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तरुण तेजपाल को बरी किए जाने के फैसले के खिलाफ HC पहुंची गोवा सरकार
यौन शोषण के मामले में तहलका पत्रिका के पूर्व एडिटर-इन-चीफ तरुण तेजपाल को बरी किए जाने के निचली अदालत के फैसले के खिलाफ गोवा सरकार ने बॉम्बे हाई कोर्ट में अपील की है।
समाचार4मीडिया ब्यूरो 4 years ago
महिला साथी के साथ कथित यौन शोषण के मामले में तहलका पत्रिका के पूर्व एडिटर-इन-चीफ तरुण तेजपाल को गोवा की निचली अदालत ने 8 साल बाद शुक्रवार को बरी कर दिया गया था। निचली अदालत के इस फैसले के खिलाफ अब गोवा सरकार ने पीड़ित महिला को इंसाफ दिलाने के लिए बॉम्बे हाई कोर्ट में अपील की है।
गोवा के एडवोकेट जनरल देवीदास पंगम ने बताया कि राज्य सरकार ने बॉम्बे हाई कोर्ट में गोवा फास्ट ट्रैक कोर्ट के इस फैसले को चुनौती दी है। हाई कोर्ट ने अभी अपील पर सुनवाई की तारीख तय नहीं की है।
वहीं, दूसरी तरफ, अदालत की ओर से 21 मई को सुनाए गए फैसले की कॉपी मंगलवार को मिली। अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता महिला की ओर से लगाए गए आरोपों के तहत तेजपाल के खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं मिल सके।
गोवा (Goa) के ट्रायल कोर्ट की एडिशनल सेशन जज क्षमा जोशी ने तरुण तेजपाल को बरी किए जाने के आदेश देते हुए कहा कि उन्हें संदेह का लाभ दिया जाता है। इसकी वजह यह है कि शिकायतकर्ता की कंप्लेंट को पुष्ट करने के लिए पर्याप्त सबूतों की कमी है। इसके अतिरिक्त अदालत ने 527 पन्नों के अपने आदेश में कहा कि मामले की जांच करने वाली अधिकारी सुनीता सावंत ने केस के महत्वपूर्ण पहलुओं की सही से जांच नहीं की। जज ने इसके साथ ही लिखा, 'ट्रायल के लिए महिला का ‘व्यवहार’ एक महत्वपूर्ण कारक था, जिसने मामले को कमजोर कर दिया।' जज ने कहा, 'यह देखने वाली बात रही कि अभियोक्ता (पीड़ित) का व्यवहार मानक नहीं था। लगातार दो रातों में यौन उत्पीड़न की शिकार हुई कोई महिला न तो प्रशंसनीय रूप में दिख सकती है और न ही उसने ऐसा कोई बर्ताव दिखाया जिससे लगे कि उसका यौन उत्पीड़न हुआ है।'
निचली अदालत ने पाया कि महिला की ओर से तरुण तेजपाल को होटल में उसकी लोकेशन के बारे में मैसेज देना 'अप्राकृतिक' था, जहां वह एक प्रमुख अमेरिकी एक्ट्रेस का पीछा कर रही थी।
महिला ने शिकायत की थी कि तेजपाल ने 7 नवंबर, 2013 और 8 नवंबर, 2013 को होटल की लिफ्ट में उसका यौन उत्पीड़न किया। अदालत ने कहा, 'अगर महिला का पहले उत्पीड़न हो चुका था और वो डरी हुई थी, तो भी उसकी मन:स्थिति को देखते हुए सवाल उठता है कि वह आरोपी को रिपोर्ट क्यों करेगी और उसे अपनी लोकेशन क्यों बताएगी? जबकि वो तीन महिलाओं को रिपोर्ट कर सकती थी…'
अदालत ने कहा, 'अभियोक्ता का अप्राकृतिक आचरण फिर से साक्ष्य अधिनियम की धारा 8 के तहत प्रासंगिक है। अभियोक्ता ने स्वीकार किया था कि उसके फोन से आरोपी को 8/11/2013 को दो एसएमएस भेजे गए थे… और ये मैसेज उसके द्वारा किसी मैसेज के जवाब में नहीं भेजे गए थे।'
जज ने फैसले की कॉपी में लिखा, 'आरोपी ने मैसेज भेजकर उससे यह पूछने की कोशिश की थी कि वो कहां थी और उसने मिनटों के अंदर दो बार एक ही मैसेज भेजा। यह स्पष्ट रूप से स्थापित करता है कि अभियोक्ता पीड़ित नहीं थी और न ही भयभीत थी। ये आरोपी पर लगाए गए अभियोजन पक्ष के मामले को पूरी तरह से खारिज कर देता है कि उक्त मैसेज के ठीक पहले आरोपी ने अभियोजक का फिर से यौन उत्पीड़न किया था।
जानकारी के मुताबिक, मामले में कोर्ट ने फैसला सुनाते समय पुलिस की जांच को भी कठघरे में खड़ा किया। कोर्ट ने तरुण तेजपाल को संदेह के लाभ के आधार पर बरी करते हुए कहा था कि जांच के दौरान गोवा पुलिस ने सबूतों को नष्ट किया और सही साक्ष्यों को पेश नहीं किया। कोर्ट ने अपने आदेश में गोवा पुलिस की ऐसी तमाम गलतियों का जिक्र किया है। अदालत ने कहा है कि जांच अधिकारी ने ग्राउंड फ्लोर, पहली और दूसरी मंजिल के सीसीटीवी फुटेज एकत्र किए लेकिन पहली मंजिल का फुटेज अदालत के समक्ष नहीं पेश किया गया। यह जांच में एक महत्वपूर्ण चूक है। अदालत ने यह भी कहा कि जांच अधिकारी ने 26 नवंबर, 2013 के सीसीटीवी फुटेज से पीड़िता के बयान की तुलना नहीं की, जो इस मामले में सबसे तटस्थ सबूत था। अदालत ने कहा कि जांच अधिकारी की जिम्मेदारी बनती है कि वह मामले की निष्पक्ष जांच करे ताकि सच्चाई सामने आ सके।
तेजपाल पर यह आरोप था कि उन्होंने 7 नवंबर, 2013 को गोवा की एक पांच सितारा होटल के ब्लॉक 7 के बाएं लिफ्ट में कथित तौर पर पीड़िता के साथ दुष्कर्म किया। पीड़िता पक्ष का कहना है कि 8 नवंबर, 2013 को पीड़िता के साथ फिर से छेड़छाड़ की गई। इस मामले में तेजपाल के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (भादंसं) की धारा 342 (गलत तरीके से रोकना), 342 (गलत तरीके से बंधक बनाना), 354 (गरिमा भंग करने की मंशा से हमला या आपराधिक बल का प्रयोग करना), 354-ए (यौन उत्पीड़न), धारा 376 की उपधारा दो (फ) (पद का दुरुपयोग कर अधीनस्थ महिला से बलात्कार) और 376 (2) (क) (नियंत्रण कर सकने की स्थिति वाले व्यक्ति द्वारा बलात्कार) के तहत मुकदमा चला।
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