28 जून से शुरू होने वाला यह कार्यक्रम हर रविवार रात 10 बजे प्रसारित होगा। इस शो में डॉ. सुभाष चंद्रा देश के विभिन्न वर्गों से संवाद करेंगे।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
‘जी’ समूह के संस्थापक और पूर्व राज्यसभा सांसद डॉ. सुभाष चंद्रा अपने संवाद कार्यक्रम ‘सच: द सुभाष चंद्रा शो’ (SACH: The Subhash Chandra Show) के तीसरे सीजन के साथ दर्शकों के बीच फिर लौट रहे हैं। 28 जून से शुरू होने वाला यह कार्यक्रम हर रविवार रात 10 बजे प्रसारित होगा।
इसका प्रसारण Zee News के साथ-साथ Zee Media नेटवर्क के अन्य चैनलों पर किया जाएगा, जबकि Z5 पर इसकी स्ट्रीमिंग भी उपलब्ध रहेगी। शो में डॉ. सुभाष चंद्रा देश के विभिन्न वर्गों से संवाद करेंगे। इसमें युवाओं की नई सोच के साथ-साथ रिटायरमेंट के बाद लोगों के जीवन से जुड़े सवालों और चुनौतियों पर भी चर्चा की जाएगी।
‘सच’ की शुरुआत कॉलेज परिसरों में युवाओं के साथ संवाद के मंच के रूप में हुई थी। नए सीजन में कार्यक्रम का दायरा बढ़ाते हुए इसे छोटे शहरों, कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों तक ले जाने की योजना है। शो के माध्यम से आकांक्षाओं, चुनौतियों, नेतृत्व, व्यक्तिगत विकास और राष्ट्र निर्माण जैसे विषयों पर चर्चा की जाएगी।
'जी मीडिया' के अनुसार, तीसरे सीजन में पहली बार ग्रामीण भारत और उभरते भारत की आवाजों को प्रमुखता दी जाएगी। गांवों और छोटे शहरों से निकलने वाली सफलता की कहानियां, स्थानीय नवाचार और सामाजिक बदलाव से जुड़े उदाहरण कार्यक्रम का हिस्सा होंगे।
कार्यक्रम में उद्यमिता, शिक्षा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), नेतृत्व, अध्यात्म, संचार कौशल, कृषि, सामुदायिक विकास, नैतिकता और भविष्य के करियर जैसे विषयों पर चर्चा की जाएगी। इसके माध्यम से युवाओं, छात्रों, उद्यमियों और भावी नेतृत्वकर्ताओं को बदलती दुनिया में अपने लक्ष्य, आत्मविश्वास और दिशा से जुड़े मुद्दों पर व्यावहारिक मार्गदर्शन देने का प्रयास किया जाएगा।
इस सीजन में सारथी नामक एक नया मंच भी जोड़ा गया है, जिसके माध्यम से लोग डॉ. सुभाष चंद्रा के विचारों, अनुभवों और जीवन-दर्शन से जुड़ सकेंगे। इसके जरिए इच्छुक व्यक्ति उनके अनुभवों से उपजे ज्ञान और मार्गदर्शन का लाभ प्राप्त कर सकेंगे।
शो के बारे में डॉ. सुभाष चंद्रा ने कहा, ‘सच’ सीजन-3 अब आपके शहरों और आपके बड़े सपनों तक विस्तार ले रहा है। इस सफर में मेरा उद्देश्य आपका ‘सारथी’ बनना है। यदि आपके पास अपने सपनों को उड़ान देने वाला कोई इनोवेटिव विचार है, या जीवन और व्यवसाय के किसी भी मोड़ पर आप खुद को फंसा हुआ पाते हैं, तो मैं इस यात्रा में आपके साथ हूं।’
सोशल मीडिया पर इस शो का प्रोमो भी जारी किया गया है, जिसे आप यहां देख सकते हैं।
टेलीविजन रेटिंग्स को लेकर लंबे समय से चल रहे गतिरोध के बीच सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने अब इस मामले को सुलझाने के लिए ज्यादा सीधा और रणनीतिक रुख अपनाया है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
इमरान फजल, असिसटेंट एडिटर, एक्सचेंज4मीडिया ।।
टेलीविजन रेटिंग्स को लेकर लंबे समय से चल रहे गतिरोध के बीच सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने अब इस मामले को सुलझाने के लिए ज्यादा सीधा और रणनीतिक रुख अपनाया है। वह अलग-अलग ब्रॉडकास्टर्स या इंडस्ट्री संगठनों के बीच चल रही खींचतान में उलझने के बजाय सीधे उन मूल मुद्दों पर ध्यान दे रहे हैं, जिनकी वजह से BARC रेटिंग्स की वापसी अटकी हुई है।
इंडस्ट्री से जुड़े लोगों का कहना है कि मंत्री का फोकस किसी एक ब्रॉडकास्टर या संगठन के पक्ष में जाने के बजाय एक ऐसी रेटिंग्स व्यवस्था तैयार करने पर है, जिस पर पूरे टीवी इकोसिस्टम को भरोसा हो सके। कई इंडस्ट्री एग्जिक्यूटिव्स इसे ‘चाणक्य जैसी रणनीति’ बता रहे हैं, यानी धैर्य के साथ पूरे मामले को समझना और किसी दबाव में आए बिना समाधान तक पहुंचना।
एक वरिष्ठ टीवी इंडस्ट्री एग्जिक्यूटिव ने नाम जाहिर न करने की शर्त पर कहा कि अगर यह मामला पूरी तरह इंडस्ट्री पर छोड़ दिया जाए तो अलग-अलग कंपनियों के व्यावसायिक हित सामने आते रहेंगे। किसी ब्रॉडकास्टर को एक फैसला अपने पक्ष में लग सकता है तो किसी दूसरे को दूसरा फैसला। लेकिन रेटिंग्स की करेंसी ऐसी होनी चाहिए, जिस पर पूरा इंडस्ट्री भरोसा कर सके। इसलिए मंत्री अलग-अलग पक्षों की लड़ाई में शामिल होने के बजाय मूल समस्या को सुलझाने पर ध्यान दे रहे हैं।
BARC की वापसी पर सरकार की नजर
भारत की टीवी इंडस्ट्री लंबे समय से BARC की रेटिंग्स का इंतजार कर रही है। ब्रॉडकास्टर्स, विज्ञापनदाता और मीडिया एजेंसियां देश की प्रमुख टीवी ऑडियंस मेजरमेंट करेंसी के बिना काम कर रही हैं।
यह स्थिति ऐसे समय में बनी हुई है, जब Television Ratings Policy 2026 के लागू होने को लेकर कई सवाल हैं। इनमें सबसे बड़ा मुद्दा ‘लैंडिंग पेज व्यूअरशिप’ का है।
इंडस्ट्री सूत्रों के मुताबिक, अश्विनी वैष्णव BARC से जुड़े मुद्दों पर सीधे जानकारी ले रहे हैं। उन्होंने संकेत दिया है कि वह तभी आगे का फैसला लेंगे, जब उन्हें भरोसा हो जाएगा कि पुराने विवादों और नए रेटिंग्स फ्रेमवर्क से जुड़े सभी जरूरी मुद्दों का समाधान हो चुका है।
इस रुख को इंडस्ट्री के कुछ हिस्सों से समर्थन भी मिल रहा है। माना जा रहा है कि इससे मामला अलग-अलग ब्रॉडकास्टर्स और इंडस्ट्री बॉडीज के बीच बातचीत और खींचतान से निकलकर सीधे नियामकीय और तकनीकी समाधान की ओर जा सकता है।
लैंडिंग पेज बना सबसे बड़ा विवाद
BARC रेटिंग्स की वापसी में सबसे बड़ी अड़चन अभी भी लैंडिंग पेज व्यूअरशिप को लेकर है।
लैंडिंग पेज को लेकर विवाद इसलिए है क्योंकि इससे टीवी ऑडियंस मेजरमेंट पर असर पड़ सकता है। सरकार की नई रेटिंग्स पॉलिसी का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि रेटिंग्स वास्तविक टीवी व्यूइंग को दिखाएं और ऐसे व्यूइंग पैटर्न को रेटिंग्स में शामिल न किया जाए, जिससे ऑडियंस आंकड़े वास्तविकता से ज्यादा दिखाई दें।
इस मुद्दे पर ब्रॉडकास्टिंग इंडस्ट्री भी एकमत नहीं है।
Network18 पर लैंडिंग पेज के इस्तेमाल से जुड़े कारोबारी हित होने के कारण उसके इस व्यूअरशिप को रेटिंग्स करेंसी से बाहर रखने के प्रस्ताव पर अलग रुख होने की बात कही जा रही है। दूसरी तरफ Indian Broadcasting & Digital Foundation (IBDF), जिसमें JioStar जैसे बड़े ब्रॉडकास्टर्स शामिल हैं, संशोधित रेटिंग्स फ्रेमवर्क को लागू करने के समर्थन में है।
यही मतभेद BARC का मामला और जटिल बना रहे हैं।
एक अन्य वरिष्ठ मीडिया एग्जिक्यूटिव ने कहा कि दोनों पक्षों के अपने-अपने व्यावसायिक हित हैं। ऐसे में यह उम्मीद करना मुश्किल है कि इंडस्ट्री खुद पूरी तरह निष्पक्ष समाधान पर पहुंच जाएगी। इसलिए सरकार की भूमिका एक रेफरी जैसी हो जाती है। मौजूदा समय में वैष्णव का रुख भी कुछ ऐसा ही दिखाई दे रहा है।
वैष्णव का संदेश साफ- पहले मुद्दे सुलझाएं
मामले से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, वैष्णव ने ऐसा कोई संकेत नहीं दिया है कि सरकार लंबे समय तक टीवी रेटिंग्स को रोके रखना चाहती है। उनका जोर सिर्फ इतना है कि पहले बाकी मुद्दों को सुलझाया जाए और BARC यह साबित करे कि वह नई व्यवस्था की सभी जरूरी शर्तों का पालन कर रहा है।
मामले से जुड़े एक व्यक्ति ने कहा कि मंत्री का रुख काफी साफ है। वह यह नहीं कह रहे हैं कि रेटिंग्स वापस नहीं आनी चाहिए। उनका कहना है कि पहले सरकार की चिंताओं का समाधान होना चाहिए। जब वह इस बात से संतुष्ट होंगे कि BARC ने सभी जरूरी शर्तों को पूरा कर लिया है, तब आगे का फैसला लिया जाएगा।
एक अन्य इंडस्ट्री एग्जिक्यूटिव ने इसे रणनीतिक और सोच-समझकर उठाया गया कदम बताया। उनके मुताबिक, मंत्री ने खुद को इंडस्ट्री के किसी एक पक्ष के साथ खड़ा करने के बजाय फैसला सरकार के पास रखा है और BARC से मूल समस्या का समाधान देने को कहा है।
यानी फिलहाल संदेश काफी सीधा है- BARC समाधान दे, नियमों के पालन का भरोसा दिलाए और सरकार उसके बाद अगला फैसला लेगी।
इंडस्ट्री संगठनों के बीच अलग-अलग राय
BARC का विवाद टीवी इंडस्ट्री के भीतर मौजूद मतभेदों को भी सामने लेकर आया है।
IBDF लगातार मंत्रालय के साथ इस मुद्दे पर बातचीत कर रहा है और ऐसी रेटिंग्स व्यवस्था का समर्थन कर रहा है, जिसमें लैंडिंग पेज समेत दूसरे संभावित मापन संबंधी मुद्दों का समाधान हो।
देश के बड़े ब्रॉडकास्टिंग ग्रुप्स में शामिल JioStar भी संशोधित फ्रेमवर्क के तहत मजबूत और पारदर्शी रेटिंग्स सिस्टम को दोबारा शुरू करने के पक्ष में है।
दूसरी ओर, Network18 का लैंडिंग पेज के मुद्दे पर अलग रुख होने की बात कही जा रही है। इसकी एक वजह यह भी है कि नई रेटिंग्स व्यवस्था का असर हर ब्रॉडकास्टर के कारोबार पर एक जैसा नहीं होगा।
इंडस्ट्री के जानकारों का मानना है कि अलग-अलग बिजनेस मॉडल और लैंडिंग पेज से जुड़े अलग-अलग कारोबारी हितों के कारण ब्रॉडकास्टर्स के बीच पूरी तरह सहमति बनना मुश्किल है।
एक इंडस्ट्री दिग्गज ने कहा कि हर ब्रॉडकास्टर अपने कारोबारी हितों की रक्षा करेगा। इसलिए सरकार को इस मामले में रेफरी की भूमिका निभानी होगी और वैष्णव फिलहाल यही करते दिखाई दे रहे हैं।
फेस्टिव सीजन से पहले बढ़ी चिंता
BARC रेटिंग्स की वापसी की जरूरत अब इसलिए भी ज्यादा महसूस की जा रही है क्योंकि इंडस्ट्री साल के दूसरे हिस्से में पहुंच चुकी है और फेस्टिव सीजन की शुरुआत होने वाली है।
टीवी ब्रॉडकास्टर्स के लिए रेटिंग्स बेहद महत्वपूर्ण हैं। इन्हीं आंकड़ों के आधार पर वे अपने विज्ञापन इन्वेंट्री की कीमत तय करते हैं, विज्ञापनदाताओं के साथ रेट पर बातचीत करते हैं और अपने कंटेंट की पहुंच और प्रभाव को साबित करते हैं।
BARC डेटा नहीं होने से विज्ञापनदाता और मीडिया एजेंसियां चैनल और प्रोग्राम के स्तर पर निवेश को लेकर जरूरी बेंचमार्क से वंचित हैं। वहीं ब्रॉडकास्टर्स के लिए भी यह पता लगाना मुश्किल हो रहा है कि कौन सा प्रोग्राम या कंटेंट बेहतर प्रदर्शन कर रहा है।
एक इंडस्ट्री सूत्र ने कहा कि टीवी इंडस्ट्री कुछ समय तक रेटिंग्स के बिना चल सकती है, लेकिन लंबे समय तक ऐसा करना मुश्किल है। विज्ञापनदाताओं को एक भरोसेमंद करेंसी चाहिए, ब्रॉडकास्टर्स को बेंचमार्क और एजेंसियों को फैसले लेने के लिए डेटा चाहिए। हर कोई BARC की वापसी चाहता है, लेकिन रेटिंग्स ऐसी व्यवस्था के साथ वापस आनी चाहिए, जो सरकार की नियामकीय चिंताओं को भी दूर करे।
‘अब इंडस्ट्री को आपस में लड़ने की जरूरत नहीं’
इंडस्ट्री में अब यह उम्मीद बढ़ रही है कि सरकार अलग-अलग ब्रॉडकास्टर्स और संगठनों की राय के बीच फैसला करने के बजाय पूरे मामले को नियामकीय और तकनीकी नजरिए से देखेगी।
एक वरिष्ठ इंडस्ट्री लीडर के मुताबिक, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मंत्री इस मुद्दे को अलग-अलग इंडस्ट्री बॉडीज के बीच राजनीतिक या कारोबारी मुकाबला नहीं बनने दे रहे हैं। वह यह देख रहे हैं कि रेटिंग्स देने वाली संस्था ने सरकार की तय शर्तों को पूरा किया है या नहीं। इससे समाधान का रास्ता ज्यादा साफ हो सकता है।
एक अन्य एग्जिक्यूटिव ने कहा कि अब इंडस्ट्री की तरफ से बहुत कुछ किया जाना बाकी नहीं है। सभी पक्ष अपनी बात सरकार के सामने रख चुके हैं। अब BARC की जिम्मेदारी है कि वह सरकार की चिंताओं का सही जवाब दे और जरूरी बदलावों को पूरा करे।
अब गेंद BARC के पाले में
फिलहाल टीवी इंडस्ट्री की नजरें BARC और सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं।
अश्विनी वैष्णव ने जिस तरह अलग-अलग इंडस्ट्री गुटों के बीच चल रही खींचतान से खुद को अलग रखते हुए सीधे मूल मुद्दों पर ध्यान दिया है, उससे साफ है कि सरकार जल्दबाजी में कोई फैसला लेने के बजाय ऐसी व्यवस्था चाहती है, जिस पर लंबे समय तक भरोसा किया जा सके।
अब BARC को सरकार की चिंताओं का समाधान देना होगा और यह साबित करना होगा कि वह नई रेटिंग्स पॉलिसी के मुताबिक काम करने के लिए तैयार है।
इसके बाद ही सरकार अगला कदम उठाएगी।
यानी फिलहाल गेंद पूरी तरह BARC के पाले में है। टीवी इंडस्ट्री को उम्मीद है कि जब रेटिंग्स वापस आएंगी तो वे सिर्फ दोबारा शुरू नहीं होंगी, बल्कि एक ऐसी भरोसेमंद, पारदर्शी और टिकाऊ व्यवस्था के साथ लौटेंगी, जिसे ब्रॉडकास्टर्स, विज्ञापनदाता और मीडिया एजेंसियां सभी स्वीकार कर सकें।
B.A.G. Films and Media Limited ने चंदन कुमार जैन को कंपनी के स्वतंत्र निदेशक के तौर पर दोबारा नियुक्त करने का फैसला किया है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
B.A.G. Films and Media Limited ने चंदन कुमार जैन को कंपनी के स्वतंत्र निदेशक के तौर पर दोबारा नियुक्त करने का फैसला किया है। कंपनी के निदेशक मंडल ने 13 अगस्त 2026 को हुई बैठक में उनकी दोबारा नियुक्ति को मंजूरी दी। हालांकि, इसके लिए कंपनी के सदस्यों की मंजूरी भी जरूरी होगी।
कंपनी के मुताबिक, चंदन कुमार जैन को 30 मई 2027 से 29 मई 2032 तक पांच लगातार वर्षों के दूसरे कार्यकाल के लिए स्वतंत्र निदेशक के तौर पर नियुक्त किया गया है। वह इस पद से तय अवधि के दौरान बारी-बारी से सेवानिवृत्त होने के नियम के तहत नहीं आएंगे।
उनकी दोबारा नियुक्ति का फैसला कंपनी की नामांकन और पारिश्रमिक समिति की सिफारिश के आधार पर लिया गया है। अब इस नियुक्ति को मंजूरी देने के लिए कंपनी की 33वीं सालाना आम बैठक में विशेष प्रस्ताव लाया जाएगा। कंपनी की यह बैठक 17 सितंबर 2026 को होगी।
जानिए, कौन हैं चंदन कुमार जैन
कंपनी की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक, 64 वर्षीय चंदन कुमार जैन सेवानिवृत्त भारतीय राजस्व सेवा (IRS) अधिकारी हैं और दिल्ली में वकालत करते हैं। उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से पढ़ाई पूरी की है।
उन्होंने वर्ष 1985 में एक राष्ट्रीयकृत बैंक में परिवीक्षाधीन अधिकारी के तौर पर अपना पेशेवर करियर शुरू किया। इसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (NABARD) में ग्रेड ‘A’ अधिकारी के तौर पर कुछ वर्षों तक काम किया।
वर्ष 1990 में चंदन कुमार जैन केंद्रीय उत्पाद शुल्क और सीमा शुल्क विभाग में शामिल हुए। यह विभाग वित्त मंत्रालय के अधीन केंद्रीय उत्पाद शुल्क और सीमा शुल्क बोर्ड (CBEC) के तहत काम करता था।
इसके बाद उन्होंने आयकर विभाग में करीब 30 साल तक सेवाएं दीं। वह संचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय में विशेष कार्य अधिकारी (OSD) के तौर पर भी काम कर चुके हैं।
कंपनी के अनुसार, चंदन कुमार जैन को आयकर, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर, कंपनी कानून और संचार कानून के क्षेत्र में 30 साल से ज्यादा का अनुभव है।
कंपनी ने यह भी साफ किया है कि चंदन कुमार जैन का कंपनी के किसी मौजूदा निदेशक, प्रवर्तक या प्रमुख प्रबंधकीय पदाधिकारी के साथ कोई संबंध नहीं है। यह जानकारी कंपनी कानून, 2013 और सेबी के लिस्टिंग नियमों में दी गई परिभाषा के आधार पर दी गई है।
इस तरह B.A.G. Films में चंदन कुमार जैन का स्वतंत्र निदेशक के तौर पर दूसरा कार्यकाल 30 मई 2027 से शुरू होकर 29 मई 2032 तक रहेगा, बशर्ते कंपनी के सदस्य आगामी सालाना आम बैठक में विशेष प्रस्ताव के जरिए उनकी नियुक्ति को मंजूरी दे दें।
न्यू दिल्ली टेलीविजन लिमिटेड (NDTV) के अंग्रेजी न्यूज चैनल NDTV 24x7 का नाम बदलकर अब NDTV किया जाएगा।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
न्यू दिल्ली टेलीविजन लिमिटेड (NDTV) के अंग्रेजी न्यूज चैनल NDTV 24x7 का नाम बदलकर अब NDTV किया जाएगा। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) ने चैनल का नाम और लोगो बदलने की मंजूरी दे दी है।
कंपनी ने 14 अगस्त 2026 को इसकी जानकारी देते हुए कहा कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने 13 अगस्त 2026 को भेजे अपने पत्र के जरिए इस बदलाव की अनुमति दी है।
मंत्रालय की मंजूरी के बाद अब कंपनी के अंग्रेजी न्यूज चैनल का नाम NDTV 24x7 से बदलकर NDTV हो जाएगा। इसके साथ ही चैनल का लोगो भी बदला जाएगा।
15 अगस्त शाम 7 बजे से नए नाम से प्रसारण
कंपनी के मुताबिक, यह बदलाव 15 अगस्त, या यूं कहें कि आज की शाम 7 बजे से प्रभावी होगा यानी 15 अगस्त को शाम 7 बजे के बाद चैनल NDTV 24x7 के बजाय NDTV नाम से संचालित होगा।
कंपनी ने शेयर बाजार को दी जानकारी में कहा है कि मंत्रालय से मिली मंजूरी के बाद चैनल नए नाम के तहत काम करेगा।
इस तरह NDTV के अंग्रेजी न्यूज चैनल के नाम में करीब एक महत्वपूर्ण बदलाव होने जा रहा है। अब दर्शकों को NDTV 24x7 की जगह सिर्फ NDTV नाम दिखाई देगा और चैनल नए लोगो के साथ प्रसारित होगा।
इंडियन ब्रॉडकास्टिंग एंड डिजिटल फाउंडेशन (IBDF) ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) के टीवी चैनलों के लिए मौजूदा 10+2 विज्ञापन सीमा को खत्म करने के फैसले का स्वागत किया है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
इमरान फजनल, असिसटेंट एडिटर, एक्सचेंज4मीडिया
इंडियन ब्रॉडकास्टिंग एंड डिजिटल फाउंडेशन (IBDF) ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) के टीवी चैनलों के लिए मौजूदा 10+2 विज्ञापन सीमा को खत्म करने के फैसले का स्वागत किया है। IBDF ने इसे एक महत्वपूर्ण और प्रगतिशील नीतिगत कदम बताया है। फाउंडेशन का कहना है कि इस फैसले से ब्रॉडकास्टर्स को विज्ञापन के मामले में ज्यादा लचीलापन मिलेगा।
यह घटनाक्रम ब्रॉडकास्टिंग इंडस्ट्री के अलग-अलग संगठनों की ओर से सरकार के सामने लगातार की जा रही मांगों के बाद आया है। इंडस्ट्री लंबे समय से मौजूदा विज्ञापन व्यवस्था की समीक्षा की मांग कर रही थी।
सरकार के इस फैसले से विज्ञापन सीमा में सीमित या चरणबद्ध राहत देने के बजाय टेलीविजन विज्ञापन व्यवस्था ज्यादा बाजार आधारित होने की दिशा में बढ़ती दिखाई दे रही है। इंडस्ट्री के हितधारकों ने पहले विज्ञापन के लिए तय समय को बढ़ाकर एक घंटे में 15 मिनट करने से लेकर विज्ञापन की अवधि का फैसला पूरी तरह बाजार की ताकतों पर छोड़ने तक के विकल्प सुझाए थे।
बदलते मीडिया माहौल के मुताबिक विज्ञापन नियमों में बदलाव जरूरी: IBDF
एक्सचेंज4मीडिया को दिए अपने बयान में IBDF ने कहा कि वह इस मुद्दे को लेकर सरकार और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के साथ लगातार संपर्क में था और ब्रॉडकास्टर्स की ओर से इस मामले में लगातार अपनी बात रखता रहा।
फाउंडेशन ने कहा कि उसने लगातार इस बात पर जोर दिया है कि मौजूदा विज्ञापन व्यवस्था ऐसे मीडिया माहौल को ध्यान में रखकर बनाई गई थी, जो आज के समय से काफी अलग था। इसलिए अब इसे दोबारा देखने की जरूरत है।
IBDF ने कहा, “पिछले एक दशक में टेलीविजन का पूरा इकोसिस्टम बुनियादी तौर पर बदल गया है।” फाउंडेशन ने बताया कि आज ब्रॉडकास्टर्स को सिर्फ दूसरे टेलीविजन चैनलों से ही मुकाबला नहीं करना पड़ता, बल्कि दर्शकों का ध्यान और विज्ञापन बजट हासिल करने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म, स्ट्रीमिंग सर्विसेज और सोशल मीडिया से भी प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है।
IBDF के मुताबिक, डिजिटल प्लेटफॉर्म के पास अपनी कमर्शियल इन्वेंट्री तय करने में काफी लचीलापन है, जबकि लीनियर टेलीविजन अभी भी तय विज्ञापन नियमों के तहत काम कर रहा है।
फाउंडेशन का कहना है कि 10+2 व्यवस्था हटने से टेलीविजन ब्रॉडकास्टर्स के लिए ज्यादा समान अवसर वाला माहौल तैयार करने में मदद मिलेगी। साथ ही ब्रॉडकास्टर्स बाजार की मांग और दर्शकों के बदलते व्यवहार के हिसाब से ज्यादा प्रभावी तरीके से फैसले ले सकेंगे।
सरकार का यह फैसला ऐसे समय आया है जब पारंपरिक टेलीविजन और डिजिटल प्लेटफॉर्म के बीच विज्ञापन बजट हासिल करने के लिए प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है। सरकार ने विज्ञापन व्यवस्था में बदलाव का फैसला लेने से पहले ब्रॉडकास्टर्स, विज्ञापनदाताओं और विज्ञापन एजेंसियों के साथ इस मुद्दे पर बातचीत भी की थी। इसके बाद सरकार ने मौजूदा विज्ञापन सीमा को पूरी तरह खत्म करने का फैसला किया।
‘रेगुलेटरी फोरबियरेंस की दिशा में महत्वपूर्ण बदलाव’
IBDF ने सरकार के इस फैसले को रेगुलेटरी फ्लेक्सिबिलिटी और फोरबियरेंस की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया है।
फाउंडेशन ने कहा कि टेलीविजन का बाजार काफी बदल चुका है। ब्रॉडकास्टर्स की लागत लगातार बढ़ रही है और उन्हें ऐसे प्लेटफॉर्म से कड़ी प्रतिस्पर्धा करनी पड़ रही है, जिन पर टेलीविजन जैसी विज्ञापन सीमा लागू नहीं है।
IBDF ने कहा, “IBDF सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और माननीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव का आभार व्यक्त करता है कि उन्होंने इंडस्ट्री की मांगों पर विचार किया और ऐसा फैसला लिया, जिससे ब्रॉडकास्टर्स को कामकाज और कमर्शियल स्तर पर ज्यादा लचीलापन मिलेगा।”
इस फैसले के बाद ब्रॉडकास्टर्स विज्ञापनदाताओं की मांग, दर्शकों के व्यवहार और अलग-अलग प्रोग्रामों की अर्थव्यवस्था के आधार पर अपनी विज्ञापन इन्वेंट्री को ज्यादा गतिशील तरीके से तय कर सकेंगे।
हालांकि, विज्ञापन सीमा खत्म होने का यह मतलब जरूरी नहीं है कि ब्रॉडकास्टर्स तुरंत विज्ञापनों की संख्या बढ़ा देंगे। इंडस्ट्री के अधिकारियों का कहना है कि बाजार की ताकतें खुद ही बहुत ज्यादा विज्ञापनों के खिलाफ एक संतुलन का काम करेंगी। अगर किसी चैनल पर जरूरत से ज्यादा विज्ञापन दिखाए जाते हैं, तो दर्शक उस चैनल से दूर जा सकते हैं। वहीं, विज्ञापनदाता भी ऑडियंस के जुड़ाव में बदलाव के हिसाब से अपने फैसले बदल सकते हैं।
फेस्टिव विज्ञापन सीजन से पहले मिली राहत
सरकार के इस फैसले का समय ब्रॉडकास्टर्स के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण है, क्योंकि टेलीविजन इंडस्ट्री अब बेहद अहम फेस्टिव विज्ञापन सीजन में प्रवेश कर रही है।
अगस्त से दिसंबर तक का समय टेलीविजन विज्ञापन के लिए पारंपरिक रूप से काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दौरान ब्रॉडकास्टर्स प्रीमियम प्रोग्रामिंग, फेस्टिव स्पेशल, रियलिटी शो और बड़े एंटरटेनमेंट व स्पोर्ट्स प्रोग्रामों से ज्यादा कमाई करने की कोशिश करते हैं।
विज्ञापन की सीमा हटने से ब्रॉडकास्टर्स को विज्ञापनदाताओं के साथ कैंपेन और कमर्शियल इन्वेंट्री को लेकर बातचीत करते समय ज्यादा लचीलापन मिल सकता है।
टेलीविजन इंडस्ट्री के लिए इस फैसले को ऐसे समय संभावित तौर पर रेवेन्यू बढ़ाने वाला कदम माना जा रहा है, जब ब्रॉडकास्टर्स को बंटी हुई ऑडियंस, बढ़ती ऑपरेशनल लागत और डिजिटल मीडिया से कड़ी प्रतिस्पर्धा जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
यह फैसला इंडियन सोसाइटी ऑफ एडवर्टाइजर्स (ISA) की ओर से सुझाई गई एक घंटे में 15 मिनट की विज्ञापन सीमा बढ़ाने की मांग से भी आगे जाता है। वहीं, एडवर्टाइजिंग एजेंसियों एसोसिएशन ऑफ इंडिया (AAAI) ने सरकार की ओर से विज्ञापन की अवधि तय करने के बजाय बाजार आधारित व्यवस्था की वकालत की थी। दूसरी ओर, ब्रॉडकास्टर्स पूरी तरह रेगुलेटरी फोरबियरेंस की मांग कर रहे थे।
BARC रेटिंग अब इंडस्ट्री की अगली बड़ी चिंता
10+2 विज्ञापन सीमा खत्म होने से ब्रॉडकास्टिंग इंडस्ट्री को एक बड़ी रेगुलेटरी राहत मिली है, लेकिन अब भी इंडस्ट्री की नजर टेलीविजन ऑडियंस मेजरमेंट की बहाली पर है। ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (BARC) की रेटिंग दोबारा कब शुरू होगी, यह अब इंडस्ट्री की बड़ी चिंता बनी हुई है।
नई टेलीविजन रेटिंग व्यवस्था के तहत रजिस्ट्रेशन पूरा होने तक MIB के निर्देश के बाद BARC ने रेटिंग जारी करना रोक रखा है। अप्रैल-जून तिमाही में सिर्फ 24वें हफ्ते तक की रेटिंग जारी की गई थी। इसके बाद रेटिंग का प्रकाशन रोक दिया गया।
फेस्टिव सीजन से पहले मौजूदा टेलीविजन रेटिंग उपलब्ध नहीं होना ब्रॉडकास्टर्स और विज्ञापनदाताओं दोनों के लिए बड़ी चिंता बन गया है, क्योंकि ऑडियंस मेजरमेंट मीडिया प्लानिंग, विज्ञापन इन्वेंट्री की कीमत तय करने और कैंपेन की परफॉर्मेंस जांचने के लिए बेहद जरूरी है।
इसलिए 10+2 विज्ञापन सीमा को खत्म करने के फैसले को जहां कमर्शियल फ्लेक्सिबिलिटी बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है, वहीं अब इंडस्ट्री का ध्यान BARC रेटिंग की वापसी पर भी रहेगा।
ब्रॉडकास्टर्स के लिए विज्ञापन इन्वेंट्री पर ज्यादा आजादी और एक भरोसेमंद टेलीविजन रेटिंग करेंसी की बहाली, दोनों चीजें मिलकर आने वाले फेस्टिव विज्ञापन सीजन से कमाई करने की इंडस्ट्री की क्षमता पर बड़ा असर डाल सकती हैं।
अब सरकार से उम्मीद है कि वह इस फैसले को लागू करने की व्यवस्था तैयार करेगी और इसे औपचारिक रूप से लागू करने के लिए जरूरी संशोधनों पर काम करेगी।
भारत की टेलीविजन ब्रॉडकास्टिंग इंडस्ट्री में बड़ा बदलाव होने जा रहा है। सरकार ने टीवी चैनलों पर लागू मौजूदा 10+2 विज्ञापन सीमा को खत्म करने पर सहमति दे दी है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
इमरान फजल, असिसटेंट एडिटर, एक्सचेंज4मीडिया ।।
भारत की टेलीविजन ब्रॉडकास्टिंग इंडस्ट्री में बड़ा बदलाव होने जा रहा है। सरकार ने टीवी चैनलों पर लागू मौजूदा 10+2 विज्ञापन सीमा को खत्म करने पर सहमति दे दी है। इस फैसले से टीवी चैनलों को विज्ञापन दिखाने के मामले में पहले के मुकाबले ज्यादा आजादी मिल सकेगी।
ई4एम को मिली जानकारी के मुताबिक, सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने आज न्यूज ब्रॉडकास्टर्स फेडरेशन (NBF) के एक प्रतिनिधिमंडल को सरकार के इस फैसले की जानकारी दी। इस प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व NBF के संस्थापक अध्यक्ष अर्नब गोस्वामी ने किया था। NBF के कई सदस्यों ने भी ई4एम से इस घटनाक्रम की पुष्टि की है। हाल ही में NBA और IBDF के प्रतिनिधिमंडलों ने भी इस मुद्दे को लेकर मंत्री से मुलाकात की थी।
यह फैसला टेलीविजन विज्ञापन के नियमन को लेकर सरकार के रुख में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है। यह ऐसे समय आया है जब ब्रॉडकास्टर्स कई सालों से सरकार से विज्ञापन के जरिए कमाई करने में ज्यादा लचीलापन देने की मांग करते रहे हैं।
NBF के प्रतिनिधिमंडल ने गोस्वामी के नेतृत्व में वैष्णव से मुलाकात कर टेलीविजन ब्रॉडकास्टर्स के सामने मौजूद विज्ञापन संबंधी पाबंदियों और डिजिटल प्लेटफॉर्म से बढ़ते प्रतिस्पर्धी दबाव पर चर्चा की। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर विज्ञापन इन्वेंट्री को लेकर इस तरह की वैधानिक सीमा लागू नहीं है।
बैठक के दौरान मंत्री ने बताया कि सरकार मौजूदा विज्ञापन सीमा को खत्म करेगी। इससे ब्रॉडकास्टर्स को बाजार की स्थिति और दर्शकों के व्यवहार के आधार पर अपनी कमर्शियल इन्वेंट्री तय करने की ज्यादा आजादी मिलेगी।
इस फैसले का ब्रॉडकास्टर्स, खासकर न्यूज चैनलों की ओर से स्वागत किए जाने की उम्मीद है। न्यूज ब्रॉडकास्टर्स लंबे समय से यह तर्क देते रहे हैं कि मौजूदा व्यवस्था डिजिटल प्लेटफॉर्म की तुलना में टेलीविजन को नुकसान पहुंचाती है। न्यूज चैनलों ने लाइव पत्रकारिता, लगातार न्यूज जुटाने और टेक्नोलॉजी व डिस्ट्रीब्यूशन में बढ़ते निवेश की लागत का भी मुद्दा उठाया है।
NBF लगातार रेगुलेटरी फोरबियरेंस की मांग करता रहा है। उसका कहना है कि विज्ञापन की अवधि कितनी होनी चाहिए, यह फैसला आखिरकार बाजार की ताकतों के आधार पर होना चाहिए। एसोसिएशन ने टेलीविजन ब्रॉडकास्टिंग की बदलती अर्थव्यवस्था और डिजिटल प्लेटफॉर्म से विज्ञापन बजट हासिल करने के लिए बढ़ती प्रतिस्पर्धा की ओर भी ध्यान दिलाया है।
यह मामला सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) के पास काफी समय से विचाराधीन था। मंत्रालय मौजूदा व्यवस्था में संभावित बदलावों को लेकर ब्रॉडकास्टर्स, विज्ञापनदाताओं और विज्ञापन एजेंसियों से बातचीत कर रहा था।
हाल तक यह माना जा रहा था कि सरकार पूरी तरह से नियम खत्म करने के बजाय विज्ञापन सीमा में चरणबद्ध या सीमित राहत देने पर विचार कर रही है। इंडस्ट्री के हितधारकों ने कई विकल्प भी सुझाए थे। इनमें विज्ञापन के लिए तय समय बढ़ाना, अलग-अलग जॉनर के लिए अलग नियम लागू करना और ज्यादा लचीले रेगुलेटरी फ्रेमवर्क की ओर बढ़ना शामिल था।
उदाहरण के लिए, इंडियन सोसाइटी ऑफ एडवर्टाइजर्स (ISA) ने विज्ञापन की मौजूदा सीमा को बढ़ाकर एक घंटे के समय का 25 फीसदी करने का समर्थन किया था। इसका मतलब एक घंटे में 15 मिनट तक विज्ञापन दिखाने की अनुमति देना होता। वहीं, एडवर्टाइजिंग एजेंसियों एसोसिएशन ऑफ इंडिया (AAAI) ने सरकार की ओर से विज्ञापन की अवधि तय करने के बजाय बाजार के आधार पर फैसला लेने की वकालत की थी।
इंडियन ब्रॉडकास्टिंग एंड डिजिटल फाउंडेशन (IBDF) और न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एंड डिजिटल एसोसिएशन (NBDA) समेत इंडस्ट्री संगठनों के जरिए ब्रॉडकास्टर्स पूरी तरह से रेगुलेटरी फोरबियरेंस की मांग कर रहे थे। उनका तर्क था कि अगर किसी चैनल पर विज्ञापन बहुत ज्यादा हो जाएंगे, तो दर्शक खुद दूसरे प्लेटफॉर्म या चैनल की ओर चले जाएंगे। ऐसे में बाजार अपने स्तर पर संतुलन बना लेगा।
इसलिए सरकार की ओर से विज्ञापन सीमा को पूरी तरह खत्म करने का फैसला उस सीमित राहत वाले रुख से एक बड़ा बदलाव है, जिस पर पहले चर्चा हो रही थी।
यह नीतिगत बदलाव ऐसे समय भी आया है जब मीडिया इकोसिस्टम तेजी से बदल रहा है। टेलीविजन ब्रॉडकास्टर्स अब उन्हीं विज्ञापन बजट के लिए स्ट्रीमिंग सर्विसेज, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और दूसरे डिजिटल माध्यमों से मुकाबला कर रहे हैं। वहीं डिजिटल प्लेटफॉर्म के पास आम तौर पर विज्ञापनों की संख्या और उनकी प्लेसमेंट तय करने में ज्यादा लचीलापन होता है।
ब्रॉडकास्टर्स के लिए विज्ञापन सीमा हटने से अतिरिक्त विज्ञापन इन्वेंट्री उपलब्ध हो सकती है। इससे उनकी कमाई बढ़ने की संभावना भी है, खासकर ऐसे समय में जब टेलीविजन इंडस्ट्री को बढ़ती प्रतिस्पर्धा और बंटी हुई ऑडियंस जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
हालांकि, इस फैसले के बाद दर्शकों के देखने के अनुभव और कंज्यूमर प्रोटेक्शन को लेकर भी चर्चा शुरू होने की संभावना है। विज्ञापन की सीमाएं मूल रूप से इसलिए लागू की गई थीं ताकि दर्शकों को बहुत ज्यादा कमर्शियल ब्रेक का सामना न करना पड़े और प्रोग्रामिंग और विज्ञापनों के बीच एक उचित संतुलन बना रहे।
इसलिए सरकार के इस फैसले पर विज्ञापनदाता, विज्ञापन एजेंसियां और कंज्यूमर ग्रुप भी करीब से नजर रखेंगे। खास तौर पर यह देखा जाएगा कि ब्रॉडकास्टर्स मिलने वाली अतिरिक्त विज्ञापन इन्वेंट्री का इस्तेमाल किस तरह करते हैं।
वैष्णव के साथ NBF प्रतिनिधिमंडल की बैठक इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि NBF लंबे समय से न्यूज ब्रॉडकास्टर्स से जुड़े मुद्दों पर अपनी आवाज उठाता रहा है।
NBF राष्ट्रीय और क्षेत्रीय बाजारों में काम करने वाले ब्रॉडकास्टर्स का प्रतिनिधित्व करता है। संगठन इससे पहले भी टेलीविजन इंडस्ट्री के सामने मौजूद रेगुलेटरी और स्ट्रक्चरल चुनौतियों को लेकर सरकार के साथ बातचीत करता रहा है। इससे पहले भी गोस्वामी के नेतृत्व में NBF के एक प्रतिनिधिमंडल ने भारत के ब्रॉडकास्ट न्यूज सेक्टर से जुड़े मुद्दों पर सरकार के साथ व्यापक बातचीत के दौरान वैष्णव से मुलाकात की थी।
अब विज्ञापन सीमा खत्म होने से टेलीविजन विज्ञापन व्यवस्था के ज्यादा बाजार-आधारित होने का रास्ता खुल सकता है। इसे भारत के ब्रॉडकास्टिंग सेक्टर में पिछले कई वर्षों के सबसे महत्वपूर्ण रेगुलेटरी बदलावों में से एक माना जा सकता है।
अब इंडस्ट्री की नजर इस बात पर होगी कि सरकार इस फैसले को लागू करने के लिए क्या व्यवस्था बनाती है और इसे प्रभावी करने के लिए किन नियमों में बदलाव या संशोधन किए जाते हैं। ब्रॉडकास्टर्स भी अब सरकार की ओर से इसके अमल की विस्तृत जानकारी और आगे की प्रक्रिया का इंतजार करेंगे।
भारत की टेलीविजन इंडस्ट्री अब ऐडवर्टाइजिंग के लिहाज से बेहद अहम फेस्टिव सीजन में प्रवेश कर रही है, लेकिन उसकी सबसे बड़ी ऑडियंस करेंसी यानी टीवी रेटिंग्स अभी उपलब्ध नहीं हैं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
इमरान फजल, असिसटेंट एडिटर, एक्सचेंज4मीडिया ।।
भारत की टेलीविजन इंडस्ट्री अब ऐडवर्टाइजिंग के लिहाज से बेहद अहम फेस्टिव सीजन में प्रवेश कर रही है, लेकिन उसकी सबसे बड़ी ऑडियंस करेंसी यानी टीवी रेटिंग्स अभी उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में न्यूज, जनरल एंटरटेनमेंट, फिल्म, स्पोर्ट्स, किड्स और रीजनल टेलीविजन समेत अलग-अलग कैटेगरी की ऐड सेल्स टीम्स के सामने ऐडवर्टाइजर्स को बजट खर्च करने के लिए मनाना मुश्किल होता जा रहा है।
अब यह समस्या सिर्फ न्यूज ब्रॉडकास्टर्स तक सीमित नहीं रह गई है। सूचना और प्रसारण मंत्रालय (MIB) ने 1 जुलाई से टेलीविजन रेटिंग्स के प्रकाशन पर रोक लगा दी है। इसके बाद से पूरा टेलीविजन इकोसिस्टम नए BARC डेटा के बिना काम कर रहा है। यह रोक न्यूज और नॉन-न्यूज दोनों जॉनर पर लागू है और इससे पूरी इंडस्ट्री में मीडिया प्लानिंग और ऐडवर्टाइजिंग डील्स पर असर पड़ा है।
टेलीविजन की ऐड सेल्स टीम्स के सामने फिलहाल सबसे सीधी समस्या यह है कि उनसे ऑडियंस बेचने को कहा जा रहा है, लेकिन उनके पास दिखाने के लिए ऑडियंस के ताजा आंकड़े नहीं हैं।
एक वरिष्ठ टेलीविजन नेटवर्क एग्जीक्यूटिव ने कहा, “हर सेल्स पिच आखिरकार एक ही सवाल पर आकर रुक जाती है, अभी की रीच कितनी है और मौजूदा रेटिंग क्या है? पुराने आंकड़े बातचीत को एक सीमा तक ही आगे ले जा सकते हैं। साप्ताहिक BARC डेटा नहीं होने पर क्लाइंट खासकर अतिरिक्त बजट खर्च करने को लेकर फैसला लेने में हिचकिचा रहा है।”
इसका असर अब ऐडवर्टाइजिंग वॉल्यूम्स में भी दिखाई देने लगा है।
TAM AdEx के आंकड़ों के मुताबिक, न्यूज टीवी पर जुलाई में पिछले चार साल का सबसे कम ऐड वॉल्यूम दर्ज किया गया। अगर जुलाई 2023 को 100 का आधार माना जाए, तो जुलाई 2024 में ऐड वॉल्यूम्स का इंडेक्स घटकर 86 और जुलाई 2025 में 84 रह गया था। जुलाई 2026 में यह और गिरकर 62 पर पहुंच गया। यानी इस अवधि में 38 फीसदी की गिरावट आई है।
मासिक टेलीविजन ऐड वॉल्यूम्स में न्यूज टीवी की हिस्सेदारी भी जनवरी से मई तक इस साल 15 से 17 फीसदी के बीच बनी हुई थी। जून में यह घटकर 13 फीसदी रह गई और जुलाई में और गिरकर सिर्फ 9 फीसदी पर पहुंच गई।
हालांकि ये आंकड़े एक खास जॉनर से जुड़े हैं, लेकिन इंडस्ट्री के अधिकारियों का कहना है कि अब इसके पीछे की समस्या पूरे टेलीविजन सेक्टर में महसूस की जा रही है। GEC, रीजनल एंटरटेनमेंट, मूवी, म्यूजिक और दूसरे जॉनर के ब्रॉडकास्टर्स को भी नए और स्वतंत्र व्यूअरशिप बेंचमार्क के बिना ऐडवर्टाइजिंग डील्स पर बातचीत करनी पड़ रही है।
एक अन्य वरिष्ठ ब्रॉडकास्टर ने कहा, “न्यूज पर इसका असर पहले दिखाई दे रहा है क्योंकि यह ज्यादा बंटा हुआ मार्केट है, लेकिन अब यह सिर्फ न्यूज की समस्या नहीं रह गई है। टेलीविजन की हर सेल्स टीम एक जैसी परेशानी का सामना कर रही है। आप किसी ऐडवर्टाइजर्स को बता सकते हैं कि किसी शो ने पहले एक खास रेटिंग हासिल की थी, लेकिन आप यह साबित नहीं कर सकते कि आज वह शो कितना प्रदर्शन कर रहा है।”
हर सेल्स पिच में गायब है सबसे जरूरी नंबर
BARC की रेटिंग्स पारंपरिक रूप से ब्रॉडकास्टर्स, एजेंसियों और ऐडवर्टाइजर्स के बीच एक कॉमन करेंसी की तरह काम करती हैं। इनकी मदद से मीडिया बायर्स चैनल्स और प्रोग्राम्स की तुलना करते हैं, ऑडियंस डिलीवरी को आंकते हैं और ऐडवर्टाइजिंग इन्वेंट्री की कीमत पर बातचीत करते हैं।
लेकिन अब जब यह करेंसी उपलब्ध नहीं है, तो सेल्स टीम्स अपनी पिच तैयार करने के लिए पुराने BARC प्रदर्शन, चैनल के इंटरनल डेटा, कंज्यूमर रिसर्च, डिजिटल कंजम्पशन के आंकड़ों और दूसरे थर्ड-पार्टी इंडिकेटर्स का इस्तेमाल कर रही हैं।
लेकिन इन सभी आंकड़ों को BARC जैसी अहमियत नहीं मिल रही है।
एक मीडिया एजेंसी के सीनियर एग्जिक्यूटिव ने कहा, “ऐडवर्टाइजर्स यह नहीं कह रहे हैं कि टेलीविजन काम नहीं करता। उनका कहना है कि उनके पास जोखिम की सही कीमत तय करने के लिए पर्याप्त जानकारी नहीं है। अगर मुझे ऐसे माध्यम में पैसा लगाना है, जहां मौजूदा प्रदर्शन का डेटा उपलब्ध है और ऐसे माध्यम में जहां सबसे नए स्वतंत्र आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, तो फैसला लेना काफी मुश्किल हो जाता है।”
यह स्थिति उन चैनल्स के लिए खास तौर पर मुश्किल है, जिन्होंने हाल में अपनी ऑडियंस बढ़ाई है या नए प्रोग्राम लॉन्च किए हैं। पुराने रेटिंग आंकड़े किसी चैनल की मौजूदा स्थिति को सही तरीके से नहीं दिखा सकते। वहीं नए शो के पास BARC का कोई पुराना रिकॉर्ड ही नहीं है।
इसका फायदा टेलीविजन के पुराने और स्थापित प्रोग्राम्स को भी मिल सकता है। प्रोग्रामिंग से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि ब्लैकआउट के कारण ब्रॉडकास्टर्स कंटेंट से जुड़े फैसले लेते समय पुराने प्रदर्शन और ब्रांड की मजबूती पर ज्यादा भरोसा करने को मजबूर हो रहे हैं। ऐसे में कुछ ज्यादा जोखिम वाले नए शो के लॉन्च को टाला भी जा सकता है।
ऐडवर्टाइजर्स मांग रहे ज्यादा सबूत और ज्यादा डिस्काउंट
रेटिंग्स की गैरमौजूदगी ने ऐडवर्टाइजिंग डील्स की बातचीत का तरीका भी बदल दिया है।
ब्रॉडकास्टर्स को अब ज्यादा ऐडवर्टाइजर्स ऑडियंस डिलीवरी के अतिरिक्त सबूत, कस्टमाइज्ड इंटीग्रेशन और परफॉर्मेंस से जुड़े अरेंजमेंट मांगते नजर आ रहे हैं। यानी सिर्फ स्पॉट इन्वेंट्री खरीदने के बजाय वे ज्यादा वैल्यू चाहते हैं।
एक वरिष्ठ एजेंसी एग्जीक्यूटिव ने कहा, “पहले बातचीत रेटिंग पॉइंट और कॉस्ट प्रति रेटिंग पॉइंट के आसपास होती थी। अब बात इस पर ज्यादा हो रही है कि ब्रॉडकास्टर हमें और क्या दे सकता है, इंटीग्रेशन, स्पॉन्सरशिप, डिजिटल एक्सटेंशन या गारंटी। कॉमन करेंसी नहीं होने से बातचीत ऑडियंस डिलीवरी से हटकर रिस्क मैनेजमेंट की तरफ जा रही है।”
कुछ ब्रॉडकास्टर्स को कीमतों को लेकर भी दबाव का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि ऐडवर्टाइजर्स इस अनिश्चितता के बीच अपने पैसे की ज्यादा वैल्यू चाहते हैं। इंडस्ट्री के अधिकारियों का कहना है कि ऑब्जेक्टिव रेटिंग डेटा की कमी का असर फेस्टिव सीजन के दौरान प्रीमियम टेलीविजन इन्वेंट्री की कीमतों पर होने वाली बातचीत में भी दिख रहा है।
यह दबाव ऐसे समय आया है जब टेलीविजन ऐडवर्टाइजिंग मार्केट पहले से ही कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। FMCG कंपनियों के खर्च में नरमी, मैक्रोइकोनॉमिक अनिश्चितता और अतिरिक्त वीडियो बजट का डिजिटल वीडियो व कनेक्टेड टीवी की ओर जाना पहले से ही टीवी पर दबाव बना रहा है। ऐसे में रेटिंग्स का ब्लैकआउट मार्केट में एक और परेशानी जोड़ रहा है।
जुलाई की कमजोरी: ब्लैकआउट का असर या सामान्य सीजनल गिरावट?
इंडस्ट्री में इस बात को लेकर भी अलग-अलग राय है कि जुलाई में ऐड वॉल्यूम में आई गिरावट का कितना हिस्सा सीधे तौर पर रेटिंग्स ब्लैकआउट से जुड़ा है।
मीडिया एजेंसियों का कहना है कि जुलाई आमतौर पर ऐडवर्टाइजिंग के लिहाज से थोड़ा कमजोर महीना होता है। मानसून में देरी का असर FMCG, रिटेल और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स जैसी कैटेगरी पर पड़ सकता है। इसके अलावा ऐडवर्टाइजर्स अब अपने वीडियो बजट को टेलीविजन, YouTube, कनेक्टेड टीवी और OTT प्लेटफॉर्म के बीच तेजी से बांट रहे हैं।
एक वरिष्ठ मीडिया प्लानर ने कहा, “जुलाई में अपनी सीजनलिटी होती है, इसलिए पूरी गिरावट का कारण BARC को बताना सही नहीं होगा। लेकिन ब्लैकआउट ने पहले से कमजोर मार्केट को और मुश्किल बना दिया है। जब बजट पर दबाव होता है, तो ऐडवर्टाइजर्स टेलीविजन पर पैसा लगाने से पहले ज्यादा मजबूत सबूत चाहते हैं।”
हालांकि, ब्रॉडकास्टर्स का कहना है कि जिस समय ऐडवर्टाइजर्स अपने सबसे बड़े कैंपेन की प्लानिंग शुरू कर रहे हैं, उसी समय रेटिंग उपलब्ध नहीं होने से टेलीविजन को एक संरचनात्मक नुकसान हो रहा है।
एक टेलीविजन नेटवर्क के सेल्स हेड ने कहा, “सीजनलिटी कुछ कमजोरी को समझा सकती है। लेकिन यह नहीं समझा सकती कि हर सेल्स बातचीत पहले से ज्यादा लंबी और जटिल क्यों हो गई है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि कोई ऐसा कॉमन नंबर नहीं है, जिस पर सभी सहमत हो सकें।”
फेस्टिव सीजन होगा असली टेस्ट
ब्रॉडकास्टर्स की सबसे बड़ी चिंता जुलाई को लेकर नहीं, बल्कि आने वाले महीनों को लेकर है।
अगस्त से दिसंबर तक का समय आमतौर पर टेलीविजन के लिए ऐडवर्टाइजिंग के लिहाज से सबसे महत्वपूर्ण दौर में से एक होता है। इस दौरान फेस्टिव सीजन की खरीदारी, नए प्रोग्राम, बड़े रियलिटी शो और प्रीमियम स्पॉन्सरशिप के मौके ऐडवर्टाइजिंग मार्केट को गति देते हैं।
लेकिन इस साल ब्रॉडकास्टर्स इस महत्वपूर्ण दौर में ऐसे समय प्रवेश कर रहे हैं, जब उनके पास वह साप्ताहिक रेटिंग डेटा नहीं है, जो आमतौर पर कीमत तय करने और प्रोग्रामिंग से जुड़े फैसलों का आधार होता है।
रेटिंग्स का ब्लैकआउट ऐडवर्टाइजर्स को ऐसे प्लेटफॉर्म की ओर देखने के लिए भी प्रेरित कर रहा है, जहां कैंपेन की परफॉर्मेंस को ज्यादा तेजी और बारीकी से मापा जा सकता है। इंडस्ट्री से जुड़े जानकारों ने चेतावनी दी है कि अगर फेस्टिव सीजन की प्लानिंग के दौरान टेलीविजन के पास मान्यता प्राप्त और भरोसेमंद मेजरमेंट करेंसी नहीं रहती है, तो डिजिटल प्लेटफॉर्म को इसका फायदा मिल सकता है।
GEC ब्रॉडकास्टर्स के लिए समस्या खास तौर पर बड़ी है, क्योंकि नए फिक्शन, रियलिटी और नॉन-फिक्शन प्रोग्राम लॉन्च किए जाने की तैयारी चल रही है। स्पोर्ट्स नेटवर्क के सामने चुनौती थोड़ी अलग है। उन्हें ताजा इंडस्ट्री-वाइड व्यूअरशिप बेंचमार्क के बिना महंगे स्पोर्ट्स राइट्स और प्रीमियम इन्वेंट्री की कीमत को सही ठहराना होगा।
रीजनल ब्रॉडकास्टर्स के सामने एक और चुनौती है, क्योंकि पुराने रेटिंग आंकड़े मौजूदा समय में अलग-अलग मार्केटों में ऑडियंस के बदलाव को सही तरीके से नहीं दिखा सकते।
वहीं न्यूज ब्रॉडकास्टर्स के लिए जुलाई के आंकड़े इस बात का शुरुआती संकेत दे रहे हैं कि रेटिंग्स को लेकर बनी अनिश्चितता ऐडवर्टाइजिंग पर कितना असर डाल सकती है।
अब पूरी इंडस्ट्री की नजर अगस्त पर है। अगर फेस्टिव कैंपेन शुरू होने के साथ टेलीविजन के ऐड वॉल्यूम में सुधार आता है, तो ब्रॉडकास्टर्स यह कह सकते हैं कि जुलाई की कमजोरी मुख्य रूप से सीजनल थी।
लेकिन अगर अलग-अलग जॉनर में कमजोरी बनी रहती है, तो रेटिंग्स ब्लैकआउट को सिर्फ मेजरमेंट में आई रुकावट नहीं, बल्कि ऐडवर्टाइजिंग के पैसे को लीनियर टेलीविजन से दूर ले जाने वाले एक कारण के तौर पर भी देखा जा सकता है।
फिलहाल टेलीविजन इंडस्ट्री अपना काम जारी रखे हुए है, लेकिन उसकी सेल्स टीम्स असल में बिना उस स्कोरबोर्ड के एयरटाइम बेच रही हैं, जो लंबे समय से यह तय करता आया है कि उस एयरटाइम की असली कीमत कितनी है।
स्वतंत्रता दिवस समारोह को दिव्यांगजनों के लिए और ज्यादा सुलभ बनाने की दिशा में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) ने निजी सैटेलाइट टीवी चैनलों से खास अपील की है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
स्वतंत्रता दिवस समारोह को दिव्यांगजनों के लिए और ज्यादा सुलभ बनाने की दिशा में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) ने निजी सैटेलाइट टीवी चैनलों से खास अपील की है। मंत्रालय ने सभी निजी टीवी चैनलों से कहा है कि वे स्वतंत्रता दिवस के प्रमुख कार्यक्रमों का लाइव प्रसारण साइन लैंग्वेज इंटरप्रिटेशन के साथ करें, ताकि सुनने में कठिनाई वाले लोग भी इन राष्ट्रीय कार्यक्रमों से जुड़ सकें।
मंत्रालय ने 13 अगस्त को जारी एक एडवाइजरी में कहा कि पिछले कुछ वर्षों से सिविल सोसायटी के सदस्यों की ओर से लगातार यह मांग की जा रही थी कि स्वतंत्रता दिवस समारोह और उसकी कमेंट्री को साइन लैंग्वेज के जरिए उपलब्ध कराया जाए। इसका मकसद यह है कि सुनने में कठिनाई वाले लोग भी देश के इस महत्वपूर्ण राष्ट्रीय समारोह का हिस्सा बन सकें।
14 अगस्त को राष्ट्रपति का संदेश होगा लाइव
मंत्रालय के मुताबिक, राष्ट्रपति का राष्ट्र के नाम संदेश 14 अगस्त 2026 को शाम 7 बजे प्रसारित किया जाएगा। इसका लाइव प्रसारण पूरे दूरदर्शन नेटवर्क पर होगा।
निजी सैटेलाइट टीवी चैनल दूरदर्शन नेटवर्क की इस फीड को बिना किसी शुल्क के अपने चैनल पर प्रसारित कर सकते हैं।
15 अगस्त को लाल किले से पीएम का संबोधन
स्वतंत्रता दिवस के दिन यानी 15 अगस्त 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लाल किले की प्राचीर से ध्वजारोहण और देश को संबोधित करेंगे। मंत्रालय के मुताबिक, इस कार्यक्रम का लाइव प्रसारण सुबह करीब 6:25 बजे से 9 बजे तक या कार्यक्रम खत्म होने तक किया जाएगा।
इस कार्यक्रम का प्रसारण डीडी भारती पर साइन लैंग्वेज इंटरप्रिटेशन के साथ किया जाएगा। इससे सुनने में कठिनाई वाले लोगों को प्रधानमंत्री के संबोधन और समारोह को समझने में मदद मिलेगी।
निजी चैनलों को फीड मुफ्त में मिलेगी
MIB ने साफ किया है कि दूरदर्शन नेटवर्क की फीड निजी सैटेलाइट टीवी चैनलों के लिए फ्री ऑफ कॉस्ट उपलब्ध कराई जा रही है। मंत्रालय ने चैनलों से आग्रह किया है कि वे राष्ट्रपति के संदेश और स्वतंत्रता दिवस समारोह का लाइव प्रसारण दूरदर्शन की इसी फीड के जरिए करें और साइन लैंग्वेज इंटरप्रिटेशन को भी शामिल करें।
मंत्रालय ने कहा कि ऐसा करने से दिव्यांगजनों के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रमों की पहुंच बढ़ेगी और स्वतंत्रता दिवस समारोह को ज्यादा से ज्यादा लोगों के लिए समावेशी बनाया जा सकेगा।
यह एडवाइजरी सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अंडर सेक्रेटरी नवनीत कुमार की ओर से जारी की गई है। इसकी कॉपी इंडियन ब्रॉडकास्टिंग एंड डिजिटल फाउंडेशन (IBDF), न्यूज ब्रॉडकास्टर्स फेडरेशन (NBF) और अन्य न्यूज ब्रॉडकास्टर एसोसिएशनों को भी भेजी गई है।
इस साल की शुरुआत में OTT मंचों के लिए सुगम्यता संबंधी दिशा-निर्देशों को अंतिम रूप देने के बाद अब सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) टेलीविजन ब्रॉडकास्टर्स के लिए भी नई व्यवस्था पर विचार कर रहा है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
इमरान फैजल, असिसटेंट एडिटर, एक्सचेंज4मीडिया ।।
इस साल की शुरुआत में OTT मंचों के लिए सुगम्यता संबंधी दिशा-निर्देशों को अंतिम रूप देने के बाद अब सूचना एवं ब्रॉडकास्ट मंत्रालय (MIB) टेलीविजन ब्रॉडकास्टर्स के लिए भी नई व्यवस्था पर विचार कर रहा है। मामले की जानकारी रखने वाले लोगों के मुताबिक, इसमें नियमों को लागू करने की समयसीमा में बदलाव और कुछ तकनीकी सुगम्यता संबंधी जरूरतों (technical accessibility requirements) को दोबारा तय करने पर विचार किया जा सकता है।
बताया जा रहा है कि प्रस्तावित नई व्यवस्था में टेलीविजन ब्रॉडकास्टर्स और डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्म ऑपरेटर्स (DPOs) को 2019 में मंत्रालय की ओर से जारी किए गए सुगम्यता मानकों को लागू करने में आई दिक्कतों को ध्यान में रखा जाएगा।
नई व्यवस्था में नियमों का पालन करने के लिए ज्यादा स्पष्ट समयसीमा दी जा सकती है। साथ ही कुछ ऐसी जरूरतों को आसान या तर्कसंगत बनाया जा सकता है, जिससे पूरे टेलीविजन डिस्ट्रीब्यूशन चेन में इन नियमों को व्यावहारिक तरीके से लागू किया जा सके।
यह कदम ऐसे समय में आया है जब सरकार ने फरवरी 2026 में OTT मंचों के लिए सुगम्यता संबंधी दिशा-निर्देश जारी किए थे। इसके लिए 2025 में प्रस्तावित नियमों के साथ विचार-विमर्श की प्रक्रिया शुरू हुई थी। अंतिम OTT व्यवस्था में नए प्रकाशित होने वाले कार्यक्रमों में सुगम्यता सुविधाओं को लागू करने के लिए एक तय समय-सारिणी दी गई है।
मंत्रालय ने पहली बार 11 सितंबर 2019 को दिव्यांग व्यक्तियों के लिए टेलीविजन कार्यक्रमों की सुगम्यता के मानक जारी किए थे। ये मानक दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016 के तहत तैयार किए गए थे। इनका उद्देश्य सुनने में परेशानी वाले लोगों के लिए टेलीविजन की पहुंच को बेहतर बनाना था।
2019 की व्यवस्था में तुरंत पूरी तरह नियम लागू करने के बजाय चरणबद्ध तरीके से इन्हें लागू करने की योजना बनाई गई थी। इसके तहत निजी गैर-न्यूज ब्रॉडकास्टर्स को शुरुआत में सप्ताह में एक कार्यक्रम कैप्शन यानी लिखित संवाद के साथ प्रसारित करना था। वहीं निजी न्यूज ब्रॉडकास्टर्स को रोजाना सांकेतिक भाषा में न्यूज बुलेटिन शुरू करने थे। इसके बाद आने वाले वर्षों में सुगम सामग्री का अनुपात धीरे-धीरे बढ़ाने की योजना थी।
हालांकि, पूरे टेलीविजन तंत्र में इन नियमों को लागू करना आसान नहीं रहा। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि सुगम्यता की जिम्मेदारी सिर्फ ब्रॉडकास्टर्स तक सीमित नहीं है। 2019 के दस्तावेज में सेवा प्रदाताओं की परिभाषा में ब्रॉडकास्टर्स के साथ-साथ केबल और उपग्रह नेटवर्क संचालकों तथा अन्य डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों को भी शामिल किया गया था।
इसमें दृश्य-श्रव्य सामग्री की पूरी सीरीज की जटिलता को भी स्वीकार किया गया था और सामग्री बनाने वालों, ब्रॉडकास्टर्स और डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों के बीच तालमेल की जरूरत बताई गई थी।
पुरानी तकनीक और कई पक्षों के कारण नियम लागू करना मुश्किल
इंडस्ट्री के सामने सबसे बड़ी दिक्कतों में से एक यह रही है कि सुगम्यता से जुड़ी सुविधाओं का सही तरीके से काम करना पूरी डिस्ट्रीब्यूशन सीरीज पर निर्भर करता है। इसमें सामग्री तैयार करने से लेकर उसे प्रसारित करने, डिस्ट्रीब्यूशन करने और आखिर में दर्शक के टेलीविजन या सेट-टॉप बॉक्स तक पहुंचाने की प्रक्रिया शामिल है।
2019 के मानकों में भी तकनीकी दिक्कतों को स्वीकार किया गया था और इन्हें चरणबद्ध तरीके से लागू करने की योजना बनाई गई थी। इसमें टेलीविजन और सेट-टॉप बॉक्स में कैप्शन, उपशीर्षक और सांकेतिक भाषा की सुविधा को आसानी से इस्तेमाल करने की व्यवस्था करने की बात कही गई थी। रिमोट और दूसरे नियंत्रण उपकरणों में भी सुगम्यता सुविधाओं का समर्थन करने की उम्मीद की गई थी।
एक ब्रॉडकास्ट नेटवर्क के वरिष्ठ अधिकारी ने नाम जाहिर नहीं करने की शर्त पर कहा, “सुगम्यता किसी प्रसारक के लिए केवल एक जगह पर नियमों का पालन करने का मामला नहीं है। प्रसारक कैप्शन या सांकेतिक भाषा वाली फीड तैयार कर सकता है, लेकिन यह संकेत डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क से होकर गुजरता है और आखिर में दर्शक के उपकरण में भी इसका समर्थन होना जरूरी है। इस पूरी सीरीज में कहीं भी तालमेल नहीं हुआ तो यह सुविधा प्रभावी नहीं रह जाती।”
इंडस्ट्री से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक, डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्म ऑपरेटर्स को भी पुराने मुख्य डिस्ट्रीब्यूशन केंद्रों और सेट-टॉप बॉक्स के बुनियादी ढांचे को बेहतर करने तथा यह सुनिश्चित करने में दिक्कतों का सामना करना पड़ा है कि सुगम्यता से जुड़े संकेत बिना किसी रुकावट के दर्शकों तक पहुंचें।
एक डिस्ट्रीब्यूशन मंच से जुड़े अधिकारी ने पहचान जाहिर नहीं करने की शर्त पर कहा, “सबसे बड़ी चुनौती अलग-अलग प्रणालियों के बीच तालमेल की रही है। बाजार में सेट-टॉप बॉक्स और डिस्ट्रीब्यूशन प्रणालियों की कई पीढ़ियां मौजूद हैं। सामग्री के स्तर पर जो जरूरत आसान दिखाई देती है, उसे डिस्ट्रीब्यूशन के स्तर पर लागू करने के लिए काफी परीक्षण और तकनीकी बदलाव की जरूरत पड़ सकती है।”
2019 के मानकों में खास तौर पर कहा गया था कि मंत्रालय टेलीविजन सेवाओं और उपकरणों के बीच तालमेल सुनिश्चित करने के लिए दिशा-निर्देश जारी कर सकता है, ताकि दर्शक सुगम्यता से जुड़ी सेवाओं को प्राप्त, समझ और अपनी स्क्रीन पर देख सकें।
मंत्रालय ज्यादा व्यावहारिक समयसीमा पर कर सकता है विचार
प्रस्तावित समीक्षा में ब्रॉडकास्टर्स के लिए नियमों का पालन करने की समय-सारिणी को ज्यादा स्पष्ट और पहले से तय करने पर जोर दिया जा सकता है। खास तौर पर उन मामलों में जहां कार्यक्रम बनाने की प्रक्रिया, ब्रॉडकास्ट व्यवस्था, पुरानी सामग्री के भंडार और डिस्ट्रीब्यूशन ढांचे में बदलाव की जरूरत होती है।
2019 के मानकों में पहले से ही यह माना गया था कि तकनीकी दिक्कतों के कारण चरणबद्ध तरीके से नियम लागू करना जरूरी होगा। इसमें उन चैनल्स को छूट दी गई थी जिनकी 12 महीने की औसत दर्शक हिस्सेदारी 1 प्रतिशत से कम थी। ऐसे चैनल्स को यह सीमा पार करने के बाद मानकों को लागू करने के लिए तीन महीने का समय दिया गया था।
न्यूज चैनल्स को छोड़कर निजी ब्रॉडकास्टर्स के लिए शुरुआत में सप्ताह में एक कार्यक्रम कैप्शन के साथ प्रसारित करने की व्यवस्था थी। वहीं लंबे समय की योजना में कार्यक्रमों के काफी बड़े हिस्से के लिए सुगम्यता सुविधाएं उपलब्ध कराने की बात कही गई थी। विदेशी भाषा के अंग्रेजी चैनल्स के लिए अलग लक्ष्य रखा गया था, जिसमें 80 प्रतिशत तक सामग्री को सुगम बनाने की बात थी।
ब्रॉडकास्ट इंडस्ट्री के एक अन्य वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “2019 के मानकों की मंशा पर कभी सवाल नहीं था। दिक्कत यह थी कि इंडस्ट्री को ज्यादा स्पष्ट योजना चाहिए थी कि प्रसारक को क्या करना है, डिस्ट्रीब्यूशन मंच संचालक को क्या करना है और टेलीविजन या सेट-टॉप बॉक्स की व्यवस्था पर क्या निर्भर करता है। नई व्यवस्था में जिम्मेदारियां ज्यादा स्पष्ट तरीके से तय की जा सकती हैं।”
सामग्री से जुड़ी जरूरतों को भी आसान बनाया जा सकता है
2019 की व्यवस्था में यह भी माना गया था कि हर तरह के कार्यक्रमों को एक जैसे नियमों के तहत नहीं रखा जा सकता। लाइव और पहले से रिकॉर्ड किए गए खेल कार्यक्रम, लाइव न्यूज, संगीत कार्यक्रम, पुरस्कार समारोह, लाइव रियलिटी कार्यक्रम और कुछ अन्य तरह की सामग्री को उनकी प्रकृति के कारण नियमों से छूट दी गई थी। विज्ञापनों और टेलीशॉपिंग को भी इससे बाहर रखा गया था।
इंडस्ट्री से जुड़े अधिकारियों को उम्मीद है कि नई व्यवस्था में भी सुगम्यता के मूल उद्देश्य को बरकरार रखा जाएगा, लेकिन अलग-अलग कार्यक्रमों और उन्हें तैयार करने की वास्तविक परिस्थितियों को देखते हुए ज्यादा लचीलापन दिया जा सकता है।
एक टेलीविजन प्रसारक के वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “लाइव सामग्री पहले से रिकॉर्ड किए गए कार्यक्रम से बिल्कुल अलग होती है। रिकॉर्ड किए गए कार्यक्रम के लिए कैप्शन पहले से तैयार किए जा सकते हैं, उनकी गुणवत्ता जांची जा सकती है और उन्हें कार्यक्रम के साथ सही तरीके से मिलाया जा सकता है। लेकिन लाइव कार्यक्रम, खासकर न्यूज और दूसरे आयोजनों में तकनीक, कम समय में तैयारी और सटीकता की जरूरत बिल्कुल अलग होती है।”
2019 के मानकों में उदाहरण के तौर पर पहले से रिकॉर्ड किए गए कार्यक्रमों के कैप्शन की सटीकता जांचने की बात कही गई थी। वहीं लाइव कैप्शन के लिए लिखित सामग्री और विशेष शब्दावली पहले से तैयार करने तथा बोलने और कैप्शन के बीच सही तालमेल रखने की जरूरत बताई गई थी।
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टेलीविजन की नई व्यवस्था में OTT के अनुभव से मिल सकती है मदद
टेलीविजन के नियमों की यह समीक्षा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकार अब OTT मंचों के लिए अलग सुगम्यता व्यवस्था तैयार कर चुकी है। अंतिम OTT दिशा-निर्देश 6 फरवरी 2026 को जारी किए गए थे। इससे पहले अक्टूबर 2025 में प्रस्तावित नियमों को विचार-विमर्श के लिए जारी किया गया था। अंतिम व्यवस्था में नई सामग्री के लिए सुगम्यता सुविधाओं को लागू करने की समय-सारिणी दी गई है।
अंतिम OTT व्यवस्था में प्रस्तावित शुरुआती नियमों की तुलना में कुछ बदलाव भी किए गए। सरकार ने नियम लागू करने के लिए ज्यादा समय दिया और पुरानी सामग्री के संग्रह के मामले में ‘सर्वोत्तम प्रयास’ वाला तरीका अपनाया।
टेलीविजन क्षेत्र के लिए भी यही तरीका एक उदाहरण बन सकता है। इसकी वजह यह है कि भारत में बड़ी संख्या में पुराने टेलीविजन और सेट-टॉप बॉक्स इस्तेमाल हो रहे हैं। ऐसे में सभी उपकरणों में एक साथ तकनीकी बदलाव करना आसान नहीं होगा।
ब्रॉडकास्ट इंडस्ट्री के एक अधिकारी ने कहा, “OTT के मामले में यह सामने आया है कि सुगम्यता से जुड़े नियमों को स्पष्ट चरणों में लागू किया जा सकता है। पूरी व्यवस्था से एक साथ नियमों का पालन करने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। टेलीविजन इससे भी ज्यादा जटिल है क्योंकि इसमें ब्रॉडकास्टर्स, डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्म ऑपरेटर्स, उपकरण बनाने वाली कंपनियों और दर्शकों, सभी की भूमिका होती है।”
मंत्रालय के 2019 के टेलीविजन मानकों में तय लक्ष्य, निगरानी व्यवस्था और समय-समय पर समीक्षा की भी बात कही गई थी। दस्तावेज में कहा गया था कि तेजी से बदलती तकनीक और बाजार की परिस्थितियों को देखते हुए नीति की हर दो साल में समीक्षा की जानी चाहिए।
ऐसे में प्रस्तावित नई व्यवस्था का उद्देश्य सुगम्यता के मूल लक्ष्य को बनाए रखते हुए भारत के अलग-अलग हिस्सों और कई स्तरों वाले टेलीविजन तंत्र में नियमों के पालन की व्यवस्था को ज्यादा व्यावहारिक बनाना हो सकता है।
ब्रॉडकास्टर्स को उम्मीद है कि संशोधित व्यवस्था में उन्हें नियम लागू करने के लिए पर्याप्त बदलाव का समय मिलेगा। साथ ही ब्रॉडकास्टर्स और डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्म ऑपरेटर्स के बीच जिम्मेदारियां ज्यादा स्पष्ट होंगी और सुगम्यता के लक्ष्य को पूरा करने के लिए पुराने तकनीकी ढांचे में अचानक बड़े बदलाव करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
राज टेलीविजन नेटवर्क (Raj Television Network Limited) के बोर्ड ने भारती श्रीधर को कंपनी के बोर्ड में स्वतंत्र निदेशक के तौर पर दोबारा नियुक्त करने की मंजूरी दे दी है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
राज टेलीविजन नेटवर्क (Raj Television Network Limited) के बोर्ड ने भारती श्रीधर को कंपनी के बोर्ड में स्वतंत्र निदेशक के तौर पर दोबारा नियुक्त करने की मंजूरी दे दी है।
बोर्ड की बैठक में नामांकन और पारिश्रमिक समिति (Nomination and Remuneration Committee) की सिफारिश के आधार पर भारती श्रीधर को दूसरे कार्यकाल के लिए पांच साल तक स्वतंत्र निदेशक बनाए रखने के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई है। उनकी नई नियुक्ति 1 अप्रैल 2027 से 31 मार्च 2032 तक रहेगी। हालांकि, यह पुनर्नियुक्ति कंपनी के सदस्यों यानी शेयरधारकों की मंजूरी के अधीन है।
भारती श्रीधर का मौजूदा कार्यकाल 31 मार्च 2027 को खत्म हो रहा है। इसके बाद उनका दूसरा पांच साल का कार्यकाल शुरू होगा।
कंपनी ने यह भी स्पष्ट किया है कि भारती श्रीधर को किसी भी नियामकीय आदेश के तहत डायरेक्टर का पद संभालने से प्रतिबंधित नहीं किया गया है और कंपनी के किसी भी अन्य डायरेक्टर के साथ पारिवारिक या अन्य कोई संबंध नहीं है।
भारती श्रीधर को मीडिया और एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में दो दशक से ज्यादा का अनुभव है। वह अंग्रेजी साहित्य में स्नातक हैं और विभिन्न मीडिया प्लेटफॉर्म्स के साथ लंबे समय तक जुड़ाव के जरिए टेलीविजन और ब्रॉडकास्टिंग सेक्टर का व्यापक अनुभव रखती हैं। इसके अलावा, वह ज्योतिष और न्यूमरोलॉजी की प्रैक्टिशनर और काउंसलर भी हैं। उन्हें Media Communication, Audience Engagement और इंडस्ट्री में बदलते ट्रेंड्स की अच्छी समझ है।
उनका विविध प्रोफेशनल एक्सपीरियंस और मीडिया इंडस्ट्री की जानकारी कंपनी के रणनीतिक फैसलों और कारोबार से जुड़े मामलों में उपयोगी साबित हो सकती है।
Raj Television Network ने कहा है कि भारती श्रीधर की पुनर्नियुक्ति को कंपनी के सदस्यों की मंजूरी मिलना जरूरी है। शेयरधारकों की मंजूरी मिलने के बाद वह 1 अप्रैल 2027 से कंपनी के बोर्ड में स्वतंत्र निदेशक के तौर पर अपना दूसरा पांच साल का कार्यकाल शुरू करेंगी।
वरिष्ठ पत्रकार अदिति नागर (Aditi Nagar) को न्यूज24 (News24) में एग्जिक्यूटिव एडिटर (Executive Editor) नियुक्त किया गया है। वह ‘सबसे बड़ा सवाल’ भी होस्ट करेंगी।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
न्यूज24 (News24) ने वरिष्ठ पत्रकार अदिति नागर (Aditi Nagar) को एग्जिक्यूटिव एडिटर–पॉलिटिकल (Executive Editor – Political) नियुक्त किया है। नई जिम्मेदारी के साथ वह चैनल के प्रमुख प्राइम टाइम डिबेट शो ‘सबसे बड़ा सवाल’ (Sabse Bada Sawal) को भी होस्ट करेंगी।
न्यूज24 से जुड़ने से पहले अदिति नागर भारत24 (Bharat24) में पॉलिटिकल एडिटर (Political Editor) और फर्स्ट इंडिया न्यूज (First India News) में एडिटर (Editor) के पद पर काम कर चुकी हैं।
न्यूज24 के मैनेजिंग एडिटर (Managing Editor) मानक गुप्ता (Manak Gupta) ने अदिति नागर की नियुक्ति पर खुशी जताई। उन्होंने कहा कि अदिति के पास राजनीति की गहरी समझ, न्यूजरूम का लंबा अनुभव और मजबूत संपादकीय नजरिया है। उनका अनुभव और स्पष्ट आवाज ‘सबसे बड़ा सवाल’ को एक नई दिशा देने के साथ न्यूज24 के प्राइम टाइम को भी मजबूत करेगी।
अदिति नागर ने कहा कि वह न्यूज24 से जुड़कर ‘सबसे बड़ा सवाल’ की जिम्मेदारी संभालने को लेकर उत्साहित हैं। उन्होंने कहा कि भरोसेमंद पत्रकारिता का काम ऐसे सवाल उठाना है जो जरूरी हों और दर्शकों को स्पष्ट जानकारी, संदर्भ और अलग-अलग नजरिए उपलब्ध कराएं।
उन्होंने आगे कहा कि वह शो की मजबूत पहचान को आगे बढ़ाने और टेलीविजन के साथ-साथ डिजिटल प्लेटफॉर्म पर दर्शकों से जुड़ने की कोशिश करेंगी।