पत्रकार स्टोरीटेलर होता है, पर आज कई पत्रकार खुद 'कहानी' बन गए हैं: भूपेंद्र चौबे

अंग्रेजी न्‍यूज चैनल 'CNN-News18' के एग्जिक्‍यूटिव एडिटर भूपेंद्र चौबे अपने आपको दूसरी पीढ़ी...

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 04 September, 2018
Last Modified:
Tuesday, 04 September, 2018
bhupendra chaubey

समाचार4मीडिया ब्‍यूरो ।।

अंग्रेजी न्‍यूज चैनल 'CNN-News18' के एग्जिक्‍यूटिव एडिटर भूपेंद्र चौबे अपने आपको टीवी मीडिया की दूसरी पीढ़ी का पत्रकार मानते हैं। बीस वर्षों से ज्‍यादा समय से पत्रकारिता में सक्रिय भूपेंद्र चौबे की न सिर्फ अंग्रेजी बल्कि हिंदी भाषा पर भी काफी अच्‍छी पकड़ है। तमाम बड़ी शख्सियतों का इंटरव्‍यू कर चुके भूपेंद्र चौबे इन दिनों नेटवर्क 18 के अंग्रेजी न्यूज चैनल सीएनएन-न्यूज18 पर प्राइम टाइम शो ‘Viewpoint’ पेश कर रहे हैं। 

'समाचार4मीडिया' के डिप्‍टी एडिटर अभिषेक मेहरोत्रा ने विभिन्‍न मुद्दों को लेकर उनसे बातचीत की। प्रस्‍तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

आज हम जिस भूपेंद्र चौबे को स्‍क्रीन पर देखते हैं, वो किस तरह इस मुकाम तक पहुंचे हैं। पत्रकारिता की शुरुआत कैसे हुई ?

मैंने कभी सोचा नहीं था कि मैं पत्रकार बनूंगा। न तो मैं इस तरह की किसी उम्‍मीद में था और न ही मेरी ऐसी कोई मंशा थी। दरअसल, मैं तो फिल्‍म बनाना चाहता था। मैं दिल्‍ली के सेंट जेवियर्स स्‍कूल में पढ़ता था। मेरा पालन-पोषण दिल्‍ली में हुआ है। वैसे मैं बनारस का रहने वाला हूं। लेकिन मैंने ये कभी नहीं सोचा था कि मैं पत्रकार बनूंगा अथवा टीवी एंकर बनूंगा। सच कहूं तो मुझे इन सब चीजों के बारे में अंदाजा ही नहीं था कि पत्रकारिता क्‍या होती है और टीवी एंकर क्‍या होता है? मैं भी आम लोगों की तरह ही अखबार पढ़ता था। 

हां, एक बात हमें पता थी कि यदि जीवन में आगे बढ़ना है तो उसके लिए हमें ही खुद कुछ करना है। क्‍योंकि हमारा कोई गॉडफादर नहीं था। यदि जर्नलिज्‍म की बात करें तो हमारा किसी पत्रकार से दूर-दूर तक कोई परिचय नहीं था। मैं किसी जर्नलिस्‍ट को नहीं जानता था।

ये जरूर था कि स्‍कूल में जो वाद-विवाद प्रतियोगिताएं होती थीं, उनमें मेरी अच्‍छी भागीदारी होती थी। बहुत बार उनमें मैं अच्छी परफॉरमेंस देता था। 12वीं के बाद जब मैंने दिल्‍ली यूनिवर्सिटी से मैथ्स में बीएससी ऑनर्स किया। उसके बाद मैं मैथ्स की आगे की पढ़ाई करने के लिए सेंट जेवियर्स कॉलेज मुंबई जा रहा था। जब मैं वहां गया तो मेरे मित्रों ने सुझाया कि तुम इतना अच्‍छा बोलते हो, इतना अच्‍छा लिखते हो, यहां पर जेवियर इंस्‍टीट्यूट ऑफ कम्‍युनिकेशन (XIC) के नाम से एक इंस्‍टी्ट्यूट है, वहां पर फिल्‍म एवं टेलिविजन प्रॉडक्‍शन का शाम का कोर्स चलता है, तुम वहां एडमिशन क्यों नहीं लेते हो। चूंकि मैं मायावी मुंबई में नया था और पहले कभी रहा नहीं था। ऐसे में मैं बड़े पर्दे के बारे में बहुत कुछ जानना चाहता था। जैसे कैमरा कैसे काम करता है? ऑडियो और साउंड कैसे काम करते हैं? ऐसे में कह सकते हैं कि स्‍क्रीन की दुनिया में वही मेरा पहला कदम था। इस समय तक भी मैंने पत्रकार बनने के बारे में सोचा नहीं था। लेकिन उसके बाद समय के साथ एक के बाद एक घटनाएं घटती गईं। 

जब मैंने कोर्स खत्‍म किया, उस समय प्रणॉय राय 'एनडीटीवी' के लिए ऐसे लोगों को तलाश रहे थे जो हिंदी और अंग्रेजी दोनों में काम कर सकें। चूंकि हम बनारस के थे और दिल्‍ली में पले-बढ़े थे। ऐसे में दोनों भाषाओं पर हमारी पकड़ ठीकठाक थी। एक दिन इस बा‍त का जिक्र होने पर हमारे किसी जानने वाले ने प्रणॉय रॉय से कह दिया कि यह अच्‍छा लड़का है, आप एक बार इससे मिलकर देखो। उन्‍होंने हमारी तारीफ भी कर दी कि यह लड़का स्‍कूल और कॉलेज में भी अच्‍छा करता था। फिर एक दिन 'एनडीटीवी' से हमारे पास फोन आया कि प्रणॉय रॉय आपको मिलने के लिए बुला रहे हैं। यह सुनकर मन में एक तरह से काफी खुशी हुई कि इतना बड़ा आदमी हमें मिलने के लिए बुला रहा है। जब मैं प्रणॉय रॉय से मिलने गया, तब तक मैं मुंबई में फिल्‍म डायरेक्‍टर केतन मेहता से बात कर चुका था और उन्‍हें बतौर असिस्‍टेंट डायरेक्‍टर जॉइन करने वाला था। वहां से सीखकर मुझे अपनी फिल्‍म भी बनानी थी लेकिन जैसा कि कहते हैं सब कुछ पहले से नियती से तय होता है तो 'एनडीटीवी' से हमारी शुरुआत हुई। 

फिर कुछ ऐसे हालात बने कि मैं वहां से निकल ही नहीं पाया। शुरुआत के एक-दो साल तक मैं जरूर सोचता था कि यह अस्‍थायी दौर है और जाना तो मुझे मुंबई ही है। मैं हर दो महीने में मुंबई चला जाता था, तीन-चार दिन रहने के लिए। वहां मेरा काफी लोगों से मिलना-जुलना होता था। मेरी आत्‍मा मुंबई में ही थी जबकि काम मैं दिल्‍ली में करता था। ऐसे में हालात कुछ ऐेसे बनते गए कि मैं यहीं पर काम में जुड़ता चला गया। इस प्रकार पत्रकारिता का मेरा सफर शुरू हुआ। बाकी तो आप देख ही रहे हैं।

अपने करियर की शुरुआत की पत्रकारिता के बारे में बताइए, उस वक्त आपको किस तरह का काम सौंपा गया था?

एनडीटीवी में मेरी शुरुआत नाइट शिफ्ट की ड्यूटी से हुई थी। हम उस समय नए थे ।जब मैंने शुरू किया तो तमाम तरह के पापड़ बेले। उस जमाने में एनडीटीवी में राजदीप सरदेसाई, अरनब गोस्वामी, बरखा दत्त एक ही न्यूज रूम में होते थे। दरअसल, मैं अपने आपको दूसरी जेनरेशन का पत्रकार मानता हूं। मेरी नजर में प्रणॉय राय, विनोद दुआ पहली जेनरेशन जबकि राजदीप, अरनब और बरखा दूसरी जेनरेशन के पत्रकार हैं। चूंकि उनका कॅरियर मुझसे करीब सात-आठ साल पहले शुरू हुआ था और इन्हों ने एक तरह से अपना वर्चस्व जमाया हुआ था। इसका कारण यह भी था कि उस समय इतना टफ कंप्टीशन नहीं थ। हालांकि ये सभी लोग काफी टैलेंटेड हैं और जीवन में काफी कुछ किया है लेकिन जब मैंने पत्रकारिता में कॅरियर शुरू किया तो 'जी न्यूज' शुरू हो चुका था। इसके अलावा 'आज तक' जो सिर्फ एक विडियो बुलेटिन करता था डीडी मेट्रो पर, वह 24 घंटे का चैनल हो गया था। मैं इस बात को नहीं भूल सकता हूं कि जो बड़ी स्टोरी हमने प्रतिस्पर्धी माहौल में की थी, वह वर्ष 2001 में गुजरात के भुज में आया भूकंप था।

मैंने अपने जीवन में पहली बड़ी स्टोरी रवीश कुमार के साथ मिलकर की थी। यह 1999-2000 की बात है। हम दोनों को एक साथ ट्रेनिंग शूट पर भेजा गया था। उस समय दिल्ली में डीजल से सीएनजी में बदलाव हो रहा था। उस समय तमाम हल्ला  मचता था कि फलां पेट्रोल पंप में आग लग गई और वहां लंबी-लंबी लाइन लगी है आदि। ऐसे में हमें पेट्रोल-पंप डीलर्स एसोसिएशन के पास शाहदरा भेजा गया था। चूंकि एनडीटीवी में अधिकांश लोग साउथ दिल्ली  से थे, इसलिए इनमें से कई ये भी नहीं जानते थे कि शाहदरा कहां है। चूंकि वहां हमें छोड़कर ज्या,दातर लोग संपन्न  परिवारों से थे। इसलिए हमें भी लगता था कि हमें भी कुछ खास करना है और अपने आपको साबित करना है। वहां आमतौर पर शाम को पांच-छह बजे लोग चले जाते थे। 

ऐसे में रात में कोई घटना होती थी तो उसे कवर करने के लिए हम खुशी-खुशी चले जाते थे। ऐसे में मुझे और रवीश को बोला गया कि शाहदरा में पेट्रोल ऑनर्स एसोसिएशन की बाइट लेकर आइए। वहां से मेरा और रवीश का रिश्ता शुरू हुआ। उस समय रवीश काफी अलग कॉमिक अंदाज में रहा करते थे। मैं उनको देखकर घबरा जाता था। शुरू से ही उनका रवैया थोड़ा अलग रहा है। उन्हें हमेशा से लगता था कि दुनिया में सब गलत है। तो मैं उनको कहता था कि आगे सब ठीक होगा। तब से हमारी दोस्ती शुरू हो गई हम दोनों ने जीवन में कई बड़े काम भी एक साथ किए। यहां से हमारी गाड़ी शुरू हुई और मैने अपने जीवन में पहला जो सबसे मेनस्ट्रीम पॉलिटिकल इवेंट कवर किया या यूं कहें कि जहां पर मुझे अपने आपको साबित करने का मौका मिला, वे वर्ष 2002 का उत्तर प्रदेश का चुनाव था। मुझे अभी तक याद है कि 24-25 फरवरी 2002 को जब चुनाव के नतीजे आए थे, मैं वापस आया और बहुत खुश था कि सब लोग मेरी प्रशंसा करेंगे। उस समय मुझे एक गाड़ी और एक कैमरामैन दिया गया था जिसके साथ मैंने उत्तर प्रदेश का कोना-कोना छान मारा था। उससे मेरा हौसला काफी बढ़ा था और बहुत-कुछ सीखने को मिला था। 

एक घटना और मुझे याद है कि किसी जमाने में चौधरी अजित सिंह का हरित प्रदेश का कैंपेन काफी जोर-शोर से चल रहा था। एक दिन शनिवार को अजित सिंह कोई रैली कर रहे थे लेकिन शनिवार की वजह से वहां शायद कोई रिपोर्टर जाने के लिए तैयार नहीं था कि बेकार में पूरा दिन खराब होगा। उस दिन मेरी नाइट शिफ्ट थी। तब बॉस ने हमसे पूछा। नाइट शिफ्ट होने के बावजूद मैंने वहां जाने के लिए हां कर दी। दूसरे लोगों को अटपटा भी लगा कि रात भर इसने काम किया और सुबह होते ही फिर काम पर चला गया। मैं वहां से स्टोरी लेकर आया, लिखी और फाइल कर दी। चूंकि उस वक्त इतना दबाव नहीं होता था तो अपने अनुसार स्टोरी लाकर उसे लिखकर एडिट भी कर सकते थे। इस तरह की एक नहीं, कई घटनाएं मैंने कवर की हैं। 

आप जिस दौर में पत्रकारिता में आए, यह वो दौर था जब न आज जितना ग्‍लैमर था और न ही इतना पैसा। ये ठीक है कि प्रणॉय राय ने आपको बुलाया लेकिन जब आपने अपने परिवार वालों को बताया कि आप पत्रकारिता में जा रहे हैं तो उनकी कैसी प्रतिक्रिया थी ?

जब मैंने एनडीटीवी को जॉइन किया तो मेरी पहली पगार के बारे में बताया गया कि वैसे तो रिपोर्टर को आठ हजार रुपये दिए जाते हैं। लेकिन आप चूंकि हिंदी और अंग्रेजी दोनों में बढि़या हैं, इसलिए हम आपको दस हजार रुपये देंगे। यह वर्ष 1999 के आसपास की बात है और तब इतनी पगार मुझे बहुत लगी। जब मैंने अपने माता-पिता को यह बात बताई तो उन्‍होंने कहा कि कल को तुम्‍हारी शादी होगी, बच्‍चे होंगे तो उस समय इतने पैसे में तुम क्‍या करोगे, क्‍या खाओगे और कहां रहोगे। उन्‍हें समझाने में मुझे कुछ समय लगा। मेरे माता-पिता इसे समझ ही नहीं पाते थे। चूंकि मेरी नाइट शिफ्ट होती थी तो माताजी पूछती थीं कि बेटा तुम काम क्‍या करते हो। ये कौन सा काम है जो तुम रात को 11 बजे जाते हो और सुबह नौ बजे आते हो। हालांकि समय के साथ धीरे-धीरे उन्‍हें यह बात समझ में आ गई। 

आप हमेशा खुद को सेकेंड जनरेशन का पत्रकार मानते हैं। आपके समय के लोगों ने प्रिंट व टीवी दोनों में काम किया है जबकि आप शुरू से ही हार्डकोर टीवी जर्नलिस्‍ट रहे हैं?

आपका कहना सही है कि मैं शुरू से ही हार्डकोर टीवी जर्नलिस्‍ट रहा हूं। उसका एक कारण है कि मैं अपने आपको यथार्थवादी व्‍यक्ति मानता हूं। मैं अपने आपको एक ऐसे व्‍यक्ति के रूप में देखता हूं जिसका काम कहानी बताना है और मैं टीवी के जरिए अपने दर्शकों के सामने ये काम अच्छी तरह से कर पाता हूं। मैं खुद कहानी नहीं हूं और मैं ये मानता भी हूं कि एक पत्रकार को खुद कहानी नहीं बनना चाहिए। ये अलग बात है कि मेरे कई साथी संपादक आज खुद कहीं न कहीं कहानी बन गए हैं। मैं अभी भी अपने आपको जमीन का रिपोर्टर समझता हूं, जिसका काम दर्शकों तक कंटेंट पहुंचाना का है।

आपके कहने का मतलब है कि पत्रकार कहानी नहीं है बल्कि वह सिर्फ स्‍टोरी टैलर यानी कहानी बताने वाला है ?

बिल्‍कुल यही बात है। टीवी पर रात को नौ बजे अपने प्रोग्राम 'व्‍यूपाइंट' में मैं इस बात का विशेष ध्‍यान रखता हूं कि उसमें  चीखना-चिल्‍लाना न हो। मेरा मानना है कि यदि मुंबई में कोई ब्रिज गिर गया है तो उसके कुछ फलां-फलां कारण होंगे। उन कारणों से पहले कुछ घटनाएं घटी होंगी। उन घटनाओं के ऊपर क्‍या क्‍या क्रिया-प्रतिक्रियाए हुई, ये लोगों को बताना मेरा काम है। किसी घटना को लेकर चार-पांच लोगों को स्‍क्रीन पर बिठाकर चीखना-चिल्‍लाना, मेरी नजर में सही पत्रकारिता नहीं है।

1999 से लेकर 2018 तक दो दशक के सफर में आपने किस तरह टीवी पत्रकारिता को बदलते देखा और जब आप इसका मजाक उड़ते देखते हैं तो कैसा महसूस करते हैं ?

यह सवाल पूछ आपने दुखती हुई रग छेड़ दी है। टीवी पत्रकारिता आजकल मजाक बन गई है, आपके इस सवाल पर काश मैं ये कह पाता कि आप झूठ बोल रहे हैं। लेकिन सच्‍चाई यही है कि आप झूठ नहीं बोल रहे हैं। 

पर मैं सकारात्मक सोच वाला व्यक्ति हूं इसलिए यही कहूंगा कि आज की तारीख में माहौल चाहे जैसा हो लेकिन ऐसा नहीं है कि सब कुछ बर्बाद हो चुका है। इतना सब होने के बाद भी मुझे लगता है कि इस क्षेत्र में अभी इतने अवसर हैं कि यदि हम सही से उनकी पहचान करें तो काफी कुछ अच्‍छा हो सकता है। मेरे साथ कई ऐसे रिपोर्टर काम करते हैं जो काफी मेहनत करते हैं और बड़ी मेहनत से स्‍टोरी लेकर आते हैं। यदि मैं उन स्‍टोरी पर सही से प्रोजेक्‍ट नहीं कर पाऊं तो ये उनकी नहीं मेरी गलती है। यदि मैं अपने सीनियर्स को यदि यह नहीं बता पाऊं कि यही पत्रकारिता है तो ये उनकी और मेरे बीच की दुविधा है। इसमें रिपोर्टर्स का कोई काम नहीं है। मैं ये तो मान सकता हूं कि टीवी मजाक बन गया है लेकिन यह नहीं मान सकता कि टीवी खत्‍म हो गया है। मेरा मानना है कि अभी भी काफी मौके हैं। ऐसा नहीं है कि स्थिति बिल्‍कुल खत्‍म हो गई। मेरा मानना है कि स्थिति सुधरेगी।

इस सरकार में एमआआईबी (MIB) में अस्थिरता दिखती है। यहां थोड़े समय में ही कई मंत्री बदल दिए जाते हैं। हमारी इंडस्‍ट्री की पॉलिसी तो एमआईबी से ही तय होती है। आखिर इसके बारे में आपका क्‍या कहना है?

आप कांग्रेस के समय से ही देखें तो MIB में हमेशा अस्थिरता रहती है। यहां स्थिरता इसलिए नहीं आ पाती है क्‍योंकि एमआईबी में जो लोग बैठते हैं, उनमें से कुछ लोग तो अपना दायरा बहुत जल्‍दी समझ जाते हैं। मेरा अपना मानना है कि एमआईबी की कोई जरूरत ही नहीं है। आखिर एमबाईबी किसलिए है, यदि आपको चैनलों का लाइसेंस चाहिए तो उसके लिए एक सिस्‍टम है। आजकल तो हम लोग डिजिटल क्रांति की तरफ हैं। ऐसे में  यदि कोई व्‍यक्ति पात्रता की सभी शर्तें पूरी करता है तो सरकारी तंत्र से उसकी स्‍क्रूटनी कराकर उसे लाइसेंस जारी कर दिया जाए। हाल ही में प्रसार भारती ने एक विज्ञापन निकाला था जिसमें उसे कंटेंट मॉनीटरिंग असिस्‍टेंट पद के लिए उम्‍मीदवार चाहिए थे। यह देखकर मुझे काफी आश्‍चर्य हुआ कि आखिर ये कौन सा पद है। आजकल तो ट्विटर और फेसबुक का जमाना है। ऐसे में मान लीजिए कि यदि मैं कोई खबर न करूं तो इसका ये मतलब कतई नहीं है कि उसे कोई और नहीं करेगा। अगर खबर है तो वो कहीं न कहीं बाहर ही आएगी, क्‍योंकि आजकल ढेरों विकल्‍प हैं और आप खबर को दबा नहीं सकते हैं। आज मीडिया की स्थिति यह हो गई है कि आप इसे नियंत्रित नहीं कर सकते हैं। आप इसमें थोड़ी हेरफेर कर सकते हैं अथवा उसे प्रभावित कर सकते हैं लेकिन कंट्रोल बिल्‍कुल नहीं कर सकते हैं।  

नोट: भूपेंद्र चौबे संग विस्तार से की गई इस बातचीत का दूसरा भाग भी आप जल्द समाचार4मीडिया डॉट कॉम पर पढ़ेंगे।

 

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योगी आदित्यनाथ ने मीडिया की भूमिका को बताया अहम, गिनाईं सरकार की उपलब्धियां

‘बिजनेस वर्ल्ड’ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा  ने पिछले दिनों लखनऊ में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से तमाम पहलुओं पर चर्चा की

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 30 December, 2020
Last Modified:
Wednesday, 30 December, 2020
Yogi

‘बिजनेस वर्ल्ड’ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा ने पिछले दिनों लखनऊ में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की। इस मुलाकात के दौरान डॉ. अनुराग बत्रा ने योगी आदित्यनाथ से निवेश को आकर्षित करने, नई नौकरियों के अवसर पैदा करने और भ्रष्टाचार को खत्म करने जैसे तमाम बिंदुओं पर बातचीत की। इस बातचीत के दौरान उन्होंने मुख्यमंत्री से यह भी जानना चाहा कि उत्तर प्रदेश सरकार की क्या उपलब्धियां रही हैं और देश के इस सबसे बड़े प्रदेश के लोगों के भविष्य के लिए राज्य सरकार के पास क्या योजनाएं हैं?  प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश: 

आपकी सरकार की क्या उपलब्धियां रही हैं, इस बारे में कुछ बताएं?

-हम पिछले नौ महीनों के दौरान और अपनी सरकार के लगभग 45 महीनों के कार्यकाल में प्रदेश के लोगों के जीवन और उनकी आजीविका की देखभाल में व्यस्त रहे हैं।  

- सबसे पहले राज्य में शिक्षा व्यवस्था की बात करते हैं। ऑपरेशन ‘कायाकल्प’ के तहत एक लाख से अधिक बेसिक स्कूलों को संसाधन योग्य बनाया गया है। स्कूल और यहां पढ़ने वाले बच्चे डिजिटल रूप से पढ़ाई का लाभ उठा रहे हैं। स्मार्ट क्लासेज, रिपोर्ट कार्ड्स जैसी तमाम नई पहल सरकारी पोर्टल ‘URISE’ (Unified Re-imagined Innovation for Students Empowerment) द्वारा की जा रही हैं। 

-स्कूलों में नामांकन कराने वाले बच्चों की संख्या बढ़ी है और शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार हुआ है। स्कूली बच्चों को मुफ्त में यूनिफॉर्म्स, स्कूल बैग्स, स्वेटर्स, जूते और मोजे दिए जाते हैं।

-सरकारी पद खाली पड़े हुए थे, अब सभी नियुक्तियां की जा रही हैं। लगभग चार लाख सरकारी पदों पर चयन पूरा हो गया है। स्कूलों में 1.5 लाख से अधिक शिक्षकों की नियुक्ति की गई है। पुलिस, बेसिक शिक्षा और उच्च शिक्षा जैसे संवर्गों में मेरिट के आधार पर भर्तियां की जा रही हैं। 

-कोविड महामारी के दौरान लोगों की जिंदगी और उनके रोजगार की रक्षा की गई है और राज्य में बड़े पैमाने पर नौकरियों का सृजन हुआ है।  

कृपया कुछ उदाहरण देकर समझाएं?

-हमने बंद मिलों को फिर से खोलकर इंडस्ट्री को पुनर्जीवित किया है और कुछ नई भी खोली हैं। हमने बिना देरी किए सभी भुगतान किए हैं।

-ODOP (One District, One Product) जैसे अभिनव प्रयासों ने स्थानीय शिल्प को प्रोत्साहित किया और केंद्र सरकार ने भी इसकी सराहना की है। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग (MSME) को बढ़ावा और समर्थन दिया जा रहा है।

-बड़े पैमाने पर लोन भी दिए गए हैं। अगले चार से पांच वर्षों में कम से कम 25 लाख अतिरिक्त नौकरियां पैदा होनी हैं।

-इन्वेस्टर समिट का भी सफलतापूर्वक आयोजन किया गया। बिजनेस करना आसान बनाने वाले राज्यों की लिस्ट में उत्तर प्रदेश को दूसरा स्थान मिला। हमने अपनी निवेश नीतियों में संशोधन किया और निवेशकों के लिए सिंगल विंडो सिस्टम (एकल खिड़की प्रणाली) तैयार की है। निवेश के बारे में संपूर्ण जानकारी और सहायता के लिए संपर्क केंद्र के रूप में Invest Up को तैयार किया गया। 

-नए मार्गों के द्वारा पूर्वांचल, बुंदेलखंड और गोरखपुर को आपस में जोड़ा गया। गंगा एक्सप्रेस-वे उत्तर प्रदेश में विकास की रफ्तार को बढ़ावा देगा। यहां इंफ्रॉस्ट्रक्चर और विकास कार्यों पर पूरा जोर है और उत्तर प्रदेश को निवेश के लिए पसंदीदा स्थान बनाने पर फोकस किया जा रहा है। बुंदेलखंड में डिफेंस एक्सपो से यहां की तस्वीर बदलेगी। रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में भारत जल्द ही आत्मनिर्भर बनेगा। इसके अलावा नोएडा में उत्तर प्रदेश का पहला डाटा सेंटर बनाए जाने की संभावना है। फिल्म सिटी यहां आ रही है। ‘नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट लिमिटेड’ (NIAL) के तहत जेवर में एशिया का सबसे बड़ा एयरपोर्ट बनाया जाएगा।

-उत्तर प्रदेश में हमने कोविड-19 की स्थिति को बेहतर तरीके से संभाला है। ‘Direct Benefit Transfer’ (DBT) से लोगों को सीधा लाभ हुआ है।

प्रदेश सरकार की स्टोरी को लोगों को बताने में मीडिया की भूमिका को आप किस रूप में देखते हैं?

मीडिया की भूमिका काफी महत्वपूर्ण है। मैं अपने काम को करने में विश्वास रखता हूं। हमें हमारा काम सकारात्मक भाव से करने दें। जो लोग नकारात्मकता फैलाते हैं, जनता उनकी असलियत से वाकिफ है। ‘जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी’।

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ABP नेटवर्क के CEO अविनाश पाण्डेय ने बताया, चैनल्स में किए गए बदलाव से क्या होगा फायदा

एबीपी नेटवर्क के सीईओ अविनाश पाण्डेय ने ब्रैंड्स के दर्शकों की पसंद को और बेहतर बनाने, वैश्विक स्वास्थ्य संकट के इस दौर में खबरों में बदलाव के साथ कई अन्य पहलुओं पर बात की।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 16 December, 2020
Last Modified:
Wednesday, 16 December, 2020
AvinashPandey54

एबीपी नेटवर्क (ABP Network) इस समय बदलाव के दौर से गुजर रहा है,  फिर चाहे वह सैफरन ब्रैंड कन्सलटेन्ट्स द्वारा डिजाइन किए गए उसके सभी चैनल्स के लोगो हों, नोएडा के फिल्म सिटी में उसका कॉरपोरेट ऑफिस और स्टूडियो का शिफ्ट हो जाना हो या फिर प्रोग्रामिंग में बदलाव हो... यहां बहुत कुछ बदल रहा है। दरअसल, हाल के दिनों में मीडिया इंडस्ट्री में तमाम तरह के बदलाव देखने मिले हैं, लिहाजा इस बीच कंजप्शन मॉडल भी परिवर्तन के दौर में है, जिसे देखते हुए और खुद कम्प्टीशन से अलग रखते हुए एबीपी नेटवर्क ने अपने सभी चैनल्स की रीब्रैंडिंग की घोषणा की है।

एबीपी नेटवर्क के सीईओ अविनाश पाण्डेय के मुताबिक, तमाम चैनल्स में किए जा रहे बदलाव नेटवर्क के सौंदर्यशास्त्र को बदल देगा। उन्होंने कहा कि हम डिजिटल में निवेश कर रहे हैं, फिर चाहे वह पॉडकास्ट हो, वीडियो कंटेंट हो, डिजिटल मीडिया हो, या फिर कुछ और। हम मानते हैं कि यह बदलाव एबीपी नेटवर्क में और अधिक निवेश लाने में मदद कर सकता है।’

हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ से एबीपी नेटवर्क के सीईओ अविनाश पाण्डेय ने ब्रैंड्स के नए फोकस एरिया, दर्शकों की पसंद को और बेहतर बनाने, वैश्विक स्वास्थ्य संकट के इस दौर में खबरों में बदलाव के साथ कई अन्य पहलुओं पर बात की। इस बातचीत के मुख्य अंश आप नीचे पढ़ सकते हैं-

समग्र ब्रैंड बदलाव के बारे में थोड़ा बताएं, आपने अभी इसे करने का फैसला क्यों किया और रीब्रैंडिंग के दौरान मुख्य बदलाव क्या होंगे?

एक ब्रैंड के तौर पर एबीपी नेटवर्क हमेशा भीड़ से अलग रहा है। एबीपी नेटवर्क की एक नई यात्रा शुरू करने का हमारे लिए यह एक रोमांचक समय है। इस तथ्य से कोई इनकार नहीं कर सकता कि COVID-19 संकट ने गिरावट और अवसर दोनों की ही तस्वीरें पेश की हैं, लेकिन अब विपरीत परिस्थितियों में अवसर खोजने की इन चुनौतियों से एबीपी नेटवर्क ऊपर उठ चुका है। हमारा जुनून ही हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है। इसी वजह से हम हर चीज जी-जान से करते हैं। यह हमारी विरासत का हिस्सा है और हम इसको हमेशा बनाए रखेंगे।

उन्होंने कहा कि भारत विरोधाभास के अनूठे मोड़ पर खड़ा है। दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी के साथ भारत के पास अपार क्षमताएं हैं, लेकिन इसके विपरीत, यहां अवसरों की असमानता और सुलभता के चलते सीमाएं भी हैं। इसीलिए ही हमने इस बदलाव का हिस्सा बनने का फैसला किया है। हम इस महामारी को बदलाव की एक शुरुआत के तौर पर याद करना चाहते हैं, न कि इसे नकारात्मकता के साथ जोड़कर देखना चाहते हैं।

हमारी नई पहचान एबीपी नेटवर्क पर हमारे उद्देश्य को बताती है, जिसका मकसद एक खुला और जानकारीपूर्ण समाज बनाना है, क्योंकि हमारा मानना है कि केवल  एक खुला और जानकारीपूर्ण समाज ही असीमित भारत का निर्माण कर सकता है। हमारी नई पहचान हमारी निडर न्यूज रिपोर्टिंग और असीमित क्षमता का प्रतीक है।

ऊंची उड़ान भरने के लिए हमने खुद को एक दायरे से बाहर निकाला है और असीम आकांक्षाओं के तहत आगे बढ़ने के लिए दर्शको को प्रेरित किया है। हमारी नई पहचान भारत में असीम क्षमताओं को बढ़ावा देने के लिए निरंतर प्रतिबद्ध है। हमारे नए लोगो में पेश किया गया तीर का निशान एक स्थायी बुनियादी ढांचे का प्रतीक है, जो तेजी से बदलते मीडिया परिवेश के लिए एकदम अनुकूल है और यह हमारे दर्शकों के लिए एक मार्गदर्शक के रूप में कार्य करता है। पुराना एबीपी एरो हमारे डिजाइन की कुंजी है और यह बदलाव की राह पर है।

क्या आपको लगता है कि रीब्रैंडिंग का असर विज्ञापन बिलों पर भी होगा? आपके साथ बिजनेस करने वाले ऐडवर्टाइजर्स को देने के लिए और आप क्या कुछ और करेंगे?

विभिन्न माध्यमों और नई पीढ़ियों के लिए एक नई पहचान बनाना 'भविष्य का प्रमाण' है। हाल के दिनों में इंडस्ट्री में हुए बदलाव और बदलते कंजप्शन मॉडल के लिए आवश्यकताओं का ध्यान रखना जरूरी है। तमाम चैनल्स में किए जा रहे बदलाव नेटवर्क के सौंदर्यशास्त्र को बदल देगा। हम डिजिटल में निवेश कर रहे हैं, फिर चाहे वह पॉडकास्ट हो, वीडियो कंटेंट हो, डिजिटल मीडिया हो, या फिर कुछ और। हम मानते हैं कि यह बदलाव एबीपी नेटवर्क में और अधिक निवेश लाने में मदद कर सकता है।’

नए एबीपी नेटवर्क का प्राथमिक फोकस क्षेत्र क्या होगा?

नए ABP नेटवर्क की कोई सीमा नहीं होगी। अपने दर्शकों को खबरें देने के लिए और उन्हें सबसे आगे रखने के लिए हम किसी भी दायरे को पार कर जाएंगे। हमारा फोकस असीमित होने के साथ-साथ बदलाव के इस दौर में और आगे बढ़ने पर होगा। हमारी नई पहचान हमारी असीम आकांक्षाओं के उद्देश्य को दर्शाती है और भारतीय नागरिकों को खुली मानसिकता का एक ऐसा मंच देती है, जहां जीवन जीने के लिए कोई भी व्यक्ति खुद को सशक्त बना सके। भारत में असीम क्षमता को बढ़ावा देने के लिए यह हम निरंतर प्रतिबद्ध हैं।

नेटवर्क की रीब्रैंडिंग बहुत ही दिलचस्प समय पर हुआ है, लिहाजा हमें वैश्विक स्वास्थ्य संकट के इस दौर में की जा रही पत्रकारिता और खबरों के बारे में बताएं?

चल रहे इस महामारी के दौर में ब्रॉडकास्ट इंडस्ट्री में कई तरह के बदलाव देखने को मिले हैं। इस अभूतपूर्व समय ने टेलीविजन मीडिया के लिए ऐतिहासिक व्युअरशिप निर्मित की है। टेक्नोलॉजी के प्रति बदलाव के कारण दर्शकों के कंजप्शन पैटर्न में महत्वपूर्ण बदलाव आया है। विश्व स्तर पर यह देखा गया कि हर तरह की जानकारी के लिए दर्शक सीधे टेलीविजन मीडिया पर निर्भर थे। लॉकडाउन के दौरान जब लोग अपने घरों में बंद थे तब हमारे संवाददाताओं ने बाहरी दुनिया की स्थिति के बारे में मिनट-टू-मिनट अपडेट देकर दर्शकों के लिए जानकारी के प्राथमिक स्रोत के रूप में कार्य किया। खबरें पढ़ने-देखने के लिए ज्यादा संख्या में लोगों ने डिजिटल प्लेटफॉर्म की ओर भी रुख किया, जिससे ब्रॉडकास्टर्स ने तेजी से बढ़ते इस नए ट्रेंड्स को भी अपनाया है।

हमने एबीपी नेटवर्क में घर से काम करने वाले एंकर्स के लिए स्पेशल प्रोग्राम्स भी तैयार किए थे। मुझे ऐसी इंडस्ट्री के साथ जुड़ने पर गर्व है, जिसने लोगों के लाभ के लिए दिन-रात काम किया है।

क्या एडिटोरियल पॉलिसी और कंटेंट में किसी तरह का कोई बदलाव होगा?

ABP नेटवर्क पर, हम एक बेहतर दुनिया का निर्माण करने के लिए खुद को अपनी ही सीमाओं से आगे निकलना चाहते हैं और अपने कंटेंट के जरिए सकारात्मक बदलाव लाना चाहते हैं। जहां तक नैतिकता, सत्य और समर्पण के मूलभूत आधार स्तंभों और मूल्यों का सवाल है, उन में कोई बदलाव नहीं होगा। लेकिन हां, हम अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए डिजिटल और अन्य पोर्टफोलियो में भारी निवेश करके सोच और माध्यम दोनों को बदल रहे हैं।

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टीवी चैनल्स की व्युअरशिप को लेकर BARC India के सीईओ सुनील लुल्ला ने कही ये बात

‘ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल’ (BARC) इंडिया के सीईओ सुनील लुल्ला ने लॉकडाउन में टीवी व्युअरशिप और मीटर टेंपरिंग समेत तमाम मुद्दों पर रखी अपनी बेबाक राय

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 08 December, 2020
Last Modified:
Tuesday, 08 December, 2020
Sunil Lulla

देश में टेलिविजन दर्शकों की संख्या मापने वाली संस्था ‘ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल’ (BARC) इंडिया के सीईओ सुनील लुल्ला का कहना है कि देश में लोगों तक पहुंच के मामले में टीवी सबसे ज्यादा प्रभावशाली माध्यम बना रहेगा। उनका कहना है कि कोविड महामारी और लॉकडाउन के दौरान टीवी व्युअरशिप ने स्पष्ट कर दिया है कि व्युअरशिप के मामले में आईपीएल के लिए यह काफी अच्छा सीजन रहा है। लुल्ला का यह भी कहना था कि हाल में मीटरों के छेड़छाड़ से जुड़ी घटनाओं ने स्टेकहोल्डर्स को साथ में आगे आने और इस मीजरमेंट प्रक्रिया को मजबूती से आगे बढ़ाने के संकल्प को और मजबूत किया है। हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ बातचीत में लुल्ला ने तमाम मुद्दों पर अपनी बेबाक राय रखी। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

टीवी व्युअरशिप की बात करें तो शुरुआती छमाही की तुलना में इस साल की दूसरी छमाही कैसी रही है?

देशभर के लोगों तक पहुंचने के लिए टेलिविजन सबसे प्रभावी माध्यम बना हुआ है। कोविड-19 और लॉकडाउन के दौरान साल की पहली छमाही जैसी रही, वह पहले कभी नहीं रही। इस दौरान लोगों ने टीवी देखने में ज्यादा समय बिताया। इससे व्युअरशिप रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई, जो पहले इस तरह कभी नहीं रही।  

मार्च के आखिरी से लेकर जून की शुरुआत तक जब स्कूल-बाजार, दुकान वगैराह सब बंद थे, ‘नॉन प्राइम टाइम’ (NPT) में टीवी पर बिताया जाने वाला समय छह सौ घंटों से बढ़कर 1800 घंटे हो गया। वर्ष 2019 की पहली छमाही की तुलना में इस साल पहले हफ्ते से 26वें हफ्ते के दौरान ‘नॉन प्राइम टाइम’ (NPT)  व्युअरशिप में 13.7 की वृद्धि देखने को मिली। पिछले साल की पहली छमाही की तुलना में इस साल की पहली छमाही में प्राइम टाइम व्युअरशिप में 3.6 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इस साल की पहली छमाही मे मूवीज, न्यूज और किड्स जैसे जॉनर्स को फायदा हुआ। फिर अनलॉक की शुरुआत हुई और जुलाई से लेकर सितंबर तक ट्रांसपोर्ट, कार्यस्थल आदि खुलने शुरू हुए। ऐसे में दर्शकों ने अपनी अन्य गतिविधियों के लिए फिर से कमर कसनी शुरू कर दी और टेलिविजन पर बिताए जाने वाले समय में कमी हो गई।

इस साल की दूसरी छमाही (H2 2020) में 27 से 43वें हफ्ते के दौरान पिछले साल इसी अवधि की तुलना में प्राइम टाइम की व्युअरशिप 16.2 प्रतिशत और नॉन प्राइम टाइम की व्युअरशिप 24.3 प्रतिशत बढ़ गई। 46वें हफ्ते तक व्युअरशिप में मूवीज जॉनर का शेयर कोविड-19 से पहले की तरह 23 प्रतिशत हो गया, जबकि जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स जॉनर का शेयर कोविड-19 से पहले 52 प्रतिशत था, जो बढ़कर 56 प्रतिशत हो गया।  

लॉकडाउन के दौरान हमने देखा कि जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स के मुकाबले न्यूज जॉनर में सबसे ज्यादा वृद्धि हुई। अब क्या स्थिति है। किन जॉनर्स की व्युअरशिप में बढ़ोतरी हो रही है?

सबसे पहले न्यूज जॉनर की बात करते हैं। 13-14 हफ्ते में न्यूज की व्युअरशिप बढ़कर 21 प्रतिशत हो गई और जून-जुलाई में यह घटकर 14-15 प्रतिशत पर आ गई और अब यह कम है। यह बढ़ोतरी नॉन प्राइम टाइम देखने के कारण हुई थी। न्यूज व्युइंग अब आठ-नौ प्रतिशत पर वापस लौट आई है। लॉकडाउन के दौरान ऑरिजनल प्रोग्रामिंग में कमी को देखते हुए ब्रॉडकास्टर्स ‘महाभारत’ और ‘रामायण’ जैसे क्लासिक शो को वापस ले आए।

महामारी के दौरान जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स के साथ न्यूज का उपभोग भी बढ़ गया, क्योंकि स्थिति जानने के लिए व्युअर्स न्यूज चैनल्स से जुड़े रहते थे। लॉकडाउन के दौरान यह जॉनर सात से बढ़कर 21 प्रतिशत हो गया और अब अनलॉक होने के साथ यह वापस सात प्रतिशत पर लौट आया है। ऑरिजनल प्रोग्रामिंग लौटने के बाद प्राइमटाइम व्युअरशिप भी बढ़ी है। इसके अलावा किड्स जॉनर की व्युअरशिप में भी वृद्धि हुई है। कुल मिलाकर टीवी पर बिताए जाने वाले औसत समय और यूनिक व्युअर्स की संख्या में बढ़ोतरी हुई है।

आईपीएल को लेकर जारी बार्क डाटा से स्पष्ट पता चलता है कि पिछले सीजन की तुलना में व्युअरशिप के मामले में यह सीजन काफी अच्छा रहा है। क्या आप इस साल आईपीएल के कुछ डाटा को शेयर कर सकते हैं? अथवा व्युअरशिप/ऐड वॉल्यूम ट्रेंड इस साल कैसे अलग रहा है?

व्युअरशिप के मामले में आईपीएल का यह सीजन (आईपीएल-13) पिछले सीजन (आईपीएल-12) के मुकाबले 23 प्रतिशत बढ़ा है। पिछले सीजन में यह 326 बिलियन व्युइंग मिनट्स से बढ़कर यह 400 बिलियन व्युइंग मिनट्स हो गया। प्रति मैच औसत व्युअरशिप भी 23 प्रतिशत बढ़ गई। इस सीरीज को कुळ 405 मिलियन व्युअर्स ने देखा। आईपीएल को ओपनिंग मैच ने 11.2 बिलियन व्युइंग मिनट्स दर्ज किए, जो पिछले सीजन के मुकाबले 65 प्रतिशत ज्यादा थे। पिछले सीजन में औसत इंप्रेशंस 40.3 मिलियन थे जो 29 प्रतिशत बढ़ोतरी के साथ इस सीजन में 52 मिलियन हो गए। पिछले साल की तुलना में इस साल ओपनिंग मैच की पहुंच में 21 प्रतिशत की वृद्धि हुई।  

विज्ञापन की बात करें तो चैनल्स के ऐड वॉल्यूम में वर्ष 2019 और 2020 में समान रूप से चार प्रतिशत की वृद्धि हुई। टॉप पांच सेक्टर्स भी लगभग समान थे। ऐडवर्टाइजिंग में इस साल नए सेक्टर्स देखे गए। मुंबई इंडियंस और चेन्नई सुपर किंग्स के बीच हुआ ओपनिंग मैच आईपीएल-12 और आईपीएल-11 की तुलना में सबसे ज्यादा देखा जाने वाला ओपनिंग मैच रहा।  

आपको क्या लगता है कि डाटा ब्लैकआउट का समय न्यूज चैनल्स और पूरी इंडस्ट्री के बिजनेस पर प्रभाव डालेगा? क्या आप हमें इस अवधि के दौरान उठाए जा रहे कदमों के बारे में कुछ बता सकते हैं?

हाल के घटनाक्रमों के मद्देनजर बार्क बोर्ड ने प्रस्ताव दिया था कि उसकी टेक्निकल कमेटी डाटा को और बेहतर करने के लिए मीजरमेंट के वर्तमान मानकों की समीक्षा और उन्हें बढ़ाने का काम करेगी और प्रमुख जॉनर्स के डाटा की रिपोर्टिंग करेगी। न्यूज समेत प्रमुख जॉनर्स के लिए क्वालिटी डाटा रिपोर्टिंग मानकों के साथ-साथ यह टेक्निकल कमेटी इंडस्ट्री और एक्सपर्ट्स के साथ मिलकर सक्रिय रूप से सहयोग कर रही है।  

साल के शुरुआत में बार-ओ-मीटर (Bar-o-meters) की संख्या बढ़ाने को लेकर चर्चा हुई थी। आपके अनुसार बार्क के मीटरों से छेड़छाड़ रोकने का दीर्घकालिक समाधान क्या है?

लॉकडाउन और COVID-19 के कारण, पैनल का विस्तार अस्थायी रूप से रोक दिया गया था। हमने विस्तार शुरू किया है और मार्केट्स में प्रगति कर रहे हैं। बार्क सेल्फ रेगुलेशन को बढ़ावा देता है।

पूरी इंडस्ट्री के लिए बार्क काफी महत्वपूर्ण संस्था है। पिछले दिनों हुए मामले पर स्टेकहोल्डर्स की प्रतिक्रिया कैसी रही है?

बार्क डाटा उलपब्ध करता है, जिसके आधार पर विज्ञापनदाता चैनल्स को विज्ञापन देते हैं। हमें स्टेकहोल्डर्स से पर्याप्त समर्थन मिल रहा है। इस तरह की घटनाओं ने स्टेकहोल्डर्स को साथ में आगे आने और इस प्रक्रिया को मजबूती से आगे बढ़ाने के संकल्प को मजबूत किया है।

इस बात पर थोड़ा प्रकाश डालें कि क्या बार्क इस प्रतिबंधित अवधि के डाटा को 12हफ्ते के बाद जारी करेगा या यह पूरी तरह से ब्लैकआउट रहेगा?

टेक्निकल कमेटी डाटा क्वालिटी रिपोर्टिंग के सभी पहलुओं को ध्यान में रख रही है और उसी के आधार पर तय किया जाएगा।

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रूबिका लियाकत ने बताया, किस तरह मिली न्यूज एंकर बनने की प्रेरणा

ABP News की जानी-मानी सीनियर न्यूज एंकर रूबिका लियाकत ने L&T Mutual Fund के सीईओ कैलाश कुलकर्णी के साथ एक बातचीत में तमाम पहलुओं पर अपने विचार रखे

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Friday, 04 December, 2020
Last Modified:
Friday, 04 December, 2020
rubika

L&T Mutual Fund The Winner’s Circle  के वर्चुअल कॉन्क्लेव 2020 के सातवें एडिशन के तहत पत्रकारिता विषय पर ‘एबीपी न्यूज’ (ABP News) की जानी-मानी सीनियर न्यूज एंकर रूबिका लियाकत ने L&T Mutual Fund के सीईओ कैलाश कुलकर्णी के साथ एक बातचीत में तमाम पहलुओं पर अपने विचार रखे। 

‘CUT THROUGH THE NOISE’  विषय के तहत एक दिसंबर की दोपहर चार बजे से हुए इस आयोजन के दौरान रूबिका ने मीडिया इंडस्ट्री में अब तक के उनके सफर, इस मुकाम तक पहुंचने में उन्हें किस प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ा जैसे कई प्रमुख बिंदुओं पर भी बात की।

इस बातचीत के दौरान रूबिका का कहना था, ‘मेरे माता-पिता दोनों उदयपुर में हिन्दुस्तान जिंक लिमिटेड में काम करते थे। मेरे पिता एक खिलाड़ी थे और वह हिन्दुस्तान जिंक लिमिटेड में स्पोर्ट्स कोटा के तहत गए थे। ग्रेजुएशन करने के बाद ही उनकी नौकरी लग गई थी। मेरी मां ने उस समय एमएससी तक की पढ़ाई की थी और वह भी वहीं नौकरी करती थीं। पिताजी मेरी मां की प्रतिभा को पहचानते थे और उन्होंने ही दबाव बनाया कि यदि मेरी मां और पढ़ाई करें तो उन्हें हिन्दुस्तान जिंक लिमिटेड में प्रमोशन मिल सकता है और जीवन पहले से बेहतर हो सकता है। उस समय मेरा और मेरी बहन का जन्म हो चुका था।’

रूबिका के अनुसार, ‘पिताजी ने मां को समझाया कि आपने एमएससी कर ली है और यदि पीएचडी कर ली तो प्रमोशन आसान हो जाएगा। यह सुनकर मेरी मां ने यह कहते हुए कि दो बेटियां हो चुकी हैं। परिवार की और ऑफिस की जिम्मेदारी के चलते आगे पढ़ाई करना मुश्किल होगा, इस बात को गंभीरता से नहीं लिया। ऐसे में मेरे पिता ने कहा कि आप अपने पिता के यहां जाकर पीएचडी कर सकती हैं। लेकिन मेरी मां ने इससे इनकार कर दिया और अपने घर पर रहकर ही पीएचडी का निर्णय लिया। इसके बाद पिताजी ने ऑफिस के साथ-साथ हमारे ब्रेकफास्ट से लेकर स्कूल जाने तक की जिम्मेदारी संभाली और तब मेरी मां ने पीएचडी पूरी की। ऐसे में मैंने बचपन में ही मां की पीएचडी के लिए अपने पिता को जिस तरह कड़ी मेहनत करते हुए देखा और जिस तरह पिता ने हमें पढ़ाया, उसने बचपन से ही मेरे मन से लड़का-लड़की का अंतर खत्म कर दिया। मैंने कभी ये नहीं सोचा कि मैं लड़की हूं तो यह नहीं कर सकती। खास बात यह रही कि मेरी मां ने अपनी पीएचडी पूरी की और वहां उन्हें प्रमोशन मिला। करीब 200 लोग उनके मातहत काम करते थे।’

रूबिका के अनुसार, माता-पिता ने हमें बचपन से यही सिखाया कि ऐसी कोई चीज नहीं है, जिसे आप नहीं कर सकते हैं। उनका कहना था कि आप महिला हैं या पुरुष इससे फर्क नहीं पड़ता, सफलता के लिए जुनून और पैशन होना चाहिए।

कैलाश कुलकर्णी द्वारा यह पूछे जाने पर कि आपने जर्नलिज्म को ही क्यों चुना, क्या इसकी प्रेरणा आपको अपने माता-पिता से मिली? रूबिका लियाकत ने बताया, ‘जैसा कि मैने बताया कि मेरे पिताजी रणजी प्लेयर्स सलेक्टर थे, मेरी मां साइंटिस्ट, मेरी दादी काफी धार्मिक महिला थीं, मेरे चाचाजी उस समय मॉडलिंग की दुनिया में काम की तलाश में थे। ये चारों अलग विचारधारा के थे, लेकिन रात को टीवी देखते समय सभी साथ होते थे। उस समय मैं सात-आठ साल की रही होंगी, जब मैंने देखा कि ये चारों लोग टीवी काफी ध्यान से देखते हैं। उस समय मैंने तय कर लिया था कि इन चारों में से मुझे कुछ नहीं बनना, मैं सलमा सुल्तान एंकर की तरह बनना चाहती थी, जिसे हमारे परिवार के चारों सदस्य एक साथ बैठकर गंभीरता से सुना करते थे। हालांकि, मुझे ये नहीं पता था कि जिसे हमारे परिवार के सभी लोग इतनी गंभीरता से सुनते हैं, उसे पत्रकार कहते हैं या न्यूज एंकर कहते हैं, लेकिन मैं उसी तरह बनना चाहती थी, जिसे पूरी दुनिया इतनी गंभीरता से सुनती है। कहते हैं कि जिस चीज को शिद्दत से चाहो तो पूरी कायनात उसे आपसे मिलाने में लग जाती है, लगता है कि मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ है।’ रूबिका का कहना था कि मेरी सलमा सुल्तान से कभी मुलाकात नहीं हो पाई, लेकिन कोविड का दौर गुजरने के बाद मैं उनसे जरूर मिलूंगी।

मीडिया के क्षेत्र में खासकर पिछले दस वर्षों (2010 से 2020) तक आए बड़े बदलावों के बारे में रूबिका का कहना था कि पहले के जो एंकर होते थे उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता था कि खबर कितनी खुशी वाली अथवा दुख वाली है, उन्हें अपने इमोशन न दिखाते हुए खबर पढ़ते समय सिर्फ अपनी बॉडी लैंग्वेज को मेंटेन करना होता था। मैंने पिछले दस सालों में खुद में जो बदलाव देखा है वह यह है कि यदि मैं किसी से नाराज होती हूं या किसी खबर से बहुत ज्यादा दुखी होती हूं तो मैं अपने इमोशन दिखा सकती हूं। यह बहुत महीन रेखा है, जिस पर मंथन हो रहा है। हमारे देश में लोगों के तमाम तरह के विचार हैं, आज के दौर में तमाम लोग अपने-अपने विचार रख रहे हैं। कुछ एक तरफ होते हैं, तो अन्य दूसरी तरफ। मुझे पूरी उम्मीद है कि आने वाले समय में हम एकमत होंगे।

वहीं जब उनसे बायस्ड होने पर सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि जब लोग आपसे प्यार और आप पर विश्वास करने लग जाते हैं, तो ये आपके के लिए सबसे बड़ा हथियार बन जाता है और कोई भी आपको छू नहीं पाता है। आज पत्रकारिता बदल गई है और समय भी बहुत ज्यादा बदल गया है। हर कोई क्रेडिबिलिटी इश्यू पर सवाल उठाता है। एक समय था जब आतंकवादी घटना होती थी, जिसमें कुछ लोग मारे जाते थे, तो खबर दे दी जाती थी कि आतंकवादी घटना हुई है...  इतने लोग मारे गए हैं... उच्च स्तरीय बैठक बुलाई जा रही है... एसआईटी बैठा दी गई है... लेकिन अब चीजें बदल गई हैं। अब जब लोग कहते हैं कि आपको अनबायस्ड रहना होगा, तो मैं उनसे माफी मांगकर ये पूछना चाहती हूं कि मैं किसके लिए बायस्ड हूं। वैसे बायस्ड शब्द को मैं सही मानती हूं। मैं एक ही प्लेटफॉर्म पर बुरे और सही को कैसे रख सकती हूं। मैं चौथा स्तम्भ हूं लेकिन चौथे स्तम्भ की ये जिम्मेदारी है कि जो सही है उसको रखें और उसकी तारीफ करें। लेकिन जो गलत है उसे क्यों रखें। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी ने अंग्रेजों की लड़ाई और हिन्दुस्तान की लड़ाई को क्या एक प्लेटफॉर्म पर रखा था। महात्मा गांधी की जब पत्राकारिता शुरू हुई थी और जिस अंदाज से वे आगे बढ़े थे उसके पीछे एक मिशन था। इसलिए मेरा मिशन है कि मेरा हिन्दुस्तान उनका हिन्दुस्तान बने और ऐसा बने जिसका सपना हम सभी देखते हैं। वैसे यह किन लोगों के विचार हैं जो मुझे अनबायस्ड रहने की नसीहत देते हैं। मैं अपने देश का चौथा स्तम्भ हूं और अपने देश के प्रति वो तमाम चीजें रखूंगी। फिर चाहे वह बायस्ड तरीका ही क्यों न हो। मेरे हिन्दुस्तान के लिए जो बढ़िया है वो रखूंगी। मैं पत्रकार हूं और मानवता के लिए काम करती हूं। मानवता के लिए यदि कोई सबसे मजबूत स्तम्भ है, तो वह हमारा हिन्दुस्तान है और मैं हिन्दुस्तान की ओर से एक पत्रकार हूं और इससे पहले एक भारतीय हूं। इसलिए जिन्हें लेफ्ट या राइट विचारधारा में पड़ना हैं, वे पड़ें। मेरी विचारधारा साफतौर पर ये कहती है कि मुझे उस ट्रैक पर चलना है जो हमारे देश के लिए बेहतर हो। फिर चाहे लेफ्ट का कोई चंक हो, यदि वह मेरे हिन्दुस्तान के लिए बेहतर है तो मैं उनका स्वागत करती हूं।                 

‘एबीपी न्यूज’ (ABP News) की जानी-मानी सीनियर न्यूज एंकर रूबिका लियाकत ने पत्रकारिता की दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बनाई है। अपने बेबाक शैली से रूबिका ने दर्शकों के दिलों पर अपनी खास छाप छोड़ी है। उदयपुर (राजस्थान) में जन्मीं रूबिका ने मुंबई यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया है। रूबिका ने पत्रकारिता में अपने करियर की शुरुआत उदयपुर में ‘चैनल24’ (Channel 24) के साथ की थी। पूर्व में वह ‘न्यूज24’ (News 24) और ‘जी न्यूज’ (Zee News) में भी अपनी जिम्मेदारी निभा चुकी हैं। रूबिका लियाकत उन गिने-चुने पत्रकारों में शामिल हैं, जिन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इंटरव्यू किया है। उनके कार्यक्रम ‘मास्टरस्ट्रोक’ को काफी देखा जाता है। सोशल मीडिया पर भी उनके प्रशंसकों की बड़ी संख्या है।

पूरा इंटरव्यू आप यहां देख सकते हैं-

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BBC के अधिकारियों ने बताया, लोग क्यों देते हैं उनके कार्यक्रमों को तवज्जो

‘बीबीसी ग्लोबल न्यूज’ के मैनेजिंग डायरेक्टर राहुल सूद और ‘बीबीसी वर्ल्ड सर्विस’ की हेड रूपा झा ने हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ से तमाम पहलुओं पर बातचीत की।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 02 December, 2020
Last Modified:
Wednesday, 02 December, 2020
BBC

प्रादेशिक भाषाओं पर फोकस करने और स्पीड से पहले तथ्यों को रखने की एडिटोरियल पॉलिसी के कारण भारत जैसे मार्केट में ‘बीबीसी इंडिया’ (BBC India) की ग्रोथ लगातार बढ़ रही है। ‘बीबीसी ग्लोबल न्यूज’ (BBC Global News) के मैनेजिंग डायरेक्टर (India and South Asia) राहुल सूद और ‘बीबीसी वर्ल्ड सर्विस’ (BBC World Service) की हेड (Indian Languages) रूपा झा ने हाल ही में हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) से इन मुद्दों के साथ तमाम पहलुओं पर बातचीत की।

प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

कंटेंट के उपभोग की बात करें तो बीबीसी न्यूज के लिए भारत फिर एक प्रमुख बाजार के रूप में उभरा है। आपकी नजर में इस ग्रोथ के पीछे क्या कारण है?

रूपा: पिछले कुछ वर्षों में भारतीय भाषाओं में किए गए विस्तार का इसमें काफी योगदान है। बीबीसी की कोर वैल्यू यानी मूल्य और निष्पक्षीय ढांचा भारतीय ऑडियंस की अपेक्षाओं पर खरा उतरा है। ऑडियंस में हुई ग्रोथ बताती है कि वे मार्केट में फैल रहीं तमाम फेक न्यूज और ओपिनियन के बीच न्यूज और अपडेट्स किसी विश्वसनीय मीडिया सोर्स से लेना चाहते हैं। 

रियलिटी चेक और फैक्ट चेक को लेकर बीसीसी के कार्यक्रमों ने दिखा दिया है कि लोग उन खबरों को ज्यादा तवज्जो देते हैं, जिन पर वे भरोसा कर सकते हैं। जमीनी स्तर और स्थानीय राजनीति भारतीय समाचारों पर हावी है। हालांकि, दुनियाभर की न्यूज आजकल प्रासंगिक हो रही हैं, क्योंकि इससे दुनियाभर से ‘समाधान’ भी मिलता है। कोरोनावायरस को लेकर की गई स्पेशल प्रोग्रामिंग इसका सबूत है।

राहुल: असल में भरोसा और विश्वसनीयता दो मुख्य बाते हैं। इस वैश्विक महामारी में लोग भरोसेमंद और विश्वसनीय न्यूज प्लेटफॉर्म्स तलाश रहे हैं। मोबाइल डिवाइस पर बीबीसी हिंदी भारत में न्यूज कंटेंट को इस्तेमाल करने वाले यूजर्स के बीच टॉप-5 में शामिल है।

आप रीजनल यानी प्रादेशिक कंटेंट पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। क्या सिर्फ हिंदी ही ऑडियंस को आकर्षित कर रही है। अन्य भाषाओं के बारे में आपका क्या कहना है?

रूपा: हम बड़े शहरों से आगे निकलकर युवाओं और महिलाओं पर फोकस कर रहे हैं। बीबीसी भारत में नौ भाषाओं पर काम करती है। हिंदी और अंग्रेजी के अलावा  हम मराठी, गुजराती, पंजाबी, तमिल, तेलुगु, बंगाली और उर्दू को कवर करते हैं। न्यू लैंग्वेज सर्विसेज, नया स्टाफ, नई प्रोग्रामिंग और नए स्टूडियो के साथ बीबीसी ने भारत में बड़ा निवेश किया है। भारत के प्रति इस प्रतिबद्धता ने क्षेत्र में 250 से अधिक नए रोजगार सृजित किए हैं और यह केवल नई भाषाओं को शामिल करने के बारे में नहीं है,बल्कि हमारे ऑपरेशंस में बदलाव के बारे में है, इसलिए हम डिजिटल रूप से और मोबाइल फर्स्ट पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं।

हम साउथ एशिया के लिए दिल्ली को एक डिजिटल पावर हाउस और डिजिटल हब बना रहे हैं। बीबीसी के पूर्व महानिदेशक ने घोषणा की है कि वर्ष 2022 तक इसकी ग्लोबल सर्विस के लिए ऑडियंस की संख्या 500 मिलियन तक पहुंच सकती है।

राहुल: हम जानते हैं कि भारत जैसे मार्केट में काफी संभावना हैं। यहां 1.2 बिलियन की जनसंख्या में इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों की संख्या 462 मिलियन है। इस पूल में 300 मिलियन से ज्यादा स्थानीय भाषा के यूजर्स हैं। वर्ष 2021 तक इनकी संख्या 300 मिलियन से बढ़कर 500 मिलियन से ज्यादा होने की उम्मीद है। ऐसे में वर्ष 2021 तक यहां करीब 735 मिलियन इंटरनेट यूजर्स हो सकते हैं।

भारत भी एक काफी प्रतिस्पर्धी मार्केट है। ऐसे में जब एडिटोरियल कंटेंट की बात आती है तो आप कैसे इसे दूसरों से अलग कहेंगे?

रूपा: जब तक हमें विश्वास नहीं होता, तब तक हम लोगों में खबरों को ब्रेक करने की जल्दबाजी नहीं रहती है। हम हो-हल्ला नहीं करते हैं। हम अपने दर्शकों को बहुत ज्यादा समझा सके और तथ्यपूर्ण जानकारी दे सके, इसके लिए ही पत्रकारिता में निवेश करते हैं। हम भारत में न्यूज प्लेटफार्म्स पर विश्वास दोबारा ला सकें, इस पर लगातार काम करते रहेंगे। हम किसी सैन्य ऑपरेशन के दौरान ज्यादा से ज्यादा खबरें देते हैं। हम ग्राउंड रिपोर्ट को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं।

राहुल: रेस में फर्स्ट आने की बात करें तो, 'सही बनना' (Being right) फर्स्ट बनने से ज्यादा जरूरी है।

भारत जैसे बाजार को ऑपरेट करने में बड़ी चुनौतियां क्या हैं?

रूपा: भारत में खबरें बहुत ही ज्यादा ध्रुवीकृत (पोलराइज्ड) होती हैं और यह बहुत ही ज्यादा भीड़-भाड़ वाला मार्केट है, जो हमें अपने दर्शकों की सही जरूरतों को पूरा करने का मौका देता है जो तेजी से डिजिटल की ओर बढ़ रहे हैं।

कोविड की वजह से डिजिटल पब्लिकेशंस के पाठकों की संख्या बढ़ी है। बीबीसी ग्लोबल न्यूज की रणनीति क्या है, जब भारत में बढ़ते मार्केट शेयर की बात होती है?

राहुल: बीबीसी जो भी करता है दिल से करता है और उसके दिल में डिजिटल है। हम विश्व स्तर पर और भारत में रिकॉर्ड ग्रोथ नंबर्स देख रहे हैं। बीबीसी की भरोसेमंद वैल्यू और निष्पक्षता ऐसी है, कि वह ऐसे समय पर जब गलत सूचनाओं और भड़काउ खबरों का अंबार लगा हुआ है, सही रिपोर्टिंग के जरिए तथ्यपरक खबरों के साथ एडवर्टाइजर्स के लिए ब्रैंड सेफ एनवॉयरमेंट सुनिश्चित करता है।

उद्योग अनुसंधान निकाय Ipsos ने नवंबर 2020 की शुरुआत में ये घोषणआ की कि टीवी और ऑनलाइन दोनों पर ही बीबीसी भारत में अंग्रेजी भाषा में नंबर एक अंतरराष्ट्रीय न्यूज ब्रैंड है। बीबीसी का 24 घंटे का अंतरराष्ट्रीय न्यूज चैनल पिछले एक साल में अपने किसी भी इंटरनेशनल कॉम्पटीटर्स से सबसे ज्यादा देखा गया। और यह पिछले वर्ष का सबसे तेजी से बढ़ने वाला सामान्य अंग्रेजी भाषा का न्यूज चैनल है। इस बात का भी खुलासा हुआ कि बीबीसी ऑनलाइन यूजर्स के साप्ताहिक आंकड़ों में भी नंबर-1 अंतरराष्ट्रीय ऑनलाइन न्यूज प्लेटफॉर्म है। कॉमस्कोर डेटा के अनुसार सितंबर, 2020 में बीबीसी पोर्टल ने ट्रैफिक में सबसे ज्यादा वृद्धि दर्ज की (लगभग 40 मिलियन यूनीक विजिजर्स)। भारत में सभी जनरल न्यूज प्लेटफॉर्म्स की तुलना में यूनिक बीबीसी प्लेटफॉर्म पर  विजिटर्स की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई और यह बढ़त सितंबर, 20 में हुई ग्रोथ और साल दर साल हुई ग्रोथ की वजह से हुई है।

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TRP-सोशल मीडिया को लेकर उठ रहे सवालों का सूचना प्रसारण मंत्री ने यूं दिया जवाब

‘न्यूज18 इंडिया’ पर वरिष्ठ टीवी पत्रकार अमिश देवगन से बातचीत में सूचना प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कई अहम मुद्दों पर रखी अपनी राय

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Friday, 27 November, 2020
Last Modified:
Friday, 27 November, 2020
Amish Devgan

डिजिटल पर जो भी कंटेंट जनरेट होता है उसकी देखभाल करना भी अब जरूरी हो गया है, फिर चाहे न्यूज पोर्टल्स ही क्यों न हो और इसके लिए हमारी तैयारी चल रही है।’ यह बात केंद्रीय सूचना-प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने वरिष्ठ टीवी पत्रकार और न्यूज18 (हिंदी) के मैनेजिंग एडिटर अमिश देवगन द्वारा पूछे गए एक सवाल के जवाब में कही। इस दौरान सूचना-प्रसारण मंत्री ने अमिश देवगन के कार्यक्रम ‘आरपार’ और उनके एंकरिंग की तरीफ भी की। उन्होंने अमिश देवगन से कहा कि वे जिस जोशीले अंदाज से एंकरिंग करते हैं, उससे एक अच्छी डिबेट होती है। इसके लिए उन्होंने अमिश देवगन को बधाई भी दी।

इसके बाद सवाल-जवाबों का सिलसिला शुरू हुआ और अमिश देवगन ने सूचना-प्रसारण मंत्री से एक-एक कर कई ऐसे सवाल पूछे, जो हाल ही में चर्चा का विषय बने हुए हैं। अपने इंटरव्यू के दौरान अमिश देवगन ने टीआरपी के मुद्दे पर भी उनसे सवाल पूछा। उन्होंने पूछा कि टीआरपी का विवाद बहुत बड़ा है, इस मामले पर सरकार की सोच क्या है? इस सवाल का जवाब देते हुए केंद्रीय सूचना-प्रसारण मंत्री ने कहा कि ब्रॉडकास्टर्स और एडवर्टाइजर्स दो लोग होते हैं, जिन्हें विज्ञापन लेना और देना है। लिहाजा वे जानना चाहते हैं कि कौन सा कार्यक्रम और चैनल लोकप्रिय है। इसके लिए ब्रॉडकास्टर्स और एडवर्टाइजर्स ने ही साथ आकर टीआरपी की रचना की है। सरकार ने दोनों को सिर्फ समर्थन दिया है, पर ये सरकार की मान्यता से ही यह चल रहा है। लिहाजा अब सरकार ने इसके लिए कमेटी भी बनायी है, ताकि सही रास्ता बताया जा सके। इसका मैनिपुलेशन की आशंका को खत्म किया जा सके, जोकि मुख्य काम है। उन्होंने कहा कि अभी नई टेक्नोलॉजी तैयार है, जिससे ज्यादा लोगों की पसंद को देखा जा सकेगा, ताकि सही नतीजे आएंगे, ऐसा मुझे विश्वास है।

जब अमिश देवगन ने उनसे पूछा किया क्या वर्तमान में चल रहे सिस्टम को पूरी तरह से रिप्लेस कर दिया जाएगा, इस पर केंद्रीय मंत्री ने जवाब दिया कि ये हम नहीं तय करते हैं बल्कि एसोसिशन तय करती हैं, हम ब्रॉकास्टर्स के नाते जाते हैं। सरकार की एक भूमिका है। कमेटी जो रिकमेंड करेगी, उसके बाद हम करेंगे। रिकमेन्डेशन के आधार पर ही काम करेंगे। हमारी कमेटी टेक्नोलॉजी और टेक्नीशियंस की बनी है और उसके द्वारा ही हम टेक्नोलॉजिकल प्रिंसिपल सॉल्यूशन देंगे, जिसके आधार पर काम होगा। इस तरीके से सबको सुकून मिलेगा कि अब सही तरीके से मापन हो रहा है। इसकी रिपोर्ट एक महीने में आ जाएगी।

वहीं अमिश देवगन ने पूछा कि ये मुद्दा विवादास्पद है, क्योंकि मुंबई पुलिस ने भी एक एफआईआर रजिस्टर कर रखी है। प्रवर्तन निदेशालय और सीबीआई ने भी केस दर्ज कर रखा है। इस पर आप क्या कहना चाहेंगे, तो उन्होंने कहा कि यह एफआईआर का मुद्दा है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने गाइडेंस दिया है कि किसी एक चैनल या एक व्यक्ति को टारगेट करके एफआईआर नहीं होनी चाहिए। एफआईआर एक सामान्य कानूनी प्रक्रिया है, इस पर हम क्या कहेंगे, लेकिन न्याय कैसे होगा ये मुद्दा है और इसके बारे में सुप्रीम कोर्ट ने सभी कोर्टों का मार्गदर्शन किया है।

ओटीटी प्लेटफॉर्म्स को लेकर भी अमिश देवगन ने केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री से सवाल किया  कि अब ओटीटी प्लेटफॉर्म्स आपके मंत्रालय की निगरानी में आ गए हैं, क्या हम ये मान सकते हैं?  इस पर उन्होंने कहा कि हां, डिजिटल पर जो भी कंटेंट जनरेट होता है उसकी देखभाल करना भी अब जरूरी हो गया है, फिर चाहे न्यूज पोर्टल्स ही क्यों न हो और इसके लिए हमारी तैयारी चल रही है। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स को लेकर हमारे पास सैकड़ों शिकायत आती हैं, क्योंकि ओटीटी पर कोई सेंसर बोर्ड नही है। जैसाकि अन्य फिल्मों को लेकर होता है कि भारत में फिल्में रिलीज करनी है तो सेंसर बोर्ड से सर्टिफिकेट लेना होता है, लेकिन ओटीटी के लिए ऐसा नहीं है। इसलिए इसके लिए अब सेंसर बोर्ड लाना है या सेल्फ रेगुलेशन लाना है ये चॉइस है, लेकिन कुछ न कुछ तो व्यवस्था करनी ही पड़ेगी। मै भी ओटीटी पर सीरियल देखता हूं, यहां हर कैटगरी के सीरियल्स और फिल्में होती हैं। लेकिन ये जो बहुत बुरी वाली कैटेगरी है, इसको लेकर लगातार शिकायतें मिल रही हैं। इसके लिए मेरा मानना है कि कुछ न कुछ व्यवस्था तैयार करनी चाहिए और हम करेंगे।

इसके बाद अमिश देवगन ने उनसे अगला सवाल किया कि नेटफ्लिक्स के ऊपर हाल ही में एक एफआईआर दर्ज की गई है, जिस पर बवाल मचा हुआ है। इस पर एक वर्ग सरकार पर आरोप लगा रही है कि सरकार सब कुछ कंट्रोल करना चाहती है, इस पर आपकी क्या राय है? इसका जवाब देते हुए जावड़ेकर ने कहा कि देखिए, ये वर्ग सेंसर बोर्ड के खिलाफ कुछ नही बोलता है। हमारे यहां आजादी का गला नही घोंटा जा रहा है। कोई भी व्यवस्था करना, आजादी का गला घोंटना नही है। 

अमिश देवगन के यह पूछे जाने पर कि केरल सरकार ने हाल ही में सोशल मीडिया पर पाबंदी लगाने वाला एक अध्यादेश जारी किया, जिसे विरोध के बाद वापस भी ले लिया गया। इसके बाद केरल सरकार की सोच पर काफी सवाल उठे, क्या सोशल मीडिया पर पाबंदी जरूरी है, इस पर आपकी क्या राय है, प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि मैं सोशल मीडिया पर पाबंदी की जरूरत नहीं मानता, लेकिन सोशल मीडिया या कोई भी मीडिया जिम्मेदारी से चलने चाहिए, क्योंकि आजादी जिम्मेदारी से ही और जिम्मेदार पत्रकार से ही सार्थक होती है। सोशल मीडिया पर तो कोई भी कुछ लिख सकता है, यहां हर व्यक्ति पत्रकार होता है, इसलिए एक झूठ पल भर में इतना प्रचारित हो जाता है कि वही सच लगने लगता है, जिसके बाद सभी जगह से वही मैसेज आने शुरू हो जाते हैं, जोकि गलत है। इसलिए सच दिखाना चाहिए, गलत नहीं। इसलिए जो कंटेंट जनरेट करता है, ये उसकी जिम्मेदारी है कि उसे सच को समझना चाहिए। 

सूचना-प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर का पूरा इंटरव्यू आप यहां देख सकते हैं-

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मीडिया में इस 'बर्बादी' के लिए जिम्मेदार कौन: सुप्रिया श्रीनेत

‘गवर्नेंस नाउ’ के एमडी कैलाशनाथ अधिकारी के साथ एक बातचीत में कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता और पूर्व पत्रकार सुप्रिया श्रीनेत ने तमाम पहलुओं पर अपने विचार रखे

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 26 November, 2020
Last Modified:
Thursday, 26 November, 2020
Supriya-Shrinate

 

आर्थिक विकास में कमी, बेरोजगारी और छंटनी जैसे तमाम मुद्दों पर नरेंद्र मोदी सरकार को घेरते हुए कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत का कहना है कि देश में कोविड महामारी आने से पहले ही अर्थव्यवस्था लगातार आठ तिमाहियों से नीचे जा रही थी।

‘गवर्नेंस नाउ’ (Governance Now) के एमडी कैलाशनाथ अधिकारी के साथ एक बातचीत में पूर्व पत्रकार सुप्रिया श्रीनेत का कहना था कि एक तरफ दुनिया की अर्थव्यवस्था ऊपर जा रही थी, वहीं इसके विपरीत भारत की अर्थव्यवस्था नीचे गिर रही थी। मीडिया का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि यहां तमाम टेक्निशियंस, कैमरापर्सन्स, प्रड्यूसर्स, प्रॉडक्शन असिस्टेंट्स और पत्रकारों समेत कई लोगों की बड़े पैमाने पर छंटनी हुई है। उन्होंने कहा, ‘इन लोगों को नौकरी नहीं मिल रही है। आखिर इस बर्बादी के लिए कौन जिम्मेदार है? भारतीय अर्थव्यवस्था की इस स्थिति के लिए आखिर कौन जिम्मेदार है?’

पब्लिक पॉलिसी प्लेटफॉर्म पर ‘विजिनरी टॉक सीरीज’ (Visionary Talk series) के तहत होने वाले इस वेबिनार के दौरान सुप्रिया श्रीनेत ने कहा, ‘भारतीय अर्थव्यवस्था के गिरने की शुरुआत सरकार की अक्षमता और गलत फैसले लेने के कारण हुई। वित्तीय वर्ष 2017 (FY 2017) से वित्तीय वर्ष 2020 (FY 2020) तक आर्थिक विकास की दर यानी जीडीपी का ग्रोथ रेट आधा हो गया। 8.2 प्रतिशत से घटकर वित्तीय वर्ष 2020 में यह 4.3 प्रतिशत पर आ गया। वित्तीय वर्ष 2021 में यह और प्रभावित होगी। यहां तक कि कोविड से पहले ही भारतीय अर्थव्यवस्था लगाता आठ हफ्तों से फिसलने लगी थी। एक तरफ दुनिया की जीडीपी का ग्रोथ रेट बढ़ रहा था, जबकि भारत का नीचे गिर रहा था।’ 

नरेंद्र मोदी सरकार को घेरते हुए श्रीनेत का कहना था कि कोविड से पहले भी नोटबंदी के करण देश में बेरोजगारी 45 साल के उच्चतम स्तर पर थी और जल्दबाजी में जीएसटी लागू करने से आर्थिक तौर पर बर्बादी हुई। जीडीपी ग्रोथ के अलावा जीडीपी वॉल्यूम यानी जीडीपी की मात्रा भी कम हो रही है। आर्थिक अवसर, रोजागर सृजन, स्वरोजगार और मजदूरी में कमी आ रही है।

सरकार के 20 लाख करोड़ रुपए के आत्मनिर्भर पैकेज के बारे में जिसे सरकार देश की जीडीपी का 10 प्रतिशत बता रही है, श्रीनेत ने कहा कि जब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम, तमाम शोधकर्ताओं, वैश्विक पर्यवेक्षकों, अर्थशास्त्रियों और यहां तक कि सरकारी कर्मचारियों ने बैठकर गणना की तो पाया कि यह खर्च (fresh expenditure outlay) वास्तव में 1.86 लाख रुपए था, जो जीडीपी के एक प्रतिशत से भी कम है। बाकी सब फरवरी 2020 में घोषित केंद्रीय बजट का नवीनीकरण था।

इस बातचीत के दौरान श्रीनेत ने इस बात को लेकर भी सरकार की आलोचना की कि लोन के लिए जोर दिया जा रहा है। जब तमाम लोगों में अपनी नौकरी को लेकर अनिश्चितता है और उनकी सैलरी आधी तक घट गई है, ऐसे में क्या ये लोग लोन लेंगे? सरकार ने एमएसएमई (MSMEs) सेक्टर को 3 लाख करोड़ रुपए के ऋण आवंटित किए हैं, इस धन का आधा हिस्सा अभी भी सरकार के पास पड़ा है, क्योंकि लोगों को पता नहीं है कि वर्तमान आर्थिक स्थिति में वे इन लोन को कैसे चुकाएंगे?

सुप्रिया श्रीनेत का कहना था कि इसके बजाय सरकार को खपत को बढ़ावा देना चाहिए, जिससे उत्पादन बढ़ेगा और अधिक लोगों को रोजगार मिलेगा और इसके परिणामस्वरूप रोजगार सृजन होगा। अन्यथा आर्थिक पुनरुद्धार केवल सपना बनकर रह जाएगा।

जबरन धर्म परिवर्तन या कथित लव-जेहाद के खिलाफ अध्यादेश को उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा मंजूरी दिए जाने के सवाल पर श्रीनेत का कहना था कि मध्य प्रदेश में वर्ष 1968 में जबरन अथवा धोखे से धर्म परिवर्तन को रोकने के लिए धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम के नाम से कानून बनाया गया था। जिसमें साल 2013 में संशोधन कर धर्मांतरण से पहले राज्य सरकार से मंजूरी लेना अनिवार्य किया गया। वहीँ जबरन धर्म परिवर्तन कराने पर इसमें सजा का प्रावधान किया गया। इस तथ्य के बावजूद कि जबरन धर्म परिवर्तन के खिलाफ भारतीय दंड संहिता के कम से कम 10 खंड हैं, जिन्हें लागू किया जा सकता है। ऐसे में सरकार ने मौजूदा कानूनों पर भरोसा क्यों नहीं किया। उन्होंने कहा कि एक युवा भारतीय के रूप में वह इसे हास्यास्पद मानती हैं कि दो युवा ये तय नहीं कर सकते कि वे किससे शादी करना चाहते हैं।

इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा 11 नवंबर को दिए गए उस फैसले का उदाहरण देते हुए जिसमें कोर्ट ने कहा है (अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने का अधिकार, इसके बाद भी कि आपने किस धर्म को स्वीकार किया है, जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार में अंतर्निहित है) श्रीनेत का कहना था कि तनिष्क का विज्ञापन भारतीय संस्कृति की बहुलता को दर्शाने वाला था।

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भारत-ऑस्ट्रेलिया क्रिकेट सीरीज में रेवेन्यू को लेकर SONY के राजेश कौल ने कही ये बात

‘एक्सचेंज4मीडिया’ से बातचीत में ‘सोनी पिक्चर्स नेटवर्क्स इंडिया’ के चीफ रेवेन्यू ऑफिसर (डिस्ट्रीब्यूशन) और हेड (स्पोर्ट्स बिजनेस) राजेश कौल ने ऐड रेवेन्यू और सबस्क्रिप्शन रेवेन्यू को लेकर चर्चा की।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Monday, 23 November, 2020
Last Modified:
Monday, 23 November, 2020
Rajesh Kaul

भारत-ऑस्ट्रेलिया के बीच 27 नवंबर से शुरू होने वाली क्रिकेट सीरीज के लिए 15-16 स्पॉन्सर्स को अपनी झोली में डालने के बाद ‘सोनी पिक्चर्स स्पोर्ट्स नेटवर्क्स’ (SPSN) इसके प्रसारण के लिए पूरी तरह तैयार है। इस सीरीज का Sony Ten 1, Sony Ten 3 और Sony Six चैनल्स पर लाइव प्रसारण किया जाएगा। लगभग नौ महीने के ब्रेक के बाद विराट कोहली की टीम इंडिया के लिए यह पहली अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट सीरीज़ होगी, जिसमें तीन टी20, तीन वनडे और चार टेस्ट मैच खेले जाने हैं। हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ एक बातचीत में ‘सोनी पिक्चर्स नेटवर्क्स इंडिया’ के चीफ रेवेन्यू ऑफिसर (डिस्ट्रीब्यूशन) और हेड (स्पोर्ट्स बिजनेस) राजेश कौल ने इस सीरीज के दौरान मिलने वाले ऐड रेवेन्यू और सबस्क्रिप्शन रेवेन्यू को लेकर विस्तार से चर्चा की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:  

कोविड-19 के कहर के कारण यह साल ब्रॉडकास्टर्स समेत लगभग प्रत्येक बिजनेस के लिए मुश्किलों भरा रहा है। ऐसे में ऐड रेवेन्यू के मामले में आपको इस सीरीज से क्या उम्मीदें हैं?

लॉकडाउन के बाद हमने स्पोर्ट्स इवेंट को लेकर व्युअरशिप में काफी इजाफा देखा है, यहां तक कि उन सीरीज में भी, जिनमें भारत शामिल नहीं रहा है। ऐसे में भारत-ऑस्ट्रेलिया सीरीज को लेकर भी हमें इसी तरह का ट्रेंड बरकरार रहने की उम्मीद है। 

इस सीरीज को लेकर लोगों के बीच काफी चर्चा है और हम सब इसे अपने नेटवर्क, नेटवर्क के बाहर, रीजनल चैनल्स पर, प्रिंट और डिजिटल पर प्रमोट करने जा रहे हैं। इसके साथ ही यह सीरीज नौ महीने के ब्रेक के बाद हो रही है, ऐसे में मुझे उम्मीद है कि पिछली बार के मुकाबले व्युअरशिप के मामले में यह काफी आगे निकलेगी।

हमें डिजिटल (SonyLIV) और अन्य चैनल्स पर एडवर्टाइजर्स और स्पॉन्सर्स की ओर से भी काफी अच्छी प्रतिक्रिया मिली है। व्युअरशिप और एड रेवेन्यू के मामले में यह सीरीज हमारे अनुमान से कहीं ज्यादा बेहतर होने जा रही है। एडवर्टाइजर्स और स्पॉन्सरशिप के अलावा हमें सबस्क्रिप्शन बिजनेस में भी बढ़ोतरी की उम्मीद है। इन सबका वास्तविक प्रभाव तो सीरीज शुरू होने के 10-15 दिन बाद ही पता चलेगा, लेकिन शुरुआती ट्रेंड्स काफी सकारात्मक हैं। हमें उम्मीद है कि सीरीज के अंत तक हमें 15-20 प्रतिशत का इजाफा देखने को मिलेगा।

लॉकडाउन के दौरान डिजिटल के उपभोग (consumption) में कई गुना बढ़ोतरी हुई है। क्या आपको लगता है कि टीवी व्युअरशिप पर इसका असर पड़ेगा?

यह सही है कि लॉकडाउन के दौरान डिजिटल का उपभोग बढ़ा है। हालांकि, स्पोर्ट्स में हमें इस तरह का ट्रेंड देखने को नहीं मिला है। यह जॉनर अभी इससे प्रभावित नहीं हुआ है। हां, समग्र रूप से देखा जाए तो डिजिटल की व्युअरशिप बढ़ रही है और आने वाले वर्षों में ऐसा होना तय है। लेकिन भारत विविधताओं भरा देश है और यहां एक टीवी वाले घरों की संख्या ज्यादा है। इसलिए, खासकर क्रिकेट के लिए जिसे ज्यादातर परिवार के लोग मिलकर देखते हैं, हमें नहीं लगता कि टीवी व्युअरशिप पर इसका कोई प्रभाव पड़ेगा।

उदाहरण के लिए-जिन सीरीज में इंडियन टीम नहीं खेल रही थी, जैसे-जुलाई में वेस्ट इंडीज और इंग्लैंड के बीच व अगस्त में पाकिस्तान और इंग्लैंड के बीच सीरीज के दौरान भी व्युअरशिप में 200 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखने को मिली है। हालांकि इस दौरान दर्शक बहुत अधिक डिजिटल कंटेंट का उपभोग कर रहे होंगे, लेकिन टीवी दर्शकों की संख्या 200 प्रतिशत बढ़ गई है। जैसा कि मैंने कहा कि डिजिटल संख्या बढ़ती रहेगी, लेकिन टीवी व्युअर्स की संख्या भी बढ़ेगी।  

इस साल सीरीज के लिए किस तरह की प्रोग्रामिंग की योजना बनाई गई है?

कोविड-19 से जुड़े प्रतिबंधों के चलते यह हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती थी, लेकिन शूटिंग के दौरान तमाम सुरक्षा मापदंडों का पालन करते हुए आगे बढ़ते चले गए। कुछ कंटेंट हमारे चैनल्स पर पहले से ही प्रसारित होना शुरू हो गया है, जिनमें भारत-ऑस्ट्रेलिया की पूर्व में हुई बेहरतीन ‘भिड़ंत’ शामिल हैं। सीरीज के दौरान हमारे पास हमारा फ्लैगशिप शो ‘Extraaa Innings’ होगा, जिसमें ग्लेन मैकग्रा, संजय मांजरेकर, वीरेंद्र सहवाग जैसे तमाम दिग्गज शामिल होंगे। हमारे पास ऑस्ट्रेलिया से आ रहा लाइव फीड होगा। इसके साथ ही हम अंग्रेजी फीड भी तैयार कर रहे हैं। हम अपने ऑडियंस को हरसंभव श्रेष्ठ कवरेज उपलब्ध कराना सुनिश्चित कर रहे हैं। यही नहीं, इस सीरीज के दौरान लगभग नौ महीने के बाद स्टेडियम में दर्शक मौजूद रहेंगे, इसलिए इस सीरीज का लुक और अनुभव कुछ अलग ही होने वाला है।  

क्या आपको लगता कि इस साल टाइमिंग का कोई इश्यू नहीं होगा, क्योंकि अधिकांश लोग अभी भी घर से काम (working from home) कर रहे हैं?

इस सीरीज में सभी वनडे, टी20 और टेस्ट मैच भारतीय समयानुसार प्रसारित किए जाएंगे। डे-नाइट मैच सुबह और टी20 मैच दोपहर में शुरू होंगे, जो काफी अच्छी टाइमिंग है। चूंकि अधिकांश लोग अभी भी घरों से काम कर रहे हैं, ऐसे में यह सभी के लिए सही होगा।

इस साल आप स्पोर्ट्स जॉनर को किस तरह से बढ़ते हुए देख रहे हैं?

इस साल की शुरुआत में ज्यादा स्पोर्ट्स इवेंट नहीं हुए। ओलंपिक्स जो इस साल जून में प्रस्तावित था, समेत कुछ स्पोर्ट्स इवेंट्स स्थगित कर दिए गए, लेकिन अब सभी चीजें धीरे-धीरे पटरी पर लौट रही हैं। ऐसे मुश्किल समय में लोग लाइव स्पोर्ट्स का लुत्फ उठाना चाहते हैं। अब लोगों का स्टेडियम में आना भी शुरू होगा और इससे स्पोर्टस जॉनर के समग्र विकास में मदद मिलेगी। मुझे उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में इस जॉनर में बड़ी ग्रोथ दिखाई देगी।

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काफी पसंद किए जा रहे हैं Hindustan Times में किए गए ये बदलाव: राजन भल्ला

‘एचटी मीडिया’ (HT Media) ग्रुप के सीएमओ राजन भल्ला ने रीब्रैंडिंग के बाद हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ के साथ बातचीत में तमाम पहलुओं पर अपने विचार रखे।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 10 November, 2020
Last Modified:
Tuesday, 10 November, 2020
Rajan Bhalla

‘कोरोनावायरस’ (कोविड-19) का संक्रमण फैलने से रोकने के लिए देशभर में किए गए लॉकडाउन के कारण अन्य तमाम उद्योग धंधों के साथ प्रिंट मीडिया भी काफी प्रभावित हुआ। निस्संदेह प्रिंट मीडिया के लिए यह बहुत कठिन समय था। लेकिन, कुछ ब्रैंड्स ने इस समय का उपयोग अपने प्रॉडक्टस में नए परिवर्तन लाने में किया। ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ (Hindustan Times) ने भी अपने आपको पूरी तरह री-डिजाइन किया और दावा किया कि ब्रैंड को युवा पीढ़ी के अनुकूल बनाया गया है।

यह भी पढ़ें: HT Media ने Hindustan Times में किए ये बड़े बदलाव

नए डिजाइन और फॉर्मेट को लागू करने के करीब दो महीने बाद हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ एक बातचीत में ‘एचटी मीडिया’ (HT Media) ग्रुप के सीएमओ राजन भल्ला ने तमाम पहलुओं पर अपने विचार रखे। उन्होंने बताया कि न सिर्फ पेज डिजाइन में बदलाव किया गया है, बल्कि इसे मल्टी-प्लेटफॉर्म शेयरेबल फॉर्मेट के साथ फिर से लॉन्च किया है, यानी इसे किसी भी फॉर्मेट पर आसानी से शेयर किया जा सकता है। इस बातचीत के दौरान उनका यह भी कहना था, ‘ब्रैंड के लिए नए प्रॉडक्ट का फीडबैक बहुत ही अच्छा रहा है। सभी बदलावों को काफी पसंद किया गया है।’  

प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

इस री-लॉन्च के बारे में कुछ बताएं ? आपने अब इसे करने का चुनाव क्यों किया?

पिछले दशक में मीडिया परिदृश्य में काफी बड़े बदलाव देखने को मिले हैं और ऐसे समय के बावजूद देश भर में आठ मिलियन पाठक संख्या के साथ एचटी मीडिया मार्केट में सबसे आगे रहा है। ऐसे में न्यूज कंज्यूमर्स की मांग व जरूरत को देखते हुए यह बदलाव किए गए हैं। हम लंबे समय से देश के युवा वर्ग से ये जानने की कोशिश कर रहे थे और पिछले एक साल में हमने इस बात को गहराई से समझा है कि लोग कैसी और किस तरह की खबर पढ़ना पसंद करते हैं। उनके नजरिये को हमने री-डिजाइन में शामिल करने की कोशिश की है। हालांकि, इन बदलावों से पुरानी पीढ़ी दूर न हो जाए, इसके लिए भी एक अच्छा संतुलन बनाए रखने की कोशिश की है, क्योंकि वे भी हमारे लॉयल रीडर्स हैं। प्रॉड्कट में इन बदलावों के लिए मीडिया इंडस्ट्री के जाने-माने नाम डॉ. मारिया गार्सिया (Dr Mario Garcia) ने एचटी मीडिया की टीम के साथ मिलकर काम किया, ताकि इसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर को भी शामिल किए जा सके।   

री-लॉन्च को करीब दो महीने हो चुके हैं, शुरुआती फीडबैक कैसा रहा है? प्रिंट और डिजिटल क्या अब बेहतर तरीके से जुड़े हैं?

नई पेशकश का फीडबैक बहुत ही अच्छा रहा है। सभी बदलावों को काफी पसंद किया गया है। इस 'ऑल-न्यू डिजिटल-फर्स्ट' वर्जन में ऐसे एलिमेंट्स जोड़े गए हैं, जो आपको प्रिंट से डिजिटल की ओर ले जाने की पेशकश करते हैं, जैसे QR कोड्स, वीडियो पॉइंटर्स, पॉडकास्ट के लिंक्स और फोटो गैलरीज जैसे डिजिटल इंटीग्रेशन। ये पाठकों को HT के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ले जाते हैं। अब हर पृष्ठ पर एक सोशल कार्ड है जो रीडर्स को प्रिंट से डिजिटल प्लेटफॉर्म पर नेविगेट करने में सक्षम बनाएगा। हम लगातार अपने प्रॉडक्ट और कंटेंट को अपने पाठकों के लिए और अधिक आकर्षक बनाने पर काम कर रहे हैं।

री-लॉन्चिंग का काम पहले ही शुरू कर दिया गया था, लेकिन इसके बाद महामारी और फिर लॉकडाउन शुरू हो गया, ऐसे में यह सफर कितना मुश्किल रहा?

एचटी मीडिया परिवार अपने जुनून के कारण महामारी के बीच इस फ्लैगशिप ब्रैंड को री-लॉन्च करने में कामयाब रहा। चीजों को सामान्य करते हुए हम सभी इसे शुरू करने को लेकर काफी गर्व महसूस कर रहे हैं। हम इस लॉन्चिंग को आगे बढ़ा सकते थे, लेकिन हम महामारी के बीच अपने पाठकों को कुछ नया और फ्रेश देना चाहते थे। यह एक साहसिक कदम था और हमने इसे पूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।    

आपके पास न केवल संपादकीय टीमों, बल्कि प्रिंट और डिजिटल की सेल्स टीमों को मिलाने के लिए न्यूयॉर्क टाइम्स (NYT) जैसी योजना है, क्या आपको लगता है कि इस तरह के प्रयास से ज्यादा रिटर्न हासिल होगा? क्या इस पूरी कवायद ने ज्यादा एडवर्टाइजर्स को अपनी ओर आकर्षित करने में मदद की?

अपने एडवर्टाइजर्स और अपने पाठकों दोनों के लिए हमारा फोकस नए बदलावों पर रहा है। अपने एडवर्टाइजर्स के लिए अब हम इंटीग्रेटेड प्रिंट और डिजिटल सॉल्यूशन पेश कर रहे हैं। एचटी मार्केट में आठ मिलियन से ज्यादा रीडरशिप और HT.com पर 65 मिलियन से ज्यादा यूनिक विजिटर्स के साथ अब हम नए एचटी में प्रिंट और डिजिटल दोनों का समावेश उपलब्ध करा रहे हैं। डिजिटल में एचटी मीडिया जैसे प्लेयर्स अधिकांश सेगमेंट जैसे-डिस्प्ले/ब्रैंडेड कंटेंट/प्रोग्रामैटिक ऐड्स में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में हम एडवर्टाइजर्स को काफी बेहतर सॉल्यूशंस उपलब्ध करा पाते हैं। महामारी निश्चित रूप से उपभोक्ताओं के व्यवहार में बदलाव ला रही है, लेकिन मजबूत पत्रकारिता और अच्छी टेक्नोलॉजी का लाभ उठाने वाले ब्रैंड्स कंज्यूमर्स और एडवर्टाइजर्स के लिए प्रासंगिक रहेंगे।

आपके द्वारा री-लॉन्च किए गए प्रॉडक्ट के लिए वे तीन प्रमुख क्षेत्र कौन से होंगे, जिन पर आप काम करना चाहेंगे?

सबसे पहले तो इस री-लॉन्च के साथ प्रयास हमारे ऑडियंस की बदलती समाचार खपत (news consumption) की आदतों को समझने और उन्हें वे देने की कोशिश करना है, जो वे चाह रहे हैं। इस 'ऑल-न्यू डिजिटल-फर्स्ट' वर्जन में ऐसे एलिमेंट्स जोड़े गए हैं, जो आपको प्रिंट से डिजिटल की ओर ले जाने की पेशकश करते हैं, जैसे QR कोड्स, वीडियो पॉइंटर्स, पॉडकास्ट के लिंक्स और फोटो गैलरीज जैसे डिजिटल इंटीग्रेशन। ये पाठकों को HT के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ले जाते हैं।

दूसरी बात, युवाओं पर ज्यादा फोकस किया जा रहा है। इस दिशा में तमाम कदम उठाए जा रहे हैं, ताकि नए एचटी के साथ प्रिंट की पेशकश बहुत आकर्षक और प्रासंगिक बनी रहे। आखिर बात, अपने एडवर्टाइजर्स को वैल्यू प्रदान करना हमेशा हमारे सभी प्रयासों के मूल में रहा है। यह नई पेशकश अपने कंज्यूमर्स पर फोकस करने के साथ ही अपने कस्टमर्स को सॉल्यूशंस उपलब्ध कराने में और अपने पार्टनर्स को ज्यादा रिटर्न ऑन इंन्वेस्टमेंट (ROI) हासिल करने में मदद करती है।

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डेलीहंट के फाउंडर्स बोले, भारत में एंटरप्रिन्योर बनना कमजोर दिल वालों का काम नहीं

डेलीहंट के फाउंडर वीरेंद्र गुप्ता व को-फाउंडर उमंग बेदी ने अपने शॉर्ट वीडियो ऐप जोश समेत तमाम मुद्दों पर रखी राय

Last Modified:
Monday, 05 October, 2020
Josh

लोकल मार्केट में अपना दबदबा बढ़ाने के बाद ‘डेलीहंट’ (Dailyhunt) ने पिछले दिनों शॉर्ट वीडियो ऐप ‘जोश’ (Josh) लॉन्च किया था, जिसे पहले हफ्ते से ही लोगों द्वारा काफी पसंद किया जा रहा है। ‘डेलीहंट’ के फाउंडर वीरेंद्र गुप्ता और को-फाउंडर उमंग बेदी ने ‘बिजनेस वर्ल्ड’ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ ग्रुप के डायरेक्टर नवल आहूजा से अपनी नई पेशकश, भारतीय ऐप मार्केट पर बढ़ते फोकस और डिजिटल कंटेंट पब्लिशर्स के आगे बढ़ने समेत तमाम मुद्दों पर बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

इस समय नए शॉर्ट वीडियो ऐप जोश को लॉन्च करने के पीछे आपकी क्या सोच रही, इस बारे में कुछ बताएं?

उमंग बेदी: हम देश के डिजिटल सिस्टम में एक बिलियन लोगों को शामिल करना चाहते हैं, जो स्थानीय भाषाओं द्वारा संचालित है। हमारा मानना है कि डेलीहंट के साथ स्थानीय भाषाओं को लेकर एक सामाजिक क्रांति शुरू हो रही है। हम सबसे बड़ा डिजिटल मीडिया बनना चाहते हैं जो एक अरब भारतीयों को इंफॉर्म करने, उनका ज्ञान बढ़ाने और मनोरंजन करने वाले कंटेंट को डिस्ट्रीब्यूट करने और कंज्यूम करने के लिए सशक्त बना रहा है। हमारी स्ट्रैटेजी अपने यूजर्स, कंज्यूमर्स, पब्लिशर्स, पार्टनर्स और ऐडवर्टाइजर्स के लिए उनकी पसंद का ऐसा प्लेटफॉर्म तैयार करना है, जो स्थानीय भाषाओं पर केंद्रित हो। हम इस बात को लेकर पूरी तरह स्पष्ट हैं कि हम स्थानीय भाषा के यूजर्स (लोकल लैंग्वेज यूजर्स) के लिए अपना माइंडशेयर (mindshare), टाइमशेयर (timeshare) और रेवेन्यू शेयर (revenue share) चाहते हैं। पिछले दो वर्षों में हमने काफी ज्यादा ग्रोथ देखी है। यहां तक कि मार्च से जब पूरे देश में लॉकडाउन लगा हुआ था, डेलीहंट ने काफी ज्यादा कंटेंट को प्राथमिकता देना और उसे बनाना शुरू कर दिया था। जब प्रधानमंत्री ने देश को आत्मनिर्भर बनाने के बारे में बात की तो इस बात ने डेलीहंट को प्रोत्साहन के साथ एक अतिरिक्त जिम्मेदारी भी प्रदान की। जैसा कि हमने कहा है कि हम शार्ट वीडियो के फॉर्मेट द्वारा स्थानीय भाषा के यूजर्स (लोकल लैंग्वेज यूजर्स) के लिए अपना माइंडशेयर (mindshare), टाइमशेयर (timeshare) और रेवेन्यू शेयर (revenue share) चाहते हैं, हमने दो हफ्ते के समय में जोश को लॉन्च किया। हमारा यह शॉर्ट वीडियो ऐप पूरी तरह स्वदेशी है और यह देश का तेजी से बढ़ता ऐप है, जिसे लोगों द्वारा काफी पसंद किया जा रहा है।

जोश को लॉन्च किए हुए कुछ हफ्ते हो गए हैं, इसका अब तक का रिस्पॉन्स कैसा रहा है?

उमंग बेदी: जोश देश के टॉप 200 क्रिएटर्स का अनूठा संगम है, जिनका विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर सामूहिक यूजर बेस 300-400 मिलियन है। शुरुआती हफ्तों की बात करें तो जोश को बेहतरीन प्रतिक्रिया मिली है। 45 दिनों में ही हम टॉप रेटेड ऐप बन गए हैं, जिसके 50 मिलियन डाउनलोड्स हो गए हैं। रोजाना इस ऐप पर 23 मिलियन लोग आते हैं और औसतन 21 मिनट व्यतीत करते हैं। इसमें रोजाना एक बिलियन वीडियो प्ले होते हैं और पांच मिलियन लोग कंटेंट बना रहे हैं। जिस हिसाब से हमारी ग्रोथ हो रही है, हमें उम्मीद है कि इस तरह अगले 60 से 90 दिनों में हम इन आंकड़ों के दोगुने तक पहुंच जाएंगे। हमने इसे पूरी तरह भारत में, भारत के लिए 14 भारतीय भाषाओं में तैयार किया है और हमारा मानना है कि यूजर बेस के मामले में इसने टिकटॉक को रिप्लेस कर दिया है।

वीरेंद्र गुप्ता: विदेशी कंपनियां जब भारत को सिर्फ अंग्रेजी भाषी मार्केट के तौर पर देखती हैं, डेलीहंट स्थानीय भाषाओं में काम कर रहा है। हम काफी समय से इस मार्केट में हैं। हमने इस मार्केट के लिए टूल्स, टेक्नोलॉजी और कंटेंट तैयार किया है। अभी तक इस मार्केट पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया था और हमने अपनी पेशकश के द्वारा इस दिशा में काफी काम किया है। जोश हमारी नवीनतम पेशकश है।

भारतीय ऐप के ईकोसिस्टम की बात करें तो इसमें रोजाना प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है, ऐसे में आप किस तरह आगे बने हुए हैं?

वीरेंद्र गुप्ता: यह बहुत अच्छी बात है कि बहुत सारी भारतीय कंपनियां नए ऐप बना रही हैं। हमें एक नए भारत की कल्पना करने की जरूरत है। हम जानते हैं कि इस खेल को कैसे जीता जाता है। मेरा मानना है कि यदि मार्केट में ज्यादा प्लेयर्स आते हैं तो इससे आगे बढ़ने में मदद मिलेगी और हमें एक-दूसरे से काफी कुछ सीखने को मिलेगा। इससे शॉर्ट वीडियो ऐप्स और अन्य ऐप्स पर काफी प्रभाव पड़ेगा, क्योंकि युवा एंटरप्रिन्योर्स नए-नए आइडियाज के साथ आ रहे हैं, इससे भारतीय ऐप का ईकोसिस्टम आगे बढ़ेगा।

उमंग बेदी: भारतीय स्टार्ट-अप इकोसिस्टम को लेकर मैं बहुत प्रोत्साहित और उत्साहित हूं। मैं हमेशा से कहता हूं कि भारत में एंटरप्रिन्योर बनना कमजोर दिल वालों का काम नहीं है। इस मार्केट में काफी भीड़भाड़ है, लेकिन प्रत्येक वर्टिकल की तरह चाहे वह ऑटोमोबाइल्स हो, हैंडसेट्स हो, टेलिकॉम या ई-कॉमर्स हो, मार्केट में दो प्लेयर्स बड़े शेयर्स के साथ उभरकर सामने आते हैं।

मेरा मानना है कि अगले छह महीनों में यह मार्केट नया रूप लेने जा रहा है। यदि आप कुछ बड़ी टेक कंपनियों की तरफ देखें, जिन्होंने अपने मार्केट में स्थानीय भाषाओं पर काम किया है, ऐसे में उन्हें किस वजह के आगे निकलने का अधिकार है?

पहली बात तो यह है कि उन्हें विभिन्न भाषाओं में विभिन्न फॉर्मेट्स में कंटेंट की गहरी समझ है। कंटेंट को समझने के लिए उनके पास आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (AI) है। दूसरी बात यह है कि वह गहरी समझ का इस्तेमाल कर रहे हैं। तीसरी बात यह है कि उनमें बड़े पैमाने पर मुद्रीकरण (monetisation) को तैयार करने की क्षमता है। हम इस बात की काफी कद्र करते हैं कि ग्लोबल कंपनियों ने किस तरह से अपना बिजनेस तैयार किया है, लेकिन हम पूरी तरह स्पष्ट हैं कि वे सिर्फ देश के खास तबके तक सीमित हैं। हम इस मायने में उनसे अलग हैं कि हम भारत को अच्छे से समझते हैं, हम स्थानीय भाषाओं को समझते हैं। देश में 21000 पिन कोड में से हमें 19000 से ट्रैफिक मिलता है। हमें लगता है कि दो बड़े प्लेयर्स के लिए एक-दूसरे से आगे बढ़ने के लिए मार्केट काफी बड़ा है और अपने आप को लेकर हम काफी आश्वस्त हैं।

यदि टिकटॉक की भारतीय मार्केट में दोबारा से एंट्री होती है या जियो कोई इसी तरह का प्रॉडक्ट लॉन्च कर देता है तो उस दौरान आपकी स्ट्रैटेजी क्या रहेगी?

कंप्टीशन को लेकर हम चिंतित नहीं हैं। हम प्रतिस्पर्धा का स्वागत करते हैं। हम ऐसे मार्केट में प्रतिस्पर्धा करते हैं, जहां पर डिजिटल एडवर्टाइजिंग की बात आती है तो एकाधिकार हावी हो जाता है। हमने चीन के बड़े ऐप्स के साथ प्रतिस्पर्धा की है और हमने वह लड़ाई जीती भी है। यदि टिकटॉक या इसी तरह का कोई ऐप वापस भी आ जाता है, तो भी हमें कोई दिक्कत नहीं है। हमारा मानना है कि यह मार्केट दो या तीन प्लेयर्स के लिए पर्याप्त बड़ा है और हमें पूरा विश्वास है कि हम उन दो प्लेयर्स में शामिल होंगे।

आपकी नजर में, क्या मार्च 2020 के बाद विज्ञापन खर्च में कुछ परिवर्तन आया है, मार्केट को लेकर आपका क्या कहना है?

उमंग बेदी: आप जिस क्षण डिजिटल में आते हैं, प्रत्येक मार्केटर आपकी परफॉर्मेंस मांगता है। चाहे पहुंच अथवा फ्रीक्वेंसी की बात हो, चाहे क्लिक की बात हो या फिर एडवर्टाइजिंग का प्रदर्शन हो।

गूगल, फेसबुक और डेलीहंट के अलावा कितने प्लेटफॉर्म्स हैं, जहां पर आप परफॉर्मेंस के आधार पर विज्ञापन हासिल कर सकते हैं?

जो मैंने देखा है, उसके अनुसार, कोविड-19 की तिमाही के दौरान हमारे रेवेन्यू में साल दर साल 100 प्रतिशत तक का इजाफा हुआ है। अब हम ब्रैंड एडवर्टाइजिंग में काफी उछाल देख रहे हैं। मुझे लगता है कि परफॉर्मेंस एक यात्रा है और हमने 100000 पब्लिशर्स व लोगों के साथ मिलकर डाटा इंटीग्रेशन तैयार किया है, जो हमें कंटेंट दे रहे हैं। परफॉर्मेंस की बात करें तो हमारे पास 250 एडवर्टाइजर्स हैं, जिनके साथ हमने डाटा इंटीग्रेशन (डाटा एकीकरण) किया है, जिसके द्वारा हम यूजर को ट्रैक कर सकते हैं और उसी हिसाब से टार्गेट कर सकते हैं। यही कारण है कि देश में गूगल और फेसबुक के बाद हम एकल गंतव्य (single destination) के मामले में रेवेन्यू के हिसाब से तीसरे स्थान पर हैं। हम अभी इनसे काफी दूर हैं, क्योंकि देश में ये कंपनियां रेवेन्यू और पहुंच के मामले में काफी बड़ी हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि आने वाले तीन वर्षों में भारत में डिजिटल टीवी के बराबर आ जाएगा या इससे आगे निकल जाएगा।  

वीरेंद्र गुप्ता: हमारे पास डेलीहंट के ऐप्स पर रोजाना दो घंटे से ज्यादा समय बिताने वाले 500 मिलियन लोकल लैंग्वेज यूजर्स होंगे। और जब आप ऐसा करते हैं, तो मेरा मानना ​​है कि विज्ञापन और बढ़ेंगे, क्योंकि यह भारत है और यह एक अंडरस्कोर मार्केट है। जैसा कि हम जानते हैं, विज्ञापन का पैसा बड़े पैमाने पर चलता है और यही वह जगह है, जहां हम आगे बढ़ रहे हैं।

यदि हम कंटेंट के विमुद्रीकरण (monetising) की बात करें देश में डिजिटल न्यूज पब्लिशिंग ईकोसिस्टम के लिए आगे बढ़ने का क्या तरीका है?

उमंग बेदी: यदि आप भारत और यहां के इंटरनेट ईकोसिस्टम के बारे में सोचते हैं तो आज की तारीख तक हम ओपन और न्यूट्रल इंटरनेट में विश्वास रखते हैं। हम मल्टीस्टेकहोल्डर तंत्र में विश्वास रखते हैं। रही बात सही और गलत स्ट्रैटेजी की तो मेरा मानना है कि इस पर गंभीर बहस किए जाने की जरूरत है। इसके अलावा टीवी ने भी काफी यूनिक और अलग कंटेंट तैयार किया है। जब मैं पांच अलग-अलग चैनल्स पर न्यूज देखता हूं तो यह वैचारिकता से प्रभावित लगती है, जो तथ्य नहीं हैं। यह न्यूज का विश्लेषण और उस न्यूज के बारे में राय है। मुझे लगता है कि एक पब्लिशिंग ईकोसिस्टम के रूप में हमें इससे प्रेरणा लेने की आवश्यकता है।

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