TOI के सबस्क्रिप्शन मॉडल के पीछे यह रही बड़ी वजह: शिवकुमार सुंदरम

बीसीसीएल की एग्जिक्यूटिव कमेटी के चेयरमैन बोले, अधिकतर लोग अखबार के प्रिंट संस्करण को देते हैं प्राथमिकता, जबकि ई-पेपर अंतरिम विकल्प है

Last Modified:
Thursday, 21 May, 2020
Sivakumar Sundaram

देश के प्रमुख अंग्रेजी अखबार ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ (The Times of India) ने पिछले हफ्ते अपने ई-पेपर को पढ़ने के लिए इस पर सबस्क्रिप्शन मॉडल लागू किया है। यानी अब इस अखबार का ई-पेपर पढ़ने के लिए पाठकों को इसे सबस्क्राइब करना होगा, जिसके लिए शुल्क भी चुकाना होगा। ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ द्वारा यह फैसला लिए जाने के बाद इंडस्ट्री में यह चर्चा जोरों पर उठने लगी है कि क्या अन्य प्रिंट प्लेयर्स भी इसका अनुसरण करेंगे और गिरते रेवेन्यू को बचाने के लिए सबस्क्रिप्शन मॉडल अपनाएंगे। अखबार द्वारा उठाए गए कदम और इंडस्ट्री में चल रहीं इस तरह की चर्चाओं के बीच तमाम सवालों को लेकर हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) ने ‘बेनेट कोलमैन एंड कंपनी लिमिटेड’ (BCCL) की एग्जिक्यूटिव कमेटी के चेयरमैन शिवकुमार सुंदरम से बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

आपने पिछले दिनों सबस्क्रिप्शन मॉडल अपनाने का फैसला लिया है। इसके पीछे क्या कारण रहा, इस बारे में कुछ बताएं

कोरोनावायरस (कोविड-19) ने हमारे जीने के अंदाज और लोगों से संपर्क करने के तरीकों को बदल दिया है। कोरोनावायस का संक्रमण फैलने से रोकने के लिए किए गए लॉकडाउन के कारण लोग इन दिनों अपने घरों पर ही हैं। इस दौरान किए गए तमाम सर्वेक्षणों से पता चला है कि लोगों द्वारा अखबार पढ़ने में बिताए जाने वाले औसत समय में काफी बढ़ोतरी हुई है। हमने नोटिस किया है कि प्रिंट वर्जन को काफी प्राथमिकता मिल रही है, लेकिन महामारी के दौर में कुछ मार्केट्स में डिस्ट्रीब्यूशन संबंधित चुनौतियां सामने आ रही हैं, ऐसे में ई-पेपर/डिजिटल पीडीएफ वर्जन बेहतर विकल्प के रूप में सामने आया है और डिस्ट्रीब्यूशन अस्थायी रूप से उस ओर शिफ्ट हो गया है। महामारी के इस दौर में विश्वसनीय खबरें सिर्फ आवश्यक ही नहीं है, बल्कि इनकी बहुत ज्यादा जरूरत है। लॉकडाउन के कारण हमारे अखबार की डिलीवरी हमारे सभी पाठकों तक सुनिश्चित नहीं हो पा रही है, ऐसे में हमारी ड्यूटी है कि लोगों तक हम प्रमाणिक खबरें पहुंचाएं। ऐसे में मुफ्त में ई-पेपर उपलब्ध होने पर शरारत करने वाले तत्व समाचारों को डाउनलोड कर उनसे साथ छेड़छाड़ कर सकते हैं अथवा फेक न्यूज को प्रसारित कर सकते हैं। ई-पेपर के लिए सबस्क्रिप्शन मॉडल अपनाकर हम यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि जो पाठक न्यूज का ऑरिजिनल वर्जन पढ़ना चाहते हैं वे इसकी प्रमाणिकता पर पूरा भरोसा कर सकते हैं।     
इस तरह हम अखबार के डाउनलोड किए गए और फॉरवर्ड किए गए वर्जन की खपत (consumption) को हतोत्साहित करते हैं, क्योंकि इस नाजुक समय में यह हमारे समाज के लिए भ्रामक और खतरनाक हो सकता है। वॉट्सऐप ग्रुप्स पर जो भी मुफ्त में और फॉरवर्ड होकर मिलता है, उसका कोई महत्व नहीं है। कंटेंट को तैयार करने और उसे सहेजने में हम काफी समय, श्रम और पैसा खर्च करते हैं। ऐसे में अपने ई-पेपर के लिए सबस्क्रिप्शन मॉडल को अपनाने के पीछे हमारा मकसद इस प्रयास को प्रदर्शित करना और इसे वह सम्मान देना है, जिसका वह हकदार है।

क्या यह कदम सीधा लॉकडाउन से जुड़ा हुआ है या पहले से ही इसकी तैयारी थी?

यह कदम लॉकडाउन में जरूर उठाया गया है, लेकिन लंबे समय से यह एक अनिवार्यता थी। हमारा मानना है कि अखबार का प्रिंट वर्जन अभी भी सबसे बेहतर है। इसके बाद ई-पेपर का नंबर आता है। अखबारों का प्रिंट संस्करण ऐसी आदत है जो पूरे दिन को एक आकार देती है। यह उन समाचारों का एक क्यूरेटेड फीड है जो हमारे द्वारा रोजाना दुनिया के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी की आवश्यकता को पूरा करता है। हमारा कोई भी मीडिया प्लेटफॉर्म चाहे प्रिंट हो, टीवी हो, आउट ऑफ होम (OOH) हो या रेडियो अथवा डिजिटल हो, उसकी अपनी एक अलग वैल्यू है, अलग अपील है और अपना खुद का बिजनेस मॉडल है। इन सभी प्लेटफॉर्म्स ने ऑडियंस के लिए अपने कंटेंट को बेहतर तरीके से तैयार किया है और उसके द्वारा ऑडियंस के बीच अपना भरोसा स्थापित किया है। बिना सोचे समझे वॉट्सऐप ग्रुप्स पर ई-पेपर्स को फॉरवर्ड किया जा रहा है। यह भी एक कारण है कि इंडस्ट्री अपने अखबार को सबस्क्रिप्शन मॉडल पर रख रही है और वॉट्सऐप पर ई-पेपर्स को फॉरवर्ड करने को गैरकानूनी बता रही है।     

यह फैसला लॉकडाउन खत्म होने के बाद आपके बिजनेस की गतिशीलता (dynamics) को किस प्रकार बदल देगा?

अपने पाठकों की न्यूज पढ़ने की आदतों के बारे में हमारे द्वारा कराए गए शोध के कई हालिया नतीजों से स्पष्ट पता चलता है कि उनमें से 90 प्रतिशत से अधिक पाठक अखबार के प्रिंट वर्जन को प्राथमिकता देते हैं। ई-पेपर अंतरिम विकल्प है और मेरा अनुमान है कि लॉकडाउन के बाद परिदृश्य लॉकडाउन के पहले जैसी स्थिति में वापस आ जाएगा।  

भारतीय बाजार के लिए इस सबस्क्रिप्शन आधारित मॉडल के बारे में आपका क्या कहना है? इस दिशा में मार्केट की गतिशीलता के बारे में आपको क्या उम्मीद है?

अपने देश में अखबारों समेत विभिन्न मीडिया में सबस्क्रिप्शन मॉडल प्रचलन में रहा है। यह नई बात नहीं है। आगे जाकर संभवत: यह इसी दिशा में आगे बढ़ेगा। अधिकांश न्यूज मीडिया रेवेन्यू के मुख्य सोर्स के रूप में एडवर्टाइजिंग पर भरोसा रखना जारी रखेंगे। एडवर्टाइजर्स के नजरिये से देखें तो अखबार उपभोक्ताओं के प्रोफाइल, तत्काल पहुंच का प्रभाव, प्रामाणिकता और विश्वसनीयता का अनूठा संयोजन है। यह विस्तृत जानकारी देने का अवसर प्रदान करता है। निकट भविष्य में भी अखबार के ये एडवांटेज बने रहेंगे। मुझे मुझे कोविड-19 के वर्तमान दौर में इस तरह के बदलाव की उम्मीद नहीं है।

इस दृष्टिकोण से निकट भविष्य में और लंबे समय के लिए आप कितने प्रतिशत रेवेन्यू प्राप्त होने की उम्मीद कर रहे हैं?

जैसा कि मैंने पहले भी कहा है कि यह कवायद रेवेन्यू जुटाने के मकसद से शुरू नहीं की गई है। रही बात रेवेन्यू  की तो मेरा मानना है कि ई-पेपर का रेवेन्यू अभी और भविष्य में भी मामूली ही रहेगा।

क्या आप इंडस्ट्री से उम्मीद करते हैं कि वह इस बिजनेस मॉडल को सर्वसम्मति से अपनाने के लिए मिलकर एक साथ आए?

यह बिजनेस मॉडल में बदलाव नहीं है। हां, सबस्क्रिप्शन मॉडल पर इंडस्ट्री निश्चित रूप से एक साथ है और मुझे पूरा विश्वास है कि प्रत्येक प्रिंट पब्लिकेशन जल्द ही अपनी योजनाओं की घोषणा करेगा। अधिकांश तो ऐसा कर भी चुके हैं।  

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रूबिका लियाकत ने बताया, किस तरह मिली न्यूज एंकर बनने की प्रेरणा

ABP News की जानी-मानी सीनियर न्यूज एंकर रूबिका लियाकत ने L&T Mutual Fund के सीईओ कैलाश कुलकर्णी के साथ एक बातचीत में तमाम पहलुओं पर अपने विचार रखे

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Friday, 04 December, 2020
Last Modified:
Friday, 04 December, 2020
rubika

L&T Mutual Fund The Winner’s Circle  के वर्चुअल कॉन्क्लेव 2020 के सातवें एडिशन के तहत पत्रकारिता विषय पर ‘एबीपी न्यूज’ (ABP News) की जानी-मानी सीनियर न्यूज एंकर रूबिका लियाकत ने L&T Mutual Fund के सीईओ कैलाश कुलकर्णी के साथ एक बातचीत में तमाम पहलुओं पर अपने विचार रखे। 

‘CUT THROUGH THE NOISE’  विषय के तहत एक दिसंबर की दोपहर चार बजे से हुए इस आयोजन के दौरान रूबिका ने मीडिया इंडस्ट्री में अब तक के उनके सफर, इस मुकाम तक पहुंचने में उन्हें किस प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ा जैसे कई प्रमुख बिंदुओं पर भी बात की।

इस बातचीत के दौरान रूबिका का कहना था, ‘मेरे माता-पिता दोनों उदयपुर में हिन्दुस्तान जिंक लिमिटेड में काम करते थे। मेरे पिता एक खिलाड़ी थे और वह हिन्दुस्तान जिंक लिमिटेड में स्पोर्ट्स कोटा के तहत गए थे। ग्रेजुएशन करने के बाद ही उनकी नौकरी लग गई थी। मेरी मां ने उस समय एमएससी तक की पढ़ाई की थी और वह भी वहीं नौकरी करती थीं। पिताजी मेरी मां की प्रतिभा को पहचानते थे और उन्होंने ही दबाव बनाया कि यदि मेरी मां और पढ़ाई करें तो उन्हें हिन्दुस्तान जिंक लिमिटेड में प्रमोशन मिल सकता है और जीवन पहले से बेहतर हो सकता है। उस समय मेरा और मेरी बहन का जन्म हो चुका था।’

रूबिका के अनुसार, ‘पिताजी ने मां को समझाया कि आपने एमएससी कर ली है और यदि पीएचडी कर ली तो प्रमोशन आसान हो जाएगा। यह सुनकर मेरी मां ने यह कहते हुए कि दो बेटियां हो चुकी हैं। परिवार की और ऑफिस की जिम्मेदारी के चलते आगे पढ़ाई करना मुश्किल होगा, इस बात को गंभीरता से नहीं लिया। ऐसे में मेरे पिता ने कहा कि आप अपने पिता के यहां जाकर पीएचडी कर सकती हैं। लेकिन मेरी मां ने इससे इनकार कर दिया और अपने घर पर रहकर ही पीएचडी का निर्णय लिया। इसके बाद पिताजी ने ऑफिस के साथ-साथ हमारे ब्रेकफास्ट से लेकर स्कूल जाने तक की जिम्मेदारी संभाली और तब मेरी मां ने पीएचडी पूरी की। ऐसे में मैंने बचपन में ही मां की पीएचडी के लिए अपने पिता को जिस तरह कड़ी मेहनत करते हुए देखा और जिस तरह पिता ने हमें पढ़ाया, उसने बचपन से ही मेरे मन से लड़का-लड़की का अंतर खत्म कर दिया। मैंने कभी ये नहीं सोचा कि मैं लड़की हूं तो यह नहीं कर सकती। खास बात यह रही कि मेरी मां ने अपनी पीएचडी पूरी की और वहां उन्हें प्रमोशन मिला। करीब 200 लोग उनके मातहत काम करते थे।’

रूबिका के अनुसार, माता-पिता ने हमें बचपन से यही सिखाया कि ऐसी कोई चीज नहीं है, जिसे आप नहीं कर सकते हैं। उनका कहना था कि आप महिला हैं या पुरुष इससे फर्क नहीं पड़ता, सफलता के लिए जुनून और पैशन होना चाहिए।

कैलाश कुलकर्णी द्वारा यह पूछे जाने पर कि आपने जर्नलिज्म को ही क्यों चुना, क्या इसकी प्रेरणा आपको अपने माता-पिता से मिली? रूबिका लियाकत ने बताया, ‘जैसा कि मैने बताया कि मेरे पिताजी रणजी प्लेयर्स सलेक्टर थे, मेरी मां साइंटिस्ट, मेरी दादी काफी धार्मिक महिला थीं, मेरे चाचाजी उस समय मॉडलिंग की दुनिया में काम की तलाश में थे। ये चारों अलग विचारधारा के थे, लेकिन रात को टीवी देखते समय सभी साथ होते थे। उस समय मैं सात-आठ साल की रही होंगी, जब मैंने देखा कि ये चारों लोग टीवी काफी ध्यान से देखते हैं। उस समय मैंने तय कर लिया था कि इन चारों में से मुझे कुछ नहीं बनना, मैं सलमा सुल्तान एंकर की तरह बनना चाहती थी, जिसे हमारे परिवार के चारों सदस्य एक साथ बैठकर गंभीरता से सुना करते थे। हालांकि, मुझे ये नहीं पता था कि जिसे हमारे परिवार के सभी लोग इतनी गंभीरता से सुनते हैं, उसे पत्रकार कहते हैं या न्यूज एंकर कहते हैं, लेकिन मैं उसी तरह बनना चाहती थी, जिसे पूरी दुनिया इतनी गंभीरता से सुनती है। कहते हैं कि जिस चीज को शिद्दत से चाहो तो पूरी कायनात उसे आपसे मिलाने में लग जाती है, लगता है कि मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ है।’ रूबिका का कहना था कि मेरी सलमा सुल्तान से कभी मुलाकात नहीं हो पाई, लेकिन कोविड का दौर गुजरने के बाद मैं उनसे जरूर मिलूंगी।

मीडिया के क्षेत्र में खासकर पिछले दस वर्षों (2010 से 2020) तक आए बड़े बदलावों के बारे में रूबिका का कहना था कि पहले के जो एंकर होते थे उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता था कि खबर कितनी खुशी वाली अथवा दुख वाली है, उन्हें अपने इमोशन न दिखाते हुए खबर पढ़ते समय सिर्फ अपनी बॉडी लैंग्वेज को मेंटेन करना होता था। मैंने पिछले दस सालों में खुद में जो बदलाव देखा है वह यह है कि यदि मैं किसी से नाराज होती हूं या किसी खबर से बहुत ज्यादा दुखी होती हूं तो मैं अपने इमोशन दिखा सकती हूं। यह बहुत महीन रेखा है, जिस पर मंथन हो रहा है। हमारे देश में लोगों के तमाम तरह के विचार हैं, आज के दौर में तमाम लोग अपने-अपने विचार रख रहे हैं। कुछ एक तरफ होते हैं, तो अन्य दूसरी तरफ। मुझे पूरी उम्मीद है कि आने वाले समय में हम एकमत होंगे।

वहीं जब उनसे बायस्ड होने पर सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि जब लोग आपसे प्यार और आप पर विश्वास करने लग जाते हैं, तो ये आपके के लिए सबसे बड़ा हथियार बन जाता है और कोई भी आपको छू नहीं पाता है। आज पत्रकारिता बदल गई है और समय भी बहुत ज्यादा बदल गया है। हर कोई क्रेडिबिलिटी इश्यू पर सवाल उठाता है। एक समय था जब आतंकवादी घटना होती थी, जिसमें कुछ लोग मारे जाते थे, तो खबर दे दी जाती थी कि आतंकवादी घटना हुई है...  इतने लोग मारे गए हैं... उच्च स्तरीय बैठक बुलाई जा रही है... एसआईटी बैठा दी गई है... लेकिन अब चीजें बदल गई हैं। अब जब लोग कहते हैं कि आपको अनबायस्ड रहना होगा, तो मैं उनसे माफी मांगकर ये पूछना चाहती हूं कि मैं किसके लिए बायस्ड हूं। वैसे बायस्ड शब्द को मैं सही मानती हूं। मैं एक ही प्लेटफॉर्म पर बुरे और सही को कैसे रख सकती हूं। मैं चौथा स्तम्भ हूं लेकिन चौथे स्तम्भ की ये जिम्मेदारी है कि जो सही है उसको रखें और उसकी तारीफ करें। लेकिन जो गलत है उसे क्यों रखें। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी ने अंग्रेजों की लड़ाई और हिन्दुस्तान की लड़ाई को क्या एक प्लेटफॉर्म पर रखा था। महात्मा गांधी की जब पत्राकारिता शुरू हुई थी और जिस अंदाज से वे आगे बढ़े थे उसके पीछे एक मिशन था। इसलिए मेरा मिशन है कि मेरा हिन्दुस्तान उनका हिन्दुस्तान बने और ऐसा बने जिसका सपना हम सभी देखते हैं। वैसे यह किन लोगों के विचार हैं जो मुझे अनबायस्ड रहने की नसीहत देते हैं। मैं अपने देश का चौथा स्तम्भ हूं और अपने देश के प्रति वो तमाम चीजें रखूंगी। फिर चाहे वह बायस्ड तरीका ही क्यों न हो। मेरे हिन्दुस्तान के लिए जो बढ़िया है वो रखूंगी। मैं पत्रकार हूं और मानवता के लिए काम करती हूं। मानवता के लिए यदि कोई सबसे मजबूत स्तम्भ है, तो वह हमारा हिन्दुस्तान है और मैं हिन्दुस्तान की ओर से एक पत्रकार हूं और इससे पहले एक भारतीय हूं। इसलिए जिन्हें लेफ्ट या राइट विचारधारा में पड़ना हैं, वे पड़ें। मेरी विचारधारा साफतौर पर ये कहती है कि मुझे उस ट्रैक पर चलना है जो हमारे देश के लिए बेहतर हो। फिर चाहे लेफ्ट का कोई चंक हो, यदि वह मेरे हिन्दुस्तान के लिए बेहतर है तो मैं उनका स्वागत करती हूं।                 

‘एबीपी न्यूज’ (ABP News) की जानी-मानी सीनियर न्यूज एंकर रूबिका लियाकत ने पत्रकारिता की दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बनाई है। अपने बेबाक शैली से रूबिका ने दर्शकों के दिलों पर अपनी खास छाप छोड़ी है। उदयपुर (राजस्थान) में जन्मीं रूबिका ने मुंबई यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया है। रूबिका ने पत्रकारिता में अपने करियर की शुरुआत उदयपुर में ‘चैनल24’ (Channel 24) के साथ की थी। पूर्व में वह ‘न्यूज24’ (News 24) और ‘जी न्यूज’ (Zee News) में भी अपनी जिम्मेदारी निभा चुकी हैं। रूबिका लियाकत उन गिने-चुने पत्रकारों में शामिल हैं, जिन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इंटरव्यू किया है। उनके कार्यक्रम ‘मास्टरस्ट्रोक’ को काफी देखा जाता है। सोशल मीडिया पर भी उनके प्रशंसकों की बड़ी संख्या है।

पूरा इंटरव्यू आप यहां देख सकते हैं-

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BBC के अधिकारियों ने बताया, लोग क्यों देते हैं उनके कार्यक्रमों को तवज्जो

‘बीबीसी ग्लोबल न्यूज’ के मैनेजिंग डायरेक्टर राहुल सूद और ‘बीबीसी वर्ल्ड सर्विस’ की हेड रूपा झा ने हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ से तमाम पहलुओं पर बातचीत की।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 02 December, 2020
Last Modified:
Wednesday, 02 December, 2020
BBC

प्रादेशिक भाषाओं पर फोकस करने और स्पीड से पहले तथ्यों को रखने की एडिटोरियल पॉलिसी के कारण भारत जैसे मार्केट में ‘बीबीसी इंडिया’ (BBC India) की ग्रोथ लगातार बढ़ रही है। ‘बीबीसी ग्लोबल न्यूज’ (BBC Global News) के मैनेजिंग डायरेक्टर (India and South Asia) राहुल सूद और ‘बीबीसी वर्ल्ड सर्विस’ (BBC World Service) की हेड (Indian Languages) रूपा झा ने हाल ही में हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) से इन मुद्दों के साथ तमाम पहलुओं पर बातचीत की।

प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

कंटेंट के उपभोग की बात करें तो बीबीसी न्यूज के लिए भारत फिर एक प्रमुख बाजार के रूप में उभरा है। आपकी नजर में इस ग्रोथ के पीछे क्या कारण है?

रूपा: पिछले कुछ वर्षों में भारतीय भाषाओं में किए गए विस्तार का इसमें काफी योगदान है। बीबीसी की कोर वैल्यू यानी मूल्य और निष्पक्षीय ढांचा भारतीय ऑडियंस की अपेक्षाओं पर खरा उतरा है। ऑडियंस में हुई ग्रोथ बताती है कि वे मार्केट में फैल रहीं तमाम फेक न्यूज और ओपिनियन के बीच न्यूज और अपडेट्स किसी विश्वसनीय मीडिया सोर्स से लेना चाहते हैं। 

रियलिटी चेक और फैक्ट चेक को लेकर बीसीसी के कार्यक्रमों ने दिखा दिया है कि लोग उन खबरों को ज्यादा तवज्जो देते हैं, जिन पर वे भरोसा कर सकते हैं। जमीनी स्तर और स्थानीय राजनीति भारतीय समाचारों पर हावी है। हालांकि, दुनियाभर की न्यूज आजकल प्रासंगिक हो रही हैं, क्योंकि इससे दुनियाभर से ‘समाधान’ भी मिलता है। कोरोनावायरस को लेकर की गई स्पेशल प्रोग्रामिंग इसका सबूत है।

राहुल: असल में भरोसा और विश्वसनीयता दो मुख्य बाते हैं। इस वैश्विक महामारी में लोग भरोसेमंद और विश्वसनीय न्यूज प्लेटफॉर्म्स तलाश रहे हैं। मोबाइल डिवाइस पर बीबीसी हिंदी भारत में न्यूज कंटेंट को इस्तेमाल करने वाले यूजर्स के बीच टॉप-5 में शामिल है।

आप रीजनल यानी प्रादेशिक कंटेंट पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। क्या सिर्फ हिंदी ही ऑडियंस को आकर्षित कर रही है। अन्य भाषाओं के बारे में आपका क्या कहना है?

रूपा: हम बड़े शहरों से आगे निकलकर युवाओं और महिलाओं पर फोकस कर रहे हैं। बीबीसी भारत में नौ भाषाओं पर काम करती है। हिंदी और अंग्रेजी के अलावा  हम मराठी, गुजराती, पंजाबी, तमिल, तेलुगु, बंगाली और उर्दू को कवर करते हैं। न्यू लैंग्वेज सर्विसेज, नया स्टाफ, नई प्रोग्रामिंग और नए स्टूडियो के साथ बीबीसी ने भारत में बड़ा निवेश किया है। भारत के प्रति इस प्रतिबद्धता ने क्षेत्र में 250 से अधिक नए रोजगार सृजित किए हैं और यह केवल नई भाषाओं को शामिल करने के बारे में नहीं है,बल्कि हमारे ऑपरेशंस में बदलाव के बारे में है, इसलिए हम डिजिटल रूप से और मोबाइल फर्स्ट पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं।

हम साउथ एशिया के लिए दिल्ली को एक डिजिटल पावर हाउस और डिजिटल हब बना रहे हैं। बीबीसी के पूर्व महानिदेशक ने घोषणा की है कि वर्ष 2022 तक इसकी ग्लोबल सर्विस के लिए ऑडियंस की संख्या 500 मिलियन तक पहुंच सकती है।

राहुल: हम जानते हैं कि भारत जैसे मार्केट में काफी संभावना हैं। यहां 1.2 बिलियन की जनसंख्या में इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों की संख्या 462 मिलियन है। इस पूल में 300 मिलियन से ज्यादा स्थानीय भाषा के यूजर्स हैं। वर्ष 2021 तक इनकी संख्या 300 मिलियन से बढ़कर 500 मिलियन से ज्यादा होने की उम्मीद है। ऐसे में वर्ष 2021 तक यहां करीब 735 मिलियन इंटरनेट यूजर्स हो सकते हैं।

भारत भी एक काफी प्रतिस्पर्धी मार्केट है। ऐसे में जब एडिटोरियल कंटेंट की बात आती है तो आप कैसे इसे दूसरों से अलग कहेंगे?

रूपा: जब तक हमें विश्वास नहीं होता, तब तक हम लोगों में खबरों को ब्रेक करने की जल्दबाजी नहीं रहती है। हम हो-हल्ला नहीं करते हैं। हम अपने दर्शकों को बहुत ज्यादा समझा सके और तथ्यपूर्ण जानकारी दे सके, इसके लिए ही पत्रकारिता में निवेश करते हैं। हम भारत में न्यूज प्लेटफार्म्स पर विश्वास दोबारा ला सकें, इस पर लगातार काम करते रहेंगे। हम किसी सैन्य ऑपरेशन के दौरान ज्यादा से ज्यादा खबरें देते हैं। हम ग्राउंड रिपोर्ट को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं।

राहुल: रेस में फर्स्ट आने की बात करें तो, 'सही बनना' (Being right) फर्स्ट बनने से ज्यादा जरूरी है।

भारत जैसे बाजार को ऑपरेट करने में बड़ी चुनौतियां क्या हैं?

रूपा: भारत में खबरें बहुत ही ज्यादा ध्रुवीकृत (पोलराइज्ड) होती हैं और यह बहुत ही ज्यादा भीड़-भाड़ वाला मार्केट है, जो हमें अपने दर्शकों की सही जरूरतों को पूरा करने का मौका देता है जो तेजी से डिजिटल की ओर बढ़ रहे हैं।

कोविड की वजह से डिजिटल पब्लिकेशंस के पाठकों की संख्या बढ़ी है। बीबीसी ग्लोबल न्यूज की रणनीति क्या है, जब भारत में बढ़ते मार्केट शेयर की बात होती है?

राहुल: बीबीसी जो भी करता है दिल से करता है और उसके दिल में डिजिटल है। हम विश्व स्तर पर और भारत में रिकॉर्ड ग्रोथ नंबर्स देख रहे हैं। बीबीसी की भरोसेमंद वैल्यू और निष्पक्षता ऐसी है, कि वह ऐसे समय पर जब गलत सूचनाओं और भड़काउ खबरों का अंबार लगा हुआ है, सही रिपोर्टिंग के जरिए तथ्यपरक खबरों के साथ एडवर्टाइजर्स के लिए ब्रैंड सेफ एनवॉयरमेंट सुनिश्चित करता है।

उद्योग अनुसंधान निकाय Ipsos ने नवंबर 2020 की शुरुआत में ये घोषणआ की कि टीवी और ऑनलाइन दोनों पर ही बीबीसी भारत में अंग्रेजी भाषा में नंबर एक अंतरराष्ट्रीय न्यूज ब्रैंड है। बीबीसी का 24 घंटे का अंतरराष्ट्रीय न्यूज चैनल पिछले एक साल में अपने किसी भी इंटरनेशनल कॉम्पटीटर्स से सबसे ज्यादा देखा गया। और यह पिछले वर्ष का सबसे तेजी से बढ़ने वाला सामान्य अंग्रेजी भाषा का न्यूज चैनल है। इस बात का भी खुलासा हुआ कि बीबीसी ऑनलाइन यूजर्स के साप्ताहिक आंकड़ों में भी नंबर-1 अंतरराष्ट्रीय ऑनलाइन न्यूज प्लेटफॉर्म है। कॉमस्कोर डेटा के अनुसार सितंबर, 2020 में बीबीसी पोर्टल ने ट्रैफिक में सबसे ज्यादा वृद्धि दर्ज की (लगभग 40 मिलियन यूनीक विजिजर्स)। भारत में सभी जनरल न्यूज प्लेटफॉर्म्स की तुलना में यूनिक बीबीसी प्लेटफॉर्म पर  विजिटर्स की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई और यह बढ़त सितंबर, 20 में हुई ग्रोथ और साल दर साल हुई ग्रोथ की वजह से हुई है।

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TRP-सोशल मीडिया को लेकर उठ रहे सवालों का सूचना प्रसारण मंत्री ने यूं दिया जवाब

‘न्यूज18 इंडिया’ पर वरिष्ठ टीवी पत्रकार अमिश देवगन से बातचीत में सूचना प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कई अहम मुद्दों पर रखी अपनी राय

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Friday, 27 November, 2020
Last Modified:
Friday, 27 November, 2020
Amish Devgan

डिजिटल पर जो भी कंटेंट जनरेट होता है उसकी देखभाल करना भी अब जरूरी हो गया है, फिर चाहे न्यूज पोर्टल्स ही क्यों न हो और इसके लिए हमारी तैयारी चल रही है।’ यह बात केंद्रीय सूचना-प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने वरिष्ठ टीवी पत्रकार और न्यूज18 (हिंदी) के मैनेजिंग एडिटर अमिश देवगन द्वारा पूछे गए एक सवाल के जवाब में कही। इस दौरान सूचना-प्रसारण मंत्री ने अमिश देवगन के कार्यक्रम ‘आरपार’ और उनके एंकरिंग की तरीफ भी की। उन्होंने अमिश देवगन से कहा कि वे जिस जोशीले अंदाज से एंकरिंग करते हैं, उससे एक अच्छी डिबेट होती है। इसके लिए उन्होंने अमिश देवगन को बधाई भी दी।

इसके बाद सवाल-जवाबों का सिलसिला शुरू हुआ और अमिश देवगन ने सूचना-प्रसारण मंत्री से एक-एक कर कई ऐसे सवाल पूछे, जो हाल ही में चर्चा का विषय बने हुए हैं। अपने इंटरव्यू के दौरान अमिश देवगन ने टीआरपी के मुद्दे पर भी उनसे सवाल पूछा। उन्होंने पूछा कि टीआरपी का विवाद बहुत बड़ा है, इस मामले पर सरकार की सोच क्या है? इस सवाल का जवाब देते हुए केंद्रीय सूचना-प्रसारण मंत्री ने कहा कि ब्रॉडकास्टर्स और एडवर्टाइजर्स दो लोग होते हैं, जिन्हें विज्ञापन लेना और देना है। लिहाजा वे जानना चाहते हैं कि कौन सा कार्यक्रम और चैनल लोकप्रिय है। इसके लिए ब्रॉडकास्टर्स और एडवर्टाइजर्स ने ही साथ आकर टीआरपी की रचना की है। सरकार ने दोनों को सिर्फ समर्थन दिया है, पर ये सरकार की मान्यता से ही यह चल रहा है। लिहाजा अब सरकार ने इसके लिए कमेटी भी बनायी है, ताकि सही रास्ता बताया जा सके। इसका मैनिपुलेशन की आशंका को खत्म किया जा सके, जोकि मुख्य काम है। उन्होंने कहा कि अभी नई टेक्नोलॉजी तैयार है, जिससे ज्यादा लोगों की पसंद को देखा जा सकेगा, ताकि सही नतीजे आएंगे, ऐसा मुझे विश्वास है।

जब अमिश देवगन ने उनसे पूछा किया क्या वर्तमान में चल रहे सिस्टम को पूरी तरह से रिप्लेस कर दिया जाएगा, इस पर केंद्रीय मंत्री ने जवाब दिया कि ये हम नहीं तय करते हैं बल्कि एसोसिशन तय करती हैं, हम ब्रॉकास्टर्स के नाते जाते हैं। सरकार की एक भूमिका है। कमेटी जो रिकमेंड करेगी, उसके बाद हम करेंगे। रिकमेन्डेशन के आधार पर ही काम करेंगे। हमारी कमेटी टेक्नोलॉजी और टेक्नीशियंस की बनी है और उसके द्वारा ही हम टेक्नोलॉजिकल प्रिंसिपल सॉल्यूशन देंगे, जिसके आधार पर काम होगा। इस तरीके से सबको सुकून मिलेगा कि अब सही तरीके से मापन हो रहा है। इसकी रिपोर्ट एक महीने में आ जाएगी।

वहीं अमिश देवगन ने पूछा कि ये मुद्दा विवादास्पद है, क्योंकि मुंबई पुलिस ने भी एक एफआईआर रजिस्टर कर रखी है। प्रवर्तन निदेशालय और सीबीआई ने भी केस दर्ज कर रखा है। इस पर आप क्या कहना चाहेंगे, तो उन्होंने कहा कि यह एफआईआर का मुद्दा है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने गाइडेंस दिया है कि किसी एक चैनल या एक व्यक्ति को टारगेट करके एफआईआर नहीं होनी चाहिए। एफआईआर एक सामान्य कानूनी प्रक्रिया है, इस पर हम क्या कहेंगे, लेकिन न्याय कैसे होगा ये मुद्दा है और इसके बारे में सुप्रीम कोर्ट ने सभी कोर्टों का मार्गदर्शन किया है।

ओटीटी प्लेटफॉर्म्स को लेकर भी अमिश देवगन ने केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री से सवाल किया  कि अब ओटीटी प्लेटफॉर्म्स आपके मंत्रालय की निगरानी में आ गए हैं, क्या हम ये मान सकते हैं?  इस पर उन्होंने कहा कि हां, डिजिटल पर जो भी कंटेंट जनरेट होता है उसकी देखभाल करना भी अब जरूरी हो गया है, फिर चाहे न्यूज पोर्टल्स ही क्यों न हो और इसके लिए हमारी तैयारी चल रही है। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स को लेकर हमारे पास सैकड़ों शिकायत आती हैं, क्योंकि ओटीटी पर कोई सेंसर बोर्ड नही है। जैसाकि अन्य फिल्मों को लेकर होता है कि भारत में फिल्में रिलीज करनी है तो सेंसर बोर्ड से सर्टिफिकेट लेना होता है, लेकिन ओटीटी के लिए ऐसा नहीं है। इसलिए इसके लिए अब सेंसर बोर्ड लाना है या सेल्फ रेगुलेशन लाना है ये चॉइस है, लेकिन कुछ न कुछ तो व्यवस्था करनी ही पड़ेगी। मै भी ओटीटी पर सीरियल देखता हूं, यहां हर कैटगरी के सीरियल्स और फिल्में होती हैं। लेकिन ये जो बहुत बुरी वाली कैटेगरी है, इसको लेकर लगातार शिकायतें मिल रही हैं। इसके लिए मेरा मानना है कि कुछ न कुछ व्यवस्था तैयार करनी चाहिए और हम करेंगे।

इसके बाद अमिश देवगन ने उनसे अगला सवाल किया कि नेटफ्लिक्स के ऊपर हाल ही में एक एफआईआर दर्ज की गई है, जिस पर बवाल मचा हुआ है। इस पर एक वर्ग सरकार पर आरोप लगा रही है कि सरकार सब कुछ कंट्रोल करना चाहती है, इस पर आपकी क्या राय है? इसका जवाब देते हुए जावड़ेकर ने कहा कि देखिए, ये वर्ग सेंसर बोर्ड के खिलाफ कुछ नही बोलता है। हमारे यहां आजादी का गला नही घोंटा जा रहा है। कोई भी व्यवस्था करना, आजादी का गला घोंटना नही है। 

अमिश देवगन के यह पूछे जाने पर कि केरल सरकार ने हाल ही में सोशल मीडिया पर पाबंदी लगाने वाला एक अध्यादेश जारी किया, जिसे विरोध के बाद वापस भी ले लिया गया। इसके बाद केरल सरकार की सोच पर काफी सवाल उठे, क्या सोशल मीडिया पर पाबंदी जरूरी है, इस पर आपकी क्या राय है, प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि मैं सोशल मीडिया पर पाबंदी की जरूरत नहीं मानता, लेकिन सोशल मीडिया या कोई भी मीडिया जिम्मेदारी से चलने चाहिए, क्योंकि आजादी जिम्मेदारी से ही और जिम्मेदार पत्रकार से ही सार्थक होती है। सोशल मीडिया पर तो कोई भी कुछ लिख सकता है, यहां हर व्यक्ति पत्रकार होता है, इसलिए एक झूठ पल भर में इतना प्रचारित हो जाता है कि वही सच लगने लगता है, जिसके बाद सभी जगह से वही मैसेज आने शुरू हो जाते हैं, जोकि गलत है। इसलिए सच दिखाना चाहिए, गलत नहीं। इसलिए जो कंटेंट जनरेट करता है, ये उसकी जिम्मेदारी है कि उसे सच को समझना चाहिए। 

सूचना-प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर का पूरा इंटरव्यू आप यहां देख सकते हैं-

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मीडिया में इस 'बर्बादी' के लिए जिम्मेदार कौन: सुप्रिया श्रीनेत

‘गवर्नेंस नाउ’ के एमडी कैलाशनाथ अधिकारी के साथ एक बातचीत में कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता और पूर्व पत्रकार सुप्रिया श्रीनेत ने तमाम पहलुओं पर अपने विचार रखे

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 26 November, 2020
Last Modified:
Thursday, 26 November, 2020
Supriya-Shrinate

 

आर्थिक विकास में कमी, बेरोजगारी और छंटनी जैसे तमाम मुद्दों पर नरेंद्र मोदी सरकार को घेरते हुए कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत का कहना है कि देश में कोविड महामारी आने से पहले ही अर्थव्यवस्था लगातार आठ तिमाहियों से नीचे जा रही थी।

‘गवर्नेंस नाउ’ (Governance Now) के एमडी कैलाशनाथ अधिकारी के साथ एक बातचीत में पूर्व पत्रकार सुप्रिया श्रीनेत का कहना था कि एक तरफ दुनिया की अर्थव्यवस्था ऊपर जा रही थी, वहीं इसके विपरीत भारत की अर्थव्यवस्था नीचे गिर रही थी। मीडिया का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि यहां तमाम टेक्निशियंस, कैमरापर्सन्स, प्रड्यूसर्स, प्रॉडक्शन असिस्टेंट्स और पत्रकारों समेत कई लोगों की बड़े पैमाने पर छंटनी हुई है। उन्होंने कहा, ‘इन लोगों को नौकरी नहीं मिल रही है। आखिर इस बर्बादी के लिए कौन जिम्मेदार है? भारतीय अर्थव्यवस्था की इस स्थिति के लिए आखिर कौन जिम्मेदार है?’

पब्लिक पॉलिसी प्लेटफॉर्म पर ‘विजिनरी टॉक सीरीज’ (Visionary Talk series) के तहत होने वाले इस वेबिनार के दौरान सुप्रिया श्रीनेत ने कहा, ‘भारतीय अर्थव्यवस्था के गिरने की शुरुआत सरकार की अक्षमता और गलत फैसले लेने के कारण हुई। वित्तीय वर्ष 2017 (FY 2017) से वित्तीय वर्ष 2020 (FY 2020) तक आर्थिक विकास की दर यानी जीडीपी का ग्रोथ रेट आधा हो गया। 8.2 प्रतिशत से घटकर वित्तीय वर्ष 2020 में यह 4.3 प्रतिशत पर आ गया। वित्तीय वर्ष 2021 में यह और प्रभावित होगी। यहां तक कि कोविड से पहले ही भारतीय अर्थव्यवस्था लगाता आठ हफ्तों से फिसलने लगी थी। एक तरफ दुनिया की जीडीपी का ग्रोथ रेट बढ़ रहा था, जबकि भारत का नीचे गिर रहा था।’ 

नरेंद्र मोदी सरकार को घेरते हुए श्रीनेत का कहना था कि कोविड से पहले भी नोटबंदी के करण देश में बेरोजगारी 45 साल के उच्चतम स्तर पर थी और जल्दबाजी में जीएसटी लागू करने से आर्थिक तौर पर बर्बादी हुई। जीडीपी ग्रोथ के अलावा जीडीपी वॉल्यूम यानी जीडीपी की मात्रा भी कम हो रही है। आर्थिक अवसर, रोजागर सृजन, स्वरोजगार और मजदूरी में कमी आ रही है।

सरकार के 20 लाख करोड़ रुपए के आत्मनिर्भर पैकेज के बारे में जिसे सरकार देश की जीडीपी का 10 प्रतिशत बता रही है, श्रीनेत ने कहा कि जब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम, तमाम शोधकर्ताओं, वैश्विक पर्यवेक्षकों, अर्थशास्त्रियों और यहां तक कि सरकारी कर्मचारियों ने बैठकर गणना की तो पाया कि यह खर्च (fresh expenditure outlay) वास्तव में 1.86 लाख रुपए था, जो जीडीपी के एक प्रतिशत से भी कम है। बाकी सब फरवरी 2020 में घोषित केंद्रीय बजट का नवीनीकरण था।

इस बातचीत के दौरान श्रीनेत ने इस बात को लेकर भी सरकार की आलोचना की कि लोन के लिए जोर दिया जा रहा है। जब तमाम लोगों में अपनी नौकरी को लेकर अनिश्चितता है और उनकी सैलरी आधी तक घट गई है, ऐसे में क्या ये लोग लोन लेंगे? सरकार ने एमएसएमई (MSMEs) सेक्टर को 3 लाख करोड़ रुपए के ऋण आवंटित किए हैं, इस धन का आधा हिस्सा अभी भी सरकार के पास पड़ा है, क्योंकि लोगों को पता नहीं है कि वर्तमान आर्थिक स्थिति में वे इन लोन को कैसे चुकाएंगे?

सुप्रिया श्रीनेत का कहना था कि इसके बजाय सरकार को खपत को बढ़ावा देना चाहिए, जिससे उत्पादन बढ़ेगा और अधिक लोगों को रोजगार मिलेगा और इसके परिणामस्वरूप रोजगार सृजन होगा। अन्यथा आर्थिक पुनरुद्धार केवल सपना बनकर रह जाएगा।

जबरन धर्म परिवर्तन या कथित लव-जेहाद के खिलाफ अध्यादेश को उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा मंजूरी दिए जाने के सवाल पर श्रीनेत का कहना था कि मध्य प्रदेश में वर्ष 1968 में जबरन अथवा धोखे से धर्म परिवर्तन को रोकने के लिए धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम के नाम से कानून बनाया गया था। जिसमें साल 2013 में संशोधन कर धर्मांतरण से पहले राज्य सरकार से मंजूरी लेना अनिवार्य किया गया। वहीँ जबरन धर्म परिवर्तन कराने पर इसमें सजा का प्रावधान किया गया। इस तथ्य के बावजूद कि जबरन धर्म परिवर्तन के खिलाफ भारतीय दंड संहिता के कम से कम 10 खंड हैं, जिन्हें लागू किया जा सकता है। ऐसे में सरकार ने मौजूदा कानूनों पर भरोसा क्यों नहीं किया। उन्होंने कहा कि एक युवा भारतीय के रूप में वह इसे हास्यास्पद मानती हैं कि दो युवा ये तय नहीं कर सकते कि वे किससे शादी करना चाहते हैं।

इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा 11 नवंबर को दिए गए उस फैसले का उदाहरण देते हुए जिसमें कोर्ट ने कहा है (अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने का अधिकार, इसके बाद भी कि आपने किस धर्म को स्वीकार किया है, जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार में अंतर्निहित है) श्रीनेत का कहना था कि तनिष्क का विज्ञापन भारतीय संस्कृति की बहुलता को दर्शाने वाला था।

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भारत-ऑस्ट्रेलिया क्रिकेट सीरीज में रेवेन्यू को लेकर SONY के राजेश कौल ने कही ये बात

‘एक्सचेंज4मीडिया’ से बातचीत में ‘सोनी पिक्चर्स नेटवर्क्स इंडिया’ के चीफ रेवेन्यू ऑफिसर (डिस्ट्रीब्यूशन) और हेड (स्पोर्ट्स बिजनेस) राजेश कौल ने ऐड रेवेन्यू और सबस्क्रिप्शन रेवेन्यू को लेकर चर्चा की।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Monday, 23 November, 2020
Last Modified:
Monday, 23 November, 2020
Rajesh Kaul

भारत-ऑस्ट्रेलिया के बीच 27 नवंबर से शुरू होने वाली क्रिकेट सीरीज के लिए 15-16 स्पॉन्सर्स को अपनी झोली में डालने के बाद ‘सोनी पिक्चर्स स्पोर्ट्स नेटवर्क्स’ (SPSN) इसके प्रसारण के लिए पूरी तरह तैयार है। इस सीरीज का Sony Ten 1, Sony Ten 3 और Sony Six चैनल्स पर लाइव प्रसारण किया जाएगा। लगभग नौ महीने के ब्रेक के बाद विराट कोहली की टीम इंडिया के लिए यह पहली अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट सीरीज़ होगी, जिसमें तीन टी20, तीन वनडे और चार टेस्ट मैच खेले जाने हैं। हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ एक बातचीत में ‘सोनी पिक्चर्स नेटवर्क्स इंडिया’ के चीफ रेवेन्यू ऑफिसर (डिस्ट्रीब्यूशन) और हेड (स्पोर्ट्स बिजनेस) राजेश कौल ने इस सीरीज के दौरान मिलने वाले ऐड रेवेन्यू और सबस्क्रिप्शन रेवेन्यू को लेकर विस्तार से चर्चा की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:  

कोविड-19 के कहर के कारण यह साल ब्रॉडकास्टर्स समेत लगभग प्रत्येक बिजनेस के लिए मुश्किलों भरा रहा है। ऐसे में ऐड रेवेन्यू के मामले में आपको इस सीरीज से क्या उम्मीदें हैं?

लॉकडाउन के बाद हमने स्पोर्ट्स इवेंट को लेकर व्युअरशिप में काफी इजाफा देखा है, यहां तक कि उन सीरीज में भी, जिनमें भारत शामिल नहीं रहा है। ऐसे में भारत-ऑस्ट्रेलिया सीरीज को लेकर भी हमें इसी तरह का ट्रेंड बरकरार रहने की उम्मीद है। 

इस सीरीज को लेकर लोगों के बीच काफी चर्चा है और हम सब इसे अपने नेटवर्क, नेटवर्क के बाहर, रीजनल चैनल्स पर, प्रिंट और डिजिटल पर प्रमोट करने जा रहे हैं। इसके साथ ही यह सीरीज नौ महीने के ब्रेक के बाद हो रही है, ऐसे में मुझे उम्मीद है कि पिछली बार के मुकाबले व्युअरशिप के मामले में यह काफी आगे निकलेगी।

हमें डिजिटल (SonyLIV) और अन्य चैनल्स पर एडवर्टाइजर्स और स्पॉन्सर्स की ओर से भी काफी अच्छी प्रतिक्रिया मिली है। व्युअरशिप और एड रेवेन्यू के मामले में यह सीरीज हमारे अनुमान से कहीं ज्यादा बेहतर होने जा रही है। एडवर्टाइजर्स और स्पॉन्सरशिप के अलावा हमें सबस्क्रिप्शन बिजनेस में भी बढ़ोतरी की उम्मीद है। इन सबका वास्तविक प्रभाव तो सीरीज शुरू होने के 10-15 दिन बाद ही पता चलेगा, लेकिन शुरुआती ट्रेंड्स काफी सकारात्मक हैं। हमें उम्मीद है कि सीरीज के अंत तक हमें 15-20 प्रतिशत का इजाफा देखने को मिलेगा।

लॉकडाउन के दौरान डिजिटल के उपभोग (consumption) में कई गुना बढ़ोतरी हुई है। क्या आपको लगता है कि टीवी व्युअरशिप पर इसका असर पड़ेगा?

यह सही है कि लॉकडाउन के दौरान डिजिटल का उपभोग बढ़ा है। हालांकि, स्पोर्ट्स में हमें इस तरह का ट्रेंड देखने को नहीं मिला है। यह जॉनर अभी इससे प्रभावित नहीं हुआ है। हां, समग्र रूप से देखा जाए तो डिजिटल की व्युअरशिप बढ़ रही है और आने वाले वर्षों में ऐसा होना तय है। लेकिन भारत विविधताओं भरा देश है और यहां एक टीवी वाले घरों की संख्या ज्यादा है। इसलिए, खासकर क्रिकेट के लिए जिसे ज्यादातर परिवार के लोग मिलकर देखते हैं, हमें नहीं लगता कि टीवी व्युअरशिप पर इसका कोई प्रभाव पड़ेगा।

उदाहरण के लिए-जिन सीरीज में इंडियन टीम नहीं खेल रही थी, जैसे-जुलाई में वेस्ट इंडीज और इंग्लैंड के बीच व अगस्त में पाकिस्तान और इंग्लैंड के बीच सीरीज के दौरान भी व्युअरशिप में 200 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखने को मिली है। हालांकि इस दौरान दर्शक बहुत अधिक डिजिटल कंटेंट का उपभोग कर रहे होंगे, लेकिन टीवी दर्शकों की संख्या 200 प्रतिशत बढ़ गई है। जैसा कि मैंने कहा कि डिजिटल संख्या बढ़ती रहेगी, लेकिन टीवी व्युअर्स की संख्या भी बढ़ेगी।  

इस साल सीरीज के लिए किस तरह की प्रोग्रामिंग की योजना बनाई गई है?

कोविड-19 से जुड़े प्रतिबंधों के चलते यह हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती थी, लेकिन शूटिंग के दौरान तमाम सुरक्षा मापदंडों का पालन करते हुए आगे बढ़ते चले गए। कुछ कंटेंट हमारे चैनल्स पर पहले से ही प्रसारित होना शुरू हो गया है, जिनमें भारत-ऑस्ट्रेलिया की पूर्व में हुई बेहरतीन ‘भिड़ंत’ शामिल हैं। सीरीज के दौरान हमारे पास हमारा फ्लैगशिप शो ‘Extraaa Innings’ होगा, जिसमें ग्लेन मैकग्रा, संजय मांजरेकर, वीरेंद्र सहवाग जैसे तमाम दिग्गज शामिल होंगे। हमारे पास ऑस्ट्रेलिया से आ रहा लाइव फीड होगा। इसके साथ ही हम अंग्रेजी फीड भी तैयार कर रहे हैं। हम अपने ऑडियंस को हरसंभव श्रेष्ठ कवरेज उपलब्ध कराना सुनिश्चित कर रहे हैं। यही नहीं, इस सीरीज के दौरान लगभग नौ महीने के बाद स्टेडियम में दर्शक मौजूद रहेंगे, इसलिए इस सीरीज का लुक और अनुभव कुछ अलग ही होने वाला है।  

क्या आपको लगता कि इस साल टाइमिंग का कोई इश्यू नहीं होगा, क्योंकि अधिकांश लोग अभी भी घर से काम (working from home) कर रहे हैं?

इस सीरीज में सभी वनडे, टी20 और टेस्ट मैच भारतीय समयानुसार प्रसारित किए जाएंगे। डे-नाइट मैच सुबह और टी20 मैच दोपहर में शुरू होंगे, जो काफी अच्छी टाइमिंग है। चूंकि अधिकांश लोग अभी भी घरों से काम कर रहे हैं, ऐसे में यह सभी के लिए सही होगा।

इस साल आप स्पोर्ट्स जॉनर को किस तरह से बढ़ते हुए देख रहे हैं?

इस साल की शुरुआत में ज्यादा स्पोर्ट्स इवेंट नहीं हुए। ओलंपिक्स जो इस साल जून में प्रस्तावित था, समेत कुछ स्पोर्ट्स इवेंट्स स्थगित कर दिए गए, लेकिन अब सभी चीजें धीरे-धीरे पटरी पर लौट रही हैं। ऐसे मुश्किल समय में लोग लाइव स्पोर्ट्स का लुत्फ उठाना चाहते हैं। अब लोगों का स्टेडियम में आना भी शुरू होगा और इससे स्पोर्टस जॉनर के समग्र विकास में मदद मिलेगी। मुझे उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में इस जॉनर में बड़ी ग्रोथ दिखाई देगी।

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काफी पसंद किए जा रहे हैं Hindustan Times में किए गए ये बदलाव: राजन भल्ला

‘एचटी मीडिया’ (HT Media) ग्रुप के सीएमओ राजन भल्ला ने रीब्रैंडिंग के बाद हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ के साथ बातचीत में तमाम पहलुओं पर अपने विचार रखे।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 10 November, 2020
Last Modified:
Tuesday, 10 November, 2020
Rajan Bhalla

‘कोरोनावायरस’ (कोविड-19) का संक्रमण फैलने से रोकने के लिए देशभर में किए गए लॉकडाउन के कारण अन्य तमाम उद्योग धंधों के साथ प्रिंट मीडिया भी काफी प्रभावित हुआ। निस्संदेह प्रिंट मीडिया के लिए यह बहुत कठिन समय था। लेकिन, कुछ ब्रैंड्स ने इस समय का उपयोग अपने प्रॉडक्टस में नए परिवर्तन लाने में किया। ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ (Hindustan Times) ने भी अपने आपको पूरी तरह री-डिजाइन किया और दावा किया कि ब्रैंड को युवा पीढ़ी के अनुकूल बनाया गया है।

यह भी पढ़ें: HT Media ने Hindustan Times में किए ये बड़े बदलाव

नए डिजाइन और फॉर्मेट को लागू करने के करीब दो महीने बाद हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ एक बातचीत में ‘एचटी मीडिया’ (HT Media) ग्रुप के सीएमओ राजन भल्ला ने तमाम पहलुओं पर अपने विचार रखे। उन्होंने बताया कि न सिर्फ पेज डिजाइन में बदलाव किया गया है, बल्कि इसे मल्टी-प्लेटफॉर्म शेयरेबल फॉर्मेट के साथ फिर से लॉन्च किया है, यानी इसे किसी भी फॉर्मेट पर आसानी से शेयर किया जा सकता है। इस बातचीत के दौरान उनका यह भी कहना था, ‘ब्रैंड के लिए नए प्रॉडक्ट का फीडबैक बहुत ही अच्छा रहा है। सभी बदलावों को काफी पसंद किया गया है।’  

प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

इस री-लॉन्च के बारे में कुछ बताएं ? आपने अब इसे करने का चुनाव क्यों किया?

पिछले दशक में मीडिया परिदृश्य में काफी बड़े बदलाव देखने को मिले हैं और ऐसे समय के बावजूद देश भर में आठ मिलियन पाठक संख्या के साथ एचटी मीडिया मार्केट में सबसे आगे रहा है। ऐसे में न्यूज कंज्यूमर्स की मांग व जरूरत को देखते हुए यह बदलाव किए गए हैं। हम लंबे समय से देश के युवा वर्ग से ये जानने की कोशिश कर रहे थे और पिछले एक साल में हमने इस बात को गहराई से समझा है कि लोग कैसी और किस तरह की खबर पढ़ना पसंद करते हैं। उनके नजरिये को हमने री-डिजाइन में शामिल करने की कोशिश की है। हालांकि, इन बदलावों से पुरानी पीढ़ी दूर न हो जाए, इसके लिए भी एक अच्छा संतुलन बनाए रखने की कोशिश की है, क्योंकि वे भी हमारे लॉयल रीडर्स हैं। प्रॉड्कट में इन बदलावों के लिए मीडिया इंडस्ट्री के जाने-माने नाम डॉ. मारिया गार्सिया (Dr Mario Garcia) ने एचटी मीडिया की टीम के साथ मिलकर काम किया, ताकि इसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर को भी शामिल किए जा सके।   

री-लॉन्च को करीब दो महीने हो चुके हैं, शुरुआती फीडबैक कैसा रहा है? प्रिंट और डिजिटल क्या अब बेहतर तरीके से जुड़े हैं?

नई पेशकश का फीडबैक बहुत ही अच्छा रहा है। सभी बदलावों को काफी पसंद किया गया है। इस 'ऑल-न्यू डिजिटल-फर्स्ट' वर्जन में ऐसे एलिमेंट्स जोड़े गए हैं, जो आपको प्रिंट से डिजिटल की ओर ले जाने की पेशकश करते हैं, जैसे QR कोड्स, वीडियो पॉइंटर्स, पॉडकास्ट के लिंक्स और फोटो गैलरीज जैसे डिजिटल इंटीग्रेशन। ये पाठकों को HT के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ले जाते हैं। अब हर पृष्ठ पर एक सोशल कार्ड है जो रीडर्स को प्रिंट से डिजिटल प्लेटफॉर्म पर नेविगेट करने में सक्षम बनाएगा। हम लगातार अपने प्रॉडक्ट और कंटेंट को अपने पाठकों के लिए और अधिक आकर्षक बनाने पर काम कर रहे हैं।

री-लॉन्चिंग का काम पहले ही शुरू कर दिया गया था, लेकिन इसके बाद महामारी और फिर लॉकडाउन शुरू हो गया, ऐसे में यह सफर कितना मुश्किल रहा?

एचटी मीडिया परिवार अपने जुनून के कारण महामारी के बीच इस फ्लैगशिप ब्रैंड को री-लॉन्च करने में कामयाब रहा। चीजों को सामान्य करते हुए हम सभी इसे शुरू करने को लेकर काफी गर्व महसूस कर रहे हैं। हम इस लॉन्चिंग को आगे बढ़ा सकते थे, लेकिन हम महामारी के बीच अपने पाठकों को कुछ नया और फ्रेश देना चाहते थे। यह एक साहसिक कदम था और हमने इसे पूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।    

आपके पास न केवल संपादकीय टीमों, बल्कि प्रिंट और डिजिटल की सेल्स टीमों को मिलाने के लिए न्यूयॉर्क टाइम्स (NYT) जैसी योजना है, क्या आपको लगता है कि इस तरह के प्रयास से ज्यादा रिटर्न हासिल होगा? क्या इस पूरी कवायद ने ज्यादा एडवर्टाइजर्स को अपनी ओर आकर्षित करने में मदद की?

अपने एडवर्टाइजर्स और अपने पाठकों दोनों के लिए हमारा फोकस नए बदलावों पर रहा है। अपने एडवर्टाइजर्स के लिए अब हम इंटीग्रेटेड प्रिंट और डिजिटल सॉल्यूशन पेश कर रहे हैं। एचटी मार्केट में आठ मिलियन से ज्यादा रीडरशिप और HT.com पर 65 मिलियन से ज्यादा यूनिक विजिटर्स के साथ अब हम नए एचटी में प्रिंट और डिजिटल दोनों का समावेश उपलब्ध करा रहे हैं। डिजिटल में एचटी मीडिया जैसे प्लेयर्स अधिकांश सेगमेंट जैसे-डिस्प्ले/ब्रैंडेड कंटेंट/प्रोग्रामैटिक ऐड्स में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में हम एडवर्टाइजर्स को काफी बेहतर सॉल्यूशंस उपलब्ध करा पाते हैं। महामारी निश्चित रूप से उपभोक्ताओं के व्यवहार में बदलाव ला रही है, लेकिन मजबूत पत्रकारिता और अच्छी टेक्नोलॉजी का लाभ उठाने वाले ब्रैंड्स कंज्यूमर्स और एडवर्टाइजर्स के लिए प्रासंगिक रहेंगे।

आपके द्वारा री-लॉन्च किए गए प्रॉडक्ट के लिए वे तीन प्रमुख क्षेत्र कौन से होंगे, जिन पर आप काम करना चाहेंगे?

सबसे पहले तो इस री-लॉन्च के साथ प्रयास हमारे ऑडियंस की बदलती समाचार खपत (news consumption) की आदतों को समझने और उन्हें वे देने की कोशिश करना है, जो वे चाह रहे हैं। इस 'ऑल-न्यू डिजिटल-फर्स्ट' वर्जन में ऐसे एलिमेंट्स जोड़े गए हैं, जो आपको प्रिंट से डिजिटल की ओर ले जाने की पेशकश करते हैं, जैसे QR कोड्स, वीडियो पॉइंटर्स, पॉडकास्ट के लिंक्स और फोटो गैलरीज जैसे डिजिटल इंटीग्रेशन। ये पाठकों को HT के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ले जाते हैं।

दूसरी बात, युवाओं पर ज्यादा फोकस किया जा रहा है। इस दिशा में तमाम कदम उठाए जा रहे हैं, ताकि नए एचटी के साथ प्रिंट की पेशकश बहुत आकर्षक और प्रासंगिक बनी रहे। आखिर बात, अपने एडवर्टाइजर्स को वैल्यू प्रदान करना हमेशा हमारे सभी प्रयासों के मूल में रहा है। यह नई पेशकश अपने कंज्यूमर्स पर फोकस करने के साथ ही अपने कस्टमर्स को सॉल्यूशंस उपलब्ध कराने में और अपने पार्टनर्स को ज्यादा रिटर्न ऑन इंन्वेस्टमेंट (ROI) हासिल करने में मदद करती है।

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डेलीहंट के फाउंडर्स बोले, भारत में एंटरप्रिन्योर बनना कमजोर दिल वालों का काम नहीं

डेलीहंट के फाउंडर वीरेंद्र गुप्ता व को-फाउंडर उमंग बेदी ने अपने शॉर्ट वीडियो ऐप जोश समेत तमाम मुद्दों पर रखी राय

Last Modified:
Monday, 05 October, 2020
Josh

लोकल मार्केट में अपना दबदबा बढ़ाने के बाद ‘डेलीहंट’ (Dailyhunt) ने पिछले दिनों शॉर्ट वीडियो ऐप ‘जोश’ (Josh) लॉन्च किया था, जिसे पहले हफ्ते से ही लोगों द्वारा काफी पसंद किया जा रहा है। ‘डेलीहंट’ के फाउंडर वीरेंद्र गुप्ता और को-फाउंडर उमंग बेदी ने ‘बिजनेस वर्ल्ड’ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ ग्रुप के डायरेक्टर नवल आहूजा से अपनी नई पेशकश, भारतीय ऐप मार्केट पर बढ़ते फोकस और डिजिटल कंटेंट पब्लिशर्स के आगे बढ़ने समेत तमाम मुद्दों पर बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

इस समय नए शॉर्ट वीडियो ऐप जोश को लॉन्च करने के पीछे आपकी क्या सोच रही, इस बारे में कुछ बताएं?

उमंग बेदी: हम देश के डिजिटल सिस्टम में एक बिलियन लोगों को शामिल करना चाहते हैं, जो स्थानीय भाषाओं द्वारा संचालित है। हमारा मानना है कि डेलीहंट के साथ स्थानीय भाषाओं को लेकर एक सामाजिक क्रांति शुरू हो रही है। हम सबसे बड़ा डिजिटल मीडिया बनना चाहते हैं जो एक अरब भारतीयों को इंफॉर्म करने, उनका ज्ञान बढ़ाने और मनोरंजन करने वाले कंटेंट को डिस्ट्रीब्यूट करने और कंज्यूम करने के लिए सशक्त बना रहा है। हमारी स्ट्रैटेजी अपने यूजर्स, कंज्यूमर्स, पब्लिशर्स, पार्टनर्स और ऐडवर्टाइजर्स के लिए उनकी पसंद का ऐसा प्लेटफॉर्म तैयार करना है, जो स्थानीय भाषाओं पर केंद्रित हो। हम इस बात को लेकर पूरी तरह स्पष्ट हैं कि हम स्थानीय भाषा के यूजर्स (लोकल लैंग्वेज यूजर्स) के लिए अपना माइंडशेयर (mindshare), टाइमशेयर (timeshare) और रेवेन्यू शेयर (revenue share) चाहते हैं। पिछले दो वर्षों में हमने काफी ज्यादा ग्रोथ देखी है। यहां तक कि मार्च से जब पूरे देश में लॉकडाउन लगा हुआ था, डेलीहंट ने काफी ज्यादा कंटेंट को प्राथमिकता देना और उसे बनाना शुरू कर दिया था। जब प्रधानमंत्री ने देश को आत्मनिर्भर बनाने के बारे में बात की तो इस बात ने डेलीहंट को प्रोत्साहन के साथ एक अतिरिक्त जिम्मेदारी भी प्रदान की। जैसा कि हमने कहा है कि हम शार्ट वीडियो के फॉर्मेट द्वारा स्थानीय भाषा के यूजर्स (लोकल लैंग्वेज यूजर्स) के लिए अपना माइंडशेयर (mindshare), टाइमशेयर (timeshare) और रेवेन्यू शेयर (revenue share) चाहते हैं, हमने दो हफ्ते के समय में जोश को लॉन्च किया। हमारा यह शॉर्ट वीडियो ऐप पूरी तरह स्वदेशी है और यह देश का तेजी से बढ़ता ऐप है, जिसे लोगों द्वारा काफी पसंद किया जा रहा है।

जोश को लॉन्च किए हुए कुछ हफ्ते हो गए हैं, इसका अब तक का रिस्पॉन्स कैसा रहा है?

उमंग बेदी: जोश देश के टॉप 200 क्रिएटर्स का अनूठा संगम है, जिनका विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर सामूहिक यूजर बेस 300-400 मिलियन है। शुरुआती हफ्तों की बात करें तो जोश को बेहतरीन प्रतिक्रिया मिली है। 45 दिनों में ही हम टॉप रेटेड ऐप बन गए हैं, जिसके 50 मिलियन डाउनलोड्स हो गए हैं। रोजाना इस ऐप पर 23 मिलियन लोग आते हैं और औसतन 21 मिनट व्यतीत करते हैं। इसमें रोजाना एक बिलियन वीडियो प्ले होते हैं और पांच मिलियन लोग कंटेंट बना रहे हैं। जिस हिसाब से हमारी ग्रोथ हो रही है, हमें उम्मीद है कि इस तरह अगले 60 से 90 दिनों में हम इन आंकड़ों के दोगुने तक पहुंच जाएंगे। हमने इसे पूरी तरह भारत में, भारत के लिए 14 भारतीय भाषाओं में तैयार किया है और हमारा मानना है कि यूजर बेस के मामले में इसने टिकटॉक को रिप्लेस कर दिया है।

वीरेंद्र गुप्ता: विदेशी कंपनियां जब भारत को सिर्फ अंग्रेजी भाषी मार्केट के तौर पर देखती हैं, डेलीहंट स्थानीय भाषाओं में काम कर रहा है। हम काफी समय से इस मार्केट में हैं। हमने इस मार्केट के लिए टूल्स, टेक्नोलॉजी और कंटेंट तैयार किया है। अभी तक इस मार्केट पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया था और हमने अपनी पेशकश के द्वारा इस दिशा में काफी काम किया है। जोश हमारी नवीनतम पेशकश है।

भारतीय ऐप के ईकोसिस्टम की बात करें तो इसमें रोजाना प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है, ऐसे में आप किस तरह आगे बने हुए हैं?

वीरेंद्र गुप्ता: यह बहुत अच्छी बात है कि बहुत सारी भारतीय कंपनियां नए ऐप बना रही हैं। हमें एक नए भारत की कल्पना करने की जरूरत है। हम जानते हैं कि इस खेल को कैसे जीता जाता है। मेरा मानना है कि यदि मार्केट में ज्यादा प्लेयर्स आते हैं तो इससे आगे बढ़ने में मदद मिलेगी और हमें एक-दूसरे से काफी कुछ सीखने को मिलेगा। इससे शॉर्ट वीडियो ऐप्स और अन्य ऐप्स पर काफी प्रभाव पड़ेगा, क्योंकि युवा एंटरप्रिन्योर्स नए-नए आइडियाज के साथ आ रहे हैं, इससे भारतीय ऐप का ईकोसिस्टम आगे बढ़ेगा।

उमंग बेदी: भारतीय स्टार्ट-अप इकोसिस्टम को लेकर मैं बहुत प्रोत्साहित और उत्साहित हूं। मैं हमेशा से कहता हूं कि भारत में एंटरप्रिन्योर बनना कमजोर दिल वालों का काम नहीं है। इस मार्केट में काफी भीड़भाड़ है, लेकिन प्रत्येक वर्टिकल की तरह चाहे वह ऑटोमोबाइल्स हो, हैंडसेट्स हो, टेलिकॉम या ई-कॉमर्स हो, मार्केट में दो प्लेयर्स बड़े शेयर्स के साथ उभरकर सामने आते हैं।

मेरा मानना है कि अगले छह महीनों में यह मार्केट नया रूप लेने जा रहा है। यदि आप कुछ बड़ी टेक कंपनियों की तरफ देखें, जिन्होंने अपने मार्केट में स्थानीय भाषाओं पर काम किया है, ऐसे में उन्हें किस वजह के आगे निकलने का अधिकार है?

पहली बात तो यह है कि उन्हें विभिन्न भाषाओं में विभिन्न फॉर्मेट्स में कंटेंट की गहरी समझ है। कंटेंट को समझने के लिए उनके पास आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (AI) है। दूसरी बात यह है कि वह गहरी समझ का इस्तेमाल कर रहे हैं। तीसरी बात यह है कि उनमें बड़े पैमाने पर मुद्रीकरण (monetisation) को तैयार करने की क्षमता है। हम इस बात की काफी कद्र करते हैं कि ग्लोबल कंपनियों ने किस तरह से अपना बिजनेस तैयार किया है, लेकिन हम पूरी तरह स्पष्ट हैं कि वे सिर्फ देश के खास तबके तक सीमित हैं। हम इस मायने में उनसे अलग हैं कि हम भारत को अच्छे से समझते हैं, हम स्थानीय भाषाओं को समझते हैं। देश में 21000 पिन कोड में से हमें 19000 से ट्रैफिक मिलता है। हमें लगता है कि दो बड़े प्लेयर्स के लिए एक-दूसरे से आगे बढ़ने के लिए मार्केट काफी बड़ा है और अपने आप को लेकर हम काफी आश्वस्त हैं।

यदि टिकटॉक की भारतीय मार्केट में दोबारा से एंट्री होती है या जियो कोई इसी तरह का प्रॉडक्ट लॉन्च कर देता है तो उस दौरान आपकी स्ट्रैटेजी क्या रहेगी?

कंप्टीशन को लेकर हम चिंतित नहीं हैं। हम प्रतिस्पर्धा का स्वागत करते हैं। हम ऐसे मार्केट में प्रतिस्पर्धा करते हैं, जहां पर डिजिटल एडवर्टाइजिंग की बात आती है तो एकाधिकार हावी हो जाता है। हमने चीन के बड़े ऐप्स के साथ प्रतिस्पर्धा की है और हमने वह लड़ाई जीती भी है। यदि टिकटॉक या इसी तरह का कोई ऐप वापस भी आ जाता है, तो भी हमें कोई दिक्कत नहीं है। हमारा मानना है कि यह मार्केट दो या तीन प्लेयर्स के लिए पर्याप्त बड़ा है और हमें पूरा विश्वास है कि हम उन दो प्लेयर्स में शामिल होंगे।

आपकी नजर में, क्या मार्च 2020 के बाद विज्ञापन खर्च में कुछ परिवर्तन आया है, मार्केट को लेकर आपका क्या कहना है?

उमंग बेदी: आप जिस क्षण डिजिटल में आते हैं, प्रत्येक मार्केटर आपकी परफॉर्मेंस मांगता है। चाहे पहुंच अथवा फ्रीक्वेंसी की बात हो, चाहे क्लिक की बात हो या फिर एडवर्टाइजिंग का प्रदर्शन हो।

गूगल, फेसबुक और डेलीहंट के अलावा कितने प्लेटफॉर्म्स हैं, जहां पर आप परफॉर्मेंस के आधार पर विज्ञापन हासिल कर सकते हैं?

जो मैंने देखा है, उसके अनुसार, कोविड-19 की तिमाही के दौरान हमारे रेवेन्यू में साल दर साल 100 प्रतिशत तक का इजाफा हुआ है। अब हम ब्रैंड एडवर्टाइजिंग में काफी उछाल देख रहे हैं। मुझे लगता है कि परफॉर्मेंस एक यात्रा है और हमने 100000 पब्लिशर्स व लोगों के साथ मिलकर डाटा इंटीग्रेशन तैयार किया है, जो हमें कंटेंट दे रहे हैं। परफॉर्मेंस की बात करें तो हमारे पास 250 एडवर्टाइजर्स हैं, जिनके साथ हमने डाटा इंटीग्रेशन (डाटा एकीकरण) किया है, जिसके द्वारा हम यूजर को ट्रैक कर सकते हैं और उसी हिसाब से टार्गेट कर सकते हैं। यही कारण है कि देश में गूगल और फेसबुक के बाद हम एकल गंतव्य (single destination) के मामले में रेवेन्यू के हिसाब से तीसरे स्थान पर हैं। हम अभी इनसे काफी दूर हैं, क्योंकि देश में ये कंपनियां रेवेन्यू और पहुंच के मामले में काफी बड़ी हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि आने वाले तीन वर्षों में भारत में डिजिटल टीवी के बराबर आ जाएगा या इससे आगे निकल जाएगा।  

वीरेंद्र गुप्ता: हमारे पास डेलीहंट के ऐप्स पर रोजाना दो घंटे से ज्यादा समय बिताने वाले 500 मिलियन लोकल लैंग्वेज यूजर्स होंगे। और जब आप ऐसा करते हैं, तो मेरा मानना ​​है कि विज्ञापन और बढ़ेंगे, क्योंकि यह भारत है और यह एक अंडरस्कोर मार्केट है। जैसा कि हम जानते हैं, विज्ञापन का पैसा बड़े पैमाने पर चलता है और यही वह जगह है, जहां हम आगे बढ़ रहे हैं।

यदि हम कंटेंट के विमुद्रीकरण (monetising) की बात करें देश में डिजिटल न्यूज पब्लिशिंग ईकोसिस्टम के लिए आगे बढ़ने का क्या तरीका है?

उमंग बेदी: यदि आप भारत और यहां के इंटरनेट ईकोसिस्टम के बारे में सोचते हैं तो आज की तारीख तक हम ओपन और न्यूट्रल इंटरनेट में विश्वास रखते हैं। हम मल्टीस्टेकहोल्डर तंत्र में विश्वास रखते हैं। रही बात सही और गलत स्ट्रैटेजी की तो मेरा मानना है कि इस पर गंभीर बहस किए जाने की जरूरत है। इसके अलावा टीवी ने भी काफी यूनिक और अलग कंटेंट तैयार किया है। जब मैं पांच अलग-अलग चैनल्स पर न्यूज देखता हूं तो यह वैचारिकता से प्रभावित लगती है, जो तथ्य नहीं हैं। यह न्यूज का विश्लेषण और उस न्यूज के बारे में राय है। मुझे लगता है कि एक पब्लिशिंग ईकोसिस्टम के रूप में हमें इससे प्रेरणा लेने की आवश्यकता है।

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IIMC के DG प्रो.संजय द्विवेदी बोले- दो आधारों पर खड़ी है आज की पत्रकारिता

मेरे जीवन में किस्से बहुत नहीं हैं, संघर्ष तो बिल्कुल नहीं। मेरे पास यात्राएं हैं, कर्म हैं और उससे उपजी सफलताएं हैं। बहुत संघर्ष की कहानियां नहीं हैं, जिन्हें सुना सकूं।

विकास सक्सेना by
Published - Monday, 17 August, 2020
Last Modified:
Monday, 17 August, 2020
Sanjay Dwivedi

प्रो.संजय द्विवेदी देश के जाने-माने पत्रकार, संपादक, लेखक, संस्कृतिकर्मी और मीडिया प्राध्यापक हैं। अनेक मीडिया संगठनों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालने के बाद वे माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल में 10 वर्ष मास कम्युनिकेशन विभाग के अध्यक्ष, विश्वविद्यालय के कुलपति और कुलसचिव भी रहे। राजनीतिक, सामाजिक और मीडिया के मुद्दों पर निरंतर लेखन से उन्होंने खास पहचान बनाई है। अब तक 25 पुस्तकों का लेखन और संपादन करने वाले प्रो.  द्विवेदी को अनेक संगठनों ने मीडिया क्षेत्र में योगदान के लिए सम्मानित किया है। हाल ही में उन्हें देश के प्रतिष्ठित मीडिया प्रशिक्षण संस्थान- भारतीय जनसंचार संस्थान का महानिदेशक नियुक्त किया गया है। भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) के 56वें स्थापना दिवस पर समाचार4मीडिया ने उनसे खास बातचीत की - 

आपने अब तक तमाम मीडिया संस्थानों और शैक्षणिक संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं, अपने अब तक के सफर के बारे में कुछ बताएं?

मैं खुद को आज भी मीडिया का विद्यार्थी ही मानता हूं।  पत्रकारिता में मेरा सफर 1994 में दैनिक भास्कर, भोपाल से प्रारंभ हुआ। उसके बाद स्वदेश-रायपुर, नवभारत- मुंबई, दैनिक भास्कर-बिलासपुर, दैनिक हरिभूमि-रायपुर, इंफो इंडिया डॉटकॉम-मुंबई, जी 24 घंटे छत्तीसगढ़ जो छत्तीसगढ़ का पहला सैटेलाइट चैनल था के साथ रहा। पत्रकारिता में संपादक, स्थानीय संपादक, समाचार संपादक, इनपुट एडिटर, एंकर जैसी जिम्मेदारियां मिलीं, उनका निर्वाह किया। मीडिया शिक्षा में आया तो कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय, रायपुर में पत्रकारिता विभाग का संस्थापक विभागाध्यक्ष रहा। बाद में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में कुलपति, कुलसचिव जैसे पदों के साथ जनसंचार विभाग के अध्यक्ष के रूप में भी दस साल दायित्व रहा। बचपन के दिनों के में दोस्तों के मिलकर‘बालसुमन’ नाम की पत्रिका निकाली। यह लिखने-पढ़ने का शौक ही बाद में जीविका बन गया  तो सौभाग्य ही था।

 इस दौरान का कोई ऐसा खास वाक्या जो आपको अभी तक याद हो?

मेरे जीवन में किस्से बहुत नहीं हैं, संघर्ष तो बिल्कुल नहीं। मेरे पास यात्राएं हैं, कर्म हैं और उससे उपजी सफलताएं हैं। बहुत संघर्ष की कहानियां नहीं हैं, जिन्हें सुना सकूं। अपने काम को पूरी प्रामणिकता, ईमानदारी से करते रहे। अपने अधिकारी के प्रति ईमानदार रहे, यात्रा चलती रही। मौके मिलते गए। मुंबई, भोपाल, रायपुर, बिलासपुर और अब दिल्ली में काम करते हुए कभी चीजों के पीछे नहीं भागा। नकारात्मकता और नकारात्मक लोगों से दूरी से बनाकर रखी। साधारण तरीके से चलते चले गए। यह सहज जीवन ही मुझे पसंद है। सफलता से बड़ा मैंने हमेशा सहजता को माना। कुछ दौड़कर, छीनकर नहीं चाहिए। स्पर्धा और संघर्ष मेरे स्वभाव में नहीं है। मैं अपना आकलन इस तरह करता हूं कि मैं कोई विशेष प्रतिभा नहीं हूं। सकारात्मक हूं और सबको साथ लेकर चलना मेरा सबसे खास गुण है। मैं जो कुछ भी हूं अपने माता-पिता, मार्गदर्शकों, शिक्षकों और दोस्तों की बदौलत हूं।   

 'कोविड-19 के दौरान पढ़ाई-लिखाई की पुरानी व्यवस्था पर काफी फर्क पड़ा है। नए दौर में ऑनलाइन पढ़ाई पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है। आईआईएमसी में इसके लिए किस तरह की तैयारी पर जोर है?

ऑनलाइन कक्षाएं हमारी मजबूरी हैं। कोरोना  जैसे संकट से डील करने का न हमारे तंत्र का अभ्यास, न हमारा है। लोंगों की जिंदगी अहम है। खासकर हमारे विद्यार्थी किसी संकट का शिकार न हों यही चिंता है। पहला सेमेस्टर ऑनलाइन ही चलेगा। तैयारी पूरी है। हमारा प्रशासनिक तंत्र और अध्यापकगण इसके लिए तैयार हैं। विद्यार्थी तो वैसे भी नए माध्यमों और  प्रयोगों का स्वागत ही करते हैं। ई-माध्यमों के साथ हमारी पीढ़ी भले सहज न हो, किंतु हमारे विद्यार्थी बहुत सहज हैं। 

पिछले दिनों आईआईएमसी में फीस बढ़ोतरी का मुद्दा काफी गरमाया रहा है, हालांकि फिलहाल यह मामला शांत है, इस बारे में आपका क्या कहना है और इस तरह के मुद्दों से किस तरह निपटेंगे?

किसी भी मामले में अपना अभ्यास निपटने-निपटाने का नहीं है। सहज संवाद का है, बातचीत का है। बातचीत से चीजें हल नहीं होतीं, तो लोग अन्य मार्ग भी अपनाते हैं। एक शासकीय संगठन होने के नाते हमारी सीमाएं हैं, हम हर चीज को मान नहीं सकते। किंतु छात्र हित सर्वोपरि है।  संवाद से रास्ते निकालेंगे। अन्यथा अन्य फोरम भी जहां लोग जाते रहे हैं, जाएंगे, जाना भी चाहिए।

पत्रकारिता में व्यावहारिक रूप में काफी बदलाव आए हैं। कोरोना काल में पत्रकारों ने अपनी जान जोखिम में डालकर ड्यूटी को अंजाम दिया है, यह बिल्कुल नई तरह की आपदा है। पत्रकारों की नई पौध को इस तरह की किसी भी स्थिति के लिए किस तरह व्यावहारिक रूप से तैयार करेंगे?

मैंने आपसे पहले भी कहा इस तरह के संकटों से निपटने का अभ्यास हमारे पास नहीं है। हम सब सीख रहे हैं। बचाव के उपाय भी अब धीरे-धीरे आदत में आ चुके हैं। पत्रकारिता हमेशा जोखिम भरा काम था। खासकर जिनके पास मैदानी या रिपोर्टिंग  दायित्व हैं। जान जोखिम में डालकर पत्रकार अपने कामों को अंजाम देते रहे हैं। कोरोना संकट में भी पत्रकारों के सामने सिर्फ संक्रमण के खतरे ही नहीं थे, कम होते वेतन, जाती नौकरियों के भी संकट थे। सबसे जूझकर उन्हें निकलना  होता है। फिर भी वे काम कर रहे हैं, समाज को संबल देने का काम कर रहे हैं। हमें भी ऐसी पीढ़ी का निर्माण करना है, जो जरा से संकटों से घबराए नहीं, संबल और साहस बनाए रखे। एक संचारक के नाते हम सबकी कोशिश होनी चाहिए कि समाज में गलत खबरें न फैलें, नकारात्मकता न फैले, लोग निराशा और अवसाद के शिकार न हों। उन्हें उम्मीदें जगाने वाली खबरें और सूचनाएं देनी चाहिए। हमारे विद्यार्थी बहुत प्रतिभावान हैं। वे अपने सामने उपस्थित सवालों और उनके ठोस तथा वाजिब हल निकालने की क्षमताओं से भरे हैं। मैं उन्हें बहुत आशा और उम्मीदों से देखता हूं। 

इस प्रतिष्ठित मीडिया शिक्षण संस्थान से पढ़कर निकले तमाम विद्यार्थी विभिन्न संस्थानों में ऊंचे पदों पर काम कर रहे हैं। IIMC को और अधिक ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए क्या आपने किसी तरह की खास स्ट्रैटेजी बनाई है?

हमारे संस्थान की स्थापना की आज हम 56वीं वर्षगांठ मना रहे हैं। 17 अगस्त,1965 को तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने इसका शुभारंभ किया था। मेरा सौभाग्य है कि एक खास  समय में मुझे इस महान संस्थान की सेवा करने का अवसर मिला है। मेरी कोशिश होगी इस महान संस्था की गौरवशाली परंपराओं में कुछ और सार्थक जोड़ सकूं। इसे भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता का केंद्र बनाने, उन पर शोध अनुसंधान का काम हो, इसकी कोशिश होगी। अपने बहुत प्रतिभावान पूर्व विद्यार्थियों, पूर्व प्राध्यापकों, पूर्व महानिदेशकों से संवाद करते हुए, उनकी सलाह लेते हुए इसे जीवंत व ऊर्जावान परिसर बनाने की कोशिश होगी। जहां बिना छूआछूत के सभी विचारों और प्रतिभाओं का स्वागत होगा। एक समर्थ भारत बनाने में कम्युनिकेशन और कम्युनिकेटर्स बहुत खास भूमिका है, हम इस ओर जोर देंगे। 

नई शिक्षा नीति कितनी सही, कितनी गलत, इस बारे में क्या है आपका मानना?

नई शिक्षा बहुत सुविचारित और सुचिंतित तरीके से प्रकाश में आई है। इसको बनाने के पहले जो मंथन हुआ है, जिस तरह पूरे देश  के लोगों की राय ली गयी है, वह प्रक्रिया बहुत खास  है। इसमें भारतीयता, भारत बोध, नैतिक शिक्षा, पर्यावरण और भारतीय भाषाओं को सम्मान देने के विषय जिस तरह से संबोधित किए गए हैं, उसके कारण यह विशिष्ट बन गयी  है। उच्च शिक्षा को स्ट्रीम से मुक्त करना एक तरह का क्रांतिकारी फैसला है। 0 से  8 साल के बच्चों का विचार। जन्म से लेकर पीएचडी तक बच्चे की परवाह यह शिक्षा नीति करती है। मुझे लगता है कि नीति के तौर इसमें कोई समस्या  नहीं है। इसे जमीन पर उतारना एक कठिन काम है। इसलिए शिक्षाविदों, शिक्षा से जुड़े अधिकारियों और संचारकों की जिम्मेदारी बहुत बढ़ गयी है। इस शिक्षा नीति को हम उसके वास्तविक संकल्पों के साथ जमीन पर उतार पाए तो एक ऐसा भारत बनेगा जिसकी कल्पना हमारे राष्ट्रीय आंदोलन के नायकों ने की थी। मुझे लगता है कि हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार की मंशाएं बहुत स्पष्ट हैं, अब समय हमारे द्वारा किए जाने वाले क्रियान्वयन और डिलेवरी का है। निश्चय ही इस कठिन दायित्वबोध ने हम सबमें ऊर्जा का संचार भी किया है। 

एक आखिरी सवाल, पत्रकारिता के क्षेत्र में आने वाले नए विद्यार्थियों के लिए क्या संदेश देना चाहेंगे?

आज की पत्रकारिता दो आधारों पर खड़ी है, एक भाषा, दूसरा तकनीकी ज्ञान। तकनीक दिन-प्रतिदिन और माध्यमों के अनुसार बदलती रहती है। तकनीक ज्यादातर अभ्यास का मामला भी है। हम करते और सीखते जाते हैं। भाषा एक कठिन स्वाध्याय से अर्जित की जाती है। किंतु हमें हर तरह से भाषा में ही व्यक्त होना है। इसलिए हमारे युवा पत्रकारों को भाषा के साथ रोजाना का रिश्ता बनाना होगा। एक अच्छी भाषा में सही तरीके कही गयी बात का कोई विकल्प नहीं है। दूसरा हमें सिर्फ सवाल खड़े करने वाला नहीं बनना है, इस देश के संकटों के ठोस  और वाजिब हल तलाशने वाला पत्रकार बनना है। मीडिया का उद्देश्य अंततः लोकमंगल ही है। यही साहित्य का भी उद्देश्य है, हमारी सारी प्रदर्शन कलाओं का भी यही ध्येय है। इसके साथ ही देश की समझ। देश के इतिहास, भूगोल, संस्कृति, परंपरा, आर्थिक-सामाजिक चिंताओं,  संविधान की मूलभूत चिंताओं की गहरी समझ हमारी पत्रकारिता को प्रामणिक बनाती है। तभी हम समाज के दुखः-दर्द, उसकी चिंताओं को समझकर तथ्य और सत्य पर आधारित पत्रकारिता करने में समर्थ होते हैं। सामाजिक-आर्थिक न्याय से  युक्त, न्यायपूर्ण-समरस समाज हम सबका साझा स्वप्न है। पत्रकारिता अपने इस कठिन दायित्वबोध से अलग नहीं हो सकती।

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BCCI और IPL को लेकर वरिष्ठ खेल पत्रकार बोरिया मजूमदार ने कही ये बात

बीसीसीआई 18 अगस्त को आईपीएल के टाटइल स्पॉन्सर की घोषणा कर सकता है।

Last Modified:
Sunday, 16 August, 2020
boria-majumdar

‘इंडियन प्रीमियर लीग’ (आईपीएल) 2020 की टाइटल स्पॉन्सर चीनी कंपनी ‘वीवो’ (VIVO) ने इस साल लीग से हाथ खींच लिए हैं। वीवो ने पिछले दिनों घोषणा की है कि वह साल इस आयोजन की फ्रेंचाइजी का हिस्सा नहीं रहेगा। अब सबकी निगाहें बीसीसीआई पर लगी हुई हैं। इसके साथ ही बीसीसीआई ने नए टाइटल स्पॉन्सर की तलाश शुरू कर दी। अब खबर है कि बीसीसीआई 18 अगस्त को टाइटल स्पॉन्सर की घोषणा कर सकती है।

इस बारे में क्रिकेट की गहराई से समझ रखने वाले जाने-माने खेल पत्रकार, लेखक और शिक्षाविद बोरिया मजूमदार से हमारी सहयोगी वेबसाइट एक्सचेंज4मीडिया (exchange4media) ने बातचीत की। इस दौरान मजूमदार ने बताया कि इस साल टाइटल स्पॉन्सरशिप के लिए किस तरह भारतीय कंपनियां आगे आ रही हैं और बीसीसीआई कैसे इसे अपनी प्रतिष्ठा के रूप में देखता है।  

पेश हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

क्या बीसीसीआई दोबारा से अपनी पूर्ववत स्थिति में आ सकता है?

इस स्वतंत्रता दिवस पर भारतीय खेल गलियारों में सबसे ज्यादा यही सवाल उठा। आईपीएल की टाइटल स्पॉन्सरशिप के लिए कई बड़ी भारतीय कंपनियां आगे आई हैं। इसमें कोई शक नहीं है कि यह आयोजन एक बार फिर मार्केट के सारे अनुमानों को मात दे देगा और आश्चर्यचकित कर देगा। इस साल वीवो के अलग हटने से 440 करोड़ रुपये के नुकसान के बाद तमाम लोगों को लगता है कि वर्तमान आर्थिक परिस्थितियों में बीसीसीआई 200 करोड़ रुपये कमा लेगा।   

संभावना है कि यह कम से कम 100 करोड़ रुपए ज्यादा यानी कुल 300 करोड़, जिनमें से 200 करोड़ से ज्यादा टाइटल स्पॉन्सरशिप से और 100 करोड़ दो अन्य ऑफिशियल पार्टनर से कमा लेगा। खास बात यह है कि अनिश्चितता के इस दौर में भी भारतीय कंपनियां (India Inc) इस आयोजन का सपोर्ट करने के लिए पूरी तरह दृढ़ हैं। दूसरा आप इन कंपनियों को देखें और तीसरा लोकल फ्लेवर भी इसमें अपनी भूमिका निभाएगा।  

यदि हम इंडिया इंक की बात करें तो आपको क्या लगता है, कौन सा ब्रैंड्स इस साल प्रमुख भूमिका निभाएगा?

टाटा, जो 2017 के बाद से क्रिकेट में अपने पहले प्रमुख स्थान पर नजर जमाए हुई है, इस भारतीय दिग्गज की वैश्विक मार्केट में भी अच्छी पकड़ है। इसने वर्ष 1920 के ओलंपिक्स में न सिर्फ इंडियन टीम को फंड दिया था, बल्कि भारतीय स्पोर्ट्स की दुनिया में लगातार बने हुए हैं। ऐसे समय में उनका आगे आना और इस तरह का कदम उठाना कोई आश्चर्य की बात नहीं है, जब प्रधानमंत्री लगातार आत्मनिर्भरता की बात कर रहे हैं।

टाइटल स्पॉन्सरशिप की इस दौड़ में ‘ड्रीम11’ (Dream11) और ‘बायजूस’ (Byju’s) जैसे दो बड़े ब्रैंड्स भी शामिल हैं। वहीं, हमें ‘अनएकैडमी’ (Unacademy) को भी नहीं भूलना चाहिए, जो डिजिटल एजुकेशन के क्षेत्र में तेजी से उभरता हुआ ब्रैंड है। दो युवा भारतीय एंटरप्रिन्योर्स द्वारा शुरू की गई ‘ड्रीम11’ का अब आठ करोड़ से ज्यादा सबस्क्राइबर बेस है और इसे सिर्फ इंडिया में खेला जाता है। वहीं, ‘बायजूस’ भी पूरी तरह इंडियन ब्रैंड है, जिसने डिजिटल एजुकेशन को पूरी तरह बदल दिया है।

खास बात यह है कि दोनों ब्रैंड्स भारतीय क्रिकेट से काफी नजदीकी से जुड़े हुए हैं और एक बार फिर जरूरत के समय ‘आईपीएल’ के लिए आगे आए हैं। ‘अनएकैडमी’ (Unacademy) जो डिजिटल एजुकेशन के क्षेत्र में कड़ी टक्कटर दे रही है, उसके लिए ‘आईपीएल’ के साथ तेजी से आगे बढ़ने का अच्छा मौका है।

क्या टाइटल स्पॉन्सरशिप का मुद्दा अब बीसीसीआई के लिए प्रतिष्ठा का मुद्दा बन गया है?

जी, यह बीसीसीआई के लिए प्रतिष्ठा का सवाल है। इन भारतीय कंपनियों के लिए खेल में गहरी दिलचस्पी के साथ-साथ ब्रैंड की मजबूती के लिए आईपीएल की रक्षा करना एक गंभीर प्रतिबद्धता है। तमाम लोगों ने सौरव गांगुली के बयान को लेकर बीसीसीआई की क्षमता पर संदेह जताया है, लेकिन तमाम लोगों ने इस इंडियन क्रिकेट ब्रैंड की ताकत को नहीं समझा है। त्योहारी सीजन पर आईपीएल शुरू होने से यह संभावना है कि टेलीविजन पर इस टूर्नामेंट को अब तक सबसे अधिक दर्शक देखेंगे। ऐसा इसलिए क्योंकि मेजबान ब्रॉडकास्टर ‘स्टार स्पोर्ट्स’ टूर्नामेंट को 7 से अधिक भाषाओं में कवर करेगा, जिसकी जड़ें देश के हर कोने-कोने तक जुड़ी हुई हैं।

हालांकि टाटा कंपनी सर्वव्यापी है, लेकिन ‘बायजूस’ की डिजिटल तकनीक का उपयोग अब उपनगरीय भारत में भी है। इनके लिए आईपीएल एक ऐसा खेल है, जिसे हर कोई देखना पसंद करता है। लिहाजा इनके लिए अगली बड़ी छलांग के लिए यह एकदम सही लॉन्चिंग पैड है। फिर चाहे उनका प्रतिद्वंद्वी ‘अनएकैडमी’ ही क्यों न हो, IPL के जरिए हर  भारतीय के ड्राइंग रूम में प्रवेश करने का अवसर है। ‘ड्रीम11’  से जुड़े लोग भी लगभग हर जगह हैं। 8 करोड़ भारतीय फैंटेसी गेम खेलते हैं,  जिनमें एक दिहाड़ी मजदूर से लेकर कॉरपोरेट सीईओ तक शामिल हैं। लगभग हर भारतीय की एक फैंटेसी स्पोर्ट्स टीम है, जिसमें मैं भी शामिल हूं।

18 अगस्त को टाइटल स्पॉन्सरशिप की घोषणा होने की संभावना है, आपको क्या लगता है कि परिणाम क्या होगा?

इन परिस्थितियों से आश्चर्यचकित न हों, मंगलवार को ही बीसीसीआई आने वाले आईपीएल टाइटल स्पॉन्सरशिप की घोषणा करेगा। भविष्यवाणी करें, तो यह  अपेक्षित राजस्व से अधिक उत्पन्न करेगा और फिर एक स्ट्रॉन्ग स्टेटमेंट देगा, जो इंडियन स्पोर्ट्स इंडस्ट्री के लिए प्रोत्साहन का काम करेगा।

वहीं, कुछ लोगों ने आईपीएल के संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में होने पर सवाल उठाए हैं और इस तरह की दलीलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। आईपीएल सिर्फ विराट कोहली या महेंद्र सिंह धोनी के बारे में नहीं है। जब हम उन्हें खेल में सबसे आगे देखते हैं, तो यह पूरी स्पोर्ट्स इंडस्ट्री को प्रभावित करता है, जिसमें ब्रॉडकास्टर, मीडिया, स्टेट एसोसिएशन, स्पोर्ट्स गुड्स कंपनीज, फर्स्ट क्लास क्रिकेटर्स और कई अन्य शामिल हैं।

मनी जनरेट होती है, तो इससे हर कोई जुड़ा होता है, हर किसी को लाभ होता है और यदि टूर्नामेंट आयोजित नहीं किया जाता, तो इससे कई लोगों की जिंदगी  और उनकी आजीविका पर असर पड़ता। हालांकि फ्रंट रैंक्ड के स्टार्स को तो इतना नहीं, लेकिन बैकग्राउंड से लोगों पर बहुत ज्यादा प्रभाव पड़ेगा, जो इस प्रतियोगिता में समान हितधारक हैं। वैसे मैं यह देखने के लिए उत्सुक हूं कि मंगलवार को क्या होगा। लेकिन एक बार फिर कहना चाहूंगा कि पुरानी बातों पर न जाएं, बीसीसीआई इंडिया इंक (India Inc) के सपोर्ट से मार्केट को सरप्राइज करेगा।

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पिता से सीखीं इन तीन खास बातों का हमेशा ध्यान रखती हैं इंडिया टुडे समूह की कली पुरी

‘बिजनेस वर्ल्ड’ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा के साथ इंडिया टुडे ग्रुप की वाइस चेयरपर्सन कली पुरी ने तमाम पहलुओं पर बातचीत की

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 06 August, 2020
Last Modified:
Thursday, 06 August, 2020
Kalli Purie

एक्सचेंज4मीडिया (exchange4media) समूह की जानी-मानी वीकली मैगजीन ‘इम्पैक्ट’ (IMPACT) द्वारा मीडिया, एडवर्टाइजमेंट और मार्केटिंग में इस साल अपनी खास पहचान बनाने वाली 50 महिलाओं की लिस्‍ट (IMPACT’s 50 Most Influential Women, 2020) से पांच अगस्त को पर्दा उठ गया। शाम पांच बजे से वर्चुअल रूप से आयोजित एक कार्यक्रम में इस लिस्ट से पर्दा उठाया गया। इस साल इस लिस्ट में ‘इंडिया टुडे’ (India Today) समूह की वाइस चेयरपर्सन कली पुरी ने पहला स्थान हासिल किया है।

इस मौके पर ‘बिजनेस वर्ल्ड’ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा के साथ एक बातचीत में कली पुरी ने अपने पिता अरुण पुरी के साथ काम करने के अपने अनुभव और आज के डिजिटल युग में न्यूज टेलिविजन की स्थिति समेत तमाम पहलुओं पर अपने विचार रखे। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

इंडिया टुडे ग्रुप के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ अपने पिता अरुण पुरी के साथ काम करने के अनुभव के बारे में बताएं?

इस ग्रुप में मुझे 21 साल और कुल मिलाकर 25 साल काम करते हुए हो गए हैं। इस दौरान मुझे उनके (पिता के) साथ काम करने का काफी समय मिला है। उनके साथ काम करना काफी अच्छा लगता है, क्योंकि हम काफी प्रोफेशनल तरीके से काम करते हैं। काम के दौरान वह सिर्फ एपी होते हैं, जबकि घर पर ऐसा नहीं होता है। इसी तरह, घर पर क्या होता है, यह हम ऑफिस से पूरी तरह अलग रखते हैं। काफी शुरुआत में जब हमने साथ काम करना शुरू किया था, तभी इस बारे में यह फैसला ले लिया था कि हमें प्रोफेशनल व पारिवारिक रिश्तों को अलग-अलग रखना है। इसने हमें साथ-साथ मिलकर काम करने में काफी मदद की है। एक बॉस के रूप में उन्हें हर काम में परफेक्शन चाहिए होता है, लेकिन वह दूसरों को अपने आइडिया व दृष्टिकोण रखने का भी मौका देते हैं। इतने वर्षों में संस्थान को आगे ले जाने में उन्होंने जो दृष्टिकोण अपनाया है और पत्रकारिता के लिए उनका जो प्यार है, वह आपको अपने पथ से भटकने नहीं देता। इसलिए एक लाइट हाउस के रूप में हमारा मार्ग हमेशा काफी बेहतर रहा है। इस बात को लेकर हम पूरी तरह स्पष्ट हैं कि हम किस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

ऐसी कौन से तीन प्रमुख बातें हैं, जो आपने अपने पिता से सीखी हैं?

अपने पिता से जो तीन खास चीजें मैंने सीखी हैं, वे हैं चीजों पर विस्तार से ध्यान देना, दूसरा अपने बिजनेस अथवा काम पर पूरा ध्यान लगाना और तीसरी बात यह है कि हमेशा सही चीजें करना। सही चीजें करें और लंबे समय में हमेशा आपको इसका फायदा मिलता है।

न्यूज टेलिविजन को लेकर आपका क्या कहना है, खासकर कोविड-19 के बाद डिजिटल युग की बात करें तो? इंडिया टुडे ग्रुप किस तरह से इसकी तैयारी कर रहा है?

जब इंडिया टुडे पाक्षिक (fortnightly) से साप्ताहिक (weekly) में तब्दील हुई थी, तब मैं वहीं थी। तब ग्रुप में मेरी एंट्री हुई ही थी और मैं एक इंटर्न के तौर पर उनके लिए क्रिएटिव एडवर्टाइजिंग कर रही थी। टीवी का जो सफर है, वह रोलर कोस्टर (roller-coaster) की तरह रहा है। मैं प्रिंट बैकग्राउंड से आई थी और मैंने डिजिटल में 20 साल से ज्यादा समय गुजारा है। अब के टीवी में पहले की टीवी जैसा कुछ नहीं है। शुरुआती दिनों में चेयरमैन खुद बैठते थे और प्रत्येक एंकर द्वारा बोले गए हर शब्द पर नजर रखते थे, क्योंकि ‘आजतक’ की शुरुआत सिर्फ 30 मिनट के बुलेटिन के तौर पर हुई थी और इसके बाद यह 24x7  चैनल बन गया। मैं अब उस तरह इसे कंट्रोल नहीं कर सकती, क्योंकि हमारे पास अब पूरा डिजिटल सिस्टम और सोशल मीडिया है।

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