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नए रेटिंग सिस्टम की राह में सबसे बड़ा सवाल– खर्च कितना और कौन करेगा फंडिंग?
टीवी व्युअरशिप तेजी से डिजिटल की ओर बढ़ रही है। अब सवाल यह नहीं कि नया ऑडियंस मीजरमेंट सिस्टम चाहिए या नहीं, बल्कि यह है कि इसकी लागत कौन उठाएगा और क्या यह इंडस्ट्री का भरोसा दोबारा जीत सकेगा?
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 6 months ago
अदिति गुप्ता, असिसटेंट एडिटर, एक्सचेंज4मीडिया ।।
भारत में टीवी व्युअरशिप के बदलते दौर में अब बहस यह नहीं रही कि नया ऑडियंस मीजरमेंट सिस्टम चाहिए या नहीं। सवाल अब यह है कि इसकी कीमत कितनी होगी, इसे फंड कौन करेगा और क्या यह भरोसा दोबारा हासिल कर पाएगा?
BARC (ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल) की सीमाओं को लेकर बढ़ती आलोचना के बीच, मीडिया और ऐडवर्टाइजिंग जगत के एक्सपर्ट अब एक साझा सोच की ओर बढ़ते दिखाई दे रहे हैं कि नई, आधुनिक ऑडियंस मीजरमेंट प्रणाली बनाना तकनीकी रूप से संभव भी है और आर्थिक रूप से समझदारी भरा कदम भी, बस शर्त ये है कि इसे सही तरीके से लागू किया जाए।
असली लागत: 3–5 वर्षों में 300 से 500 करोड़ रुपये तक?
BARC की पुरानी व्यवस्था की कमियों को दूर करने वाला नया ऑडियंस मीजरमेंट सिस्टम बनाने में जरूर भारी निवेश की जरूरत होगी। एक्सपर्ट्स के अनुसार, इस पर आने वाली लागत 300 करोड़ से 500 करोड़ रुपये के बीच हो सकती है।
Media Care Brand Solutions के डायरेक्टर यासिन हमिदानी के मुताबिक, “भारत में एक भरोसेमंद टीवी रेटिंग्स सिस्टम बनाने के लिए शुरुआती निवेश 300 से 500 करोड़ के बीच हो सकता है, लेकिन क्लाउड कंप्यूटिंग, एआई आधारित मॉडलिंग और रियल-टाइम इंफ्रास्ट्रक्चर लंबे समय में लागत की भरपाई कर सकते हैं।”
एक अन्य इंडस्ट्री एक्सपर्ट ने, नाम न छापने की शर्त पर, बताया कि यह अनुमानित बजट (जो 500 करोड़ रुपये तक हो सकता है) हार्डवेयर (जैसे पीपल मीटर और राउटर), फील्ड फोर्स की तैनाती, देशव्यापी पैनल मेंटेनेंस, रीयल टाइम डेटा प्रोसेसिंग सिस्टम और थर्ड-पार्टी ऑडिट व डेटा सुरक्षा जैसे अनुपालन ढांचे को कवर करेगा।
हालांकि, यासिन हमिदानी का मानना है कि दीर्घकाल में इस व्यवस्था की लागत-कुशलता सबसे बड़ा लाभ हो सकता है। उन्होंने कहा, “एक बार स्केल हो जाने पर, क्लाउड आधारित सिस्टम और एआई एकीकृत मॉडल स्थायी लागत को काफी हद तक घटा देते हैं। असली चुनौती खर्च नहीं, बल्कि परस्पर तालमेल और वैधता है।”
यह विचार कई स्टेकहोल्डर्स के साथ गूंजता है। एक ब्रैंड एक्सपर्ट ने कहा, “असल में तकनीक तो पहले से मौजूद है। जो चीज सबसे महंगी है, वो है सहमति। हर ब्रॉडकास्टर, एजेंसी और ऐडवर्टाइजर को साथ लाना सबसे मुश्किल हिस्सा है। यदि पैनल डिजाइन, डेटा उपयोग और मेथडोलॉजी को लेकर पारदर्शिता पर सहमति नहीं बनती, तो पूरी कोशिश असफल हो जाती है।”
मौजूदा स्थिति क्यों काम नहीं कर रही?
भारत में फिलहाल 230 मिलियन से अधिक टीवी घर हैं, लेकिन केवल लगभग 58,000 पीपल-मीटर लगे हैं, जो कुल टीवी घरों का महज 0.025% प्रतिनिधित्व करते हैं। इन मीटरों का संचालन केवल BARC करता है, जो पिछले एक दशक से टीवी रेटिंग्स का एकमात्र स्रोत बना हुआ है। उपभोक्ता व्यवहार में भारी बदलाव के बावजूद BARC का पैनल 2018 के बाद से गंभीर रूप से अपडेट नहीं हुआ।
सूचना और प्रसारण मंत्रालय (MIB) ने खुद जुलाई 2025 में माना कि वर्तमान व्यवस्था अपर्याप्त है। यह स्मार्ट टीवी, ओटीटी प्लेटफॉर्म और मोबाइल डिवाइसेज पर होने वाली व्युअरशिप को दर्ज नहीं करती, जबकि आज के दौर में यही दर्शकों का बड़ा हिस्सा हैं।
इसका नतीजा है जिसे ऐडवर्टाइजर और ब्रॉडकास्टर "रेटिंग गैप" कहते हैं यानी वह डेटा गैप जो असल उपभोक्ता व्यवहार और मीडिया बजट की योजना के बीच मौजूद है। Pitch Madison Advertising Report 2025 के अनुसार, भारत में टीवी का ऐडवर्टाइजिंग शेयर 30% से नीचे गिर गया है, जबकि डिजिटल 50% के पार पहुंच गया है।
को-फंडिंग की जरूरत: आगे आने को तैयार हैं ऐडवर्टाइजर
एक बड़ा बदलाव जो सामने आ रहा है, वह यह है कि ऐडवर्टाइजर वैकल्पिक रेटिंग्स प्रोवाइडर की स्थापना के लिए फंडिंग में हिस्सेदारी करने को तैयार हैं।
Jumboking की मार्केटिंग हेड सयंतनी दास के अनुसार, “यदि नया सिस्टम क्रॉस-प्लैटफॉर्म सटीकता और पारदर्शिता दे सके, तो भारतीय ब्रैंड्स और ऐडवर्टाइजर इसके लिए फंडिंग या समर्थन देने के लिए तैयार हैं।”
उद्योग से जुड़े कई लोगों का मानना है कि यदि कुछ शर्तें पूरी की जाएं तो ऐडवर्टाइजर इस पहल का समर्थन करेंगे। इनमें शामिल हैं:
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वैश्विक मीडिया वैलिडेशन फर्मों से थर्ड-पार्टी ऑडिट
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ऐडवर्टाइजर्स, एजेंसियों और ब्रॉडकास्टर्स की समान भागीदारी वाला निष्पक्ष गवर्नेंस
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पायलट स्टडीज के जरिए सिस्टम की विश्वसनीयता और अभियानों से तालमेल का परीक्षण
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टीवी, मोबाइल और ओटीटी पर डिवाइस-अज्ञेय (device-agnostic) रीयल टाइम मापन
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और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार स्वतंत्र बेंचमार्किंग
एक ब्रैंड एक्सपर्ट ने कहा, “मुद्दा हमेशा यह रहा है कि खर्च कौन करेगा और किसके हितों की रक्षा होगी। असली बाधा लागत नहीं है, बल्कि भरोसे की कमी है।”
उनका यह भी मानना था कि सबसे उपयुक्त फंडिंग मॉडल संभवतः बड़ी मीडिया एजेंसियों के जरिए आएगा जो ऐडवर्टाइजर्स की ओर से एग्रीगेटर की भूमिका निभा सकें—जैसे कि AAAI या MRUC मॉडल। “ऐसी संस्था चाहिए जहां हर स्टेकहोल्डर को अपनी आवाज और वीटो का अधिकार महसूस हो।”
BARC की संरचनात्मक चुनौतियां और नीति बदलाव
भारत का मौजूदा टीवी रेटिंग्स ढांचा सिर्फ तकनीकी ही नहीं, बल्कि संरचनात्मक बाधाओं से भी जूझ रहा है। 2014 की "Policy Guidelines for Television Rating Agencies" के अनुच्छेदों ने BARC के एकाधिकार को संरक्षित किया था, जिससे नए खिलाड़ियों की एंट्री सीमित हो गई।
हालांकि, जुलाई 2025 में सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा जारी ड्राफ्ट संशोधन में इस स्थिति को बदलने की कोशिश की गई है। इसमें:
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अनुच्छेद 1.4 में ढील दी गई है ताकि ऑपरेशनल फ्लेक्सिबिलिटी और हितों के टकराव से बचाव हो सके
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अनुच्छेद 1.5 और 1.7 को हटाया गया है जो नए एंट्रेंट्स के लिए रुकावट थे
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एकाधिक एजेंसियों को प्रोत्साहन दिया गया है ताकि नवाचार और प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा मिले
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कवरेज को CTV, मोबाइल और OTT तक बढ़ाया गया है
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ब्रॉडकास्टर्स और ऐडवर्टाइजर्स जैसे अन्य स्टेकहोल्डर्स को नियंत्रित निगरानी के तहत निवेश की अनुमति दी गई है
कनेक्टेड टीवी और रिटर्न-पाथ डेटा: इन्फ्रास्ट्रक्चर की चुनौती
ऑडियंस मापन को आधुनिक बनाने के लिए रिटर्न-पाथ डेटा और कनेक्टेड डिवाइसेज के साथ बेहतर इंटीग्रेशन भी जरूरी है। एंड्रॉइड सेट-टॉप बॉक्स इस दिशा में अहम हैं, लेकिन इनकी कीमत अब भी बड़ी बाधा है।
केबल इंडस्ट्री के एक वरिष्ठ व्यक्ति ने बताया कि उच्च इंपोर्ट ड्यूटी के कारण ये बॉक्स 3,500 से 4,000 रुपये के बीच महंगे पड़ते हैं।
“यदि इंपोर्ट ड्यूटी घटाई जाए या टैक्स इंसेंटिव दिए जाएं, तो इनका अपनाया जाना तेज हो सकता है,” उन्होंने कहा।
एक अन्य एक्सपर्ट के मुताबिक, चूंकि MSO और DTH प्लेटफॉर्म करीब 10 करोड़ घरों तक पहुंचते हैं, यदि डेटा प्राइवेसी और प्राइसिंग को संतुलित किया जाए तो यहीं से रीयल टाइम डेटा एकत्र करना पूरी तरह संभव है।
कानूनी उलझनें बनी हुई हैं
हालांकि MIB का ड्राफ्ट पॉलिसी सुधार की दिशा में एक सकारात्मक कदम है, लेकिन कुछ कानूनी अस्पष्टताएं अब भी मौजूद हैं।
Singhania & Co. के पार्टनर रोहित जैन ने चेताया कि अनुच्छेद 1.4 की व्याख्या को लेकर भ्रम की स्थिति बन सकती है।
उनके अनुसार, “भले ही अनुच्छेद हटा दिए जाएं, लेकिन रेगुलेशन की भावना बनी रहनी चाहिए। हितों के टकराव से हर कीमत पर बचना होगा।”
आगे की राह: एक ऐसा सिस्टम जो जमीनी हकीकत को दर्शाए
अंततः, भारत में टीवी रेटिंग्स का भविष्य केवल लागत या तकनीक पर नहीं, बल्कि संरेखण (alignment) पर निर्भर करेगा।
सभी एक्सपर्ट्स की एक राय थी कि यदि नया सिस्टम सफल होना है तो:
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यह सांख्यिकीय रूप से प्रतिनिधिक होना चाहिए, कम से कम 70,000 घरों का पैनल शामिल हो
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क्षेत्र, भाषा और सामाजिक-आर्थिक वर्गों में संतुलन हो
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रीयल टाइम डेटा, डिवाइस क्रॉस-अट्रिब्यूशन और मीडिया प्लानिंग टूल्स के साथ एपीआई इंटीग्रेशन हो
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और मजबूत फ्रॉड डिटेक्शन व डेटा सुरक्षा उपाय सुनिश्चित किए जाएं
Jumboking की सयंतनी दास ने कहा, “यदि आपका सिस्टम जमीनी सच्चाई को प्रतिबिंबित नहीं करता, तो वह ऐडवर्टाइजिंग खर्चों को प्रभावित नहीं कर पाएगा। ब्रैंड्स ऐसी इनसाइट चाहते हैं जिन पर वे कार्रवाई कर सकें और जिनमें वे यकीन कर सकें।”
भारत के पास तकनीक है, निवेश की क्षमता है—अब जरूरत है तो सिर्फ सामूहिक इच्छाशक्ति की।
2 अगस्त को सार्वजनिक सुझावों की 30-दिनी विंडो बंद होते ही, MIB के ये ड्राफ्ट सुधार भारत में पारदर्शी, आधुनिक और मल्टी-प्लैटफॉर्म ऑडियंस मीजरमेंट के नए युग की राह खोल सकते हैं।
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