अब मुफ्त में पढ़ने को नहीं मिलेगा टाइम्स ऑफ इंडिया का e-paper, चुकानी होगी यह कीमत

शुक्रवार से यह नई व्यवस्था लागू की गई है और कुछ ही घंटों में सैकड़ों लोगों ने इस सर्विस के लिए साइनअप (signing up) भी कर लिया

Last Modified:
Tuesday, 19 May, 2020
TOI

अंग्रेजी अखबार ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ (The Times of India) से एक बड़ी खबर है। खबर ये है कि अब इस अखबार का ई-पेपर पढ़ने के लिए पाठकों को इसे सबस्क्राइब करना होगा, जिसके लिए शुल्क भी चुकाना होगा। यानी बिना सबस्क्राइब किए आप इसे नहीं पढ़ सकेंगे। 15 मई से यह नई व्यवस्था लागू की गई है और कुछ ही घंटों में सैकड़ों लोगों ने इस सर्विस के लिए साइनअप (signing up) भी कर लिया।   

न्यूज रिपोर्ट्स के अनुसार, इस अखबार का ई-पेपर अभी तक देश में पाठकों के लिए मुफ्त में उपलब्ध था, जिसके लिए अब हर महीने 199 रुपए (जीएसटी अलग से) चुकाने होंगे। इसके साथ ही ‘टाइम्स प्राइम’, जिसमें एक्सक्लूसिव स्टोरी होती हैं, वह भी सबस्क्राइबर्स के लिए उपलब्ध होगा।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ का ई-पेपर तीन डॉलर प्रतिमाह अथवा 30 डॉलर सालाना के शुल्क पर सबस्क्राइब किया जा सकता है। बता दें कि हाल ही में इंडियन रीडरशिप सर्वे की चौथी तिमाही (IRS Q4 2019) के आंकड़ों के अनुसार ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ की कुल रीडरशिप 1.73 करोड़ है।

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जानें, हर साल क्यों मनाया जाता है हिंदी पत्रकारिता दिवस

हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में 30 मई का खास महत्व है। यही कारण है कि 30 मई को हर साल हिंदी पत्रकारिता दिवस के रूप में मनाया जाता है।

Last Modified:
Saturday, 30 May, 2020
Journalism Day

हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में 30 मई का खास महत्व है। यही कारण है कि 30 मई को हर साल हिंदी पत्रकारिता दिवस के रूप में मनाया जाता है। दरअसल, इसी दिन वर्ष 1826 को पंडित युगल किशोर शुक्ल ने पहले हिंदी अखबार ‘उदंड मार्तण्ड’ का प्रकाशन किया था। उस दौरान अंग्रेजी, फारसी और बांग्ला में तो अनेक पत्र निकल रहे थे, लेकिन हिंदी में एक भी पत्र नहीं निकलता था। इसलिए 'उदन्त मार्तण्ड' का प्रकाशन शुरू किया गया। मूल रूप से कानपुर के रहने वाले पंडित युगल किशोर शुक्ल ने इसे कलकत्ता (अब कोलकाता) से एक साप्ताहिक अखबार के तौर पर शुरू किया था। इसके प्रकाशक और संपादक भी वह खुद थे। यह अखबार हर हफ्ते मंगलवार को पाठकों तक पहुंचता था।

'उदन्त मार्तण्ड' के पहले अंक की 500 प्रतियां छपी। हिंदी भाषी पाठकों की कमी की वजह से उसे ज्यादा पाठक नहीं मिल सके। इसके अलावा हिंदी भाषी राज्यों से दूर होने के कारण उन्हें समाचार पत्र डाक द्वारा भेजना पड़ता था। डाक दरें बहुत ज्यादा होने की वजह से इसे हिंदी भाषी राज्यों में भेजना भी आर्थिक रूप से महंगा सौदा हो गया था। पैसों की तंगी की वजह से 'उदन्त मार्तण्ड' का प्रकाशन बहुत दिनों तक नहीं हो सका और आखिरकार 4 दिसम्बर 1826 को इसका प्रकाशन बंद कर दिया गया।

यह अखबार ऐसे समय में प्रकाशित हुआ था, जब हिंदी भाषियों को अपनी भाषा के पत्र की आवश्यकता महसूस हो रही थी। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर ‘उदन्त मार्तण्ड‘ का प्रकाशन किया गया था। वह ऐसा दौर था जब भारत माता को गुलामी की बेड़ियों से मुक्त करने का बीड़ा पत्रकारिता ने अपने कंधों पर उठाया था। देश की आजादी से लेकर, साधारण आदमी के अधि‍कारों की लड़ाई तक, हिंदी भाषा की कलम से इंसाफ की लड़ाई लड़ी गई। वक्त बदलता रहा और पत्रकारिता के मायने और उद्देश्य भी बदलते रहे, लेकिन हिंदी भाषा से जुड़ी पत्रकारिता में लोगों की दिलचस्पी कम नहीं हुई, क्योंकि इसकी एक खासियत यह भी रही है कि इस क्षेत्र में हिंदी के बड़े लेखक, कवि और विचारक भी आए। हिंदी के बड़े लेखकों ने संपादक के रूप में अखबारों की भाषा का मानकीकरण किया और उसे सरल-सहज रूप देते हुए कभी उसकी जड़ों से कटने नहीं दिया।

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न्यूजपेपर इंडस्ट्री के लिए माकपा सांसद ने पीएम मोदी से की ये अपील

कोरोना महामारी के चलते देशभर में लॉकडाउन जारी है। ऐसे में कई इंडस्ट्री को नुकसान उठाना पड़ा है, जिनमें  न्यूजपेपर इंडस्ट्री भी शामिल है, जिसे काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है

Last Modified:
Friday, 29 May, 2020
newspaper

कोरोना महामारी के चलते देशभर में लॉकडाउन जारी है। ऐसे में कई इंडस्ट्री को नुकसान उठाना पड़ा है, जिनमें  न्यूजपेपर इंडस्ट्री भी शामिल है, जिसे काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में अब माकपा की ओर से कोयम्बटूर लोकसभा के सदस्य पी.आर. नटराजन इसे लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मदद करने की अपील की है।

पी.आर. नटराजन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से न्यूजपेपर इंडस्ट्री को राहत मुहैया कराने के लिए जरूरी  कदम उठाने की मांग की है। माकपा के सांसद ने मोदी को हाल ही में एक पत्र लिखकर उन्हें इंडस्ट्री की चुनौतियों से अवगत कराया और कहा कि कई अखबारों ने पहले ही पेजों की संख्या कम कर दी है। यहां तक कि कई एडिशन भी बंद करने पड़ गए हैं।

उन्होंने कहा कि जिस इंडस्ट्री ने लाखों रोजगार को दिया, आज वह लॉकडाउन के प्रभावों की वजह से दम तोड़ रही है, क्योंकि इसकी वजह से उसका ऐड रेवन्यू प्रभावित हुआ है। उन्होंने यह भी कहा कि न्यूजपेपर इंडस्ट्री की यह स्थिति लंबे समय तक बने रहने की उम्मीद है।

नटराजन ने कहा कि पार्टी के सांसदों ने न्यूजपेपर के संगठनों द्वारा जारी किए उन प्रस्तावों का समर्थन किया है, जिसमें न्यूजप्रिंट पर सीमा शुल्क माफ करने, अखबारों के लिए दो साल तक टैक्स छोड़ने, अखबारों को सरकारी विज्ञापन के बकाये के भुगतान के लिए कदम उठाने और ब्यूरो ऑफ आउटरीच एंड कम्युनिकेशन (बीओसी) की विज्ञापन दरों में 100 प्रतिशत की बढ़ोतरी करने का आग्रह किया गया है।

गौरतलब है कि इससे पहले द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (द्रमुक) के अध्यक्ष एम. के. स्टालिन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर इस तरह के मदद की अपील की थी। उन्होंने मोदी को लिखे एक पत्र में कहा था, ‘विज्ञापन राजस्व में कमी और कोविड-19 महामारी के चलते सर्कुलेशन प्रभावित हुआ है और वे खर्च भी पूरा नहीं कर पा रहे हैं।’ उन्होंने कहा था, ‘न्यूजप्रिंट और आयात होने वाले अन्य कच्चे सामान पर लगने वाले सीमा शुल्क को वर्ष के बाकी समय के लिए माफ कर दिया जाए।’ उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से न्यूजपेपर इंडस्ट्री को राहत मुहैया कराने के लिए कदम उठाने का आग्रह किया।   

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प्रिंट प्रकाशन बंद करने के तीने महीने बाद ‘प्लेब्वॉय’ ने लिया ये बड़ा फैसला

महामारी बन चुके कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया में अफरा-तफरी मचा दी है। हाल ये है कि ग्लोबल स्तर पर प्रिंट मीडिया भी इसके खौफ से अछूता नहीं रहा है

Last Modified:
Friday, 29 May, 2020
Playboy_Mag544

महामारी बन चुके कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया में अफरा-तफरी मचा दी है। हाल ये है कि ग्लोबल स्तर पर प्रिंट मीडिया भी इसके खौफ से अछूता नहीं रहा है। ऐसे में प्रसिद्ध अमेरिकी मैगजीन ‘प्लेब्वॉय’ (Playboy) से एक बड़ी खबर सामने आई है। ‘प्लेब्वॉय’ ने प्रिंट प्रकाशन बंद करने के करीब तीने महीने बाद ही अब अपने एडिटोरियल स्टाफ के एक बड़े हिस्से को बाहर का रास्ता दिखा दिया है। वैसे बताया जा रहा है कि  मैगजीन ने अब अपने 25 एम्प्लॉयीज की छंटनी कर दी है।   

हालांकि ‘प्लेब्वॉय’ के एक प्रवक्ता ने कहा कि  66 साल बाद मार्च में प्रिंट पत्रिका बंद की गई थी और इस समय किसी भी तरह से छंटनी की कोई भी योजना नहीं बनाई गई थी। लेकिन मीडिया आउटलेट को इसमें बदलाव के लिए बहुत ज्यादा समय की जरूरत नहीं थी।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, करीब 25 एडिटोरियल स्टाफ की नौकरी गई है और ये उसके डिजिटल ऑपरेशन से जुड़े हुए थे। वैसे ये प्लेब्वॉय के संपादकीय कार्यबल का एक बड़ा हिस्सा माना जा रहा है, क्योंकि यह पहले से ही फ्रीलॉन्स जर्नलिस्ट के साथ काम करता है। पिछले कुछ सालों में इसने अपने एडिटोरियल स्टाफ को कम कर दिया है।

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Hindustan Times ने 27% एम्प्लॉयीज को दिखाया बाहर का रास्ता: सोर्स

सूत्रों का कहना है कि कुछ हफ्ते पहले सैलरी में कटौती की घोषणा के बाद ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ (Hindustan Times) ने अब 130 एम्प्लॉयीज को बाहर का रास्ता दिखा दिया है

Last Modified:
Thursday, 28 May, 2020
HT

कोरोना वायरस के फैलते संक्रमण रोकथाम के लिए पूरा लॉकडाउन के दौर से गुजर रहा है, जिसका सीधा असर तमाम इंडस्ट्री पर देखने को मिल रहा है। देश में आर्थिक संकट उत्पन्न हो गया है। ऐसे में मीडिया इंडस्ट्री भी इस संकट से अछूती नहीं है। सूत्रों के हवाले से खबर मिली है कुछ हफ्ते पहले सैलरी में कटौती की घोषणा के बाद ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ (Hindustan Times) ने अब 130 एम्प्लॉयीज को बाहर का रास्ता दिखा दिया है। बता दें कि निकाले गए एम्प्लॉयीज उसके सभी एडिशंस के एडिटोरियल, मार्केटिंग और सेल्स डिपार्टमेंट में शामिल हैं।

एक करीबी सूत्र ने बताया कि एचटी (HT) ने यह फैसला मैनेजमेंट कंसल्टिंग फर्म McKinsey की सलाह पर लिया है, जिसके मुताबिक उसे कुल स्टाफ से 27 फीसदी कम करना है। ये 27 फीसदी एम्प्लॉयीज ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ (Hindustan Times) और उसके बिजनेस न्यूजपेपर ‘मिंट’ (Mint) के हैं।

हालांकि हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media.com) ने जब इसकी पुष्टि के लिए HT के मैनेजमेंट से संपर्क साधा तो उन्होंने कर्मचारियों की छंटनी की खबरों का खंडन किया है।

 

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पाठकों को पढ़ने को नहीं मिलेंगे अब ये दो बड़े अखबार

एक अखबार ने अपना कामकाज बंद कर दिया है, जबकि दूसरा अखबार एक जून को बंद हो जाएगा

Last Modified:
Thursday, 28 May, 2020
Newspapers

‘सकाल मीडिया ग्रुप’ (Sakal Media Group) अपने अखबार ‘सकाल टाइम्स’ (Sakal Times)  और ‘गोमांतक टाइम्स’ (Gomantak Times) को बंद करने जा रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पुणे से निकलने वाले अंग्रेजी अखबार ‘सकाल टाइम्स’ का आखिरी एडिशन 27 मई को निकाला गया जबकि गोवा से निकलने वाले ‘गोमांतक टाइम्स’ का आखिरी एडिशन एक जून को पब्लिश होगा।

मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि कंपनी के पास इन दोनों अखबारों के डिजिटल एडिशन जारी रखने की भी कोई योजना नहीं है। बताया जाता है कि लॉकडाउन के बाद से दोनों अखबारों के एंप्लाईज की सैलरी में भी कटौती कर दी गई थी। एडिटोरियल डिपार्टमेंट में कई पत्रकारों की नौकरी जाने के साथ ही मराठी डिवीजन के सहयोग से यहां का कामकाज चलाया जा रहा था।  

बता दें कि ‘सकाल टाइम्स’ की शुरुआत मई 2008 में हुई थी, जबकि  ‘गोमांतक टाइम्स’ वर्ष 1986 में गोवा में शुरू हुआ था और इसे वर्ष 2000 में सकाल पेपर्स ने टेकओवर कर लिया था।

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HT की नेशनल एडिटर पद्मा राव ने संस्थान को कहा अलविदा, बताई ये वजह

अंग्रेजी अखबार ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ (Hindustan Times) की नेशनल एडिटर पद्मा राव ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर इसकी घोषणा की है।

Last Modified:
Wednesday, 27 May, 2020
Padma Rao

अंग्रेजी अखबार ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ (Hindustan Times) की नेशनल एडिटर पद्मा राव ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर इसकी घोषणा की है। इस पोस्ट में पद्मा राव ने स्पष्ट किया है कि उन्हें कंपनी द्वारा हटाया नहीं गया है।

सोशल मीडिया पर की गई अपनी पोस्ट में राव ने बताया है कि वह एक ग्लोबल ऑर्गनाइजेशन के साथ दिल्ली में एक इंटरनेशनल एडिटोरियल असाइनमेंट संभालने जा रही हैं।

पद्मा राव की सोशल मीडिया पर की गई पोस्ट के अनुसार, ‘एचटी ने कल कथित तौर पर कई लोगों को हटा दिया है (यदि यह सही है तो यह काफी बुरा है, लेकिन इस बारे में सिर्फ वॉट्सऐप पर उड़ती हुई खबरें आ रही है और मुझे इस बारे में कहीं से कोई पुष्टि नहीं हुई है)। हालांकि, मैं आपको बता दूं कि मुझे हटाया नहीं गया है। मैंने पिछले हफ्ते खुद ही एचटी से इस्तीफा दे दिया था और एक जून से मैं नई पारी शुरू करने जा रही हूं। मैं एक ग्लोबल ऑर्गनाइजेशन के साथ दिल्ली में एक इंटरनेशनल एडिटोरियल असाइनमेंट संभालने जा रही हूं। यह नौकरी एक महीने पहले ही फाइनल हो गई थी और मैं अपना इस्तीफा सौंपने से पहले सभी औपचारिकताएं पूरी होने का इंतजार कर रही थी। मैं एचटी को बहुत भारी मन से छोड़ रही हूं। मुझे अपनी नई नौकरी को काफी चुनौतीपूर्ण और रोमांचक होने की उम्मीद है। आपको इस बारे में जल्द ही और जानकारी मिल जाएगी।’

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कोरोना ने छीन ली ‘नईदुनिया’ अखबार के प्रबंध संपादक राजेन्द्र तिवारी की जिंदगी

हिंदी दैनिक अखबार ‘नईदुनिया’ से एक बड़ी खबर निकलकर सामने आई है। खबर ये है कि इस महामारी की चपेट में आकर अखबार के प्रबंध संपादक राजेन्द्र तिवारी का निधन हो गया है

Last Modified:
Wednesday, 27 May, 2020
rajendra-tiwari

कोरोना की कवरेज में अहम भूमिका निभा रहे हिंदी दैनिक अखबार ‘नईदुनिया’ से एक बड़ी खबर निकलकर सामने आई है। खबर ये है कि इस महामारी की चपेट में आकर वरिष्ठ पत्रकार व अखबार के प्रबंध संपादक राजेन्द्र तिवारी का निधन हो गया है। वे 82 वर्ष के थे। मिली जानकारी के मुताबिक, राजेन्द्र तिवारी भोपाल के चिरायु मेडिकल कॉलेज में भर्ती थे। कोरोना संक्रमण की रिपोर्ट पॉजिटिव आने के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां वे पिछले 4 दिनों से वेंटिलेटर पर थे।

बताया जा रहा है कि उनकी किडनी और लंग्स ने काम करना बंद कर दिया था, जिसके बाद आज (बुधवार) सुबह 8 बजे अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली।

बता दें कि ‘नईदुनिया’ इंदौर से बंटवारे के तहत भोपाल में दैनिक ‘नईदुनिया’ का मालिकाना हक नरेन्द्र तिवारी जी के बेटे राजेन्द्र तिवारी को मिला था। 1994 से वे लगातार भोपाल में दैनिक ‘नईदुनिया’ का प्रकाशन व संपादन कर रहे थे। वे अपने पीछे पुत्र अपूर्व तिवारी को छोड़ गए हैं। बुधवार दोपहर 12:30 बजे उनका अंतिम संस्कार किया गया।

राजेन्द्र तिवारी के निधन पर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने शोक व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि पहले नईदुनिया इंदौर और बाद में वर्ष 1991 से भोपाल से दैनिक नईदुनिया के प्रकाशन में श्री राजेन्द्र तिवारी का महत्वपूर्ण योगदान रहा। मध्यप्रदेश की हिंदी पत्रकारिता में श्री राजेन्द्र तिवारी द्वारा दी गई सेवाएं स्मरणीय रहेंगी। वहीं मुख्यमंत्री ने स्व. राजेंद्र तिवारी की आत्मा की शांति और शोकाकुल तिवारी परिवार को यह असीम दुख सहन करने की शक्ति देने की ईश्वर से प्रार्थना की है।

 

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इस अखबार के फ्रंट पेज पर न तो कोई खबर, न तस्वीर और न ही विज्ञापन, फिर भी आया चर्चाओं में

पूरी दुनिया में अपना कहर बरपा रहा कोरोना वायरस से संक्रमित होने के सबसे ज्यादा मामले अमेरिका से हैं, जहां अभी तक करीब 16 लाख लोग इस वायरस की चपेट में चुके हैं

Last Modified:
Monday, 25 May, 2020
Newspaper

पूरी दुनिया में अपना कहर बरपा रहा कोरोना वायरस से संक्रमित होने के सबसे ज्यादा मामले अमेरिका से हैं, जहां अभी तक करीब 16 लाख लोग इस वायरस की चपेट में चुके हैं, जबकि मरने वालों की संख्या करीब एक लाख तक पहुंच गई है। इस महामारी की गंभीरता को समझाने और जागरूक करने के लिए एक अखबार की अनूठी पहले दुनिया में चर्चा का विषय बन गया है।

दरअसल, न्यूयॉर्क टाइम्स के फ्रंट पेज पर न तो कोई खबर छपी है, न तस्वीर और न विज्ञापन। अखबार का फ्रंट पेज पूरी तरह से इस महामारी से जान गवाने वाले अमेरिकियों को समर्पित कर दिया गया है। पृष्ठ पर कोरोना से मरने वाले लोगों के नाम छापे गए हैं, लिहाजा यह देखकर हर कोई हैरान रह गया।

अखबार ने फ्रंट पेज पर एक लाख मृतकों के नाम छापते हुए सिर्फ एक लाइन का संदेश लिखा है, करीब एक लाख मौतें, बेहिसाब क्षति। इसके बाद नीचे उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए लिखा गया है सूची में वो सिर्फ नाम नहीं थे, वो हम थे। 

अखबार ने फ्रंट पेज पर मृतकों के नाम क्यों प्रकाशित किए, इसपर उसने 'टाइम्स इनसाइडर' में एक लेख भी प्रकाशित किया है। दरअसल, न्यूयॉर्क टाइम्स के संपादकों ने इस भयावह स्थिति को दर्शाने का फैसला किया। ग्राफिक्स डेस्क की असिस्टेंट एडिटर सिमोन लैंडन संख्याओं को इस रूप में रखना चाहती थीं जो यह तो दिखाए ही कि कितनी बड़ी संख्या में लोगों की जान गई है और यह भी किस वर्ग के लोगों की मौत हुई है।

न्यूयॉर्क टाइम्स के सभी विभाग के पत्रकार इस महामारी को कवर कर रहे हैं। सिमोन लैंडन कहती हैं, हमें पता था कि हम माइल स्टोन खड़ा करने जा रहे हैं। हमें पता था कि उन संख्याओं को रखने का कुछ तरीका होना चाहिए। उन्होंने कहा कि एक लाख डॉट या स्टिक फिगर पेज पर लगाने से आपको कुछ पता नहीं चलता कि वे कौन लोग थे और वे हमारे लिए क्या मायने रखते थे।

न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक अखबार के पहले पन्ने पर जिन एक हजार लोगों के नाम छापे गए हैं, वे कुल मौतों का सिर्फ एक फीसदी हैं। अखबार का कहना है कि मृतकों की लिस्ट इतनी लंबी है कि यदि इसे छापा जाए तो अखबार के 12वें पेज तक सिर्फ मृतकों के नाम ही लिखे जा सकते हैं। अखबार ने इन लोगों का नाम, उम्र और पता लिखने के बाद उनके बारे में एक लाइन लिखकर उन्हें याद किया है।

न्यूयॉर्क टाइम्स का कहना है कि इस वायरस से मरने वालों की संख्या के आधार पर अमेरिका पर इसके असर को नहीं समझा जा सकता। इस वायरस की अमेरिका को भारी कीमत चुकानी पड़ी है।

अखबार ने शनिवार की देर रात जैसे ही अपने फ्रंट पेज का स्क्रीनशॉट जारी किया, वह दुनिया भर में सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गया। फेसबुक और ट्विटर पर काफी संख्या में लोगों ने इसे शेयर किया। सोशल मीडिया पर यूजर्स ने मृतकों को याद करने के लिए इस अनूठे अंदाज पर अखबार को धन्यवाद ज्ञापित किया।  

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IRS: इन बड़ी वजहों से लगातार सफलता की इबारत लिख रहा दैनिक जागरण

पिछले दिनों 'मीडिया रिसर्च यूजर्स काउंसिल' (MRUC) द्वारा ‘इंडियन रीडरशिप सर्वे 2019’ की चौथी तिमाही (IRS 2019 Q4) के डाटा जारी किए गए हैं।

Last Modified:
Friday, 22 May, 2020
Dainik Jagran

पिछले दिनों 'मीडिया रिसर्च यूजर्स काउंसिल' (MRUC) द्वारा ‘इंडियन रीडरशिप सर्वे 2019’ की चौथी तिमाही (IRS 2019 Q4) के डाटा जारी किए गए हैं। यह रिपोर्ट इंडियन रीडरशिप सर्वे 2019 की पिछली तिमाही यानी पहली (Q1), दूसरी (Q2) और तीसरी तिमाही (Q3) के जारी किए गए डाटा पर आधारित है, जिसकी औसतन रिपोर्ट के बाद चौथी तिमाही के नतीजे तैयार किए गए हैं।

आइआरएस के ताजा आंकड़ों के मुताबिक देशभर के छह करोड़ 87 लाख पाठकों, जिनमें अकेले उत्तर प्रदेश के ही 3.9 करोड़ पाठक शामिल हैं, ने दैनिक जागरण को अपना पसंदीदा अखबार बताया है। सर्वे में दैनिक जागरण लगातार पूरे देश के समाचार पत्रों में शीर्ष पर बना हुआ है। देश में सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले अखबारों की लिस्ट में अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी से दैनिक जागरण की कुल रीडरशिप (total readership) 30 प्रतिशत ज्यादा बनी हुई है।  

‘आईपीजी मीडियाब्रैंड्स इंडिया’ (IPG Mediabrands India) के सीईओ शशि सिन्हा के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में हिंदी मार्केट में दैनिक जागरण की काफी ग्रोथ हुई है। उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे मार्केट में जहां साक्षरता दर बढ़ी है और इसलिए वहां अखबार की रीडरशिप में भी इजाफा हुआ है।

सिन्हा का कहना है, ‘जागरण ने भी नए पाठकों पर काफी निवेश किया है। देश में अखबारों का कवर मूल्य इतना कम है कि कई बार अखबार सर्कुलेशन बंद हो जाता है, क्योंकि जब तक आपके पास स्थिर विज्ञापन रेवेन्यू नहीं होता है, तब आप जितनी बिक्री करते हैं, उतना ही आपको नुकसान होता है। दूसरों के विपरीत जागरण का सर्कुलेशन सिर्फ बढ़ा है,इसकी वजह से रीडरशिप भी बढ़ी है और उन्हें अपनी टॉप पोजीशन पर रहने में मदद मिली है।’

इस बारे में ‘जागरण प्रकाशन’ के सीनियर वाइस प्रेजिडेंट (स्ट्रैटेजी, ब्रैंड और बिजनेस डेवलपमेंट) बसंत राठौड़ का कहना है, ‘पाठकों के लिए क्वालिटी कंटेंट तैयार करने पर किए गए मजबूत फोकस ने रीडरशिप की लिस्ट में नंबर वन रहने में मदद की है।’  उनका कहना है, ‘दैनिक जागरण के सात सरोकार इसकी एडिटोरियल पॉलिसी का हिस्सा है। ये सात सरोकार गरीबी उन्मूलन, स्वस्थ समाज, सुशिक्षित समाज, महिला सशक्तीकरण, पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण और जनसंख्या नियोजन हैं। इन सरोकारों पर काम करने से लोगों से भावनात्मक जुड़ाव मजबूत होता है।’

आईआरएस की चौथी तिमाही के आंकड़ों के अनुसार, दैनिक जागरण न सिर्फ टोटल रीडरशिप (Total Readership) बल्कि एवरेज इश्यू रीडरशिप (average issue readership) में भी नंबर वन है। चौथी तिमाही में इस अखबार की एवरेज इश्यू रीडरशिप 16872000 पर पहुंच गई है। पिछले दो सर्वे (IRSs of 2017 और 2019) के दौरान अखबार की रीडरशिप लगातार 6.8 करोड़ और सात करोड़ रही है।

राठौड़ का कहना है, ‘दैनिक जागरण अपने सात सरकारों के साथ काफी बेहतर कंटेंट पाठकों को उपलब्ध कराता है। इसमें स्वास्थ्य से जुडे कॉलम के अलावा युवाओं पर केंद्रित सप्लीमेंट भी शामिल हैं, जिसमें रोजगार के अवसरों के बारे में भी बताया जाता है, इसके अलावा महिला पाठकों की जरूरत को ध्यान में रखते हुए भी कंटेंट उपलब्ध कराया जाता है।’ विशेषज्ञों का कहना है कि अखबार की इतनी ज्यादा पाठक संख्या के कारण ही एडवर्टाइजर्स के लिए इसे नजरअंदाज करना काफी मुश्किल होता है। इसके अलावा कई अन्य कारक भी इसके पक्ष में काम करते हैं।

‘पीएचडी मुंबई’ (PHD Mumbai) के वाइस प्रेजिडेंट दिनेश व्यास के अनुसार, ‘दैनिक जागरण की रीडरशिप में लगातार वृद्धि इस तथ्य को दर्शती है कि लोकल कंटेंट ही किंग है, खासकर हिंदी भाषी मार्केट में। 11 राज्यों में 37 एडिशंस इसकी टोटल रीडरशिप में योगदान दे रहे हैं। इसके अलावा यह उचित मूल्य पर उलब्ध है, जिसका लाभ भी पाठकों को मिल रहा है। दैनिक जागरण डिस्ट्रीब्यूटर्स के द्वारा अपने ग्राहकों के आवास या कार्यालयों से पुराने अखबारों को रीसाइक्लिंग को प्रोत्साहित करने के लिए इकट्ठा करने का काम भी करता है, जिसमें मासिक सब्सक्रिप्शन पर छूट मिलती है।’

व्यास का कहना है, ‘यह अखबार कई सालों से चल रहा है और पाठकों के जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया है। सभी आयु वर्ग के लोगों के लिए यह सप्लीमेंट्स दे रहा है। पुरुष हो अथवा महिला, यह परिवार के सभी सदस्यों के लिए उनकी जरूरतों को ध्यान में रखते हुए बेहतर कंटेंट उपलब्ध करा रहा है।’ विज्ञापन के मुद्दे पर व्यास ने कहा कि अखबार स्थानीय विज्ञापनदाताओं को आकर्षित करता है, जिसमें छोटे एंटरप्रिन्योर्स से लेकर स्थानीय दुकानदार शामिल है, जो स्थानीय सप्लीमेंट्स में अपना विज्ञापन प्रकाशित करवाना चाहते हैं। इसके अलावा हिंदी भाषी मार्केट में इसकी ज्यादा रीडरशिप को देखते हुए राष्ट्रीय स्तर के एडवर्टाइजर्स भी अपने विज्ञापन देते हैं।

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अखबारों की डोर-टू-डोर डिलीवरी के मामले में सरकार जल्द ले सकती है ये फैसला

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने कहा कि अखबारों को घर-घर पहुंचाने पर रोक लगाने का फैसला कोरोनावायरस (कोविड-19) के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए लिया गया था।

Last Modified:
Thursday, 21 May, 2020
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महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने बुधवार को कहा कि मुंबई में अखबारों की घर-घर जाकर (डोर टू डोर) डिलीवरी पर लगाए गए प्रतिबंध को जल्द ही हटाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि घर-घर अखबार पहुंचाने पर लगी रोक अस्थायी है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि इस बारे में मौजूदा स्थिति का आकलन कर जल्द फैसला लिया जाएगा।

अखबार वितरकों के साथ विडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से हुई बैठक के बाद उद्धव ठाकरे ने कहा कि अखबारों को घर-घर पहुंचाने पर रोक लगाने का फैसला कोरोनावायरस (कोविड-19) के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए लिया गया है। उन्होंने कहा कि राज्य में कई उद्योग, व्यवसाय, दुकानें और अन्य चीजें शुरू की गई हैं। अखबार हमारी दैनिक आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि लॉकडाउन के चौथे चरण में रेड जोन तथा कोविड-19 कंटेनमेंट जोन पर ध्यान केंद्रित है। ठाकरे ने कहा कि महामारी को देखते हुए अखबार वितरण पर रोक है, लेकिन जल्द ही समाधान निकाला जाएगा।

बैठक में अखबार वितरकों का कहना था कि आवासीय सोसायटियां अखबारों के घर पर वितरण की इजाजत नहीं दे रही हैं और सामाजिक दूरी का पालन करते हुए दुकानों पर अखबारों की बिक्री की जा रही है। इस पर ठाकरे ने कहा कि कोरोना स्वास्थ्य के लिए आपातकाल है। इसलिए अखबारों के वितरण पर प्रतिबंध लगाया है, फिर भी इसका जल्द से जल्द मार्ग निकाला जाएगा।

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