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संकट में देश की केबल इंडस्ट्री: EY रिपोर्ट में खुलासा, 6 साल में गईं 5.77 लाख नौकरियां
Ernst & Young (EY) और ऑल इंडिया डिजिटल केबल फेडरेशन (AIDCF) ने मिलकर पहली बार एक रिपोर्ट जारी की है, जिसमें बताया गया है कि केबल डिस्ट्रीब्यूशन बिज़नेस में आमदनी लगातार घट रही है
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 8 months ago
अदिति गुप्ता, असिसटेंट एडिटर, एक्सचेंज4मीडिया ।।
भारत में केबल टीवी इंडस्ट्री गंभीर संकट से गुजर रही है। Ernst & Young (EY) और ऑल इंडिया डिजिटल केबल फेडरेशन (AIDCF) ने मिलकर पहली बार इतने बड़े स्तर पर एक रिपोर्ट जारी की है, जिसमें बताया गया है कि केबल डिस्ट्रीब्यूशन बिजनेस में आमदनी लगातार घट रही है, ग्राहक कम हो रहे हैं, मुनाफा गिर रहा है और सबसे चिंताजनक बात ये है कि इस सेक्टर में बड़ी संख्या में नौकरियां जा रही हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, जिन लोकल केबल ऑपरेटर्स (LCOs) से सर्वे किया गया, उनमें से 93% ने माना कि 2018 के मुकाबले उनकी मासिक कमाई घट गई है। वहीं, 79% LCOs ने कहा कि उनकी आय 20% से भी ज्यादा गिर गई है। यह सर्वे पूरे देश में 28,100 LCOs पर आधारित था, जो अपने आप में इस इंडस्ट्री पर हुआ अब तक का सबसे बड़ा रिसर्च है।
इस रिपोर्ट का सबसे गंभीर पहलू यह है कि इसमें केबल डिस्ट्रीब्यूशन से जुड़े रोजगार में भारी गिरावट सामने आई है। AIDCF के प्रेजिडेंट और डेन नेटवर्क्स के सीईओ एस. एन. शर्मा ने बताया कि इस सेक्टर में करीब 5.77 लाख नौकरियां जा चुकी हैं, जो अब तक की सबसे बड़ी गिरावट है। उनके मुताबिक, इस सर्वे में शामिल 28,000 LCOs में काम करने वाले लोग 2018 में जहां 1.2 लाख थे, अब घटकर 80,000 रह गए हैं, यानी 31% की कमी आई है। यदि इसे पूरे देश के 1.6 लाख LCOs पर नजर डालें, तो करीब 1.95 लाख लोगों की नौकरी जा चुकी है।
केबल इंडस्ट्री में नौकरी छूटने की असली तस्वीर तब सामने आती है जब उन लोकल केबल ऑपरेटर्स (LCOs) को भी गिना जाता है जो पूरी तरह से बंद हो चुके हैं। GTPL हैथवे के चेयरमैन अजय सिंह ने बताया कि पिछले छह वर्षों में AIDCF से जुड़े करीब 76,000 LCOs बंद हो गए हैं। यदि हर एक LCO में औसतन तीन लोग भी काम करते थे, तो इसका मतलब है कि लगभग 2.28 लाख और नौकरियां चली गईं।
इसके अलावा, जो LCOs AIDCF से नहीं जुड़े हैं और स्वतंत्र मल्टी सिस्टम ऑपरेटर्स (MSOs) हैं, उनमें से भी कई बाजार से बाहर हो चुके हैं, जिससे अनुमानित 1.5 लाख और लोगों की नौकरियां गई हैं। वहीं छोटे MSOs के बंद होने से यदि हर एक में औसतन पांच कर्मचारी मानें, तो लगभग 5,000 से 6,000 और रोजगार खत्म हो गए हैं।
AIDCF के प्रेजिडेंट एस.एन. शर्मा ने कहा कि ये आंकड़े सिर्फ अंदाजे नहीं हैं, बल्कि असली लोग और उनकी आजीविका हैं, जो देश के छोटे शहरों और कस्बों में प्रभावित हुई है। उन्होंने यह भी कहा कि इस गिनती में उन नौकरियों को शामिल नहीं किया गया है जो कंपनियों के अंदर लागत कम करने के चलते गई हैं।
इस भारी गिरावट के पीछे दो बड़ी वजहें बताई गई हैं। पहली वजह 2019 में लागू किया गया नया रेगुलेटरी सिस्टम है, जिसने केबल ऑपरेटर्स से यह आजादी छीन ली कि वे अपने दर्शकों के लिए स्थानीय जरूरतों के हिसाब से चैनल पैकेज बना सकें। अब ब्रॉडकास्टर्स तय करते हैं कि किस पैकेज में क्या होगा, भले ही उपभोक्ता वह कंटेंट न देखना चाहता हो।
दूसरी बड़ी वजह है कीमतों और affordability की समस्या। शर्मा ने कहा कि केबल सेवा हमेशा एक बड़ी संख्या में आम लोगों को ध्यान में रखकर दी जाती थी यानी कम कीमत में ज्यादा कंटेंट। लेकिन पिछले छह सालों में कीमतें तेजी से बढ़ीं, और कई ऑपरेटर अपने ग्राहकों पर यह बोझ नहीं डाल पाए। नतीजतन, उन्होंने खुद ही लागत झेली, जिससे उनका मुनाफा घटा और कई को कारोबार बंद करना पड़ा।
केबल ऑपरेटर आज सिर्फ तकनीकी बदलाव से नहीं, बल्कि असमान नियमों के कारण सबसे अधिक परेशान हैं। ऑपरेटर्स का कहना है कि वे तकनीक से डरते नहीं—न DTH से, न OTT से। असली समस्या यह है कि नियम सबके लिए एक जैसे नहीं हैं। जबकि केबल कंपनियों को कीमतों, कंटेंट और विज्ञापन को लेकर कई कड़े नियमों का पालन करना पड़ता है, OTT प्लेटफॉर्म इन नियमों से लगभग मुक्त हैं। इससे निष्पक्ष मुकाबले की जगह बाजार में असंतुलन पैदा हो गया है, जिसे ऑपरेटर 'कैनिबलाइजेशन' यानी एक तरह से खुद का ही खत्म किया जाना बता रहे हैं।
रिपोर्ट में यह भी खुलासा हुआ है कि पे-टीवी (वह टीवी सेवाएं जिनके लिए सब्सक्रिप्शन फीस ली जाती है) घरों की संख्या लगातार घट रही है- 2017 में जहां यह 15.2 करोड़ थी, 2025 तक यह घटकर 11.1 करोड़ रह गई है। यानी करीब 4 करोड़ घरों ने केबल या डीटीएच सब्सक्रिप्शन छोड़ दिया है, जो पूरे बाजार का 25-30% है। इसके उलट, उन घरों की संख्या तेजी से बढ़ रही है जो टीवी नहीं देख रहे या केवल फ्री कंटेंट देख रहे हैं, जिन्हें “TV-dark homes” कहा जा रहा है। EY के आशीष फेरवानी ने कहा कि 14 करोड़ ऐसे घर अब भारत में हैं और यह एक गंभीर चिंता का विषय है।
सर्वे में यह भी सामने आया कि 28,000 लोकल केबल ऑपरेटर्स में से 10,000 से ज्यादा ने बताया कि उनके सब्सक्राइबर 2018 के बाद से 40% तक घट चुके हैं। कई लोगों ने बताया कि पहले जहां एक घर में दो या तीन टीवी के लिए केबल कनेक्शन होता था, अब लोग एक ही कनेक्शन रख रहे हैं। बाकी टीवी को ब्रॉडबैंड या स्मार्ट टीवी से जोड़ रहे हैं। साथ ही YouTube जैसे फ्री प्लेटफॉर्म या OTT की बेहतर स्टोरीटेलिंग की ओर लोगों की रुचि भी बढ़ी है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि सिर्फ छोटे ऑपरेटर ही नहीं, बल्कि बड़े DTH और MSO (मल्टी सिस्टम ऑपरेटर) भी राजस्व और मुनाफे में गिरावट झेल रहे हैं। EY के फेरवानी ने कहा कि यह केवल ग्राहकों की संख्या का मसला नहीं है, बल्कि पूरी इंडस्ट्री की प्रणाली एक संकट में है।
EY और AIDCF की रिपोर्ट ने केबल इंडस्ट्री में जारी गिरावट को रोकने के लिए पांच बेहद जरूरी कदम सुझाए हैं। सबसे पहले, रिपोर्ट कहती है कि ब्रॉडकास्टर्स को पे-टीवी को फिर से आकर्षक बनाने के लिए कंटेंट और मार्केटिंग में दोबारा निवेश करना होगा। दूसरा, देशभर में पड़े लगभग 2 करोड़ बंद पड़े सेट टॉप बॉक्स को फिर से एक्टिव करने के लिए एक समन्वित प्रयास होना चाहिए, इसके लिए प्रोत्साहनों और साझेदारियों का सहारा लिया जा सकता है।
तीसरा, रिपोर्ट इस बात पर जोर देती है कि सभी प्लेटफॉर्म्स, जैसे- केबल, DTH और OTT के लिए नियम बराबर होने चाहिए। कीमतें, विज्ञापन और कंटेंट से जुड़े नियम एक जैसे हों। EY के अशिष फेरवानी ने कहा, "एक ही कंटेंट यदि एक प्लेटफॉर्म पर फ्री में दिया जा रहा है और दूसरे पर बेचा जा रहा है, तो यह असंतुलन है।" इसीलिए समान मानकों की जरूरत है।
चौथा, रिपोर्ट कहती है कि कंटेंट रिलीज को लेकर एक रणनीति होनी चाहिए, जैसे- फिल्मों के लिए पहले थिएटर, फिर OTT का सिलसिला होता है, वैसे ही टीवी पर भी कंटेंट को कुछ समय तक एक्सक्लूसिव रखा जाना चाहिए, ताकि उसकी वैल्यू बनी रहे।
आखिर में, रिपोर्ट ने पाइरेसी को एक बड़े संकट के रूप में चिह्नित किया है। EY की एक दूसरी रिपोर्ट The Rob Report के मुताबिक भारत की मीडिया इंडस्ट्री को पाइरेसी से हर साल करीब 20,000 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है- चाहे वह डिजिटल कंटेंट हो या पारंपरिक टीवी कंटेंट।
रिपोर्ट के निष्कर्ष में फेरवानी ने कहा, "यह रिपोर्ट सिर्फ गिरते राजस्व की बात नहीं कर रही, बल्कि एक पूरी इंडस्ट्री की बुनियाद हिल रही है, जो लाखों लोगों को रोजगार देती है। यदि हमने अभी मिलकर, ठोस और तेजी से कार्रवाई नहीं की, तो यह नुकसान स्थायी हो सकता है।"
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