भारत में क्विक कॉमर्स का मुकाबला अब सिर्फ कुछ मिनटों में किराना पहुंचाने तक सीमित नहीं रहा है। Flipkart Minutes और Blinkit के बीच मुकाबला तेजी से बड़ा हो रहा है।
by
Vikas Saxena
भारत में क्विक कॉमर्स का मुकाबला अब सिर्फ कुछ मिनटों में किराना पहुंचाने तक सीमित नहीं रहा है। Flipkart Minutes और Blinkit के बीच मुकाबला तेजी से बड़ा हो रहा है। मौजूदा कारोबार, ऑर्डर और मुनाफे के मामले में Blinkit अभी काफी आगे है, लेकिन Flipkart Minutes ने जिस तेजी से अपने स्टोर और ऑर्डर बढ़ाए हैं, उससे यह मुकाबला आने वाले समय में और दिलचस्प होने वाला है।
Flipkart Minutes पर मोबाइल फोन को हटाकर औसत नेट ऑर्डर वैल्यू करीब 500-530 रुपये बताई गई है। वहीं Blinkit की जून तिमाही में यह वैल्यू 518 रुपये थी। ये आंकड़े UBS के आकलन पर आधारित हैं। मोबाइल फोन को शामिल करने पर Flipkart Minutes की औसत ऑर्डर वैल्यू इससे ऊपर चली जाती है।
हालांकि, सिर्फ औसत ऑर्डर वैल्यू से दोनों कंपनियों के कारोबार की पूरी तस्वीर नहीं मिलती। महंगे स्मार्टफोन किसी ऑर्डर की कीमत को काफी बढ़ा सकते हैं, लेकिन इससे यह पता नहीं चलता कि ग्राहक कितनी बार दोबारा ऑर्डर कर रहा है, किसी स्टोर से कितने ऑर्डर निकल रहे हैं या हर डिलीवरी पर कंपनी को कितना फायदा हो रहा है।
Blinkit की बढ़त अभी बरकरार
वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में Blinkit ने 33.1 करोड़ ऑर्डर पूरे किए। यानी रोजाना करीब 36 लाख ऑर्डर। इस दौरान कंपनी का नेट ऑर्डर वैल्यू 17,132 करोड़ रुपये रहा, जो सालाना आधार पर 86 फीसदी ज्यादा था।
Blinkit के पास इस अवधि में 3.18 करोड़ मासिक लेन-देन करने वाले ग्राहक और 2,443 डार्क स्टोर थे। कंपनी ने पहली बार समायोजित EBITDA में 102 करोड़ रुपये का मुनाफा दर्ज किया, जबकि एक साल पहले उसे 162 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था। उसका योगदान मार्जिन भी 5.3 फीसदी रहा। इससे यह संकेत मिलता है कि क्विक कॉमर्स में बड़े पैमाने पर कारोबार के साथ अब मुनाफे की तस्वीर भी धीरे-धीरे सुधर रही है। हालांकि, मार्जिन अभी भी बहुत ज्यादा नहीं है।
Flipkart Minutes की रफ्तार ने चौंकाया
Flipkart Minutes के पूरे वित्तीय आंकड़े सार्वजनिक रूप से Blinkit की तरह उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए इसके ऑर्डर और स्टोर से जुड़े कुछ आंकड़े अनुमान या UBS के आकलन पर आधारित हैं। 6 सितंबर 2026 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, Flipkart Minutes अब अनुमानित तौर पर रोजाना 11 लाख से 12 लाख ऑर्डर संभाल रहा है। पिछले साल नवंबर में यह आंकड़ा करीब 3.90 लाख से 4 लाख ऑर्डर प्रतिदिन था। यह आधिकारिक Flipkart आंकड़ा नहीं, बल्कि रिपोर्ट में दिया गया अनुमान है।
वहीं स्टोर नेटवर्क के मामले में Flipkart ने आधिकारिक तौर पर जून 2026 में बताया था कि Minutes ने 1,000 माइक्रो-फुलफिलमेंट सेंटर का आंकड़ा पार कर लिया है। ये सेंटर 130 से ज्यादा शहरों और 8,000 से ज्यादा पिनकोड में फैले थे। कंपनी ने नेटवर्क को 2026 के अंत तक करीब 1,500 सेंटर तक ले जाने की योजना भी बताई थी।
UBS के आकलन के मुताबिक, Minutes का एक औसत स्टोर रोजाना 800-1,000 ऑर्डर संभाल रहा है। करीब पांच-छह महीने पुराने स्टोरों में यह संख्या 1,200-1,500 ऑर्डर प्रतिदिन तक पहुंच सकती है।
ऑर्डर के मामले में कितना अंतर?
अगर Flipkart Minutes के रोजाना 12 लाख ऑर्डर के ऊपरी अनुमान को आधार माना जाए, तो 91 दिनों की एक तिमाही में करीब 10.92 करोड़ ऑर्डर बनते हैं। यह Blinkit के 33.1 करोड़ तिमाही ऑर्डर का लगभग एक-तिहाई है। इसलिए यहां एक बात साफ समझनी जरूरी है- Minutes की औसत ऑर्डर वैल्यू Blinkit के करीब पहुंच रही है, लेकिन कुल ऑर्डर की संख्या अभी काफी पीछे है। 11-12 लाख रोजाना ऑर्डर का आंकड़ा अनुमान है, जबकि Blinkit के 33.1 करोड़ तिमाही ऑर्डर कंपनी के रिपोर्टेड आंकड़े हैं।
Flipkart को पुराने ग्राहक आधार का फायदा
Flipkart Minutes की सबसे बड़ी ताकत यह है कि उसे ग्राहक आधार शून्य से तैयार नहीं करना पड़ रहा। Flipkart के पास पहले से करोड़ों ग्राहक, विक्रेता, भुगतान नेटवर्क, गोदाम और डिलीवरी का बुनियादी ढांचा मौजूद है।
UBS के आकलन के मुताबिक, जिन जगहों पर Minutes उपलब्ध है, वहां Flipkart पर आने वाले करीब 40-45 फीसदी ग्राहक उसके क्विक कॉमर्स सेक्शन का भी इस्तेमाल करते हैं। यह आंकड़ा भी आधिकारिक कंपनी आंकड़ा नहीं, बल्कि UBS के चेक्स पर आधारित अनुमान है।
यही वजह है कि Flipkart के लिए Minutes को बढ़ाना किसी नए क्विक-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के मुकाबले आसान हो सकता है। ग्राहक पहले से Flipkart पर मौजूद हैं और कंपनी उन्हें रोजमर्रा की खरीदारी के लिए उसी ऐप पर बनाए रखना चाहती है।
मोबाइल से किराने तक पहुंचने की कोशिश
Flipkart की ताकत लंबे समय से मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसी बड़ी खरीदारी में रही है। अब Minutes के जरिए कंपनी रोजमर्रा के सामान की खरीदारी भी अपने प्लेटफॉर्म पर लाना चाहती है। एक ग्राहक सोमवार को किराना, बुधवार को कॉस्मेटिक्स और शुक्रवार को स्मार्टफोन खरीद सकता है। कंपनी के लिए लक्ष्य यही है कि बड़ी खरीदारी के बीच भी ग्राहक रोजमर्रा की जरूरतों के लिए Flipkart पर वापस आता रहे।
यहीं पर Blinkit और Flipkart Minutes की रणनीति एक-दूसरे से टकराती है। Flipkart को Blinkit जैसी बार-बार होने वाली खरीदारी चाहिए, जबकि Blinkit धीरे-धीरे बड़ी और ज्यादा कैटेगरीज वाले सामान की तरफ बढ़ रहा है। Blinkit अब सिर्फ दूध, फल और सब्जियों तक सीमित नहीं है। ब्यूटी प्रोडक्ट्स, खिलौने, छोटे इलेक्ट्रॉनिक्स, स्टेशनरी और दूसरे सामान भी उसके कारोबार का हिस्सा बन रहे हैं।
असली परीक्षा होगी मुनाफे की
Flipkart Minutes के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ ज्यादा स्टोर खोलना नहीं, बल्कि उन स्टोरों को पर्याप्त ऑर्डर और मुनाफे तक पहुंचाना है। UBS के आकलन के मुताबिक, करीब 500-600 रुपये की औसत ऑर्डर वैल्यू पर एक परिपक्व Minutes स्टोर को ब्रेक-ईवन के करीब पहुंचने के लिए लगभग 1,400-1,500 ऑर्डर प्रतिदिन की जरूरत हो सकती है। जबकि औसत स्टोर अभी इससे नीचे है। यह भी कंपनी का आधिकारिक आंकड़ा नहीं, बल्कि आकलन है।
दूसरी तरफ Blinkit के एक स्टोर ने जून तिमाही में औसतन 8.27 लाख रुपये का नेट ऑर्डर वैल्यू प्रतिदिन दर्ज किया। कंपनी का मानना है कि एक परिपक्व स्टोर आगे चलकर 11 लाख रुपये प्रतिदिन तक पहुंच सकता है। वहीं एक Blinkit स्टोर और उससे जुड़ी वेयरहाउसिंग के लिए करीब 2.5 करोड़ रुपये के पूंजीगत खर्च का अनुमान है।
छोटे शहरों पर भी नजर
Flipkart Minutes की रणनीति सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित नहीं है। कंपनी ने जून में बताया था कि उसका नेटवर्क 130 से ज्यादा शहरों और 8,000 से ज्यादा पिनकोड तक पहुंच चुका है। Tier-II और Tier-III शहरों में भी तेज विस्तार हो रहा है। कंपनी के मुताबिक, इन बाजारों में उसका कारोबार पिछले साल की तुलना में 42 गुना बढ़ा था।
उत्तर प्रदेश भी Minutes के विस्तार में अहम भूमिका निभा रहा है। कंपनी ने जून में गोरखपुर में अपना 1,000वां माइक्रो-फुलफिलमेंट सेंटर खोला था। उत्तर प्रदेश में ऑर्डर सालाना आधार पर 6 गुना बढ़ने और राज्य के Tier-II व Tier-III बाजारों में 20 गुना वृद्धि की जानकारी कंपनी ने दी थी।
फिलहाल Blinkit आगे, लेकिन Flipkart की रफ्तार तेज
मौजूदा तस्वीर में Blinkit के पास ऑर्डर, स्टोर, ग्राहक और घोषित मुनाफे के मामले में साफ बढ़त है। वहीं Flipkart Minutes की सबसे बड़ी ताकत उसका तेज विस्तार, पहले से मौजूद ग्राहक आधार और इलेक्ट्रॉनिक्स समेत कई कैटेगरीज में मजबूत पकड़ है। इस मुकाबले में सिर्फ ऑर्डर वैल्यू देखना पर्याप्त नहीं होगा। क्विक कॉमर्स का असली खेल ऑर्डर की संख्या, ग्राहक कितनी बार लौटता है, स्टोर की क्षमता, डिलीवरी लागत और हर ऑर्डर पर होने वाली कमाई से तय होगा।
Flipkart Minutes ने दो साल से भी कम समय में 1,000 से ज्यादा सेंटर खड़े कर दिए हैं और ऑर्डर तेजी से बढ़ाए हैं। लेकिन अब अगला सवाल यह है कि क्या वह इस रफ्तार को लंबे समय तक मुनाफे में बदल पाएगा। फिलहाल कहा जा सकता है कि Blinkit के पास बढ़त है, लेकिन Flipkart Minutes तेजी से पीछा कर रहा है। आने वाले समय में असली मुकाबला इस बात पर होगा कि कौन कम लागत में ज्यादा ग्राहकों को बार-बार ऑर्डर करने के लिए तैयार कर पाता है।
एचएसबीसी प्राइवेट बैंक ने रोनाल्ड ओमान को ग्लोबल हेड ऑफ मार्केटिंग नियुक्त किया है। ओमान 2 नवंबर से नई भूमिका संभालेंगे और वैश्विक मार्केटिंग रणनीति की जिम्मेदारी देखेंगे।
by
Samachar4media Bureau
एचएसबीसी प्राइवेट बैंक (HSBC Private Bank) ने रोनाल्ड ओमान (Ronald Oman) को ग्लोबल हेड ऑफ मार्केटिंग नियुक्त किया है। वह 2 नवंबर से नई जिम्मेदारी संभालेंगे।
ओमान के पास इन्वेस्टमेंट बैंकिंग (Investment Banking), एसेट मैनेजमेंट (Asset Management) और प्राइवेट बैंकिंग (Private Banking) में मार्केटिंग का 25 साल का अनुभव है। वह यूरोप, मध्य पूर्व और अफ्रीका (EMEA) तथा एशिया में 15 साल से ज्यादा समय तक सीनियर लीडरशिप भूमिकाओं में काम कर चुके हैं।
इससे पहले ओमान यूरोपीय एसेट मैनेजर अमुंडी (Amundi) से जुड़े थे। यहां उन्होंने दो साल तक अल्टरनेटिव्स और प्राइवेट एसेट्स के लिए ग्लोबल हेड ऑफ मार्केटिंग एंड कम्युनिकेशन की जिम्मेदारी संभाली। नई भूमिका में वह एचएसबीसी प्राइवेट बैंक की ग्लोबल मार्केटिंग स्ट्रैटेजी का नेतृत्व करेंगे। उनका फोकस ग्राहकों को उपयोगी जानकारी, नए अवसरों और वित्तीय समाधानों से जोड़ने पर रहेगा।
अमुंडी से पहले ओमान ने जेपी मॉर्गन (J.P. Morgan) में 14 साल से ज्यादा समय बिताया। इस दौरान उन्होंने प्राइवेट बैंकिंग कारोबार में कई सीनियर मार्केटिंग पद संभाले। जुलाई 2021 से सितंबर 2024 तक वह ईएमईए प्राइवेट बैंक के चीफ मार्केटिंग ऑफिसर रहे और ईएमईए मैनेजमेंट कमेटी के सदस्य भी थे।
इससे पहले वह हेड ऑफ एक्विजिशन मार्केटिंग और हेड ऑफ प्रोडक्ट मार्केटिंग की जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं। उन्होंने इन्वेस्टमेंट्स मार्केटिंग से जुड़ी लीडरशिप भूमिकाओं में भी काम किया है।
करियर के शुरुआती दौर में ओमान सोसाइटी जेनरल कॉरपोरेट एंड इन्वेस्टमेंट बैंकिंग (Société Générale Corporate and Investment Banking) में ग्लोबल इक्विटीज एंड डेरिवेटिव्स सॉल्यूशंस के लिए ग्लोबल हेड ऑफ कॉरपोरेट कम्युनिकेशन रहे। उन्होंने अमुंडी एसेट मैनेजमेंट (Amundi Asset Management) में भी ग्लोबल इंस्टीट्यूशनल मार्केटिंग और कम्युनिकेशन से जुड़ी जिम्मेदारियां निभाईं।
इसी वजह से जहां एक तरफ टेलीविजन, अखबार और रेडियो जैसे पारंपरिक माध्यम अहम बने हुए हैं, वहीं दूसरी तरफ सोशल मीडिया क्रिएटर्स के जरिए प्रचार करने का चलन भी बढ़ रहा है।
by
Vikas Saxena
विज्ञापन की दुनिया में कंपनियों के सामने अब सिर्फ अपने ब्रैंड को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने की चुनौती नहीं है, लेकिन वे यह भी जानना चाहती हैं कि विज्ञापन पर खर्च किए गए पैसे से कितने नए ग्राहक मिल रहे हैं और सेल्स में कितना इजाफा हो रहा है। इसी वजह से जहां एक तरफ टेलीविजन, अखबार और रेडियो जैसे पारंपरिक माध्यम अहम बने हुए हैं, वहीं दूसरी तरफ सोशल मीडिया क्रिएटर्स के जरिए प्रचार करने का चलन भी बढ़ रहा है।
सितंबर और अक्टूबर 2026 में प्रकाशित रिपोर्टों से पता चलता है कि भारत का विज्ञापन बाजार डिजिटल माध्यमों की ओर बढ़ रहा है और ब्रैंड क्रिएटर साझेदारी को भी ज्यादा गंभीरता से ले रहे हैं। हालांकि, इन आंकड़ों के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग हर कंपनी के लिए पारंपरिक विज्ञापन से ज्यादा फायदेमंद है। दोनों माध्यमों की उपयोगिता कंपनी के लक्ष्य, बजट, ग्राहक और विज्ञापन के नतीजों पर निर्भर करती है।
भारत का विज्ञापन बाजार कितना बड़ा हो रहा है?
18 सितंबर 2026 को प्रकाशित DCODE 2.0 रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का कुल विज्ञापन बाजार 2025 के अनुमानित 1.85 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2026 में 2 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। रिपोर्ट में 2025 के विज्ञापन खर्च में डिजिटल माध्यमों की हिस्सेदारी 60 फीसदी, टेलीविजन की 26 फीसदी और प्रिंट की 10 फीसदी बताई गई है। 2026 के लिए कुल विज्ञापन बाजार में करीब 9.7 फीसदी की बढ़त का अनुमान लगाया गया है।
यहां एक जरूरी अंतर समझना चाहिए। डिजिटल विज्ञापन में सोशल मीडिया विज्ञापन के अलावा सर्च विज्ञापन, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर प्रचार, कनेक्टेड टीवी और दूसरे डिजिटल माध्यम भी शामिल हैं। इसलिए डिजिटल विज्ञापन की 60 फीसदी हिस्सेदारी को इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग की हिस्सेदारी नहीं माना जा सकता।
14 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित TAM AdEx के आंकड़ों के मुताबिक, 1 जुलाई से 28 सितंबर 2026 के बीच डिजिटल विज्ञापन गतिविधि का सूचकांक पिछले साल के आधार 100 से बढ़कर 124.5 हो गया। यानी इसमें 24.5 फीसदी की बढ़त दर्ज की गई। इसी अवधि में टेलीविजन का सूचकांक 91.4 और प्रिंट का 94.7 रहा। रेडियो का सूचकांक 101.1 था।
ये आंकड़े विज्ञापन गतिविधि में बदलाव दिखाते हैं, न कि विज्ञापन दरों, कंपनियों की कमाई या इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग के निवेश पर रिटर्न को। इसलिए इनके आधार पर सीधे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि ब्रैंड ने टेलीविजन से बजट निकालकर क्रिएटर्स को देना शुरू कर दिया है।
इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग पर ब्रैंड का कितना भरोसा बढ़ा?
14 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित इंडियन इन्फ्लुएंसर गवर्निंग काउंसिल (IIGC) की रिपोर्ट में 100 से ज्यादा ब्रैंड और मार्केटिंग प्रोफेशनल्स के सर्वे का हवाला दिया गया। इसके मुताबिक, कंपनियों के मार्केटिंग बजट का 15 से 25 फीसदी हिस्सा क्रिएटर आधारित गतिविधियों की ओर जा रहा है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि ब्रैंड अब क्रिएटर्स को केवल प्रचार करने वाले चेहरे के बजाय उपभोक्ताओं का भरोसा बढ़ाने, उत्पाद के प्रति रुचि पैदा करने और सेल्स में मदद करने वाले साझेदार के रूप में देख रहे हैं। हालांकि, यह आंकड़ा सर्वे में शामिल ब्रैंड के बजट से जुड़ा है। इसे पूरे भारतीय विज्ञापन बाजार में इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग की हिस्सेदारी नहीं माना जाना चाहिए।
क्रिएटर मार्केटिंग की खासियत यह है कि कंपनियां अपने उत्पाद के हिसाब से सही दर्शक वर्ग तक पहुंच सकती हैं। उदाहरण के लिए, सौंदर्य उत्पाद बेचने वाली कंपनी मेकअप से जुड़े वीडियो बनाने वाले क्रिएटर के साथ काम कर सकती है। इसी तरह, मोबाइल फोन बनाने वाली कंपनी तकनीक की जानकारी देने वाले क्रिएटर को चुन सकती है।
इस तरीके से विज्ञापन को उस वर्ग तक पहुंचाने में मदद मिल सकती है, जिसकी उत्पाद में पहले से दिलचस्पी है। लेकिन इसका फायदा तभी सामने आएगा, जब दर्शक विज्ञापन देखने के बाद उत्पाद में रुचि लें और खरीदारी भी करें।
लंबे समय की साझेदारी पर बढ़ रहा जोर
क्रिएटर मार्केटिंग में अब केवल एक पोस्ट या रील बनवाने के बजाय लंबे समय तक साझेदारी करने पर भी ध्यान दिया जा रहा है। मई 2026 में जारी Kofluence की वार्षिक रिपोर्ट में शामिल सर्वे के मुताबिक, 62.1 फीसदी ब्रैंड प्रोफेशनल्स ने माना कि लंबे समय की क्रिएटर साझेदारी एक बार के अभियान के मुकाबले बेहतर निवेश रिटर्न दे सकती है। रिपोर्ट में 76.6 फीसदी ब्रैंड द्वारा इन्फ्लुएंसर्स के साथ साझेदारी वाले विज्ञापन चलाने की जानकारी भी दी गई।
यहां भी आंकड़ों का सही मतलब समझना जरूरी है। 62.1 फीसदी का आंकड़ा उन ब्रैंड प्रोफेशनल्स की राय बताता है, जो लंबे समय की साझेदारी को बेहतर मानते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि सभी कंपनियों को 62.1 फीसदी ज्यादा सेल्स या मुनाफा मिला है। इसी तरह, 76.6 फीसदी का आंकड़ा साझेदारी वाले विज्ञापनों के इस्तेमाल से जुड़ा है, न कि उनकी सफलता की दर से।
लंबे समय की साझेदारी का फायदा यह हो सकता है कि दर्शक किसी क्रिएटर के जरिए एक ही ब्रैंड को बार-बार देखें और उसके उत्पादों को बेहतर तरीके से समझें। फिर भी, बार-बार दिखने से सेल्स बढ़ना तय नहीं है। उत्पाद की गुणवत्ता, कीमत, ग्राहक की जरूरत और खरीदारी का अनुभव भी उतने ही जरूरी हैं।
क्रिएटर की फीस कितनी है? एक तय दर बताना मुश्किल
इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग की लागत समझने में सबसे बड़ी परेशानी यह है कि सभी क्रिएटर्स की फीस एक जैसी नहीं होती। किसी क्रिएटर के फॉलोअर्स ज्यादा हो सकते हैं, लेकिन उसके वीडियो पर प्रतिक्रिया कम मिलती हो। दूसरी तरफ, छोटा क्रिएटर किसी खास क्षेत्र, भाषा या ग्राहक वर्ग में मजबूत पकड़ रख सकता है।
फीस तय करते समय फॉलोअर्स की संख्या के अलावा वीडियो की पहुंच, दर्शकों की सक्रियता, सामग्री बनाने का खर्च, प्लेटफॉर्म, अभियान की अवधि और ब्रैंड को सामग्री के दोबारा इस्तेमाल के अधिकार जैसे पहलू भी मायने रखते हैं।
इस रिसर्च के लिए सितंबर और अक्टूबर 2026 में प्रकाशित ऐसी कोई व्यापक, स्वतंत्र दर-सूची प्रमाणित नहीं हुई, जो भारत में अलग-अलग श्रेणियों के क्रिएटर्स की वास्तविक फीस का तुलनीय औसत बताती हो। इसलिए किसी खास क्रिएटर के लिए तय रकम या औसत फीस का दावा करना उचित नहीं होगा।
ब्रैंड के लिए जरूरी है कि वह सिर्फ कम फीस देखकर क्रिएटर न चुने। उसे यह भी देखना चाहिए कि उस खर्च से कितने सही दर्शकों तक पहुंचा जा सकेगा और अभियान से कितने ग्राहक मिलने की संभावना है।
ज्यादा व्यूज का मतलब ज्यादा सेल्स नहीं
इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग की सफलता मापने में लाइक, कमेंट और वीडियो के व्यूज सबसे आसानी से दिखाई देने वाले आंकड़े हैं। लेकिन ये अपने आप में सेल्स का प्रमाण नहीं हैं।
मान लीजिए, किसी क्रिएटर के वीडियो को पांच लाख लोगों ने देखा, लेकिन उससे बहुत कम ऑर्डर मिले। वहीं किसी छोटे क्रिएटर के वीडियो को 50 हजार लोगों ने देखा और उससे ज्यादा खरीदारी हुई। ऐसी स्थिति में केवल व्यूज के आधार पर पहले अभियान को सफल कहना सही नहीं होगा।
कंपनियों को यह भी पता लगाना चाहिए कि कितने लोगों ने लिंक पर क्लिक किया, कितने ग्राहकों ने खरीदारी की और एक नया ग्राहक हासिल करने में कितना खर्च आया। इसके लिए अलग-अलग लिंक, कूपन कोड, सेल्स के आंकड़े और अभियान से पहले तथा बाद के प्रदर्शन की तुलना की जा सकती है।
उदाहरण के लिए, यदि किसी अभियान पर एक लाख रुपये खर्च हुए और उससे तीन लाख रुपये की सेल्स हुई, तो विज्ञापन खर्च के मुकाबले सेल्स तीन गुना है। लेकिन इसका मतलब तीन गुना मुनाफा नहीं है। उत्पाद की लागत, छूट, डिलीवरी, रिटर्न और अन्य खर्च घटाने के बाद ही असली कमाई का पता चलेगा।
साथ ही, यह देखना भी जरूरी है कि अभियान से वास्तव में नई सेल्स हुई या उन ग्राहकों ने ही खरीदारी की, जो पहले से उत्पाद खरीदने वाले थे। इस अंतर को समझे बिना विज्ञापन के वास्तविक योगदान का सही आकलन करना मुश्किल है।
पारंपरिक विज्ञापन को नजरअंदाज करना सही नहीं
टेलीविजन, अखबार और रेडियो की अपनी ताकत है। ये माध्यम बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंचने, किसी नए उत्पाद की जानकारी देने और ब्रैंड की पहचान बनाने में उपयोगी हो सकते हैं। बड़े स्तर पर उत्पाद लॉन्च करने वाली कंपनियों के लिए व्यापक पहुंच अब भी महत्वपूर्ण है।
दूसरी तरफ, क्रिएटर उत्पाद का इस्तेमाल करके दिखा सकता है, उसके बारे में विस्तार से समझा सकता है और दर्शकों के सवालों का जवाब दे सकता है। इससे ग्राहक को उत्पाद के बारे में जानकारी हासिल करने में मदद मिल सकती है।
कई ब्रैंड के लिए दोनों माध्यमों को साथ इस्तेमाल करना ज्यादा उपयोगी हो सकता है। उदाहरण के तौर पर, कोई कंपनी टीवी विज्ञापन से अपने नए उत्पाद की जानकारी बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंचाए और फिर क्रिएटर्स के जरिए उसके इस्तेमाल और खूबियों को समझाए। इसके बाद कंपनी सेल्स और ग्राहक हासिल करने की लागत के आधार पर अलग-अलग माध्यमों के योगदान का आकलन कर सकती है।
हालांकि, ऐसे संयुक्त अभियान में यह तय करना आसान नहीं होता कि सेल्स का कितना हिस्सा टीवी विज्ञापन, क्रिएटर की सामग्री या दूसरे माध्यमों से आया। इसलिए कंपनियों को केवल अनुमान के बजाय ट्रैकिंग और नियंत्रित परीक्षणों की मदद लेनी चाहिए।
ब्रैंड को कहां मिल रहा ज्यादा फायदा?
सितंबर और अक्टूबर 2026 में प्रकाशित आंकड़े भारत के विज्ञापन बाजार में डिजिटल माध्यमों की मजबूत भूमिका और क्रिएटर साझेदारी में ब्रैंड की बढ़ती दिलचस्पी दिखाते हैं। लेकिन उपलब्ध आंकड़े यह साबित नहीं करते कि इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग हर स्थिति में पारंपरिक विज्ञापन से ज्यादा सेल्स या मुनाफा देती है।
अगर कंपनी का लक्ष्य कम समय में बड़ी आबादी तक पहुंचना और ब्रैंड की पहचान मजबूत करना है, तो टेलीविजन, प्रिंट और दूसरे व्यापक माध्यम उपयोगी हो सकते हैं। वहीं, किसी खास ग्राहक वर्ग तक पहुंचने, उत्पाद को समझाने और डिजिटल सेल्स के नतीजों को मापने के लिए क्रिएटर मार्केटिंग बेहतर विकल्प बन सकती है।
आखिरकार, ब्रैंड को यह नहीं देखना चाहिए कि किस माध्यम पर ज्यादा व्यूज आए या किसकी पहुंच बड़ी है। उसे यह समझना होगा कि किस माध्यम ने नए ग्राहक दिलाए, ग्राहक हासिल करने की लागत कितनी रही और कारोबार को कितना अतिरिक्त फायदा मिला। विज्ञापन की सफलता का असली पैमाना खर्च के मुकाबले मिलने वाला वास्तविक परिणाम है, न कि केवल लोकप्रियता।
गो क्विक ने आशीमा चौधरी को ब्रांड मैनेजर नियुक्त किया है। इससे पहले वह डब्ल्यूपीपी में एसोसिएट बिजनेस डायरेक्टर-रणनीति एवं प्लानिंग की जिम्मेदारी संभाल रही थीं और करीब पांच साल जुड़ी रहीं।
by
Samachar4media Bureau
गो क्विक (GoKwik) ने आशीमा चौधरी (Ashima Chaudhary) को ब्रांड मैनेजर के पद पर नियुक्त किया है। चौधरी ने लिंक्डइन (LinkedIn) पोस्ट के जरिए अपनी नई जिम्मेदारी की जानकारी साझा की।
उन्होंने अपनी पोस्ट में लिखा, “मुझे यह बताते हुए खुशी हो रही है कि मैंने गो क्विक में ब्रांड मैनेजर के तौर पर नई जिम्मेदारी संभाली है। इस नए सफर और आगे आने वाले अवसरों को लेकर उत्साहित हूं।”
इससे पहले चौधरी डब्ल्यूपीपी (WPP) में एसोसिएट बिजनेस डायरेक्टर-रणनीति एवं प्लानिंग के पद पर काम कर रही थीं। वह करीब पांच साल तक डब्ल्यूपीपी से जुड़ी रहीं। उन्होंने दिसंबर 2021 में बिजनेस मैनेजर-रणनीति एवं प्लानिंग के तौर पर कंपनी के साथ अपना सफर शुरू किया था।
अपने करियर में चौधरी मार्श इंडिया (Marsh India) और ईटेबल (Eatable) के साथ भी काम कर चुकी हैं।
नील मूर्ति को रिपलिंग में चीफ मार्केटिंग ऑफिसर बनाया गया है। इससे पहले वह कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट-ग्रोथ की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। उन्होंने गोल्डबेली और अन्य संगठनों में भी काम किया है।
by
Samachar4media Bureau
नील मूर्ति (Neel Murthy) को रिपलिंग (Rippling) में चीफ मार्केटिंग ऑफिसर बनाया गया है। पदोन्नति से पहले वह कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट-ग्रोथ की जिम्मेदारी संभाल रहे थे।
रिपलिंग से जुड़ने से पहले मूर्ति गोल्डबेली (Goldbelly) और सेफ डिपॉजिट बॉक्स इंश्योरेंस कवरेज एलएलसी (Safe Deposit Box Insurance Coverage, LLC) समेत कई संगठनों के साथ काम कर चुके हैं।
तरुणदीप सिंह राणा ने एल्केम लैबोरेटरीज में हेड – कंज्यूमर बिजनेस की जिम्मेदारी संभाली है। उनके पास कंज्यूमर हेल्थकेयर, मार्केटिंग, सेल्स और बिजनेस ट्रांसफॉर्मेशन का 25 वर्षों से अधिक अनुभव है।
by
Samachar4media Bureau
तरुणदीप सिंह राणा ने एल्केम लैबोरेटरीज (Alkem Laboratories) में हेड – कंज्यूमर बिजनेस के रूप में नई जिम्मेदारी संभाली है। उनके पास कंज्यूमर हेल्थकेयर, कंज्यूमर प्रोडक्ट्स, मार्केटिंग और सेल्स, कमर्शियल एक्सीलेंस, बिजनेस ट्रांसफॉर्मेशन, एचसीपी आउटरीच और पीएंडएल मैनेजमेंट में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव है।
एल्केम से जुड़ने से पहले तरुणदीप जाइडस हेल्थकेयर लिमिटेड (Zydus Healthcare Limited) में चीफ मार्केटिंग ऑफिसर के पद पर कार्यरत थे। जाइडस से पहले उन्होंने सन फार्मा कंज्यूमर हेल्थकेयर (Sun Pharma Consumer Healthcare) में कई महत्वपूर्ण नेतृत्व भूमिकाएं संभालीं।
इससे पहले वह डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज (Dr. Reddy’s Laboratories) से जुड़े थे, जहां उन्होंने कंपनी के ग्लोबल ओटीसी (OTC) कारोबार का नेतृत्व किया। इसके अलावा उन्होंने हमदर्द लैबोरेटरीज (Hamdard Laboratories) में भी काम किया।
यहां पुराने और स्थापित ब्रांड्स को दोबारा मजबूत करने, कारोबार बढ़ाने और बेहतर प्रदर्शन करने वाली टीमों का नेतृत्व करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
अपने करियर के दौरान तरुणदीप ने भारत के साथ-साथ उभरते बाजारों में स्थापित ब्रांड्स और नए कारोबार को विकसित किया है। उन्होंने उपभोक्ता-केंद्रित ब्रांड निर्माण के साथ कमर्शियल लीडरशिप और बिजनेस ट्रांसफॉर्मेशन को जोड़कर कारोबार को आगे बढ़ाने का काम किया है।
एंड्रयू कैट्ज ने जेनरस ब्रांड्स में चीफ मार्केटिंग ऑफिसर की जिम्मेदारी संभाली है। वह कंपनी के कंज्यूमर ब्रांड्स की मार्केटिंग लीड करेंगे और ब्रांड रणनीति, क्रिएटिव और परफॉर्मेंस मार्केटिंग संभालेंगे।
by
Samachar4media Bureau
एंड्रयू कैट्ज (Andrew Katz) ने जेनरस ब्रांड्स (Generous Brands) में चीफ मार्केटिंग ऑफिसर यानी सीएमओ (CMO) की नई जिम्मेदारी संभाली है। वह कंपनी के कंज्यूमर ब्रांड्स के पूरे पोर्टफोलियो में मार्केटिंग संगठन का नेतृत्व करेंगे।
इसमें बोल्टहाउस फार्म्स (Bolthouse Farms), हेल्थ-एड (Health-Ade), इवोल्यूशन फ्रेश (Evolution Fresh) और सांबाजॉन (SAMBAZON) जैसे ब्रांड शामिल हैं।
नई भूमिका में कैट्ज ब्रांड स्ट्रैटेजी, कंज्यूमर इनसाइट्स, क्रिएटिव और परफॉर्मेंस मार्केटिंग की देखरेख करेंगे। इन सभी क्षेत्रों को एक साथ लाकर उनका फोकस कंपनी के पूरे पोर्टफोलियो में ग्रोथ को बढ़ाने पर रहेगा।
जेनरस ब्रांड्स से पहले कैट्ज अक्टूबर 2021 से अप्रैल 2026 तक एथलेटिक ब्रूइंग कंपनी (Athletic Brewing Company) में चीफ मार्केटिंग ऑफिसर रहे। उनके कार्यकाल के दौरान कंपनी के नॉन-अल्कोहलिक क्राफ्ट बीयर ब्रांड को बढ़ाने पर खास फोकस रहा। वर्ष 2022 से 2025 के बीच कंपनी ने सालाना रेवेन्यू में 38 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वृद्धि दर दर्ज की।
एथलेटिक ब्रूइंग में कैट्ज की जिम्मेदारियों में ब्रांड इन्वेस्टमेंट, कंज्यूमर सेगमेंटेशन, क्रिएटिव स्ट्रैटेजी और मार्केटिंग एनालिटिक्स शामिल रहे। उन्होंने मार्केटिंग मेजरमेंट से जुड़ी क्षमताएं भी विकसित कीं, जिनमें मार्केटिंग मिक्स मॉडलिंग, ब्रांड हेल्थ ट्रैकिंग, क्रिएटिव इवैल्यूएशन और मल्टी-टच एट्रिब्यूशन शामिल थे।
कैट्ज ने कई कैंपेन का नेतृत्व किया और लाइव नेशन (Live Nation) तथा प्रीमियर लैक्रोस लीग (Premier Lacrosse League) के साथ पार्टनरशिप विकसित की। इसके अलावा नेटफ्लिक्स (Netflix) और आयरनमैन (Ironman) के साथ प्रोडक्ट कोलैबोरेशन में भी उनकी भूमिका रही।
एथलेटिक ब्रूइंग से पहले कैट्ज ने 2018 से 2021 तक वर्चुअल फिटनेस प्लेटफॉर्म इंस्ट्रक्टर (Instructrr) की स्थापना की और चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर के रूप में इसका नेतृत्व किया। इससे पहले वह हेनेकेन (Heineken) में डॉस इक्विस (Dos Equis) के वाइस प्रेसिडेंट ऑफ मार्केटिंग रहे। यहां उन्होंने कंपनी के ‘मोस्ट इंटरेस्टिंग मैन’ कैंपेन के खत्म होने के बाद ब्रांड की नई पहचान और स्ट्रैटेजिक दिशा तय करने में भूमिका निभाई।
उनके शुरुआती करियर में अमेरिकन एक्सप्रेस (American Express) और पेप्सिको (PepsiCo) में मार्केटिंग और एडवरटाइजिंग से जुड़ी लीडरशिप भूमिकाएं शामिल रहीं। अमेरिकन एक्सप्रेस में उन्होंने ब्रांड और कस्टमर एक्विजिशन स्ट्रैटेजी के साथ वॉलमार्ट (Walmart) के साथ साझेदारी में विकसित फाइनेंशियल सर्विस प्रोडक्ट ब्लूबर्ड (Bluebird) की लॉन्चिंग पर काम किया।
वरुण मुंद्रा इससे पहले मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज (Motilal Oswal Financial Services) में कार्यरत थे।
by
Samachar4media Bureau
ड्रीम11 ग्रुप की कंपनी ड्रीमस्ट्रीट (DreamStreet) ने वरुण मुंद्रा (Varun Mundra) को हेड ऑफ मार्केटिंग एंड ग्रोथ नियुक्त किया है। वह कंपनी में मार्केटिंग और ग्रोथ से जुड़ी जिम्मेदारियां संभालेंगे।
वरुण मुंद्रा इससे पहले मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज (Motilal Oswal Financial Services) में कार्यरत थे। वह करीब चार साल तक इस कंपनी से जुड़े रहे। यहां उनकी आखिरी जिम्मेदारी सीनियर वाइस प्रेजिडेंट और हेड–ग्रुप मीडिया एंड इनोवेशंस की थी।
अपने करियर के शुरुआती दौर में मुंद्रा द ग्लिच (The Glitch), व्हाइट रिवर्स मीडिया (White Rivers Media), आइसोबार (Isobar) और जैक इन द बॉक्स वर्ल्डवाइड (Jack in the Box Worldwide) जैसी प्रतिष्ठित कंपनियों के साथ भी काम कर चुके हैं।
बता दें कि कंपनी ड्रीम11 के व्यापक कारोबारी इकोसिस्टम के भीतर अपने कारोबार को आगे बढ़ाने की दिशा में काम कर रही है।
लंदन में यौन उत्पीड़न के आरोपों में गिरफ्तार भारतीय वकील विजय अग्रवाल को ब्रिटेन की अदालत ने जमानत देने से इनकार कर दिया है।
by
Vikas Saxena
भारतीय बाजार में ब्रैंड सिर्फ एक नाम नहीं, रोज की आदत है। माना जाता है कि किराना दुकान पर कई ग्राहक पैक का रंग और आकार देखकर ही सामान पहचान लेते हैं, नाम पढ़कर नहीं। इसीलिए जब कोई कंपनी लोगो, नाम या पैकेजिंग बदलने का फैसला करती है, तो वह सिर्फ डिजाइन नहीं बदलती, जमा हुआ भरोसा भी दांव पर लगाती है। सवाल यह है कि यह दांव कब सही बैठता है और कब केवल दिखावटी बदलाव बनकर रह जाता है।
रीब्रैंडिंग के पीछे की कारोबारी वजहें
कारोबार का दायरा बढ़ना: Vasmol और Streax बनाने वाली कंपनी हाइजीनिक रिसर्च इंस्टीट्यूट (HRI) ने 13 अक्टूबर 2026 को नई कॉर्पोरेट पहचान, नया लोगो और टैगलाइन 'Where Beauty Evolves' पेश की। कंपनी का कहना है कि वह एक ब्रैंड और एक श्रेणी वाले कारोबार से बढ़कर कई ब्रैंड और कई श्रेणियों वाला संगठन बन चुकी है। यानी पहचान बदलने की वजह कारोबार का बदलना था, सिर्फ चेहरा नहीं।
नई पीढ़ी का उपभोक्ता: आयुर्वेद आधारित बच्चों के ब्रैंड BabyOrgano ने 17 अक्टूबर 2026 को 'BabyOrgano 2.0' के तहत नई पहचान, नई पैकेजिंग और कछुए के रूप में नया मैस्कॉट 'Oru' उतारा। ब्रैंड का दावा है कि उससे 20 लाख से ज्यादा माता-पिता जुड़े हैं और अब वह पिताओं तथा देखभाल करने वाले दूसरे लोगों तक भी पहुंचना चाहता है।
नाम और ढांचे में बदलाव: अक्टूबर 2026 में ICICI प्रूडेंशियल लाइफ इंश्योरेंस ने 'ICICI Life Insurance' नाम के साथ नई ब्रैंड पहचान और टैगलाइन 'Har Kal Aasaan' पेश की। यह उदाहरण सेवा क्षेत्र का है, फिर भी बताता है कि बड़े ब्रैंड नाम तक बदलने से नहीं हिचकते।
निवेश की दिशा: 4 सितंबर 2026 को कैपिटल मार्केट्स डे में हिन्दुस्तान यूनिलीवर (HUL) ने बताया कि वह पूंजीगत खर्च को टर्नओवर के करीब 2% से बढ़ाकर 3% करेगी। कंपनी का FY26 (अप्रैल 2025–मार्च 2026) टर्नओवर ₹63,763 करोड़ और EBITDA मार्जिन 23.6% रहा। HUL के मुताबिक प्रीमियम ब्रैंडों पर टर्नओवर के अनुपात में लगभग दोगुना निवेश होता है। यानी कंपनी का जोर प्रीमियम ब्रैंडों और क्षमता निर्माण पर है।
Parle-G: पहचान बदली नहीं, संभालकर रखी
पार्ले-जी का सबसे बड़ा रीब्रैंडिंग फैसला बहुत पुराना है। 1980 के दशक में 'पार्ले ग्लूको' का नाम बदलकर 'पार्ले-जी' हुआ, जहां 'G' का मतलब ग्लूकोज था। उसके बाद लाल-पीली पैकिंग और पार्ले-जी वाली बच्ची की तस्वीर ही इसकी पहचान रही। पैकिंग वैक्स पेपर से प्लास्टिक रैपर में बदली, पर डिजाइन वही रहा। लागत बढ़ी तो कंपनी ने ₹2 और ₹5 की कीमतें बरकरार रखने के लिए पैक का वजन घटाया, पहचान नहीं छेड़ी।
पैमाने की बात करें तो फोर्ब्स एशिया (30 सितंबर 2026, कंट्रीब्यूटर का लेख) के अनुसार पार्ले का सालाना राजस्व करीब 1.8 अरब डॉलर है और भारत से बाहर उसके नौ कारखाने हैं। रिपोर्ट के मुताबिक कंपनी का आईपीओ अगले साल आ सकता है, जिससे करीब 1 अरब डॉलर जुटाने और 10 अरब डॉलर से ऊपर के मूल्यांकन की बात है। बता दें कि पार्ले अनलिस्टेड कंपनी है और ये बातें रिपोर्ट पर आधारित हैं, कंपनी की आधिकारिक घोषणा पर नहीं। इसी बीच 1 सितंबर 2026 से पेप्सिको में 30 साल से ज्यादा काम कर चुके जॉर्ज कोवूर ने पार्ले बिस्किट्स के सीईओ का पद संभाला, जिन्हें कई मीडिया रिपोर्ट्स में कंपनी का पहला सीईओ बताया गया है।
Surf Excel: विचार वही, कहानियां नई
HUL का Surf Excel दिखाता है कि एक ही ब्रैंड-विचार को नई कहानियों के साथ ताजा रखा जा सकता है। 'दाग अच्छे हैं' अभियान 2005 में शुरू हुआ था और अक्टूबर 2026 की शुरुआत में इसी मंच के तहत नई ऐड फिल्म 'Race' आई, जिसमें बच्चों की दौड़ के जरिए सहानुभूति की बात की गई। यानी 21 साल पुराने विचार को नए संदर्भ में कहा जा रहा है।
अक्टूबर 2025 में आए Q2 FY26 नतीजों में HUL के होम केयर सेगमेंट का राजस्व करीब 1% घटकर ₹5,667 करोड़ रहा, क्योंकि GST के चलते कीमतें घटानी पड़ी थीं। इसके बावजूद सेगमेंट की बिक्री-मात्रा (वॉल्यूम) में मध्यम एकल अंक की बढ़त रही और फैब्रिक वॉश का वॉल्यूम भी मध्यम एकल अंक में बढ़ा, जबकि कंपनी का कुल वॉल्यूम उस तिमाही स्थिर रहा। यह पूरे सेगमेंट का आंकड़ा है, अकेले Surf Excel का नहीं, और कंपनी ने इसका श्रेय किसी रीब्रैंडिंग को नहीं दिया है। ताजा तिमाही (जुलाई–सितंबर 2026) के नतीजे HUL 28 अक्टूबर 2026 को घोषित करेगी, इसलिए उनका इंतजार है।
घड़ी (Ghadi) डिटर्जेंट: जब बदलाव ठोस हो
RSPL ग्रुप के घड़ी डिटर्जेंट का उदाहरण दिखाता है कि पैकेजिंग बदलना कब सार्थक होता है। 30 सितंबर 2026 को कंपनी ने 'विश्वास की परीक्षा' अभियान के साथ मधुरी दीक्षित को ब्रैंड एंबेसडर बनाकर नया फॉर्मूलेशन उतारा। इसमें '2X फोम टेक्नोलॉजी', ज्यादा बारीक पाउडर और पानी में तेज घुलने का दावा है, और अपग्रेडेड पैकेजिंग उसी दिन से देशभर के रिटेल व ट्रेड चैनलों में आनी शुरू हुई। कंपनी ने ब्रैंड की पुरानी प्रतिज्ञा 'पहले इस्तेमाल करें, फिर विश्वास करें' को बनाए रखा और मूल्य-आधारित प्राइस पैक रणनीति जारी रखने की बात कही।
यहां नई पैकेजिंग के पीछे उत्पाद में सुधार का दावा है, यानी पैक पर किया गया वादा चखकर परखा जा सकता है। डिजाइन स्टूडियो NH1 के केस-स्टडी पेज (जो अगस्त 2025 में अपडेट हुआ; पुनर्रचना की सटीक तारीख पेज पर नहीं है) के अनुसार घड़ी की पहले की पहचान-पुनर्रचना में सफेद पैक की पहचान को अहम माना गया और लाल-पीले रंगों को अनिवार्य रखा गया, जबकि लोगो को कई भारतीय लिपियों में काम करने लायक बनाया गया। यानी बदलाव हुए, पर पहचान के बुनियादी संकेत सुरक्षित रखे गए।
कब जरूरी, कब दिखावा
रीब्रैंडिंग तब जरूरी है जब:
बदलाव दिखावा बन जाता है जब:
एक ईमानदार बात: इनमें से किसी ब्रैंड ने रीब्रैंडिंग पर हुआ खर्च सार्वजनिक नहीं किया है। इसलिए 'करोड़ों' का कोई आंकड़ा अनुमान ही होगा, और उसे तथ्य की तरह पेश करना ठीक नहीं।
रीब्रैंडिंग अपने आप में न सही है, न गलत। इन उदाहरणों के आधार पर कहा जा सकता है कि वह तब सही बैठती है जब कारोबार, उत्पाद या उपभोक्ता में आए किसी असली बदलाव का नतीजा हो, और तब संदिग्ध है जब वह उस बदलाव की जगह ले ले। पार्ले-जी की पैकिंग और Surf Excel का दो दशक पुराना अभियान दिखाते हैं कि पहचान को संभालकर रखना भी एक रणनीति है, जबकि घड़ी दिखाता है कि उत्पाद बेहतर हो तो पैक बदलना तर्कसंगत है। यह निष्कर्ष लेखक का आकलन है; किसी ब्रैंड ने बदलाव के वित्तीय नतीजे सार्वजनिक नहीं किए हैं।
इससे पहले दिसंबर 2015 से नवंबर 2018 तक वह आइलीया (Eylea) के सीनियर प्रोडक्ट मैनेजर रहे, जहां उन्होंने मार्केटिंग रणनीति, कारोबारी योजना और उत्पाद की वृद्धि से जुड़ी पहलों पर काम किया।
by
Samachar4media Bureau
डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज (Dr Reddy’s Laboratories) ने देवांग मेहता (Devang Mehta) को गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल यानी पेट और आंतों से जुड़ी दवाओं के पोर्टफोलियो के लिए कैटेगरी हेड-मार्केटिंग (Category Head-Marketing) नियुक्त किया है।
डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज में शामिल होने से पहले देवांग मेहता जीएसके (GSK) से जुड़े थे। जनवरी 2023 से सितंबर 2026 तक उन्होंने ग्लोबल मार्केटिंग मैनेजर-रेस्पिरेटरी (Global Marketing Manager-Respiratory) के तौर पर काम किया। इस भूमिका में वह श्वसन संबंधी दवाओं के लिए ब्रांड रणनीति, डॉक्टरों और मरीजों की जरूरतों से जुड़ी जानकारी तथा विभिन्न माध्यमों से मार्केटिंग पहलों पर काम कर रहे थे।
इससे पहले दिसंबर 2020 से दिसंबर 2022 तक वह जीएसके में ग्लोबल मार्केटिंग मैनेजर-यूरोलॉजी (Global Marketing Manager-Urology) रहे। यहां उन्होंने अंतरराष्ट्रीय बाजारों में पोर्टफोलियो की वृद्धि, बाजार हिस्सेदारी और लाभप्रदता से जुड़े काम संभाले।
देवांग मेहता ने बायर (Bayer) में पांच वर्षों से अधिक समय तक काम किया। दिसंबर 2018 से दिसंबर 2020 तक वह एक्सरेल्टो (Xarelto) के मार्केटिंग मैनेजर रहे और हृदय, रक्त वाहिका तथा हड्डियों से जुड़ी चिकित्सा श्रेणियों में इस ब्रांड की जिम्मेदारी संभाली।
इससे पहले दिसंबर 2015 से नवंबर 2018 तक वह आइलीया (Eylea) के सीनियर प्रोडक्ट मैनेजर रहे, जहां उन्होंने मार्केटिंग रणनीति, कारोबारी योजना और उत्पाद की वृद्धि से जुड़ी पहलों पर काम किया।
देवांग मेहता ने अपने करियर की शुरुआत नवंबर 2014 में नोवार्टिस इंडिया (Novartis India) से की थी। यहां उन्होंने ल्यूसेंटिस (Lucentis) के प्रोडक्ट मैनेजर के तौर पर काम किया। इसके बाद अक्टूबर 2012 से अक्टूबर 2014 तक वह डैनोन बेबी न्यूट्रिशन यानी न्यूट्रिशिया इंडिया (Danone Baby Nutrition – Nutricia India) में प्रोडक्ट मैनेजर रहे।
SCHOTT Glass ने सुंदीप प्रभु को Director-Sales & Marketing नियुक्त किया है। वह एशिया में फार्मास्युटिकल ग्लास ट्यूबिंग कारोबार और भारत में ब्रांडिंग व इमेजिंग की जिम्मेदारी संभालेंगे।
by
Samachar4media Bureau
एससीएचओटीटी ग्लास (SCHOTT Glass) ने सुंदीप प्रभु (Sundeep Prabhu) को डायरेक्टर-सेल्स एंड मार्केटिंग (Director-Sales & Marketing) नियुक्त किया है। नई जिम्मेदारी में वह एशिया में कंपनी के फार्मास्युटिकल ग्लास ट्यूबिंग कारोबार के साथ भारत में ब्रांडिंग और इमेजिंग का काम संभालेंगे।
सुंदीप प्रभु नवंबर 2009 में एससीएचओटीटी से जुड़े थे और कंपनी के साथ करीब 17 वर्षों से काम कर रहे हैं। इस दौरान उन्होंने सेल्स और मार्केटिंग से जुड़े कई वरिष्ठ पदों पर जिम्मेदारी निभाई है। वह वाइस प्रेसिडेंट और सीनियर वाइस प्रेसिडेंट-सेल्स एंड मार्केटिंग (Vice President और Senior Vice President-Sales and Marketing) के पदों पर भी रह चुके हैं। इन भूमिकाओं में उन्होंने एशिया क्षेत्र में फार्मास्युटिकल ग्लास ट्यूबिंग कारोबार का नेतृत्व किया।
एससीएचओटीटी में शामिल होने से पहले प्रभु अगस्त 2005 से अक्टूबर 2009 तक एसोसिएटेड कैप्सूल्स प्राइवेट लिमिटेड (Associated Capsules Private Limited) में डिप्टी जनरल मैनेजर-इंटरनेशनल बिजनेस (Deputy General Manager-International Business) रहे। इस भूमिका में उन्होंने मिडिल ईस्ट, अफ्रीका और एशिया-पैसिफिक क्षेत्रों में खाली हार्ड जिलेटिन कैप्सूल की बिक्री संभाली।
इससे पहले वह 2001 से 2005 तक हिंडाल्को इंडस्ट्रीज (Hindalco Industries) में सीनियर मैनेजर-एक्सपोर्ट्स (Senior Manager-Exports) के पद पर रहे। यहां उन्होंने फार्मास्युटिकल और पैकेजिंग उद्योगों के लिए एल्युमिनियम फॉयल और फ्लेक्सिबल पैकेजिंग की अंतरराष्ट्रीय बिक्री की जिम्मेदारी संभाली।