FY26 की तीसरी तिमाही में HT Media को प्रिंट व डिजिटल बिजनेस से मिला फायदा

HT Media ने वित्त वर्ष 2025-26 की तीसरी तिमाही (Q3 FY26) में अपने ऑपरेशनल प्रदर्शन में सुधार दर्ज किया है।

Last Modified:
Thursday, 29 January, 2026
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HT Media ने वित्त वर्ष 2025-26 की तीसरी तिमाही (Q3 FY26) में अपने ऑपरेशनल प्रदर्शन में सुधार दर्ज किया है। इस दौरान कंपनी की कमाई और EBITDA दोनों में तिमाही आधार पर बढ़ोतरी हुई, जिसका फायदा उसके प्रिंट और डिजिटल बिजनेस से मिला। हालांकि, कुछ खास खर्चों (Exceptional Items) की वजह से कंपनी का शुद्ध घाटा बढ़ गया।

31 दिसंबर 2025 को खत्म हुई तिमाही में HT Media की कंसॉलिडेटेड ऑपरेशनल रेवेन्यू 496.6 करोड़ रुपये रही। यह पिछली तिमाही के 451.5 करोड़ रुपये के मुकाबले करीब 10 फीसदी ज्यादा है। सालाना आधार पर देखें तो कमाई में हल्की बढ़त रही और यह पिछले साल की इसी तिमाही से करीब 1.4 फीसदी अधिक रही।

कंपनी की कुल आय भी बढ़कर 532.3 करोड़ रुपये पहुंच गई, जो पिछली तिमाही में 499.2 करोड़ रुपये थी। हालांकि, साल-दर-साल आधार पर यह लगभग स्थिर रही।

इस तिमाही में कंपनी का EBITDA बढ़कर 50.7 करोड़ रुपये हो गया, जो पिछली तिमाही में 43.6 करोड़ रुपये था। यह बढ़त बेहतर ऑपरेशनल मैनेजमेंट और खर्चों पर नियंत्रण की वजह से आई है। सालाना आधार पर भी EBITDA में करीब 9 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई।

हालांकि, इन सुधारों के बावजूद HT Media को तीसरी तिमाही में 23.7 करोड़ रुपये का शुद्ध घाटा हुआ। पिछली तिमाही में यह घाटा सिर्फ 4.3 करोड़ रुपये था। कंपनी ने बताया कि इस तिमाही के नतीजों पर 40.4 करोड़ रुपये के खास खर्चों का असर पड़ा, जिसकी वजह से घाटा बढ़ा। टैक्स से पहले कंपनी को 27 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।

प्रिंट, रेडियो और डिजिटल बिजनेस का हाल

तीसरी तिमाही में HT Media का प्रिंट बिजनेस मजबूत बना रहा। इस सेगमेंट की कमाई बढ़कर 394.8 करोड़ रुपये हो गई। इसमें अंग्रेजी अखबारों में विज्ञापनों की अच्छी बढ़त और सर्कुलेशन से स्थिर कमाई का बड़ा योगदान रहा।

वहीं, रेडियो बिजनेस से कमाई 33.7 करोड़ रुपये रही। पिछली तिमाही के मुकाबले इसमें हल्की बढ़त हुई, लेकिन सालाना आधार पर कमाई में गिरावट दर्ज की गई। कंपनी ने कहा कि पिछले साल इवेंट्स से ज्यादा कमाई होने की वजह से इस साल तुलना में गिरावट दिख रही है।

डिजिटल बिजनेस ने इस तिमाही में शानदार प्रदर्शन किया। डिजिटल से कमाई बढ़कर 66.7 करोड़ रुपये हो गई। सालाना आधार पर इसमें करीब 30 फीसदी की तेज बढ़त दर्ज की गई, जो डिजिटल-फर्स्ट प्रोडक्ट्स और बेहतर कमाई मॉडल का नतीजा है।

नौ महीनों का प्रदर्शन

अप्रैल से दिसंबर 2025 तक के नौ महीनों में HT Media की कुल ऑपरेशनल कमाई 1,360.3 करोड़ रुपये रही, जो पिछले साल की इसी अवधि से करीब 5 फीसदी ज्यादा है। इस दौरान EBITDA भी बढ़कर 104 करोड़ रुपये हो गया।

हालांकि, नौ महीनों में कंपनी को कुल मिलाकर 39.4 करोड़ रुपये का घाटा हुआ, जो पिछले साल के मुकाबले थोड़ा ज्यादा है। इसका कारण भी खास खर्च बताए गए हैं।

HT Media की चेयरपर्सन और एडिटोरियल डायरेक्टर शोभना भारतीय ने कहा कि तीसरी तिमाही में कंपनी का ऑपरेशनल प्रदर्शन लगातार बेहतर हुआ है। उन्होंने बताया कि प्रिंट बिजनेस में मजबूती बनी हुई है, रेडियो बिजनेस चुनौतीपूर्ण माहौल में स्थिर हो रहा है और डिजिटल बिजनेस तेजी से आगे बढ़ रहा है।

उन्होंने कहा कि आने वाले समय में कंपनी अपने मजबूत प्रिंट ब्रांड्स, रेडियो ऑपरेशंस में बदलाव और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के विस्तार पर फोकस करेगी, ताकि आगे चलकर मुनाफे की राह मजबूत हो सके।

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न्यूजप्रिंट की बढ़ती कीमतों से अखबारों पर बढ़ रहा दबाव

न्यूजप्रिंट की बढ़ती कीमतों ने भारतीय अखबार उद्योग के सामने एक बार फिर लागत संभालने की चुनौती खड़ी कर दी है।

Last Modified:
Thursday, 22 October, 2026
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न्यूजप्रिंट की बढ़ती कीमतों ने भारतीय अखबार उद्योग के सामने एक बार फिर लागत संभालने की चुनौती खड़ी कर दी है। कागज महंगा होने के साथ प्रकाशकों को विज्ञापन से होने वाली कमाई, अखबार की कीमत और प्रसार के बीच संतुलन बनाना पड़ रहा है। दूसरी ओर, न्यूजप्रिंट बनाने वाली कंपनियों ने भी कच्चे माल और उत्पादन से जुड़ी समस्याएं उठाई हैं। ऐसे में सवाल है कि पिछले साल के मुकाबले न्यूजप्रिंट कितना महंगा हुआ है, इसके पीछे क्या कारण हैं और इसका असर अखबारों के कारोबार पर किस तरह पड़ सकता है?

इसका एक स्पष्ट उदाहरण देश के बड़े अखबार समूह DB Corp के ताजा वित्तीय नतीजों के बाद हुई कॉन्फ्रेंस कॉल में सामने आया। कंपनी के डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर पवन अग्रवाल ने 16 अक्टूबर 2026 को बताया कि पिछले साल जहां कंपनी न्यूजप्रिंट के लिए औसतन 47,000 रुपये प्रति टन खर्च कर रही थी, वहीं अब यह लागत बढ़कर करीब 57,000 रुपये प्रति टन हो गई है। इस तरह कंपनी की औसत खरीद लागत में लगभग 20.8% की बढ़ोतरी हुई है।

पवन अग्रवाल के मुताबिक, इसके पीछे भू-राजनीतिक परिस्थितियां, आयातित न्यूजप्रिंट की बढ़ती कीमतें और माल ढुलाई का खर्च प्रमुख कारण हैं। उन्होंने कहा कि आयातित न्यूजप्रिंट की कीमत बढ़ने पर घरेलू न्यूजप्रिंट की कीमतों पर भी असर पड़ता है। कंपनी को अपने आपूर्तिकर्ताओं से संकेत मिले हैं कि वित्त वर्ष 2026-27 की तीसरी और चौथी तिमाही में कीमतों में 2–3% तक नरमी आ सकती है। हालांकि, यह कंपनी प्रबंधन का अनुमान है, न कि कीमतों में कमी की गारंटी।

न्यूजप्रिंट की कीमतों में कितनी बढ़ोतरी?

किसी एक कंपनी की खरीद लागत और पूरे बाजार की कीमतों में बदलाव को एक जैसा नहीं माना जा सकता। इसलिए न्यूजप्रिंट की महंगाई को समझने के लिए सरकारी थोक मूल्य सूचकांक (WPI) के आंकड़े भी महत्वपूर्ण हैं।

वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के आर्थिक सलाहकार कार्यालय के आंकड़ों के अनुसार, सितंबर 2026 में न्यूजप्रिंट का थोक मूल्य सूचकांक पिछले साल के इसी महीने की तुलना में 16.38% अधिक था। अगस्त 2026 में यह सालाना बढ़ोतरी 17.61% और जुलाई में 18.07% रही थी। इससे पता चलता है कि न्यूजप्रिंट के थोक मूल्य सूचकांक में सालाना बढ़ोतरी बनी हुई है, हालांकि सितंबर में इसकी दर पिछले दो महीनों से कम रही।

यहां यह समझना जरूरी है कि WPI में 16.38% की बढ़ोतरी का मतलब यह नहीं है कि देश के हर अखबार की न्यूजप्रिंट खरीद लागत भी इतनी ही बढ़ी है। यह व्यापक थोक मूल्य सूचकांक है, जबकि DB Corp का आंकड़ा कंपनी की औसत खरीद लागत को दर्शाता है।

इसी बीच, इंडियन न्यूजपेपर सोसायटी (INS) ने अगस्त 2026 में दावा किया था कि मार्च के बाद घरेलू न्यूजप्रिंट की कीमतों में 30–40% तक बढ़ोतरी हुई है। यह उद्योग संगठन का आकलन है। इसकी अवधि और आधार सरकारी WPI तथा DB Corp की खरीद लागत से अलग हैं। इसलिए इन तीनों आंकड़ों को एक ही राष्ट्रीय औसत के रूप में पेश करना सही नहीं होगा।

आयात पर निर्भरता और आपूर्ति की समस्या

न्यूजप्रिंट की कीमतों में बदलाव का एक बड़ा कारण भारत की आयात पर निर्भरता है। INS के मुताबिक, देश में न्यूजप्रिंट की सालाना खपत करीब 13 लाख टन है, जबकि घरेलू उत्पादन लगभग 5 लाख टन है। यानी घरेलू उत्पादन देश की पूरी जरूरत को पूरा नहीं करता और अखबार प्रकाशकों को आयातित कागज पर भी निर्भर रहना पड़ता है।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत बढ़ने पर आयात करने वाले प्रकाशकों की लागत बढ़ सकती है। इसके अलावा रुपये की विनिमय दर, समुद्री माल ढुलाई और आपूर्ति में अनिश्चितता भी महत्वपूर्ण हैं। यदि रुपये के मुकाबले डॉलर महंगा होता है, तो समान कीमत वाले आयातित कागज के लिए अधिक रुपये खर्च करने पड़ सकते हैं।

पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति श्रृंखला में अनिश्चितता का मुद्दा भी INS ने उठाया है। संगठन के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर न्यूजप्रिंट की उपलब्धता और कीमतों पर इसका असर पड़ा है। हालांकि, कीमतों में हुई पूरी बढ़ोतरी को केवल एक क्षेत्र के तनाव या किसी एक कारण से जोड़ना उचित नहीं होगा।

न्यूजप्रिंट निर्माता भी परेशान, कोयले की आपूर्ति का मुद्दा उठा

न्यूजप्रिंट की महंगाई की तस्वीर का दूसरा पहलू घरेलू उत्पादन है। 20 अक्टूबर 2026 को Business Standard में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, इंडियन न्यूजप्रिंट मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (INMA) ने कोयले की आपूर्ति में रुकावटों को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से हस्तक्षेप की मांग की।

संगठन ने कहा कि उसके सदस्य कोल इंडिया की विभिन्न सहायक कंपनियों के साथ लंबे समय के ईंधन आपूर्ति समझौते होने के बावजूद तय समय पर कोयले की पर्याप्त आपूर्ति नहीं मिलने की समस्या का सामना कर रहे हैं। INMA के मुताबिक, इसके कारण कुछ निर्माताओं को खुले बाजार से महंगा कोयला खरीदना पड़ रहा है और महंगी बिजली का इस्तेमाल करना पड़ रहा है।

संगठन ने दावा किया कि अनियमित आपूर्ति से उत्पादन क्षमता का पूरा इस्तेमाल करना मुश्किल हो रहा है। इससे घरेलू न्यूजप्रिंट की उपलब्धता पर भी असर पड़ सकता है। INMA ने कोयले की आपूर्ति और आवंटन व्यवस्था में सुधार की मांग की है।

यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण है, क्योंकि न्यूजप्रिंट की कीमत केवल आयात पर निर्भर नहीं करती। घरेलू मिलों की उत्पादन लागत और उनकी नियमित आपूर्ति भी बाजार में उपलब्ध कागज की मात्रा को प्रभावित कर सकती है। हालांकि, कोयले की आपूर्ति की समस्या को न्यूजप्रिंट की कीमतों में हुई पूरी बढ़ोतरी का अकेला कारण नहीं माना जा सकता।

कागज निर्माताओं का क्या कहना है?

न्यूजप्रिंट की लागत पर कागज निर्माताओं का नजरिया भी महत्वपूर्ण है। 19 अगस्त 2026 को प्रकाशित Exchange4media की रिपोर्ट में Emami Paper Mills ने घरेलू न्यूजप्रिंट की कीमत लगभग 58–62 रुपये प्रति किलो बताई थी। कंपनी ने रुपये की कमजोरी, आयातित रेशों और रसायनों की लागत, पूंजी खर्च तथा माल ढुलाई को कीमतों पर असर डालने वाले कारकों में शामिल किया था।

यह आंकड़ा निर्माता की ओर से बताई गई घरेलू न्यूजप्रिंट की कीमत का दायरा है। इसे सभी प्रकार के न्यूजप्रिंट की एक समान कीमत नहीं माना जाना चाहिए, क्योंकि गुणवत्ता, उत्पाद की किस्म, खरीद की मात्रा और अनुबंध के आधार पर वास्तविक कीमत अलग हो सकती है।

INS ने आयातित न्यूजप्रिंट पर लगने वाले 5% सीमा शुल्क को हटाने की मांग भी उठाई है। संगठन का तर्क है कि घरेलू उत्पादन देश की जरूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त नहीं है और आयात पर शुल्क प्रकाशकों की लागत बढ़ाता है। दूसरी ओर, घरेलू निर्माताओं की उत्पादन लागत और आपूर्ति की समस्याओं को भी ध्यान में रखना होगा। ऐसे में सरकार के सामने घरेलू उत्पादन और अखबार उद्योग की जरूरतों के बीच संतुलन बनाने का सवाल है।

विज्ञापन कारोबार में गिरावट ने बढ़ाई चुनौती

न्यूजप्रिंट की बढ़ती लागत ऐसे समय में चिंता का विषय है, जब प्रिंट मीडिया के विज्ञापन कारोबार में भी कमजोरी दिखाई दी है।

INS की 87वीं वार्षिक रिपोर्ट, 2025-26 के मुताबिक, उसके सदस्य प्रकाशनों का कुल विज्ञापन कारोबार 2025 में 14,773.74 करोड़ रुपये रहा, जबकि 2024 में यह 15,316.39 करोड़ रुपये था। इस तरह एक साल में विज्ञापन कारोबार में करीब 3.54% की गिरावट दर्ज की गई।

ये आंकड़े INS के सदस्य प्रकाशनों के रिपोर्ट किए गए विज्ञापन कारोबार के हैं, पूरे भारतीय विज्ञापन बाजार के नहीं। फिर भी वे उद्योग की कारोबारी स्थिति को समझने में मदद करते हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, विज्ञापन एजेंसियों के जरिये मिलने वाला कारोबार 2024 के 8,229.73 करोड़ रुपये से घटकर 2025 में 8,178.15 करोड़ रुपये रहा। इसके उलट, सीधे मिलने वाला विज्ञापन कारोबार 2,588.22 करोड़ रुपये से बढ़कर 2,685.74 करोड़ रुपये हो गया। यानी विज्ञापन के अलग-अलग स्रोतों में बदलाव एक जैसा नहीं रहा।

INS के आंकड़ों में भारतीय भाषा के दैनिक अखबारों की स्थिति भी महत्वपूर्ण है। विज्ञापन एजेंसियों के जरिये मिलने वाले कारोबार में भारतीय भाषा के दैनिक अखबारों की हिस्सेदारी 2025 में 57.57% रही, जबकि अंग्रेजी दैनिकों की हिस्सेदारी 43.90% थी। यह हिस्सेदारी एजेंसी से मिलने वाले विज्ञापन कारोबार की है, कुल विज्ञापन कारोबार की नहीं।

न्यूजप्रिंट की बढ़ती लागत और विज्ञापन कारोबार में गिरावट एक साथ होने पर प्रकाशकों के मुनाफे पर दबाव पड़ सकता है। लेकिन किसी कंपनी का वास्तविक मुनाफा उसके विज्ञापन राजस्व, प्रसार से होने वाली आय, कागज की खपत और दूसरे खर्चों पर निर्भर करेगा।

DB Corp के नतीजे क्या संकेत देते हैं?

DB Corp के वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही के आंकड़े बताते हैं कि कंपनी को विज्ञापन कारोबार में भी कुछ दबाव का सामना करना पड़ा। 16 अक्टूबर की कॉन्फ्रेंस कॉल में कंपनी ने बताया कि दूसरी तिमाही में उसका विज्ञापन राजस्व 411 करोड़ रुपये रहा, जबकि पिछले साल की समान तिमाही में यह 439 करोड़ रुपये था। प्रसार से मिलने वाला राजस्व भी 121 करोड़ रुपये से घटकर 116 करोड़ रुपये रहा।

कंपनी के प्रबंधन ने बताया कि त्योहारों के समय में बदलाव का असर तिमाही के विज्ञापन कारोबार पर पड़ा। नवरात्रि से जुड़े कुछ विज्ञापन खर्च सितंबर से अक्टूबर में खिसक गए। इसलिए इस गिरावट को केवल न्यूजप्रिंट की महंगाई या विज्ञापन बाजार की कमजोरी का परिणाम मानना सही नहीं होगा।

कंपनी ने यह भी कहा कि उसने अन्य खर्चों को नियंत्रण में रखने की कोशिश की है, लेकिन न्यूजप्रिंट की कीमत ऐसा क्षेत्र है जिस पर उसका सीधा नियंत्रण सीमित है। इससे यह समझ आता है कि बढ़ती लागत से निपटने के लिए प्रकाशक सिर्फ कागज की खरीद पर ही नहीं, बल्कि दूसरे खर्चों और विज्ञापन से होने वाली कमाई पर भी ध्यान दे रहे हैं।

क्या अखबारों की कीमत बढ़ेगी?

न्यूजप्रिंट की महंगाई के बीच सबसे बड़ा सवाल है कि क्या अखबारों के कवर प्राइस बढ़ेंगे। DB Corp के प्रबंधन ने कॉन्फ्रेंस कॉल में कहा कि कंपनी फिलहाल कीमत बढ़ाने को लेकर सावधानी बरत रही है। पवन अग्रवाल के मुताबिक, कवर प्राइस बढ़ने से अखबार की प्रतियों की संख्या में और गिरावट आ सकती है। कंपनी का कहना है कि वह अखबार को घरों के लिए किफायती बनाए रखना चाहती है।

हालांकि, एक कंपनी की रणनीति को पूरे उद्योग पर लागू नहीं माना जा सकता। अलग-अलग प्रकाशक विज्ञापन दरों में बदलाव, कागज के बेहतर इस्तेमाल, खर्चों में कटौती या कवर प्राइस में संशोधन जैसे विकल्पों पर विचार कर सकते हैं। अभी उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि सभी अखबार अपनी कीमतें बढ़ाने जा रहे हैं।

हिंदी और क्षेत्रीय अखबारों पर पड़ने वाले असर को समझने के लिए भी वास्तविक आंकड़ों की जरूरत है। हर प्रकाशक की खरीद क्षमता, प्रसार, विज्ञापन बाजार और उत्पादन लागत अलग होती है। इसलिए छोटे और क्षेत्रीय अखबारों पर सबसे ज्यादा असर पड़ने का निष्कर्ष निकालने से पहले उनके वास्तविक खर्च और कमाई की तुलना करनी होगी।

आगे क्या?

न्यूजप्रिंट की कीमतों का अगला रुख अंतरराष्ट्रीय बाजार, आयात की लागत, रुपये की विनिमय दर, घरेलू मिलों की उत्पादन क्षमता और कच्चे माल की उपलब्धता पर निर्भर करेगा। DB Corp के प्रबंधन को अगली दो तिमाहियों में कीमतों में 2–3% नरमी की उम्मीद है, लेकिन इसे पूरे उद्योग के लिए निश्चित अनुमान नहीं माना जा सकता।

दूसरी ओर, INMA की कोयला आपूर्ति संबंधी मांग से पता चलता है कि घरेलू उत्पादन में भी ऐसी समस्याएं हैं जो कागज की उपलब्धता को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे में प्रकाशकों के लिए चुनौती सिर्फ सस्ता कागज खरीदने की नहीं, बल्कि नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करने और विज्ञापन से होने वाली कमाई को संभालने की भी है।

कुल मिलाकर, न्यूजप्रिंट की बढ़ती कीमत भारतीय अखबार उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण कारोबारी चुनौती है। सितंबर 2026 में सरकारी थोक मूल्य सूचकांक में सालाना 16.38% बढ़ोतरी, DB Corp की खरीद लागत में करीब 20.8% इजाफा और INS सदस्य प्रकाशनों के विज्ञापन कारोबार में 2025 के दौरान 3.54% गिरावट इस चुनौती के अलग-अलग पहलुओं को दिखाते हैं, लेकिन इन आंकड़ों को एक ही पैमाने पर नहीं रखा जा सकता।

आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि प्रकाशक बढ़ती लागत का सामना कैसे करते हैं, घरेलू न्यूजप्रिंट निर्माता उत्पादन और आपूर्ति की समस्याओं से कैसे निपटते हैं और विज्ञापन बाजार में सुधार से अखबारों को कितनी राहत मिलती है।

 

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गिरीश अग्रवाल बोले- न्यूजप्रिंट की कीमतें बनीं चिंता, विज्ञापन कारोबार में तेजी की उम्मीद

कंपनी के डायरेक्टर गिरीश अग्रवाल का कहना है कि नवरात्र के त्योहार का समय पिछले साल के मुकाबले इस बार बदलने से दूसरी तिमाही के नतीजों पर असर पड़ा है।

Last Modified:
Thursday, 22 October, 2026
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डीबी कॉर्प को चालू वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में विज्ञापन कारोबार में बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद है। कंपनी के डायरेक्टर गिरीश अग्रवाल का कहना है कि नवरात्र के त्योहार का समय पिछले साल के मुकाबले इस बार बदलने से दूसरी तिमाही के नतीजों पर असर पड़ा है। पिछले साल नवरात्र सितंबर में था, जबकि इस साल यह अक्टूबर में पड़ा है। कंपनी के मुताबिक, इस बदलाव के कारण करीब 40 करोड़ रुपये का विज्ञापन कारोबार एक तिमाही से दूसरी तिमाही में चला गया है। वहीं, कंपनी के डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर पवन अग्रवाल ने बताया कि दूसरी तिमाही में कंपनी का कुल राजस्व 614 करोड़ रुपये रहा, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 635 करोड़ रुपये था।

16 अक्टूबर को वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही के नतीजों पर आयोजित निवेशकों और विश्लेषकों की कॉन्फ्रेंस कॉल में दोनों अधिकारियों ने कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन, विज्ञापन बाजार, अखबारों की प्रसार संख्या, न्यूजप्रिंट की बढ़ती लागत और डिजिटल कारोबार की योजनाओं पर विस्तार से बात की।

दूसरी तिमाही में 614 करोड़ रुपये रहा राजस्व

पवन अग्रवाल ने बताया कि सितंबर 2026 को समाप्त दूसरी तिमाही में डीबी कॉर्प का कुल समेकित राजस्व 614 करोड़ रुपये रहा। पिछले वित्त वर्ष की इसी तिमाही में यह 635 करोड़ रुपये था। हालांकि, कंपनी का एबिटा 115 करोड़ रुपये से बढ़कर 124 करोड़ रुपये हो गया। एबिटा से मतलब कारोबार से होने वाली कमाई से है, जिसमें ब्याज, टैक्स और कुछ अन्य खर्चों को शामिल नहीं किया जाता।

दूसरी ओर, कंपनी का कर चुकाने के बाद मुनाफा 93 करोड़ रुपये से घटकर 69 करोड़ रुपये रह गया। पवन अग्रवाल ने बताया कि नवरात्र के समय में बदलाव को ध्यान में रखते हुए तुलना की जाए तो दूसरी तिमाही में कंपनी के विज्ञापन राजस्व और एबिटा में एकल अंक में बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

कंपनी की विज्ञापन से होने वाली आय 439 करोड़ रुपये से घटकर 411 करोड़ रुपये रही। वहीं, अखबारों की प्रसार संख्या से मिलने वाला राजस्व 121 करोड़ रुपये से घटकर 116 करोड़ रुपये पर आ गया।

पवन अग्रवाल के मुताबिक, कंपनी अपने विज्ञापनदाताओं के साथ संबंध मजबूत करने और प्रमुख बाजारों में उनकी भागीदारी बनाए रखने पर ध्यान दे रही है। साथ ही, बढ़ती लागत के असर को कम करने के लिए खरीद प्रक्रिया को बेहतर बनाने, खर्चों पर नियंत्रण और कागज के भंडार का सही प्रबंधन करने की कोशिश की जा रही है।

पहली छमाही में राजस्व बढ़ा, मुनाफे में गिरावट

वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही में कंपनी का कुल समेकित राजस्व 1,246 करोड़ रुपये रहा, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 1,222 करोड़ रुपये था। विज्ञापन से होने वाली आय भी 832 करोड़ रुपये से बढ़कर 843 करोड़ रुपये हो गई।

हालांकि, प्रसार से होने वाला राजस्व 241 करोड़ रुपये से घटकर 236 करोड़ रुपये रह गया। पहली छमाही में एबिटा 297 करोड़ रुपये के मुकाबले 289 करोड़ रुपये रहा, जबकि कर चुकाने के बाद मुनाफा 174 करोड़ रुपये से घटकर 169 करोड़ रुपये पर आ गया।

रेडियो कारोबार की बात करें तो दूसरी तिमाही में इससे 39 करोड़ रुपये का राजस्व मिला, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 43 करोड़ रुपये था। रेडियो कारोबार का एबिटा भी 13 करोड़ रुपये से घटकर 11 करोड़ रुपये रहा।

हालांकि, पहली छमाही में रेडियो कारोबार का राजस्व 82 करोड़ रुपये पर स्थिर रहा। इस दौरान एबिटा 24 करोड़ रुपये से बढ़कर 26 करोड़ रुपये हो गया। पवन अग्रवाल ने कहा कि कंपनी डिजिटल कारोबार को भी भविष्य में वृद्धि के एक अहम माध्यम के तौर पर देख रही है। इसके लिए सामग्री, तकनीक और उपयोगकर्ताओं के अनुभव को बेहतर बनाने पर ध्यान दिया जा रहा है।

विज्ञापन कारोबार में एकल अंक से दोहरे अंक की बढ़ोतरी का लक्ष्य

गिरीश अग्रवाल ने कहा कि नवरात्र के समय में बदलाव के कारण दूसरी तिमाही में सालाना आधार पर विज्ञापन राजस्व की तुलना प्रभावित हुई है। उनके मुताबिक, करीब आठ दिन के इस बदलाव से लगभग 40 करोड़ रुपये का विज्ञापन कारोबार तीसरी तिमाही में चला गया है।

उन्होंने कहा कि त्योहारों के दौरान विज्ञापन कारोबार की रफ्तार अच्छी दिख रही है। कंपनी को उम्मीद है कि यह रफ्तार आगे भी बनी रहेगी। पूरे वित्त वर्ष में विज्ञापन राजस्व में एकल अंक के ऊपरी स्तर से लेकर शुरुआती दोहरे अंक तक की वृद्धि हासिल करने की कंपनी की कोशिश है।

हालांकि, गिरीश अग्रवाल ने मानसून और भू-राजनीतिक परिस्थितियों को लेकर चिंता भी जताई। उन्होंने कहा कि कुछ क्षेत्रों में बारिश का सिलसिला जारी है, जिससे कारोबार पर असर पड़ सकता है। इसके बावजूद उन्हें देश की आर्थिक गतिविधियों और आने वाले दो तिमाहियों के प्रदर्शन को लेकर उम्मीद है।

उन्होंने यह भी बताया कि कुछ राज्यों में पंचायत चुनावों के कारण लागू आचार संहिता से सरकारी विज्ञापन प्रभावित हुए हैं। इस वजह से भी दूसरी तिमाही में विज्ञापन कारोबार की तुलना करना आसान नहीं है।

न्यूजप्रिंट की कीमत में करीब 21% की बढ़ोतरी

कंपनी के लिए बढ़ती न्यूजप्रिंट लागत एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। गिरीश अग्रवाल ने बताया कि पिछले साल के मुकाबले न्यूजप्रिंट की औसत कीमत लगभग 47,000 रुपये प्रति टन से बढ़कर करीब 57,000 रुपये प्रति टन हो गई है। इस तरह इसमें लगभग 20.8%, यानी करीब 21% की बढ़ोतरी हुई है।

उन्होंने इसके पीछे भू-राजनीतिक परिस्थितियों, आयातित कागज की बढ़ती कीमतों और माल ढुलाई की ऊंची लागत को प्रमुख कारण बताया। उनके मुताबिक, आयातित कागज की कीमत बढ़ने पर घरेलू बाजार में भी कीमतें बढ़ जाती हैं।

कंपनी को उम्मीद है कि तीसरी और चौथी तिमाही में न्यूजप्रिंट की कीमतों में करीब 2% से 3% तक की नरमी आ सकती है। हालांकि, यह गिरावट इससे ज्यादा होने की उम्मीद नहीं है। पिछले साल की तीसरी तिमाही के मुकाबले चालू वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही में न्यूजप्रिंट की लागत लगभग 18% से 20% ज्यादा रह सकती है।

आपूर्ति को लेकर भी बाजार में दबाव है। गिरीश अग्रवाल ने कहा कि जब बाजार में कागज की उपलब्धता सीमित होती है, तो कंपनियों के लिए कीमतों पर बेहतर शर्तें हासिल करना मुश्किल हो जाता है।

उन्होंने बताया कि घरेलू न्यूजप्रिंट का भंडार आम तौर पर कुछ महीनों के लिए रखा जाता है, जबकि आयातित कागज का भंडार लगभग एक तिमाही के लिए रहता है।

गिरीश अग्रवाल के मुताबिक, कंपनी ने कर्मचारियों और अन्य खर्चों पर नियंत्रण रखा है। कई मदों में खर्च कम करने के प्रयास किए गए हैं, लेकिन न्यूजप्रिंट की कीमतें ऐसी लागत हैं जिन पर कंपनी का सीधा नियंत्रण नहीं है।

अखबार की प्रसार संख्या करीब 38 लाख प्रतियां

अखबारों की प्रसार संख्या में लंबे समय से बड़ी बढ़ोतरी नहीं होने के सवाल पर गिरीश अग्रवाल ने स्वीकार किया कि कोविड के बाद खोई हुई प्रसार संख्या वापस हासिल करने के बावजूद कंपनी आगे बहुत ज्यादा वृद्धि नहीं कर पाई है।

उन्होंने बताया कि कंपनी की प्रसार संख्या करीब 38 लाख प्रतियों के आसपास है। चर्चा के दौरान उन्होंने मौजूदा संख्या 37.68 लाख प्रतियां बताई। पिछली तिमाही के मुकाबले करीब 30,000 प्रतियों का अंतर भी सामने आया।

गिरीश अग्रवाल ने कहा कि कंपनी प्रसार संख्या बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। खास तौर पर अपने प्रमुख बाजारों में मौजूदा संख्या बनाए रखने पर जोर है। कुछ गैर-प्रमुख बाजारों में प्रसार संख्या में मामूली गिरावट को लेकर कंपनी उतनी चिंतित नहीं है, लेकिन मुख्य बाजारों में अपनी स्थिति मजबूत बनाए रखना उसकी प्राथमिकता है।

उन्होंने यह भी कहा कि कंपनी का उद्देश्य सिर्फ प्रतियों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि पाठकों के साथ जुड़ाव को बेहतर बनाना भी है। उनके मुताबिक, करीब 38 लाख प्रतियों के जरिए कंपनी तक बड़ी संख्या में पाठकों की पहुंच है। इस पहुंच का विज्ञापनदाताओं के लिए बेहतर इस्तेमाल करना कंपनी की रणनीति का हिस्सा है।

उन्होंने कहा कि अगर किसी बाजार में डीबी कॉर्प की प्रसार संख्या स्थिर रहती है, जबकि प्रतिस्पर्धी की संख्या ज्यादा घटती है, तो उस बाजार में कंपनी की हिस्सेदारी बढ़ सकती है। इससे विज्ञापन कारोबार में भी फायदा मिल सकता है।

अखबारों की कीमत बढ़ाने की फिलहाल योजना नहीं

अखबारों के कवर प्राइस यानी प्रति प्रति कीमत बढ़ाने के सवाल पर गिरीश अग्रवाल ने स्पष्ट किया कि फिलहाल कंपनी ऐसा करने के पक्ष में नहीं है।

उन्होंने कहा कि अगर अखबारों की कीमत बढ़ाई जाती है, तो इससे प्रसार संख्या में गिरावट और तेज हो सकती है। कंपनी नहीं चाहती कि अखबार आम परिवारों के लिए महंगा हो जाए।

गिरीश अग्रवाल के मुताबिक, एक ग्राहक अखबार पर औसतन हर महीने करीब 150 से 170 रुपये खर्च करता है। पुराने अखबार बेचने से कुछ रकम वापस मिल जाती है, जिसके बाद उसका वास्तविक खर्च लगभग 100 रुपये रह जाता है। इस तरह सालाना वास्तविक खर्च करीब 1,200 रुपये बैठता है।

उन्होंने कहा कि कंपनी इस खर्च को और बढ़ाकर पाठकों पर अतिरिक्त बोझ नहीं डालना चाहती। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कीमत बढ़ाने का विकल्प कंपनी के पास मौजूद है, लेकिन फिलहाल उसका इस्तेमाल करने की योजना नहीं है।

विज्ञापनदाताओं को प्रीमियम पेज पर लाने की रणनीति

अखबारों में विज्ञापन की कीमत बढ़ाने के बारे में गिरीश अग्रवाल ने बताया कि कंपनी विज्ञापनदाताओं को सामान्य पेज से ज्यादा प्रमुखता वाले पेजों पर विज्ञापन देने के लिए प्रोत्साहित कर रही है।

उदाहरण के तौर पर, अगर कोई विज्ञापनदाता अंदर के पेज पर विज्ञापन के लिए 100 रुपये खर्च कर रहा है, तो कंपनी उसे 140 रुपये में पहले पेज जैसे ज्यादा प्रमुख स्थान पर विज्ञापन देने का विकल्प देती है। इससे विज्ञापनदाता को अधिक लोगों तक पहुंचने का मौका मिलता है और कंपनी को प्रति विज्ञापन ज्यादा राजस्व हासिल होता है।

उन्होंने बताया कि कंपनी अखबार के तीसरे पेज, पीछे के पेज और पहले पेज पर विज्ञापन के लिए बेहतर कीमत हासिल करने की कोशिश कर रही है। पहले पेज पर विशेष कवर या जैकेट विज्ञापनों से भी ज्यादा राजस्व जुटाने पर ध्यान दिया जा रहा है।

उनके मुताबिक, कंपनी की रणनीति विज्ञापनों की संख्या बढ़ाने के साथ-साथ जहां संभव हो, प्रति विज्ञापन मिलने वाली कीमत में भी सुधार करने की है।

डिजिटल ऐप के सब्सक्रिप्शन पर प्रयोग जारी

डीबी कॉर्प अपने डिजिटल कारोबार में कमाई के नए रास्ते तलाश रही है। गिरीश अग्रवाल ने बताया कि कंपनी ने अपने ऐप के सब्सक्रिप्शन की कीमत 149 रुपये से बढ़ाकर 199 रुपये करने का प्रयोग किया है। हालांकि, यह बदलाव सभी जगह एक समान लागू नहीं किया गया है। कुछ जगहों पर इससे कम मासिक कीमत भी आजमाई गई है।

उन्होंने कहा कि डिजिटल कारोबार में कंपनी अलग-अलग प्रयोग कर रही है। डिजिटल मंच पर करीब एक लाख सब्सक्राइबर के समूह के साथ भी अलग-अलग कीमतों और योजनाओं को परखा जा सकता है। शुरुआती नतीजे संतोषजनक हैं, लेकिन कीमतों में बदलाव से राजस्व और सब्सक्राइबर संख्या पर क्या असर पड़ेगा, इसका आकलन करना अभी जल्दबाजी होगी।

उनके मुताबिक, आने वाली कुछ तिमाहियों में इन प्रयोगों के नतीजे ज्यादा स्पष्ट हो सकते हैं।

डिजिटल कारोबार की कमाई के बारे में उन्होंने बताया कि कंपनी तीन प्रमुख रास्तों पर काम कर रही है—विज्ञापन, पेड सब्सक्रिप्शन और तकनीकी कंपनियों के साथ साझेदारी। फिलहाल ये सभी कारोबार शुरुआती चरण में हैं।

उन्होंने कहा कि कंपनी ऐप पर विज्ञापन भी दिखा रही है, लेकिन इस बात का ध्यान रखा जा रहा है कि विज्ञापनों के कारण पैसे देकर सेवा लेने वाले ग्राहकों का अनुभव खराब न हो। कंपनी चाहती है कि विज्ञापन, सब्सक्रिप्शन और तकनीकी साझेदारी तीनों के बीच संतुलन बना रहे।

डिजिटल ऐप के मासिक सक्रिय उपयोगकर्ताओं में गिरावट

कंपनी के डिजिटल ऐप के मासिक सक्रिय उपयोगकर्ताओं यानी एमएयू की संख्या घटने के सवाल पर गिरीश अग्रवाल ने बताया कि कंपनी ने डिजिटल कारोबार में मार्केटिंग पर होने वाला खर्च कम किया है।

उन्होंने कहा कि कंपनी चाहती है कि उसके मीडिया ब्रांड अपनी सामग्री और विश्वसनीयता के आधार पर पाठकों को जोड़े रखें और स्वाभाविक रूप से उपयोगकर्ताओं की संख्या बढ़े। मार्केटिंग खर्च कम करने का असर भी सक्रिय उपयोगकर्ताओं की संख्या पर पड़ा है।

इसके अलावा, सब्सक्रिप्शन और ग्राहकों के लिए अलग-अलग प्रयोग भी किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि तिमाही आधार पर उपयोगकर्ताओं की संख्या में करीब 3% से 4% का अंतर देखने को मिल रहा है।

डिजिटल कारोबार को लेकर उन्होंने कहा कि कंपनी ने इसके लिए एक टीम बनाई है और कारोबार को आगे बढ़ाने के लिए काम जारी है। हालांकि, टीम में कुछ बदलाव भी हुए हैं, क्योंकि उम्मीदों और वास्तविक प्रदर्शन के बीच अंतर रहा।

गिरीश अग्रवाल के मुताबिक, डिजिटल विज्ञापन बाजार में फिलहाल काफी अनिश्चितता है। एक ओर विज्ञापन के लिए उपलब्ध जगह बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर डीबी कॉर्प जैसे ब्रांड अपने विज्ञापन स्थान को सामान्य उत्पाद की तरह बेचने के बजाय बेहतर कीमत हासिल करना चाहते हैं। ऐसे में डिजिटल कारोबार की दिशा और संभावनाओं पर अभी अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।

उन्होंने कहा कि डिजिटल कारोबार से जुड़े आंकड़ों को निवेशकों के साथ साझा करने के मुद्दे को वह अगली बोर्ड बैठक में उठाएंगे। कंपनी पहले भी प्रतिस्पर्धा को ध्यान में रखते हुए कुछ कारोबारी जानकारियों को सार्वजनिक न करने का फैसला ले चुकी है।

उत्तर प्रदेश चुनाव से डिजिटल कारोबार को उम्मीद

आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से मिलने वाले विज्ञापन अवसरों पर गिरीश अग्रवाल ने कहा कि चुनावी विज्ञापनों की मात्रा का पहले से अनुमान लगाना मुश्किल है। इसके बावजूद कंपनी उत्तर प्रदेश में पाठकों के साथ अपना जुड़ाव बढ़ाने पर काम कर रही है।

उन्होंने बताया कि राज्य में कंपनी के डिजिटल मंच पर अच्छी पहुंच है और उसके पत्रकारों का नेटवर्क भी काफी मजबूत है। उनका दावा है कि उत्तर प्रदेश में कंपनी की जमीनी समाचार कवरेज कई अन्य समाचार संगठनों के मुकाबले काफी व्यापक है।

गिरीश अग्रवाल को उम्मीद है कि चुनाव के दौरान उत्तर प्रदेश में कंपनी के डिजिटल सब्सक्राइबर की संख्या बढ़ सकती है। हालांकि, उन्होंने चुनावी विज्ञापन से होने वाली संभावित कमाई का कोई निश्चित आंकड़ा नहीं दिया।

एफएमसीजी विज्ञापनों में दबाव, आभूषण और स्वास्थ्य क्षेत्र में मजबूती

विभिन्न उद्योगों से मिलने वाले विज्ञापनों के बारे में गिरीश अग्रवाल ने बताया कि दूसरी तिमाही में एफएमसीजी यानी रोजमर्रा के इस्तेमाल की वस्तुओं के विज्ञापन में करीब 2% की गिरावट रही। हालांकि, त्योहारों के समय में बदलाव को ध्यान में रखते हुए उन्होंने इस तिमाही की तुलना को पूरी तरह सही पैमाना नहीं माना। उनके मुताबिक, इस असर को ध्यान में रखने पर एफएमसीजी विज्ञापन कारोबार की स्थिति एकल अंक की वृद्धि के आसपास बैठती है।

उन्होंने बताया कि रियल एस्टेट के विज्ञापनों में एकल अंक की वृद्धि रही। अगर त्योहारों के समय में बदलाव नहीं होता, तो इस क्षेत्र में दोहरे अंक की वृद्धि देखने को मिल सकती थी।

आभूषण क्षेत्र से विज्ञापन कारोबार अच्छा रहा, क्योंकि इस उद्योग में त्योहारों के लिए विज्ञापन गतिविधियां जल्दी शुरू हो जाती हैं। बैंकिंग और वित्तीय सेवाओं के विज्ञापन में भी अच्छा प्रदर्शन रहा। खास तौर पर आईपीओ से जुड़े विज्ञापनों में पिछले साल के मुकाबले करीब 50% की वृद्धि हुई। हालांकि, गिरीश अग्रवाल ने स्पष्ट किया कि इस कारोबार का कुल आकार छोटा होने के कारण इतनी तेज वृद्धि को पूरे विज्ञापन कारोबार का संकेत नहीं माना जाना चाहिए।

स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में भी दोहरे अंक की मजबूत वृद्धि रही। दूसरी ओर, ऑटोमोबाइल क्षेत्र का कारोबार लगभग स्थिर रहा, जबकि शिक्षा क्षेत्र में एकल अंक की वृद्धि दर्ज की गई। एफएमसीजी, लाइफस्टाइल और बड़े खुदरा बाजारों से जुड़े विज्ञापनों में दबाव देखने को मिला।

कंपनी के पास 1,120 करोड़ रुपये की नकदी

कंपनी की नकदी, निवेश और शेयरधारकों को लाभांश देने की योजना पर गिरीश अग्रवाल ने बताया कि डीबी कॉर्प के पास फिलहाल नकदी और बैंक जमा के रूप में करीब 1,120 करोड़ रुपये हैं।

उन्होंने कहा कि कंपनी को आने वाली कुछ तिमाहियों में बड़े पूंजीगत खर्च की जरूरत नहीं दिख रही है, क्योंकि उत्पादन मशीनें और दूसरे जरूरी उपकरण पहले से उपलब्ध हैं। उनके मुताबिक, अगले चार से पांच तिमाहियों में भी किसी बड़े पूंजीगत खर्च की संभावना नहीं है।

गिरीश अग्रवाल ने बताया कि कंपनी पहली तिमाही में प्रति शेयर 5 रुपये का अंतरिम लाभांश पहले ही दे चुकी है। आगे नकदी का कितना हिस्सा शेयरधारकों को दिया जाएगा, इसका फैसला बोर्ड करेगा।

अन्य आय में दर्ज करीब 13.39 करोड़ रुपये के लाभ पर उन्होंने बताया कि अहमदाबाद स्थित कंपनी के पंजीकृत कार्यालय का पट्टा समाप्त कर दिया गया है। संबंधित भवन के मालिक पुनर्विकास करने जा रहे हैं। इस कारण कंपनी ने पट्टे से जुड़ी परिसंपत्ति और देनदारी को अपने खातों से हटाया और लेखांकन नियमों के अनुसार करीब 13.39 करोड़ रुपये का लाभ अन्य आय में दर्ज किया।

डिजिटल कारोबार में निवेश जारी रहेगा

गिरीश अग्रवाल ने कहा कि पिछले दो से तीन वर्षों में डिजिटल कारोबार के लिए किए गए प्रयोगों में कुछ सफल रहे हैं और कुछ उम्मीद के मुताबिक नतीजे नहीं दे पाए। इसके बावजूद कंपनी डिजिटल कारोबार को लेकर प्रतिबद्ध है और इसमें निवेश जारी रखेगी।

उन्होंने कहा कि कंपनी का प्रयास है कि सही समय पर इन निवेशों से कारोबार को फायदा मिले। डिजिटल कारोबार में विज्ञापन, सब्सक्रिप्शन और तकनीकी कंपनियों के साथ साझेदारी को साथ लेकर चलने की रणनीति बनाई जा रही है।

वहीं, पवन अग्रवाल ने समापन टिप्पणी में निवेशकों और विश्लेषकों का धन्यवाद किया। उन्होंने कहा कि कंपनी का निवेशक संबंध विभाग आगे भी निवेशकों के सवालों का जवाब देने के लिए उपलब्ध रहेगा। दोनों अधिकारियों ने निवेशकों और उनके परिवारों को दिवाली की शुभकामनाएं भी दीं।

 

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डी.बी. कॉर्प का मुनाफा घटकर 69 करोड़ रुपये : राजस्व 614 करोड़

डी.बी. कॉर्प ने वित्त वर्ष 2027 की दूसरी तिमाही में 614 करोड़ रुपये का समेकित राजस्व दर्ज किया। विज्ञापन आय और मुनाफे में सालाना आधार पर गिरावट दर्ज हुई है।

Last Modified:
Thursday, 15 October, 2026
dbcorp

दैनिक भास्कर (Dainik Bhaskar), दिव्य भास्कर (Divya Bhaskar) और दिव्य मराठी (Divya Marathi) का प्रकाशन करने वाली डी.बी. कॉर्प (D.B. Corp) ने वित्त वर्ष 2027 की दूसरी तिमाही में 614 करोड़ रुपये का समेकित राजस्व दर्ज किया है। पिछले साल की समान तिमाही में यह 635 करोड़ रुपये था।

कंपनी की विज्ञापन आय 411 करोड़ रुपये रही, जो एक साल पहले 439 करोड़ रुपये थी। सर्कुलेशन आय भी 121 करोड़ रुपये से घटकर 116 करोड़ रुपये रह गई। इस दौरान कंपनी का शुद्ध मुनाफा 93 करोड़ रुपये से घटकर 69 करोड़ रुपये रहा, जबकि एबिट्डा (EBITDA) 158 करोड़ रुपये से घटकर 124 करोड़ रुपये हो गया।

कंपनी ने बताया कि विज्ञापन आय और एबिट्डा में सालाना आधार पर आई गिरावट मुख्य रूप से नवरात्रि के त्योहार की तारीखों में बदलाव के कारण रही। पिछले साल नवरात्रि दूसरी तिमाही में था, जबकि इस साल यह तीसरी तिमाही में है। कंपनी के मुताबिक, इस प्रभाव को हटाकर समान आधार पर विज्ञापन आय और एबिट्डा में एकल अंक की सकारात्मक वृद्धि दर्ज हुई।

वित्त वर्ष 2027 की पहली छमाही में डी.बी. कॉर्प का समेकित राजस्व 1,222 करोड़ रुपये से बढ़कर 1,246 करोड़ रुपये हो गया। इस दौरान विज्ञापन आय 832 करोड़ रुपये से बढ़कर 843 करोड़ रुपये रही। सर्कुलेशन आय 241 करोड़ रुपये के मुकाबले 236 करोड़ रुपये रही, जबकि शुद्ध मुनाफा 174 करोड़ रुपये से घटकर 169 करोड़ रुपये रहा।

कंपनी ने तिमाही के दौरान न्यूजप्रिंट की लागत में भी 14 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की। इसके पीछे मुख्य वजह भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं को बताया गया है। बढ़ी हुई लागत के असर को नियंत्रित करने के लिए कंपनी लागत अनुकूलन, परिचालन दक्षता और इन्वेंटरी प्रबंधन पर लगातार ध्यान दे रही है।

डी.बी. कॉर्प लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर सुधीर अग्रवाल (Sudhir Agarwal) ने कहा कि कुछ हिस्सों में सामान्य से कम मानसून के बावजूद कंपनी की मजबूत बाजार मौजूदगी, पाठकों के साथ संबंध और विज्ञदाताओं के साथ साझेदारी ने प्रदर्शन को मजबूती दी। उन्होंने कहा कि आने वाली तिमाहियों में त्योहारी सीजन से विज्ञापन गतिविधियों और उपभोक्ता खर्च को समर्थन मिलने की उम्मीद है।

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क्षेत्रीय अखबारों के सामने विज्ञापन की चुनौती: स्थानीय बाजार में टिके रहने की लड़ाई

भारत में अखबार का कारोबार दो रफ्तारों पर चल रहा है। बड़े क्षेत्रीय समूहों ने अप्रैल-जून 2026 की तिमाही में विज्ञापन राजस्व में दोहरे अंकों की बढ़त दर्ज की।

Last Modified:
Thursday, 15 October, 2026
Newspaper8

भारत में अखबार का कारोबार दो रफ्तारों पर चल रहा है। बड़े क्षेत्रीय समूहों ने अप्रैल-जून 2026 की तिमाही में विज्ञापन राजस्व में दोहरे अंकों की बढ़त दर्ज की। दैनिक भास्कर के विज्ञापन राजस्व में 10% और दैनिक जागरण में 13% बढ़त रही। दूसरी तरफ सरकारी विज्ञापन, महंगे न्यूज़प्रिंट और डिजिटल मंचों का दबाव उन अखबारों पर ज्यादा है जिनके पास बड़ा ब्रैंड और अतिरिक्त आय के स्रोत नहीं हैं। सितंबर 2026 में सार्वजनिक हुई इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी (INS) की वार्षिक रिपोर्ट इस दबाव की तस्वीर देती है।

बाजार की तस्वीर: विज्ञापन का बड़ा बाजार, छोटा प्रिंट का हिस्सा 

डेंट्सू की डिजिटल ऐडवर्टाइजिंग रिपोर्ट 2026 के अनुसार 2025 में भारत का कुल विज्ञापन खर्च ₹1,21,339 करोड़ रहा। इसमें डिजिटल ₹71,621 करोड़ (59%) और प्रिंट ₹16,594 करोड़ (14%) था। रिपोर्ट का अनुमान है कि 2027 तक प्रिंट की हिस्सेदारी 10% रह जाएगी।

पिच-मैडिसन रिपोर्ट (PMAR) 2026 की परिभाषा अलग है। उसके अनुसार 2025 में प्रिंट का विज्ञापन खर्च ₹20,866 करोड़ था और मात्रा 336 मिलियन कॉलम सेंटीमीटर रही। राजस्व को सहारा प्रीमियम जगहों से मिला, जैसे फ्रंट पेज और जैकेट। 2026 के लिए रिपोर्ट का अनुमान ₹21,388 करोड़ है। इसके मुताबिक प्रिंट अब "व्यापक पहुंच" से ज्यादा "विश्वसनीयता और चुनिंदा बाजारों में असर" का माध्यम बन रहा है।

FICCI-EY की 2026 रिपोर्ट में 2025 में प्रिंट इंडस्ट्री ₹25,900 करोड़ की थी। इसमें विज्ञापन ₹17,930 करोड़ और सर्कुलेशन राजस्व ₹8,010 करोड़ रहा। प्रिंट कंपनियों के राजस्व में डिजिटल का औसत हिस्सा करीब 6% है। रिपोर्ट आगे प्रिंट विज्ञापन में सालाना करीब 2% की मामूली बढ़त का अनुमान देती है।

भाषाई अखबार: INS रिपोर्ट के आंकड़े

INS की 87वीं वार्षिक रिपोर्ट (2025-26) के अनुसार 2025 में उसके सदस्य प्रकाशनों का कुल विज्ञापन कारोबार ₹14,773.74 करोड़ रहा। इसमें मान्यता प्राप्त एजेंसियों से ₹8,178.15 करोड़ आया:

  • अंग्रेजी दैनिक: ₹3,590.29 करोड़, जो एजेंसी कारोबार का 43.9% है
  • भारतीय भाषाओं के दैनिक: ₹4,544.61 करोड़

बाकी कारोबार का ब्योरा:

  • गैर-मान्यता प्राप्त एजेंसियां: ₹2,361.03 करोड़
  • सीधे विज्ञापन: ₹2,685.74 करोड़

वैसे बता दें कि रिपोर्ट इन सीधे विज्ञापनों में स्थानीय विज्ञापनदाताओं का अलग ब्योरा नहीं देती। यह भी ध्यान रहे कि 2025 के आंकड़े 526 सदस्य प्रकाशनों ने दिए। यह पूरे बाजार का हूबहू पैमाना नहीं है।

बड़े समूह: 2026-27 की पहली तिमाही बनाम 2025-26

  • डीबी कॉर्प: अप्रैल-जून 2026 में विज्ञापन राजस्व ₹432 करोड़ रहा, जबकि अप्रैल-जून 2025 में ₹393.3 करोड़ था (10% वृद्धि)। सर्कुलेशन राजस्व लगभग स्थिर रहा (₹120.4 करोड़ बनाम ₹120.3 करोड़)। कंपनी ने रियल एस्टेट, ज्वेलरी, FMCG और सरकारी विज्ञापनों में मांग बताई। न्यूज़प्रिंट पर "कुछ दबाव" के बावजूद EBITDA मार्जिन 23.6% से बढ़कर 26.1% हुआ।
  • जागरण प्रकाशन: समेकित राजस्व ₹460.05 करोड़ से बढ़कर ₹499.35 करोड़ (करीब 8.5%) हुआ। दैनिक जागरण का विज्ञापन राजस्व ₹209 करोड़ से ₹236 करोड़ (13%) रहा, पर सर्कुलेशन राजस्व ₹71 करोड़ पर स्थिर रहा। कंपनी ने न्यूज़प्रिंट की ऊंची कीमतों को मुनाफे पर दबाव की वजह बताया। दैनिक जागरण का परिचालन मार्जिन 22.05% से घटकर 19.05% रह गया।

ये बड़ी सूचीबद्ध कंपनियां हैं। इनके नतीजे जिला-स्तरीय अखबारों की हालत का पैमाना नहीं हैं।

स्थानीय बजट और डिजिटल प्रतिस्पर्धा

छोटे कारोबारियों का पैसा तेजी से डिजिटल की तरफ जा रहा है। PMAR के अनुसार 2025 में MSME का डिजिटल विज्ञापन खर्च ₹35,814 करोड़ रहा, और 2026 में इसके ₹42,976 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। उसी रिपोर्ट में पूरे प्रिंट इंडस्ट्री का 2025 का विज्ञापन खर्च ₹20,866 करोड़ था। यानी MSME का डिजिटल खर्च अकेले पूरे प्रिंट बाजार से बड़ा है।

INS ने डिजिटल विज्ञापन में बिग टेक की प्रभुत्वशाली स्थिति को लेकर प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) में शिकायत की है। आयोग ने प्रथम दृष्टया इसे जांच योग्य माना है, नतीजा बाकी है। प्रिंट की प्रभावशीलता पर INS के साल भर के अभियान के पहले क्रिएटिव 1 जुलाई 2026 को सदस्यों को भेजे गए।

सरकारी विज्ञापन: दर बढ़ी, बजट नहीं

केंद्र सरकार ने नवंबर 2025 में प्रिंट विज्ञापन दरें 26% बढ़ाईं। एक लाख प्रसार वाले दैनिक के लिए श्वेत-श्याम विज्ञापन की दर ₹47.40 से ₹59.68 प्रति वर्ग सेमी हो गई। INS का कहना है कि प्रिंट को मिलने वाला कुल सरकारी विज्ञापन बजट उसी अनुपात में नहीं बढ़ा। रिपोर्ट यह नहीं बताती कि दर बढ़ने से विज्ञापनों की संख्या घटी या नहीं।

INS सदस्यों को 2025 में मिला सरकारी-संबंधित कारोबार:

  • केंद्रीय संचार ब्यूरो (CBC, पूर्व DAVP): ₹124.91 करोड़
  • राज्य सरकारें: ₹803.49 करोड़
  • टेंडर विज्ञापन: ₹430.15 करोड़
  • राज्य सरकारों की PSU: ₹160.20 करोड़
  • केंद्रीय PSU: ₹23.15 करोड़

राज्य सरकारों से मिलने वाला कारोबार केंद्र से कई गुना है, इसलिए राज्य स्तर पर विज्ञापन नीति क्षेत्रीय अखबारों के लिए निर्णायक है। छोटे और क्षेत्रीय प्रकाशनों की सरकारी विज्ञापन पर निर्भरता ज्यादा बताई जाती है।

प्रिंट लागत: न्यूज़प्रिंट की मार

INS ने आयातित न्यूज़प्रिंट पर 5% सीमा शुल्क हटाने की मांग फिर दोहराई है। रिपोर्ट के अनुसार पश्चिम एशिया के तनाव से कीमतों और आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बढ़ी है। INS के निवर्तमान अध्यक्ष विवेक गुप्ता के मुताबिक घरेलू उत्पादन इंडस्ट्री की जरूरत का लगभग आधा ही पूरा करता है। रिपोर्ट गुणवत्ता की समस्याओं और मिलों के पैकेजिंग-ग्रेड कागज की ओर जाने का भी जिक्र करती है। INS ने फरवरी-मार्च 2026 में घरेलू आपूर्ति की कमी पर बयान भी जारी किए थे।

असर कंपनियों के नतीजों में दिखता है। डीबी कॉर्प ने लागत नियंत्रण से मार्जिन बढ़ाया, जबकि जागरण का मार्जिन घटा।

छोटे शहरों में पहुंच

INS के निवर्तमान अध्यक्ष गुप्ता ने कहा कि हॉकरों की उपलब्धता "गंभीर चिंता" बनती जा रही है। यह वितरण की आखिरी कड़ी है, जिस पर कस्बों और गांवों तक अखबार पहुंचना निर्भर है।

ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन (ABC) के जुलाई-दिसंबर 2025 के आंकड़ों में हिंदी पट्टी का रुझान मिला-जुला रहा। दैनिक भास्कर और हिंदुस्तान के प्रसार में मामूली बढ़त हुई, जबकि दैनिक जागरण, अमर उजाला और राजस्थान पत्रिका में गिरावट आई। EY की रिपोर्ट के अनुसार अखबारों के पाठक 35 वर्ष से ऊपर की ओर झुक रहे हैं और युवा पाठक डिजिटल पर जा रहे हैं।

आगे की राह (विश्लेषण)

  1. हाइपरलोकल पर जोर: PMAR भी प्रिंट की भूमिका को चुनिंदा बाजारों में असरदार विज्ञापन के रूप में देखती है। स्थानीय खबर और स्थानीय कारोबार का जुड़ाव अखबार का सबसे ठोस तर्क बनता है।
  2. आय के अतिरिक्त स्रोत: जागरण के आउटडोर और इवेंट खंड का राजस्व ₹56.11 करोड़ से बढ़कर ₹62.95 करोड़ हुआ। डिजिटल, इवेंट और ब्रैंडेड कंटेंट अलग आय का रास्ता दिखाते हैं।
  3. नीतिगत समर्थन: न्यूज़प्रिंट पर शुल्क राहत और सरकारी विज्ञापन बजट में वास्तविक बढ़ोतरी INS की मुख्य मांगें हैं।

कुल मिलाकर प्रिंट खत्म नहीं हो रहा, पर उसका आर्थिक आधार बदल रहा है। बड़े ब्रैंड वाले समूह आगे हैं, जबकि सरकारी विज्ञापन और स्थानीय बजट पर निर्भर अखबार ज्यादा जोखिम में हैं।

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लिविंग मीडिया को मिला WAN-IFRA अवॉर्ड, ‘मैगजीन इन मिनट्स’ पहल को मिली नई पहचान

इस पहल के जरिए प्रिंट मैगजीन को ऑन-डिमांड खरीदारी की व्यवस्था से जोड़ा गया है, जिसमें पाठकों की सुविधा को डिस्ट्रीब्यूशन स्ट्रैटेजी का अहम हिस्सा बनाया गया है।

Last Modified:
Saturday, 10 October, 2026
Living Media

लिविंग मीडिया इंडिया लिमिटेड (Living Media India Limited) को अपनी पहल ‘मैगजीन इन मिनट्स’ (Magazine in Minutes) के लिए WAN-IFRA प्रिंट एंड सस्टेनेबिलिटी अवॉर्ड्स 2026 में सप्लाई चेन इनोवेटर अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है। यह पहल डिजिटल माध्यम से मैगजीन तलाशने और ऑर्डर करने की सुविधा को प्रिंट मैगजीन की तेज डिलीवरी से जोड़ती है।

यह अवॉर्ड नीदरलैंड्स के रॉटरडैम में आयोजित वर्ल्ड प्रिंटर्स समिट और डिस्ट्रीप्रेस कांग्रेस के दौरान प्रदान किया गया। इस कार्यक्रम में दुनियाभर से प्रिंट और डिस्ट्रीब्यूशन सेक्टर के 300 से अधिक प्रोफेशनल्स शामिल हुए। कंपनी की ओर से सीईओ एवं पब्लिशर मनोज शर्मा और सेल्स एंड डिस्ट्रीब्यूशन के असिस्टेंट वाइस प्रेजिडेंट (सेल्स एंड डिस्ट्रीब्यूशन) दीपक भट्ट ने यह अवॉर्ड प्राप्त किया।

ब्लिंकिट के साथ साझेदारी से मिली रफ्तार: कोविड-19 महामारी के बाद पाठकों के बदलते व्यवहार को देखते हुए इस पहल की शुरुआत की गई। इसका उद्देश्य मैगजीन की दुकानों पर घटती ग्राहकों की आवाजाही और न्यूजस्टैंड पर कम होती बिक्री की चुनौती से निपटना था। इसके लिए प्रिंट मैगजीन को क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म के माध्यम से उपलब्ध कराने का मॉडल अपनाया गया।

लिविंग मीडिया ने ब्लिंकिट के साथ साझेदारी कर लोगों को डिजिटल माध्यम से मैगजीन देखने और ऑर्डर करने की सुविधा दी। कंपनी के मुताबिक, इस व्यवस्था के तहत मैगजीन की डिलीवरी कुछ मामलों में महज 10 से 12 मिनट में हो जाती है। क्विक कॉमर्स के जरिए यह मॉडल अब भारत के 100 से अधिक शहरों तक पहुंच चुका है, जहां डिलीवरी में आमतौर पर 10 से 15 मिनट लगते हैं।

कंपनी ने अवॉर्ड के लिए दिए गए अपने आवेदन में बताया कि इस माध्यम की हिस्सेदारी उसके कुल मासिक सर्कुलेशन में 10% से अधिक हो गई है। इस चैनल के जरिए ग्राहकों की ओर से दोबारा खरीदारी भी हो रही है और नए ग्राहक भी जुड़ रहे हैं।

डिस्ट्रीब्यूशन प्रक्रिया में किए गए बदलाव: इस मॉडल का विस्तार करने के लिए कंपनी को अपने इन्वेंट्री और वितरण से जुड़ी प्रक्रियाओं में बदलाव करने पड़े। हर मैगजीन अंक की बिक्री के लिए सीमित समय होता है, जबकि क्विक कॉमर्स के तहत ऑर्डर पूरा करने के लिए स्थानीय डार्क स्टोर्स में पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध होना जरूरी है।

अपने साझेदारों की टेक्नोलॉजी, इन्वेंट्री प्लानिंग और ऑपरेशंस टीमों के साथ काम करते हुए लिविंग मीडिया ने मैगजीन के नए अंक जारी करने, स्टॉक की दोबारा आपूर्ति, उपलब्धता और मांग का अनुमान लगाने की प्रक्रियाओं को नए सिरे से तैयार किया। कंपनी ने स्टॉक के आवंटन के लिए ऊपर से नीचे तक अपनाई जाने वाली व्यवस्था की जगह क्षेत्रवार मांग के अनुमान पर भी जोर दिया, ताकि अलग-अलग इलाकों में ग्राहकों की खरीदारी के रुझान के अनुसार स्टॉक उपलब्ध कराया जा सके।

इस बारे में  लिविंग मीडिया के सीईओ एवं पब्लिशर मनोज शर्मा ने कहा कि यह अवॉर्ड मैगजीन डिस्ट्रीब्यूशन के पारंपरिक तरीकों को चुनौती देने के लिए कंपनी की टीमों की सोच और दृढ़ संकल्प को मान्यता देता है। उन्होंने कहा, ‘हमारा मानना था कि प्रिंट का भविष्य केवल कंटेंट की गुणवत्ता पर ही नहीं, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करेगा कि पाठक उस तक कितनी आसानी और तेजी से पहुंच सकते हैं।’ शर्मा ने कहा कि इस पहल की अहमियत केवल डिलीवरी की रफ्तार तक सीमित नहीं है। उनके मुताबिक, असली उपलब्धि मैगजीन के लिए उपभोक्ताओं की एक नई यात्रा तैयार करना है, जिसमें डिजिटल माध्यम से मैगजीन की खोज करने से लेकर उसकी तत्काल फिजिकल डिलीवरी तक की प्रक्रिया शामिल है।

युवा पाठकों तक पहुंचने पर जोर: कंपनी इस मॉडल को युवा पाठकों तक पहुंचने, प्रीमियम और विशिष्ट श्रेणियों की मैगजीन पेश करने और उपभोक्ताओं से मिलने वाले राजस्व के आधार पर नए प्रोडक्ट विकसित करने के अवसर के रूप में देख रही है।

लिविंग मीडिया के मुताबिक, पारंपरिक न्यूजस्टैंड अब भी उसके वितरण नेटवर्क का हिस्सा बने रहेंगे। हालांकि, भविष्य में कारोबार की वृद्धि इस बात पर भी निर्भर करेगी कि पाठकों तक उन प्लेटफॉर्म के जरिए कैसे पहुंचा जाए, जिनका वे पहले से इस्तेमाल करते हैं। इस पहल के जरिए प्रिंट मैगजीन को ऑन-डिमांड खरीदारी की व्यवस्था से जोड़ा गया है, जिसमें पाठकों की सुविधा को डिस्ट्रीब्यूशन स्ट्रैटेजी का अहम हिस्सा बनाया गया है।

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दैनिक भास्कर समूह 16 अक्टूबर को करेगा निवेशकों से बात, 15 अक्टूबर को आएंगे तिमाही नतीजे

दैनिक भास्कर अखबार समूह की कंपनी डीबी कॉर्प लिमिटेड (D.B. Corp Limited) 16 अक्टूबर, 2026 को निवेशकों और विश्लेषकों के साथ कॉन्फ्रेंस कॉल करेगी।

Last Modified:
Saturday, 10 October, 2026
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दैनिक भास्कर अखबार समूह की कंपनी डीबी कॉर्प लिमिटेड (D.B. Corp Limited) 16 अक्टूबर, 2026 को निवेशकों और विश्लेषकों के साथ कॉन्फ्रेंस कॉल करेगी। यह कॉल शाम 4:30 बजे (भारतीय समयानुसार) शुरू होगी। इसमें कंपनी 30 सितंबर, 2026 को समाप्त दूसरी तिमाही और वित्त वर्ष की पहली छमाही के वित्तीय प्रदर्शन पर चर्चा करेगी।

कंपनी ने 9 अक्टूबर, 2026 को बीएसई (BSE) और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) को दी गई सूचना में यह जानकारी दी। यह सूचना भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) के लिस्टिंग से जुड़े नियमों, 2015 के नियम 30 के तहत दी गई है।

15 अक्टूबर को घोषित होंगे वित्तीय नतीजे

कंपनी के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही और 30 सितंबर, 2026 को समाप्त छमाही के वित्तीय नतीजे 15 अक्टूबर, 2026 को घोषित किए जाने हैं। इसके अगले दिन यानी 16 अक्टूबर को कॉन्फ्रेंस कॉल के जरिए कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन पर चर्चा होगी।

इस कॉल में कंपनी के प्रबंधन की ओर से डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर पवन अग्रवाल, डायरेक्टर गिरीश अग्रवाल, मुख्य वित्तीय अधिकारी (सीएफओ) ललित जैन, फाइनेंस एंड अकाउंट्स के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट मुश्ताक अली और निवेशक संबंध विभाग के प्रमुख प्रसून पांडे शामिल होंगे।

पहले प्रबंधन की बात, फिर सवाल-जवाब

कॉन्फ्रेंस कॉल की शुरुआत कंपनी के प्रबंधन की ओर से संक्षिप्त शुरुआती संबोधन से होगी। इसके बाद निवेशकों और विश्लेषकों के लिए सवाल-जवाब का सत्र खोला जाएगा, जिसमें वे कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन से जुड़े सवाल पूछ सकेंगे।

डीबी कॉर्प लिमिटेड भारत की प्रमुख प्रिंट मीडिया कंपनियों में से एक है। कंपनी के मुताबिक, इसके अखबार समूह में पांच अखबार शामिल हैं। इनमें हिंदी का दैनिक भास्कर, गुजराती के दिव्य भास्कर और सौराष्ट्र समाचार, मराठी का दिव्य मराठी और डीबी स्टार शामिल हैं।

कंपनी के अनुसार, दैनिक भास्कर के 43 संस्करण, दिव्य भास्कर के 8 संस्करण और दिव्य मराठी के 6 संस्करण हैं। इसके अलावा, तीन भाषाओं- हिंदी, गुजराती और मराठी, में 210 उप-संस्करणों के जरिए इसकी मौजूदगी देश के 12 राज्यों में है।

कंपनी के अनुसार, इसके प्रमुख अखबारों की कुल पाठक संख्या 6.67 करोड़ है। समूह की मौजूदगी मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, चंडीगढ़, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, गुजरात, महाराष्ट्र, बिहार और झारखंड में है।

अखबारों के अलावा, कंपनी रेडियो कारोबार में भी सक्रिय है। इसका रेडियो ब्रांड ‘94.3 माय एफएम’ (94.3 MY FM) सात राज्यों के 39 शहरों में मौजूद है। कंपनी का डिजिटल कारोबार भी बढ़ रहा है, जिसके तहत चार डिजिटल पोर्टल और चार मोबाइल ऐप हैं, जिन्हें लोग डाउनलोड करके इस्तेमाल करते हैं।

कंपनी ने दी भविष्य के अनुमानों पर चेतावनी

डीबी कॉर्प ने यह भी कहा है कि कॉन्फ्रेंस कॉल के दौरान कंपनी के भविष्य के प्रदर्शन को लेकर कुछ अनुमान या बयान दिए जा सकते हैं। ऐसे अनुमान नियामकीय बदलावों, स्थानीय राजनीतिक या आर्थिक घटनाक्रम, तकनीकी जोखिमों और अन्य कारणों से प्रभावित हो सकते हैं। इन वजहों से कंपनी के वास्तविक नतीजे बताए गए अनुमानों से काफी अलग हो सकते हैं।

कंपनी ने स्पष्ट किया है कि ऐसे बयानों के आधार पर की गई किसी कार्रवाई के लिए वह जिम्मेदार नहीं होगी। साथ ही, बाद में होने वाली घटनाओं या परिस्थितियों के आधार पर इन अनुमानों को सार्वजनिक रूप से अपडेट करने की जिम्मेदारी भी कंपनी ने नहीं ली है।

यह सूचना कंपनी के कंपनी सचिव और अनुपालन अधिकारी ओम प्रकाश पांडे की ओर से जारी की गई है।  

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निष्ठा बधानी बनीं राजस्थान पत्रिका में वाइस प्रेसिडेंट-नेशनल अकाउंट्स

निष्ठा बधानी को राजस्थान पत्रिका में वाइस प्रेसिडेंट-नेशनल अकाउंट्स नियुक्त किया गया है। इससे पहले वह जियोस्टार में एसोसिएट डायरेक्टर थीं और टेलीविजन व प्रिंट मीडिया में 16 साल का अनुभव रखती हैं।

Last Modified:
Tuesday, 29 September, 2026
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निष्ठा बधानी (Nishtha Badhani) को राजस्थान पत्रिका (Rajasthan Patrika) में वाइस प्रेसिडेंट-नेशनल अकाउंट्स (Vice President-National Accounts) नियुक्त किया गया है। उन्होंने लिंक्डइन (LinkedIn) पर एक पोस्ट के जरिए अपनी नई जिम्मेदारी की जानकारी साझा की।

अपनी पोस्ट में उन्होंने लिखा कि उन्हें यह साझा करते हुए खुशी हो रही है कि उन्होंने राजस्थान पत्रिका प्राइवेट लिमिटेड (Rajasthan Patrika Pvt. Ltd.) में वाइस प्रेसिडेंट के तौर पर नई जिम्मेदारी संभाली है।

इससे पहले निष्ठा बधानी करीब दो साल तक जियोस्टार (JioStar) के साथ एसोसिएट डायरेक्टर (Associate Director) के पद पर काम कर रही थीं।

निष्ठा बधानी को स्ट्रैटेजिक और रिजल्ट-ओरिएंटेड मीडिया सेल्स लीडर (Strategic and Result-Oriented Media Sales Leader) के तौर पर जाना जाता है। उन्हें टेलीविजन और प्रिंट मीडिया (Television and Print Media) में 16 वर्षों का अनुभव है। अपने करियर में उन्होंने रेवेन्यू ग्रोथ (Revenue Growth) और रणनीति आधारित समाधानों के जरिए लंबे समय तक क्लाइंट रिलेशनशिप (Client Relationships) विकसित करने पर काम किया है।

इससे पहले वह डिज्नी स्टार (Disney Star), नेटवर्क18 मीडिया एंड इन्वेस्टमेंट्स लिमिटेड (Network18 Media & Investments Limited) और डीबी कॉर्प लिमिटेड (DB Corp Ltd.) समेत कई प्रमुख मीडिया संस्थानों के साथ काम कर चुकी हैं।

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मिली ऐश्वर्या ने पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया में पूरे किए 18 साल

मिली ऐश्वर्या ने पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया में 18 साल पूरे किए हैं। उन्होंने 2008 में शुरुआत की थी और अब एडल्ट पब्लिशिंग ग्रुप के साथ 13 इम्प्रिंट्स की जिम्मेदारी संभालती हैं।

Last Modified:
Monday, 28 September, 2026
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पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया (Penguin Random House India) की पब्लिशर और ग्रुप सीनियर वाइस प्रेसिडेंट (Publisher and Group Senior Vice President) मिली ऐश्वर्या (Milee Ashwarya) ने कंपनी के साथ 18 साल पूरे कर लिए हैं। उन्होंने सितंबर 2008 में पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया के साथ पब्लिशर, एबरी पब्लिशिंग और विंटेज पब्लिशिंग (Publisher, Ebury Publishing and Vintage Publishing) के तौर पर करियर शुरू किया था। इस भूमिका में उन्होंने 14 साल से ज्यादा समय बिताया।

जनवरी 2023 में उन्हें सीनियर वाइस प्रेसिडेंट और पब्लिशर, एडल्ट पब्लिशिंग ग्रुप (Senior Vice President and Publisher, Adult Publishing Group) की जिम्मेदारी मिली। इसके बाद जनवरी 2026 में उन्हें पब्लिशर और ग्रुप सीनियर वाइस प्रेसिडेंट के पद पर प्रमोट किया गया।

18 साल पूरे होने के मौके पर लिंक्डइन (LinkedIn) पर साझा की गई पोस्ट में मिली ऐश्वर्या ने अपने सफर को याद किया। उन्होंने कहा कि इस दौरान उन्होंने पब्लिशिंग लैंडस्केप (Publishing Landscape) में बदलाव देखे, इंडस्ट्री की चुनौतियों का सामना किया, नए लेखकों के साथ काम किया और भारतीय पाठकों के लिए कई इम्प्रिंट्स लॉन्च किए।

उन्होंने कहा कि उन्हें ऐसे पब्लिशिंग प्रोग्राम (Publishing Programme) को तैयार करने पर खास गर्व है, जो भारत की भाषाई, सांस्कृतिक और बौद्धिक विविधता को दर्शाता है और पाठकों तक नई आवाजों और विचारों को पहुंचाता है।

फिलहाल मिली ऐश्वर्या पेंगुइन इंडिया के एडल्ट पब्लिशिंग ग्रुप का नेतृत्व कर रही हैं। वह एलन लेन (Allen Lane), हैमिश हैमिल्टन (Hamish Hamilton), विंटेज (Vintage), वाइकिंग (Viking), पेंगुइन क्लासिक्स (Penguin Classics) और पेंगुइन बिजनेस (Penguin Business) समेत 13 इम्प्रिंट्स की जिम्मेदारी संभालती हैं।

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तमिलनाडु न्यूजप्रिंट एंड पेपर्स की सालाना बैठक में 5 प्रस्ताव मंजूर

तमिलनाडु न्यूजप्रिंट एंड पेपर्स लिमिटेड (TNPL) की 46वीं वार्षिक आम बैठक (AGM) 24 सितंबर 2026 को हुई।

Last Modified:
Saturday, 26 September, 2026
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तमिलनाडु न्यूजप्रिंट एंड पेपर्स लिमिटेड (TNPL) की 46वीं वार्षिक आम बैठक (AGM) 24 सितंबर 2026 को हुई। बैठक में शेयरधारकों ने 31 मार्च 2026 को समाप्त वित्त वर्ष के लिए कंपनी के ऑडिट किए गए वित्तीय नतीजों को मंजूरी दे दी।

बैठक वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए हुई। इसका आयोजन कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय (MCA) और भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) के सर्कुलर के तहत किया गया। बैठक की अध्यक्षता कंपनी के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर कुमार जयंत ने की।

AGM में डिविडेंड घोषित करने, रोटेशन के आधार पर रिटायर हो रहे एक डायरेक्टर की दोबारा नियुक्ति और वैधानिक ऑडिटर के पारिश्रमिक तय करने समेत कुल पांच साधारण प्रस्ताव रखे गए। सभी प्रस्ताव जरूरी बहुमत से पास हो गए।

वोटिंग के नतीजे जारी

कंपनी ने SEBI के लिस्टिंग नियमों के रेगुलेशन 44(3) के तहत कंसोलिडेटेड वोटिंग रिजल्ट भी जारी किया है। 17 सितंबर 2026 की कट-ऑफ डेट तक कंपनी के कुल 51,591 शेयरधारक रिकॉर्ड पर थे।

शेयरधारकों ने 21 सितंबर से 23 सितंबर 2026 तक रिमोट ई-वोटिंग के जरिए और AGM के दौरान इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग के जरिए मतदान किया।

वित्तीय स्टेटमेंट को मंजूरी देने वाले प्रस्ताव के पक्ष में 99.98% वोट पड़े, जबकि डिविडेंड घोषित करने के प्रस्ताव को 99.99% वोट मिले। वहीं, डॉ. एस. विजयकुमार, आईएएस की दोबारा नियुक्ति के प्रस्ताव के पक्ष में 99.97% वोट पड़े।

ऑडिट में क्या कहा गया?

कंपनी के वैधानिक ऑडिटर एम/एस ए. जॉन मॉरिस एंड कंपनी ने वित्तीय स्टेटमेंट पर बिना किसी प्रतिकूल टिप्पणी के ऑडिट राय दी। हालांकि, उन्होंने कंपनी के अकाउंटिंग सॉफ्टवेयर Oracle E-Business Suite (EBS) में ऑडिट ट्रेल से जुड़ी एक बात बताई।

ऑडिटर्स के मुताबिक, EBS में एप्लिकेशन लेवल पर ऑडिट ट्रेल मौजूद है, लेकिन डेटाबेस लेवल पर सीधे किए जाने वाले डेटा बदलावों को रिकॉर्ड करने के लिए ऑडिट ट्रेल चालू नहीं है। ऑडिटर्स ने यह भी स्पष्ट किया कि यूजर्स के पास बैकएंड से एंट्री को बदलने या एडिट करने की सुविधा नहीं है।

इसके अलावा, भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने ‘NIL’ रिपोर्ट दी, यानी खातों को लेकर कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं की गई। कंपनी के सेक्रेटेरियल ऑडिटर्स एम/एस श्रीधरन एंड श्रीधरन एसोसिएट्स ने भी अपनी रिपोर्ट दी। रिपोर्ट में बताई गई योग्यताओं को बोर्ड की रिपोर्ट में संबोधित किया गया है।

AGM में कौन-कौन रहे मौजूद?

बैठक में बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में चेयरमैन एवं मैनेजिंग डायरेक्टर कुमार जयंत, एन. वेंकटेश, आर. कन्नन और कई स्वतंत्र डायरेक्टर शामिल रहे। इनमें डॉ. एन. सुंदरदेवन, टी.एम.टी. एम. सत्यवती, मैथ्यू थॉमस और श्रीगणेश पद्मनाभन शामिल थे।

डॉ. एस. विजयकुमार पहले से तय व्यस्तताओं के कारण बैठक में मौजूद नहीं थे। उन्हें दोबारा डायरेक्टर नियुक्त करने का प्रस्ताव AGM में मंजूर किया गया। AGM दोपहर 1:45 बजे समाप्त हुई। इस दौरान शेयरधारकों ने कंपनी के कामकाज और बाजार की स्थिति से जुड़े सवाल भी पूछे। 

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हिन्दुस्तान मीडिया वेंचर्स: प्रियव्रत भारती फिर बने डायरेक्टर, AGM में दो प्रस्ताव मंजूर

हिन्दुस्तान मीडिया वेंचर्स लिमिटेड की 16वीं (पोस्ट-आईपीओ) सालाना आम बैठक (एजीएम) 24 सितंबर 2026 को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए आयोजित की गई।

Last Modified:
Friday, 25 September, 2026
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हिन्दुस्तान मीडिया वेंचर्स लिमिटेड की 16वीं (पोस्ट-आईपीओ) सालाना आम बैठक (एजीएम) 24 सितंबर 2026 को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए आयोजित की गई। कंपनी ने बैठक में रखे गए दोनों प्रस्तावों को जरूरी बहुमत के साथ मंजूरी मिलने की जानकारी दी है।

कंपनी के मुताबिक, एजीएम सुबह 11 बजे शुरू हुई। शेयरधारकों को बैठक से पहले रिमोट ई-वोटिंग और एजीएम के दौरान ई-वोटिंग के जरिए वोट करने की सुविधा दी गई थी।

बैठक में पहला प्रस्ताव वित्त वर्ष 2025-26 के लिए कंपनी के ऑडिट किए गए स्टैंडअलोन और कंसोलिडेटेड वित्तीय विवरणों को मंजूर करने से जुड़ा था। इसमें बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स और ऑडिटर्स की रिपोर्ट भी शामिल थी। इस प्रस्ताव को 99.9935 फीसदी वोट के साथ मंजूरी मिली।

दूसरा प्रस्ताव प्रियव्रत भारती को रोटेशन के आधार पर रिटायर होने के बाद फिर से डायरेक्टर नियुक्त करने से जुड़ा था। वे दोबारा नियुक्ति के लिए पात्र थे और उन्होंने इसके लिए अपनी पेशकश की थी। इस प्रस्ताव को 99.9934 फीसदी वोट के साथ मंजूरी मिली।

कंपनी के 17 सितंबर 2026 के कट-ऑफ डेट तक कुल 15,769 शेयरधारक थे। एजीएम में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए प्रमोटर और प्रमोटर ग्रुप से 1 और पब्लिक कैटेगरी से 49 शेयरधारकों ने हिस्सा लिया।

कंपनी ने बताया कि दोनों प्रस्ताव जरूरी बहुमत के साथ पास हो गए हैं। वोटिंग के नतीजे और स्क्रूटिनाइजर की रिपोर्ट कंपनी की वेबसाइट और नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड (एनएसडीएल) की ई-वोटिंग वेबसाइट पर उपलब्ध कराई जाएगी।

 

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