहने हुए हों। कार्यपालिका, न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र तय हैं तो पत्रकारिता की भी लक्ष्मण रेखा को स्वीकारना होगा।

ब्रिटेन में केबल टीवी एक्ट का प्राधिकरण है।  भारत में जब तक ऐसी नियामक संस्था नहीं हो, तब तक भारतीय प्रेस परिषद् द्वारा निर्धारित नियमों, आचार संहिता का पालन टीवी-डिजिटल मीडिया में भी किया जाए।  फिलहाल, प्रिंट मीडिया का प्रभावशाली वर्ग ही प्रेस परिषद् के नियम-संहिता की परवाह नहीं कर रहा है, क्योंकि उसके पास दंड देने का कोई अधिकार नहीं है, जबकि प्रेस परिषद् के अध्यक्ष सेवानिवृत्त वरिष्ठ न्यायाधीश ही होते हैं। इन दिनों तो परिषद् ही गंभीर विवादों में उलझ गई है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार संविधान में हर नागरिक के लिए है। पत्रकार उसी अधिकार का उपयोग करते हैं। समाज में हर नागरिक के लिए मनुष्यता, नैतिकता, सच्चाई और ईमानदारी के साथ कर्तव्य के सामान्य सिद्धांत लागू होते हैं। पत्रकारों पर भी वह लागू होने चाहिए। सरकार से नियंत्रित व्यवस्था नहीं हो, लेकिन संसद, न्याय पालिका और पत्रकार बिरादरी द्वारा बनाई गई पंचायत यानी मीडिया परिषद् जैसी संस्था के मार्गदर्शी नियम, लक्ष्मण रेखा का पालन तो हो।

न्यायपालिका के सामने एक गंभीर मुद्दा भी उठाया जाता रहा है कि मानहानि कानून का दुरुपयोग भी हो रहा है, जिससे ईमानदार मीडियाकर्मी को तमाम नेता, अधिकारी या अपराधी तंग करते हैं। अदालतों में मामले वर्षों तक लंबित रहते हैं। इसलिए जरूरत इस बात की है कि समय रहते सरकार, संसद, न्यायपालिका, मीडिया नए सिरे से मीडिया के नए नियम कानून, आचार संहिता को तैयार करे। नया मीडिया आयोग,  मीडिया परिषद् बने। पुराने गोपनीयता अथवा मानहानि के कानूनों की समीक्षा हो। तभी तो सही अर्थों में भारतीय गणतंत्र को दुनिया में सर्वश्रेष्ठ साबित किया जा सकेगा।

(यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक पद्मश्री से सम्मानित संपादक और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष हैं)

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