संदीप चौधरी अब एबीपी न्यूज पर करेंगे ‘सीधा सवाल’

31 जुलाई से इस शो का प्रसारण हफ्ते के सातों दिन शाम सात बजे से किया जाएगा।

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Saturday, 29 July, 2023
ABP News


‘एबीपी नेटवर्क’ (ABP Network) के हिंदी न्यूज चैनल ‘एबीपी न्यूज’ (ABP News) पर 31 जुलाई से वरिष्ठ टीवी पत्रकार और जाने-माने न्यूज एंकर संदीप चौधरी ‘सीधा सवाल’ करेंगे। 31 जुलाई से इस शो का प्रसारण हफ्ते के सातों दिन शाम सात बजे से किया जाएगा।

एबीपी न्यूज के ट्विटर हैंडल पर शेयर इस शो के प्रोमो को आप यहां देख सकते हैं।  

गौरतलब है कि संदीप चौधरी ने कुछ दिनों पूर्व ही हिंदी न्यूज चैनल ‘न्यूज24’ (News24) में अपनी पारी को विराम देकर एबीपी न्यूज के साथ बतौर एंकर और कंसल्टिंग एडिटर अपनी नई पारी शुरू की है। वह करीब नौ साल से ‘न्यूज24’ के साथ कार्यरत थे और ‘सबसे बड़ा सवाल’ (Sabse Bada Sawal) शो होस्ट करते थे।

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डॉ. सुभाष चंद्रा के आरोपों पर रिलायंस ने दी सफाई, कहा- बेबुनियाद हैं आरोप

एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन डॉ. सुभाष चंद्रा की ओर से रिलायंस ग्रुप और उसके मीडिया संस्थानों पर लगाए गए आरोपों के बाद अब रिलायंस ने इन आरोपों पर अपना जवाब दिया है।

Samachar4media Bureau by
Published - Friday, 28 August, 2026
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Friday, 28 August, 2026
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एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन डॉ. सुभाष चंद्रा की ओर से रिलायंस ग्रुप और उसके मीडिया संस्थानों पर लगाए गए आरोपों के बाद अब रिलायंस ने इन आरोपों पर अपना जवाब दिया है। रिलायंस ग्रुप ने डॉ. सुभाष चंद्रा की टिप्पणियों को बेबुनियाद बताते हुए सभी आरोपों और इशारों को पूरी तरह खारिज कर दिया है।

रिलायंस की ओर से 28 अगस्त को जारी मीडिया बयान में कहा गया कि ग्रुप ने एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन डॉ. सुभाष चंद्रा की टिप्पणियों पर निराशा जताई है।

‘आरोप और इशारे पूरी तरह खारिज’

रिलायंस ने अपने बयान में कहा कि रिलायंस ग्रुप का हिस्सा रहे मीडिया संस्थानों के खिलाफ लगाए गए सभी आरोप और इशारे पूरी तरह गलत हैं। ग्रुप ने साफ किया कि उसके मीडिया ब्रैंड्स का इस्तेमाल कभी किसी व्यक्ति पर हमला करने के लिए नहीं किया गया और न ही भविष्य में ऐसा किया जाएगा।

रिलायंस के प्रवक्ता ने कहा, “हमारे मीडिया ब्रैंड्स का इस्तेमाल कभी किसी को निशाना बनाने के लिए नहीं किया गया और न ही कभी किया जाएगा।” 

डॉ. सुभाष चंद्रा के लिए सम्मान भी जताया

हालांकि, आरोपों को खारिज करने के साथ ही रिलायंस ने डॉ. सुभाष चंद्रा के प्रति सम्मान भी जताया। कंपनी ने कहा कि वह सुभाष चंद्रा को एक कारोबारी और उद्यमी के तौर पर काफी सम्मान देती है। रिलायंस ने अपने बयान के अंत में डॉ. सुभाष चंद्रा के अच्छे भविष्य की कामना भी की।

NCLT कवरेज को लेकर शुरू हुआ विवाद

दरअसल, यह पूरा विवाद सुभाष चंद्रा की ओर से रिलायंस के चेयरमैन मुकेश अंबानी और रिलायंस से जुड़े मीडिया संस्थानों की कथित रिपोर्टिंग पर सवाल उठाए जाने के बाद सामने आया है। डॉ. सुभाष चंद्रा ने आरोप लगाया था कि उनके कर्ज और हालिया NCLT कार्यवाही को लेकर गलत नैरेटिव पेश किया गया। उन्होंने रिलायंस से जुड़े मीडिया संस्थानों पर उनके खिलाफ अभियान चलाने का आरोप भी लगाया था।

अब रिलायंस ने इन आरोपों को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया है। दोनों पक्षों के बयानों के बाद यह मामला कारोबारी और मीडिया जगत में चर्चा का विषय बन गया है।

 

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NCLT मामले की कवरेज पर डॉ. सुभाष चंद्रा ने रिलायंस के मीडिया संस्थानों पर उठाए सवाल

एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन डॉ. सुभाष चंद्रा ने रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी और रिलायंस ग्रुप से जुड़े मीडिया संस्थानों पर गंभीर आरोप लगाए हैं।

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एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन डॉ. सुभाष चंद्रा ने रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी और रिलायंस ग्रुप से जुड़े मीडिया संस्थानों पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया है कि उनके कर्ज और हाल में हुई एनसीएलटी (NCLT) की कार्यवाही को लेकर भ्रामक खबरें और गलत नैरेटिव फैलाया गया।

जी न्यूज को दिए एक इंटरव्यू में सुभाष चंद्रा ने सीधे तौर पर मुकेश अंबानी और टीवी18 नेटवर्क का नाम लिया। उन्होंने आरोप लगाया कि नेटवर्क से जुड़े सीएनबीसी जैसे मीडिया संस्थानों ने यह गलत दावा चलाया कि उनके करीब ₹22,000 करोड़ के कर्ज का निपटारा एनसीएलटी के जरिए महज ₹6.5 करोड़ में हो गया।

मुकेश अंबानी से संपर्क की कोशिश का दावा

सुभाष चंद्रा ने कहा कि उन्होंने इस मामले को लेकर मुकेश अंबानी से संपर्क करने की कोशिश की थी। जब उन्हें कोई जवाब नहीं मिला तो उन्होंने अंबानी को पत्र भी लिखा। चंद्रा ने अंबानी से अपील की कि उनके और उनके समूह के खिलाफ जिस तरह का कथित प्रचार चल रहा है, उसे रोका जाए।

उन्होंने रिलायंस के मीडिया नेटवर्क पर उनके खिलाफ एकतरफा अभियान चलाने का भी आरोप लगाया। डॉ. चंद्रा का कहना है कि मीडिया संस्थानों को किसी भी व्यक्ति या कारोबारी समूह के बारे में खबर दिखाते समय तथ्यों की सही जानकारी देनी चाहिए।

2019 की घटनाओं का भी किया जिक्र

सुभाष चंद्रा ने अपने आरोपों को सिर्फ हालिया घटनाओं तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने 2019 की घटनाओं का भी जिक्र किया। चंद्रा ने आरोप लगाया कि उस समय मुकेश अंबानी से जुड़ी संस्थाओं की भूमिका के कारण जी के शेयर भाव में तेज गिरावट आई थी।

उन्होंने आगे दावा किया कि इसके बाद निवेश कंपनी इनवेस्को के साथ मिलकर जी को अधिग्रहण करने की कोशिश भी हुई थी। हालांकि, डॉ. चंद्रा के मुताबिक यह प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ सका, क्योंकि उनके अनुसार यह अल्पांश शेयरधारकों यानी माइनॉरिटी शेयरहोल्डर्स के हित में नहीं था।

बोले- अब मेरे पास खोने के लिए ज्यादा कुछ नहीं

इंटरव्यू के दौरान सुभाष चंद्रा ने अपने ऊपर पिछले कई वर्षों से चल रहे आर्थिक दबाव और संपत्तियों की बिक्री का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि इन परिस्थितियों के बाद उनके पास खोने के लिए बहुत ज्यादा कुछ नहीं बचा है।

चंद्रा ने चेतावनी दी कि अगर उनके खिलाफ कथित हमले जारी रहे तो वह अपना बचाव करेंगे। उन्होंने रिलायंस से जुड़े मीडिया संस्थानों से भी अपील की कि वे तथ्यों के आधार पर खबरें दिखाएं और उनके खिलाफ किसी तरह की ‘विच हंट’ यानी लगातार निशाना बनाने वाली मुहिम न चलाएं।

रिलायंस ने आरोपों को बताया बेबुनियाद

सुभाष चंद्रा के आरोपों के सामने आने के बाद रिलायंस की ओर से भी प्रतिक्रिया दी गई। रिलायंस ने डॉ. चंद्रा के आरोपों और इशारों को पूरी तरह खारिज कर दिया।

रिलायंस के प्रवक्ता ने कहा कि एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन सुभाष चंद्रा की टिप्पणियां बेबुनियाद हैं। प्रवक्ता ने यह भी स्पष्ट किया कि रिलायंस ग्रुप से जुड़े मीडिया संस्थानों का इस्तेमाल कभी किसी व्यक्ति को निशाना बनाने के लिए नहीं किया गया है और न ही भविष्य में ऐसा किया जाएगा।

रिलायंस ने अपने बयान में सुभाष चंद्रा को एक कारोबारी और उद्यमी के तौर पर सम्मान देने की बात भी कही और उनके अच्छे भविष्य की कामना की।

दो बड़े कारोबारी दिग्गजों के बीच खुली जुबानी जंग

सुभाष चंद्रा के आरोपों और रिलायंस की प्रतिक्रिया के बाद मामला काफी चर्चा में आ गया है। यह घटनाक्रम भारत के दो प्रमुख कारोबारी समूहों से जुड़े दो बड़े नामों के बीच बेहद सीधी सार्वजनिक टकराहट को दिखाता है।

खास बात यह है कि सुभाष चंद्रा ने अपने आरोपों में सिर्फ मुकेश अंबानी का नाम नहीं लिया, बल्कि रिलायंस ग्रुप के मीडिया कारोबार और उससे जुड़े संस्थानों की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं। वहीं, रिलायंस ने इन सभी आरोपों को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया है।

 

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TRP का ‘लाइसेंस राज’: कागज पर आसान एंट्री, TV रेटिंग कारोबार में निवेश अब भी बड़ी चुनौती

भारतीय टेलीविजन रेटिंग कारोबार नए दौर में है। नियामकीय मंजूरी आसान हुई है, लेकिन टिकाऊ रेटिंग कारोबार खड़ा करना अब भी बड़ी चुनौती है।

Samachar4media Bureau by
Published - Thursday, 27 August, 2026
Last Modified:
Thursday, 27 August, 2026
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इमरान फजल, असिसटेंट एडिटर, एक्सचेंज4मीडिया ।।

भारत का टेलीविजन रेटिंग कारोबार अब एक नए दौर में प्रवेश कर रहा है। इसमें नियामकीय मंजूरी हासिल करना शायद थोड़ा आसान हो गया है, लेकिन व्यावसायिक रूप से टिकाऊ रेटिंग कारोबार खड़ा करना अब भी बड़ी चुनौती है। इसकी वजह यह है कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) ने जहां नए खिलाड़ियों के लिए बाजार खोला है, वहीं ऑडियंस मापने वाली कंपनियां किस तरह काम करेंगी, इसे लेकर नियम और सख्त कर दिए हैं।

टेलीविजन रेटिंग पॉलिसी 2026 के तहत रेटिंग एजेंसियों के लिए न्यूनतम नेटवर्थ की जरूरत 20 करोड़ रुपये से घटाकर 5 करोड़ रुपये कर दी गई है। साथ ही, इस क्षेत्र को औपचारिक रूप से एक से ज्यादा एजेंसियों के लिए खोल दिया गया है। लेकिन इंडस्ट्री से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि नियामकीय स्तर पर प्रवेश की यह सीमा उस पूंजी का केवल एक छोटा हिस्सा है, जो देशभर में भरोसेमंद टीवी रेटिंग सिस्टम तैयार करने के लिए जरूरी होगी।

उनकी सबसे बड़ी चिंता यह है कि क्या कंपनियां ऐसे कारोबार में सैकड़ों या संभवतः हजारों करोड़ रुपये लगाने के लिए तैयार होंगी, जहां नियामकीय हस्तक्षेप यह तय कर सकता है कि मौजूदा रेटिंग सिस्टम को आंकड़े जारी करने की अनुमति मिलेगी या नहीं।

एक वरिष्ठ मीडिया अधिकारी ने कहा, “पॉलिसी ने औपचारिक प्रवेश की बाधा निश्चित रूप से कम की है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि निवेश की बाधा भी कम हो गई है। 1,000 करोड़ रुपये से ज्यादा के निवेश पर विचार करने वाली कोई भी कंपनी पहले यह जानना चाहेगी कि अगले 10 साल तक नियामकीय माहौल कितना स्थिर और अनुमान के मुताबिक रहेगा।”

2026 में BARC India की टीवी रेटिंग लंबे समय तक बंद रहने के बाद यह चिंता और ज्यादा बढ़ गई है। BARC एक इंडस्ट्री-स्वामित्व वाली संस्था होने के बावजूद, उसे टेलीविजन ऑडियंस के आंकड़े जारी करना रोकने का निर्देश दिया गया था। इस दौरान नए ढांचे के तहत उसके रजिस्ट्रेशन की जांच की जा रही थी।

टेलीविजन इंडस्ट्री के लिए इस पूरे घटनाक्रम ने रेटिंग सिस्टम में आए एक बुनियादी बदलाव को सामने रखा है। BARC रेटिंग मापने और सिस्टम चलाने वाली संस्था बनी रह सकती है, लेकिन एक मान्य टीवी रेटिंग करेंसी के रूप में काम करने की उसकी क्षमता अब सरकार के नियामकीय ढांचे का पालन करने पर निर्भर है।

इंडस्ट्री के सिस्टम से रेगुलेटेड इकोसिस्टम तक

BARC की स्थापना 2012 में हुई थी और उसने 2015 में एक इंडस्ट्री-आधारित टेलीविजन मापन संस्था के रूप में काम शुरू किया। इसे Indian Broadcasting & Digital Foundation (IBDF), Indian Society of Advertisers (ISA) और Advertising Agencies Association of India (AAAI) मिलकर 60:20:20 के ढांचे में प्रमोट करते हैं। इन तीनों हिस्सेदार समूहों में क्रमशः ब्रॉडकास्टर्स, विज्ञापनदाता और विज्ञापन एवं मीडिया एजेंसियां शामिल हैं। इस व्यवस्था का उद्देश्य यह था कि टेलीविजन की रेटिंग करेंसी उसी विज्ञापन इकोसिस्टम के प्रमुख हिस्सेदारों द्वारा बनाई और संचालित की जाए। अब इस मॉडल के साथ सरकार की सीधी नियामकीय भूमिका भी जुड़ गई है।

टेलीविजन रेटिंग पॉलिसी 2026 के तहत रेटिंग एजेंसियों को सरकार के साथ रजिस्टर कराना होगा। इसके साथ पैनल के आकार, गवर्नेंस, ऑडिट, मेथडोलॉजी, स्वतंत्रता, तकनीक और डेटा की विश्वसनीयता से जुड़ी शर्तों का पालन करना होगा। BARC समेत मौजूदा एजेंसियों को भी नए ढांचे के तहत आना होगा।

एक ब्रॉडकास्ट इंडस्ट्री अधिकारी ने कहा, “सबसे बड़ा बदलाव यह है कि रेटिंग अब सिर्फ इंडस्ट्री की सेवा नहीं रह गई है। अब रेगुलेटर की भूमिका काफी सीधी हो गई है और वह यह तय कर सकता है कि रेटिंग सिस्टम किन शर्तों के तहत काम करेगा। यह कुछ-कुछ लाइसेंस राज जैसा है, जो अब इसमें लागू है।” इससे एक अलग तरह की व्यवस्था बन गई है- स्वामित्व इंडस्ट्री का, संचालन निजी स्तर पर और काम करने की नियामकीय वैधता सरकार के नियंत्रण में।

ब्लैकआउट ने इंडस्ट्री के निवेश जोखिम को बदल दिया

BARC का ब्लैकआउट संभावित नए खिलाड़ियों के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि इससे यह पता चला है कि नया नियामकीय ढांचा वास्तविक स्थिति में किस तरह काम कर सकता है। मुख्य सवाल केवल यह नहीं था कि BARC ऑडियंस को माप सकता है या नहीं। असली सवाल यह था कि नई पॉलिसी के तहत उसके रजिस्ट्रेशन और नियमों के पालन की प्रक्रिया पूरी होने तक क्या उसे आंकड़े जारी करने की अनुमति रहेगी।

यह अंतर काफी महत्वपूर्ण है। किसी नई रेटिंग कंपनी को प्रतिनिधित्व करने वाला पैनल तैयार करने, मीटर लगाने, एस्टेब्लिशमेंट सर्वे करने, सांख्यिकीय मॉडल बनाने और इंडस्ट्री का भरोसा हासिल करने में कई साल लग सकते हैं।

एक वरिष्ठ टेलीविजन इंडस्ट्री अधिकारी ने कहा, “ब्लैकआउट सिर्फ BARC की समस्या नहीं है। इस कारोबार में आने के बारे में सोचने वाली हर कंपनी इस पूरे मामले को बहुत ध्यान से देखेगी। अगर पहले से मजबूत पैनल और इंडस्ट्री संबंध रखने वाली कंपनी को भी रुकावट का सामना करना पड़ सकता है, तो नई कंपनी अपने निवेश के फैसले में इस नियामकीय जोखिम को जरूर शामिल करेगी।”

रेटिंग कारोबार का निवेश चक्र काफी लंबा होता है। डिजिटल मापन वाले किसी प्रोडक्ट को अपेक्षाकृत कम समय में तैयार और बड़ा किया जा सकता है, लेकिन देशभर में टीवी रेटिंग का पूरा सिस्टम तैयार करने के लिए शुरुआत में ही काफी पैसा लगाना पड़ता है, जबकि उससे मिलने वाली व्यावसायिक रेटिंग करेंसी को स्वीकार किए जाने में समय लगता है।

5 करोड़ रुपये की सीमा बनाम 1,000 करोड़ रुपये की हकीकत

MIB ने रेटिंग एजेंसियों के लिए न्यूनतम नेटवर्थ की जरूरत 20 करोड़ रुपये से घटाकर 5 करोड़ रुपये कर दी है। इससे संभावित रूप से ज्यादा कंपनियां रजिस्ट्रेशन के लिए योग्य हो सकती हैं। हालांकि, इंडस्ट्री अधिकारियों का कहना है कि यह बदलाव सिर्फ नियामकीय ढांचे में प्रवेश के लिए जरूरी वित्तीय योग्यता को आसान करता है।

एक भरोसेमंद और देशव्यापी रेटिंग सिस्टम के लिए अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों और जनसांख्यिकीय समूहों के प्रतिनिधि परिवारों का पैनल, फील्ड टीमें, मीटर लगाना और उनका रखरखाव, सैंपल में बदलाव, क्वालिटी कंट्रोल, एस्टेब्लिशमेंट सर्वे, डेटा सुरक्षा, सांख्यिकीय मॉडलिंग और लगातार ऑडिट की जरूरत होगी।

इंडस्ट्री के अधिकारियों के हवाले से सामने आए अनुमानों के मुताबिक, ऐसा पूरा सिस्टम तैयार करने के लिए 1,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का निवेश करना पड़ सकता है।

एक अन्य इंडस्ट्री अधिकारी ने कहा, “5 करोड़ रुपये की संख्या देखकर पॉलिसी काफी आसान लग सकती है। लेकिन यह मूल रूप से सिर्फ नियामकीय पात्रता की संख्या है। असल कारोबार में पर्याप्त पैमाना और विश्वसनीयता हासिल करके मुकाबला करने के लिए कंपनी को कई सौ करोड़ रुपये खर्च करने पड़ सकते हैं।”

व्यावसायिक चुनौती इसलिए भी बड़ी है क्योंकि नई एजेंसी को ऐसे बाजार में उतरना होगा जहां BARC के पास पहले से मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर और ब्रॉडकास्टर्स, विज्ञापनदाताओं और एजेंसियों के साथ स्थापित संबंध हैं।

'सिर्फ टेक्नोलॉजी काफी नहीं'

Chrome DM और TAM पहले ही BARC या अन्य इंडस्ट्री हिस्सेदारों के साथ काम करने की इच्छा जाहिर कर चुके हैं। लेकिन सिर्फ CTV यानी Connected TV की माप से प्रतिनिधित्व करने वाला टीवी रेटिंग पैनल तैयार करने की समस्या हल नहीं होती।

एक पूरी रेटिंग एजेंसी को पारंपरिक यानी लीनियर टेलीविजन के साथ-साथ डिजिटल स्क्रीन को भी मापना होगा। इसके लिए घरों को फिजिकल तरीके से पैनल में शामिल करना, मीटर लगाना, उनका रखरखाव करना, फील्ड वेरिफिकेशन, सैंपल मैनेजमेंट और आंकड़ों की सांख्यिकीय जांच जैसी कई प्रक्रियाएं जरूरी होंगी।

एक मीडिया मापन अधिकारी ने कहा, “कनेक्टेड टीवी किसी कंपनी को मजबूत टेक्नोलॉजी लेयर दे सकता है, लेकिन टीवी रेटिंग कारोबार सिर्फ टेक्नोलॉजी का कारोबार नहीं है। सबसे मुश्किल काम ऐसा सांख्यिकीय रूप से प्रतिनिधित्व करने वाला पैनल बनाना है, जिस पर पूरी इंडस्ट्री भरोसा करे और यह माने कि इससे मिलने वाले आंकड़े को रेटिंग करेंसी के रूप में इस्तेमाल किया जाना चाहिए।”

इस वजह से टेक्नोलॉजी आधारित कंपनियों के लिए तुरंत अपना पूरी तरह स्वतंत्र रेटिंग सिस्टम खड़ा करने की बजाय पार्टनरशिप के जरिए इस कारोबार में प्रवेश करना ज्यादा व्यावहारिक रणनीति हो सकती है।

TAM के पास अनुभव, लेकिन अनुभव की भी कीमत है

दूसरी ओर, TAM के पास टेलीविजन ऑडियंस मापन का पुराना अनुभव है। इससे उसे उन कंपनियों के मुकाबले फायदा मिल सकता है, जो किसी दूसरे टेक्नोलॉजी क्षेत्र से इस कारोबार में प्रवेश कर रही हैं। लेकिन इंडस्ट्री अधिकारियों का कहना है कि पुराना अनुभव 2026 की पॉलिसी के तहत जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर और गवर्नेंस की जरूरतों को खत्म नहीं करता।

नई कंपनी को अभी भी जरूरी पैनल आकार, फील्ड ऑपरेशन, डेटा सुरक्षा, गवर्नेंस सिस्टम, ऑडिट और मेथडोलॉजी तैयार करनी होगी। साथ ही, उसे ऐसे टेलीविजन बाजार में उतरने के लिए नए सिरे से निवेश का तर्क देना होगा, जिसकी अर्थव्यवस्था डिजिटल वीडियो, कनेक्टेड टीवी और OTT की बढ़ती हिस्सेदारी के कारण दबाव में है। 

सोर्स मटेरियल के अनुसार, TAM के CEO L.V. Krishnan ने इन घटनाक्रमों पर कोई टिप्पणी नहीं की।

एक इंडस्ट्री अधिकारी ने कहा, “TAM जैसी कंपनी के लिए सवाल यह नहीं है कि उसे टेलीविजन मापना आता है या नहीं। सवाल यह है कि क्या भारतीय बाजार का आकार और उसकी अर्थव्यवस्था उस इंफ्रास्ट्रक्चर को दोबारा तैयार करने और नए नियमों के तहत जरूरी पूंजी लगाने को सही ठहराती है।”

टीवी बाजार का सिकुड़ता कारोबार बढ़ा रहा है जोखिम

निवेश से जुड़ा सवाल इसलिए और मुश्किल हो रहा है क्योंकि टेलीविजन बाजार खुद भी संरचनात्मक दबाव का सामना कर रहा है। टेलीविजन अब भी विज्ञापन का एक महत्वपूर्ण माध्यम है, लेकिन विज्ञापनदाता अपने बजट का एक बड़ा हिस्सा डिजिटल वीडियो, कनेक्टेड टीवी और दूसरे प्लेटफॉर्मों पर भी खर्च कर रहे हैं। इसका मतलब है कि नई रेटिंग कंपनी को ऐसे उद्योग में भारी निवेश करना होगा, जिसकी पारंपरिक विज्ञापन अर्थव्यवस्था पहले के वर्षों की तरह तेजी से नहीं बढ़ रही है।

2026 की पॉलिसी में टेक्नोलॉजी-न्यूट्रल मापन की भी जरूरत रखी गई है, जिसमें कनेक्टेड-टीवी व्यूइंग को शामिल किया गया है। इससे नए मापन मॉडल के लिए अवसर बढ़ सकते हैं, लेकिन एक व्यापक रेटिंग करेंसी तैयार करना और जटिल हो जाता है।

एक इंडस्ट्री अधिकारी ने कहा, “निवेशक सिर्फ यह नहीं देख रहा कि सरकार बाजार में प्रवेश की अनुमति देगी या नहीं। वह यह भी देख रहा है कि संभावित बाजार कितना बड़ा है, टेलीविजन विज्ञापन किस दिशा में जाएगा और क्या इतनी बड़ी शुरुआती लागत को वापस निकालने के लिए पर्याप्त आमदनी होगी।”

गवर्नेंस भी बन सकती है एक और बड़ी बाधा

पॉलिसी में स्वतंत्रता यानी इंडिपेंडेंस पर भी काफी जोर दिया गया है। शुरुआती ढांचे में रेटिंग एजेंसी के बोर्ड में कम से कम आधे सदस्य स्वतंत्र निदेशक होने जरूरी थे। बाद में MIB ने इस शर्त को बदलकर कम से कम 33% कर दिया। साथ ही यह भी तय किया गया कि स्वतंत्र निदेशकों का ब्रॉडकास्टर्स, विज्ञापनदाताओं या विज्ञापन एजेंसियों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संबंध नहीं होना चाहिए। ढांचे में क्रॉस-होल्डिंग, हितों के टकराव, सिक्योरिटी क्लियरेंस और ऑपरेशनल स्वतंत्रता से जुड़ी शर्तें भी शामिल हैं।

एक अन्य इंडस्ट्री अधिकारी ने कहा, “रेटिंग व्यावसायिक नजरिए से पूरी तरह तटस्थ डेटा नहीं है। रेटिंग में बदलाव विज्ञापन दरों, चैनल की आमदनी और प्रोग्रामिंग से जुड़े फैसलों को प्रभावित कर सकता है। इसलिए रेगुलेटर संरचनात्मक स्वतंत्रता चाहता है, लेकिन इससे नए खिलाड़ियों के लिए स्वामित्व और गवर्नेंस का मॉडल भी ज्यादा जटिल हो जाता है।”

रजिस्ट्रेशन शायद सिर्फ शुरुआत है

रजिस्ट्रेशन मिलने के बाद भी रेटिंग एजेंसियों को मेथडोलॉजी, पैनल चयन, पैनल में बदलाव, भौगोलिक कवरेज, ऑडिट और डेटा गवर्नेंस से जुड़े नियमों का लगातार पालन करना होगा। नई कंपनी के लिए इसका मतलब है कि यह सिर्फ एक बार आने वाली नियामकीय लागत नहीं होगी, बल्कि लगातार होने वाला खर्च होगा।

कंपनी को अपनी रेटिंग मेथडोलॉजी के हर बड़े हिस्से को समझाना होगा और अगर ब्रॉडकास्टर्स, विज्ञापनदाता या एजेंसियां उसके आंकड़ों पर सवाल उठाती हैं तो उन्हें सही साबित करने के लिए मजबूत आधार देना होगा। BARC के मामले में इनमें से कई सिस्टम पहले से मौजूद हैं। लेकिन नए खिलाड़ी को ये सभी सिस्टम उस समय तैयार करने होंगे, जब वह बाजार को अपनी रेटिंग करेंसी अपनाने के लिए भी मनाने की कोशिश कर रहा होगा।

एक वरिष्ठ एजेंसी अधिकारी ने कहा, “BARC की सबसे बड़ी ताकत सिर्फ उसकी टेक्नोलॉजी नहीं है। उसका असली मजबूत पक्ष पूरा इकोसिस्टम है। उसका डेटा पहले से मीडिया प्लानिंग, विज्ञापन सौदों और ब्रॉडकास्टर्स के फैसलों का हिस्सा है। किसी प्रतियोगी को सिस्टम और बाजार- दोनों एक साथ बनाने होंगे।”

क्या भारत में एक से ज्यादा टीवी रेटिंग करेंसी टिक पाएंगी?

पॉलिसी का घोषित उद्देश्य प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना और एक ही रेटिंग प्रदाता पर निर्भरता कम करना है। लेकिन आगे चलकर इंडस्ट्री के सामने एक और सवाल खड़ा हो सकता है- क्या विज्ञापनदाता और एजेंसियां एक से ज्यादा रेटिंग करेंसी पर कारोबार करने के लिए तैयार होंगी?

अगर अलग-अलग रेटिंग एजेंसियां अलग-अलग ऑडियंस आंकड़े देती हैं, तो ब्रॉडकास्टर्स किसी एक मेथडोलॉजी को प्राथमिकता दे सकते हैं, जबकि विज्ञापनदाता किसी दूसरी को पसंद कर सकते हैं। इससे बाजार BARC, दूसरी रेटिंग एजेंसियों, CTV डेटा, DTH और केबल डेटा और प्लेटफॉर्म द्वारा जारी OTT ऑडियंस आंकड़ों के बीच बंट सकता है। इसलिए सरकार के सामने चुनौती यह सुनिश्चित करने की होगी कि ज्यादा प्रतिस्पर्धा से ज्यादा विश्वसनीयता पैदा हो, न कि टेलीविजन की हकीकत के कई अलग-अलग आंकड़े सामने आने लगें।

बड़ा सवाल: क्या कोई इतनी बड़ी रकम निवेश करेगा?

फिलहाल इंडस्ट्री अधिकारियों का कहना है कि सबसे पहली प्राथमिकता एक काम करने वाली साझा रेटिंग करेंसी को वापस लाना है। उनके मुताबिक पहले मौजूदा रेटिंग सिस्टम को नए नियामकीय ढांचे के तहत वापस लाया जाना चाहिए। इसके बाद नए खिलाड़ियों के लिए एक स्थिर और अनुमान के मुताबिक काम करने वाला माहौल बनाया जाए। टेक्नोलॉजी विशेषज्ञों को पार्टनरशिप के जरिए इस क्षेत्र में भाग लेने का मौका मिले और फिर ऐसी कंपनियों के बीच वास्तविक प्रतिस्पर्धा विकसित हो, जो देशव्यापी रेटिंग सिस्टम की सभी जरूरतों को पूरा करने में सक्षम हों।

एक वरिष्ठ टेलीविजन अधिकारी ने कहा, “प्रतिस्पर्धा का उद्देश्य गलत नहीं है। लेकिन प्रतिस्पर्धा के लिए निवेश चाहिए, निवेश के लिए भरोसा चाहिए और भरोसा आखिरकार नियामकीय स्थिरता से आता है।” यही टेलीविजन रेटिंग पॉलिसी 2026 की सबसे बड़ी परीक्षा हो सकती है।

 MIB ने औपचारिक वित्तीय बाधा कम कर दी है, एक से ज्यादा रेटिंग एजेंसियों के लिए रास्ता खोला है और टेक्नोलॉजी-न्यूट्रल ढांचा पेश किया है। लेकिन BARC के मामले ने साथ ही यह भी दिखा दिया है कि रेटिंग कारोबार के आसपास बने नियामकीय ढांचे की ताकत कितनी ज्यादा है। TAM और Chrome DM जैसे संभावित नए खिलाड़ियों के लिए अब सवाल सिर्फ यह नहीं रह गया है कि वे भारत के पूरी तरह विकसित टेलीविजन रेटिंग बाजार में प्रवेश कर सकते हैं या नहीं।

सवाल यह है कि क्या उन्हें यह बाजार इतना स्थिर, बड़ा और अनुमान के मुताबिक काम करने वाला लगता है कि यहां प्रतिस्पर्धी रेटिंग करेंसी बनाने के लिए जरूरी भारी निवेश किया जा सके। भारत ने कागज पर टेलीविजन रेटिंग कारोबार में प्रवेश करना आसान जरूर किया है। लेकिन इसमें निवेश करना अभी भी आसान नहीं बनाया है।

 

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B.A.G. Films की 33वीं AGM 17 सितंबर को, शेयरधारकों को कंपनी ने दी अहम जानकारी

मीडिया कंपनी B.A.G. Films and Media Limited ने अपने शेयरधारकों के लिए वित्त वर्ष 2025-26 की Annual Report और 33वीं वार्षिक आम बैठक (AGM) को लेकर जरूरी जानकारी जारी की है।

Vikas Saxena by
Published - Thursday, 27 August, 2026
Last Modified:
Thursday, 27 August, 2026
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मीडिया कंपनी B.A.G. Films and Media Limited ने अपने शेयरधारकों के लिए वित्त वर्ष 2025-26 की Annual Report और 33वीं वार्षिक आम बैठक (AGM) को लेकर जरूरी जानकारी जारी की है। कंपनी ने बताया कि उसकी 33वीं AGM 17 सितंबर 2026 को शाम 4 बजे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) या अन्य ऑडियो-विजुअल माध्यम (OAVM) के जरिए होगी।

कंपनी के मुताबिक, AGM में 13 अगस्त 2026 को जारी नोटिस में बताए गए कारोबार और प्रस्तावों पर चर्चा की जाएगी।

ईमेल नहीं है तो वेबसाइट से मिलेंगे AGM Notice और Annual Report

कंपनी ने बताया कि जिन शेयरधारकों की ईमेल आईडी कंपनी, रजिस्ट्रार एवं शेयर ट्रांसफर एजेंट (RTA) Alankit Assignments Limited या Depository Participant के पास रजिस्टर्ड है, उन्हें 33वीं AGM का नोटिस और वित्त वर्ष 2025-26 की Annual Report इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भेजी गई है।

जिन शेयरधारकों की ईमेल आईडी रजिस्टर्ड नहीं है, उनके लिए कंपनी ने अपनी वेबसाइट पर AGM Notice और Annual Report तक पहुंचने के लिए वेब लिंक और नेविगेशन पाथ उपलब्ध कराया है।

कंपनी की वेबसाइट पर Financial > Annual Reports > Annual Report 2025-26 सेक्शन में जाकर भी Annual Report देखी और डाउनलोड की जा सकती है।

फिजिकल शेयर रखने वालों को PAN और KYC अपडेट करना होगा

B.A.G. Films and Media ने फिजिकल रूप में शेयर रखने वाले शेयरधारकों से अपने PAN, KYC और Nomination Details अपडेट करने की अपील की है। 

कंपनी के मुताबिक, शेयरधारकों को अपने फोलियो में डाक का पता, ईमेल आईडी, मोबाइल नंबर, सैंपल सिग्नेचर, बैंक अकाउंट डिटेल्स और नॉमिनेशन की जानकारी अपडेट करनी होगी। यह प्रक्रिया SEBI के 6 फरवरी 2026 को जारी मास्टर सर्कुलर के तहत की जा रही है।

कौन से फॉर्म जमा करने होंगे?

KYC और अन्य जानकारी अपडेट करने के लिए शेयरधारकों को जरूरी दस्तावेजों के साथ संबंधित फॉर्म जमा करने होंगे। Form ISR-1 के जरिए PAN और KYC से जुड़ी जानकारी अपडेट करनी होगी। इसके साथ जरूरी दस्तावेजों की सेल्फ-अटेस्टेड कॉपी देनी होगी।

Form ISR-2 के साथ बैंक से सत्यापित सिग्नेचर और शेयरधारक के नाम वाला ओरिजिनल कैंसिल चेक या बैंक पासबुक/स्टेटमेंट की सेल्फ-अटेस्टेड कॉपी देनी होगी। वहीं, नॉमिनेशन अपडेट करने के लिए Form SH-13 और नॉमिनेशन से बाहर रहने का विकल्प चुनने के लिए Form ISR-3 का इस्तेमाल किया जा सकता है।

दस्तावेज जमा करने के तीन तरीके

शेयरधारक KYC से जुड़े दस्तावेज RTA को तीन तरीकों से जमा कर सकते हैं। पहला तरीका हार्ड कॉपी के जरिए है, जिसमें दस्तावेज सेल्फ-अटेस्टेड और दिनांक के साथ होने चाहिए।

दूसरा तरीका इलेक्ट्रॉनिक माध्यम है। इसके लिए दस्तावेज उस ईमेल आईडी से भेजने होंगे जो RTA के रिकॉर्ड में रजिस्टर्ड है। दस्तावेजों पर शेयरधारक के इलेक्ट्रॉनिक या डिजिटल सिग्नेचर होने चाहिए। जॉइंट होल्डिंग के मामले में पहले जॉइंट होल्डर के सिग्नेचर जरूरी होंगे।

तीसरा तरीका कंपनी के RTA Alankit Assignments के वेब पोर्टल के जरिए ऑनलाइन KYC अपडेट करना है।

RTA को भेज सकते हैं दस्तावेज

कंपनी ने फिजिकल शेयरधारकों के लिए KYC दस्तावेज जमा करने का पता भी बताया है। दस्तावेज Alankit Assignments Limited, Unit: B.A.G. Films and Media Limited, 205-208, Anarkali Complex, Jhandewalan Extension, New Delhi-110055 पर भेजे जा सकते हैं।

शेयरधारक KYC से जुड़ी जानकारी के लिए kycupdate@alankit.com पर ईमेल या 011-42541234/23541234 पर संपर्क कर सकते हैं।

डिमैट शेयरधारक अपने DP से करें संपर्क

कंपनी ने साफ किया है कि जिन निवेशकों के शेयर डिमैट रूप में हैं, वे जरूरी दस्तावेज अपने Depository Participant (DP) के पास जमा करें। वहीं, फिजिकल शेयर रखने वाले निवेशक कंपनी के RTA के जरिए यह प्रक्रिया पूरी कर सकते हैं।

कंपनी ने शेयरधारकों से जल्द से जल्द PAN, KYC और नॉमिनेशन की जानकारी अपडेट करने को कहा है, ताकि उनके शेयर फोलियो से जुड़ी सेवाएं आसानी से जारी रह सकें। अगर किसी शेयरधारक ने पहले ही अपनी जानकारी कंपनी या RTA के रिकॉर्ड में अपडेट कर दी है, तो उसे इस पत्र पर दोबारा कार्रवाई करने की जरूरत नहीं है।

 

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जी एंटरटेनमेंट ने जारी की BRSR रिपोर्ट, इन छह बड़े मुद्दों को माना अहम

जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज (ZEE) ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए अपनी बिजनेस रिस्पॉन्सिबिलिटी एंड सस्टेनेबिलिटी रिपोर्ट (BRSR) जारी कर दी है।

Vikas Saxena by
Published - Wednesday, 26 August, 2026
Last Modified:
Wednesday, 26 August, 2026
ZeeEntertainment6589

जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज (ZEE) ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए अपनी बिजनेस रिस्पॉन्सिबिलिटी एंड सस्टेनेबिलिटी रिपोर्ट (BRSR) जारी कर दी है। कंपनी ने यह रिपोर्ट 25 अगस्त 2026 को शेयर बाजारों के सामने दाखिल की। यह रिपोर्ट कंपनी की वित्त वर्ष 2025-26 की वार्षिक रिपोर्ट का हिस्सा है। रिपोर्ट के साथ तीसरी पक्ष की संस्था TÜV SÜD South Asia Pvt. Ltd. की स्वतंत्र उचित आश्वासन रिपोर्ट भी दी गई है। कंपनी की ओर से यह दस्तावेज नियामकीय नियमों के तहत दाखिल किया गया है। 

इस रिपोर्ट में कंपनी ने अपने कारोबार, एम्प्लॉयीज, ग्राहकों, मानवाधिकार, सामाजिक जिम्मेदारी, पर्यावरण, ऊर्जा और पानी की खपत, कार्बन उत्सर्जन, कचरा प्रबंधन, साइबर सुरक्षा, कंटेंट की चोरी रोकने और सामाजिक योजनाओं से जुड़ी विस्तृत जानकारी दी है।

1982 में शुरू हुई कंपनी, 190 से ज्यादा देशों तक पहुंच

रिपोर्ट के मुताबिक जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज की स्थापना साल 1982 में हुई थी। कंपनी का पंजीकृत और कॉरपोरेट कार्यालय मुंबई के लोअर परेल में है। कंपनी के शेयर बीएसई और एनएसई दोनों पर सूचीबद्ध हैं। कंपनी ने बताया कि उसके कारोबार का 90 फीसदी से ज्यादा हिस्सा कंटेंट और प्रसारण कारोबार से आता है। इसमें सैटेलाइट टीवी चैनलों और डिजिटल माध्यमों का प्रसारण, दूसरे टीवी चैनलों के लिए विज्ञापन और प्रसारण स्थान की बिक्री, कार्यक्रमों, फिल्मों, संगीत और दूसरे मीडिया अधिकारों की बिक्री तथा फिल्मों का निर्माण और वितरण शामिल है।

31 मार्च 2026 तक कंपनी की भारत में 1 संयंत्र और 14 कार्यालय समेत कुल 15 जगहों पर मौजूदगी थी। विदेशों में 8 कार्यालय थे। कंपनी के मुताबिक उसका कारोबार भारत के 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों के अलावा 190 से ज्यादा देशों तक पहुंचता है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि कंपनी के कुल कारोबार में निर्यात की हिस्सेदारी 8 फीसदी रही।

कंपनी में 3,007 एम्प्लॉयी, महिलाओं की हिस्सेदारी 18.7 फीसदी

31 मार्च 2026 तक ZEE में कुल 3,007 एम्प्लॉयी थे। इनमें:

  • 2,159 स्थायी एम्प्लॉयी
  • 848 गैर-स्थायी एम्प्लॉयी शामिल थे।

कुल एम्प्लॉयीज में 2,446 पुरुष और 561 महिलाएं थीं। इस तरह कंपनी के कुल एम्प्लॉयीज में महिलाओं की हिस्सेदारी 18.7 फीसदी रही। कंपनी के निदेशक मंडल में कुल 7 सदस्य हैं, जिनमें 2 महिलाएं, यानी 28.6 फीसदी महिलाएं हैं। वहीं प्रमुख प्रबंधकीय एम्प्लॉयीज के 3 सदस्यों में कोई महिला नहीं है। कंपनी ने 6 दिव्यांग स्थायी एम्प्लॉयीज की जानकारी भी दी है।

एम्प्लॉयीज को स्वास्थ्य और दुर्घटना बीमा का 100 फीसदी कवरेज

रिपोर्ट के मुताबिक स्थायी और गैर-स्थायी दोनों तरह के एम्प्लॉयीज को स्वास्थ्य बीमा और दुर्घटना बीमा का 100 फीसदी कवरेज मिला हुआ है। स्थायी महिला एम्प्लॉयीज के लिए मातृत्व लाभ की कवरेज 100 फीसदी है। स्थायी पुरुष एम्प्लॉयीज के लिए पितृत्व लाभ की कवरेज भी 100 फीसदी बताई गई है।

कंपनी के अनुसार सभी पात्र एम्प्लॉयीज को भविष्य निधि और ग्रेच्युटी का लाभ दिया गया और संबंधित राशि जमा की गई। राष्ट्रीय पेंशन योजना की कवरेज वित्त वर्ष 2025-26 में एम्प्लॉयीज की 9.3 फीसदी रही, जो वित्त वर्ष 2024-25 में 8 फीसदी थी।

करीब 98.6 फीसदी एम्प्लॉयीज का प्रदर्शन और करियर मूल्यांकन

कंपनी ने बताया कि 31 मार्च 2026 तक पात्र एम्प्लॉयीज में से 98.6 फीसदी का प्रदर्शन और करियर विकास मूल्यांकन किया गया। पुरुष एम्प्लॉयीज के मामले में यह आंकड़ा 98.9 फीसदी और महिला एम्प्लॉयीज के मामले में 97.4 फीसदी रहा।

मानवाधिकार से जुड़े प्रशिक्षण की बात करें तो कंपनी ने वित्त वर्ष 2025-26 में अपने 3,007 यानी 100 फीसदी एम्प्लॉयीज को इस तरह की ट्रेनिंग दी।

साइबर सुरक्षा और निजी जानकारी की सुरक्षा को बड़ा जोखिम माना

ZEE ने आंकड़ों की गोपनीयता और साइबर सुरक्षा को अपने छह प्रमुख महत्वपूर्ण कारोबारी मुद्दों में शामिल किया है। कंपनी के मुताबिक उसका Z5 डिजिटल मंच कई भौगोलिक क्षेत्रों में उपलब्ध है। ऐसे में अलग-अलग देशों और क्षेत्रों के निजी जानकारी से जुड़े नियमों का पालन महत्वपूर्ण है। रिपोर्ट में डिजिटल व्यक्तिगत जानकारी संरक्षण कानून और दूसरे क्षेत्रीय गोपनीयता कानूनों से जुड़े संभावित जोखिमों का उल्लेख किया गया है। 

कंपनी ने बताया कि उसने आईएसओ 27701 मानक और यूरोपीय सामान्य डेटा संरक्षण नियमों के आधार पर निजी जानकारी की सुरक्षा से जुड़ी व्यवस्था लागू की है। इसके तहत नियमित रूप से गोपनीयता प्रभाव आकलन, गोपनीयता को ध्यान में रखकर व्यवस्था तैयार करना और किसी भी गोपनीयता संबंधी घटना से निपटने की व्यवस्था की जाती है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस्तेमाल पर भी सावधानी

कंपनी ने बताया कि कार्यालयी कामकाज में जनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी जनरेटिव एआई के इस्तेमाल से भी कुछ जोखिम पैदा हो सकते हैं। इनमें गलत जानकारी, पक्षपात, गलत व्याख्या, जानबूझकर गलत इस्तेमाल और कानूनी या नैतिक समस्याएं शामिल हैं।

इसी वजह से एम्प्लॉयीज को एआई उपकरणों के जिम्मेदार और सुरक्षित इस्तेमाल के बारे में जागरूक किया जा रहा है। कंपनी ने बिना अनुमति वाले एआई उपकरणों और वेबसाइटों की पहचान तथा उन्हें रोकने के उपाय भी किए हैं।

साइबर सुरक्षा के लिए आईएसओ प्रमाणन बरकरार

ZEE के मुताबिक वित्त वर्ष 2025-26 की तीसरी तिमाही में कंपनी ने ISO/IEC 27001:2022 सूचना सुरक्षा प्रबंधन प्रणाली प्रमाणन का नवीनीकरण कराया। कंपनी एम्प्लॉयीज को फर्जी ई-मेल और धोखाधड़ी वाले संदेशों की पहचान करने के लिए समय-समय पर अभ्यास भी कराती है।

रिपोर्ट के अनुसार कंपनी ने सूचना सुरक्षा के लिए ऐसी व्यवस्था बनाई है जिसमें संभावित खतरे की पहचान, सुरक्षा, निगरानी, जवाब और व्यवस्था बहाल करने की प्रक्रिया शामिल है।

कंटेंट की चोरी से कारोबार को नुकसान का खतरा

मीडिया और मनोरंजन कारोबार में फिल्मों, टीवी कार्यक्रमों, संगीत, पटकथाओं और प्रसारण अधिकारों की अहम भूमिका होती है। ZEE ने बौद्धिक संपदा की सुरक्षा और कंटेंट की चोरी रोकना भी अपने महत्वपूर्ण मुद्दों में शामिल किया है।

कंपनी के मुताबिक गैरकानूनी तरीके से कंटेंट की नकल और प्रसारण से फिल्मों, डिजिटल कार्यक्रमों, सदस्यता, विज्ञापन और कंटेंट अधिकारों से होने वाली कमाई प्रभावित हो सकती है। इससे निपटने के लिए कंपनी ने डिजिटल अधिकार प्रबंधन प्रणाली और वॉटरमार्किंग तकनीक का इस्तेमाल किया है।

कंपनी के अनुसार उसने प्रसारण और Z5 डिजिटल मंच के लिए कंटेंट चोरी से जुड़ी शिकायतों और गैरकानूनी कंटेंट हटाने के काम के लिए दो सर्विस पार्टनर भी जोड़े हैं। कंपनी ने कंटेंट की चोरी रोकने के लिए क्षेत्र के हिसाब से पहुंच सीमित करने, संदिग्ध गतिविधियों की पहचान करने और चोरी की गई कंटेंट को हटाने के लिए कानूनी कार्रवाई जैसे कदमों की भी जानकारी दी है।

ग्राहकों का अनुभव भी कंपनी की प्राथमिकता

ZEE ने ग्राहक अनुभव और जिम्मेदार कंटेंट को भी महत्वपूर्ण मुद्दा माना है। कंपनी के मुताबिक अगर दर्शकों को खराब अनुभव मिलता है तो इससे देखने का समय कम हो सकता है, ग्राहक कंपनी से दूर हो सकते हैं और कंपनी की छवि पर भी असर पड़ सकता है। इसके लिए कंपनी दर्शकों की प्रतिक्रिया, सामाजिक माध्यमों पर लोगों की प्रतिक्रिया और दूसरे तरीकों से दर्शकों की पसंद समझने की कोशिश करती है।

कंपनी ने बताया कि टीवी और डिजिटल मंचों पर प्रसारित होने वाली कंटेंट की जांच मानक और व्यवहार संबंधी टीम करती है। संवेदनशील कंटेंट के मामले में कानूनी और नियामकीय पहलुओं की भी जांच की जाती है।

दर्शकों की शिकायतों का जवाब 48 घंटे में देने की व्यवस्था

कंपनी के अनुसार दर्शक अपने सवाल, सुझाव और शिकायतें ई-मेल तथा ऑनलाइन माध्यमों से दर्ज करा सकते हैं। कंपनी ने बताया कि दर्शकों की प्रतिक्रियाओं का जवाब 48 घंटे के भीतर देने की व्यवस्था है। कंटेंट से जुड़ी शिकायतों के लिए कंपनी की वेबसाइट पर अलग शिकायत दर्ज करने की सुविधा भी उपलब्ध है।

वित्त वर्ष 2025-26 में कंटेंट से जुड़ी शिकायतों समेत अन्य श्रेणी में 4,159 शिकायतें मिलीं। रिपोर्ट के अनुसार साल के अंत में इनमें कोई शिकायत लंबित नहीं थी। वहीं निजी जानकारी, विज्ञापन, साइबर सुरक्षा, जरूरी सेवाओं की आपूर्ति, प्रतिबंधित व्यापार व्यवहार और अनुचित व्यापार व्यवहार से जुड़ी उपभोक्ता शिकायतों की संख्या रिपोर्ट में शून्य बताई गई है।

वित्त वर्ष में कोई आंकड़ा चोरी होने की घटना नहीं

ZEE ने रिपोर्ट में बताया कि वित्त वर्ष 2025-26 में आंकड़ों की चोरी या बड़ी जानकारी के उल्लंघन की कोई घटना नहीं हुई। कंपनी ने ग्राहकों की निजी पहचान वाली जानकारी से जुड़े किसी आंकड़ा उल्लंघन का मामला भी रिपोर्ट नहीं किया।

कंपनी ने जलवायु परिवर्तन को भी महत्वपूर्ण मुद्दा माना

ZEE ने जलवायु परिवर्तन से निपटने की क्षमता को अपने छह प्रमुख महत्वपूर्ण मुद्दों में शामिल किया है। कंपनी के मुताबिक उसने जलवायु परिवर्तन की रणनीति और कार्बन उत्सर्जन कम करने की योजना तैयार की है। कंपनी ने यह काम विज्ञान आधारित लक्ष्य पहल के वैश्विक मानकों के अनुरूप करने की बात कही है। इसके अलावा जलवायु जोखिम का आकलन भी शुरू किया गया है।

वित्त वर्ष 2025-26 में कंपनी ने देशभर में अपने संचालन स्थलों पर ऊर्जा जांच कराई। कंपनी वित्त वर्ष 2026-27 में अपनी एक जगह पर नवीकरणीय ऊर्जा के इस्तेमाल की संभावना का भी आकलन कर रही है।

कुल कार्बन उत्सर्जन 71,799.71 टन

रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में कंपनी का प्रत्यक्ष कार्बन उत्सर्जन यानी स्कोप-1 उत्सर्जन 6,724.21 टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य रहा। वित्त वर्ष 2024-25 में यह 6,065.1 टन था। वहीं बिजली आदि के इस्तेमाल से जुड़ा स्कोप-2 उत्सर्जन 7,890.79 टन रहा। पिछले वित्त वर्ष में यह 8,340.66 टन था। इस तरह स्कोप-1 और स्कोप-2 को मिलाकर कुल उत्सर्जन 14,615 टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य रहा।

दूसरी अप्रत्यक्ष गतिविधियों से जुड़ा स्कोप-3 उत्सर्जन 57,184.71 टन रहा। वित्त वर्ष 2024-25 में यह 55,102.88 टन था। तीनों को मिलाकर कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन 71,799.71 टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य रहा। इन आंकड़ों की स्वतंत्र जांच TÜV SÜD South Asia Pvt. Ltd. ने की है।

ऊर्जा की खपत बढ़कर 1,39,448.9 गीगाजूल हुई

कंपनी के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में कुल ऊर्जा खपत 1,39,448.9 गीगाजूल रही। वित्त वर्ष 2024-25 में यह 1,36,024.8 गीगाजूल थी। रिपोर्ट में नवीकरणीय स्रोतों से ऊर्जा खपत शून्य बताई गई है।

कंपनी ने ऊर्जा बचाने के लिए ऊर्जा जांच, ऊर्जा दक्ष उपकरणों का इस्तेमाल और कार्बन उत्सर्जन घटाने की रणनीति तैयार करने जैसे कदमों की जानकारी दी है।

पानी की खपत 1,59,713.9 किलोलीटर

वित्त वर्ष 2025-26 में कंपनी ने कुल 1,59,713.9 किलोलीटर पानी लिया और इस्तेमाल किया।

इसमें:

  • 99,243.6 किलोलीटर भूजल
  • 60,470.3 किलोलीटर तीसरे पक्ष से प्राप्त पानी शामिल था।

वित्त वर्ष 2024-25 में कुल पानी की खपत 1,46,855.2 किलोलीटर थी। कंपनी ने बताया कि उसके चार कार्यालय पानी की कमी वाले क्षेत्रों में आते हैं। इनमें बेंगलुरु शहर के 2, जयपुर शहरी क्षेत्र का 1 और चेन्नई के गिंडी का 1 कार्यालय शामिल है। इन चार स्थानों पर वित्त वर्ष 2025-26 में कुल 12,756 किलोलीटर पानी की खपत हुई।

कुल कचरा 97.1 टन

कंपनी के मुताबिक वित्त वर्ष 2025-26 में कुल 97.1 टन कचरा पैदा हुआ। वित्त वर्ष 2024-25 में यह 90.6 टन था।

वित्त वर्ष 2025-26 में:

  • प्लास्टिक कचरा – 1.8 टन
  • इलेक्ट्रॉनिक कचरा – 2.43 टन
  • बैटरी कचरा – 6.91 टन
  • अन्य गैर-खतरनाक कचरा – 87.8 टन रहा।

कंपनी ने कुल 66.7 टन कचरे को दोबारा इस्तेमाल या पुनर्चक्रण के लिए भेजा। 30.4 टन कचरे को दूसरे निपटान तरीकों से हटाया गया। कंपनी के अनुसार कचरे को शुरुआत में ही अलग-अलग किया जाता है और इलेक्ट्रॉनिक कचरे, बैटरी तथा दूसरे खतरनाक कचरे को अधिकृत पुनर्चक्रणकर्ताओं और सेवा प्रदाताओं के जरिए संभाला जाता है।

एम्प्लॉयीज की सुरक्षा पर भी रिपोर्ट में जानकारी

कंपनी ने बताया कि वित्त वर्ष 2025-26 में उसके 63.6 फीसदी संयंत्रों और कार्यालयों में स्वास्थ्य एवं सुरक्षा तथा काम करने की परिस्थितियों का आकलन किया गया।

एम्प्लॉयीज के लिए काम के दौरान चोट लगने की दर यानी एलटीआईएफआर 1.5 रही, जबकि वित्त वर्ष 2024-25 में यह 1.1 थी।

रिपोर्ट में वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान एम्प्लॉयीज के बीच 8 काम से जुड़ी दर्ज चोटों की जानकारी दी गई है।

किसी एम्प्लॉयी की काम के दौरान मौत और गंभीर श्रेणी की काम से जुड़ी चोट के मामले में आंकड़ा शून्य बताया गया है।

कंपनी ने नियमित सुरक्षा जांच, जोखिम आकलन, सुरक्षा प्रशिक्षण और जरूरत के मुताबिक सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराने की जानकारी दी है।

रिश्वत और भ्रष्टाचार के खिलाफ शून्य सहनशीलता

ZEE ने कारोबारी नैतिकता को भी महत्वपूर्ण मुद्दा माना है।

कंपनी ने बताया कि रिश्वत और भ्रष्टाचार के खिलाफ उसकी शून्य सहनशीलता की नीति है। एम्प्लॉयीज के लिए आचार संहिता का पालन जरूरी है।

वित्त वर्ष 2025-26 में निदेशकों, प्रमुख प्रबंधकीय एम्प्लॉयीज, एम्प्लॉयीज या कामगारों के खिलाफ रिश्वत या भ्रष्टाचार के मामले में किसी अनुशासनात्मक कार्रवाई की जानकारी नहीं दी गई।

नियामक संस्थाओं या अदालतों की ओर से जुर्माना, दंड, समझौता राशि, सजा या अन्य कार्रवाई के मामले में भी रिपोर्ट में कोई राशि या मामला नहीं बताया गया है।

कंपनी के सामाजिक कामों में महिलाओं और कमजोर वर्गों पर जोर

ZEE ने सामाजिक जिम्मेदारी के तहत महिलाओं को सशक्त बनाने, कला-संस्कृति और राष्ट्रीय विरासत के संरक्षण, आपदा राहत, ग्रामीण विकास और रोजगार से जुड़े कई कार्यक्रम चलाए। कंपनी ने झारखंड के आकांक्षी जिलों में अत्यधिक गरीबी कम करने के लिए महिलाओं के नेतृत्व वाले परिवारों के लिए भी कार्यक्रम चलाया। इसमें बोकारो, पूर्वी सिंहभूम, गोड्डा, गुमला, खूंटी, लातेहार, लोहरदगा, पाकुड़, सिमडेगा और पश्चिमी सिंहभूम शामिल थे।

कंपनी के मुताबिक इन परिवारों को बिना ब्याज के कर्ज, खेती और पशुपालन की जानकारी, स्वयं सहायता समूहों से जोड़ने और सरकारी योजनाओं तक पहुंच दिलाने जैसी सहायता दी गई।

कई सामाजिक योजनाओं से हजारों लोगों को लाभ

रिपोर्ट में कंपनी ने कई सामाजिक योजनाओं के लाभार्थियों का विवरण दिया है।

-  सक्षम योजना के तहत गौतम बुद्ध नगर में 155 लोगों को लाभ मिला। यह योजना कई तरह की दिव्यांगता और दृष्टिबाधित बच्चों तथा युवाओं के लिए थी।

-  मैजिक बस इंडिया फाउंडेशन की आजीविका योजना से 1,841 युवाओं को लाभ मिला।

-  बाल रक्षा भारत की युवा कौशल और रोजगार योजना से 678 युवाओं को लाभ मिला।

-  स्नेहाबिल्डिंग ब्रिजेज योजना के तहत 18,966 लोगों को लाभ मिलने की जानकारी दी गई है।

-  ऑस्कर फाउंडेशन की फुटबॉल और जीवन कौशल योजना से 411 बच्चों को लाभ मिला।

-  पब्लिक कंसर्न इंटरनेशनलउद्यमिता कार्यक्रम के तहत 351 महिला उद्यमियों को सहायता मिली।

-  पब्लिक कंसर्न इंटरनेशनलसार्वजनिक खरीद कार्यक्रम के तहत 2,380 लोगों को लाभ मिला।

-  वहीं नज इंस्टीट्यूटएंड अल्ट्रा पॉवर्टी योजना के तहत झारखंड में 5,400 महिलाओं के नेतृत्व वाले परिवारों को सहायता देने का लक्ष्य रखा गया।

इन योजनाओं में रिपोर्ट के अनुसार लाभार्थियों में 100 फीसदी हिस्सा कमजोर और वंचित वर्गों का था।

छोटे और मध्यम कारोबार से खरीद में बढ़ोतरी

कंपनी ने बताया कि वित्त वर्ष 2025-26 में उसके इनपुट की 21 फीसदी खरीद सीधे छोटे और मध्यम कारोबारों या छोटे उत्पादकों से हुई। वित्त वर्ष 2024-25 में यह हिस्सा 8 फीसदी था। भारत के भीतर से सीधे खरीदे गए इनपुट का हिस्सा 98 फीसदी रहा, जो पिछले वित्त वर्ष में 97 फीसदी था।

छह बड़े मुद्दों को कंपनी ने माना अहम

ZEE ने अपनी दोहरी महत्वपूर्णता जांच के आधार पर छह प्रमुख मुद्दों की पहचान की है। ये हैं:

  1. कारोबारी नैतिकता
  2. आंकड़ों की गोपनीयता और साइबर सुरक्षा
  3. बौद्धिक संपदा की सुरक्षा और कंटेंट की चोरी रोकना
  4. ग्राहक अनुभव और जिम्मेदार कंटेंट
  5. प्रतिभा को आकर्षित करना और एम्प्लॉयीज को बनाए रखना
  6. जलवायु परिवर्तन से निपटने की क्षमता

कंपनी ने बताया कि इन मुद्दों की पहचान कारोबार और हितधारकों पर इनके संभावित प्रभाव, जोखिम, अवसर और आर्थिक असर को ध्यान में रखते हुए की गई है।

एम्प्लॉयीज को बनाए रखना भी चुनौती

कंपनी ने एम्प्लॉयीज के नौकरी छोड़ने की दर को भी महत्वपूर्ण मुद्दा माना है। रिपोर्ट में वित्त वर्ष 2024-25 की स्वैच्छिक एम्प्लॉयी नौकरी छोड़ने की दर 17.5 फीसदी बताई गई है, जबकि कंपनी ने बाजार का औसत 17.2 फीसदी बताया।

कंपनी के मुताबिक मीडिया व एंटरटेनमेंट सेक्टर में प्रतिभाशाली एम्प्लॉयीज की भूमिका काफी अहम है। एम्प्लॉयीज के जाने से नई भर्ती, प्रशिक्षण, काम की गति, परियोजनाओं और पुराने अनुभव का नुकसान हो सकता है। इसी वजह से कंपनी आंतरिक नौकरी के अवसर, करियर विकास, कौशल बढ़ाने, मार्गदर्शन, एम्प्लॉयी कल्याण और कंपनी की बेहतर कार्य संस्कृति जैसे उपायों पर काम कर रही है।

कंपनी के साथ शेयरधारकों और दूसरे हितधारकों की लगातार बातचीत

कंपनी ने शेयरधारकों, निवेशकों, ग्राहकों, आपूर्तिकर्ताओं, एम्प्लॉयीज, सरकारी और नियामकीय संस्थाओं, समुदायों, कारोबार पार्टनर्स और रचनात्मक क्षेत्र से जुड़े लोगों को प्रमुख हितधारक बताया है। इनके साथ ई-मेल, मीटिंग, फोन, व्यक्तिगत बातचीत, एम्प्लॉयी मीटिंग, सर्वेक्षण और वेबसाइट समेत कई माध्यमों से संपर्क किया जाता है।

कंपनी के मुताबिक पर्यावरण, सामाजिक और शासन से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों की निगरानी विभिन्न बोर्ड समितियां करती हैं। इनमें लेखा परीक्षा समिति, सामाजिक जिम्मेदारी समिति, नामांकन एवं पारिश्रमिक समिति, हितधारक संबंध समिति और जोखिम प्रबंधन समिति शामिल हैं। 

TÜV SÜD ने की स्वतंत्र जांच

ZEE की रिपोर्ट के साथ TÜV SÜD South Asia Pvt. Ltd. की स्वतंत्र उचित आश्वासन रिपोर्ट भी दी गई है। TÜV SÜD ने BRSR के 9 मुख्य मानकों से जुड़ी जानकारी की उचित स्तर पर जांच की। जांच के दौरान कंपनी के अलग-अलग कार्यालयों और स्थानों से जुड़े आंकड़ों, प्रक्रियाओं और नियंत्रण व्यवस्था को देखा गया।

TÜV SÜD ने अपने निष्कर्ष में कहा कि किए गए आकलन और उपलब्ध कराए गए प्रमाणों के आधार पर ऐसा कुछ सामने नहीं आया जिससे यह माना जाए कि वित्त वर्ष 2025-26 के 9 मुख्य मानकों से जुड़ी जानकारी महत्वपूर्ण स्तर पर रिपोर्टिंग आवश्यकताओं के अनुरूप तैयार नहीं की गई है। कंपनी के ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन से जुड़े आंकड़ों की भी TÜV SÜD ने अलग से उचित स्तर पर जांच की। इसमें स्कोप-1, स्कोप-2 और स्कोप-3 उत्सर्जन शामिल रहे।

ZEE Entertainment की वित्त वर्ष 2025-26 की रिपोर्ट में कंपनी ने कारोबार के साथ-साथ एम्प्लॉयीज, ग्राहकों, सामाजिक जिम्मेदारी और पर्यावरण से जुड़े कई पहलुओं की जानकारी दी है। कंपनी ने साइबर सुरक्षा, ग्राहकों की निजी जानकारी की सुरक्षा, कंटेंट की चोरी, एम्प्लॉयीज को बनाए रखने और जलवायु परिवर्तन को अपने कारोबार के लिए महत्वपूर्ण जोखिम और अवसर के तौर पर पहचाना है। वहीं एम्प्लॉयीज के लिए बीमा, मानवाधिकार प्रशिक्षण, सामाजिक योजनाओं, कंटेंट सुरक्षा, ऊर्जा जांच, कचरा पुनर्चक्रण और कार्बन उत्सर्जन घटाने की दिशा में उठाए गए कदमों की भी जानकारी दी गई है। रिपोर्ट में दिए गए प्रमुख आंकड़ों की स्वतंत्र जांच TÜV SÜD की ओर से की गई है। कंपनी ने कहा है कि इन प्रयासों का उद्देश्य जिम्मेदार कारोबारी व्यवस्था को मजबूत करना और लंबे समय के लिए टिकाऊ विकास की दिशा में आगे बढ़ना है।

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दूसरा BARC या नया इकोसिस्टम? MIB ने TAM और Chrome DM से CTV मीजरमेंट पर साधा संपर्क

भारत का टेलीविजन रेटिंग्स सिस्टम सिर्फ सरकार की संशोधित Television Ratings Policy, 2026 के तहत रेटिंग्स की वापसी तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि इसमें इससे कहीं बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।

Samachar4media Bureau by
Published - Wednesday, 26 August, 2026
Last Modified:
Wednesday, 26 August, 2026
TV5412

इमरान फजल, असिसटेंट एडिटर, एक्सचेंज4मीडिया ।।

भारत का टेलीविजन रेटिंग्स सिस्टम सिर्फ सरकार की संशोधित Television Ratings Policy, 2026 के तहत रेटिंग्स की वापसी तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि इसमें इससे कहीं बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।जानकारों के मुताबिक, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) ने टेलीविजन मीजरमेंट कंपनियों TAM और Chrome DM से Connected TV (CTV) मीजरमेंट को लेकर उनके सहयोग और तकनीकी क्षमताओं के बारे में संपर्क किया है।

इस कदम के बाद एक बड़ा सवाल सामने आया है कि क्या सरकार BARC India के लिए ज्यादा प्रतिस्पर्धा तैयार करना चाहती है या फिर ऐसा व्यापक मीजरमेंट सिस्टम बनाना चाहती है, जिसमें विशेषज्ञ टेक्नोलॉजी कंपनियां मौजूदा रेटिंग्स सिस्टम के साथ जुड़कर काम कर सकें?

Chrome DM पहले से ही एक ऑटोमेटेड CTV मीजरमेंट सिस्टम संचालित करता है। वहीं, TAM के CEO एलवी कृष्णन ने इससे पहले एक्सचेंज4मीडिया से कहा था, “BARC India के साथ JV के जरिए TAM, इंडस्ट्री की जरूरतों के आधार पर मीजरमेंट के अगले चरण में BARC की मदद करने के लिए तैयार है।”

TAM को डिजिटल और टेलीविजन ऑडियंस मीजरमेंट का लंबे समय से अनुभव है। Chrome DM ने भी संकेत दिया है कि अगर उसकी टेक्नोलॉजी, डेटा या विशेषज्ञता किसी व्यापक इंडस्ट्री मीजरमेंट सिस्टम में योगदान दे सकती है, तो वह BARC या इंडस्ट्री के अन्य संबंधित पक्षों के साथ काम करने के लिए तैयार है।

मामले की जानकारी रखने वाले लोगों ने कहा कि MIB की ओर से किया गया यह संपर्क सरकार की उस बड़ी कोशिश के संदर्भ में देखा जाना चाहिए, जिसमें टेलीविजन मीजरमेंट को ज्यादा टेक्नोलॉजी-न्यूट्रल बनाया जाए और Linear Television, Smart TVs और Connected Devices पर बंट चुके व्यूइंग को भी मापा जा सके। यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब इंडस्ट्री संशोधित पॉलिसी के तहत टेलीविजन रेटिंग्स के पूरी तरह दोबारा शुरू होने का इंतजार कर रही है।

सिर्फ टेक्नोलॉजी से रेटिंग एजेंसी नहीं बनती

सरकार ने टेलीविजन रेटिंग्स मार्केट में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए इसे ज्यादा खुला बनाया है। संशोधित पॉलिसी के तहत तय नियमों को पूरा करने वाली कई रेटिंग एजेंसियां काम कर सकती हैं। वहीं, न्यूनतम नेट-वर्थ की जरूरत को 20 करोड़ रुपये से घटाकर 5 करोड़ रुपये कर दिया गया है। कागज पर देखें तो इससे नई कंपनियों के लिए बाजार में प्रवेश की बाधा काफी कम हुई है।

लेकिन असल में इंडस्ट्री के अधिकारियों का कहना है कि इस बिजनेस की लागत अभी भी बहुत ज्यादा है। एक वरिष्ठ ब्रॉडकास्टिंग एग्जिक्यूटिव ने कहा, “रेटिंग एजेंसी सिर्फ ऐसी कंपनी नहीं है जो टेलीविजन स्क्रीन की गिनती कर सके। इसके लिए एक प्रतिनिधि पैनल, फील्ड ऑपरेशंस, पीपल मीटर्स और दूसरी मीजरमेंट सुविधाएं, डेटा प्रोसेसिंग, स्टैटिस्टिकल मॉडलिंग, क्वालिटी कंट्रोल, गवर्नेंस सिस्टम और ब्रॉडकास्टर्स, एडवर्टाइजर्स और एजेंसियों की जांच का सामना करने की क्षमता चाहिए।”

इसका मतलब है कि अत्याधुनिक CTV मीजरमेंट टेक्नोलॉजी रखने वाली कंपनी महत्वपूर्ण डेटा या टेक्नोलॉजी प्रोवाइडर बन सकती है, लेकिन जरूरी नहीं कि वह खुद रेटिंग्स करेंसी प्रोवाइडर भी बन जाए।

एक इंडस्ट्री एग्जिक्यूटिव ने कहा कि यह अंतर बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि बड़े स्तर पर टीवी खपत को मीजरमेंटे की क्षमता अपने आप में स्वतंत्र रूप से ऑडिट की गई और देशभर के लिए प्रतिनिधि टेलीविजन करेंसी तैयार करने की क्षमता नहीं बन जाती।

एग्जिक्यूटिव ने कहा, “टेलीविजन की खपत को मीजरमेंटे की टेक्नोलॉजी होना एक बात है। राष्ट्रीय स्तर पर रेटिंग्स करेंसी चलाना बिल्कुल अलग बिजनेस है। पैनल, मेथडोलॉजी, गवर्नेंस, ऑडिटेबिलिटी और इंडस्ट्री की स्वीकार्यता आखिर में सबसे ज्यादा मायने रखती है।” इससे यह संकेत मिलता है कि सीधे मुकाबले की जगह सहयोग करना फिलहाल ज्यादा व्यावहारिक रास्ता हो सकता है।

TAM, Chrome DM: CTV के लिए अहम बिल्डिंग ब्लॉक बन सकते हैं

TAM और Chrome DM को इस उभरते बाजार में एक खास फायदा हो सकता है, क्योंकि उन्हें CTV मीजरमेंट और मल्टी-स्क्रीन डिजिटल ऑडियंस मीजरमेंट सर्विस को बिल्कुल शुरुआत से तैयार नहीं करना पड़ेगा।

Chrome DM के पंकज कृष्णा ने कहा कि कंपनी ने बड़े स्तर पर ऑटोमेटेड CTV मीजरमेंट सिस्टम तैयार किया है, जो रियल टाइम में व्यूइंग को कैप्चर कर सकता है। कंपनी के मुताबिक, उसके डेटा का इस्तेमाल ब्रॉडकास्टर्स और एडवर्टाइजर्स कंटेंट और एडवर्टाइजिंग ऑप्टिमाइजेशन के लिए पहले से कर रहे हैं।

Chrome DM का कहना है कि टेलीविजन मीजरमेंट का भविष्य केवल एक मीजरमेंट स्रोत पर निर्भर नहीं रह सकता। कंपनी ने कहा, “रेटिंग्स का भविष्य किसी एक मीजरमेंट स्रोत पर निर्भर नहीं हो सकता। एक मजबूत सिस्टम में डेमोग्राफिक प्रोफाइलिंग के लिए प्रतिनिधि पैनल डेटा के साथ कई स्रोतों से मिले Census-level data को जोड़ा जाना चाहिए।”

टेलीविजन व्यूइंग के लगातार अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर बंटने के साथ यह प्रस्ताव और भी महत्वपूर्ण हो सकता है। 

Linear Television के लिए डेमोग्राफिक्स को समझने और एक कॉमन करेंसी तैयार करने के लिए प्रतिनिधि पैनल की जरूरत बनी रहेगी। वहीं, CTV बड़े स्तर पर डिवाइस-लेवल कंजम्पशन डेटा तैयार करता है, जिससे कहीं ज्यादा बारीकी से जानकारी मिल सकती है। दोनों तरह के मीजरमेंट अलग-अलग समस्याओं को हल करते हैं। पैनल इंडस्ट्री को बता सकता है कि कौन देख रहा है। ऑटोमेटेड CTV डेटा संभावित रूप से यह बता सकता है कि क्या देखा जा रहा है, कब देखा जा रहा है, कहां देखा जा रहा है और कितने बड़े स्तर पर देखा जा रहा है। रणनीतिक सवाल यह है कि क्या इन दोनों डेटा सेट को इस तरह जोड़ा जा सकता है कि रेटिंग्स करेंसी की विश्वसनीयता पर असर न पड़े।

पंकज कृष्णा ने कहा कि अगर Chrome DM की टेक्नोलॉजी, डेटा या विशेषज्ञता एक मजबूत इंडस्ट्री-वाइड मीजरमेंट सिस्टम तैयार करने में योगदान दे सकती है, तो कंपनी BARC या किसी अन्य संबंधित इंडस्ट्री स्टेकहोल्डर के साथ सहयोग करने के लिए तैयार है।

इससे संकेत मिलता है कि Chrome DM फिलहाल किसी नए BARC को बिल्कुल शुरुआत से तैयार करने के बजाय एक ऐसे सिस्टम में विशेषज्ञ मीजरमेंट टेक्नोलॉजी की भूमिका निभाने को ज्यादा महत्वपूर्ण अवसर मानता है, जिसमें अलग-अलग कंपनियां इस पूरी व्यवस्था के अलग-अलग हिस्सों में योगदान दें।

लेकिन क्या Chrome DM रेटिंग एजेंसी बन सकती है?

अगर कंपनी खुद एक रेटिंग एजेंसी बनना चाहती है, तो उसे लागू रेगुलेटरी नियमों को पूरा करना होगा और ऐसा ऑपरेटिंग मॉडल तैयार करना होगा, जो स्वतंत्र और प्रतिनिधि टेलीविजन करेंसी देने में सक्षम हो। इसके मुकाबले BARC के साथ टेक्नोलॉजी पार्टनरशिप करने पर Chrome DM एक विशेषज्ञ मीजरमेंट प्रोवाइडर के रूप में काम कर सकती है।

यह अंतर आगे चलकर MIB के सामने एक अहम सवाल खड़ा कर सकता है, जिसका मौजूदा टेक्नोलॉजी-न्यूट्रल फ्रेमवर्क पूरी तरह जवाब नहीं देता: क्या किसी कंपनी को रेटिंग एजेंसी बनने के लिए पूरे मीजरमेंट सिस्टम का मालिक होना जरूरी है? अगर इसका जवाब हां है, तो विशेषज्ञ CTV कंपनियों पर जरूरत से ज्यादा बोझ पड़ सकता है।

उन्हें Linear Television को मीजरमेंटे के लिए जरूरी पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर फिर से तैयार करना पड़ेगा, सिर्फ इसलिए कि वे ऐसे रेटिंग्स सिस्टम में शामिल हो सकें, जहां उनकी मौजूदा CTV क्षमताएं पहले से ही काफी उपयोगी हो सकती हैं।

अगर जवाब नहीं है, तो इंडस्ट्री ज्यादा मॉड्यूलर मॉडल की तरफ बढ़ सकती है। ऐसे सिस्टम में एक प्रतिनिधि पैनल ऑपरेटर डेमोग्राफिक मीजरमेंट उपलब्ध करा सकता है, एक ऑटोमेटेड CTV कंपनी Census-level viewing data दे सकती है, कोई अन्य टेक्नोलॉजी प्रोवाइडर Return-path या Set-top-box data दे सकता है और एक स्वतंत्र रेटिंग्स संस्था इन सभी डेटा सेट को मिलाकर अंतिम करेंसी तैयार कर सकती है। यह सिर्फ एक और रेटिंग एजेंसी जोड़ने से कहीं बड़ा बदलाव होगा।

TAM का सवाल

TAM का भारत में टेलीविजन ऑडियंस मीजरमेंट के साथ लंबा जुड़ाव रहा है। इसके कारण उसके पास ऐसी संस्थागत जानकारी और पुराना अनुभव है, जो किसी नए खिलाड़ी के पास जरूरी नहीं होगा। हालांकि, फिलहाल TAM की ओर से इस बात की कोई पुष्टि नहीं हुई है कि वह नई पॉलिसी के तहत रजिस्ट्रेशन के लिए आवेदन करने या एक पूरी रेटिंग एजेंसी के रूप में बाजार में लौटने की योजना बना रही है। TAM के CEO L.V. Krishnan ने इन घटनाक्रमों पर कोई टिप्पणी नहीं की।

फिर भी TAM के लिए दोबारा बाजार में आने पर वही मूल चुनौती होगी, जो दूसरे संभावित प्रतिस्पर्धियों के सामने है: सिर्फ विशेषज्ञता पर्याप्त नहीं है। एक भरोसेमंद राष्ट्रीय रेटिंग्स ऑपरेशन के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर, मेथडोलॉजी, पैनल मैनेजमेंट, गवर्नेंस, वित्तीय संसाधन और लंबे समय तक इंडस्ट्री का भरोसा जरूरी है। इसलिए MIB का TAM से बात करना महत्वपूर्ण है, भले ही इसका अंतिम नतीजा कोई नई रेटिंग्स सर्विस शुरू होने के रूप में सामने न आए। इससे संकेत मिलता है कि सरकार शायद अब सिर्फ BARC बनाम किसी नई रेटिंग कंपनी के पुराने मॉडल से आगे सोच रही है।

क्या MIB दो-स्तरीय मीजरमेंट सिस्टम बना सकता है?

एक संभावित नतीजा ऐसा रेगुलेटरी या इंडस्ट्री फ्रेमवर्क हो सकता है, जिसमें विशेषज्ञ मीजरमेंट प्रोवाइडर्स और फुल-सर्विस रेटिंग एजेंसियों के बीच अंतर किया जाए।

संशोधित पॉलिसी टेक्नोलॉजी-न्यूट्रल तरीका अपनाती है और बदलते टेलीविजन कंजम्पशन पैटर्न, जिसमें Connected Television भी शामिल है, को जगह देने की कोशिश करती है। लेकिन बाजार में ज्यादा फंक्शनल अंतर की जरूरत हो सकती है।

एक रेटिंग एजेंसी के एग्जिक्यूटिव ने कहा, “एक विशेषज्ञ CTV मीजरमेंट कंपनी को देशभर का Linear-TV पैनल तैयार करने की जरूरत के बिना CTV कंजम्पशन डेटा उपलब्ध कराने के लिए मान्यता दी जा सकती है।”

एग्जिक्यूटिव ने कहा, “वहीं, एक Full-service ratings agency प्रतिनिधि राष्ट्रीय टेलीविजन करेंसी तैयार करने की जिम्मेदारी संभाल सकती है। इस तरह की व्यवस्था इनोवेशन की व्यावहारिक बाधाओं को कम कर सकती है।”

इससे मीजरमेंट सिस्टम में ज्यादा कंपनियों के आने का रास्ता भी खुल सकता है, बिना इस मजबूरी के कि हर कंपनी उस इंफ्रास्ट्रक्चर को दोबारा तैयार करने में बड़ी रकम खर्च करे, जो किसी दूसरी कंपनी के पास पहले से मौजूद है।

लेकिन गवर्नेंस से जुड़े सवाल काफी मुश्किल होंगे।

सवाल बने हुए हैं:

CTV डेटा को पैनल डेटा के मुकाबले किस तरह वेटेज दिया जाएगा?

मेथडोलॉजी कौन तय करेगा?

तैयार होने वाले आंकड़ों का ऑडिट कौन करेगा?

Connected TVs, Linear Television और कई स्क्रीन के बीच होने वाली डुप्लीकेशन को किस तरह दूर किया जाएगा?

डिवाइस-लेवल कंजम्पशन के साथ डेमोग्राफिक जानकारी कैसे जोड़ी जाएगी?

और सबसे महत्वपूर्ण सवाल, विज्ञापन बाजार जिस अंतिम आंकड़े के आधार पर लेन-देन करता है, उसका मालिक कौन होगा?

संशोधित पॉलिसी में मेथडोलॉजी, ट्रांसपेरेंसी, इंडिपेंडेंस और ऑडिटिंग पर जोर दिया गया है। इसलिए किसी भी हाइब्रिड मीजरमेंट सिस्टम में जिम्मेदारियों को स्पष्ट रूप से तय करना होगा।

BARC को शायद एक और प्रतिद्वंद्वी नहीं, ज्यादा डेटा की जरूरत हो

इसलिए सबसे बड़ा बदलाव ऐसा सिस्टम हो सकता है जिसमें BARC को हटाने के बजाय उसे एक बहुत बड़े मीजरमेंट सिस्टम का हिस्सा बना दिया जाए।

BARC के पास प्रतिनिधि पैनल और इंडस्ट्री के साथ स्थापित रिश्ते हैं। वहीं TAM और Chrome DM के पास डिजिटल मीजरमेंट क्षमताएं हैं। हर कंपनी को पूरा रेटिंग्स सिस्टम तैयार करने के लिए मजबूर करने के बजाय इंडस्ट्री अलग-अलग कंपनियों की विशेषज्ञ क्षमताओं को जोड़ सकती है।

एडवर्टाइजर्स के लिए इससे भविष्य में टेलीविजन कंजम्पशन की ज्यादा व्यापक तस्वीर सामने आ सकती है। ब्रॉडकास्टर्स के लिए ऑडियंस और विज्ञापन एक्सपोजर का ज्यादा बारीक डेटा उपलब्ध हो सकता है।

सरकार के लिए इससे प्रतिस्पर्धा और टेक्नोलॉजिकल मजबूती बढ़ सकती है, बिना इस जरूरत के कि हर नई कंपनी पूरे राष्ट्रीय मीजरमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर को दोबारा तैयार करे।

1,000 करोड़ रुपये का सवाल

यहीं पर निवेश की अर्थव्यवस्था सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है।

इंडस्ट्री के अनुमान के मुताबिक, एक भरोसेमंद राष्ट्रीय टेलीविजन मीजरमेंट ऑपरेशन तैयार करने में 1,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का निवेश लग सकता है। इसमें पैनल का विस्तार, पीपल मीटर्स, फील्ड ऑपरेशंस, टेक्नोलॉजी, डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर और कर्मचारियों की लागत शामिल है।

इतने बड़े कैपिटल एक्सपेंडिचर से प्रतिस्पर्धा का पूरा सवाल बदल जाता है।

सरकार ने औपचारिक नेट-वर्थ की सीमा 20 करोड़ रुपये से घटाकर 5 करोड़ रुपये कर दी है, लेकिन रेगुलेटरी न्यूनतम सीमा और एक भरोसेमंद रेटिंग्स ऑपरेशन तैयार करने के लिए जरूरी कमर्शियल कैपिटल एक ही चीज नहीं है।

एक इंडस्ट्री एग्जिक्यूटिव ने इसे सीधे शब्दों में कहा, “अगर आप किसी मीजरमेंट कंपनी को बनाने में 1,000 करोड़ रुपये या उससे ज्यादा निवेश करने के बारे में सोच रहे हैं, तो आप इस बात पर करीब से नजर रखेंगे कि मौजूदा कंपनी के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है। निवेशकों के लिए सबसे बड़े कारकों में से एक नियमों की स्थिरता है।”

एक अन्य एग्जिक्यूटिव ने कहा कि यह मुद्दा सिर्फ मौजूदा रेटिंग्स संकट तक सीमित नहीं है।

उन्होंने कहा, “चिंता सिर्फ आज की रेटिंग्स ब्लैकआउट को लेकर नहीं है। चिंता इस बात को लेकर है कि क्या आगे भी इस तरह के हस्तक्षेप ऑपरेटिंग एनवायरनमेंट का हिस्सा बन सकते हैं।”

संभावित नई कंपनियों के लिए यह शायद सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है।

सवाल अब सिर्फ यह नहीं है कि सरकार ने बाजार को औपचारिक रूप से खोल दिया है या नहीं। सवाल यह है कि क्या निवेशकों को भरोसा है कि नियम इतने लंबे समय तक स्थिर रहेंगे कि नई रेटिंग्स कंपनी अपने बड़े शुरुआती निवेश को वापस हासिल कर सके।

सिर्फ लाइसेंस देने से प्रतिस्पर्धा नहीं आएगी

सरकार ने कई रेटिंग एजेंसियों को अनुमति देकर एक बड़ी बाधा जरूर हटा दी है। लेकिन सिर्फ लाइसेंस देने से प्रतिस्पर्धा पैदा नहीं होगी। नई कंपनी को एक मजबूत बिजनेस मॉडल, पर्याप्त पूंजी, इंडस्ट्री की स्वीकार्यता और इस भरोसे की जरूरत होगी कि उसकी मेथडोलॉजी के साथ निष्पक्ष व्यवहार किया जाएगा।

इसलिए TAM और Chrome DM जैसे विशेषज्ञ खिलाड़ियों के लिए कमर्शियल रूप से ज्यादा तर्कसंगत रास्ता शायद CTV मीजरमेंट के जरिए बाजार में प्रवेश करना हो सकता है, बजाय इसके कि वे तुरंत BARC के पूरे इंफ्रास्ट्रक्चर को दोबारा तैयार करने की कोशिश करें।

TAM के लिए अवसर अलग होगा, अगर वह इसे आगे बढ़ाने का फैसला करता है। वह अपनी ऐतिहासिक विशेषज्ञता का इस्तेमाल करते हुए 2026 के फ्रेमवर्क के तहत जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर को दोबारा तैयार कर सकता है या किसी अन्य कंपनी के साथ साझेदारी कर सकता है।

वहीं BARC के लिए प्रतिस्पर्धी खतरा जरूरी नहीं कि ऐसी कंपनी से आए जो उसे सीधे बदलने की कोशिश कर रही हो। यह नई पीढ़ी की मीजरमेंट कंपनियों से भी आ सकता है, जो Single-source television currency के मॉडल को धीरे-धीरे बनाए रखना मुश्किल बना दें।

यही वजह है कि MIB का TAM और Chrome DM दोनों से संपर्क करना पहली नजर में जितना सामान्य लग सकता है, उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है। मंत्रालय शायद यह समझने की कोशिश कर रहा है कि भविष्य का रेटिंग्स सिस्टम आखिर कैसा होना चाहिए।

सरकार के सामने मूल रूप से दो विकल्प हैं- एक और BARC तैयार करना या फिर ऐसा इकोसिस्टम बनाना जिसमें किसी एक कंपनी को पूरी तरह BARC बनने की जरूरत ही न हो। दूसरा मॉडल टेलीविजन के भविष्य के लिहाज से टेक्नोलॉजी के स्तर पर ज्यादा प्रासंगिक हो सकता है। हालांकि, इसे रेगुलेट करना भी काफी ज्यादा मुश्किल हो सकता है।

ब्रॉडकास्टर्स और एडवर्टाइजर्स के लिए दांव काफी बड़ा है। ज्यादा प्रतिस्पर्धी रेटिंग्स मार्केट से किसी एक मीजरमेंट प्रोवाइडर पर निर्भरता कम हो सकती है और ऑडियंस डेटा की बारीकी में सुधार हो सकता है। लेकिन अगर कई डेटा सोर्स सामने आते हैं और उनके बीच कोई कॉमन करेंसी नहीं होती, तो इंडस्ट्री को इसका उल्टा नतीजा भी मिल सकता है- ज्यादा डेटा, ज्यादा मीजरमेंट कंपनियां और इस बात को लेकर कम निश्चितता कि आखिर आंकड़ों का मतलब क्या है।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या MIB का TAM और Chrome DM के साथ जुड़ाव वास्तव में एक प्रतिस्पर्धी रेटिंग्स मार्केट की शुरुआत है, या फिर यह भारतीय टेलीविजन ऑडियंस को मीजरमेंटे के बिल्कुल अलग मॉडल की दिशा में पहला कदम है।

 

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B.A.G. Films की AGM 17 सितंबर को, शेयरधारकों की मंजूरी के लिए रखे जाएंगे ये 13 प्रस्ताव

B.A.G. Films and Media Limited की 33वीं सालाना आम बैठक (AGM) 17 सितंबर 2026 को शाम 4 बजे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग/अन्य ऑडियो-विजुअल माध्यम (VC/OAVM) से आयोजित की जाएगी।

Vikas Saxena by
Published - Tuesday, 25 August, 2026
Last Modified:
Tuesday, 25 August, 2026
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B.A.G. Films and Media Limited की 33वीं सालाना आम बैठक (AGM) 17 सितंबर 2026 को शाम 4 बजे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग/अन्य ऑडियो-विजुअल माध्यम (VC/OAVM) से आयोजित की जाएगी। कंपनी ने AGM के नोटिस में कुल 13 एजेंडा आइटम रखे हैं। इनमें वित्त वर्ष 2025-26 के ऑडिटेड वित्तीय विवरणों को मंजूरी, सुधीर शुक्ला की दोबारा नियुक्ति और चंदन कुमार जैन को स्वतंत्र निदेशक के तौर पर दूसरे कार्यकाल के लिए नियुक्त करने के प्रस्ताव शामिल हैं।

इसके अलावा कंपनी और उससे जुड़ी कंपनियों के बीच होने वाले कई महत्वपूर्ण संबंधित पक्ष लेनदेन (Material Related Party Transactions) के लिए भी शेयरधारकों की मंजूरी मांगी गई है।

वित्त वर्ष 2025-26 के वित्तीय विवरणों को मंजूरी

AGM में 31 मार्च 2026 को समाप्त वित्त वर्ष के कंपनी के ऑडिटेड वित्तीय विवरण, जिसमें समेकित (Consolidated) वित्तीय विवरण भी शामिल हैं, शेयरधारकों के सामने रखे जाएंगे। इसके साथ निदेशक मंडल (Board of Directors) और ऑडिटर्स की रिपोर्ट भी पेश की जाएगी।

सुधीर शुक्ला की दोबारा नियुक्ति का प्रस्ताव

दूसरे प्रस्ताव में सुधीर शुक्ला को दोबारा निदेशक नियुक्त करने की मंजूरी मांगी गई है। वह रोटेशन के आधार पर निदेशक पद से रिटायर हो रहे हैं और दोबारा नियुक्ति के लिए पात्र हैं। उन्होंने इस पद पर बने रहने की इच्छा भी जताई है।

कंपनी के दस्तावेजों के मुताबिक, सुधीर शुक्ला 13 फरवरी 2013 से कंपनी के बोर्ड में हैं। वह गैर-कार्यकारी निदेशक (Non-Executive Director) हैं। उन्हें जनरल मैनेजमेंट कंसल्टेंसी, ऑर्गनाइजेशनल कंट्रोल सिस्टम्स, कॉरपोरेट परफॉर्मेंस मैनेजमेंट, रिस्क मैनेजमेंट और कॉरपोरेट गवर्नेंस जैसे क्षेत्रों में अनुभव है।

वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान उन्हें बोर्ड और उसकी समितियों की बैठकों में शामिल होने के लिए ₹1.35 लाख की बैठक फीस (Sitting Fees) मिली थी। कंपनी में उनके पास 26,700 इक्विटी शेयर हैं।

चंदन कुमार जैन का स्वतंत्र निदेशक के तौर पर दूसरा कार्यकाल

तीसरा प्रस्ताव चंदन कुमार जैन की स्वतंत्र निदेशक के तौर पर दोबारा नियुक्ति से जुड़ा है। उन्हें कंपनी की 29वीं AGM में 29 अगस्त 2022 को पांच साल के पहले कार्यकाल के लिए नियुक्त किया गया था। उनका मौजूदा कार्यकाल 29 मई 2027 को समाप्त होगा।

अब बोर्ड ने उन्हें दूसरे कार्यकाल के लिए नियुक्त करने की सिफारिश की है। अगर शेयरधारक प्रस्ताव को मंजूरी देते हैं तो उनका दूसरा कार्यकाल 30 मई 2027 से 29 मई 2032 तक पांच लगातार वर्षों का होगा।

वह गैर-कार्यकारी स्वतंत्र निदेशक (Non-Executive Independent Director) के तौर पर काम करेंगे और रोटेशन के आधार पर रिटायर नहीं होंगे। उनकी नियुक्ति के लिए विशेष प्रस्ताव (Special Resolution) के जरिए शेयरधारकों की मंजूरी मांगी गई है।

कंपनी के मुताबिक, नामांकन एवं पारिश्रमिक समिति (Nomination and Remuneration Committee) ने उनके अनुभव, कौशल और बोर्ड में योगदान को देखते हुए उनकी दोबारा नियुक्ति की सिफारिश की है।

Related Party Transactions पर शेयरधारकों की मंजूरी

AGM के नोटिस में आइटम नंबर 4 से 13 तक कुल 10 महत्वपूर्ण संबंधित पक्ष लेनदेन के प्रस्ताव रखे गए हैं। ये लेनदेन वित्त वर्ष 2026-27 के दौरान किए जाने या जारी रखने से जुड़े हैं और इनके लिए शेयरधारकों की पहले से मंजूरी मांगी गई है।

कंपनी के मुताबिक, प्रस्तावित लेनदेन सामान्य कारोबारी गतिविधियों के तहत और आर्म्स-लेंथ आधार (Arm's Length Basis) पर किए जाएंगे।

News24 के साथ ₹145 करोड़ तक के लेनदेन :

सबसे बड़ी प्रस्तावित सीमा News24 Broadcast India Limited (News24) के साथ है। कंपनी ने वित्त वर्ष 2026-27 में News24 के साथ होने वाले महत्वपूर्ण संबंधित पक्ष लेनदेन की अधिकतम सीमा ₹145 करोड़ रखने का प्रस्ताव किया है। News24 कंपनी की सहायक कंपनी (Subsidiary) और संबंधित पक्ष (Related Party) है।

E24 Glamour के साथ ₹103 करोड़ तक :

दूसरे प्रस्ताव में E24 Glamour Limited के साथ वित्त वर्ष 2026-27 में अधिकतम ₹103 करोड़ के संबंधित पक्ष लेनदेन की मंजूरी मांगी गई है। E24 भी कंपनी की सहायक कंपनी और संबंधित पक्ष है।

Skyline Tele Media Services के साथ ₹32 करोड़ :

Skyline Tele Media Services Limited (STMSL) के साथ वित्त वर्ष 2026-27 में अधिकतम ₹32 करोड़ के महत्वपूर्ण संबंधित पक्ष लेनदेन का प्रस्ताव है। STMSL कंपनी के प्रमोटर ग्रुप की कंपनी और संबंधित पक्ष है।

B.A.G. Live Entertainment के साथ ₹100 करोड़ :

B.A.G. Live Entertainment Limited के साथ वित्त वर्ष 2026-27 में अधिकतम ₹100 करोड़ के संबंधित पक्ष लेनदेन की मंजूरी मांगी गई है। यह कंपनी प्रमोटर ग्रुप की कंपनी और B.A.G. Films and Media की संबंधित पक्ष है।

News24 और B.A.G. Live Entertainment के बीच ₹70 करोड़ :

एक अन्य प्रस्ताव में News24 Broadcast India Limited और B.A.G. Live Entertainment Limited के बीच वित्त वर्ष 2026-27 में अधिकतम ₹70 करोड़ के महत्वपूर्ण संबंधित पक्ष लेनदेन को मंजूरी देने की बात कही गई है।

News24 और Skyline Tele Media Services के बीच ₹20 करोड़ :

News24 और Skyline Tele Media Services Limited के बीच वित्त वर्ष 2026-27 में प्रस्तावित संबंधित पक्ष लेनदेन की अधिकतम सीमा ₹20 करोड़ रखी गई है।

News24 और B.A.G. Convergence के बीच ₹50 करोड़ :

News24 और B.A.G. Convergence Limited के बीच वित्त वर्ष 2026-27 में अधिकतम ₹50 करोड़ के महत्वपूर्ण संबंधित पक्ष लेनदेन की मंजूरी मांगी गई है। कंपनी ने B.A.G. Convergence को प्रमोटर के स्वामित्व वाली कंपनी और संबंधित पक्ष बताया है।

 E24 और B.A.G. Live Entertainment के बीच ₹30 करोड़ :

E24 Glamour Limited और B.A.G. Live Entertainment Limited के बीच वित्त वर्ष 2026-27 में प्रस्तावित महत्वपूर्ण संबंधित पक्ष लेनदेन (Material Related Party Transactions) की अधिकतम सीमा ₹30 करोड़ रखी गई है।

E24 और Skyline Tele Media Services के बीच ₹30 करोड़ :

E24 Glamour Limited और Skyline Tele Media Services Limited के बीच भी वित्त वर्ष 2026-27 में अधिकतम ₹30 करोड़ के महत्वपूर्ण संबंधित पक्ष लेनदेन को मंजूरी देने का प्रस्ताव रखा गया है।

E24 और B.A.G. Convergence के बीच ₹30 करोड़ :

इसी तरह, E24 Glamour Limited और B.A.G. Convergence Limited के बीच वित्त वर्ष 2026-27 में अधिकतम ₹30 करोड़ के महत्वपूर्ण संबंधित पक्ष लेनदेन की मंजूरी मांगी गई है।

संबंधित पक्ष लेनदेन में क्या-क्या शामिल होगा?

कंपनी के स्पष्टीकरण बयान (Explanatory Statement) के मुताबिक, इन संबंधित पक्ष लेनदेन के तहत जरूरत के हिसाब से कंपनियों के बीच सेवाओं का लेना-देना किया जा सकता है। इनमें डिजिटल कंटेंट, वेबसाइट डेवलपमेंट, ब्रॉडकास्टिंग, टेलीविजन प्रोग्रामिंग, प्लेसमेंट, मार्केटिंग, स्टोर्स और लाइन फीड जैसी सेवाएं शामिल हो सकती हैं।

इसके अलावा संबंधित कंपनियों के बीच एम्प्लॉयीज और इंफ्रास्ट्रक्चर का इस्तेमाल भी किया जा सकता है। इसमें आईटी एसेट्स, क्लाउड सेवाएं, मैनपावर और मैनेजमेंट सेवाएं शामिल हैं। कारोबारी जरूरत के मुताबिक बिजनेस एसेट्स की खरीद-बिक्री या लीज और कुछ वित्तीय लेनदेन भी इन प्रस्तावित व्यवस्थाओं का हिस्सा हो सकते हैं।

कंपनी के मुताबिक, इन लेनदेन का मकसद संबंधित कंपनियों के कारोबार को सुचारू रूप से चलाना, जरूरी सेवाएं उपलब्ध कराना और कारोबारी जरूरतों को पूरा करना है।

संबंधित पक्ष वोटिंग से बाहर

कंपनी ने स्पष्ट किया है कि SEBI Listing Regulations के तहत संबंधित पक्ष Resolution No. 4 से 13 पर वोट नहीं कर सकेंगे। यानी जिन शेयरधारकों को इन प्रस्तावों में संबंधित पक्ष माना गया है, वे इन प्रस्तावों को मंजूरी देने की प्रक्रिया में मतदान नहीं कर पाएंगे।

17 सितंबर को होगी ऑनलाइन AGM

कंपनी की 33वीं सालाना आम बैठक (AGM) 17 सितंबर 2026 को ऑनलाइन माध्यम से आयोजित की जाएगी, जिसमें इन प्रस्तावों पर शेयरधारकों से मंजूरी ली जाएगी।

 B.A.G. Films and Media की 33वीं AGM 17 सितंबर 2026 को शाम 4 बजे VC/OAVM के जरिए आयोजित होगी। कंपनी ने AGM के लिए NSDL को e-voting और ऑनलाइन बैठक की सुविधा उपलब्ध कराने वाली अधिकृत एजेंसी नियुक्त किया है।

शेयरधारकों के लिए 10 सितंबर 2026 को cut-off date रखा गया है। इस तारीख को कंपनी के रिकॉर्ड में दर्ज सदस्य remote e-voting और AGM के दौरान e-voting में हिस्सा ले सकेंगे।

Remote e-voting 13 सितंबर 2026 सुबह 9 बजे से 16 सितंबर 2026 शाम 5 बजे तक चलेगी।

कुल मिलाकर, B.A.G. Films and Media की 33वीं सालाना आम बैठक (AGM) में वित्त वर्ष 2025-26 के वित्तीय विवरणों को मंजूरी देने का प्रस्ताव रखा गया है। इसके साथ ही सुधीर शुक्ला की दोबारा नियुक्ति और चंदन कुमार जैन को स्वतंत्र निदेशक के तौर पर दूसरे कार्यकाल के लिए नियुक्त करने के प्रस्ताव भी शामिल हैं।

इसके अलावा News24, E24 Glamour, Skyline Tele Media Services, B.A.G. Live Entertainment और B.A.G. Convergence से जुड़े 10 महत्वपूर्ण संबंधित पक्ष लेनदेन (Material Related Party Transactions) के लिए भी शेयरधारकों से मंजूरी मांगी गई है।

 

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टीवी विज्ञापनों पर खत्म हुई 10+2 की बंदिश, MIB ने ब्रॉडकास्टर्स को दी कमाई की खुली छूट

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने Cable Television Networks Rules, 1994 में बदलाव करते हुए वह प्रावधान हटा दिया है, जिसके तहत टीवी चैनलों को एक घंटे में अधिकतम 12 मिनट ही विज्ञापन दिखाने की अनुमति थी।

Samachar4media Bureau by
Published - Saturday, 22 August, 2026
Last Modified:
Saturday, 22 August, 2026
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टीवी चैनलों पर विज्ञापन दिखाने को लेकर लंबे समय से लागू 10+2 का नियम अब खत्म हो गया है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) ने Cable Television Networks Rules, 1994 में बदलाव करते हुए वह प्रावधान हटा दिया है, जिसके तहत टीवी चैनलों को एक घंटे में अधिकतम 12 मिनट ही विज्ञापन दिखाने की अनुमति थी।

सरकार ने यह बदलाव 21 अगस्त 2026 को गजट नोटिफिकेशन के जरिए किया है और यह उसी दिन से लागू हो गया है। नए नोटिफिकेशन का नाम Cable Television Networks (Amendment) Rules, 2026 है और इसे G.S.R. 751(E) के तहत जारी किया गया है।

क्या था 10+2 का नियम?

जिस प्रावधान को अब हटाया गया है, वह Cable Television Networks Rules, 1994 के Rule 7(11) में था। इसी के आधार पर टीवी पर 10+2 विज्ञापन व्यवस्था लागू थी। इसके तहत किसी कार्यक्रम में एक घंटे के दौरान अधिकतम 12 मिनट का विज्ञापन दिखाया जा सकता था। इसमें 10 मिनट तक कमर्शियल विज्ञापन और 2 मिनट तक चैनल के अपने प्रमोशनल कंटेंट के लिए रखे गए थे।

अब सरकार ने Rule 7(11) को ही हटा दिया है। इसका मतलब है कि टीवी चैनलों के लिए सरकार की ओर से तय 12 मिनट प्रति घंटे की वैधानिक सीमा अब नहीं रही।

सरकार ने क्यों हटाया नियम?

सरकार ने इससे पहले 14 अगस्त को ही 12 मिनट प्रति घंटे की विज्ञापन सीमा खत्म करने के फैसले की जानकारी दी थी। सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने News Broadcasters Federation (NBF) के एक प्रतिनिधिमंडल को इस फैसले की जानकारी दी थी। इस प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व NBF के संस्थापक अध्यक्ष अर्नब गोस्वामी ने किया था।

टीवी ब्रॉडकास्टर्स लंबे समय से विज्ञापनों के मामले में ज्यादा आजादी की मांग कर रहे थे। उनका कहना था कि टीवी अब डिजिटल प्लेटफॉर्म, सोशल मीडिया और स्ट्रीमिंग सेवाओं से सीधे मुकाबला कर रहा है। ऐसे में टीवी पर विज्ञापन की तय सरकारी सीमा ब्रॉडकास्टर्स की कमाई के रास्ते को सीमित करती है।

इस मुद्दे पर दूसरे इंडस्ट्री संगठनों ने भी मंत्रालय के साथ चर्चा की थी। इनमें News Broadcasters & Digital Association (NBDA) और Indian Broadcasting and Digital Foundation (IBDF) जैसे संगठन शामिल थे।

पहले बढ़ाने की बात थी, अब पूरी सीमा ही खत्म

विज्ञापन नियमों में बदलाव को लेकर इंडस्ट्री में कई तरह के विकल्पों पर चर्चा हुई थी। इनमें विज्ञापन की मौजूदा सीमा बढ़ाने से लेकर अलग-अलग तरह के चैनलों के लिए अलग नियम बनाने और अंत में पूरी तरह सरकारी सीमा हटाने तक के विकल्प शामिल थे।

अब सरकार ने इनमें सबसे बड़ा बदलाव करते हुए Rule 7(11) को ही हटा दिया है। यानी 12 मिनट की सीमा को बढ़ाकर कोई नई निश्चित सीमा तय नहीं की गई है, बल्कि पुरानी वैधानिक सीमा को पूरी तरह खत्म कर दिया गया है।

2006 से लागू था 10+2 सिस्टम

टीवी पर 10+2 विज्ञापन व्यवस्था साल 2006 से लागू थी। इस नियम को लेकर ब्रॉडकास्टर्स ने अदालत का भी रुख किया था। मई 2026 में दिल्ली हाई कोर्ट ने Rule 7(11) और विज्ञापन अवधि से जुड़े संबंधित TRAI नियमों की वैधता को बरकरार रखा था। कोर्ट ने कहा था कि इन नियमों का उद्देश्य दर्शकों को बहुत ज्यादा कमर्शियल ब्रेक से बचाना है।

कोर्ट ने यह भी माना था कि किसी ब्रॉडकास्टर को असीमित तरीके से विज्ञापन से कमाई करने का संवैधानिक अधिकार नहीं है। लेकिन अब सरकार ने Rule 7(11) को ही हटा दिया है। इसके साथ ही टीवी विज्ञापन की वैधानिक स्थिति में बदलाव हो गया है।

टीवी चैनलों की संख्या में भी आया बड़ा बदलाव

सरकार ने विज्ञापन सीमा हटाने के फैसले के पीछे बदलते टीवी बाजार को भी एक वजह बताया है।

MIB के मुताबिक, जब 2006 में यह विज्ञापन प्रतिबंध लागू किया गया था, तब देश में केवल 62 टीवी चैनल थे। आज इनकी संख्या 900 से ज्यादा है।

इसके अलावा आज टीवी को डिजिटल प्लेटफॉर्म से भी कड़ी प्रतिस्पर्धा मिल रही है। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर विज्ञापन की अवधि को लेकर टीवी जैसा कोई समान वैधानिक प्रतिबंध नहीं है।

ब्रॉडकास्टर्स का कहना रहा है कि दर्शकों और विज्ञापनदाताओं के पास अब डिजिटल प्लेटफॉर्म के कई विकल्प हैं। ऐसे में टीवी चैनलों को भी अपने विज्ञापन इन्वेंट्री को बाजार की जरूरत के हिसाब से मैनेज करने की ज्यादा आजादी मिलनी चाहिए।

ब्रॉडकास्टर्स ने की थी पूरी आजादी की मांग

ब्रॉडकास्टर्स और उनके संगठनों का लगातार तर्क रहा है कि विज्ञापन की अवधि सरकार द्वारा तय करने के बजाय बाजार की मांग और दर्शकों के व्यवहार पर निर्भर होनी चाहिए।

उनका कहना है कि अगर किसी चैनल पर बहुत ज्यादा विज्ञापन दिखाए जाएंगे तो दर्शक चैनल बदल सकते हैं या उसे देखना कम कर सकते हैं। ऐसे में बाजार खुद यह तय करेगा कि किसी चैनल के लिए विज्ञापन की कितनी मात्रा व्यावहारिक है।

खासकर न्यूज चैनलों ने लगातार बढ़ती लागत का मुद्दा भी उठाया है। न्यूज जुटाने, लाइव कवरेज, टेक्नोलॉजी, डिस्ट्रीब्यूशन और दूसरी व्यवस्थाओं पर लगातार खर्च बढ़ता है। ऐसे में विज्ञापन से होने वाली कमाई ब्रॉडकास्टर्स के लिए काफी महत्वपूर्ण है।

विज्ञापनदाताओं की राय थोड़ी अलग थी

विज्ञापन की सीमा हटाने को लेकर एडवर्टाइजर्स और एजेंसियों के बीच भी अलग-अलग राय थी। इंडियन सोसायटी ऑफ ऐडवर्टाइजर्स (ISA) ने विज्ञापन की सीमा बढ़ाकर एक घंटे में 25% तक करने का समर्थन किया था। इसका मतलब एक घंटे में 15 मिनट तक विज्ञापन की अनुमति देना होता।

वहीं Advertising Agencies Association of India (AAAI) ने सरकारी स्तर पर विज्ञापन की कोई निश्चित अवधि तय करने के बजाय बाजार आधारित व्यवस्था की बात कही थी।

ब्रॉडकास्टर्स से जुड़े संगठनों, जिनमें IBDF और NBDA शामिल हैं, ने पूरी तरह सरकारी सीमा हटाने की मांग की थी। अब सरकार का फैसला उन लोगों के पक्ष में गया है जो पूरी तरह मार्केट-ड्रिवन व्यवस्था की मांग कर रहे थे।

क्या अब टीवी पर ज्यादा विज्ञापन दिखेंगे?

इस बदलाव के बाद टीवी चैनलों के पास विज्ञापन इन्वेंट्री को लेकर पहले से ज्यादा लचीलापन जरूर होगा। वे बाजार की मांग, दर्शकों के व्यवहार और विज्ञापनदाताओं की जरूरत के हिसाब से अपनी रणनीति तय कर सकेंगे।

लेकिन इसका यह मतलब जरूरी नहीं है कि हर चैनल अब हर घंटे पहले से ज्यादा विज्ञापन दिखाएगा।

चैनलों को दर्शकों की पसंद और टीआरपी जैसी व्यावसायिक जरूरतों का भी ध्यान रखना होगा। अगर विज्ञापनों के कारण दर्शक ज्यादा संख्या में चैनल बदलने लगते हैं, तो इसका असर चैनल की कमर्शियल वैल्यू पर भी पड़ सकता है। इसलिए आगे चलकर यह काफी हद तक बाजार पर निर्भर करेगा कि चैनल वास्तव में कितने विज्ञापन दिखाते हैं।

दर्शकों के अनुभव पर भी रहेगी नजर

विज्ञापन की सीमा हटने के बाद दर्शकों के टीवी देखने के अनुभव को लेकर भी चर्चा बढ़ सकती है। अब तक 10+2 नियम का एक उद्देश्य यह भी था कि कार्यक्रमों के बीच बहुत ज्यादा कमर्शियल ब्रेक न हों। अब वैधानिक सीमा हटने के बाद ब्रॉडकास्टर्स को ज्यादा आजादी मिलेगी, लेकिन यह भी देखना होगा कि इस आजादी का इस्तेमाल किस तरह किया जाता है।

दर्शकों के लिए विज्ञापनों की संख्या और ब्रेक की लंबाई बढ़ती है या नहीं, इस पर आने वाले समय में नजर रहेगी।

टीवी विज्ञापन बाजार में बड़ा बदलाव

सरकार का यह फैसला टीवी ब्रॉडकास्टिंग के लिए एक महत्वपूर्ण नियामकीय बदलाव माना जा रहा है। खास बात यह है कि सरकार ने 12 मिनट की सीमा को बढ़ाकर कोई नई सीमा तय नहीं की है, बल्कि Rule 7(11) को पूरी तरह हटा दिया है।

इससे टीवी चैनलों को विज्ञापन बेचने और अपनी कमर्शियल रणनीति तय करने में ज्यादा आजादी मिलेगी। वहीं विज्ञापनदाताओं और एजेंसियों के लिए टीवी इन्वेंट्री की उपलब्धता, उसकी कीमत और पैकेजिंग में बदलाव देखने को मिल सकता है।

कुल मिलाकर, 10+2 व्यवस्था का खत्म होना टीवी विज्ञापन बाजार को सरकारी तय सीमा से निकालकर ज्यादा मार्केट-ड्रिवन सिस्टम की तरफ ले जाता है। अब ब्रॉडकास्टर्स के सामने ज्यादा कमाई की संभावना के साथ यह जिम्मेदारी भी होगी कि विज्ञापनों और दर्शकों के अनुभव के बीच सही संतुलन बनाए रखें।

 

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BCCL के एम्प्लॉयीज का THPL में ट्रांसफर, 1 सितंबर से लागू होगा फैसला

टाइम्स ग्रुप की प्रमुख कंपनी Bennett, Coleman & Co. Ltd. (BCCL) में काम कर रहे एम्प्लॉयीज को अब Times Horizon Private Limited (THPL) में ट्रांसफर किया जाएगा। यह बदलाव 1 सितंबर 2026 से लागू होगा।

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Published - Saturday, 22 August, 2026
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Saturday, 22 August, 2026
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टाइम्स ग्रुप की प्रमुख कंपनी Bennett, Coleman & Co. Ltd. (BCCL) में काम कर रहे एम्प्लॉयीज को अब Times Horizon Private Limited (THPL) में ट्रांसफर किया जाएगा। यह बदलाव 1 सितंबर 2026 से लागू होगा। कंपनी ने एम्प्लॉयीज को भेजे गए एक इंटरनल ईमेल के जरिए इसकी जानकारी दी है।

कंपनी ने साफ किया है कि यह कदम एम्प्लॉयीज की नौकरी खत्म करने या नई नौकरी देने से जुड़ा नहीं है। इसे ‘ट्रांसफर ऑफ एम्प्लॉयमेंट’ बताया गया है, यानी एम्प्लॉयीज की सेवा जारी रहेगी और सिर्फ उनका कानूनी नियोक्ता बदलेगा।

पुरानी जॉइनिंग डेट रहेगी बरकरार

एम्प्लॉयीज को भेजे गए ईमेल में कहा गया है कि उनकी कंटिन्यूटी ऑफ सर्विस बरकरार रहेगी। साथ ही, कंपनी में उनकी मूल जॉइनिंग डेट को भी मान्यता मिलती रहेगी। इसका मतलब है कि एम्प्लॉयीज के लिए BCCL में काम करने की अवधि खत्म नहीं मानी जाएगी और THPL में ट्रांसफर के बाद उन्हें नए एम्प्लॉयी के तौर पर नहीं देखा जाएगा।

कंपनी ने यह भी कहा है कि एम्प्लॉयीज की मौजूदा रोजगार शर्तें और मुआवजा (compensation) जारी रहेगा। हालांकि, अगर किसी मामले में अलग से कोई बदलाव होगा तो उसके बारे में एम्प्लॉयीज को अलग से जानकारी दी जाएगी।

डीमर्जर की प्रक्रिया का हिस्सा है ट्रांसफर

एम्प्लॉयीज का यह ट्रांसफर टाइम्स ग्रुप में चल रही बड़ी बिजनेस रिस्ट्रक्चरिंग और डीमर्जर प्रक्रिया का हिस्सा है। नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) की मुंबई बेंच-I ने फरवरी 2026 में BCCL और THPL के बीच स्कीम ऑफ अरेंजमेंट को मंजूरी दी थी। इसके तहत BCCL के EIBME Business Undertaking को THPL में एक चालू कारोबार के तौर पर ट्रांसफर किया जाना है।

अब एम्प्लॉयीज का THPL में ट्रांसफर इसी प्रक्रिया को लागू करने की दिशा में एक और कदम है।

एम्प्लॉयीज की संख्या की जानकारी नहीं

कंपनी की ओर से भेजे गए ईमेल में यह नहीं बताया गया है कि BCCL से THPL में कुल कितने एम्प्लॉयी ट्रांसफर होंगे। साथ ही, किन-किन बिजनेस यूनिट्स या फंक्शंस से जुड़े एम्प्लॉयी इस ट्रांसफर का हिस्सा होंगे, इसकी भी जानकारी नहीं दी गई है।

हालांकि, कंपनी ने एम्प्लॉयीज को यह भरोसा जरूर दिया है कि यह प्रक्रिया किसी तरह की छंटनी या रोजगार खत्म करने से जुड़ी नहीं है।

अलग-अलग बिजनेस पर ज्यादा फोकस की कोशिश

टाइम्स ग्रुप ने पिछले कुछ समय में अपने कारोबार को अलग-अलग बिजनेस वर्टिकल्स में व्यवस्थित करने की दिशा में कदम उठाए हैं। NCLT के आदेश के मुताबिक BCCL का कारोबार काफी विविध है। इसमें प्रिंट और डिजिटल न्यूज पब्लिशिंग, टेलीविजन ब्रॉडकास्टिंग, डिजिटल प्रोडक्ट्स और सर्विसेज, मैगजीन, इंटरनेट, रेडियो, एंटरटेनमेंट, म्यूजिक, फिल्म, आउट-ऑफ-होम एडवर्टाइजिंग, रियल एस्टेट क्लासीफाइड्स, एजुकेशन और एडटेक, फिनटेक, स्पोर्ट्स, गेमिंग और अलग-अलग तरह के निवेश शामिल हैं।

वहीं, THPL को EIBME Business को संभालने के उद्देश्य से बनाया गया था और यह BCCL की पूरी तरह स्वामित्व वाली सब्सिडियरी है।

कारोबार को दो प्रमुख हिस्सों में बांटने की योजना

डीमर्जर की स्कीम में ग्रुप के कारोबार को broadly दो हिस्सों में बांटा गया है- Publishing Business और EIBME Business। NCLT के आदेश में दर्ज कंपनी की दलील के मुताबिक इन दोनों बिजनेस के काम करने का तरीका, पूंजी की जरूरत, जोखिम, प्रतिस्पर्धी स्थिति, रणनीति और अनुपालन की जरूरतें अलग-अलग हैं।

ऐसे में अलग-अलग बिजनेस को ज्यादा फोकस और स्वतंत्र नेतृत्व देने की कोशिश की जा रही है। कंपनी के मुताबिक इससे अलग-अलग कारोबार को अपनी ग्रोथ और निवेश की रणनीति के हिसाब से आगे बढ़ने में मदद मिल सकती है। इस व्यवस्था से बिजनेस के लिए पूंजी जुटाने और अपने क्षेत्र के हिसाब से पार्टनर्स या निवेशकों के साथ काम करने की गुंजाइश भी बढ़ सकती है।

THPL को मिलेंगे संबंधित बिजनेस के एसेट्स और देनदारियां

NCLT से मंजूर व्यवस्था के तहत EIBME Business Undertaking से जुड़े सभी एसेट्स और देनदारियां, जिनमें टैक्स और अन्य चार्ज भी शामिल हैं, THPL को ट्रांसफर किए जाने हैं। स्कीम में THPL की ओर से Sanmati Properties Limited को कुछ तय शर्तों के तहत अतिरिक्त शेयर जारी करने का भी प्रावधान है।

NCLT के आदेश के मुताबिक BCCL और THPL के बोर्ड ने इस स्कीम को 22 सितंबर 2025 को हुई बैठकों में मंजूरी दी थी। स्कीम के लिए नियुक्त तारीख 1 अप्रैल 2026 तय की गई थी या फिर वह तारीख जब स्कीम प्रभावी होती है, इनमें जो पहले हो।

एम्प्लॉयीज के लिए फिलहाल सबसे बड़ा बदलाव क्या है?

एम्प्लॉयीज के लिहाज से इस पूरी प्रक्रिया का सबसे अहम हिस्सा यह है कि 1 सितंबर 2026 से उनका कानूनी नियोक्ता BCCL की जगह THPL होगा, लेकिन कंपनी ने इसे नौकरी खत्म होने या नई नौकरी शुरू होने के रूप में पेश नहीं किया है।

एम्प्लॉयीज की पुरानी जॉइनिंग डेट और सर्विस की निरंतरता बरकरार रहेगी। मौजूदा रोजगार शर्तों और compensation को भी जारी रखने की बात कही गई है। हालांकि, उपलब्ध ईमेल में पेरोल, बेनिफिट्स, रिपोर्टिंग स्ट्रक्चर या दूसरी प्रशासनिक प्रक्रियाओं में संभावित बदलावों के बारे में विस्तार से जानकारी नहीं दी गई है।

NCLT के आदेश में भी कहा गया है कि इस स्कीम के तहत एम्प्लॉयीज और क्रेडिटर्स के हितों की सुरक्षा का प्रावधान किया गया है।

टाइम्स ग्रुप के बड़े रिस्ट्रक्चरिंग का हिस्सा

कुल मिलाकर, BCCL के एम्प्लॉयीज का THPL में ट्रांसफर टाइम्स ग्रुप के बड़े कारोबारी पुनर्गठन का हिस्सा है। ग्रुप अपने अलग-अलग कारोबार को ज्यादा फोकस्ड कॉरपोरेट स्ट्रक्चर में व्यवस्थित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

NCLT के आदेश में Times Internet Limited और Entertainment Network (India) Limited को BCCL की प्रमुख सब्सिडियरीज में शामिल बताया गया है।

कंपनी की ओर से एम्प्लॉयीज को भेजा गया संदेश फिलहाल इस बात पर जोर देता है कि यह रोजगार खत्म होने का मामला नहीं, बल्कि रोजगार इकाई में बदलाव के साथ होने वाला ट्रांसफर है।

वहीं, फरवरी 2026 में NCLT की मंजूरी के बाद 1 सितंबर से होने वाला यह एम्प्लॉयी ट्रांसफर टाइम्स ग्रुप की डीमर्जर प्रक्रिया को जमीन पर लागू करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

 

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Network18 ने जारी की BRSR रिपोर्ट, एम्प्लॉयीज के लिए वेलफेयर व सुविधाओं की दी जानकारी

नेटवर्क18 मीडिया एंड इन्वेस्टमेंट लिमिटेड (Network18 Media & Investments Limited) ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए अपनी Business Responsibility and Sustainability Report (BRSR) जारी कर दी है।

Vikas Saxena by
Published - Saturday, 22 August, 2026
Last Modified:
Saturday, 22 August, 2026
Network18

नेटवर्क18 मीडिया एंड इन्वेस्टमेंट लिमिटेड (Network18 Media & Investments Limited) ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए अपनी Business Responsibility and Sustainability Report (BRSR) जारी कर दी है। कंपनी ने यह रिपोर्ट 21 अगस्त 2026 को दाखिल की। रिपोर्ट में कंपनी ने अपने कारोबार, एम्प्लॉयीज, उपभोक्ता शिकायतों, साइबर सिक्योरिटी, डेटा प्राइवेसी, कॉरपोरेट गवर्नेंस और जिम्मेदार कारोबारी गतिविधियों से जुड़ी जानकारी साझा की है।

रिपोर्ट के मुताबिक यह जानकारी Network18 Media & Investments Limited के standalone आधार पर दी गई है। कंपनी का मुख्य कारोबार ब्रॉडकास्टिंग और डिजिटल मीडिया गतिविधियों से जुड़ा है।

ब्रॉडकास्टिंग और डिजिटल मीडिया कारोबार का बड़ा हिस्सा

कंपनी के मुताबिक उसके कुल टर्नओवर में इनफॉर्मेशन व कम्युनिकेशन से जुड़ी गतिविधियों की हिस्सेदारी 99.94 फीसदी है। इसमें ब्रॉडकास्टिंग और डिजिटल मीडिया गतिविधियां शामिल हैं। वहीं, ऐडवर्टाइजिंग व सब्सक्रिप्शन रेवेन्यू कंपनी के कुल टर्नओवर में 97.81 फीसदी का योगदान करता है।

Network18 के डिजिटल और ब्रॉडकास्टिंग प्लेटफॉर्म भारत में ग्राहकों तक पहुंचते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक कंपनी को 20 देशों में मौजूद ग्राहकों से भी रेवेन्यू मिला और वित्त वर्ष 2025-26 में कुल टर्नओवर का 8.2 फीसदी हिस्सा एक्सपोर्ट से आया।

कंपनी में 4,905 एम्प्लॉयी

रिपोर्ट में एम्प्लॉयीज से जुड़ा आंकड़ा भी दिया गया है। वित्त वर्ष के अंत में Network18 में कुल 4,905 एम्प्लॉयी थे। इनमें 3,680 पुरुष और 1,225 महिलाएं शामिल थीं। स्थायी एम्प्लॉयीज की संख्या 4,895 थी।

कंपनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में कुल सात सदस्य हैं, जिनमें दो महिलाएं हैं। यानी बोर्ड में महिलाओं की हिस्सेदारी 28.57 फीसदी है। Key Management Personnel में तीन में से एक महिला है, यानी 33.33 फीसदी।

एम्प्लॉयीज को हेल्थ और स्किल से जुड़ी ट्रेनिंग

कंपनी ने बताया कि वित्त वर्ष 2025-26 में उसके सभी 4,905 एम्प्लॉयीज को हेल्थ और सेफ्टी से जुड़ी ट्रेनिंग दी गई। इनमें 3,680 पुरुष और 1,225 महिलाएं शामिल हैं। इसी दौरान 3,458 एम्प्लॉयीज को स्किल अपग्रेडेशन से जुड़ी ट्रेनिंग भी दी गई।

कंपनी ने एम्प्लॉयीज के परफॉर्मेंस और करियर डेवलपमेंट रिव्यू का आंकड़ा भी साझा किया है। रिपोर्ट के मुताबिक कुल 4,494 एम्प्लॉयीज का यह रिव्यू किया गया, जो कुल एम्प्लॉयीज का 91.62 फीसदी है।

डेटा प्राइवेसी और साइबर सिक्योरिटी पर भी जानकारी

BRSR में Network18 ने साइबर सिक्योरिटी और डेटा प्राइवेसी से जुड़े अपने सिस्टम की जानकारी दी है। कंपनी के मुताबिक साइबर सिक्योरिटी से जुड़े जोखिमों की पहचान और उन्हें मैनेज करने के लिए उसके पास एक रिस्क मैनेजमेंट फ्रेमवर्क है।

कंपनी ने बताया कि इसके तहत साइबर सिक्योरिटी पॉलिसी और प्रक्रियाएं, सिक्योरिटी डिफेंस टूल्स, लगातार थ्रेट मॉनिटरिंग और साइबर घटनाओं की पहचान करने की क्षमता जैसे उपाय शामिल हैं। कंपनी साइबर हमलों की स्थिति में अपनी तैयारी और प्रतिक्रिया को परखने के लिए नियमित रूप से ड्रिल भी करती है।

रिपोर्ट के मुताबिक एम्प्लॉयीज को फिशिंग और डेटा के सही वर्गीकरण व इस्तेमाल जैसे विषयों पर भी जागरूक किया जाता है। कंपनी नई और उभरती साइबर चुनौतियों को समझने के लिए सरकार, कानून लागू करने वाली एजेंसियों और इंडस्ट्री के दूसरे संगठनों के साथ भी जुड़ती है।

उपभोक्ता शिकायतों के लिए अलग व्यवस्था

Network18 ने अपने टीवी चैनलों और डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़ी शिकायतों के लिए अलग-अलग शिकायत निवारण व्यवस्था का भी जिक्र किया है।

रिपोर्ट के अनुसार टीवी चैनलों के कंटेंट से जुड़ी शिकायतें Code of Ethics & Broadcasting Standards और संबंधित News Broadcasting Standards के तहत की जा सकती हैं। वहीं, कंपनी के न्यूज पोर्टल और डिजिटल पब्लिशिंग पर Digital Code of Ethics लागू होता है।

कंपनी ने News18, Forbes India, Overdrive, Firstpost, Moneycontrol और CNBC-TV18 जैसे अपने प्रोडक्ट वेबसाइटों पर शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया और संबंधित अधिकारियों की जानकारी उपलब्ध होने की बात भी कही है।

 एम्प्लॉयीज के लिए वेलफेयर और सुविधाओं की जानकारी

BRSR में एम्प्लॉयीज के वेलफेयर से जुड़े खर्च और सुविधाओं का भी विवरण दिया गया है। कंपनी ने एम्प्लॉयीज के लिए हेल्थ इंश्योरेंस, एक्सीडेंट इंश्योरेंस, मैटरनिटी और पैटरनिटी बेनिफिट, डे-केयर सुविधा और मेडिकल खर्च जैसी सुविधाओं की जानकारी रिपोर्ट में दी है।

स्थायी एम्प्लॉयीज के लिए हेल्थ और एक्सीडेंट इंश्योरेंस कवरेज की जानकारी भी रिपोर्ट में शामिल है।

छोटे शहरों में रोजगार का भी आंकड़ा

रिपोर्ट में एम्प्लॉयीज को दिए गए वेतन के स्थान के आधार पर भी आंकड़े दिए गए हैं। FY2025-26 में कुल वेतन लागत में सेमी-अर्बन लोकेशन की हिस्सेदारी 1.18 फीसदी, अर्बन लोकेशन की 13.05 फीसदी और मेट्रोपॉलिटन लोकेशन की 85.77 फीसदी रही। ग्रामीण क्षेत्र की हिस्सेदारी 0 फीसदी बताई गई है।

रिश्वत और भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की स्थिति

कंपनी ने रिपोर्ट में बताया है कि वित्त वर्ष 2025-26 में रिश्वत या भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर किसी डायरेक्टर, KMP या एम्प्लॉयी के खिलाफ किसी कानून लागू करने वाली एजेंसी की ओर से अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की गई।

इसी तरह डायरेक्टर्स और KMPs के Conflict of Interest से जुड़े मामलों में भी कोई शिकायत दर्ज नहीं हुई।

एम्प्लॉयीज की यूनियन को लेकर कंपनी ने क्या कहा

रिपोर्ट के मुताबिक Network18 में कोई मान्यता प्राप्त एम्प्लॉयी एसोसिएशन या यूनियन नहीं है। हालांकि कंपनी ने कहा है कि एम्प्लॉयीज को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत किसी एसोसिएशन या यूनियन से जुड़ने की स्वतंत्रता है।

पूरी रिपोर्ट को देखें तो Network18 के FY2025-26 कारोबार में ब्रॉडकास्टिंग और डिजिटल मीडिया की बड़ी भूमिका रही। कंपनी ने BRSR में अपने एम्प्लॉयीज, उपभोक्ता शिकायतों, साइबर सिक्योरिटी, डेटा प्राइवेसी और कॉरपोरेट गवर्नेंस से जुड़ी व्यवस्थाओं का भी विवरण दिया है।

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