ऐसे मामलों में हम व्युअरशिप पर नहीं देते ध्यान: फे डिसूजा, मिरर नाउ

देश में टेलिविजन न्यूाज इंडस्ट्री को नई दिशा देने और इसे नई ऊंचाइयों पर पहुंचाने में...

Last Modified:
Monday, 11 March, 2019
Faye D’Souza

समाचार4मीडिया ब्यूरो।।

देश में टेलिविजन न्‍यूज इंडस्‍ट्री को नई दिशा देने और इसे नई ऊंचाइयों पर पहुंचाने में अहम योगदान देने वालों को सम्मानित करने के लिए पिछले दिनों नोएडा के होटल रेडिसन ब्लू में ‘एक्‍सचेंज4मीडिया न्‍यूज ब्रॉडकास्टिंग अवॉर्ड्स’ (enba) दिए गए। इनबा का यह 11वां एडिशन का आयोजन हुआ, जिसमें अंग्रेजी न्यूज चैनल ‘मिरर नाउ’ (Mirror Now) ने कई अवॉर्ड्स जीते।

‘मिरर नाउ’ की एग्जिक्यूटिव एडिटर फे डिसूजा को ‘न्यूज टेलिविजन एडिटर-इन-चीफ ऑफ द ईयर’ (अंग्रेजी) के अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। वहीं, जूरी चॉइस के तहत इसे ‘न्यूज चैनल ऑफ द ईयर’ अवॉर्ड’ दिया गया। इसके अलावा इसे ‘Mahul-The Toxic Hell’ के लिए ‘बेस्ट न्यूज कवरेज और ‘VERIFIED’ शो के लिए बेस्ट टॉक शो का अवॉर्ड दिया गया।

‘मिरर नाउ’ द्वारा इन अवॉर्ड्स के जीतने पर हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) ने चैनल की एग्जिक्यूटिव एडिटर फे डिसूजा से उनकी इस जीत और आगामी चुनावों में चैनल की कवरेज प्लानिंग समेत कई मुद्दों पर विस्तार से बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंशः

इस तरह के अवॉर्ड्स मिलने पर आपको कैसा महसूस होता है?

हमने जब ‘मिरर नाउ’ शुरू किया था, तब हमारा आइडिया व्युअर्स को एक विकल्प प्रदान करना था। हम जो भी निर्णय लेते है, उसमें हमेशा विकल्प होता है। यह अवॉर्ड इस बात का सबूत है कि हमने जो निर्णय लिया, वह सही था। हमें विश्वास है कि चैनल सही ट्रैक पर है।  

कुछ दिनों पहले आपने ट्वीट किया था कि न्यूज अपडेट देने के मामले में चैनल की रफ्तार कम रहेगी। आखिर इसके पीछे क्या कारण था?

‘मिरर नाउ’ हमेशा ऐसा करता रहा है। हाल ही में पाकिस्तान के साथ हमारे देश का जो तनाव हुआ, ऐसे में तमाम ऐसी इंफॉर्मेशन थीं, जो आधिकारिक नहीं थी। भारत सरकार द्वारा इस मामले में किसी भी तरह की पुष्टि नहीं की गई और न ही कोई आधिकारिक सूचना आई थी, ऐसे में हमने निर्णय किया था कि हम पाकिस्तान की तरफ से आ रही खबरों को नहीं चलाएंगे, बल्कि अपने देश की सरकार द्वारा इंफॉर्मेशन देने का इंतजार करेंगे और उन इंफॉर्मेशन का ही इस्तेमाल करेंगे। ऐसे में दर्शकों को लगा होगा कि चैनल पर कुछ भी नहीं है। इसलिए मैं लोगों को इस बारे में बताना चाहती थी कि कि हम अपने चैनल पर इंफॉर्मेशन क्यों नहीं दे रहे थे।  

भारत-पाकिस्तान के बीच पिछले दिनों हुए विवाद की कवरेज को लेकर मीडिया को भी काफी आलोचना का सामना करना पड़ा है। इस बारे में आपका क्या मानना है?

आपकी बात सही है। हालांकि, दूसरे चैनलों के बारे में तो मैं नहीं बता सकती हूं, लेकिन जहां तक ‘मिरर नाउ’ की बात है तो हमने कुछ चीजें तय कर रखी हैं। ऐसे समय में जब देश संघर्ष में है, हम देश के साथ खड़े हैं। मीडिया के तौर पर, खासकर टेलिविजन मीडिया पर हमें जिम्मेदार बनना होगा, क्योंकि यह पूरे देश के साथ ही सीमा पार भी लाइव टेलिकास्ट होता है। दूसरी तरफ ऐसे लोग थे, जिन्होंने भारतीय मीडिया का हवाला दिया और इसका इस्तेमाल हमारे खिलाफ किया। उन्होंने कुछ नेताओं की बातों को खूब उछाला और हमारे खिलाफ इनका इस्तेमाल किया। मेरा मानना है कि इस तरह की स्थिति में यह जरूरी नहीं है कि आप अपने व्युअर्स को लगातार अपडेट देते रहें। हमने तब तक इंतजार किया, जब तक कि सरकार ने घोषणा नहीं की। इसके बाद हमने सरकार की कही हुई बातों को प्रसारित किया।   

जब आप इस तरह का फैसला लेते हैं, तो क्या व्युअरशिप पर भी इसका प्रभाव पड़ता है?

जब भी हम इस तरह का फैसला लेते है, तो हमें वास्तव में नहीं पता होता है कि इसे लेकर व्युअर्स किस तरह की प्रतिक्रिया देंगे। लेकिन हम मानते हैं कि इससे जो क्रेडिबिलिटी हमें मिलती है, वह एक हफ्ते की व्युअरशिप से ज्यादा समय तक रहेगी। एक हफ्ते की ज्यादा व्युअरशिप हासिल करने के मुकाबले मैं क्रेडिबिलिटी को प्राथमिकता दूंगी। यदि इससे व्युअरशिप पर प्रभाव पड़ता है, तो भी मुझे फर्क नहीं पड़ता है। मुझे नहीं लगता कि क्रेडिबिलिटी के मुकाबले व्युअरशिप ज्यादा महत्वपूर्ण है। यदि एक तरफ देश हो और दूसरी तरफ व्युअरशिप तो मेरी नजर में देश ही सबसे ज्यादा जरूरी होगा। यह अवॉर्ड भी इसी बात का उदाहरण है।  

लोकसभा चुनावों की कवरेज के लिए आपकी क्या स्ट्रैटेजी रहेगी?

लोकसभा चुनावो की कवरेज के दौरान हमारा ज्यादा से ज्यादा फोकस आम लोगों पर रहेगा। हम किसी भी स्टोरी को लोगों के नजरिये से देखते हैं। हमारा पूरा ध्यान देश की जनता, खासकर युवा पीढ़ी पर रहेगा। अपने देश में ऐसे युवाओं की संख्या बहुत ज्यादा है, जो इस बार चुनाव में अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। इनमें से कई युवाओं की उम्र तो 30 साल से कम है, जबकि कई पहली बार वोट डालेंगे। हम इन युवाओं से बात कर जानेंगे कि वे अपने इस अधिकार के बारे में क्या सोचते हैं। कौन से ऐसे मुद्दे हैं, जो उनके लिए मायने रखते हैं और हम उन्हें सही जानकारी देने में किस तरह मदद कर सकते हैं। इस तरह से युवाओं को सही चुनाव करने में मदद मिलेगी।  

देश में आम चुनावों की आहट के साथ ही सभी चैनलों ने अपने स्पेशल इलेक्शन शो के बारे में बात करनी शुरू कर दी है। ऐसे में इलेक्शन की कवरेज को लेकर ‘मिरर नाउ’ ने किस तरह की प्लानिंग की है?

यही हम लोगों का काम है कि नए-नए शो लेकर आएं, नए आइडिया लेकर आएं। वैसे, हमारी प्लानिंग पूरे देश में घूमने की है। हमारी सहयोगी तन्वी शुक्ला देश भर के लोगों का मिजाज जानेंगी। इस आइडिया का उद्देश्य लोगों से मिलकर उनके शहर के बारे में चर्चा की जाएगी। इस दौरान ज्यादा से ज्यादा युवाओं से बातचीत कर उनसे जुड़ने की कोशिश की जाएगी। किसी भी अन्य चैनल को मुकाबले युवाओं से कनेक्ट करने में हम ज्यादा सफल रहे हैं, क्योंकि हमारे पास युवाओं की टीम है और हम उस उम्र के युवाओं की मनोदशा को बेहतर समझ सकते हैं।

आजकल के समय में खबरों को सनसनीखेज बनाया जाता है। ऐसे में कई बार गलत खबरें भी चल जाती हैं। ऐसी स्थिति से ‘मिरर नाउ’ किस तरह निपटता है?

बिना तथ्यों की जांच के लिए हम कोई खबर नहीं चलाते हैं। तथ्यों की दोबारा से जांच करने के लिए हम उस स्टोरी पर 20 मिनट ज्यादा खर्च करते हैं। हमारा मानना है कि दूसरों के मुकाबले भले ही खबर देने में थोड़ी देर हो जाए, लेकिन हम पहले किसी भी तरह से यह सुनिश्चित करेंगे कि वह खबर सही हो। ब्रेकिंग न्यूज से ज्यादा हमारे लिए क्रेडिबिलिटी बहुत जरूरी है। कहने का मतलब है कि खबरों की आपाधापी में हम ब्रेकिंग न्यूज के नाम पर गलत खबर नहीं चलाना पसंद नहीं करते हैं। जहां तक दूसरे चैनलों की बात है, तो हमें पता है कि अभी बहुत आलोचना हो रही है। मेरा मानना है कि आलोचना का सबसे अच्छा तरीका यही है कि यदि आपको लगता है कि कोई सनसनी फैला रहा है अथवा गैरजिम्मेदार है तो आपको उस चैनल को नहीं देखना चाहिए। हालांकि, हम ये तय नहीं कर सकते हैं कि आपको क्या देखना चाहिए, लेकिन एक ऑडियंस के रूप में यह शक्ति आपके हाथों में है।

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MD रबिन्द्र नारायण ने बताया, कैसे पूरी दुनिया के सामने उदाहरण पेश करेगा पीटीसी नेटवर्क

पीटीसी नेटवर्क की ओर से तीन जुलाई को वर्चुअल रूप में ‘पीटीसी पंजाबी फिल्म अवॉर्ड्स’ के 10वें एडिशन का आयोजन किया जाएगा

Last Modified:
Thursday, 02 July, 2020
Rabindra Narayan

प्रतिष्ठित ‘पीटीसी पंजाबी फिल्म अवॉर्ड्स’ (PTC Punjabi Film Awards) का 10वां एडिशन दस्तक देने को तैयार है। 'पीटीसी नेटवर्क' (PTC Network) की ओर से तीन जुलाई को वर्चुअल रूप (ऑनलाइन) में इस कार्यक्रम का आयोजन किया जाएगा। महामारी के इस दौर में जब तमाम अवॉर्ड शोज या तो स्थगित किए जा रहे हैं अथवा रद्द हो रहे हैं, पीटीसी नेटवर्क ने कोरोनावायरस (कोविड-19) के द्वारा उत्पन्न तमाम चुनौतियों के बावजूद इसे होस्ट करने का निर्णय लिया है। तीन जुलाई को पीटीसी पंजाबी चैनल पर अथवा इसके फेसबुक पेज पर इस प्रतिष्ठित अवॉर्ड शो को देखा जा सकेगा।

हमारे समूह की अंग्रेजी वेबसाइट ‘Everything Experiential’ को दिए एक इंटरव्यू में 'पीटीसी नेटवर्क' के एमडी और प्रेजिडेंट रबिन्द्र नारायण ने वर्चुअल इवेंट के पीछे की प्रेरण के साथ ही यह भी बताया कि पीटीसी किस तरह इतना बड़ा इवेंट आयोजित करेगा, जो विश्व में एक उदाहरण प्रस्तुत करेगा। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:    

पीटीसी पंजाबी वर्चुअल फिल्म अवॉर्ड्स के बारे में कुछ बताएं, इस वर्चुअल इवेंट को आयोजित करने के पीछे क्या सोच है?

यह 10वां साल है, जब पीटीसी पंजाबी सिनेमा को एक श्रेष्ठ पहचान देगा और उसके उल्लेखनीय योगदान को सम्मान देगा। दुर्भाग्य से, कोरोना और लॉकडाउन के कारण तमाम इवेंट्स और एक्टिविटीज कैंसल हो गई हैं और और हमारे वार्षिक अवॉर्ड समारोह को धूमधाम से करने की कोई उम्मीद नहीं थी जो हम इतने वर्षों से करते आ रहे हैं। लगभग सभी लोगों ने हमसे कहा कि इस साल इस आयोजन को न करें, लेकिन हम पंजाबी फिल्म इंडस्ट्री की इतनी कड़ी मेहनत और योगदान को कैसे भूल सकते हैं, इसलिए हमने निर्णय लिया और हम इस आयोजन को टेक्नोलॉजी की सहायता से वर्चुअल रूप में करेंगे। इस प्लेटफॉर्म पर आर्टिस्ट कहीं से भी शामिल हो सकते हैं और एक-दूसरे से जुड़ सकते हैं। इसके साथ ही हम वर्चुअल रूप में उसी भव्यता के साथ समारोह कर सकते हैं, जितनी भव्यता के साथ यह पूर्व में हमेशा से होता आया है। दुनिया में किसी ने भी वर्चुअल ऑनलाइन अवॉर्ड्स समारोह के बारे में नहीं सोचा और हमने इस बारे में सोचा है। हमेशा की तरह, हमें पूरी दुनिया के सामने एक उदाहरण पेश करना चाहिए।  

जहां तक इस वर्चुअल अवॉर्ड्स की बात है तो पंजाबी फिल्म इंडस्ट्री से इसे किस तरह की प्रतिक्रिया मिली है?

लोग काफी उत्साहित और आशान्वित हैं और आश्चर्यचकित हैं कि कैसे इस तरह की चीजें आकार ले रही हैं। हम देख रहे हैं कि लोगों में इसे लेकर काफी उत्साह बना हुआ है।

यदि हम इस वर्चुअल इवेंट के तकनीकी पहलू को देखें तो आप किस तरह से यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि यह वास्तविक इवेंट के जैसे ही होगा?

शुरुआत की बात करें तो यदि आप इस इवेंट का टीजर (teaser) देखेंगे तो आप गुरप्रीत घुग्गी और दिव्या दत्ता को नोटिस करेंगे कि कैसे वे शो को होस्ट करने की तैयारी कर रहे हैं और आपस में संवाद कर रहे हैं। जबकि सच यह है कि घुग्गी अपने होमटाउन पंजाब में और दिव्या मुंबई में थी। टीजर देखकर कोई नहीं कह सकता कि वे साथ-साथ नहीं हैं और एक जगह से एंकरिंग नहीं कर रहे हैं।

शो के लिए इन दोनों के साथ ही अन्य स्टार जैसे- निंजा, गुरनाम भुल्लर और हरिश वर्मा अलग-अलग शहरों से एक वर्चुअल सेट पर शो होस्ट करेंगे। ऑडियंस को अहसास भी नहीं होगा कि ये कलाकार साथ-साथ खड़े होकर होस्ट नहीं कर रहे हैं। मीत ब्रदर्स मुंबई से परफॉर्म करने जा रहे हैं और इसी तरह अन्य आर्टिस्ट भी अलग-अलग जगह से परफॉर्म करेंगे। जैसे-गिप्पी ग्रेवाल और सुनंदा शर्मा की परफॉर्मेंस की बात करें को डांसर्स दिल्ली में हैं जबकि आर्टिस्ट मोहाली में हैं, लेकिन वे सभी वर्चअल सेट पर आपस में इतनी तालमेल से अपने डांस मूवमेंट कर रहे हैं कि इस बात का पता ही नहीं चलता कि वे अलग-अलग जगह से यह सब कर रहे हैं।      

इस तरह के सेट को डिजाइन करने में, हर मूव को तैयार करने में, वर्चुअल स्टेज लाइट को बनाने में काफी समय लगता है। टेक्नोलॉजी के अलावा कलाकारों के प्रत्येक लुक और भाव भंगिमाओं को आपस में काफी अच्छी तरह से समन्वित किया गया है। तीन जुलाई को पीटीसी पंजाबी को अपनी स्क्रीन पर देखिए अथवा फेसबुक पर आइए और इस ‘जादुई’ आयोजन को देखिए।  

आखिर में हमे ये बताएं कि पिछले तीन महीनों में आपने अपने दर्शकों को किस तरह अपने साथ जोड़े रखा?

हमने इसके लिए काफी व्यापक अभियान चलाया था। इसी का परिणाम रहा है कि फेसबुक हमारा डिजिटल पार्टनर बन गया है। नॉमिनेशंस की घोषणा की गई है। पिछले दशकों के शानदार पलों को कंपाइल कर उन्हें ऑनलाइन रूप से पोस्ट किया गया है, ताकि लोगों में इसके लिए काफी रुचि बढ़े। इसके अलावा जूम और फोन सेशन के माध्यम से सेलेब्रिटीज को समझाया गया है कि हम कैसे इस शो की योजना बना रहे थे। यह सभी कुछ काफी आशाजनक लग रहा है।

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TV9 नेटवर्क के CEO बरुण दास ने बताया, मंदी और निवेश के बीच का ये ‘गणित’

‘टीवी9 नेटवर्क’ के सीईओ ने हमारी सहयोगी वेबसाइट एक्सचेंज4मीडिया की एडिटर नाजिया अल्वी रहमान से खास बातचीत की।

Last Modified:
Thursday, 02 July, 2020
Barun Das

देश में टेलिविजन दर्शकों की संख्या मापने वाली संस्था 'ब्रॉडकास्‍ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल' (BARC) इंडिया के आंकड़ों के अनुसार, कोविड-19 के कारण देश में लागू किए गए लॉकडाउन के बीच न्यूज व्युअरशिप में करीब 200 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। इस जॉनर में हुई इतनी ग्रोथ और न्यूज की दुनिया में प्रतिस्पर्धा के बावजूद अपनी मजबूत स्थिति के बारे में ‘टीवी9 नेटवर्क’ (TV9 Network) के सीईओ बरुण दास ने हमारी सहयोगी वेबसाइट एक्सचेंज4मीडिया (exchange4media) की एडिटर नाजिया अल्वी रहमान से खास बातचीत की। वेबिनार के माध्यम से हुई इस बातचीत के दौरान बरुण दास ने नेटवर्क की ग्रोथ और रीजनल मार्केट्स के महत्व को लेकर भी अपने विचार रखे।

लॉकडाउन के बाद से ‘टीवी9’ के सफर के बारे में दास ने कहा कि उनके चैनल ने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में इस जोखिम के बीच बहादुरी के साथ अपनी ड्यूटी को अंजाम दिया। दास के अनुसार, ‘इस महामारी ने पूरी दुनिया को प्रभावित किया है। मार्च के अंत में, लोग नई वास्तविकता से रूबरू हो रहे थे और किसी को भी स्थिति के बारे में पूरी तरह क्लियर नहीं था। एक न्यूज चैनल होने के नाते हम आवश्यक सेवाओं में शामिल थे और हम घर पर नहीं बैठ सकते थे। मैं व पूरी टीम रोजाना ऑफिस आई। टीम लीडर होने के नाते मैं ऐसा नहीं कर सकता था कि मैं तो घर पर सुरक्षित बैठा रहूं, जबकि हमारे रिपोर्टर्स और सपोर्टिंग टीमें तमाम जोखिम के बीच अपना काम कर रहे थे। उसी समय हमने अपनी टीम को कहा कि मीडिया इंडस्ट्री का हिस्सा बनना उनकी पसंद थी और अब यह समय कुछ करके दिखाने का है।’

दास ने कहा, ‘हमारे लिए यह काफी चुनौतीपूर्ण स्थिति थी, लेकिन हमारा फोकस लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में अपनी पहचान के प्रति सच्चा रहना था। यह हमारी जिम्मेदारी थी कि हम इस महामारी और लॉकडाउन के कारण घरों में बैठे हुए चिंतित लोगों को तमाम जानकारी उपलब्ध कराएं और स्थिति की गंभीरता से अवगत कराएं। उस दौरान हमने यह भी सुनिश्चित किया कि हमारे एम्प्लॉयीज सरकार की ओर से जारी किए गए सभी सुरक्षा नियमों का पालन करें, जैसे मास्क पहनना और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करना आदि। इस दौरान मैनपॉवर को भी दो हिस्सों में बांट दिया गया था और उन्होंने शिफ्ट में काम किया, लेकिन इन सबके बावजूद संस्थान के करीब 80 एम्प्लॉयीज का कोरोनावायरस (कोविड-19) टेस्ट पॉजिटिव आया। कोरोना के बढ़ते मामलों के कारण स्टूडियो को दो दिनों के लिए सील कर दिया गया था और स्टाफ को क्वारंटाइन में भेज दिया गया था।’

बरुण दास ने बताया, ‘हमने अपने बगल में एक समानांतर ऑफिस तैयार किया और जब हमारा ऑफिस 48 घटों के लिए सील था, हमने समानांतर ऑफिस से काम किया। तमाम उतार-चढ़ावों के बीच हम अपना काम करते रहे। इस महामारी के दौरान 10 प्रतिशत मार्केट शेयर के साथ टीवी9 भारतवर्ष मार्केट लीडर्स की लिस्ट में शुमार हो गया। व्युअरशिप में इस ग्रोथ के पीछे चैनल के कंटेंट, प्रमोशन और डिस्ट्रीब्यूशन तीनों का योगदान रहा।’

इस दौरान दास ने यह भी कहा, ‘हम सौभाग्यशाली रहे कि हमारी री-लॉन्चिंग जो जनवरी में प्रस्तावित थी, वह मार्च आधे तक लेट हो गई। हालांकि, हमने आउटडोर प्रमोशंस कैंसल कर दिए थे, हमने डिजिटल और लोकल चैनल्स पर काफी मजबूती से प्रचार किया। इस री-लॉन्चिंग में हमने अपने चैनल के लुक और फील को भी इंप्रूव किया और मुझे विश्वास है कि हमारा चैनल हिंदी न्यूज में सबसे अच्छे दिखने वाले चैनल्स में से एक है। एक और चीज जो हमारे पक्ष में रही वो यह थी कि लोग स्वभाविक रूप से तमाम चैनल बदलते रहते हैं और जब वे हमारे चैनल पर आए तो उन्हें यह अच्छा लगा और वे इस पर रुक गए। इसके अलावा कंटेंट के चयन ने भी हमारे पक्ष में काफी काम किया’

बातचीत के दौरान बरुण दास ने बताया, ‘कंटेंट की बात करें तो हमने बेहतर तरीके से कोविड-19 पर फोकस किया। हमने अप्रैल की शुरुआत में चीन को एक वैश्विक शत्रु की रूप में पहचाना और उस पर फोकस किया। हमारा तीसरा फोकस ग्लोबल न्यूज पर था। आपको यह जानकर काफी हैरानी होगी कि हिंदी भाषी मार्केट्स में ग्लोबल न्यूज की कितनी मांग है। हमारी कवरेज में वैश्विक दृष्टिकोण था, जिसने हमारे लिए काम किया। सात दिनों के अंदर आने वाली रेटिंग से भी हमें यह आयडिया मिला कि हमें क्या करना है और क्या नहीं करना है।’

दास ने इस दौरान आंकड़े बढ़ने के बावजूद एक जॉनर के रूप में न्यूज के अवमूल्यन (undervaluation) के बारे में भी बताया। उन्होंने कहा कि मार्केट में न्यूज का मूल्यांकन कम है, खासकर रीजनल की बात करें तो, क्योंकि रीजनल न्यूज चैनल केवल रेट के एक हिस्से को ही नियंत्रित कर सकता है।  

दास के अनुसार, इसके पीछे मार्केट में बिखंडन (fragmentation) वजह नहीं थी। मुख्य रूप से मार्केट लीडर को इस बारे में पहल करनी चाहिए। किसी को बोल्ड स्टेप उठाना पड़ेगा और रेवेन्यू में अस्थायी रूप से नुकसान के बावजूद रेट बढ़ाने होंगे। उन्होंने कहा कि किसी भी शैली में टॉप तीन प्लेयर्स ही बिजनेस के मामले में आसानी से सक्षम हो सकेंगे, चौथे और पांचवे नंबर के प्लेयर्स यदि अपनी लागत को अच्छे से व्यवस्थित कर सकते हैं तो ही वह बिजनेस सही से कर पाएंगे। एडवर्टाइजर्स बाकियों की तरफ नहीं देखेंगे। रीजनल चैनल्स की बात करें तो एडवर्टाइजर्स तीन नंबर से आगे ही नहीं देखेंगे। नेशनल में आप सातवें और आठवें नंबर के प्लेयर्स के लिए एडवर्टाइजर्स का रुझान देख सकते हैं, क्योंकि वहां एडवर्टाइजर्स की सामर्थ्य में काफी भिन्नता होती है। यह विज्ञापन दरों पर थोड़ा दबाव बनाता है क्योंकि एडवर्टाइजर्स सस्ते विकल्प पर जा सकते हैं।

ऐसे समय में जब अधिकांश नेटवर्क्स कॉस्ट में कटौती कर रहे हैं, टीवी9 अपनी टीम को बढ़ा रहा है और नई नियुक्तियां कर रहा है, के बारे में पूछे जाने पर दास ने कहा कि पूरी तरह से खर्च में कटौती किए बिना निवेश के बारे में निर्णय लेने के लिए मंदी सबसे अच्छा समय है। इस स्ट्रैटेजी के बारे में दास ने कहा, ‘मैंने अपने करियर में दो मंदी देखी हैं, एक 9/11 के बाद और दूसरी वर्ष 2008 में। औपचारिक रूप से मंदी के दौरान यदि आप वहन कर सकते हैं तो आपका कोई भी विस्तार सस्ता पड़ता है। आप खर्च और निवेश के बीच अंतर करते हैं और निवेश मंदी के दौरान सस्ता पड़ता है। हम दो नए रीजनल चैनल्स लॉन्च करने जा रहे थे, पर हमने इन लॉन्चिंग को फिलहाल रोक दिया है। लेकिन, हम अपने डिजिटल विस्तार की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, क्योंकि निकट भविष्य में डिजिटल का रेवेन्यू बढ़ेगा। TV9 भी अक्टूबर की शुरुआत तक बेंगलुरु स्थित अपने अंग्रेजी न्यूज चैनल को वेब चैनल के रूप में फिर से लॉन्च करने जा रहा है।

रीजनल मार्केट के महत्व के बारे में दास ने कहा कि रीजनल ने हमेशा टेलिविजन की ग्रोथ में अपना योगदान दिया है। उन्होंने कहा, ‘यह केवल न्यूज में ही नहीं, बल्कि जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स की ग्रोथ में भी अपनी भूमिका निभा रहा है। अपनी मातृभाषा के कंटेंट के प्रति लोगों का झुकाव है और यह बढ़ना जारी रहेगा।’ इसके साथ ही दास ने यह भी बताया कि उनके लिए इस समय हिंदी सबसे बड़ा मार्केट है, इसके बाद रीजनल मार्केट्स का नंबर है। उन्होंन कहा, ‘पिछले साल तक हमारा 95 प्रतिशत रेवेन्यू रीजनल मार्केट से आया। इस साल यह घटकर 70 प्रतिशत रह गया है। हमारे पास चार रीजनल चैनल और एक हिंदी चैनल है, लेकिन हिंदी का रेशियो ज्यादा है।’

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हालात सामान्य होने तक समाज की बेहतरी की दिशा में जारी रहेगी हमारी ये पहल: मार्कंड अधिकारी

एक्सचेंज4मीडिया के साथ एक बातचीत के दौरान 'सब ग्रुप’ (SAB Goup) के वाइस चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर मार्कंड अधिकारी ने तमाम मुद्दों पर रखे अपने विचार

Last Modified:
Saturday, 20 June, 2020
Markand Adhikari

‘कोरोनावायरस’ (कोविड-19) ने हमारे जीने के तरीके को बदलकर रख दिया है। इस महामारी ने समाज के लगभग सभी वर्गों को प्रभावित किया है, लेकिन प्रवासी श्रमिकों (migrant workers) पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ा है। ऐसे में ब्रॉडकास्ट इंडस्ट्री में जाना-माना नाम ‘श्री ’ (Sri Adhikari Brothers) ने एक सराहनीय पहल शुरू की है, ताकि टैलेंटेड श्रमिकों को अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिले और इसके जरिये वे कमाई भी कर सकें।

हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ एक बातचीत के दौरान ‘सब ग्रुप’ (SAB Goup) के वाइस चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर मार्कंड अधिकारी ने इस पहल के बारे में बताने के साथ ही यह भी बताया कि कोविड-19 से ब्रॉडकास्ट इंडस्ट्री में किस तरह के बदलाव आए हैं। इसके अलावा उन्होंने डिजिटल प्लेटफॉर्म की ग्रोथ समेत तमाम मुद्दों पर भी अपनी बात रखी, प्रस्तुत हैं इस बातचीत के कुछ अंश:

पिछले 30 वर्षों से आप ब्रॉडकास्टिंग इंडस्ट्री का जाना-माना नाम हैं, कोविड-19 के बाद इस आप सेक्टर में किस तरह के मूलभूत बदलाव होते हुए देख रहे हैं?

कोविड के बाद लाइफ पूरी तरह से बदल गई है। सबसे पहले तो इसका सीधा प्रभाव ब्रॉडकास्टर्स के रेवेन्यू पर पड़ा है, जो काफी कम हो गया है। हालांकि, यह महीनावार (month-wise) बढ़ रहा है, लेकिन भगवान ही जानते हैं कि कोविड-19 से पहले वाली स्थिति कब आएगी। दूसरी तरफ, नए कार्यक्रम नहीं बन रहे हैं। ऐसे में जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स के लिए भारी झटका है और जीआरपी (Gross rating point) में भारी गिरावट आई है। इसके साथ ही शूटिंग के लिए जो नई गाइडलाइंस जारी की गई हैं, उनमें फ्रेश कंटेंट तैयार करना काफी मुश्किल है। इमर्जेंसी अथवा पैचवर्क में ही इनका इस्तेमाल किया जा सकता है।

यह काफी अजीब स्थिति है कि चैनल बिजनेस उपयोगिता के रूप में चल रहे हैं, व्युअर्स भी इनका उपभोग (consuming) कर रहे हैं, लेकिन जिन्हें बिलों का भुगतान करना है, वे गायब हैं। यह तो ऐसा हो गया है कि लोग फाइव स्टार होटल आ रहे हैं, लंच और डिनर कर रहे हैं और बिना बिल दिए चले जा रहे हैं। जैसा कि आप सब जानते हैं कि ब्रॉडकास्टर्स के बिलों का भुगतान हमेशा एडवर्टाइजर्स के द्वारा किया जाता है, बेशक यह रेटिंग पर निर्भर करता है।      

इस दौरान डिजिटल/वेब प्लेटफॉर्म काफी तेजी से बढ़े हैं, क्योंकि वे सबस्क्रिप्शन पर ज्यादा निर्भर होते हैं। वे मुश्किल से ही एडवर्टाइजर्स पर निर्भर होते हैं। नए फिल्में डिजिटल प्लेटफॉर्म पर रिलीज जो रही हैं। हमारी नई पीढ़ी ने कोविड-19 से पहले दो मार्च को ‘डिज्नी हॉटस्टार’ पर अपनी फिल्म ‘ढीठ पतंगे’ (Dheet Patange) के साथ यह प्रयोग किया है, लेकिन किसी को नहीं पता था कि यह एक ट्रेंड बन जाएगा।  

डिजिटल अब और ज्यादा महत्वपूर्ण किस तरह होता जा रहा है?

जैसा कि मैंने पहले ही कहा है कि डिजिटल सबस्क्राइबर्स पर ज्यादा और एडवर्टाइजर्स पर मुश्किल से ही निर्भर होता है। यह समय उनका है, लेकिन नए कंटेंट को लगातार तैयार करना सबसे बड़ी चुनौती है, क्योंकि आखिर में व्युअर्स को फ्रेश कंटेंट ही चाहिए होता है।  

आप हमेशा समाज के भले के लिए तत्पर रहते हैं। हाल ही में श्री अधिकारी ब्रदर्स समूह द्वारा नई पहल (Sri Adhikari Brothers initiative 2.0) शुरू की गई है। आपने प्रवासी श्रमिकों को जीवन में आशा और आजीविका प्रदान करने के लिए यह सराहनीय पहल शुरू की है। इसकी शुरुआत कैसे हुई? इसके प्रोमो पर किस तरह की प्रतिक्रिया आई और कितने लोगों ने इसमें अपना कंटेंट भेजा है?

मेरा मानना है कि एक बिजनेसमैन/मीडिया कंपनी मालिक के रूप में समाज के लिए कुछ करना हमारी पहली जिम्मेदारी है। जैसा कि मैंने अपनी पहली पहल (1.0) में कहा था कि समाज के पांच से 10 प्रतिशत उच्च वर्ग के लोगों को आगे आकर उन लोगों के लिए मदद का हाथ बढ़ाना होगा, जो तमाम मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। ‘BAPS Swaminarayan’ के साथ मिलकर हमने 1000 परिवारों की जिम्मेदारी ली है और उन्हें मासिक आधार पर आवश्यक वस्तुएं उपलब्ध करा रहे हैं।

लेकिन मुझे लगता है कि डोनेशन इसका पूरा हल नहीं है, हमें रोजगार के अवसर भी तैयार करने होंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘आत्मनिर्भर’ के आह्वान पर हमने उन प्रवासी श्रमिकों के बेरोजगारी के मुद्दे की दिशा में काम करने का फैसला लिया है जो महामारी की वजह से अपना काम-धंधा छोड़कर अपने घरों पर वापस लौट गए हैं। चूंकि हम टैलेंट और परफॉर्मिंग आर्ट के बिजनेस में हैं, ऐसे में मैंने उन्हें एक अवसर प्रदान करने का निर्णय लिया और उनसे कहा है कि वे अपनी कला का कोई वीडियो अपने पते और बैंक अकाउंट नंबर के साथ भेजें। हम हर महीने ऐसी 1000 प्रतिभाओं को चुनेंगे। हम न सिर्फ उनके टैलेंट को अपने ग्रुप के चैनल्स पर दिखाएंगे, बल्कि उनके खाते में पैसे भी ट्रांसफर करेंगे। उससे उन्हें अपने ‘हुनर’ से कमाई का मौका मिलेगा और उन्हें गर्व का अनुभव होगा। मुझे लगता है कि समाज के लिए हमारी जिम्मेदारी है, क्योंकि हम आज जो भी हैं वह हमें समाज द्वारा दिया गया है और अब समाज के लिए कुछ करने का समय है। इस पहल का ग्रुप के चैनल्स (Mastiii, Dabangg और Maiboli) पर प्रसारण शुरू कर दिया गया है और शुरुआती स्तर पर हमें इसकी जबर्दस्त प्रतिक्रिया मिली है और हम आपको कुछ दिनों के बाद वास्तविक आंकड़ों के साथ अपडेट करेंगे।

यह पहल कब तक चालू रहेगी?

जब तक स्थिति सामान्य नहीं हो जाती, यह चलती रहेगी। इस पहल में भागीदारी केवल टीयर III (Tier III) शहरों, ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों और उन लोगों के लिए खुली है जो बेरोजगारी से पीड़ित हैं। भागीदारी के लिए यही हमारी मूल शर्त है। वर्तमान के हालात को देखते हुए कोई भी इस समय समय सीमा के बारे में भविष्यवाणी नहीं कर सकता है, लेकिन हम अपने वादे पर तब तक टिके रहेंगे, जब तक कि हमें आशा की किरण दिखाई नहीं देती।

आपने इसके लिए कितना पैसा आवंटित किया है?

परोपकार के रूप में आप जो खर्च कर रहे हैं, उस राशि के बारे में उल्लेख करना सही नहीं है, लेकिन मैं एक बात कह सकता हूं कि समाज के वंचित व जरूरतमंद लोगों के सहयोग के लिए अपनी पहली पहल (1.0) और अब दूसरी पहल (2.0) के लिए हमने अपने परिवार से पर्याप्त धन हासिल किया है।   

आप न्यूज काफी देखते हैं, न्यूज चैनल्स के बारे में आपका क्या कहना है? पहले आपके पास भी तो एक न्यूज चैनल था।

मुझे लगता है कि व्युअर्स अब टीवी से डिजिटल की ओर रुख कर रहे हैं। इसमें वर्तमान चैनल्स के ऐप्स भी शामिल हो सकते हैं। लेकिन एक बड़ा बदलाव हम यह देखते हैं कि सोशल मीडिया तेजी से आगे बढ़ रहा है। लोग सिर्फ न्यूज चैनल्स पर ही भरोसा नहीं जता रहे हैं, बल्कि वे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की ओर भी झुक रहे हैं। बेशक, हमारे पास पहले एक न्यूज चैनल था, लेकिन वर्तमान में हमारे ग्रुप के पास ‘गवर्नेंस नाउ’ (Governance Now) के नाम से एक डिजिटल प्लेटफॉर्म है, जो पहले प्रिंट रूप में भी था। ‘गवर्नेंस नाउ’ करीब दस साल से है और सरकार से संबंधित मुद्दों पर एक बहुत ही जिम्मेदार और गंभीर प्लेटफॉर्म माना जाता है।

आपकी अगली पीढ़ी कैसे अपनी भूमिका निभा रही है और आपको नई चीजों से रूबरू होना सिखा रही है?

बेशक, हमारी नई पीढ़ी डिजिटल की दुनिया के साथ ज्यादा पली-बढ़ी है। उनकी पहली क्रिएशन ‘ढीठ पतंगे’ (Dheet Patange) थी जो दो मार्च 2020 को डिज्नी हॉटस्टार प्लेटफॉर्म पर रिलीज की गई थी। इसके बाद से यह डिजिटल फिल्मों के लिए यह एक ट्रेंड बन गया है। वे लॉकडाउन में भी कई डिजिटल वेब सीरीज और फिल्मों पर काम कर रहे हैं। रवि और कैलाश नई स्क्रिप्ट्स और सब्जेक्ट्स पर काफी मेहनत कर रहे हैं। उनके पास लगभग 10 प्रोजेक्ट तैयार हैं। बेशक, वे उभरते हुए मीडिया में हैं और मैं अपनी पूरी जिंदगी अपनी अगली पीढ़ी का स्टूडेंट बनना पसंद करूंगा।  

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Enterr10 के COO दीप द्रोण ने बताया, दंगल टीवी की सफलता का 'राज'

Enterr10 टेलिविजन के हिंदी जनरल एंटरटेनमेंट चैनल ‘दंगल टीवी’ ने लॉकडाउन के दौरान भी अपना ऑडियंस बेस बनाए रखा है।

Last Modified:
Friday, 19 June, 2020
Dangal TV

‘एंटर10’ (Enterr10) टेलिविजन के हिंदी जनरल एंटरटेनमेंट चैनल ‘दंगल टीवी’ (Dangal TV) ने लॉकडाउन के दौरान भी अपना ऑडियंस बेस बनाए रखा है। यह चैनल शहरी और ग्रामीण (U+R) मार्केट में अपनी वीकली लीडरशिप एवरेज रेटिंग से आगे की ओर देख रहा है। हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ बातचीत के दौरान ‘b’ टेलिविजन के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर दीप द्रोण (Deep Drona) ने बताया कि दंगल टीवी ने वर्तमान में कारोबारी माहौल को किस तरह अपने अनुकूल बनाए रखा है और चार बड़े ब्रॉडकास्टर्स के ‘फ्री टू एयर’ (FTA) स्पेस में वापस आने के बाद भी अपनी लीडरशिप पोजीशन को बनाए रखने के लिए चैनल की क्या स्ट्रैटेजी है? प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:  

पिछले साल अप्रैल से ही दंगल टीवी की रेटिंग का हिंदी के जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स जॉनर में वर्चस्व रहा है। चैनल की इस ग्रोथ के पीछे क्या कारण रहे हैं?

निश्चित रूप से दो प्लेयर्स के एक हो जाने से व्युअरशिप के आधार पर दंगल टीवी को मदद मिली है। कई प्लेयर्स ने ‘फ्री टू एयर’ (Free-to-Air) स्पेस से निकलने का फैसला लिया, जबकि हमने अधिकतर इसी पर फोकस किया। हमने उन फ्री टू एयर ऑडियंस को ध्यान में रखा जो एंटरटेनमेंट और क्वालिटी प्रोग्रामिंग से वंचित थे। इसने हमें बड़े अंतर से शहरी और ग्रामीण मार्केट में लीडर बनाया है। हमने अपने ऑडियंस के लिए सिर्फ क्वालिटी लाइब्रेरी शो ही नहीं दिखाए, बल्कि उसमें बहुत सारी ओरिजिनल प्रोग्रामिंग भी शामिल की, जिसे दर्शकों द्वारा काफी सराहा गया।

व्युअरशिप के मामले में आपके सबसे बड़े मार्केट्स कौन से हैं?

राजस्थान और मध्य प्रदेश के साथ उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे उत्तरी बाजार हमारे गढ़ हैं। पश्चिम के मार्केट में हम प्रतिस्पर्धा में हैं और वहां हमने यूनिक ऑडियंस भी जोड़े हैं। उत्तरी और पश्चिमी बाजार सभी मीडिया योजनाओं के प्रमुख बाजार हैं, जो हिंदी भाषी मार्केट के दर्शकों को देखते हैं। चूंकि हम शहरी व्युअर्स को भी आकर्षित करते हैं, इससे भी दंगल टीवी को मदद मिलती है।  

दंगल टीवी और नेटवर्क पर लॉकडाउन का क्या प्रभाव पड़ा है?

यदि हम रेवेन्यू की बात करें तो दूसरे प्लेयर्स के मुकाबले हम ज्यादा बेहतर स्थिति में हैं। हमारी रिकवरी भी बहुत सकारात्मक रही है और यदि आप हमारे एडवर्टाइजर्स की लिस्ट देखें तो उससे यह स्पष्ट हो जाता है। हमने स्थिति को देखते हुए अपने गेम प्लान को काफी आक्रामक तरीके से आगे बढ़ाया। हमारे बड़े पार्टनर्स ने हमारे साथ बड़ा निवेश करना जारी रखा और हमने वर्तमान स्थिति में काफी अच्छा किया। वास्तव में, हमारी परफॉर्मेंस’सामान्य महीनों’ के हिसाब से 75-80 प्रतिशत के करीब रही है। व्युअरशिप की बात करें तो एक पे चैनल को छोड़कर हम ही एकमात्र चैनल हैं, जिसे दर्शक संख्या का जरा भी नुकसान नहीं हुआ। कई हफ्तों में तो शहरी और ग्रामीण मार्केट में हमारी वीकली नॉर्मल लीडरशिप रेटिंग्स की तुलना में काफी अच्छी ग्रोथ रही है। लॉकडाउन में दूरदर्शन की रेटिंग भी काफी बढ़ी। इस अप्रत्याशित समय में दंगल टीवी को भी काफई फायदा हुआ और हमारे नेटवर्क चैनल्स का प्रदर्शन कुछ प्रमुख पे चैन्स की तुलना में काफी ज्यादा था। लॉकडाउन के दौरान भी नेटवर्क ने अपना ऑडियंस बेस बनाए रखा।

चार बड़े ब्रॉडकास्टर्स की फ्री टू एयर स्पेस में वापसी के साथ दंगल टीवी ने अपनी लीडरशिप पोजीशन को बनाए रखने के लिए क्या स्ट्रैटेजी बनाई है?

छह-सात तिमाही तक सभी चैनल्स, जिनमें प्रमुख ब्रॉडकास्टर्स भी शामिल हैं, साथ-साथ थे। वर्तमान हालात में सभी नए-पुराने चैनल्स एफटीए जॉनर में जुड़ने के लिए साथ आएंगे। वास्तव में, इस जॉनर को स्वयं ग्राहकों या एजेंसियों से बहुत अधिक ध्यान आकर्षित करना होगा और टीवी पर मीडिया के खर्च के संदर्भ में अपने वास्तविक और उचित मूल्य के लिए लड़ना होगा। क्लाइंट्स के लिए मार्केट परिपक्व (matured) हो गया है और शहरी क्षेत्रों से आगे बढ़ रहा है, क्योंकि वास्तविक ग्रोथ शहरी क्षेत्रों से परे सेंटर्स से आ रही है। पहले दंगल टीवी पैक का हिस्सा था और पिछले एक साल से चैनल लीडर रहा है। हमें पूरा विश्वास है कि व्युअरशिप के मामले में पूरा मार्केट आगे बढ़ेगा। हमारा प्रयास और फोकस मार्केट शेयर पर टिके रहना और प्रतिस्पर्धा की नई जरूरतों पर प्रतिक्रिया देना होगा।

दंगल टीवी के लिए आपकी कंटेंट स्ट्रैटेजी क्या होगी?

हम एक संपूर्ण एंटरटेनमेंट चैनल हैं जिसमें डेली सोप और नाटक से लेकर तमाम वैरायटी के शो शामिल हैं। यह सब पूर्व में हमें अच्छी तरह से परोसा गया है। प्लेयर्स इस जॉनर में अपने लाइब्रेरी कंटेंट के साथ दोबारा से आएंगे। हमारे पास ओरिजिनल से लाइब्रेरी तक 40:60 प्रतिशत की कंटेंट स्ट्रैटेजी है। हम यह देखेंगे कि चीजें कैसे आकार लेती हैं और फिर क्षेत्र में अग्रणी प्रतिस्पर्धी खिलाड़ी होने के लिए हम सभी जरूरी कदम उठाएंगे।

कुछ समय से विज्ञापन की कीमतों को लेकर काफी दबाव बना हुआ है। लेकिन अपनी पहुंच को देखते हुए आप विज्ञापन की दरों को कैसे कम कर रहे हैं? प्रतिबंधों में ढील के साथ कौन सी श्रेणियां रुचि दिखा रही हैं?

यदि हम हिंदी भाषी मार्केट चैनल्स की तुलना क्रिकेट में बैटिंग के क्रम से करें तो एफटीए चैनल्स अब मिडिल ऑर्डर (मध्य क्रम) में हैं, जबकि पे चैनल्स लीड पर हैं। मध्य क्रम अधिकांश क्लाइंट्स के लिए मीडिया प्लान्स में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। एडवर्टाइजर्स की ओर देखें तो ‘फास्ट मूविंग कंज्यूमर्स गुड्स’ (FMCG) आगे बने रहेंगे और इसके बाद बेवरेज, फूड्स और सीमेंट्स रहेंगे। हमें बैंकिंग और बीमा क्षेत्र से भी बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद है।

तमाम चैनल्स और नेटवर्क्स अपने बिजनेस मॉडल्स का पुनर्मूल्यांकन (re-evaluating) कर रहे हैं। इस दिशा में Enterr10 का क्या प्लान है?

ब्रॉडकास्टर्स द्वारा उठाया गया यह कदम पहले की योजनाओं की वापसी है, जो उन्होंने पहले बनाई थी। ट्राई (TRAI) के नए टैरिफ ऑर्डर ने अधिकांश प्लेयर्स को यह क्षेत्र छोड़ने के लिए मजबूर किया। हालांकि, मौजूदा बाजार परिदृश्य में, राजस्व की हानि बनाम चल रहे बिजनेस प्लान ने उन्हें वापसी के लिए प्रेरित किया। यह मार्केट अब आगे बढ़ेगा और परिपक्व होगा। हम प्रतिस्पर्धा में बने रहने और लीडरशिप के लिए ओरिजिनल प्रोग्रामिंग और ओवरऑल बिजनेस में निवेश करना जारी रखेंगे।

Enterr10 नेटवर्क में छह चैनल्स हैं। आप नेटवर्क के प्रदर्शन का आकलन कैसे करेंगे?

दंगल टीवी, भोजपुरी सिनेमा, फक्त मराठी और अन्य चैनल्स के साथ नेटवर्क ने पिछले वर्षों की तुलना में मजबूती से प्रदर्शन किया है।

Enterr10 के लिए आपकी भविष्य की क्या योजनाएं हैं? क्या आप और लॉन्चिंग करना चाहते हैं? यदि हां तो वह किस भाषा और जॉनर्स में होंगीं?  

हमने कुछ और लॉन्चिंग की योजना बनाई थी, लेकिन वर्तमान हालातों को देखते हुए उन्हें फिलहाल होल्ड पर रखा है। एक बार मार्केट के स्थिर होने पर हम तेजी से उन योजनाओं को धरातल पर ले आएंगे।

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शीरीन भान ने बताया, लॉकडाउन ने कैसे ‘CNBC-TV18’ के न्यूजरूम को किया प्रभावित

हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचें4मीडिया’ के साथ CNBC-TV18 की मैनेजिंग एडिटर शीरीन भान ने तमाम मुद्दों पर चर्चा की

Last Modified:
Thursday, 18 June, 2020
Shereen Bhan

‘सीएनबीसी-टीवी18’ (CNBC-TV18) स्टार्टअप्स के लिए समर्पित देश के पहले शो ‘यंग तुर्क’ की वर्षगांठ का जश्न मना रहा है। सबसे पहले यह शो वर्ष 2002 में प्रसारित किया गया था और अब 17 जून को यह 18 साल का हो गया है। हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ बातचीत में ‘सीएनबीसी-टीवी18’ की मैनेजिंग एडिटर शीरीन भान ने बताया कि करीब दो दशक के दौरान इस शो में लगभग 5000 स्टार्टअप्स और देश में स्टार्टअप्स की बढ़ती कहानी को दिखाया गया है। इस दौरान भान ने महामारी के दौरान न्यूज रूम के बदलते रूप के साथ ही इस बारे में भी चर्चा की कि इस मुश्किल समय में भी इस ब्रैंड ने कैसे व्युअर्स के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को बनाए रखा है। प्रस्तुत हैं शीरीन भान के साथ इस बातचीत के प्रमुख अंश:

हमें सबसे पहले ‘यंग तुर्क’ के बारे में थोड़ा बताएं। आपको क्या लगता है कि इन 18 वर्षों में देश में स्टार्टअप्स का परिदृश्य किस तरह और कितना बदल गया है?

’यंग तुर्क’ को युवा एंटरप्रिन्योर्स, नए आइडिया और उभरते भारतीय ब्रैंड्स पर फोकस करने के लिए बतौर एक प्रयोग शुरू किया गया था। हमने सोचा था कि यह एक सीरीज होगी जो 13 हफ्ते में खत्म हो जाएगी, लेकिन इसने अपना सफर खुद जारी रखा। आज यह न सिर्फ स्टार्टअप्स को समर्पित देश का पहला शो है, बल्कि शायद स्टार्टअप्स और एंटरप्रिन्योरशिप पर दुनिया का सबसे लंबा चलने वाला शो है। इस शो के दौरान, हमने स्टार्टअप की अर्थव्यवस्था को विकसित होते हुए देखा है। 18 वर्ष पहले की तुलना में पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) ज्यादा विविध हो गया है। युवा भारतीय एंटरप्रिन्योर्स के पास आज के समय में टेक्नोलॉजी की पावर भी है। स्टार्टअप्स ने न सिर्फ नई कैटेगरीज और मार्केट तैयार किए हैं, बल्कि उन्होंने इस सेक्टर को एक व्यवस्थित सेक्टर के रूप में स्थापित करने में भी मदद की है, जो पहले काफी बिखरा हुआ था। इस ईकोसिस्टम की ग्रोथ के साथ ही ‘यंग तुर्क’ ने एक डेली शो ‘स्टार्टअप स्ट्रीट’ (Startup Street) शुरू करने का फैसला लिया, जो इस क्षेत्र के समाचारों पर केंद्रित है। ‘यंग तुर्क’ ने जहां 18 साल पूरे कर लिए हैं, वहीं ‘स्टार्टअप स्ट्रीट’ को अभी एक साल ही हुआ है और हम स्टार्टअप इंडिया की कहानी का एक अभिन्न हिस्सा होने पर बेहद गर्व महसूस कर रहे हैं।   

इस शो पर अब तक कितने स्टार्ट अप्स दिखाए गए हैं? हमें इस शो की विकास यात्रा के बारे में कुछ बताएं और 18 वर्षगांठ के लिए आपने किस तरह की स्पेशल प्रोग्रामिंग की योजना बनाई है?

इन तमाम वर्षों में हमने देश के करीब 5000 एंटरप्रिन्योर्स को दिखाया है और हमने इस शो को ग्लोबल लेवल पर भी पहुंचाया है। दुनिया के विभिन्न हिस्सों से स्टार्टअप के साथ हमारे गहरे संबंध हैं और इस शो को हम लंदन, सिंगापुर, इजराइल ले गए हैं और एक ग्लोबल नेटवर्क तैयार किया है। शो के 18 साल पूरे होने पर हमने एक घंटे का स्पेशल शो तैयार किया है, जिसमें देश के प्रमुख स्टार्टअप्स और इन्वेस्टर्स ‘CNBC-TV18’ पर हमारे साथ जुड़ेंगे। इसमें जाने-माने निवेशक और फाउंडर्स जैसे-‘ Nexus Venture Partners’ के को-फाउंडर और एमडी नरेन गुप्ता, ‘Lightspeed India Partners’ के पार्टनर देव खरे, ‘Indian Angel Network’ की को-फाउंडर पद्मजा रूपारेल, ‘Pine Labs’ के सीईओ अमरीश राव, ‘Rivigo’ की को-फाउंडर गजल कालरा, ‘Meesho’ के फाउंडर और सीईओ विदित आत्रे और ‘Vedantu’ के सीईओ और को-फाउंडर वामसी कृष्णा जैसे नाम शामिल हैं।  

वर्तमान दौर की बात करें तो आप कैसे बहुत कम कार्यबल (Workforce) के साथ काम कर रही हैं और लॉकडाउन ने किस प्रकार ‘CNBC-TV18’ के न्यूजरूम को प्रभावित किया है?  

इस महामारी ने निश्चित रूप से हमारे आसपास बहुत कुछ बदलकर रख दिया है। कम कार्यबल और लॉकडाउन ने हमें ज्यादा कुशल और इनोवेटिव (innovative) बनाया है। कोविड-19 महामारी हमारे समय की सबसे बड़ी स्टोरी है और CNBC-TV18 ने इसे कवर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। कोविड-19 से जुड़ी स्टोरी और अपडेट्स देने के लिए हमारी एडिटोरियल टीम लगातार काम कर रही है। हम व्यापार निरंतरता योजना (business continuity plan) को अपनाने वाले पहले लोगों में से थे, जिसने हमें न सिर्फ संचालन को निर्बाध रूप से बनाए रखने बल्कि सभी कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में भी सहायता प्रदान की है। ‘CNBC TV-18’ नेटवर्क में एंकर्स, पत्रकार, प्रॉडक्शन टीम और न्यूजरूम से जुड़े सभी लोगों ने नए नियमों को अपनाया और उनका पूरी तरह पालन कर रहे हैं। हमारा पूरा प्रयास ऑडियंस को फ्रेश और डायनामिक कंटेंट प्रदान करने का रहा है।

पिछले तीन महीनों के दौरान न्यूज की व्युअरशिप अब तक सबसे ज्यादा रही है। लोगों ने इस दौरान मार्केट और बिजनेस न्यूज में काफी रुचि दिखाई है। क्या CNBC-TV18 की ग्रोथ में भी इस तरह की बढ़ोतरी हुई है? इस ग्रोथ को बनाए रखने के लिए आपका क्या प्लान है?

जब से लॉकडाउन लागू हुआ था, तब से लोग अपने घर पर बहुत समय बिता रहे हैं। इस दौरान टीवी की व्युअरशिप भी काफी बढ़ी है। दूसरे जॉनर्स की तुलना में बिजनेस न्यूज की खपत (consumption) में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है, क्योंकि कोविड-19 महामारी का अर्थव्यवस्था और बाजारों पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा है। यहां तक कि जब हमने घर से काम (work from home) करने के लिए अपने ऑपरेशंस का काफी महत्वपूर्ण हिस्सा शिफ्ट किया, उस दौरान भी हमने प्रभावशाली लोगों को एक साथ लाने के लिए अपनी प्रोग्रामिंग पर नवाचार (innovation) करना जारी रखा। केंद्रीय बैंकर्स, केंद्रीय मंत्रियों, वित्त राज्य मंत्रियों और व्यापार जगत के नेताओं से लेकर वैश्विक स्वास्थ्य सेवा नेताओं और फंड मैनेजरों के द्वारा हमने अपने दर्शकों को समस्या और संभावित समाधानों पर पूरी जानकारी देने की कोशिश की है। एक जिम्मेदारी न्यूज प्लेटफॉर्म होने और बिजनेस न्यूज के क्षेत्र में अग्रणी होने के नाते CNBC-TV18 की व्युअरशिप में भी बहुत ज्यादा इजाफा देखने को मिला है, जो हाल में स्थिर हुआ है। अंग्रेजी बिजनेस न्यूज जॉनर में हमने लगातार 70 प्रतिशत से अधिक मार्केट शेयर हासिल किया है। CNBC-TV18 ने बेजोड़ कवरेज और गहन विश्लेषण के कारण बेहतर प्रदर्शन जारी रखा है।

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ABP न्यूज नेटवर्क के CEO ने बताया, कैसे ग्रोथ की कहानी बयां कर रहा यह चैनल

‘एबीपी न्यूज नेटवर्क’ के सीईओ अविनाश पांडे ने हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ के साथ तमाम मुद्दों पर चर्चा की

Last Modified:
Thursday, 11 June, 2020
Avinash Pandey

'ब्रॉडकास्‍ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल' (BARC) इंडिया की रेटिंग में लगातार सात हफ्ते तक नंबर वन रहने के बाद ‘एबीपी न्यूज नेटवर्क’ (ABP News Network) के बंगाली न्यूज चैनल ‘एबीपी आनंद’ (ABP Ananda) ने इस संख्या को लगातार न सिर्फ बनाए रखने बल्कि आगे बढ़ाने की योजना भी बनाई है। हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ एक बातचीत में ‘एबीपी न्यूज नेटवर्क’ के सीईओ अविनाश पांडे ने बताया कि कैसे पश्चिमी बंगाल न सिर्फ व्युअर्स और न्यूज के इस्तेमाल (consumption) में हमेशा से आगे रहा है, बल्कि एडवर्टाइजर्स के लिए एक मार्केट के रूप में उभरा है। इस दौरान अविनाश पांडे ने एक मार्केट के रूप में बंगाल की स्थिति, एबीपी आनंद की ग्रोथ स्टोरी और जमीनी स्तर पर शुरू की गईं पहल समेत तमाम मुद्दों पर अपनी बात रखी। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

आपके रेटिंग के आंकड़े प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘Vocal for Local’ विजन को लेकर तालमेल बैठा रहे हैं। बढ़ती हुई रेटिंग के बारे में थोड़ा बताएं। क्या सिर्फ ‘स्टे एट होम’ (stay-at-home) ट्रैफिक की वजह से आंकड़ों में यह बढ़ोतरी हो रही है?

पिछले कुछ सालों में ‘एबीपी आनंद’ ने पश्चिम बंगाल के मार्केट में अपनी मजबूत पकड़ बनाई है और खासकर रीजनल न्यूज ब्रॉडकास्ट की बात करें तो यह काफी मजबूती से उभरा है। हम ‘एबीपी आनंद’ की 15वीं वर्षगांठ मना रहे हैं और एक और महत्वपूर्ण वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं, हम टीवी न्यूज को लेकर बड़े कदम उठाने के लिए तैयार हैं।

कोरोनावायरस के कारण लोग इन दिनों अपने घरों पर रहने के लिए मजबूर हैं, जिससे इंटरनेट और टीवी का इस्तेमाल बढ़ा है। इसमें कोई शक नहीं है कि व्युअरशिप बढ़ाने में लॉकडाउन की काफी अहम भूमिका है। वहीं, हमारा बेहतरीन और इनोविटव कंटेंट भी इस चुनौतीपूर्ण समय में लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने में समान रूप से प्रासंगिक रहा है। लगातार सात हफ्तों तक विभिन्न जॉनर्स में हम नंबर वन रहे हैं और हमारे व प्रतिद्वंद्वियों के बीच का अंतर और बढ़ा है। यह खुद अपने आप में हमारी ग्रोथ की कहानी बयां कर रहा है।

अन्य क्षेत्रों के मुकाबले बंगाल में न्यूज खपत (news consumption) का मार्केट कैसा रहा है, क्या आप इसे बढ़ता हुआ देख रहे हैं? क्यों?

व्युअरशिप और न्यूज खपत के मामले में बंगाल हमेशा से बढ़ोतरी की स्थिति में रहा है। ब्रॉडकास्टर्स और एडवर्टाइजर्स दोनों के लिए यह एक पसंदीदा बाजारों में से एक रहा है। इसके अलावा, हाइपर लोकल न्यूज ईकोसिस्टम भी कोविड-19 के दौरान बढ़ रहा है, क्योंकि व्युअर्स अपने जिले, कस्बे आदि से जुड़े न्यूज अपडेट्स को हासिल करना चाहते हैं। ऐसे में ‘एबीपी आनंद’ बंगाल में लोगों की पसंद बना हुआ है।  

इस महामारी के दौरान न्यूज चैनल्स न्यूज के अलावा इंफोटेनमेंट (infotainment) कार्यक्रम भी दिखा रहे हैं। इस दिशा में ‘एबीपी आनंद’ क्या कर रहा है?

लॉकडाउन के दौरान पहले से तनाव में रह रहे लोगों के लिए कोरोनावायरस की लगातार न्यूज कवरेज काफी निराशाजनक रह सकती है। ऐसी स्थिति से बचने के लिए हमें अपने कंटेंट में विविधता की जरूरत है। एबीपी आनंद के द्वारा हम कई जानकारीपरक और शैक्षिक प्रोग्राम्स पर फोकस कर रहे हैं। इससे पहले हमने कक्षा नौ और 12वीं के लिए वर्चुअल क्लासेज का प्रसारण किया, जिसे व्युअर्स की ओर से काफी अच्छी प्रतिक्रिया मिला। हमने सामाजिक शिक्षा प्रदान करने वाले नए फॉर्मेट्स को लेकर भी प्रयोग किया है। ‘Ghanta Khanek Sange Suman’ के द्वारा सुमन डे घर से लाइव शो होस्ट कर रहे हैं, जिसे लोगों ने काफी सराहा है।

लॉकडाउन के दौरान न्यूज कैटेगरी में अभूतपूर्व वृद्धि देखी रही है। आप इन आंकड़ों को बनाए रखने के लिए क्या कर रहे हैं। क्या आपको लगता है कि लॉकडाउन पूरी तरह समाप्त होने के बाद भी इन आंकड़ों को बनाए रखना संभव होगा?  

वर्तमान में जिस तरह की अनिश्चतता है, उसे देखकर अनुमान लगाना काफी कठिन है। हालांकि, लॉकडाउन के बाद व्युअरशिप में कुछ हद तक कमी आएगी, लेकिन पिछली तिमाहियों के मुकाबले यह ज्यादा बनी रहेगी। कोविड-19 को लेकर लोगों में डर लगातार बना रहेगी और व्युअर्स लेटेस्ट न्यूज अपडेट्स हासिल करना जारी रखेंगे। हमारा फोकस अपने व्युअर्स के लिए कंटेंट उपलब्ध कराने और नए नए इनोवेशन पर है, इसलिए हमें सकारात्मक वृद्धि की उम्मीद है।

राज्य में अगले साल विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं और यह सोशल डिस्टेंसिंग का दौर है। क्या आपको लगता है कि इस पूरी प्रक्रिया में बंगाल में न्यूज चैनल्स महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे और डिबेट्स के रूप में कंटेंट को परोसेंगे, जैसा कि हम पश्चिम देशों में देखते हैं?

इस महामारी से सभी प्रमुख इंडस्ट्रीज काफी प्रभावित हुई हैं। ब्रॉडकास्ट इंडस्ट्री भी इससे अछूती नहीं है। सोशल डिस्टेंसिंग के परिणामस्वरूप, न्यूज जॉनर में इवेंट वर्चुअल अब सामान्य बात हो चुकी है। वर्चुअल इवेंट और लाइव होम बुलेटिंस के जरिये हमारे न्यूज चैनल्स को जीवन की एक नई चीज भी मिली है। हाल ही में ‘एबीपी आनंद’ ने राज्य सरकार द्वारा सहायता प्राप्त माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्कूलों के साथ-साथ आईसीएसई (ICSE) और आइएससी (ISC) के नौवीं और 12वीं कक्षाओं के छात्रों के लिए वर्चुअल कक्षाएं प्रसारित की हैं। इसके अलावा भी हमारी ओर से कई और पहल की गई हैं। हम यह सुनिश्चित करेंगे कि चुनावों को जिस तरह इस महामारी से पहले प्रभावी रूप से कवर किया जाता रहा है, उसी तरीके से कवर किया जाए। हालांकि, सोशल डिस्टेंसिंग एक चुनौती है, लेकिन महामारी के दौरान कई नई पहल भी सामने आई हैं, जो हमारे लॉन्ग टर्म फोकस को बनाए रखेंगी।

कंटेंट की खपत (content consumption) में काफी बदलाव देखा गया है। तमाम व्युअर्स कंटेंट के लिए डिजिटल की ओर रुख कर रहे हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर चैनल किस तरह का प्रदर्शन कर रहा है?

इस समय, डिजिटल मीडिया के बढ़ते इस्तेमाल को नकारा नहीं जा सकता है। कंज्यूमर्स के व्यवहार में महत्वपूर्ण बदलाव आया है। ऐसे में अपने व्युअर्स की नब्ज को पहचानते हुए हमने नया कंटेंट तैयार किया है। ऐसे में हमारे सभी डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर काफी परिवर्तन देखने को मिला है। ‘एबीपी आनंद’ के यूट्यूब चैनल को 20 मई 2020 को 6.2 मिलियन व्यूज (source: YouTube Analytics) मिले हैं। यह दर्शाता है कि बंगाली दर्शकों पर हमारा कितना गहरा प्रभाव पड़ा है।  

चैनल की ओर से किस तरह की स्पेशल प्रोग्रामिंग अथवा ऑनग्राउंड पहल शुरू की गई हैं?

एबीपी आनंद के रूप में हमारा फोकस हमेशा से अपने कंटेंट में तमाम सांस्कृतिक तत्वों को शामिल करने पर रहा है, ताकि हम बंगाली व्युअर्स के साथ एक मजबूत रिश्ता स्थापित कर सकें। हमारे कुछ लोकप्रिय कार्यक्रमों में ‘खैबर पास फूड फेस्टिवल’ (Khaibar Pass Food Festival) शामिल है। यह कोलकाता के सबसे बड़े ऑनग्राउंड फूड फेस्टिवल्स में शामिल है जो बंगाल के फूड कल्चर को दर्शाता है। इसकी सफलता ने नॉर्थ बंगाल, साउथ बंगाल और नॉर्थ 24 परगनाओं में तीन अन्य खैबर पास कार्यक्रम (Khaibar Pass Events) का मार्ग प्रशस्त किया। इसके अलावा बंगाल की जानी-मानी हस्तियों को सम्मानित करने के लिए एक अवॉर्ड शो सेरा बंगाली (Sera Bangali) और विभिन्न विषयों पर लोगों को गहराई से जानकारी देने के लिए एक डिबेट शो ‘जुक्ती टोको’ (Jukti-Tokko) भी हमारी पेशकश में शामिल है। हमारी सभी स्पेशल प्रोग्रामिंग का उद्देश्य यही है कि हम लोगों की आवाज को उठाने के साथ ही उनसे जुड़े मुद्दों को सामने ला सकें।

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चार साल पहले उठाया गया बिजनेस स्टैंडर्ड का यह कदम भविष्य को देगा बल: शिवेंद्र गुप्ता

हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ के साथ एक बातचीत के दौरान ‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ के एग्जिक्यूटिव वाइस प्रेजिडेंट शिवेंद्र गुप्ता ने अपने पेवॉल मॉडल व इसे लागू करने में आईं चुनौतियों पर चर्चा की

Last Modified:
Wednesday, 03 June, 2020
Shivendra Gupta

तमाम अखबारों द्वारा अपने ई-पेपर्स को पेवॉल (paywalls) यानी पेड सबस्क्रिप्शन की ओर ले जाने का मुद्दा इन दिनों चर्चाओं में है। अंग्रेजी अखबार बिजेनस स्टैंडर्ड (Business Standard) उन मीडिया ऑर्गनाइजेशंस की लिस्ट में शामिल है, जिन्होंने अपनी न्यूज वेबसाइट के लिए काफी पहले पेवॉल मॉडल को अपनाया था। हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ एक बातचीत के दौरान ‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ के एग्जिक्यूटिव वाइस प्रेजिडेंट शिवेंद्र गुप्ता ने अपने पेवॉल मॉडल, इसे लागू करने में आईं चुनौतियों और इसके भविष्य के बारे में बताया। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

बिजनेस स्टैंडर्ड ने अपने ऑनलाइन कंटेंट को पेवॉल के पीछे रखा हुआ है। इसे लेकर अब तक का अनुभव कैसा रहा है और कंपनी को इस स्ट्रीम से किस तरह का रेवेन्यू मिलता है?

बिजनेस स्टैंडर्ड ने अपनी वेबसाइट के एक हिस्से को करीब चार साल पहले पेवॉल के पीछे रखा था। इस स्ट्रैटेजी को लेकर हमारा अनुभव काफी उत्साहजनक रहा है। पिछले चार साल में हमें अपने आंकड़ों में लगातार ग्रोथ देखने को मिली है। हालांकि, हम इसकी सटीक डिटेल शेयर नहीं कर पाएंगे, लेकिन यह कहना सही होगा कि डिजिटल सबस्क्रिप्शन ने हमारे कुल डिजिटल रेवेन्यू में काफी महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

शुरुआत में जब आपने रीडर्स से ऑनलाइन कंटेंट के लिए भुगतान करने के लिए कहा तो आपकी किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा? अभी आपके सामने किस तरह की चुनौतियां आ रही हैं?

सबसे बड़ी चुनौती (जो अभी भी बनी हुई है) तब आती है, जब लोगों से भुगतान करने के लिए कहा जाता है। खासकर तब, जब उन्होंने लंबे समय तक फ्री कंटेंट हासिल किया हो। सच्चाई यह है कि हमारे प्रतिद्वंद्वी फ्री स्ट्रैटेजी अपना रहे थे, इस बात ने भी हमारी ग्रोथ को बाधित किया। अब कोविड के बाद की दुनिया में हम देख रहे हैं कि अधिकांश पब्लिशर्स अपने ई-पेपर को पेवॉल के पीछे ले जाने की दिशा में कदम उठा रहे हैं। हमें लगता है कि भविष्य में इस दिशा में और मजबूती आएगी।

पेड ऑनलाइन कंटेंट मॉडल कई देशों में पहले से चल रहा है। लेकिन वहां प्रिंट एडिशंस या तो पूरी तरह समाप्त हो गए हैं अथवा उनकी कीमतें काफी प्रभावित हुई हैं। क्या आप अपने देश में इस तरह की परिकल्पना कर रहे हैं अथवा क्या आपको लगता है कि एक बार यह बुरा दौर गुजर जाने के बाद प्रिंटेड अखबार फिर वापसी करेंगे?

हमारा मानना है कि प्रिंट और डिजिटल दोनों बने रहेंगे। भारत के संदर्भ में देखें तो निकट भविष्य में प्रिंट और अधिक प्रभावी रहेंगे। वर्तमान दौर में डिस्ट्रीब्यूशन प्रक्रिया काफी बाधित होने के कारण इन दिनों प्रिंट मीडिया निश्चित रूप से काफी मुश्किल दौर से गुजर रहा है, लेकिन हमारा मानना है कि यह प्रॉडक्ट फिर जोरदार वापसी करेगा। हमें लगातार अपने पाठकों का फीडबैक मिलता है कि वे प्रिंट प्रॉडक्ट (अखबार) को मिस करते हैं और हमें विश्वास है कि एक बार स्थितियां सामान्य होने पर हम इन नुकसान की भरपाई कर सकेंगे। यहां तक कि जब हम सफल डिजिटल प्रॉडक्ट्स के अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों को देखें तो उनका प्रिंट बिजेनस (हालांकि यह डिजिटल से कम है) तब से ठीक प्रदर्शन कर रहा है, जब से वे अपने डिजिटव वर्जन को पेवॉल के पीछे ले गए हैं।

भारतीय प्रिंट मार्केट के लिए इस ऑनलाइन सबस्क्रिप्शन रेवेन्यू मॉडल के बारे में आपकी क्या राय है? क्या आपको मार्केट डायनामिक्स के इस दिशा में आगे बढ़ने की उम्मीद है?

पब्लिशर्स के लिए डिजिटल एडवर्टाइजिंग बिजनेस लंबे समय से निराशाजनक रहा है। संरचनात्मक रूप से देखें तो यह तय होता प्रतीत दिखाई नहीं दे रहा है। वहीं, डिजिटल की डिलीवरी कॉस्ट काफी ज्यादा है। डिजिटल पर टेक्नोलॉजी कई ऑपरेटिंग सिस्टम्स, डिवाइस और सोशल प्लेटफॉर्म्स पर बंटी हुई है, जो अलग से अपने ऊपर ध्यान चाहते हैं। टेक्नोलॉजी की कीमतें प्रिंटिंग कॉस्ट में होने वाली बचत को खत्म कर देती हैं। इसका एकमात्र रास्ता डिजिटल सबस्क्रिप्शन मॉडल को तैयार करना है। डिजिटल के लिए सबस्क्रिप्शन और एडवर्टाइजिंग रेवेन्यू का मिश्रण उचित रहेगा। यह देखते हुए हमारा मानना है कि अधिकांश प्लेयर्स को देर-सवेर सबस्क्रिप्शन मॉडल की दिशा में कदम बढ़ाना होगा। अधिकांश प्लेयर्स के लिए अपनी डिजिटल प्रॉपर्टी (digital assets) को एडिट संचालित प्रॉपर्टी (edit driven assets) की दिशा में ले जाना होगा। वर्तमान में अधिकांश प्लेयर्स अपने डिजिटल प्रॉडक्ट को अपने मूल प्लेटफॉर्म (native platform) के तौर पर देखते हैं, जहां पर वास्तविक न्यूज को कॉमर्शियल कंटेंट से अलग करना मुश्किल है। डिजिटल प्रॉडक्ट के लिए भुगतान करने वाले कस्टमर्स जुटाने के लिए पब्लिशर्स को इन दोनों को एक-दूसरे से अलग करना होगा। शुक्र है कि बिजनेस स्टैंडर्ड में हमारी डिजिटल प्रॉपर्टी शुरुआत से ही एडिट यानी संपादकीय के कंट्रोल में रही है। इसने हमें डिजिटल सबस्क्रिप्शन प्रॉडक्ट के रूप में अग्रणी होने में मदद की है।

आखिरी सवाल, क्या आपको उम्मीद है कि ऑनलाइन कंटेंट पढ़ने के लिए पाठकों द्वारा भुगतान करने के मामले में इंडस्ट्री एक साथ आएगी?

मुझे इसकी पूरी उम्मीद है।

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अब अखबारों को इन दोनों मॉडल्स पर करना होगा काम: प्रोबल घोषाल, अमर उजाला

अमर उजाला लिमिटेड के डायरेक्टर प्रोबल घोषाल ने हिंदी और प्रादेशिक भाषाओं के अखबारों द्वारा अपनाए जा रहे डिजिटल सबस्क्रिप्शन मॉडल को लेकर रखी अपनी बात

Last Modified:
Saturday, 30 May, 2020
Probal Ghosal

कोरोनावायरस (कोविड-19) के खौफ के कारण देश में चल रहे लॉकडाउन के बीच विभिन्न अखबारों के ई-पेपर्स और ऑनलाइन कंटेंट की मांग में काफी इजाफा हुआ है। इस बीच तमाम अखबार अपने ई-पेपर्स को पेवॉल (paywalls) यानी पेड सबस्क्रिप्शन की ओर ले जा रहे हैं। हिंदी और प्रादेशिक भाषा के कई अखबारों द्वारा डिजिटल सबस्क्रिप्शन मॉडल की दिशा में बढ़ाए जा रहे कदम को लेकर हमारी सहयोगी बेवसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) ने ‘अमर उजाला लिमिटेड’ के डायरेक्टर प्रोबल घोषाल से बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

देश के तमाम बड़े अंग्रेजी अखबार अपने ऑनलाइन कंटेंट से मुद्रीकरण (monetisation) के लिए इसे पेवॉल के पीछे ले जाने की प्लानिंग कर रहे हैं। इस बारे में आपका क्या नजरिया है। आपको क्या लगता है कि अन्य अखबार खासकर हिंदी और प्रादेशिक भाषा के अखबार भी इस राह पर चलेंगे?

हाल के दिनों में देखें तो विभिन्न अखबारों के डिजिटल कंटेंट का उपभोग (consumption) यानी इस्तेमाल काफी बढ़ा है, चाहे वह ई-पेपर का सबस्क्रिप्शन हो अथवा यूजर्स द्वारा ऑनलाइन न्यूज कंटेंट का इस्तेमाल किया जाना हो। हाल ही में आई ‘इंडियन रीडरशिप सर्वे’ (IRS) की रिपोर्ट में भी इस पर प्रकाश डाला गया है। इस बढ़ते हुए ट्रेंड को देखते हुए ही हमने अपने आप पहल करते हुए पिछले साल नाममात्र के मूल्य पर ई-पेपर के लिए पेड मॉडल लॉन्च किया था। हालांकि, जब हम अंग्रेजी अखबारों के सबस्क्रिप्शन प्लान्स पर नजर डालते हैं तो उनके सबस्क्रिप्शन ऑफलाइन अखबारों की कीमत के बराबर ही हैं। चूंकि, ई-पेपर पढ़ने की आदत लोगों में काफी कम है, क्योंकि ई-पेपर की रीडरशिप एक पाठक तक ही सीमित होती है, जबकि जो अखबार फिजिकल घरों में पहुंचता है, उसे तमाम पाठक आपस में शेयर कर लेते हैं। यही कारण है कि महंगे सबस्क्रिप्शन प्लान की सफलता सीमित हो जाती है।    

हमने अपने सबस्क्रिप्शन प्लान के लिए काफी नाममात्र कीमत रखी है, क्योंकि हमारा प्राथमिक उद्देश्य पाठकों में इसे पढ़ने की आदत को बढ़ावा देना है। वास्तव में कोविड-19 के दौरान ई-पेपर/ऑनलाइन कंटेंट सबस्क्रिप्शन मॉडल्स के लिए यह बहुत जरूरी है, ताकि बिजनेस को निर्वाह और अस्तित्व को बनाए रखा जा सके। वर्तमान में इसकी उपलब्धता एक बड़ा इश्यू है, लोग विश्वसनीयता के कारण अपनी पसंद के अखबार को पढ़ने के लिए देख रहे हैं और यह पाठक की ब्रैंड के प्रति निष्ठा है। इसलिए यदि लोगों को अपने हाथ में अखबार नहीं मिल रहा है तो वे इसे ऑनलाइन हासिल कर रहे हैं और इसके लिए भुगतान भी करते हैं। वास्तव में, स्थिति सामान्य हो जाने के बाद भी लोग अपनी इसी आदत के कारण ई-पेपर पढ़ते रहेंगे और इस बदले हुए व्यवहार के कारण अखबारों को भी अपने कंटेंट के लिए मुद्रीकरण का अवसर मिलेगा।

भारतीय प्रिंट मार्केट के लिए सबस्क्रिप्शन आधारित मॉडल के बारे में आपका क्या कहना है? आपको इस बारे में किस तरह की उम्मीद है। यदि भारतीय कंपनियां अपने पाठकों से ऑनलाइन कंटेंट का भुगतान करने के लिए कहेंगी, तो उनके सामने किस तरह की चुनौतियां होंगी?

प्रिंट मीडिया इंडस्ट्री में एडवर्टाइजिंग रेवेन्यू में हम पिछले कई सालों से स्थिरता देख रहे हैं। ऐसे में देश के न्यूजपेपर बिजनेस का भविष्य़ डिजिटल कंटेंट/ईपेपर के मुद्रीकरण के साथ ही अखबार की कीमत में बढ़ोतरी का मिश्रण होगा। चूंकि दोनों चीजों का सहअस्तित्व है, इसलिए एक भरोसेमंद और प्रतिष्ठित अखबार अपने अखबार के मूल्य को बढ़ाने के साथ ही ऑनलाइन कंटेंट से मुद्रीकरण करने में सक्षम होगा। हालांकि, टियर-दो/टियर-तीन (tier 2/tier 3) शहरों और ग्रामीण मार्केट में ऑनलाइन सबस्क्रिप्शन का मूल्य जरूर प्रभाव डालेगा।

इसके साथ ही हमें यह भी समझने की जरूरत है कि अखबार पढ़ने की आदत, क्रेडिबिलिटी और इंफार्मेशन के कारण एक पाठक वर्ग हमेशा बना रहेगा। इसलिए एक प्रतिष्ठित न्यूजपेपर को ब्रैंड के लाभ को ध्यान में रखते हुए अखबार की कीमत यानी कवर प्राइस को बढ़ाने के साथ ही नई पीढ़ी के ऑडियंस/यूजर्स के लिए ऑनलाइन कंटेंट के मुद्रीकरण पर भी काम करना होगा।   

यही नहीं, निकट भविष्य में जीडीपी ग्रोथ बढ़ने के कारण टियर-दो/टियर-तीन मार्केट में प्रिंट की ग्रोथ बढ़ेगी। इसके अलावा इन मार्केट्स में अखबारों की अपनी भी वैल्यू है। इससे कुछ समय के लिए एडवर्टाइजिंग रेवेन्यू को थोड़ा बल जरूर मिलेगा, लेकिन यह समग्र लाभ के दृष्टिकोण से पर्याप्त नहीं होगा। ऐसे में ब्रैंड्स को ऐसे मिक्स प्लान पर काम करना होगा, जिसमें अखबार का कवर मूल्य बढ़ाने के साथ ही ऑनलाइन सबस्क्रिप्शन मॉडल से भी कमाई हो। हालांकि, शुरुआत में समग्र परिदृश्य में ई-पेपर के सबस्क्रिप्शन मॉडल का योगदान इसमें काफी कम होगा, लेकिन तेजी से बदलती हुईं कंज्यूमर्स की आदतों और ई-पेपर व ऑनलाइन कंटेंट की स्वीकार्यता बढ़ने के साथ भविष्य में बदलाव जरूर होगा।

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यह डिजिटल के भविष्य के लिए अच्छा संकेत है: चंदन जायसवाल, डिजिटल एडिटर, नवोदय टाइम्स

कोरोनावायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए देश लॉकडाउन के दौर से गुजर रहा है और ऐसे में तमाम इंडस्ट्री पर आर्थिक संकट का खतरा मंडराने लगा है।

Last Modified:
Friday, 29 May, 2020
chandan Jaiswal

देश में कोरोनावायरस (COVID-19) का कहर थमने का नाम नहीं ले रहा है। कोरोनावायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए देश लॉकडाउन के दौर से गुजर रहा है और ऐसे में तमाम इंडस्ट्री पर आर्थिक संकट का खतरा मंडराने लगा है। मीडिया इंडस्ट्री पर भी लॉकडाउन के असर से अछूती नहीं रही। लॉकडाउन के दौरान टीवी की व्युअरशिप बढ़ने के बावजूद विज्ञापनों की संख्या घट रही है। प्रिंट का सर्कुलेशन भी काफी प्रभावित हुआ है, लेकिन इसका डिजिटल पर कितना असर पड़ा है। इन्हीं तमाम मुद्दों पर समाचार4मीडिया ने 'नवोदय टाइम्स' के डिजिटल एडिटर चंदन जायसवाल से जानना चाहा कि आखिर वे इस बारे में क्या सोचते हैं? प्रस्तुत हैं प्रमुख अंश:

कोरोनावायरस (कोविड-19) के कारण देशव्यापी लॉकडाउन के दौरान टीवी की व्युअरशिप काफी बढ़ी है, डिजिटल में आप इसे किस रूप में लेते हैं?

डिजिटल के लिए भी लॉकडाउन का समय पाठकों के लिहाज से सही रहा है लेकिन इसका मतलब यह नहीं निकाला जाना चाहिए कि कोरोना काल के दौरान डिजिटल किसी और की पीठ पर चल के सफलता की मंजिल पर काबिज हुआ है। पिछले कई वर्षों से देखा जा रहा है कि समाचार को लेकर खास तौर पर यूथ की पसंद में बदलाव आया है और डिजिटल उन्हें यह यकीन दिलाने में सफल रहा है कि यह माध्यम उनके मन मुताबिक है और उनकी जरूरतों को पूरी भी कर रहा है। हां, ये बात जरूर कही जा सकती है कि लॉकडाउन के दौरान लोगों की गतिविधियां कम हुईं और घर में बैठे रहने के दौरान उनका रुख भी डिजिटल की और हुआ इसका असर हमें साइट पर विजिटर्स (व्युअरशिप) की बढ़ी संख्या के रुप में दिखा। समाचारों का विश्वसनीय स्रोत होने के नाते पंजाब केसरी समूह के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी यूजर्स की संख्या बढ़ी है।

टीवी और प्रिंट में विज्ञापन लगातार घटता जा रहा है, सरकार से इस दिशा में कदम उठाने की मांग हो रही है, डिजिटल पर विज्ञापन की क्या स्थिति है, इस बारे में कुछ बताएं?

लॉकडाउन और कोरोना काल से वैश्विक स्तर पर संकट है और इसका सबसे बुरा असर यदि जिन सेक्टर्स पर देखना पड़ रहा है, उनमें मीडिया भी शामिल है। डिजिटल की बात करें तो इस संकट काल में रेवेन्यू को लेकर कोई खास असर नहीं पड़ा है, क्योंकि डिजिटल के लिए रेवेन्यू की कमी हमेशा से रही है। हां, कोरोना काल में डिजिटल के पक्ष में एक अच्छी बात जो सामने आई है वो ये है कि कल तक जो इस माध्यम को विज्ञापन देने से हिचक रहे थे, अब तैयार नजर आ रहे हैं। कहा जा सकता है कि आने वाला दिन डिजिटल में रेवेन्यू के लिए बेहतर होने वाला है।

अन्य तमाम बिजनेस की तरह मीडिया भी इन दिनों काफी संकट से जूझ रही है। तमाम अखबार और मैगजींस का सर्कुलेशन प्रभावित हुआ है, तमाम मैगजींस को तो अपने प्रिंट एडिशन फिलहाल बंद करने पड़े हैं, डिजिटल पर इसका किस तरह असर पड़ा है?

कोरोना काल में तमाम तरह के झूठ फैलाए गए है। जैसा कि सब जानते हैं कि महज एक अफवाह के डर से दिल्ली-एनसीआर से लेकर गांवों तक तमाम लोगों ने अखबार/ मैगजींस लेना छोड़ दिया है। विज्ञापन शून्य हो जाने से एडिशन निकालना कठिन हो गया है। लेकिन यही अंतिम सत्य नहीं है। हमें इस आपदा को चुनौती के तौर पर लेना है। पहले भी पत्रकारिता चुनौतियों का सामना करती रही है। पंजाब केसरी समूह के चुनौतियों से जुझने और उससे बेहतर तरीके से निपटने का इतिहास रहा है। बुरा दौर है जो निश्चित ही जल्द खत्म होगा। हालांकि इस संकट काल में डिजिटल मीडिया को कोई नुकसान नहीं हुआ है बल्कि पाठक संख्या तो और बेहतर ही हुई है। भविष्य को लेकर तो अभी कुछ दावा नहीं किया जा सकता, लेकिन हिचकते हुए ही सही, जिस तरह से विज्ञापन देने वाली कंपनियां डिजिटल की तरफ रुख कर रही हैं...यह डिजिटल के भविष्य के लिए अच्छा संकेत है। 

वर्तमान हालातों को देखते हुए अपने पाठकों से जुड़े रहने के लिए तमाम मीडिया संस्थानों ने डिजिटल को और ज्यादा बढ़ावा देना शुरू कर दिया है, आपकी नजर में क्या प्रिंट के लिए यह खतरे की घंटी है?

देखिए मैंने पहले ही साफ कर दिया है कि प्रिंट और डिजिटल दोनों ही पत्रकारिता के आयाम तो हैं लेकिन ऐसा नहीं है कि ऐसे पाठक जो कल तक अखबार पढ़ रहे थे कोरोना के बाद डिजिटल की तरफ मुखातिब हो गए हैं और सिर्फ इसलिए ही डिजिटल की गाड़ी चल निकली है। कोरोना के दौरान प्रिंट के सर्कुलेशन गिरने और डिजिटल की रीडरशिप बढ़ने की व्याख्या कुछ लोग ऐसे कर रहे हैं कि लग रहा है कि प्रिंट की 'शहादत' से ही डिजिटल फलाफूला है, जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है।

आज से 5-7 साल पहले ही देश में इंटरनेट फ्रेंडली यूजर्स की बढ़ोतरी और समाचार की सभी विधाओं को एक ही प्लेटफॉर्म पर सबसे पहले (कई बार इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से भी पहले) परोस देने की खूबी के कारण डिजिटल ने प्रिंट को पीछे छोड़ दिया था। यही वह दौर था जब अखबार मालिकों ने डिजिटल पर ध्यान देना शुरू किया। इसका मतलब कही से भी यह नहीं निकालना चाहिए कि मैं कह रहा हूं कि प्रिंट आउटडेटेड हो गया। लेकिन यह तो मानना पड़ेगा कि आज का यूथ न्यूज के लिए प्रिंट की ओर नहीं डिजिटल की ओर देखता है। इसका कोरोना काल से कोई संबंध नहीं है। यूथ के हाथ में मोबाइल है, ऑफिस से आते-जाते महज उंगलियों की हलचल से वह दोस्तों से चैटिंग करते-करते टी-20 का स्कोर भी देख लेता है और लेटेस्ट न्यूज भी जान जाता है। न पेज पलटने की समस्या, न स्टेशन आने पर पेपर को समेट कर बैग में रखने का लोचा। ये मैंने डिजिटल की जो खूबियां गिनाई हैं, इन्हें प्रिंट के लिए खतरे के तौर पर मत देखिए। प्रिंट पर जो भी संकट है वह अस्थायी है या फिर जेनेरेशन का है। प्रिंट इन दोनों से बहुत आसानी से निपटने में सक्षम है। हम जब मीडिया में नए-नए आए थे तब से मीडिया पंडित प्रिंट के संकट की भविष्यवाणी कर रहे हैं। इलेक्ट्रॉनिक के आने के बाद तो उन लोगों ने समय भी बताना शुरू कर दिया था, जबकि हकीकत सबके सामने है।  

 इस संकटकाल में आप और आपकी टीम किस तरह की स्ट्रैटेजी बनाकर काम कर रही है, इस बारे में कुछ बताएं?

देखिए, संकट के इस दौर में हमारे समूह के सभी साथी बहुत ही मजबूती और बहादुरी के साथ काम कर रहे हैं। डिजिटल की बात करें तो जैसे ही लॉकडाउन के पहले चरण की शुरुआत होने वाली थी और जनता कर्फ्यू लग रहा था, उसी समय हम लोगों को ये अंदाजा हो गया था कि आने वाले समय में पाबंदियां बढ़ेंगी। हमने बिल्कुल शुरुआती दौर में ही सभी साथियों को वर्क फ्रॉम होम दे दिया। पहले हम लोग कंटेंट के लिए शिफ्ट वाइज मीटिंग करते थे, लेकिन अब सभी साथियों के साथ वर्चुअल मीटिंग करते हैं।

शुरुआत से ही हमने पूरा ध्यान कोरोनावायरस से जुड़े कंटेंट की ओर लगाया ताकि लोगों को ज्यादा से ज्यादा ऑथेंटिक इंफॉर्मेशन उपलब्ध करा सकें। इसके लिए हमने टेक्नोलॉजी का यूज करके विशेषज्ञ चिकित्सकों को लाइव कनेक्ट किया और लोगों को कोरोनाकाल की समस्याओं से निजात पाने का उपाय बताया। लॉकडाउन में एंटरटेनमेंट की खबरों के लिए तमाम सेलिब्रिटीज से लाइव कनेक्ट कर उसको फैंस के साथ रूबरू करवाते हैं। हमारे लिए वर्क फ्रॉम होम इसलिए भी आसान रहा कि नवोदय टाइम्स/पंजाब केसरी की टीम 9 राज्यों से काम करती है जिससे डिजिटल टीम को काफी मदद मिली। 

आपकी नजर में कोविड-19 के बाद डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में किस तरह के बदलाव आने की उम्मीद है?

मेरे हिसाब से तो मीडिया की दुनिया में बदलाव निश्चित है क्योंकि कोरोना काल इतनी जल्दी जाने वाला नहीं है। डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में पहला बड़ा बदलाव जो मैं देख पा रहा हूं वह है वर्क फ्रॉम होम। कोरोना काल में यह कार्य संस्कृति एम्प्लॉयी और एम्प्लॉयर दोनों के लिए बेहतर है और यह बदलाव दोनों के लिए ज्यादा व्यापक और अर्थपूर्ण है। पत्रकारों के काम करने का तरीका भी बदलेगा, मसलन किसी का इंटरव्यू करने के लिए टेक्नोलॉजी की सहायता से घर या दफ्तर से बैठे-बैठे उसे कनेक्ट कर लिजिए। इससे समय और मैनपावर दोनों की बचत भी होगी।

रेवेन्यू के लिहाज से यह समय काफी मुश्किलों भरा है। ऐसे में सबस्क्रिप्शन मॉडल पर गौर किया जा रहा है, आपकी नजर में क्या इससे इसकी भरपाई हो सकती है और क्या यह मॉडल सफल होगा, इस बारे में आपके क्या विचार हैं?

फिलहाल मैं इस बारे में कुछ नहीं कहूंगा

आखिरी सवाल, फेक न्यूज का मुद्दा इन दिनों काफी गरमा रहा है। खासकर विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर फेक न्यूज की ज्यादा आशंका रहती है, आपकी नजर में फेक न्यूज को किस प्रकार फैलने से रोका जा सकता है?

देखिए, मेरा मानना तो ये है कि ये सब कुकुरमुत्ते की तरह उग रहे न्यूज पोर्टल्स का मर्ज है। कई लोग प्रोपेगैंडा खबरों के लिए न्यूज पोर्टल्स खोल के बैठे हैं। इसके लिए सरकार को कुछ कड़े नियम बनाने चाहिए ताकि फेक न्यूज की पोस्टिंग पर लगाम लगाया जा सके। सोशल मीडिया पर समाचार पढ़ने वालों को भी जागरूक करना होगा कि वे हर किसी ख़बर पर आंख बंद करके भरोसा न करें।

जहां तक हमारा सवाल है तो हम लोग एक बड़े मीडिया हाउस (परम्परागत मीडिया संस्थान) से जुड़े हैं। नवोदय टाइम्स/पंजाब केसरी समूह की पाठकों में विश्वसनीयता है। हमारे यहां संपादकीय चेक एंड बैलेंस की व्यवस्था है जो वैसी खबरों को दूर रखने का काम करती है। हालांकि PV और UV के चक्कर में कई बार उतावलापन हावी होता है लेकिन क्रॉस चेक, फैक्ट चेक जैसे एथिक्स हैं जिसका दामन जितनी मजबूती से कोई संपादकीय टीम पकड़े रहेगी तब तक फेक न्यूज से बचना संभव है। यह कहना आसान है लेकिन डिजिटल मीडिया की 'सबसे पहले' वाली मानसिकता में इसे अमल में लाना उतना ही मुश्किल काम है।

न्यूज टीम के हर सदस्य के लिए भी यह समझने का विषय है कि एक ब्रैंड को तो ऐसी खबरें दागदार करती ही हैं,  खुद पत्रकारों के लिए भी ऐसी खबरों में ट्रैप होना उनके प्रोफेशनलिज़्म पर सवाल उठाता है और भविष्य में उनके सलेक्शन ऑफ न्यूज और न्यूज सेंस को भी खराब करता है।

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BBC हिंदी के एडिटर मुकेश शर्मा ने बताया, महामारी ने किस तरह बदली डिजिटल मीडिया की 'दुनिया'

ऐसा होता है कि कभी भी कोई बड़ी घटना होती है तो एक स्पाइक आता है, जिसमें ज्यादा से ज्यादा लोग आते हैं, फिर उसमें से बहुत सारे लोग चले जाते हैं, पर यह दिखता है...

Last Modified:
Tuesday, 26 May, 2020
Mukesh-sharma

इन दिनों कोरोनावायरस (कोविड-19) ने देश-दुनिया में अपना कहर बरपा रखा है। कोरोनावायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए देश में लॉकडाउन किया गया है, जिसकी वजह से तमाम उद्योग-धंधों पर विपरीत असर पड़ रहा है। मीडिया इंडस्ट्री भी इससे अछूती नहीं है। एक तरफ जहां अखबारों का सर्कुलेशन प्रभावित हुआ है, वहीं इंडस्ट्री को मिलने वाले विज्ञापनों में काफी कमी आई है। ऐसे में इंडस्ट्री तमाम आर्थिक कठिनाइयों से जूझ रही है। 

हालांकि, कोरोनावायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए देश में चल रहे लॉकडाउन के बीच टीवी चैनल्स की व्युअरशिप तो बढ़ी है, लेकिन विज्ञापन के मामले में इस व्युअरशिप का लाभ नहीं मिल पा रहा है, वहीं डिजिटल की पहुंच इन दिनों पहले से ज्यादा हुई है। क्या डिजिटल में आई यह वृद्धि बरकरार रहेगी और विज्ञापनदाता फिर से इंडस्ट्री की ओर रुख करेंगे? क्या तमाम अखबारों द्वारा अपने ई-पेपर को सबस्क्रिप्शन मॉडल (पेवॉल) के पीछे ले जाने की रणनीति रेवेन्यू के लिहाज से कारगर साबित होगी, जैसे तमाम सवालों को लेकर समाचार4मीडिया ने ‘बीबीसी हिंदी’ के एडिटर मुकेश शर्मा से बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

कोरोनावायरस (कोविड-19) के कारण देशव्यापी लॉकडाउन के दौरान टीवी की व्युअरशिप काफी बढ़ी है, डिजिटल में आप इसे किस रूप में लेते हैं?

जहां तक मैंने देखा है कि लॉकडाउन के दौरान डिजिटल प्लेटफॉर्म की रीडरशिप काफी बढ़ गई है। उसका एक कारण यह भी रहा कि इस दौरान लोगों तक अखबार की उपलब्धता भी बाधित हुई। दूसरी बात ये कि घरों में आमतौर पर एक या दो टीवी सेट होते हैं। घर के तो सभी मेंबर लॉकडाउन में फंसे हुए हैं। कहने का मतलब ये है कि टीवी सेट भले ही एक-दो हों, लेकिन घरों में मोबाइल सेट ज्यादा हैं। इस वजह से डिजिटल का उपभोग यानी खपत (Consumption) बढ़ा है। एक मसला ये है कि पहले जो लोग न्यूज में बहुत ज्यादा रुचि नहीं भी रखते थे,उन लोगों ने भी काफी न्यूज देखी। इसका कारण ये है कि यह मुद्दा (महामारी) सीधे-सीधे स्वास्थ्य से जुड़ा है। ऐसा नहीं है कि यह इलेक्शन का मुद्दा है जिसमें कुछ खास लोगों की रुचि है, या वर्ल्ड कप हो रहा है, जिसका अलग पाठक/दर्शक वर्ग है। चूंकि यह महामारी सभी के स्वास्थ्य से संबंधित है, इसलिए सभी लोग इस बारे में जानने के लिए उत्सुक हैं कि आखिर कहां पर क्या हो रहा है। हर व्यक्ति इस बारे में अपडेट और इंफॉर्मेशन जानना चाहता है कि आखिर क्या हो रहा है, यह महामारी कंट्रोल में आ रही है अथवा नहीं, संक्रमण कितना फैल रहा है अथवा कोई इलाज मिल पा रहा है अथवा नहीं। ये बातें जानने की सभी में जिज्ञासा थी। इसकी वजह से लोगों ने डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की ओर रुख ज्यादा किया, क्योंकि वे अपडेटेड रहना चाहते हैं। अपडेट्स अथवा नई इंफॉर्मेशन के लिए वे तमाम न्यूज वेबसाइट्स पर जा रहे हैं। कई बार लोगों की किसी खास न्यूज वेबसाइट में रुचि होती है और वह उसी को पढ़ना चाहते हैं, जैसे तमाम लोग किसी एक ही अखबार को ज्यादा पसंद करते हैं और उसी को पढ़ना चाहते हैं। टीवी चैनल्स के बारे में भी आमतौर पर लोग अपनी एक राय बना लेते हैं और उसी के अनुसार अपने पसंदीदा चैनल को ही देखते हैं। लेकिन इस दौरान तमाम लोगों की वह आदत भी बदली और उन्होंने विभिन्न न्यूज प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल किया, क्योंकि वह जगह-जगह जाकर देखना, सुनना और पढ़ना चाह रहे थे। कहने का मतलब है कि डिजिटल का इस्तेमाल कुल मिलाकर काफी बढ़ा है और यह डिजिटल के लिए काफी अच्छी बात है। ऐसे में इसने प्रिंट के लिए काफी चुनौतियां भी पेश की हैं। 

टीवी और प्रिंट में विज्ञापन लगातार घटता जा रहा है, सरकार से इस दिशा में कदम उठाने की मांग हो रही है, डिजिटल पर विज्ञापन की क्या स्थिति है, इस बारे में कुछ बताएं?

देखिए, बीबीसी विज्ञापनों को उस तरीके से बहुत ज्यादा नहीं लेता है, इसलिए बीबीसी के लिहाज से यह कहना थोड़ा मुश्किल काम है, लेकिन अन्य मीडिया प्रतिष्ठानों के लिहाज से देखें तो मसला इस चीज भी जुड़ा था कि लॉकडाउन के दौरान तमाम बिजनेस पर असर पड़ा। इसका प्रभाव विज्ञापन देने वालों पर भी काफी पड़ा। नकदी का काफी संकट है। इस स्थिति में विज्ञापन देने वालों को अपने पैसे का बैलेंस भी देखना है कि वे कितना खर्च कर सकते हैं। चूंकि इस दौरान डिजिटल की ग्रोथ काफी आगे बढ़ी, उसने इस मार्केट में विज्ञापनदाताओं के सामने तमाम अवसर जरूर पैदा किए हैं। तमाम विज्ञापनदाता जो पहले डिजिटल को लेकर सोचते थे कि एक बंडल पैकेज में साथ में हो जाएगा, मुझे लगता है कि आने वाले समय में अब बंडल पैकेज की जगह डिजिटल अपनी स्वतंत्र पहचान बना पाएगा।

अन्य तमाम बिजनेस की तरह मीडिया भी इन दिनों काफी संकट से जूझ रही है। तमाम अखबार और मैगजींस का सर्कुलेशन प्रभावित हुआ है, तमाम मैगजींस को तो अपने प्रिंट एडिशन फिलहाल बंद करने पड़े हैं, डिजिटल पर इसका किस तरह असर पड़ा है?

देखिए, तमाम मीडिया हाउसेज सिंगल मीडिया आउटलेट नहीं हैं। कुछ ही ऐसे हैं जो सिर्फ डिजिटल में काम कर रहे हैं। ज्यादातर मीडिया हाउस ऐसे हैं जो प्रिंट में हैं और साथ में उनका डिजिटल चलता है। टेलिविजन चैनल है और साथ में सपोर्टिंग में डिजिटल चलता है। चूंकि इन जगहों पर असर पड़ा है, इसलिए डिजिटल पर भी असर आने की बात देखी गई है। लेकिन केवल डिजिटल की बात करें तो डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर महामारी और लॉकडाउन का बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ा है। चूंकि डिजिटल की ग्रोथ काफी हुई है, इसलिए इस पर सबसे कम असर हुआ है। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर लोग ज्यादा आए, डिजिटल का इस्तेमाल ज्यादा बढ़ा। लोगों ने ज्यादा खबरें पढ़ीं। मीडिया संस्थानों ने भी डिजिटल पर ज्यादा कंटेंट उपलब्ध कराया। कहने का मतलब है कि लॉकडाउन पर डिजिटल का ज्यादा असर नहीं है, लेकिन हर मीडिया हाउस की अपनी जो वित्तीय स्थिति है, वो सब चीजों को प्रभावित करती है। जैसा हमने देखा कि जिस मीडिया हाउस पर इसका जितना प्रभाव पड़ा, उसने उसी हिसाब से अपने यहां अलग-अलग कटौतियां कीं। लेकिन जो सिर्फ डिजिटल के माध्यम हैं, अगर आप उन्हें देखेंगे तो उन्होंने प्रिंट के मुकाबले अच्छा प्रदर्शन किया है।     

वर्तमान हालातों को देखते हुए अपने पाठकों से जुड़े रहने के लिए तमाम मीडिया संस्थानों ने डिजिटल को और ज्यादा बढ़ावा देना शुरू कर दिया है, आपकी नजर में क्या प्रिंट के लिए यह खतरे की घंटी है?

दुनिया के बाकी देशों में जब प्रिंट का सर्कुलेशन कम हो रहा था तो भारत में अभी भी वह स्थिति नहीं थी। अब कोविड-19 के कारण जो परिस्थितियां पैदा हुई हैं, उसमें एक ये अलग चीज देखने को मिली है कि हर आयु वर्ग के लोग अब डिजिटल की ओर मुड़े हैं। मुझे लगता है कि लॉकडाउन में प्रिंट पर इसका थोड़ा असर पड़ेगा, क्योंकि पता नहीं कब लॉकडाउन पूरा हटेगा, कब उद्योग-धंधों अथवा विज्ञापनदाताओं की स्थिति थोड़ी बेहतर होगी और कब उनके पास इतना पैसा आएगा कि वे निवेश कर पाएंगे। कहने का मतलब है कि प्रिंट पर थोड़ा असर तो रहने वाला है लेकिन मुझे लगता है कि एक वक्त के बाद जब हालात थोड़े से सामान्य होंगे, तो फिर अखबार और मैगजींस का पुराना समय लौटेगा। लॉकडाउन में जरूर ऐसा हुआ है और स्थिति सामान्य होने में थोड़ा समय जरूर लगेगा, इसके बाद लोगों की प्रिंट की ओर वापसी फिर शुरू होगी।   

इस संकटकाल में आप और आपकी टीम किस तरह की स्ट्रैटेजी बनाकर काम कर रही है, इस बारे में कुछ बताएं?

इस महामारी के दौरान मीडिया आवश्यक सेवाओं में शामिल रहा है। मुझे लगता है कि मीडिया ने बहुत ही मजबूती के साथ और बहुत ही बहादुरी के साथ काम किया। मीडियाकर्मी लगातार घर से बाहर निकल रहे हैं। ऐसा नहीं है कि उनके परिवार वाले चिंतित नहीं हैं, लेकिन उनका बाहर निकलना जरूरी भी है, क्योंकि लोगों तक सूचनाएं पहुंचना जरूरी हैं। यह काफी काफी चुनौती वाला रहा। बीबीसी की बात करें तो जैसे ही लॉकडाउन के पहले चरण की शुरुआत होने वाली थी बल्कि जब जनता कर्फ्यू लग रहा था, उसी समय हम लोगों को ये अंदाजा हो गया था कि आने वाले समय में ये पाबंदियां बढ़ेंगी। हमने बिल्कुल शुरुआत के दौर में ही यह लागू करना शुरू कर दिया था कि घरों से काम कितना शिफ्ट हो सकता है। एक वक्त ऐसा था जब सामान्य समय में नहीं लगता था कि ऐसा हो सकता है, पर आज ऐसा हो रहा है। डिजिटल का कामकाज वैसे भी घर से करना इसलिए आसान हो जाता है कि यदि कंपनी ने लैपटॉप और जरूरी सॉफ्टवेयर उपलब्ध कराए हैं तो ज्यादा दिक्कत नहीं आती है और प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के चैनल्स की तुलना में आप डिजिटल का काम घर से आसानी से कर सकते हैं।

हमने उसी स्ट्रैटेजी के तहत शुरू में बैलेंस बनाने की कोशिश की कि मिनिमम और मैक्सिमम कितने लोगों की ऑफिस में रिक्वायरमेंट होगी, जिसे देखकर यहां बाकी सभी लोगों को वर्क फ्रॉम होम करने की इजाजत दे दी गई। हमने यह भी तय किया कि एम्प्लॉयीज हर दिन ना आए, लिहाजा इसके लिए काम के घंटे तय करने की जरूरत पड़ी, तो वह भी किया। बीबीसी में हम लोगों ने पहले तो इस तरह से बैलेंस बनाने की कोशिश की कि कुछ लोग ऑफिस आएं और कुछ लोग घर से ही काम करें और दूसरा यह कि इसमें भी थोड़ा रोटेशन हो सके, तो इसके लिए यह किया कि जो लोग ऑफिस आ रहे हैं, वह कुछ समय बाद घर से काम कर सकें और घर से काम कर रहे एम्प्लॉयीज कुछ समय बाद ऑफिस आ सकें, ताकि सभी में  थोड़ी सी सेंस ऑफ सिक्योरिटी और थोड़ी सी सुरक्षा की भावना रहे। और फिर कार्यालय ने यह भी ध्यान में रखा कि ऑफिस आने के लिए क्या साधन हो सकते हैं, क्या सुविधाएं हो सकती हैं, ताकि एक्सपोजर कम से कम हो सके।

शुरुआती समय में हमने टेक्नोलॉजी को ज्यादा अडॉप्ट किया था। फील्ड में जाना रिपोर्टिंग का एक अहम हिस्सा होता है। पर उस समय हमें यह भी समझ में आया कि एक बैलेंस बनाने की जरूरत थी और पहले वह कुछ इस तरह का होना था, जिसमें हमें अपने जर्नलिस्ट और पूरे ऑपरेशन की सेफ्टी भी देखनी थी, लिहाजा हमने न्यूज गैदरिंग के लिए टेक्नोलॉजी का सहारा ज्यादा से ज्यादा लिया। लोगों से बात करने व इंटरव्यू करने के किए जूम, स्काइप या फिर अन्य माध्यमों का प्रयोग किया, ताकि जर्नलिस्ट सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कर सकें। शुक्रगुजार हैं कि शुरुआती समय में ही हमारे यहां उठाए गए ऐहतियाती कदमों के चलते हमारा कोई भी रिपोर्टर कोरोनावायरस के संक्रमण में नहीं आया और हम अभी भी बचते हुए चल रहे हैं।

फिलहाल अपने पूरे ऑपरेशन के लिए बैलेंस बनाकर चलने की कोशिश करना पहली स्ट्रैटजी थी, जबकि दूसरी स्ट्रैजटी कंटेंट से जुड़ी है। कंटेंट से जुड़े हिस्से में हमको यह समझ में आया कि लोगों को इंफॉर्मेशन जानने की उत्सुकता तो है पर उन्हें क्रेडिबल इंफॉर्मेशन यानी भरोसेमंद सूचनाएं चाहिए। ऐसे समय पर यह बहुत बड़ी रिक्वायरमेंट है और भारत में बीबीसी को लोग एक विश्वसनीय माध्यम की तरह देखते हैं। यदि कोई ऐसी खबर है, जो उसे चेक करनी है तो वह बीबीसी पर चेक करना चाहता है। इसलिए यह जो क्रेडिबिलिटी बीबीसी के साथ जुड़ी हुई है, उसे देखते हुए ही हम चाहते हैं कि ऐसी कोई भी सूचना बीबीसी के जरिए न जाए, जो भरोसेमंद न हो। इसे पहले भी हम ध्यान में रखते थे और अब भी ध्यान में रखकर काम कर रहे हैं, जब इस समय इसकी जरूरत ज्यादा महसूस की जा रही है। लिहाजा इसके लिए हमने ध्यान रखा कि सिर्फ ग्लोबल लेवल पर एक्सेप्टेड चीजें हो रही हैं, हम उसी को ब्रॉडकास्ट करें। इसके लिए हमने डब्ल्यूएचओ की एडवाइजरी ध्यान में रखी और भी बहुत सारी चीजें ध्यान में रखीं। ऐसा नहीं है कि लोकल गाइडेंस और एडवाइजर्स पर भरोसा नहीं है पर जो चीजें समय की मांग है और ग्लोबल लेवल पर अप्लाई हो रही है, हमने उस पर भरोसा किया ताकि हंड्रेड परसेंट सही सूचनाएं लोगों के पास पहुंचें।

इस पूरे समय में हमने पूरा ध्यान कोरोनावायरस से जुड़े कंटेंट की ओर लगाया ताकि लोगों की जो ज्यादा से ज्यादा जिज्ञासाएं हैं, उन्हें शांत किया जा सके। अन्य भारतीय भाषाओं में, जहां भी बीबीसी काम करता है, हमने सब जगह इसी स्ट्रैटेजी के साथ काम किया है। इस दौरान कोरोना से जुड़ी हुई जितनी भी ऑथेंटिक इंफॉर्मेशन और जितनी जल्दी उन तक सूचनाएं पहुंचाई जा सकें, इस पर कंटेंट के लिहाज से काम किया गया।

आपकी नजर में कोविड-19 के बाद डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में किस तरह के बदलाव आने की उम्मीद है?

ऐसा होता है कि कभी भी कोई बड़ी घटना होती है तो एक स्पाइक आता है, जिसमें ज्यादा से ज्यादा लोग आते हैं, फिर उसमें से बहुत सारे लोग चले जाते हैं, पर यह दिखता है कि हर मीडिया संस्थान  उस स्पाइक को मेंटेन कर लेता है। स्पाइक होता है तो मुझे लगता है कि हर संस्थान में पहले के मुकाबले पाठकों और दर्शकों की संख्या बढ़ गई है। निश्चित रूप से इसमें से कुछ लोग अलग-अलग माध्यमों पर चले जाएंगे, लेकिन इनमें से कुछ लोग रिटेन भी हो जाएंगे। मुझे लगता है कि आने वाले समय में मीडिया संस्थान स्वास्थ्य संबंधी खबरों पर भी ध्यान रखेंगे। अभी तक ऐसा दिख रहा था कि जन स्वास्थ्य से जुड़ी खबरें पॉलिटिकल की कवरेज के आगे कहीं पीछे छूट जाती थीं, पर मुझे यह लगता है कि अब मीडिया संस्थान के लिए यह लर्निंग का समय है। पब्लिक हेल्थ को लेकर अब हर मीडिया संस्थान को थोड़ा सा ज्यादा काम करना चाहिए, ज्यादा से ज्यादा लोगों में जागरूकता लानी पड़ेगी, लिहाजा इससे पाठकों में उसके प्रति जागरूकता बढ़ेगी।

मुझे लगता है कोविड-19 के खत्म होने के बाद हेल्थ से जुड़ी खबरों पर मीडिया संस्थान फोकस करेंगे, तो वह और लोगों को अपने साथ रोक पाएंगे। हेल्थ से जुड़ी वेबसाइट्स आगे बढ़ेंगी, लेकिन क्रेडिबिलिटी की बात जरूर आएगी। कई बार क्या होता है कि जो खबर आप पढ़ रहे हैं, उस पर आप कितना भरोसा कर रहे हैं, यह कहीं न कहीं निर्भर करेगा उस प्लेटफॉर्म पर भी, कि वह ऑथेंटिक मीडिया ऑर्गेनाइजेशंस है या नहीं। दरअसल, यहां कहना चाहूंगा कि मीडिया संस्थान जब हेल्थ के ऊपर फोकस करेंगे, तो लोग उनकी ओर ज्यादा जाएंगे, बजाय छोटी जगहों के, क्योंकि छोटी जगहों पर थोड़ा सा भरोसे का संकट बना रहता है। लेकिन मैं यह भी नहीं कहूंगा कि लोगों का आंख मूंदकर के बड़े संस्थानों पर भरोसा हो जाता है, लेकिन हां छोटे संस्थानों के मुकाबले बड़े संस्थानों में भरोसा थोड़ा ज्यादा रहता है।

रेवेन्यू के लिहाज से यह समय काफी मुश्किलों भरा है। ऐसे में सबस्क्रिप्शन मॉडल पर गौर किया जा रहा है, आपकी नजर में क्या इससे इसकी भरपाई हो सकती है और क्या यह मॉडल सफल होगा, इस बारे में आपके क्या विचार हैं?

देखिए, बीबीसी एक पब्लिक सर्विस ब्रॉडकास्टर है, लिहाजा इस नाते जनता से जो ब्रिटेन में पैसा आता है उससे बीबीसी को फंड मिलता है और उस फंड से ही बीबीसी ब्रॉडकास्टिंग करता है। तो ऐसे में बीबीसी के लिए सबस्क्रिप्शन मॉडल लागू करना मुश्किल है। और वैसे भी बीबीसी दुनिया की 40 से ज्यादा भाषाओं में ब्रॉडकास्ट करता है, इसलिए अचानक से यह फैसला नहीं हो सकता और फिर यह एक जगह किया हुआ फैसला तो बिल्कुल भी नहीं हो सकता। बीबीसी के लिए पे मॉडल के पीछे कंटेंट ले जाना एक बहुत ही बड़ा फैसला होगा, जिसके लिए इस समय ऐसी कोई चर्चा करना मुश्किल है क्योंकि इस समय ज्यादा से ज्यादा लोगों तक ऑथेंटिक सूचनाएं पहुंचाना बीबीसी की प्राथमिकता है।

देखिए, सबस्क्रिप्शन मॉडल का लागू करना मार्केट-टू-मार्केट पर निर्भर करता है। जैसे उन मार्केट्स में जहां लोगों के पास देने के लिए पैसा है। अब यूएस को देखिए, यहां की पब्लिक के पास ऐसी चीजें अफोर्ड करने के पैसे हैं, लिहाजा यह मॉडल यहां पहले शुरू हुआ। भारत जैसे देश में इस मॉडल को लागू करना आसान काम नहीं है। लोग पब्लिक से फंड की अपेक्षा तो कर सकते हैं, लेकिन पेवॉल के पीछे कंटेंट को ले जाना बहुत ही मुश्किल काम होगा। या फिर बहुत ही छोटा वर्ग होगा, जिसको आप  टारगेट कर पाएंगे। ऐसा इसलिए क्योंकि जो अखबार या चैनल है, वे सबस्क्रिप्शन कितने कम पैसे के ऊपर देते हैं, तो ऐसे में डिजिटल को पेवॉल के पीछे ले जाना यह बहुत ही मुश्किल काम होगा और इस समय अर्थव्यवस्था की हालत तो आप देख ही रहे हैं, यह आने वाले समय में शायद और बड़ी चुनौती बन जाए। इसलिए इतना आसान नहीं है इसे लागू कर पाना। लिहाजा बीबीसी भी अभी ऐसा कोई कदम नहीं उठाएगा, क्योंकि एक तो बीबीसी का इतना बड़ा ऑपरेशन है कि अगर कह भी दें कि वह ऐसा कहीं करना भी चाहे, तो बीबीसी को किसी एक मार्केट में देखना पड़ेगा, क्योंकि यूके जैसी मार्केट, जोकि प्राइमरी मार्केट है, वहां तो पहले से ही पब्लिक पैसा दे रही है, फिर वहां कंटेंट को पेवॉल के पीछे ले जाने से एक विचित्र स्थिति बन जाएगी। बीबीसी के इतने बड़े ऑपरेशन को देखते हुए यह बहुत ही मुश्किल और चुनौती भरा काम होगा। लेकिन पैसे को लेकर जब हर मार्केट में स्थिति एक जैसी है तो, बीबीसी के ऊपर भी प्रेशर होगा, लेकिन पब्लिक सर्विस ब्रॉडकास्टर होने के नाते बीबीसी के लिए यह इतना आसान नहीं है।

आखिरी सवाल, फेक न्यूज का मुद्दा इन दिनों काफी गरमा रहा है। खासकर विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर फेक न्यूज की ज्यादा आशंका रहती है। आपकी नजर में फेक न्यूज को किस प्रकार फैलने से रोका जा सकता है?

आपने देखा होगा कि बीबीसी साइट तो हमेशा से ही फेक न्यूज के खिलाफ पूरी की पूरी रीढ़ है। रियलिटी चेक और फैक्ट चेक के नाम से बीबीसी लगातार चीजें प्रोवाइड कराता है, जैसा कि मैंने पहले भी कहा है कि बीबीसी के साथ एक क्रेडिबिलिटी जुड़ी हुई है, तो हम उसी को और बेहतर कर सकते हैं। पहले भी हम लोगों को गलत खबरों की जांच करके बताते थे, और इस दौरान भी बीबीसी लगातार इस पर ही काम कर रहा है और वह भी दो तरह से। एक तो मेडिकल फील्ड में, जहां आपने देखा होगा कि मेडिकल फील्ड में कुछ ऐसी खबरें आने लगी है कि गर्म पानी पियो तो कोरोनावायरस का प्रभाव नहीं होगा, किसी ने कहा ठंडा पानी पियो तो कोरोना का प्रभाव नहीं होगा, तो किसी ने कहा मौसम बदलेगा तो कोरोना का असर खत्म हो जाएगा। देखिए, हर रोज कभी किसी को लेकर, तो कभी किसी के नाम की फेक चर्चा होने लगती है। बीबीसी ने इस पर बहुत सावधानी से काम किया है। बीबीसी ने लगातार ऐसी हर चीज का फैक्ट चेक करके बताया कि यह सच है या गलत है। आप जो यह बहुत सारे दावे पढ़ रहे हैं यह सच है या गलत। बीबीसी ने इस दौरान खास तौर पर यह काम किया और एक्रॉस द लैंग्वेज किया। इंग्लिश में किया और इन्हीं चीजों को हमने यहां अभी रिप्लिकेट किया। भारत में भी इस दौरान कई तरह की फेक न्यूज फैलीं और हमने उन्हें बस्ट करने का काम किया। वैसे भी बीबीसी फेक न्यूज थोड़ा ज्यादा ही बस्ट करने का काम करता है। इस दौरान भी जिन लोगों के मन में कोई मिथक बन गया है, उसे तोड़ने के लिए बीबीसी ने लगातार खास कंटेंट दिया है।

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