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पुराने शो, नई मुसीबत: क्या भारतीय टीवी की क्रिएटिविटी वाकई खत्म हो गई है?

भारतीय टेलीविजन आजकल एक अजीब दौर से गुजर रहा है। 'क्योंकि सास भी कभी बहू थी', 'CID' और 'बड़े अच्छे लगते हैं' जैसे पुराने शो एक बार फिर टीवी पर लौट आए हैं।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 6 months ago

वी.सी. भारती, इंडस्ट्री एक्सपर्ट, तमिल टेलीविजन ।। 

भारतीय टेलीविजन आजकल एक अजीब दौर से गुजर रहा है। 'क्योंकि सास भी कभी बहू थी', 'CID' और 'बड़े अच्छे लगते हैं' जैसे पुराने शो एक बार फिर टीवी पर लौट आए हैं। इसकी एक बड़ी वजह ये है कि लोग अब स्ट्रीमिंग ऐप्स और शॉर्ट वीडियो की ओर ज्यादा आकर्षित हो रहे हैं, जिससे पारंपरिक टीवी की व्युअरशिप घट रही है। ऐसे में चैनल्स दर्शकों को फिर से लुभाने के लिए पुरानी यादों का सहारा ले रहा है। ऐसे में सवाल ये है कि क्या ये रणनीति समझदारी है या फिर बस इस बात का संकेत कि नए आइडिया ही नहीं बचे? शायद दोनों ही बातें सच हैं।

सच कहें तो लग रहा है कि इंडस्ट्री एक जगह फंस गई है और उम्मीद कर रही है कि पुराने हिट्स फिर से कमाल कर देंगे। नए शोज वो असर नहीं छोड़ पा रहे। इतना तो तय है कि टीवी इस समय अपने दर्शकों की बदलती पसंद के साथ तालमेल बिठाने में जूझ रहा है। यह देखना बाकी है कि ये 'नोस्टैल्जिया' का दांव कितना चलेगा, लेकिन फिलहाल नया कुछ नहीं, सब कुछ जाना-पहचाना ही है।

अब सवाल उठता है कि ये हो क्यों रहा है? जवाब सीधा है- भारतीय टीवी को अपनी पहचान को लेकर असमंजस है। जब ओटीटी और टिकटॉक जैसे प्लेटफॉर्म सारे 'कूल' दर्शकों को खींच ले जाएं, तो मेनस्ट्रीम चैनल क्या करें? वही पुराने शो दोबारा लाएं, थोड़ी चमक-धमक दें और TRP के भगवान से प्रार्थना करें कि लोग दोबारा देखने लगें। ये बिल्कुल वैसा है जैसे कोई पुराना म्यूजिक बैंड री-यूनियन टूर पर निकले- चाहे किसी ने मांगा हो या नहीं, टिकट फिर भी बिक ही जाते हैं।

अब दोष पूरी तरह चैनलों का भी नहीं है। नोस्टैल्जिया तो सीधे दिल में घुस जाने वाला शॉर्टकट है। क्योंकि सास... का टाइटल ट्रैक सुनकर या ACP प्रद्युमन का “दया, दरवाजा तोड़ दो!” सुनकर आंखें नम न हो जाएं तो कहना। स्टार प्लस और बाकी चैनल अब आपके बचपन की यादों के सहारे स्क्रीन से आपको जोड़े रखना चाहते हैं- वही लेट नाइट स्लॉट, वही पुराने एपिसोड, अब ओटीटी पर भी।

लेकिन यह नोस्टैल्जिया सिर्फ गर्मजोशी नहीं, चेतावनी भी है। जो नए शो आ रहे हैं, वो भी बस पुराने फॉर्मूलों को दोहराते जा रहे हैं। वही सास-बहू की लड़ाई, वही लव ट्रायंगल और आधुनिक महिला मतलब खलनायिका वाला राग। अनुपमा और कुंडली भाग्य जैसे शो इतनी तेजी से एपिसोड निकाल रहे हैं कि दर्शक सांस भी न ले पाएं, लेकिन IMDB रेटिंग ऐसी जैसे स्कूल के सबसे सख्त मास्टर ने चेकिंग की हो।

लेखकों के पास नए आइडिया की किल्लत साफ झलकती है। खुद ऐक्टर्स भी बोर हो गए हैं। रोहित रॉय तक ने कहानी को “दकियानूसी” कह दिया, यानी सीधे शब्दों में कहें, तो पत्थर युग में अटकी हुई। एकता कपूर ने बदलाव की कोशिश की थी, लेकिन रिस्पॉन्स ठंडा रहा और वो भी वापस पुराने ढर्रे पर लौट आईं।

इस वक्त हम एक ‘रीरन रूटीन’ में फंस चुके हैं। कोई इस चक्र को तोड़ेगा? शायद। पर तब तक पॉपकॉर्न निकालिए, क्योंकि भारतीय टीवी के लिए अतीत ही फिलहाल पूरी स्क्रिप्ट बन चुका है।

जहां टीवी पुराने खाने को फिर से गरम कर रहा है, वहीं ओटीटी तो जैसे फाइव-स्टार किचन बन चुका है। सेक्रेड गेम्स, पाताल लोक, स्कैम 1992—ये शो सिर्फ मनोरंजन नहीं, एक झटका हैं। ऐसे कैरेक्टर्स और ट्विस्ट्स कि असली जिंदगी भी फीकी लगने लगे। अब Gen Z को 2000 एपिसोड वाला ड्रामा देखने कहो, तो जवाब में एक इंस्टा रील भेज देंगे- “कौन देखे इतना लंबा शो?”

संख्याएं भी यही कहती हैं। हां, टीवी चैनल अब भी प्राइम टाइम पर कब्जा जमाए हुए हैं, लेकिन ऑडियंस अब जवान हो रही है और बहुत अधीर भी। वो अब डबल-स्क्रीनिंग करते हैं- एक तरफ टीवी, दूसरी तरफ ओटीटी। क्योंकि अब लोग सिर्फ एक स्वाद पर नहीं टिकते, पूरा कंटेंट का बुफे चाहिए। ब्रॉडकास्टर्स को भी अंदाजा हो गया है, तभी तो CID को नेटफ्लिक्स पर डाला जा रहा है, और क्योंकि... के डिजिटल वर्जन पर काम शुरू हो चुका है। लेकिन सच कहें तो, ये पुराने मारुति पर नई पेंटिंग करने जैसा है और उम्मीद करना कि ये टेस्ला को टक्कर दे देगी।

ओटीटी की दुनिया में कंटेंट क्रिएटर्स खुलकर खेल रहे हैं, जॉनर मिक्स हो रहे हैं, विजुअल्स एकदम धमाकेदार हैं। टीवी के पुराने फार्मूले अब टिक नहीं पा रहे, खासकर जब लोग ब्रेकिंग बैड जैसी एड्रेनालिन-फुल स्टोरीटेलिंग का स्वाद चख चुके हैं। और शॉर्ट-फॉर्म? वो तो जैसे कंटेंट का एस्प्रेसो शॉट हो गया है- छोटा, तीखा, और नींद तोड़ने वाला।

तो टीवी का अगला प्लान क्या है? पुराने शो को नए प्लेटफॉर्म पर लाना और चमत्कार की उम्मीद करना। क्योंकि... जैसे शो वादा कर रहे हैं कि अब वो “मॉर्डन मुद्दों” पर बात करेंगे, लेकिन अगर वही पुराने क्लिशे लौटे, तो ऑडियंस उसे डेटिंग ऐप की तरह स्वाइप कर देगी बिना देखे, बाय-बाय।

भारतीय टीवी को अब रिस्क लेना होगा, नए जॉनर एक्सप्लोर करने होंगे, और सबसे जरूरी- ‘आदर्श बहू’ का खांचा छोड़ना होगा। हमें चाहिए थोड़े गड़बड़ किरदार, अस्त-व्यस्त परिवार, ऑफिस ड्रामा और साइंस फिक्शन। हम वो शो चाहते हैं जो हँसाए, रुलाए और अचानक हमें चीखने पर मजबूर कर दे- “क्या? ऐसा कैसे हो गया?”

लेखकों को थोड़ी छूट दीजिए, एक्टर्स को खुलकर खेलने दीजिए, शायद तब कुछ जादू हो जाए।

अंत में कहें तो, भारतीय टीवी की यह नोस्टैल्जिया वाली स्ट्रैटेजी, दाल-चावल जैसी है। सुकून देती है, पर हर दिन नहीं खाई जा सकती। इस ओटीटी की जंगल-जैसी दुनिया में टिके रहने के लिए इंडस्ट्री को मसाला बढ़ाना होगा, पुराने फ्लेवर में नई रेसिपी मिलानी होगी और नई सोच को गले लगाना होगा। तभी जाकर टीवी एक बार फिर दिल और रिमोट दोनों जीत पाएगा। 

(ये लेखक के निजी विचार हैं)


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