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क्या वाकई तुम मेरे जैसा सोचते हो?
वरिष्ठ पत्रकार डॉ. विनोद पुरोहित ने कविता के माध्यम से इस दुनिया को कहीं ऐसी जगह ले जाने की बात कही है, जहां पर हालात बेहतर हों
समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago
डॉ.विनोद पुरोहित, संपादक
अमर उजाला, आगरा संस्करण।।
तुम भी मेरे जैसा सोचते हो...
तो चलो...
धरती को कांधे पर उठाकर
कहीं और ले चलें,
जहां बांहे फैलाकर उसका
स्वागत हो और संकल्प हो
उसे सेहतमंद रखने का...
यहां तो बड़ी घुटन है,
नोंच-नोंच कर उसकी छाती-पसलियां
छलनी कर दीं...
खुद को ईश्वर
बनाने की होड़ में
सब कुछ ' आर्टिफिशियल' गढ़ लिया है...
सबके अपने सूरज-चांद
सबके अपनी हवा और पानी,
और तो और मूर्ति खुद की बना
चल रहा है गगनभेदी स्वस्ति गान,
घट रहा है कद, मन हो रहा गरिष्ठ।
तो चलो...
इस बोझ को कहीं उतार आएं
फिर वो सूरज बांध लाएं
वहीं गढ़ेगा फिर सौंधा मानव
यही वह गुनगुनी उम्मीद है
जिससे भुरभुरी होगी माटी।
...क्या वाकई तुम मेरे जैसा सोचते हो?
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